{"ref": "rv/1", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/1/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "राज-विद्या: ज्ञान का राजा", "purport": "śrī bhagavān uvāca\n\nidaṁ tu te guhyatamaṁ\n\npravakṣyāmy anasūyave\n\njñānaṁ vijñāna-sahitaṁ\n\nyaj jñātvā mokṣyase 'śubhāt\n\n\"श्रीभगवान् ने कहा: हे अर्जुन! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, अतः मैं तुम्हें यह परम गुह्य ज्ञान प्रदान करूँगा, जिसे जानकर तुम भौतिक अस्तित्व के दुःखों से मुक्त हो जाओगे।\" (गीता 9.1)\n\n*भगवद्गीता* के नवम अध्याय के आरम्भिक शब्द संकेत करते हैं कि स्वयं परमेश्वर बोल रहे हैं। यहाँ श्रीकृष्ण को भगवान् कहकर सम्बोधित किया गया है। भग का अर्थ है ऐश्वर्य, और वान् का अर्थ है वह जो उनका अधिकारी हो। हमारे मन में ईश्वर की कुछ धारणा रहती है, किन्तु वैदिक साहित्य में ईश्वर से क्या तात्पर्य है, इसका निश्चित वर्णन एवं परिभाषा मिलती है, और जो तात्पर्य है उसे एक ही शब्द में बताया गया है—भगवान्। भगवान् समस्त ऐश्वर्यों के अधिकारी हैं—ज्ञान, धन, शक्ति, सौन्दर्य, यश एवं त्याग की समग्रता के। जब हमें कोई ऐसा मिले जो इन ऐश्वर्यों का पूर्ण रूप से अधिकारी हो, तब हमें जान लेना चाहिए कि वह ईश्वर है। बहुत से धनी, बुद्धिमान्, यशस्वी, सुन्दर एवं शक्तिशाली पुरुष होते हैं, किन्तु कोई एक पुरुष इन समस्त ऐश्वर्यों का अधिकारी होने का दावा नहीं कर सकता। केवल श्रीकृष्ण ही इन्हें समग्र रूप से धारण करने का दावा करते हैं।\n\nbhoktāraṁ yajña-tapasāṁ\n\nsarva-loka-maheśvaram\n\nsuhṛdaṁ sarva-bhūtānāṁ\n\njñātvā māṁ śāntim ṛcchati\n\n\"समस्त यज्ञों एवं तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों एवं देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का हितैषी एवं शुभचिन्तक मुझे जानकर मुनिगण भौतिक दुःखों की पीड़ा से शान्ति प्राप्त करते हैं।\" (गीता 5.29)\n\nयहाँ श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि वे समस्त क्रियाओं के भोक्ता एवं समस्त लोकों के स्वामी हैं (sarva-loka-maheśvaram)। कोई व्यक्ति भूमि का विशाल भाग धारण कर सकता है, और उसे अपने स्वामित्व पर गर्व हो सकता है, किन्तु श्रीकृष्ण समस्त लोकमण्डलों के अधिकारी होने का दावा करते हैं। श्रीकृष्ण समस्त जीवों के मित्र होने का भी दावा करते हैं (suhṛdaṁ sarva-bhūtānām)। जब कोई व्यक्ति यह समझ लेता है कि ईश्वर ही सबका स्वामी, सबका मित्र एवं सबका भोक्ता है, तब वह परम शान्त हो जाता है। यही वास्तविक शान्ति-सूत्र है। जब तक कोई यह सोचता है, \"मैं स्वामी हूँ\", तब तक उसे शान्ति नहीं मिल सकती। कौन स्वामित्व का दावा करने में समर्थ है? कुछ ही सौ वर्ष पूर्व लाल इंडियन अमेरिका के स्वामी माने जाते थे। आज अपनी बारी में हम उस स्वामित्व का दावा कर रहे हैं, किन्तु चार सौ अथवा एक हज़ार वर्ष में सम्भवतः कोई और आकर उसी का दावा करेगा। भूमि यहीं है, और हम यहाँ आकर मिथ्या रूप से स्वयं को उसका स्वामी घोषित कर देते हैं। मिथ्या स्वामित्व का यह दर्शन वैदिक आदेशों के अनुरूप नहीं है। *श्री ईशोपनिषद्* कहती है कि \"इस ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ भी चर अथवा अचर है, वह सब भगवान् के द्वारा नियन्त्रित एवं उनके स्वामित्व में है (īśāvāsyam idaṁ sarvaṁ)।\" इस कथन की सच्चाई तथ्यपरक है, किन्तु भ्रमवश हम सोचते हैं कि हम स्वामी हैं। वास्तव में ईश्वर ही सबका स्वामी है, और इसीलिए उसे सर्वाधिक धनी कहा जाता है।\n\nनिःसन्देह बहुत से ऐसे मनुष्य हैं जो स्वयं को ईश्वर होने का दावा करते हैं। उदाहरणार्थ, भारत में किसी भी समय कम-से-कम एक दर्जन ऐसे लोगों को ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती जो स्वयं को ईश्वर बताते हों। किन्तु यदि आप उनसे पूछें कि क्या वे सबके स्वामी हैं, तो उन्हें इसका उत्तर देना कठिन हो जाता है। यह वह कसौटी है जिससे हम समझ सकते हैं कि ईश्वर कौन है। ईश्वर सबका स्वामी है, और ऐसा होने के कारण उसे किसी भी अन्य व्यक्ति अथवा वस्तु से अधिक शक्तिशाली होना ही चाहिए। जब श्रीकृष्ण साक्षात् इस पृथ्वी पर उपस्थित थे, तब उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उनके कभी कोई युद्ध हारने का अभिलेख नहीं है। वे क्षत्रिय (योद्धा) कुल के थे, और क्षत्रियों का कार्य दुर्बलों को रक्षा प्रदान करना है। जहाँ तक उनके ऐश्वर्य का प्रश्न है, उन्होंने 16,108 पत्नियों से विवाह किया। प्रत्येक पत्नी का अपना पृथक् प्रासाद था, और उन सबके साथ भोग करने के लिए श्रीकृष्ण ने स्वयं को 16,108 बार विस्तारित किया। यह विश्वास करना कठिन प्रतीत हो सकता है, किन्तु यह *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है, और भारत के महान् ऋषिगण इसे शास्त्र के रूप में तथा श्रीकृष्ण को ईश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं।\n\nइस नवम अध्याय के प्रथम श्लोक में, guhyatamam शब्द के द्वारा श्रीकृष्ण यह संकेत करते हैं कि वे अर्जुन को परम गोपनीय ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। वे यह अर्जुन को ही क्यों बता रहे हैं? इसका कारण यह है कि अर्जुन anasūyu—अनीर्ष्यालु—है। भौतिक जगत् में यदि कोई हमसे श्रेष्ठ हो, तो हम ईर्ष्या करते हैं। हम केवल एक-दूसरे से ही नहीं, अपितु ईश्वर से भी ईर्ष्या करते हैं। और जब श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मैं स्वामी हूँ\", तब हम उस पर अविश्वास करते हैं। किन्तु अर्जुन के साथ ऐसी बात नहीं है, जो श्रीकृष्ण को बिना ईर्ष्या के सुनता है। अर्जुन श्रीकृष्ण से व्यर्थ विवाद नहीं करता, अपितु वे जो भी कहते हैं उससे सहमत हो जाता है। यही उसकी विशेष योग्यता है, और यही *भगवद्गीता* को समझने की रीति है। अपनी मानसिक कल्पनाओं के द्वारा यह समझ पाना सम्भव नहीं कि ईश्वर क्या है; हमें सुनना होता है, और हमें स्वीकार करना होता है।\n\nचूँकि अर्जुन ईर्ष्यालु नहीं है, अतः श्रीकृष्ण उसे यह विशेष ज्ञान बताते हैं। यह केवल सैद्धान्तिक ज्ञान ही नहीं, अपितु व्यावहारिक ज्ञान भी है (vijñāna-sahitam)। *भगवद्गीता* से हमें जो भी ज्ञान प्राप्त होता है, उसे भावुकता अथवा कट्टरता न समझा जाए। यह ज्ञान ज्ञान एवं विज्ञान दोनों है—सैद्धान्तिक प्रज्ञा एवं वैज्ञानिक ज्ञान। यदि कोई इस ज्ञान में पारंगत हो जाए, तो मोक्ष निश्चित है। इस भौतिक जगत् में जीवन स्वभावतः अशुभ एवं दुःखमय है। मोक्ष का अर्थ है मुक्ति, और प्रतिज्ञा यह है कि इस ज्ञान को समझ लेने के बल पर मनुष्य समस्त दुःखों से मुक्ति प्राप्त करेगा। अतः यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि श्रीकृष्ण इस ज्ञान के विषय में क्या कहते हैं।\n\nrāja-vidyā rāja-guhyaṁ\n\npavitram idam uttamam\n\npratyakṣāvagamaṁ dharmyaṁ\n\nsu-sukhaṁ kartum avyayam\n\n\"यह ज्ञान विद्या का राजा है, समस्त रहस्यों में परम रहस्य। यह शुद्धतम ज्ञान है, और चूँकि यह अनुभूति के द्वारा आत्मा का प्रत्यक्ष बोध कराता है, अतः यह धर्म की पूर्णता है। यह अविनाशी है, और इसे आनन्दपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।\" (गीता 9.2)\n\n*भगवद्गीता* के अनुसार सर्वोच्च ज्ञान (rāja-vidyā rāja-guhyam) कृष्णभावनामृत है, क्योंकि *भगवद्गीता* में हम पाते हैं कि जो वास्तव में ज्ञानवान् है उसका लक्षण यह है कि उसने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर ली है। जब तक हम ईश्वर के विषय में कल्पना करते रहते हैं किन्तु शरणागत नहीं होते, तब तक यही समझा जाता है कि हमने ज्ञान की पूर्णता प्राप्त नहीं की। ज्ञान की पूर्णता यह है:\n\nbahūnāṁ janmanām ante\n\njñānavān māṁ prapadyate\n\nvāsudevaḥ sarvam iti\n\nsa mahātmā sudurlabhaḥ\n\n\"अनेक जन्मों एवं मृत्युओं के पश्चात् जो वास्तव में ज्ञानवान् है, वह मुझे समस्त कारणों का कारण एवं जो कुछ भी है उस सबका हेतु जानकर मेरी शरण में आता है। ऐसी महान् आत्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\" (गीता 7.19)\n\nजब तक हम शरणागत नहीं होते, तब तक हम ईश्वर को नहीं समझ सकते। ईश्वर के प्रति शरणागति में अनेक जन्म लग सकते हैं, किन्तु यदि हम यह स्वीकार कर लें कि ईश्वर महान् है, तो तत्काल उसकी शरण में जाना सम्भव है। किन्तु प्रायः भौतिक जगत् में हमारी यह स्थिति नहीं होती। हम स्वभाव से ही ईर्ष्यालु हैं और फलस्वरूप सोचते हैं, \"अरे, मैं ईश्वर के समक्ष शरणागत क्यों होऊँ? मैं स्वतन्त्र हूँ। मैं स्वतन्त्र रूप से कार्य करूँगा।\" अतः इस भ्रान्ति को सुधारने के लिए हमें अनेक जन्मों तक प्रयास करना पड़ता है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण का नाम विशेष रूप से सार्थक है। कृष् का अर्थ है \"जन्म की पुनरावृत्ति\", और ण का अर्थ है \"वह जो रोकता है\"। हमारे जन्म की पुनरावृत्ति को केवल ईश्वर ही रोक सकता है। ईश्वर की अहैतुकी कृपा के बिना कोई भी अपने जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति को नहीं रोक सकता।\n\nनवम अध्याय का विषय राज-विद्या है। राज का अर्थ है \"राजा\", और विद्या का अर्थ है \"ज्ञान\"। साधारण जीवन में हम एक व्यक्ति को एक विषय में निपुण तथा दूसरे को किसी अन्य विषय में निपुण पाते हैं। तथापि यह ज्ञान समस्त अन्य ज्ञानों पर सार्वभौम है, और अन्य समस्त ज्ञान इसके अधीन अथवा इसके सापेक्ष हैं। rāja-guhyam शब्द संकेत करता है कि यह सार्वभौम ज्ञान अत्यन्त गोपनीय है, और pavitram शब्द का अर्थ है कि यह अत्यन्त शुद्ध है। यह ज्ञान uttamam भी है; उद् का अर्थ है \"पार करना\", और तम का अर्थ है \"अन्धकार\", और जो ज्ञान इस संसार एवं इस संसार के ज्ञान का अतिक्रमण कर जाता है, उसे uttamam कहते हैं। यह प्रकाश का ज्ञान है, और इससे अन्धकार पृथक् कर दिया गया है। यदि कोई इस ज्ञान-पथ का अनुसरण करे, तो वह स्वयं समझ लेगा कि वह पूर्णता के पथ पर कितना आगे बढ़ चुका है (pratyakṣāvagamaṁ dharmyam)। Su-sukhaṁ kartum संकेत करता है कि इस ज्ञान को सम्पन्न करना अत्यन्त सुखद एवं आनन्दमय है। और avyayam संकेत करता है कि यह ज्ञान स्थायी है। हम इस भौतिक जगत् में शिक्षा अथवा धन के लिए कार्य कर सकते हैं, किन्तु ये वस्तुएँ avyayam नहीं हैं, क्योंकि ज्यों ही यह शरीर समाप्त होता है, अन्य सब कुछ भी समाप्त हो जाता है। मृत्यु के साथ हमारी शिक्षा, हमारी उच्च उपाधियाँ, बैंक-शेष, परिवार—सब कुछ—समाप्त हो जाते हैं। हम इस भौतिक जगत् में जो कुछ भी कर रहे हैं, वह शाश्वत नहीं है। तथापि यह ज्ञान ऐसा नहीं है।\n\nnehābhikrama-nāśo 'sti\n\npratyavāyo na vidyate\n\nsvalpam apy asya dharmasya\n\ntrāyate mahato bhayāt\n\n\"इस प्रयास में कोई हानि अथवा क्षय नहीं होता, और इस पथ पर थोड़ी-सी भी प्रगति मनुष्य को महान्-से-महान् भय से रक्षा प्रदान कर सकती है।\" (गीता 2.40)\n\nकृष्णभावनामृत में ज्ञान इतना पूर्ण है कि यदि कोई कृष्णभावनामृत में कार्य करे और फिर भी पूर्णता प्राप्त न करे, तो अपने अगले जीवन में वह वहीं से आरम्भ करता है जहाँ उसने छोड़ा था। दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृत में किए गए कर्म टिकाऊ होते हैं। इसके विपरीत, भौतिक उपलब्धियाँ, चूँकि वे शरीर से सम्बन्धित होती हैं, मृत्यु के समय नष्ट हो जाती हैं। उपाधियों से सम्बन्धित ज्ञान स्थायी नहीं रहता। मैं सोचता हूँ कि मैं पुरुष हूँ अथवा स्त्री, अमेरिकी हूँ अथवा भारतीय, ईसाई हूँ अथवा हिन्दू—ये सभी शरीर से सम्बन्धित उपाधियाँ हैं, और जब शरीर समाप्त हो जाता है, तो ये भी समाप्त हो जाएँगी। हम वास्तव में आत्मा हैं, और इसीलिए हमारी आध्यात्मिक क्रियाएँ हम जहाँ भी जाएँ हमारे साथ जाएँगी।\n\nश्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि ज्ञान का यह राजा आनन्दपूर्वक भी सम्पन्न होता है। हम सरलता से देख सकते हैं कि कृष्णभावनामृत में क्रियाएँ आनन्दपूर्वक की जाती हैं। इसमें कीर्तन एवं नृत्य है, प्रसादम् (श्रीकृष्ण को अर्पित भोजन) ग्रहण करना तथा *भगवद्गीता* की चर्चा करना है। ये प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं। ऐसे कोई कठोर नियम एवं विधि-विधान नहीं हैं कि हमें इतने समय तक इतना सीधा बैठना पड़े, अथवा इतने व्यायाम करने पड़ें, अथवा अपने श्वास को नियन्त्रित करना पड़े। नहीं, यह प्रक्रिया अत्यन्त सरलता एवं आनन्दपूर्वक की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति नृत्य करना, गाना, खाना तथा सत्य सुनना चाहता है। यह प्रक्रिया वास्तव में susukham—अत्यन्त सुखद—है।\n\nभौतिक जगत् में शिक्षा के अनेक स्तर होते हैं। कुछ लोग कभी प्राथमिक पाठशाला अथवा माध्यमिक विद्यालय भी पूर्ण नहीं कर पाते, जबकि अन्य आगे बढ़कर विश्वविद्यालय की शिक्षा, बी.ए., एम.ए., पी-एच.डी. आदि प्राप्त करते हैं। किन्तु यह राज-विद्या, शिक्षा का राजा, ज्ञान का परम कल्याण (summum bonum) क्या है? यह यही कृष्णभावनामृत है। वास्तविक ज्ञान यह समझना है कि \"मैं क्या हूँ\"। जब तक हम यह समझने की स्थिति में नहीं पहुँचते कि हम क्या हैं, तब तक हम वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। जब सनातन गोस्वामी ने अपना सरकारी पद त्याग दिया और प्रथम बार चैतन्य महाप्रभु के समीप आए, तब उन्होंने भगवान् से पूछा, \"शिक्षा क्या है?\" यद्यपि सनातन गोस्वामी संस्कृत सहित अनेक भाषाएँ जानते थे, फिर भी उन्होंने वास्तविक शिक्षा के विषय में जिज्ञासा की। सनातन गोस्वामी ने भगवान् से कहा, \"सामान्य जनसमुदाय मुझे अत्यन्त शिक्षित कहता है, और मैं ऐसा मूर्ख हूँ कि मैं वास्तव में उनकी बात मान लेता हूँ।\"\n\nभगवान् ने उत्तर दिया, \"तुम स्वयं को सुशिक्षित क्यों न समझो? तुम तो संस्कृत एवं फ़ारसी के महान् विद्वान् हो।\"\n\nसनातन गोस्वामी ने कहा, \"ऐसा हो सकता है, किन्तु मैं यह नहीं जानता कि मैं क्या हूँ।\" तत्पश्चात् उन्होंने भगवान् से आगे कहा: \"मैं दुःख भोगना नहीं चाहता, किन्तु ये भौतिक दुःख मुझ पर बलात् थोपे जाते हैं। मैं न तो यह जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ, और न यह कि मैं कहाँ जा रहा हूँ, फिर भी लोग मुझे शिक्षित कहते हैं। जब वे मुझे महान् विद्वान् कहते हैं, तो मैं सन्तुष्ट हो जाता हूँ, किन्तु वस्तुतः मैं ऐसा महामूर्ख हूँ कि मैं यह तक नहीं जानता कि मैं क्या हूँ।\" सनातन गोस्वामी वास्तव में हम सबके लिए ही बोल रहे थे, क्योंकि यही हमारी वर्तमान स्थिति है। हमें अपनी शैक्षणिक शिक्षा पर गर्व हो सकता है, किन्तु यदि पूछा जाए कि हम क्या हैं, तो हम बता पाने में असमर्थ रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति इस धारणा के अधीन है कि यह शरीर ही आत्मा है, किन्तु वैदिक स्रोतों से हम सीखते हैं कि ऐसा नहीं है। केवल यह अनुभव कर लेने के पश्चात् कि हम ये शरीर नहीं हैं, हम वास्तविक ज्ञान में प्रवेश कर सकते हैं और समझ सकते हैं कि हम वास्तव में क्या हैं। अतः यही ज्ञान का आरम्भ है।\n\nराज-विद्या को और आगे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है—न केवल यह जानना कि मनुष्य क्या है, अपितु तदनुसार कर्म करना भी। यदि हम यह नहीं जानते कि हम कौन हैं, तो हमारी क्रियाएँ उचित कैसे हो सकती हैं? यदि हम अपनी पहचान के विषय में भ्रमित हैं, तो हम अपनी क्रियाओं के विषय में भी भ्रमित रहेंगे। केवल यह जान लेना कि हम ये भौतिक शरीर नहीं हैं, पर्याप्त नहीं है; हमें इस दृढ़ विश्वास के अनुसार कर्म करना होगा कि हम आध्यात्मिक हैं। इस ज्ञान पर आधारित कर्म—आध्यात्मिक क्रिया—ही कृष्णभावनामृत में कार्य है। ऐसा ज्ञान इतनी सरलता से प्राप्त होने योग्य प्रतीत नहीं हो सकता, किन्तु श्रीकृष्ण एवं भगवान् चैतन्य महाप्रभु की कृपा से इसे अत्यन्त सरल बना दिया गया है, जिन्होंने हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के जप की प्रक्रिया के माध्यम से इस ज्ञान को सहज ही सुलभ कर दिया।\n\nचैतन्य महाप्रभु ने जीवों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया: जो चलते-फिरते हैं और जो नहीं चलते। वृक्ष, घास, पौधे, पत्थर आदि नहीं चलते, क्योंकि उनकी चेतना पर्याप्त रूप से विकसित नहीं होती। उनकी चेतना वहाँ है, किन्तु ढकी हुई है। यदि कोई जीव अपनी स्थिति को नहीं समझता, तो वह पत्थर के समान है, चाहे वह मानव शरीर में ही क्यों न निवास करता हो। जीव—पक्षी, सरीसृप, पशु, कीट, मनुष्य, देवता आदि—की संख्या 80,00,000 से अधिक योनियों में है, और इनमें से अत्यन्त अल्प संख्या मनुष्यों की है। भगवान् चैतन्य आगे इंगित करते हैं कि मनुष्य की 4,00,000 योनियों में से कुछ ही सभ्य हैं; और अनेक सभ्य व्यक्तियों में से केवल कुछ ही ऐसे हैं जो शास्त्रों के प्रति निष्ठावान् हैं।\n\nआजकल अधिकांश लोग किसी-न-किसी धर्म के प्रति निष्ठावान् होने का दावा करते हैं—ईसाई, हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध आदि—किन्तु वास्तव में वे शास्त्रों में सचमुच विश्वास नहीं करते। जो शास्त्रों में विश्वास करते हैं, वे प्रायः पुण्यमय परोपकारी कार्यों में आसक्त रहते हैं। वे मानते हैं कि धर्म का अर्थ है यज्ञ, दान एवं तप (तपस्या)। जो तपस्या में संलग्न होता है, वह स्वेच्छा से अत्यन्त कठोर विधि-विधान धारण करता है, जैसे ब्रह्मचारी विद्यार्थी अथवा संन्यासी (संन्यास आश्रम वाले) धारण करते हैं। दान का अर्थ है अपनी भौतिक सम्पत्ति को स्वेच्छा से दे देना। वर्तमान युग में यज्ञ नहीं होते, किन्तु *महाभारत* जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थों से हमें यह जानकारी मिलती है कि राजा माणिक्य, स्वर्ण एवं रजत बाँटकर यज्ञ करते थे। यज्ञ मुख्यतः राजाओं के लिए था, और दान, बहुत छोटे पैमाने पर, गृहस्थों के लिए नियत था। जो वास्तव में शास्त्रों में विश्वास करते थे, वे प्रायः इनमें से कुछ सिद्धान्तों को अपना लेते थे। किन्तु प्रायः इस युग में लोग केवल यही कहते हैं कि वे किसी धर्म से सम्बन्धित हैं, किन्तु वास्तव में कुछ नहीं करते। ऐसे लाखों लोगों में से अत्यन्त अल्प संख्या ही वास्तव में दान, यज्ञ एवं तपस्या करती है। चैतन्य महाप्रभु आगे इंगित करते हैं कि समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करने वाले लाखों लोगों में से केवल कुछ ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त करते हैं और समझते हैं कि वे क्या हैं।\n\nकेवल यह जान लेना कि \"मैं यह शरीर नहीं हूँ, अपितु आत्मा हूँ\", पर्याप्त नहीं है। हमें भौतिक प्रकृति के इस बन्धन से छूटना होगा। इसे मुक्ति, अर्थात् मोक्ष कहते हैं। हज़ारों ऐसे व्यक्तियों में से जिन्हें इस आत्मज्ञान की उपलब्धि है कि वे क्या एवं कौन हैं, केवल एक अथवा दो ही वास्तव में मुक्त हो पाते हैं। और हज़ारों मुक्त व्यक्तियों में से केवल एक अथवा दो ही समझ पाते हैं कि श्रीकृष्ण क्या एवं कौन हैं। अतः श्रीकृष्ण को समझना ऐसा सरल कार्य नहीं है। इस प्रकार इस कलियुग में, जो अज्ञान एवं अव्यवस्था से युक्त युग है, मुक्ति प्रायः सबकी पहुँच से बाहर है। मनुष्य को सभ्य बनने, फिर धार्मिक बनने की समूची कठिन परीक्षा से गुज़रना पड़ता है, फिर उसे दान एवं यज्ञ करने पड़ते हैं और ज्ञान के स्तर पर पहुँचना पड़ता है, फिर मुक्ति की अवस्था में, और अन्ततः मुक्ति के पश्चात् इस बोध में कि श्रीकृष्ण क्या हैं। इस प्रक्रिया का संकेत *भगवद्गीता* में भी मिलता है:\n\nbrahma-bhūtaḥ prasannātmā\n\nna śocati na kāṅkṣati\n\nsamaḥ sarveṣu bhūteṣu\n\nmad-bhaktiṁ labhate parām\n\n\"जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित होता है, वह तत्काल परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है और न किसी वस्तु की इच्छा करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त कर लेता है।\" (गीता 18.54)\n\nये मुक्ति के लक्षण हैं। जो मुक्त है उसका प्रथम लक्षण यह है कि वह अत्यन्त प्रसन्न रहता है। उसे विषादग्रस्त पाना सम्भव नहीं। न ही उसे किसी प्रकार की चिन्ता होती है। वह कभी यह कुढ़न नहीं करता, \"यह वस्तु मेरे पास नहीं है। अरे, मुझे यह वस्तु अवश्य प्राप्त करनी है। अरे, यह बिल मुझे चुकाना है। मुझे यहाँ जाना है, वहाँ जाना है।\" जो मुक्त है उसे कोई चिन्ता नहीं होती। वह संसार का सबसे निर्धन व्यक्ति हो सकता है, किन्तु वह न तो शोक करता है और न यह सोचता है कि वह निर्धन है। वह यह क्यों सोचे कि वह निर्धन है? जब हम यह सोचते हैं कि हम ये भौतिक शरीर हैं और इनके साथ हमारी सम्पत्तियाँ भी हैं, तब हम सोचते हैं कि हम निर्धन हैं अथवा धनी, किन्तु जो जीवन की भौतिक धारणा से मुक्त है उसका सम्पत्ति अथवा सम्पत्ति के अभाव से कोई सरोकार नहीं रहता। वह सोचता है, \"मेरे पास न कुछ खोने को है, न कुछ पाने को। मैं इस सबसे पूर्णतया पृथक् हूँ।\" न ही वह किसी अन्य को धनी अथवा निर्धन, शिक्षित अथवा अशिक्षित, सुन्दर अथवा कुरूप आदि के रूप में देखता है। वह किसी भौतिक द्वैत को नहीं देखता, क्योंकि उसकी दृष्टि पूर्णतया आध्यात्मिक स्तर पर है, और वह देखता है कि प्रत्येक जीव श्रीकृष्ण का अंश एवं अविभाज्य भाग है। इस प्रकार समस्त जीवों को उनकी वास्तविक पहचान में देखते हुए, वह उन्हें वापस कृष्णभावनामृत में लाने का प्रयास करता है। उसका दृष्टिकोण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह ब्राह्मण हो अथवा शूद्र, काला हो अथवा गोरा, हिन्दू, ईसाई अथवा जो कुछ भी हो—कृष्णभावनामृत में आए। जब कोई इस प्रकार स्थित होता है, तब: mad-bhaktiṁ labhate parām [गीता 18.54]—वह श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बनने के योग्य हो जाता है।\n\nव्यावहारिक रूप से, यह प्रक्रिया इस कलियुग में बहुत सरल नहीं है। *श्रीमद्भागवत* में इस युग के लोगों का वर्णन दिया गया है। कहा गया है कि उनकी आयु अत्यन्त अल्प है, वे कफ-प्रधान एवं मन्द होते हैं तथा बहुत अधिक सोते हैं, और जब वे सो नहीं रहे होते, तब वे धन कमाने में व्यस्त रहते हैं। अधिक-से-अधिक उनके पास दिन में केवल दो घण्टे आध्यात्मिक क्रियाओं के लिए होते हैं, अतः आध्यात्मिक बोध की क्या आशा है? यह भी कहा गया है कि यदि कोई आध्यात्मिक प्रगति करने को उत्सुक भी हो, तो उसका लाभ उठाने के लिए अनेक कूट-आध्यात्मिक संस्थाएँ विद्यमान हैं। इस युग में लोगों को अभागा भी बताया गया है। उन्हें जीवन की प्राथमिक माँगों—खाने, रक्षा करने, संगम करने तथा सोने—को पूरा करने में बहुत कठिनाई होती है, जो आवश्यकताएँ पशुओं द्वारा भी पूरी की जाती हैं। इस युग में यदि लोग इन आवश्यकताओं को पूरा कर भी रहे हों, तो वे सदा युद्ध के विषय में चिन्तित रहते हैं—या तो आक्रमणकारियों से अपनी रक्षा करते हुए, या स्वयं युद्ध में जाने को विवश होते हुए। इसके अतिरिक्त, कलियुग में सदा कष्टकारी रोग एवं आर्थिक समस्याएँ रहती हैं। अतः भगवान् श्रीकृष्ण ने यह विचार किया कि इस युग में लोगों के लिए विहित नियमों एवं विधि-विधानों का पालन करके मुक्ति की पूर्णावस्था पर पहुँचना असम्भव है।\n\nइस प्रकार अपनी अहैतुकी कृपा से, श्रीकृष्ण भगवान् चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए और हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के जप के द्वारा जीवन की सर्वोच्च पूर्णता एवं आध्यात्मिक आनन्द का साधन वितरित किया। जप की यह प्रक्रिया सर्वाधिक व्यावहारिक है, और यह इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कोई मुक्त है अथवा नहीं, अथवा किसी की दशा आध्यात्मिक जीवन के अनुकूल है अथवा नहीं—जो कोई भी इस प्रक्रिया को अपनाता है, वह तत्काल शुद्ध हो जाता है। इसीलिए इसे pavitram (शुद्ध) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, जो कोई इस कृष्णभावनामृत प्रक्रिया को अपनाता है, उसके पापमय कर्मों की समस्त सुप्त प्रतिक्रियाओं के बीज निष्फल हो जाते हैं। जिस प्रकार अग्नि उसमें डाली गई प्रत्येक वस्तु को भस्म कर देती है, उसी प्रकार यह प्रक्रिया हमारे पूर्व जीवनों की समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं को भस्म कर देती है।\n\nहमें यह समझना चाहिए कि हमारा दुःख हमारी पापमय क्रिया के कारण है, और पापमय क्रिया हमारे अज्ञान के कारण है। पाप, अथवा अपराध, उनके द्वारा किए जाते हैं जो यह नहीं जानते कि क्या है। उदाहरणार्थ, एक बालक अज्ञानवश सरलता से अपना हाथ अग्नि में डाल देगा। इस प्रकार वह तत्काल जल जाता है, क्योंकि अग्नि निष्पक्ष है और निर्दोष बालक के प्रति कोई विशेष विचार नहीं करती। वह तो केवल अग्नि के रूप में ही कार्य करेगी। इसी प्रकार, हम यह नहीं जानते कि यह भौतिक जगत् किस प्रकार कार्य कर रहा है, इसका नियन्ता कौन है, अथवा यह किस प्रकार नियन्त्रित है, और अपने अज्ञान के कारण हम मूर्खतापूर्ण ढंग से कार्य करते हैं, किन्तु प्रकृति इतनी कठोर है कि वह हमें अपने कर्मों की प्रतिक्रियाओं से बचने नहीं देती। हम जानते हुए कोई कर्म करें अथवा अनजाने में, प्रतिक्रियाएँ एवं उनके फलस्वरूप दुःख विद्यमान रहते हैं। तथापि ज्ञान के द्वारा हम समझ सकते हैं कि वास्तविक स्थिति क्या है, ईश्वर कौन है, और उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है।\n\nयह ज्ञान, जिसके द्वारा हम दुःख से छुटकारा पा सकते हैं, मनुष्य योनि में सम्भव है, पशु योनि में नहीं। हमें ज्ञान देने के लिए, हमें उचित दिशा-निर्देश देने के लिए, संसार के सभी भागों में विविध भाषाओं में लिखे गए शास्त्र विद्यमान हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने इंगित किया कि लोग अनादि काल से परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति विस्मरणशील हैं; अतः श्रीकृष्ण ने मनुष्य को शास्त्र प्रदान करने के लिए इतने प्रतिनिधि भेजे हैं। हमें इनका लाभ उठाना चाहिए, विशेषकर *भगवद्गीता* का, जो आधुनिक संसार के लिए प्रमुख शास्त्र है।"}
{"ref": "rv/2", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/2/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "संसार से परे ज्ञान", "purport": "श्रीकृष्ण विशेष रूप से कहते हैं कि कृष्णभावनामृत की यह प्रक्रिया susukham है—अभ्यास में अत्यन्त सुखद एवं सरल। वस्तुतः भक्ति की यह प्रक्रिया अत्यन्त सुखद है; हम वाद्ययन्त्रों के साथ मधुरता से गाते हैं, और कोई सुनेगा तथा साथ भी सम्मिलित हो जाएगा (śravaṇaṁ kīrtanam)। निःसन्देह यह संगीत परमेश्वर के सम्बन्ध में, उनके गुणगान में होना चाहिए। *भगवद्गीता* का श्रवण भी भक्ति का अंग है, और उसके श्रवण के अतिरिक्त मनुष्य को उसे अपने जीवन में लागू करने के लिए उत्सुक रहना चाहिए। कृष्णभावनामृत एक विज्ञान है और इसे आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए। भक्ति की नौ अनुशंसित प्रक्रियाएँ हैं (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वन्दन, सेवा, भगवान् के सेवक के रूप में संलग्न होना, भगवान् के साथ मैत्री-सम्बन्ध स्थापित करना, समस्त वस्तुएँ भगवान् को अर्पित करना)। ये सभी अभ्यास में सरल हैं और इन्हें आनन्दपूर्वक सम्पन्न करना चाहिए।\n\nनिःसन्देह यदि कोई यह सोचे कि *भगवद्गीता* एवं हरे कृष्ण मन्त्र हिन्दू व्यवस्था के अंग हैं और इस कारण उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहता, तो भी वह ईसाई गिरजाघर में जाकर वहाँ गा सकता है। इस प्रक्रिया एवं उस प्रक्रिया में कोई अन्तर नहीं है; बात यह है कि मनुष्य चाहे किसी भी प्रक्रिया का अनुसरण करे, उसे ईश्वर-भावनाभावित होना चाहिए। ईश्वर न तो मुसलमान है, न हिन्दू, न ईसाई—वह ईश्वर है। न ही हमें हिन्दू, मुसलमान अथवा ईसाई समझा जाए। ये देहगत उपाधियाँ हैं। हम सब शुद्ध आत्मा हैं, परमेश्वर के अंश एवं अविभाज्य भाग। ईश्वर pavitram है, शुद्ध, और हम भी शुद्ध हैं। किन्तु किसी-न-किसी प्रकार हम इस भौतिक सागर में गिर पड़े हैं, और ज्यों-ज्यों लहरें थपेड़े मारती हैं, हम दुःख भोगते हैं। वास्तव में भौतिक दुःखों की इन थपेड़ा मारती लहरों से हमारा कोई सरोकार नहीं है। हमें केवल यही प्रार्थना करनी चाहिए, \"हे श्रीकृष्ण! कृपया मुझे ऊपर उठा लीजिए।\" ज्यों ही हम श्रीकृष्ण को भूलते हैं, माया का सागर वहाँ उपस्थित रहता है, और वह तत्काल हमें जकड़ लेता है। इस सागर से छूटने के लिए हरे कृष्ण का जप सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे एक ध्वनि (śabda) है जो श्रीकृष्ण से अभिन्न है। कृष्ण ध्वनि एवं मूल श्रीकृष्ण एक ही हैं। जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं और नृत्य करते हैं, तब श्रीकृष्ण भी हमारे साथ नृत्य करते हैं। निःसन्देह हम कह सकते हैं, \"किन्तु मैं तो उन्हें नहीं देखता\", किन्तु हम देखने पर इतना बल क्यों देते हैं? सुनने पर क्यों नहीं? देखना, चखना, सूँघना, स्पर्श करना तथा सुनना—ये सभी अनुभव एवं ज्ञान के साधन हैं। हम देखने पर इतना विशेष बल क्यों देते हैं? भक्त श्रीकृष्ण को देखना नहीं चाहता; वह केवल श्रीकृष्ण के विषय में सुनकर ही सन्तुष्ट हो जाता है। देखना अन्ततः हो सकता है, किन्तु सुनने को इससे किंचित् कम महत्त्वपूर्ण न समझा जाए। ऐसी वस्तुएँ हैं जिन्हें हम सुनते तो हैं किन्तु देखते नहीं—वायु हमारे कानों के पास सरसराती हुई निकल सकती है, और हम उसे सुन सकते हैं, किन्तु वायु को देखने की कोई सम्भावना नहीं है। चूँकि सुनना देखने से किंचित् कम महत्त्वपूर्ण अथवा कम प्रामाणिक अनुभव नहीं है, अतः हम श्रीकृष्ण को सुन सकते हैं और ध्वनि के माध्यम से उनकी उपस्थिति का साक्षात्कार कर सकते हैं। स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मैं अपने धाम में नहीं रहता, अथवा ध्यान करने वाले योगी के हृदय में नहीं, अपितु वहाँ रहता हूँ जहाँ मेरे शुद्ध भक्त गा रहे होते हैं।\" ज्यों-ज्यों हम वास्तव में प्रगति करते हैं, हम श्रीकृष्ण की उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं।\n\nऐसा नहीं है कि हमें केवल श्रीकृष्ण से लेते रहना चाहिए और उन्हें कुछ अर्पित नहीं करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर से कुछ-न-कुछ ले रहा है, तो कुछ देते क्यों न? हम श्रीकृष्ण से इतना प्रकाश, वायु, भोजन, जल आदि ले रहे हैं। जब तक ये साधन श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान नहीं किए जाते, तब तक कोई जीवित नहीं रह सकता। क्या केवल लेते-लेते-लेते रहना, बदले में कभी कुछ अर्पित किए बिना, प्रेम है? प्रेम का अर्थ है लेना और देना भी। यदि हम किसी से केवल लेते रहें और बदले में उसे कुछ न दें, तो वह प्रेम नहीं है—वह शोषण है। ऐसा नहीं है कि हमें श्रीकृष्ण को कुछ अर्पित किए बिना केवल खाते रहना चाहिए। *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\npatraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ\n\nyo me bhaktyā prayacchati\n\ntad ahaṁ bhakty-upahṛtam\n\naśnāmi prayatātmanaḥ\n\nyat karoṣi yad aśnāsi\n\nyaj juhoṣi dadāsi yat\n\nyat tapasyasi kaunteya\n\ntat kuruṣva mad arpaṇam\n\n\"यदि कोई मुझे प्रेम एवं भक्ति सहित पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा। हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो एवं दान देते हो, तथा जो भी तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पण के रूप में किया जाए।\" (गीता 9.26–27)\n\nदेने एवं लेने के अतिरिक्त, भक्ति के सम्पादन में मनुष्य को अपना जो भी दुःख अथवा गोपनीय समस्या हो, वह श्रीकृष्ण के समक्ष निवेदित करनी चाहिए। उसे कहना चाहिए, \"हे श्रीकृष्ण! मैं इस प्रकार दुःख भोग रहा हूँ। मैं भौतिक माया के इस थपेड़ा मारते सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे ऊपर उठा लीजिए। मैं अब समझता हूँ कि मुझे केवल यहाँ रख दिया गया है, मानो अटलांटिक महासागर में फेंक दिया गया हो। मैं किसी भी प्रकार अटलांटिक महासागर के साथ अपनी पहचान नहीं जोड़ सकता, किन्तु मैं सागर के थपेड़ों के अधीन हूँ। वास्तव में मैं एक आध्यात्मिक स्फुलिंग हूँ, आपका एक खण्डांश।\" अपने दुर्भाग्यवश हम इस सागर के साथ अपनी पहचान जोड़ने तथा उसके थपेड़ों को रोकने का प्रयास करते हैं। हमें थपेड़ों को रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह सम्भव नहीं है। किसी भी दशा में थपेड़े चलते रहेंगे, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है। केवल मूर्ख ही इस संसार के अनुरूप ढलने का प्रयास करते हैं; वास्तविक समस्या यह है कि इससे बाहर कैसे निकला जाए। जो लोग अनुरूप ढलने का प्रयास करते हैं और जो कभी श्रीकृष्ण की ओर नहीं मुड़ते, वे जन्म-मृत्यु के सागर में निरन्तर देहान्तर के अधीन रहते हैं।\n\naśraddadhānāḥ puruṣā\n\ndharmasyāsya parantapa\n\naprāpya māṁ nivartante\n\nmṛtyu-saṁsāra-vartmani\n\n\"हे शत्रुदमन! जो लोग भक्ति के पथ पर श्रद्धावान् नहीं हैं, वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, अपितु इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु में लौट आते हैं।\" (गीता 9.3)\n\nपरिभाषा के अनुसार, धर्म वह है जो हमें ईश्वर से जोड़ता है। यदि वह हमें ईश्वर से जोड़ने में समर्थ नहीं है, तो वह धर्म नहीं है। धर्म का अर्थ है ईश्वर की खोज करना, ईश्वर को समझना तथा ईश्वर के साथ सम्बन्ध स्थापित करना। यही धर्म है। जो लोग भक्ति में संलग्न हैं, वे श्रीकृष्ण अथवा ईश्वर के लिए कार्य कर रहे हैं, और चूँकि इस प्रकार ईश्वर से सम्बन्ध बनता है, अतः कृष्णभावनामृत एक धर्म है।\n\nधर्म का निर्माण करना सम्भव नहीं है। सच्चे धर्म को किसी अधिकृत स्रोत से आना चाहिए, और वह स्रोत या तो ईश्वर है अथवा उसका प्रतिनिधि। धर्म को ईश्वर का विधान कहा गया है। किसी व्यक्ति के लिए राज्य का विधान बनाना सम्भव नहीं है। विधान तो विद्यमान है, और वह राज्य द्वारा दिया जाता है। कोई अपने समाज के लिए कुछ उप-नियम बना सकता है, किन्तु इन नियमों को राज्य के विधान द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। इसी प्रकार, यदि हम धर्म का कोई सिद्धान्त बनाना चाहें, तो उसे वैदिक प्रमाण द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।\n\n*भगवद्गीता* भी धर्म है। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, भगवान् चैतन्य, शंकराचार्य तथा ऐसे ही अनेक महान् प्रामाणिक आचार्यों ने *भगवद्गीता* को धर्म के परम सिद्धान्त के रूप में तथा श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। पश्चिम में भी *भगवद्गीता* को दर्शन का एक महान् ग्रन्थ माना जाता है, और पश्चिम के अनेक महान् विद्वानों एवं दार्शनिकों ने इसे पढ़ा है तथा इस पर टीका की है। विद्वानों एवं आचार्यों द्वारा स्वीकार किए जाने पर भी, ऐसे व्यक्ति हैं जो *भगवद्गीता* को स्वीकार नहीं करते और जिनमें कोई श्रद्धा नहीं है। वे इसे प्रमाण के रूप में बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे सोचते हैं कि यह श्रीकृष्ण नामक एक मनुष्य द्वारा की गई कोई भावुक अतिशयोक्ति है। अतः श्रीकृष्ण उपर्युक्त उद्धृत श्लोक में कहते हैं कि जो *भगवद्गीता* को प्रमाण के रूप में अस्वीकार करते हैं, उनका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता, और चूँकि उनका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः वे जन्म-मृत्यु के चक्र में बने रहते हैं। Aprāpya māṁ nivartante mṛtyu-saṁsāra-vartmani। संसार, अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र के अधीन रहना यह सुनिश्चित नहीं करता कि अगले जीवन में मनुष्य को *भगवद्गीता* समझने की वैसी ही सुविधा अवश्य मिलेगी। आवश्यक नहीं कि वह पुनः मनुष्य के रूप में, अथवा अमेरिका में, अथवा भारत में, अथवा इस ग्रह पर ही जन्म ले। कोई निश्चितता नहीं है; यह सब हमारे कर्म पर निर्भर करता है। जन्म-मृत्यु के पथ पर हम जन्म लेते हैं, कुछ समय तक रहते हैं, सुख अथवा दुःख भोगते हैं, फिर पुनः इस शरीर को त्याग देते हैं और किसी माता के गर्भ में प्रवेश करते हैं—चाहे वह मनुष्य हो अथवा पशु—फिर बाहर आने के लिए दूसरा शरीर तैयार करते हैं और पुनः अपना कर्म आरम्भ कर देते हैं। इसे mṛtyu-saṁsāra-vartmani कहते हैं। यदि कोई इस पथ से बचना चाहे, तो उसे कृष्णभावनामृत को अपनाना होगा।\n\nजब युधिष्ठिर महाराज से पूछा गया, \"संसार में सबसे आश्चर्यजनक वस्तु क्या है?\" तब उन्होंने उत्तर दिया, \"सबसे आश्चर्यजनक वस्तु यह है कि प्रतिदिन, प्रत्येक क्षण, लोग मर रहे हैं, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है कि उसके लिए मृत्यु नहीं आएगी।\" प्रत्येक मिनट एवं प्रत्येक क्षण हम अनुभव करते हैं कि जीव मृत्यु के मन्दिर की ओर जा रहे हैं। मनुष्य, कीट, पशु, पक्षी—प्रत्येक जा रहा है। अतः इस संसार को mṛtyuloka—मृत्यु का लोक—कहा जाता है। प्रतिदिन शोक-समाचार आते हैं, और यदि हम श्मशान अथवा कब्रिस्तान जाने का कष्ट करें, तो हम उनकी पुष्टि कर सकते हैं। फिर भी प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है, \"किसी-न-किसी प्रकार मैं जीवित रहूँगा।\" प्रत्येक व्यक्ति मृत्यु के नियम के अधीन है, फिर भी कोई इसे गम्भीरता से नहीं लेता। यही भ्रम है। यह सोचते हुए कि हम सदैव जीवित रहेंगे, हम जो चाहें वही करते रहते हैं, यह अनुभव करते हुए कि हम कभी उत्तरदायी नहीं ठहराए जाएँगे। यह अत्यन्त जोखिमभरा जीवन है, और यह भ्रम का सघनतम भाग है। हमें अत्यन्त गम्भीर हो जाना चाहिए और समझना चाहिए कि मृत्यु प्रतीक्षा कर रही है। हमने यह अभिव्यक्ति सुनी है, \"मृत्यु के समान निश्चित।\" इसका अर्थ है कि इस संसार में मृत्यु सबसे निश्चित वस्तु है; कोई भी इससे बच नहीं सकता। जब मृत्यु आती है, तब हमारा अहंकारग्रस्त दर्शन अथवा हमारी उच्च उपाधियाँ हमारी कोई सहायता नहीं करेंगी। उस समय हमारा हृष्ट-पुष्ट एवं सबल शरीर तथा हमारी बुद्धि—जो किसी की परवाह नहीं करती—नष्ट हो जाते हैं। उस समय खण्डांश (jīvātmā) भौतिक प्रकृति के अधीन हो जाता है, और प्रकृति हमें उसी प्रकार का शरीर देती है जिसके हम योग्य हैं। यदि हम यह जोखिम उठाना चाहें, तो हम श्रीकृष्ण से बच सकते हैं; यदि हम इसे उठाना नहीं चाहते, तो श्रीकृष्ण हमारी सहायता करने आएँगे।"}
{"ref": "rv/3", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/3/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "श्रीकृष्ण की शक्तियों का ज्ञान", "purport": "इस बिन्दु पर यह उल्लेख किया जा सकता है कि *भगवद्गीता* का नवम अध्याय विशेष रूप से उनके लिए है जिन्होंने श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में पहले ही स्वीकार कर लिया है। दूसरे शब्दों में, यह उनके भक्तों के लिए है। यदि कोई श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो यह नवम अध्याय उससे भिन्न प्रतीत होगा जो यह वास्तव में है। जैसा कि आरम्भ में कहा गया, नवम अध्याय का विषय समस्त *भगवद्गीता* की परम गोपनीय सामग्री है। यदि कोई श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो वह इस अध्याय को मात्र अतिशयोक्ति समझेगा। यह विशेष रूप से उन श्लोकों के सन्दर्भ में सत्य है जो श्रीकृष्ण के अपनी सृष्टि के साथ सम्बन्ध की चर्चा करते हैं।\n\nmayā tatam idaṁ sarvaṁ\n\njagad avyakta-mūrtinā\n\nmat-sthāni sarva-bhūtāni\n\nna cāhaṁ teṣv avasthitaḥ\n\n\"मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है। समस्त जीव मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।\" (गीता 9.4)\n\nजो संसार हम देखते हैं, वह भी श्रीकृष्ण की शक्ति, उनकी माया है। यहाँ mayā का अर्थ है \"मेरे द्वारा\", जैसे कोई कहता है, \"यह कार्य मेरे द्वारा किया गया है।\" इस \"मेरे द्वारा\" का यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने अपना कार्य कर लिया और समाप्त कर दिया अथवा अवकाश ले लिया। यदि मैं कोई विशाल कारखाना आरम्भ करूँ और कहूँ, \"यह कारखाना मेरे द्वारा आरम्भ किया गया था\", तो किसी भी दशा में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं लुप्त हो गया अथवा किसी प्रकार उपस्थित नहीं हूँ। यद्यपि कोई निर्माता अपने उत्पादों को \"मेरे द्वारा निर्मित\" कह सकता है, इसका यह अर्थ नहीं कि उसने व्यक्तिगत रूप से अपने उत्पाद को रचा अथवा बनाया, अपितु यह कि वह उत्पाद उसकी ऊर्जा द्वारा उत्पन्न किया गया था। इसी प्रकार, यदि श्रीकृष्ण कहते हैं, \"संसार में तुम जो कुछ भी देखते हो, वह मेरे द्वारा रचा गया था\", तो हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे अब विद्यमान नहीं हैं।\n\nसृष्टि में सर्वत्र ईश्वर को देख लेना अत्यन्त कठिन नहीं है, क्योंकि वह सर्वत्र उपस्थित है। जिस प्रकार फोर्ड कारखाने में श्रमिक प्रत्येक कोने में श्रीमान् फोर्ड को देखते हैं, उसी प्रकार जो श्रीकृष्ण के विज्ञान से परिचित हैं, वे सृष्टि के प्रत्येक अणु में उन्हें देख सकते हैं। प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण में स्थित है (mat-sthāni sarva bhūtāni), किन्तु श्रीकृष्ण वहाँ नहीं हैं (na cāhaṁ teṣv avasthitaḥ)। श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति अभिन्न हैं, फिर भी शक्ति श्रीकृष्ण नहीं है। सूर्य एवं सूर्य-प्रकाश भिन्न नहीं हैं, किन्तु सूर्य-प्रकाश सूर्य नहीं है। सूर्य-प्रकाश हमारी खिड़की से आकर हमारे कक्ष में प्रवेश कर सकता है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सूर्य हमारे कक्ष में है। *विष्णु पुराण* कहता है: parasya brāhmaṇaḥ śaktiḥ: parasya का अर्थ है परम, brāhmaṇaḥ का अर्थ है परम सत्य, और śaktiḥ का अर्थ है ऊर्जा। परम परब्रह्म की ऊर्जा ही सब कुछ है, किन्तु उस ऊर्जा में श्रीकृष्ण नहीं पाए जाते।\n\nऊर्जा दो प्रकार की होती है—भौतिक एवं आध्यात्मिक। जीव, अथवा व्यष्टि आत्माएँ, श्रीकृष्ण की पराशक्ति से सम्बन्धित हैं, किन्तु चूँकि वे भौतिक शक्ति की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति रखते हैं, अतः उन्हें तटस्था शक्ति कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल दो ही शक्तियाँ हैं। समस्त लोकमण्डल एवं ब्रह्माण्ड श्रीकृष्ण की शक्तियों पर स्थित हैं। जिस प्रकार सौरमण्डल के समस्त ग्रह सूर्य-प्रकाश में स्थित हैं, उसी प्रकार सृष्टि के भीतर प्रत्येक वस्तु कृष्ण-प्रभा पर स्थित है। भगवान् की ये समस्त शक्तियाँ भक्त को आनन्द प्रदान करती हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता है, वह इन्हें अस्वीकार कर देता है। जब कोई अभक्त होता है, तब श्रीकृष्ण के कथन उसे केवल ढोंग प्रतीत होते हैं, किन्तु जब कोई भक्त होता है, तब वह सोचता है, \"अहो, मेरे प्रभु इतने शक्तिशाली हैं!\" और वह प्रेम एवं आराधना से भर उठता है। अभक्त सोचते हैं कि चूँकि श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मैं ईश्वर हूँ\", अतः वे एवं अन्य सभी भी वही कह सकते हैं। किन्तु यदि उनसे अपना विश्वरूप दिखाने को कहा जाए, तो वे ऐसा नहीं कर सकते। यही कूट ईश्वर एवं वास्तविक ईश्वर के बीच का अन्तर है। श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण ने 16,000 से अधिक पत्नियों से विवाह किया और उन्हें 16,000 प्रासादों में भली-भाँति रखा, किन्तु एक साधारण मनुष्य तो एक पत्नी को भी भली-भाँति नहीं रख सकता। ऐसा नहीं है कि श्रीकृष्ण ने केवल इतनी आश्चर्यजनक बातें ही कहीं; उन्होंने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य भी किया। हमें श्रीकृष्ण की कही अथवा की हुई एक बात पर विश्वास करके दूसरी को अस्वीकार नहीं करना चाहिए; यदि विश्वास है, तो वह पूर्ण विश्वास होना चाहिए।\n\nइस सन्दर्भ में, नारद मुनि की एक कथा है, जिनसे एक बार एक ब्राह्मण ने पूछा: \"अरे, आप तो भगवान् से मिलने जा रहे हैं? कृपया उनसे पूछिएगा कि मुझे मेरी मुक्ति कब मिलेगी?\"\n\nनारद ने स्वीकार किया, \"ठीक है। मैं उनसे पूछूँगा।\"\n\nज्यों-ज्यों नारद आगे बढ़े, उन्हें एक मोची मिला जो एक वृक्ष के नीचे बैठा जूते सुधार रहा था, और उस मोची ने भी इसी प्रकार नारद से पूछा, \"अरे, आप तो ईश्वर के दर्शन करने जा रहे हैं? कृपया उनसे पूछिएगा कि मेरी मुक्ति कब आएगी?\"\n\nजब नारद मुनि वैकुण्ठ लोकों में पहुँचे, तब उन्होंने उनकी विनती पूरी की और नारायण (ईश्वर) से उस ब्राह्मण एवं मोची की मुक्ति के विषय में पूछा, और नारायण ने उत्तर दिया, \"इस शरीर को त्यागने के पश्चात् वह मोची यहाँ मेरे पास आएगा।\"\n\nनारद ने पूछा, \"और उस ब्राह्मण का क्या?\"\n\n\"उसे वहाँ अनेक जन्मों तक रहना पड़ेगा। मैं नहीं जानता कि वह कब आ रहा है।\"\n\nनारद मुनि चकित रह गए, और अन्ततः उन्होंने कहा, \"मैं इसके रहस्य को नहीं समझ पा रहा हूँ।\"\n\nनारायण ने कहा, \"वह तुम देखोगे। जब वे तुमसे पूछें कि मैं अपने धाम में क्या कर रहा हूँ, तो उन्हें बताना कि मैं एक हाथी को सुई के छेद में पिरो रहा हूँ।\"\n\nजब नारद पृथ्वी पर लौटे और उस ब्राह्मण के पास पहुँचे, तब ब्राह्मण ने कहा, \"अरे, आपने भगवान् के दर्शन कर लिए? वे क्या कर रहे थे?\"\n\nनारद ने उत्तर दिया, \"वे एक हाथी को सुई के छेद से पिरो रहे थे।\"\n\nब्राह्मण ने उत्तर दिया, \"मैं ऐसी बकवास पर विश्वास नहीं करता।\" नारद तत्काल समझ गए कि इस मनुष्य में कोई श्रद्धा नहीं है और वह केवल पुस्तकों का पाठक मात्र है।\n\nतत्पश्चात् नारद वहाँ से चल पड़े और उस मोची के पास गए, जिसने उनसे पूछा, \"अरे, आपने भगवान् के दर्शन कर लिए? बताइए, वे क्या कर रहे थे?\"\n\nनारद ने उत्तर दिया, \"वे एक हाथी को सुई के छेद से पिरो रहे थे।\"\n\nवह मोची रोने लगा, \"अहो, मेरे प्रभु इतने अद्भुत हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं!\"\n\nनारद ने पूछा, \"क्या तुम सचमुच विश्वास करते हो कि भगवान् एक हाथी को सुई के छेद से धकेल सकते हैं?\"\n\nमोची ने कहा, \"क्यों नहीं? निःसन्देह मैं इस पर विश्वास करता हूँ।\"\n\n\"वह कैसे?\"\n\nमोची ने उत्तर दिया, \"आप देख सकते हैं कि मैं इस बरगद के वृक्ष के नीचे बैठा हूँ, और आप देख सकते हैं कि प्रतिदिन इतने फल गिरते हैं, और प्रत्येक बीज में इसी के समान एक बरगद का वृक्ष है। यदि एक छोटे-से बीज के भीतर इतना बड़ा वृक्ष हो सकता है, तो क्या यह स्वीकार करना कठिन है कि भगवान् एक हाथी को सुई के छेद से धकेल रहे हैं?\"\n\nअतः इसे श्रद्धा कहते हैं। यह आँख मूँदकर विश्वास करने का प्रश्न नहीं है। इस विश्वास के पीछे तर्क है। यदि श्रीकृष्ण इतने छोटे-छोटे बीजों के भीतर एक बड़ा वृक्ष रख सकते हैं, तो क्या यह इतना आश्चर्यजनक है कि वे समस्त लोकमण्डलों को अपनी शक्ति के द्वारा आकाश में तैरता रखे हुए हैं?\n\nयद्यपि वैज्ञानिक यह सोच सकते हैं कि ग्रह केवल प्रकृति के द्वारा ही आकाश में टिके हुए हैं, किन्तु प्रकृति के पीछे परमेश्वर है। प्रकृति उसके निर्देशन में कार्य कर रही है। जैसा कि श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nmayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ\n\nsūyate sa-carācaram\n\nhetunānena kaunteya\n\njagad viparivartate\n\n\"हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है, और समस्त चर एवं अचर जीवों को उत्पन्न कर रही है। इसके शासन से यह प्रकटीकरण बार-बार रचा एवं नष्ट किया जाता है।\" (गीता 9.10)\n\nMayādhyakṣena का अर्थ है \"मेरी देखरेख में\"। भौतिक प्रकृति इतने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य नहीं कर सकती जब तक उसके पीछे भगवान् का हाथ न हो। हम भौतिक वस्तुओं के स्वतः कार्य करने का कोई उदाहरण नहीं दे सकते। जड़ पदार्थ निष्क्रिय है, और आध्यात्मिक स्पर्श के बिना उसके कार्य करने की कोई सम्भावना नहीं है। जड़ पदार्थ स्वतन्त्र रूप से अथवा स्वतः कार्य नहीं कर सकता। यन्त्र भले ही अत्यन्त आश्चर्यजनक ढंग से बनाए गए हों, किन्तु जब तक कोई मनुष्य उस यन्त्र को स्पर्श न करे, वह कार्य नहीं कर सकता। और वह मनुष्य क्या है? वह एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है। आध्यात्मिक स्पर्श के बिना कुछ भी गति नहीं कर सकता; अतः प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की निर्विशेष ऊर्जा पर स्थित है। श्रीकृष्ण की ऊर्जा निर्विशेष है, किन्तु वे एक पुरुष हैं। हम प्रायः ऐसे व्यक्तियों के विषय में सुनते हैं जो आश्चर्यजनक कार्य करते हैं, फिर भी अपनी ऊर्जावान् उपलब्धियों के बावजूद वे व्यक्ति ही बने रहते हैं। यदि यह मनुष्यों के लिए सम्भव है, तो परमेश्वर के लिए यह सम्भव क्यों नहीं? हम सब व्यक्ति हैं, किन्तु हम सब श्रीकृष्ण पर, उस परम पुरुष पर, आश्रित हैं।\n\nहमने प्रायः एटलस के चित्र देखे हैं — एक हृष्ट-पुष्ट पुरुष, जो अपने कन्धों पर एक विशाल ग्रह उठाए हुए है और उसे थामे रखने के लिए अत्यन्त संघर्ष कर रहा है। हम सोच सकते हैं कि चूँकि श्रीकृष्ण ब्रह्माण्ड का पालन करते हैं, अतः वे भी एटलस की भाँति उसके भार तले संघर्ष कर रहे होंगे। किन्तु ऐसा नहीं है।\n\nna ca mat-sthāni bhūtāni\n\npaśya me yogam aiśvaram\n\nbhūta-bhṛn na ca bhūta-stho\n\nmamātmā bhūta-bhāvanaḥ\n\n\"और फिर भी जो कुछ सृजित है, वह मुझमें स्थित नहीं है। मेरे योगैश्वर्य को देखो। यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक हूँ और यद्यपि मैं सर्वत्र हूँ, तथापि मेरा आत्मस्वरूप सृष्टि का परम उद्गम है।\" (गीता 9.5)\n\nयद्यपि ब्रह्माण्ड के समस्त जीव श्रीकृष्ण की ऊर्जा में स्थित हैं, तथापि वे उनमें नहीं हैं। श्रीकृष्ण समस्त जीवों का पालन करते हैं, और उनकी ऊर्जा सर्वव्यापी है, फिर भी वे अन्यत्र हैं। यह श्रीकृष्ण की अचिन्त्य योगशक्ति है। वे सर्वत्र हैं, फिर भी प्रत्येक वस्तु से पृथक् हैं। हम उनकी ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं, किन्तु उन्हें देख नहीं सकते, क्योंकि भौतिक नेत्रों से उन्हें देखा नहीं जा सकता। परन्तु जब हम अपने आध्यात्मिक गुणों का विकास करते हैं, तब हम अपनी इन्द्रियों को इतना पवित्र कर लेते हैं कि इसी ऊर्जा के भीतर भी हम उन्हें देख सकते हैं। उदाहरणार्थ, विद्युत् सर्वत्र विद्यमान है, और एक विद्युत्-तकनीशियन उसका उपयोग करने में समर्थ है। इसी प्रकार, परमेश्वर की ऊर्जा सर्वत्र है, और जब हम दिव्य स्थिति में स्थित हो जाते हैं, तब हम सर्वत्र भगवान् का साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। इन्द्रियों का यह आध्यात्मीकरण भक्ति तथा ईश्वर-प्रेम के द्वारा सम्भव है। भगवान् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापी हैं और आत्मा में, हृदय में, जल, वायु — सर्वत्र — स्थित हैं। अतः यदि हम किसी वस्तु में — मिट्टी, पत्थर, काष्ठ अथवा किसी भी वस्तु में — भगवान् की प्रतिमा बनाएँ, तो उसे मात्र एक गुड़िया नहीं समझना चाहिए। वह भी भगवान् हैं। यदि हममें पर्याप्त भक्ति हो, तो वह प्रतिमा हमसे वार्ता भी करेगी। भगवान् सर्वत्र निर्विशेष रूप से विद्यमान हैं (mayā tatam idaṁ sarvam), किन्तु यदि हम किसी वस्तु से उनका साकार रूप बनाएँ, अथवा यदि हम अपने भीतर भगवान् की प्रतिमा रच लें, तो वे हमारे लिए साक्षात् रूप में उपस्थित होंगे। शास्त्रों में आठ प्रकार की प्रतिमाओं की अनुशंसा की गई है, और किसी भी प्रकार की प्रतिमा की आराधना की जा सकती है, क्योंकि भगवान् सर्वत्र हैं। कोई आपत्ति कर सकता है और पूछ सकता है, \"भगवान् की आराधना प्रतिमाओं में क्यों की जाए, उनके मूल आध्यात्मिक रूप में क्यों नहीं?\" इसका उत्तर यह है कि हम भगवान् को उनके आध्यात्मिक रूप में तत्काल नहीं देख सकते। अपने भौतिक नेत्रों से हम केवल पत्थर, मिट्टी, काष्ठ — कोई मूर्त वस्तु ही देख सकते हैं। इसी कारण श्रीकृष्ण अर्चा-विग्रह के रूप में आते हैं — एक ऐसा रूप जिसे परमेश्वर हमारे दर्शन हेतु सुविधापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। परिणाम यह होता है कि यदि हम उस प्रतिमा पर ध्यान केन्द्रित करें और प्रेम तथा भक्ति सहित अर्पण करें, तो श्रीकृष्ण उस प्रतिमा के माध्यम से प्रत्युत्तर देंगे।\n\nऐसा होने के अनेक उदाहरण हैं। भारत में एक मन्दिर है जिसे साक्षी-गोपाल कहते हैं (श्रीकृष्ण को प्रायः गोपाल कहा जाता है)। गोपाल मूर्ति अथवा विग्रह एक समय वृन्दावन के एक मन्दिर में स्थित थी। एक बार दो ब्राह्मण — एक वृद्ध और एक युवक — तीर्थयात्रा पर वृन्दावन के दर्शन हेतु गए। यह एक लम्बी यात्रा थी, और उन दिनों रेलगाड़ियाँ नहीं थीं, अतः यात्रियों को अनेक कष्ट सहने पड़ते थे। वृद्ध पुरुष यात्रा में सहायता के लिए उस युवक का बहुत आभारी था, और वृन्दावन पहुँचने पर उसने उससे कहा : \"हे प्रिय बालक, तुमने मेरी इतनी सेवा की है, और मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ। मैं उस सेवा का प्रतिफल देना चाहता हूँ और तुम्हें कोई पुरस्कार देना चाहता हूँ।\"\n\n\"हे आदरणीय,\" युवक ने कहा, \"आप तो मेरे पिता के समान वृद्ध हैं। आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। मुझे किसी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं।\"\n\n\"नहीं, मैं तुम्हारा आभारी हूँ, और मुझे तुम्हें पुरस्कार अवश्य देना है,\" वृद्ध ने आग्रह किया। तत्पश्चात् उसने युवक को अपनी युवा पुत्री विवाह में देने का वचन दिया।\n\nवृद्ध पुरुष अत्यन्त धनवान था, और युवक, यद्यपि एक विद्वान् ब्राह्मण था, अत्यन्त निर्धन था। इस पर विचार करते हुए युवक ने कहा, \"ऐसा वचन न दीजिए, क्योंकि आपका परिवार कभी सहमत नहीं होगा। मैं इतना निर्धन हूँ, और आप कुलीन हैं, अतः यह विवाह सम्पन्न नहीं होगा। विग्रह के समक्ष इस प्रकार का वचन न दीजिए।\"\n\nयह वार्तालाप मन्दिर में गोपाल-कृष्ण के विग्रह के समक्ष हो रहा था, और युवक इस बात के लिए चिन्तित था कि विग्रह का अपराध न हो। तथापि, युवक के अनुनय के बावजूद, वृद्ध विवाह के लिए अड़ा रहा। कुछ समय वृन्दावन में रहने के पश्चात् वे अन्ततः घर लौटे, और वृद्ध ने अपने ज्येष्ठ पुत्र को सूचित किया कि उसकी छोटी बहन का विवाह उस निर्धन ब्राह्मण युवक से होना है। ज्येष्ठ पुत्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। \"ओह, आपने मेरी बहन के पति के रूप में उस दरिद्र को कैसे चुन लिया? यह नहीं हो सकता।\"\n\nवृद्ध की पत्नी भी उसके पास आई और बोली, \"यदि तुमने हमारी पुत्री का विवाह उस बालक से किया, तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।\"\n\nइस प्रकार वृद्ध व्याकुल हो उठा। कुछ समय पश्चात् वह ब्राह्मण युवक अत्यन्त चिन्तित हो गया। \"उसने अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करने का वचन दिया है, और वह वचन उसने विग्रह के समक्ष दिया था। अब वह उसे पूर्ण करने नहीं आ रहा।\" तत्पश्चात् वह वृद्ध से मिलने गया, ताकि उसे उसका वचन स्मरण कराए।\n\n\"आपने भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष वचन दिया था,\" युवक ने कहा, \"और आप उस वचन को पूर्ण नहीं कर रहे। ऐसा क्यों?\"\n\nवृद्ध मौन रहा। वह श्रीकृष्ण से प्रार्थना करने लगा, क्योंकि वह व्याकुल था। वह न तो अपनी पुत्री का विवाह उस युवक से करना चाहता था और न ही अपने परिवार में इतना बड़ा क्लेश उत्पन्न करना चाहता था। इसी बीच ज्येष्ठ पुत्र बाहर आया और ब्राह्मण युवक पर दोषारोपण करने लगा। \"तुमने तीर्थस्थान में मेरे पिता को लूटा है। तुमने उन्हें कोई नशीला पदार्थ देकर उनका सारा धन ले लिया, और अब तुम कह रहे हो कि उन्होंने तुम्हें मेरी सबसे छोटी बहन देने का वचन दिया है। अरे धूर्त!\"\n\nइस प्रकार बहुत कोलाहल हुआ, और लोग एकत्र होने लगे। युवक समझ गया कि वृद्ध तो अब भी सहमत है, किन्तु परिवार उसके लिए कठिनाई उत्पन्न कर रहा है। ज्येष्ठ पुत्र के कोलाहल के कारण लोग एकत्र होने लगे, और ब्राह्मण युवक उनके समक्ष यह घोषित करने लगा कि वृद्ध ने यह वचन विग्रह के समक्ष दिया था, किन्तु अब वह उसे पूर्ण नहीं कर पा रहा, क्योंकि परिवार आपत्ति कर रहा है। ज्येष्ठ पुत्र, जो एक नास्तिक था, सहसा युवक की बात बीच में काटकर बोला, \"तुम कहते हो कि भगवान् साक्षी थे। ठीक है, यदि वे आकर मेरे पिता के इस वचन के साक्षी बनते हैं, तो तुम मेरी बहन से विवाह कर सकते हो।\"\n\nयुवक ने उत्तर दिया, \"हाँ, मैं श्रीकृष्ण से साक्षी के रूप में आने की प्रार्थना करूँगा।\" उसे विश्वास था कि भगवान् अवश्य आएँगे। तत्पश्चात् सबके समक्ष यह समझौता हुआ कि यदि श्रीकृष्ण वृद्ध के वचन के साक्षी के रूप में वृन्दावन से आ जाएँ, तो कन्या विवाह में दे दी जाएगी।\n\nब्राह्मण युवक वृन्दावन लौटा और गोपाल-कृष्ण से प्रार्थना करने लगा। \"हे प्रिय प्रभु, आपको मेरे साथ अवश्य चलना होगा।\" वह इतना दृढ़ भक्त था कि वह श्रीकृष्ण से इस प्रकार बात करता था, जैसे कोई किसी मित्र से बात करता है। वह यह नहीं सोचता था कि गोपाल मात्र एक मूर्ति अथवा प्रतिमा हैं, अपितु वह उन्हें साक्षात् भगवान् मानता था। सहसा विग्रह ने उससे कहा :\n\n\"तुम कैसे सोचते हो कि मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ? मैं तो एक मूर्ति हूँ। मैं कहीं नहीं जा सकता।\"\n\n\"यदि कोई मूर्ति बोल सकती है, तो वह चल भी सकती है,\" बालक ने उत्तर दिया।\n\n\"अच्छा तो ठीक है,\" विग्रह ने अन्ततः कहा। \"मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, किन्तु एक शर्त पर। तुम किसी भी दशा में मुझे देखने के लिए पीछे मुड़कर नहीं देखोगे। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगा, और तुम मेरे पायल की झंकार से जान जाओगे कि मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूँ।\"\n\nयुवक मान गया, और इस प्रकार वे दूसरे नगर जाने के लिए वृन्दावन से चल पड़े। जब यात्रा लगभग समाप्त होने को थी, ठीक जब वे उसके गाँव में प्रवेश करने ही वाले थे, तब युवक को पायल की ध्वनि अब सुनाई नहीं दी, और वह भयभीत होने लगा। \"ओह, श्रीकृष्ण कहाँ हैं?\" स्वयं को और अधिक न रोक पाने के कारण उसने पीछे मुड़कर देख लिया। उसने देखा कि विग्रह स्थिर खड़े हैं। चूँकि उसने पीछे मुड़कर देख लिया था, अतः वे और आगे नहीं जाएँगे। वह तुरन्त नगर में दौड़ा और लोगों से बाहर आकर श्रीकृष्ण के दर्शन करने को कहा, जो साक्षी के रूप में आए थे। सभी आश्चर्यचकित थे कि इतनी बड़ी मूर्ति इतनी दूर से आई है, और उन्होंने उसी स्थान पर विग्रह के सम्मान में एक मन्दिर बनवाया, और आज भी लोग साक्षी-गोपाल की, साक्षी रूप में भगवान् की, आराधना कर रहे हैं।\n\nअतः हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि चूँकि भगवान् सर्वत्र हैं, अतः वे अपनी मूर्ति में, अपनी बनाई गई प्रतिमा में भी हैं। यदि श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं, जैसा कि निर्विशेषवादी भी स्वीकार करते हैं, तो फिर वे अपनी प्रतिमा में क्यों न हों? कोई प्रतिमा अथवा मूर्ति हमसे बात करती है या नहीं, यह हमारी भक्ति की मात्रा पर निर्भर करता है। किन्तु यदि हम प्रतिमा को मात्र काष्ठ अथवा पत्थर का टुकड़ा मानने का निश्चय कर लें, तो श्रीकृष्ण हमारे लिए सदा काष्ठ अथवा पत्थर ही बने रहेंगे। श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं, किन्तु जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक चेतना में उन्नति करते हैं, वैसे-वैसे हम उन्हें उनके यथार्थ रूप में देखने लगते हैं। यदि हम कोई पत्र किसी डाक-पेटी में डालते हैं, तो वह अपने गन्तव्य तक पहुँच जाएगा, क्योंकि वह डाक-पेटी अधिकृत है। इसी प्रकार, यदि हम भगवान् की किसी अधिकृत प्रतिमा की आराधना करते हैं, तो हमारी श्रद्धा का कुछ प्रभाव अवश्य होगा। यदि हम विविध नियमों एवं विधि-विधानों का पालन करने के लिए प्रस्तुत हों — अर्थात् यदि हम योग्य बन जाएँ — तो कहीं भी और सर्वत्र भगवान् का दर्शन सम्भव है। जब कोई भक्त उपस्थित होता है, तब श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापी ऊर्जाओं द्वारा कहीं भी और सर्वत्र अपने को प्रकट करते हैं, किन्तु जब उनका भक्त वहाँ नहीं होता, तब वे ऐसा नहीं करते। इसके अनेक उदाहरण हैं। प्रह्लाद महाराज ने श्रीकृष्ण को एक स्तम्भ में देखा। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण तो वहाँ हैं; आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उन्हें देखने की योग्यता रखें।\n\nश्रीकृष्ण स्वयं अपनी सर्वव्यापकता का उदाहरण इस प्रकार देते हैं :\n\nyathākāśa sthito nityaṁ\n\nvāyuḥ sarvatra-go mahān\n\ntathā sarvāṇi bhūtāni\n\nmat-sthānīty upadhāraya\n\n\"जिस प्रकार सर्वत्र बहने वाली प्रबल वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, उसी प्रकार जान लो कि समस्त जीव मुझमें स्थित हैं।\" (गीता 9.6)\n\nसभी जानते हैं कि वायु आकाश के भीतर बहती है, और पृथ्वी पर वह सर्वत्र बह रही है। ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ वायु अथवा हवा न हो। यदि हम वायु को बाहर निकालना चाहें, तो हमें किसी यन्त्र द्वारा कृत्रिम रूप से निर्वात बनाना पड़ता है। जिस प्रकार वायु आकाश में सर्वत्र बह रही है, उसी प्रकार प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण के भीतर विद्यमान है। यदि ऐसी ही बात है, तो जब भौतिक सृष्टि का प्रलय होता है, तब वह कहाँ जाती है?\n\nsarva-bhūtāni kaunteya\n\nprakṛtiṁ yānti māmikām\n\nkalpa-kṣaye punas tāni\n\nkalpādau visṛjāmy aham\n\n\"हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में प्रत्येक भौतिक प्रकटीकरण मेरी प्रकृति में प्रवेश कर जाता है, और दूसरे कल्प के आरम्भ में मैं अपनी शक्ति से पुनः सृष्टि करता हूँ।\" (गीता 9.7)\n\nश्रीकृष्ण अपनी प्रकृति को गति में लाते हैं, जैसे कोई घड़ी में चाबी भरता है, और जब प्रकृति की चाबी उतर जाती है, तब वह भगवान् में लीन हो जाती है। तथापि, आध्यात्मिक सृष्टि ऐसी नहीं है, क्योंकि वह नित्य है। भौतिक सृष्टि में प्रत्येक वस्तु क्षणिक है। जिस प्रकार हमारे शरीर अपने भीतर स्थित आध्यात्मिक स्फुलिंग के कारण विकसित होते हैं, उसी प्रकार समूची सृष्टि भगवान् की उस आत्मा के कारण, जो उसके भीतर है, अस्तित्व में आती, विकसित होती और लुप्त होती है। जिस प्रकार हमारी आत्मा शरीर के भीतर उपस्थित है, उसी प्रकार भगवान् परमात्मा के रूप में ब्रह्माण्ड के भीतर उपस्थित हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु की उपस्थिति के कारण भौतिक सृष्टि का अस्तित्व है, ठीक जैसे हमारी उपस्थिति के कारण हमारे शरीर का अस्तित्व है। कभी श्रीकृष्ण भौतिक सृष्टि को प्रकट करते हैं, और कभी नहीं करते। सभी दशाओं में उसका अस्तित्व उनकी उपस्थिति के कारण ही है।"}
{"ref": "rv/4", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/4/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "महात्माओं, महान् आत्माओं के माध्यम से ज्ञान", "purport": "सृष्टि के समस्त पक्षों में श्रीकृष्ण की उपस्थिति का अनुभव महात्माजन, अर्थात् महान् आत्माएँ करते हैं, जो सदा श्रीकृष्ण की आराधना में संलग्न रहते हैं। जैसा कि श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, ये महान् आत्माएँ *भगवद्गीता* के नवें अध्याय में वर्णित गुह्य ज्ञान से परिचित होती हैं, और वे श्रीकृष्ण को समस्त वस्तुओं का उद्गम जानती हैं।\n\nmahātmānas tu māṁ pārtha\n\ndaivīṁ prakṛtim āśritāḥ\n\nbhajanty ananya-manaso\n\njñātvā bhūtādim avyayam\n\n\"हे पृथापुत्र, जो भ्रमित नहीं हैं, वे महान् आत्माएँ दिव्य प्रकृति के संरक्षण में रहती हैं। वे पूर्णतः भक्ति में संलग्न रहती हैं, क्योंकि वे मुझे आदि एवं अक्षय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में जानती हैं।\" (गीता 9.13)\n\nमहान् आत्मा निःसन्देह यह जानती है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और वे समस्त अंशों के उद्गम हैं। *वेदान्त-सूत्र* कहता है, athāto brahma jijñāsā : मानव-जीवन ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा करने के लिए है। इस समय हम सभी क्षणिक, क्षुद्र वस्तुओं के अध्ययन में संलग्न हैं। ब्रह्म का अर्थ है महानतम, किन्तु महानतम से सरोकार रखने के स्थान पर हम खाने, सोने, रक्षा करने तथा मैथुन की पाशविक समस्याओं को सुलझाने के प्रयत्न में उलझ गए हैं। ये क्षुद्र समस्याएँ तो स्वतः ही सुलझ जाती हैं। पशु भी मैथुन, निद्रा, भोजन तथा रक्षा का आनन्द ले रहे हैं। सब व्यवस्था पहले से ही की हुई है। शरीर की ये माँगें वास्तव में समस्याएँ नहीं हैं, किन्तु हमने इन्हें समस्या बना लिया है। *वेदान्त-सूत्र* हमें आदेश देता है कि हम इन समस्याओं से सरोकार न रखें, क्योंकि ये किसी भी जीवन-रूप में सन्तुष्ट हो जाती हैं। हमारी समस्या तो इन समस्त प्रकटीकरणों के उद्गम के विषय में जिज्ञासा करना है। मानव-जीवन उन भौतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए कठोर संघर्ष करने हेतु नहीं है, जिन्हें एक सूअर, एक विष्ठा-भक्षक भी सुलझा सकता है। सूअर पशुओं में सबसे नीच माना जाता है, फिर भी उसके पास भोजन की सुविधा, मैथुन की सुविधा, निद्रा की सुविधा तथा रक्षा की सुविधाएँ हैं। यदि हम इन वस्तुओं के लिए प्रयत्न न भी करें, तो भी ये हमें प्राप्त होंगी। मनुष्य का प्रयोजन तो, इसके विपरीत, उस उद्गम का पता लगाना है जिससे ये समस्त वस्तुएँ आ रही हैं। *वेदान्त-सूत्र* कहता है कि ब्रह्म वह है जिससे प्रत्येक वस्तु प्रकट हो रही है (janmādy asya yataḥ [भा. 1.1.1])। दार्शनिक, वैज्ञानिक, योगीजन, ज्ञानीजन तथा अध्यात्मवादी सभी प्रत्येक वस्तु के परम उद्गम का पता लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह उद्गम ब्रह्म-संहिता में दिया गया है, sarva-kāraṇa-kāraṇam : [ब्र.सं. 5.1] श्रीकृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं।\n\nश्रीकृष्ण को प्रत्येक वस्तु का आदि उद्गम समझते हुए महान् आत्माएँ कैसा आचरण करती हैं? श्रीकृष्ण स्वयं उनका वर्णन इस प्रकार करते हैं :\n\nsatataṁ kīrtayanto māṁ\n\nyatantaś ca dṛḍha-vratāḥ\n\nnamasyantaś ca māṁ bhaktyā\n\nnitya-yuktā upāsate\n\n\"सदा मेरी महिमा का गान करते हुए, महान् दृढ़ संकल्प के साथ प्रयत्न करते हुए, मुझे प्रणाम करते हुए, ये महान् आत्माएँ निरन्तर भक्तिपूर्वक मेरी आराधना करती हैं।\" (गीता 9.14)\n\nवह महिमा-गान ही भक्तियोग की यह प्रक्रिया है, अर्थात् हरे कृष्ण का जप। महान् आत्माएँ भगवान् के स्वरूप, उनके अवतरण तथा उनके ध्येय को समझकर अनेक प्रकार से उनकी महिमा का गान करती हैं, किन्तु कुछ अन्य भी हैं जो उन्हें स्वीकार नहीं करते। श्रीकृष्ण नवें अध्याय में उनका भी उल्लेख करते हैं :\n\navajānanti māṁ mūḍhā\n\nmānuṣīṁ tanum āśritam\n\nparaṁ bhāvam ajānanto\n\nmama bhūta-maheśvaram\n\n\"मूर्ख मेरा उपहास करते हैं जब मैं मानव-रूप में अवतरित होता हूँ। वे मेरी दिव्य प्रकृति तथा समस्त अस्तित्व पर मेरे परम आधिपत्य को नहीं जानते।\" (गीता 9.11)\n\nवे मूढ़, अर्थात् मूर्ख मनुष्य, जो पशुओं से भी नीच हैं, उनका उपहास करते हैं। कोई भी व्यक्ति जो भगवान् में विश्वास नहीं करता, वह या तो पागल होगा अथवा प्रथम कोटि का मूर्ख। भगवान् में विश्वास न करने का कोई कारण नहीं, और उनमें विश्वास करने के समस्त कारण हैं। मनुष्य कह सकता है कि वह भगवान् में विश्वास नहीं करता, किन्तु उसे यह कहने की शक्ति कौन देता है? जब मृत्यु आती है, तब यह बोलने की शक्ति समाप्त हो जाती है — तो फिर बोलने की यह शक्ति कौन दे रहा है? क्या यह बोलने की शक्ति पत्थर से स्वतः आ गई है? जैसे ही परम सत्ता द्वारा बोलने की शक्ति वापस ले ली जाती है, वैसे ही शरीर पत्थर से अधिक कुछ नहीं रह जाता। बोलने की यह शक्ति ही इस बात का प्रमाण है कि एक परम शक्ति है जो हमें प्रत्येक वस्तु दे रही है। एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जानता है कि उसके पास जो कुछ है, वह उसके नियन्त्रण में नहीं है। यदि हम भगवान् में विश्वास नहीं करते, तो हमें अपने से परे किसी शक्ति में विश्वास करना ही होगा जो पग-पग पर हमारा नियन्त्रण कर रही है — चाहे उस शक्ति को भगवान् कहें, प्रकृति कहें या कुछ भी। ब्रह्माण्ड में एक नियन्त्रक शक्ति है, और कोई भी विवेकशील व्यक्ति इसे अस्वीकार नहीं कर सकता।\n\nश्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर उपस्थित थे और अलौकिक शक्ति सहित ठीक एक मनुष्य की भाँति प्रकट हुए। तथापि उस समय निन्यानबे प्रतिशत लोग उन्हें भगवान् के रूप में नहीं पहचान सके। वे उन्हें इसलिए नहीं पहचान सके क्योंकि उनके पास देखने के लिए नेत्र नहीं थे (paraṁ bhāvam ajānantaḥ)। भगवान् को पहचानना कैसे सम्भव है? उन्हें अलौकिक शक्ति के द्वारा, प्रामाणिक अधिकारियों के साक्ष्य के द्वारा तथा शास्त्रीय साक्ष्य के द्वारा पहचाना जा सकता है। जहाँ तक श्रीकृष्ण का प्रश्न है, प्रत्येक वैदिक प्रमाण ने उन्हें भगवान् के रूप में स्वीकार किया है। जब वे पृथ्वी पर उपस्थित थे, तब प्रदर्शित उनकी लीलाएँ अतिमानवीय थीं। यदि कोई इस पर विश्वास न करे, तो यही निष्कर्ष निकालना होगा कि वह चाहे जो भी साक्ष्य दिया जाए, उस पर विश्वास नहीं करेगा।\n\nभगवान् को देखने के लिए नेत्र भी होने चाहिए। भगवान् भौतिक इन्द्रियों से देखे नहीं जा सकते, अतः भक्तियोग की प्रक्रिया इन्द्रियों को शुद्ध करने की प्रक्रिया है, जिससे हम समझ सकें कि भगवान् क्या हैं और कौन हैं। हममें देखने, सुनने, स्पर्श करने, स्वाद लेने इत्यादि की शक्ति है, किन्तु यदि ये इन्द्रियाँ कुण्ठित हों, तो हम भगवान् को नहीं समझ सकते। कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया इन इन्द्रियों को विनियमित सिद्धान्तों के द्वारा, विशेषतः हरे कृष्ण के जप के द्वारा, प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया है।\n\nश्रीकृष्ण मूढ़ों का और भी वर्णन करते हैं :\n\nmoghāśā mogha-karmāṇo\n\nmogha-jñānā vicetasaḥ\n\nrākṣasīm āsurīṁ caiva\n\nprakṛtiṁ mohinīṁ śritāḥ\n\n\"जो इस प्रकार भ्रमित हैं, वे आसुरी एवं नास्तिक विचारों की ओर आकृष्ट होते हैं। उस मोहग्रस्त दशा में उनकी मुक्ति की आशाएँ, उनके सकाम कर्म तथा उनका ज्ञान-अनुशीलन — सभी विफल हो जाते हैं।\" (गीता 9.12)\n\nmoghāśā शब्द यह संकेत करता है कि नास्तिकों की आकांक्षाएँ विफल हो जाएँगी। कर्मी, अर्थात् सकाम श्रमिक, सदा अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए किसी श्रेष्ठतर वस्तु की आशा करते रहते हैं। उनके रुकने की कोई सीमा नहीं। वे अपना बैंक-शेष बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं और किसी निश्चित बिन्दु पर सुखी होने की आशा कर रहे हैं, किन्तु वह बिन्दु कभी नहीं आता, क्योंकि वे तृप्ति के परम बिन्दु को नहीं जानते। जो माया-शक्ति के आकर्षणों से मुग्ध हैं, वे जीवन के परम लक्ष्य को नहीं समझ सकते। mogha-karmāṇaḥ शब्द यह संकेत करता है कि वे अत्यन्त कठोर परिश्रम कर रहे हैं, किन्तु अन्त में उन्हें केवल कुण्ठा ही प्राप्त होगी। जब तक हम कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं होते, तब तक हमारे समस्त कार्य अन्त में विफल हो जाएँगे।\n\nयह किसी साधारण मनुष्य का निर्णय नहीं, अपितु स्वयं श्रीकृष्ण का है। यदि हम ज्ञान की खोज में हैं, तो हमें यह पता लगाने के लिए अनुसन्धान करना चाहिए कि कहीं श्रीकृष्ण भगवान् तो नहीं हैं। बिना किसी ध्येय के, हज़ारों वर्षों की मानसिक कल्पना का क्या प्रयोजन? परमेश्वर इतने विराट् हैं कि कोई मानसिक कल्पना के द्वारा उन तक नहीं पहुँच सकता। यदि हम लाखों वर्षों तक मन तथा वायु की गति से यात्रा करें, तो भी कल्पना के द्वारा परम तक पहुँचना सम्भव नहीं। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं जिसमें किसी ने अपनी मानसिक कल्पना के द्वारा परम सत्य तक पहुँच पाया हो। अतः mogha-jñānāḥ शब्द यह संकेत करता है कि लौकिक ज्ञान की प्रक्रिया भ्रामक है। अपने स्वयं के प्रयत्न से सूर्यास्त के पश्चात् सूर्य को देखना सम्भव नहीं। हमें तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक सूर्य प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्वयं को प्रकट न कर दे। यदि अपनी सीमित इन्द्रियों से सूर्य जैसी भौतिक वस्तु का अनुभव करना भी सम्भव नहीं, तो अभौतिक का अनुभव कैसे सम्भव होगा? हम श्रीकृष्ण को अपने स्वयं के प्रयत्न से न तो पता लगा सकते हैं और न समझ सकते हैं। हमें कृष्णभावनामृत के द्वारा अपने को योग्य बनाना होगा और उनके स्वयं को प्रकट करने की प्रतीक्षा करनी होगी।\n\nteṣāṁ satata-yuktānāṁ\n\nbhajatāṁ prīti-pūrvakam\n\ndadāmi buddhi-yogaṁ taṁ\n\nyena mām upayānti te\n\n\"जो निरन्तर समर्पित रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मुझ तक आ सकें।\" (गीता 10.10)\n\nश्रीकृष्ण अन्तर्यामी रूप में विद्यमान हैं, किन्तु अपनी भौतिक बद्धता के कारण हम इसका अनुभव नहीं करते। जो स्वभाव से पिशाच एवं असुर हैं (rākṣasīm āsurīm), वे सोचते हैं कि यह भौतिक जीवन ही सर्वस्व है और मानव-जीवन का प्रयोजन पदार्थ से अधिकाधिक भोग निचोड़ लेना है। वे निचोड़ने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु निरन्तर कुण्ठित होते हैं। भौतिक प्रकृति को निचोड़ना यथार्थ आनन्द को पाने की प्रक्रिया नहीं है। यदि हम यथार्थ आनन्द की खोज में हैं, तो हमें कृष्णभावनामृत को अपनाना होगा। भौतिक जगत् में समस्त सुख का आदि एवं अन्त है, किन्तु श्रीकृष्ण में सुख असीम है, और उसका कोई अन्त नहीं। इस सुख को प्राप्त करने के लिए हमें केवल थोड़ा समय अर्पित करना है और हरे कृष्ण का जप करना है। पूर्व युगों में महान् ऋषि तथा देवता परम का साक्षात्कार करने के लिए अपना समूचा जीवन समर्पित कर देते थे, फिर भी उन्हें सफलता नहीं मिलती थी। इस युग के लिए चैतन्य महाप्रभु ने ईश्वर-साक्षात्कार की एक सुगम प्रक्रिया दी है। आवश्यकता केवल सावधानीपूर्वक श्रवण की है। हमें *भगवद्गीता* का श्रवण करना है, और हमें श्रीकृष्ण के नामों का जप करना है तथा उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना है। हमें अहंकारग्रस्त नहीं होना चाहिए, यह मिथ्या सोचते हुए कि हमारा ज्ञान महान् है अथवा हम अत्यन्त विद्वान् हैं। श्रीकृष्ण के सन्देशों को सुनने के लिए हमें केवल थोड़ा विनम्र एवं नम्र बनना होगा।\n\nइस समय यह संसार राक्षसों द्वारा संचालित हो रहा है। राक्षस नरभक्षी हैं, जो अपनी इन्द्रियों की तृप्ति के लिए अपने ही पुत्रों को खा जाते हैं। अब राक्षसों की इन्द्रियों की तृप्ति के लिए अनेक लोगों को कुचलने हेतु महान् शासन-तन्त्र खड़े किए गए हैं, किन्तु वे यह नहीं समझते कि उनकी इन्द्रियाँ इस प्रकार कभी तृप्त नहीं होंगी। फिर भी, राक्षस अपनी सनकी इच्छाओं को तृप्त करने के लिए प्रत्येक वस्तु बलिदान करने को उद्यत हैं। उनके लिए यथार्थ स्थिति को समझना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वे भौतिक सभ्यता पर अत्यधिक मुग्ध हैं। तो फिर कौन समझ सकता है? जो महात्मा हैं, जिनके हृदय विशाल हो गए हैं, वे समझते हैं कि \"प्रत्येक वस्तु भगवान् की है, और मैं भी भगवान् का हूँ।\"\n\nऐसे महात्मा भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण में नहीं रहते (mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛtim āśritāḥ [गीता 9.13])। भगवान् महान् हैं और महान् की सेवा करने से महात्मा का हृदय भी महान् बन जाता है। महात्मा किसी राजनीतिक नेता के लिए कोई मुहर नहीं है। किसी को मतों के द्वारा महात्मा की मुहर नहीं लगाई जा सकती। महात्मा का मानदण्ड *भगवद्गीता* में दिया गया है : महात्मा वह है जिसने भगवान् की परा ऊर्जा की शरण ली है। निस्सन्देह समस्त ऊर्जाएँ उन्हीं की हैं, और वे आध्यात्मिक ऊर्जा तथा भौतिक ऊर्जा में भेद नहीं करते, किन्तु उस बद्धजीव के लिए, जो भौतिक ऊर्जा एवं आध्यात्मिक ऊर्जा के बीच तटस्थ रूप से स्थित है, एक भेद है। महात्मा इस भेद को देखते हैं और इसी कारण आध्यात्मिक ऊर्जा (daivīṁ prakṛtim) की शरण लेते हैं।\n\nमहान् की सेवा करके महात्मा परा ऊर्जा से तदात्म्य स्थापित करते हुए स्वयं भी महान् बन जाते हैं : (ahaṁ brahmāsmi) \"मैं ब्रह्म — आत्मा — हूँ।\" ऐसा नहीं कि वे अहंकारग्रस्त होकर यह सोचने लगें कि वे ही भगवान् हैं। अपितु, यदि कोई ब्रह्म बन जाए, तो उसे ब्रह्म में अपनी क्रियाएँ प्रदर्शित करनी होंगी। आत्मा सक्रिय है, और ब्रह्म बनना निष्क्रिय हो जाना नहीं है। ब्रह्म आत्मा है, और ये भौतिक शरीर इसीलिए सक्रिय हैं क्योंकि उनके भीतर ब्रह्म स्थित है। यदि भौतिक प्रकृति के सम्पर्क के बावजूद हम सक्रिय हैं, तो क्या हम तब निष्क्रिय हो जाएँगे जब हम अपने को भौतिक कल्मष से शुद्ध कर लें और शुद्ध ब्रह्म के रूप में अपनी यथार्थ पहचान में स्थित हो जाएँ? \"मैं ब्रह्म हूँ\" इसका साक्षात्कार करने का अर्थ है आध्यात्मिक क्रिया में संलग्नता, क्योंकि हम आत्मा हैं, और हमारी क्रियाएँ तब भी प्रदर्शित होती हैं जब हम पदार्थ से दूषित होते हैं। ब्रह्म बनने का अर्थ शून्य बन जाना नहीं, अपितु परा प्रकृति में अपने को स्थित करना है, जिसका अर्थ है परा ऊर्जा एवं परा क्रियाएँ। ब्रह्म बनने का अर्थ है भगवान् की भक्ति-सेवा अर्पित करने में पूर्णतः संलग्न होना। अतः महात्मा समझता है कि यदि सेवा अर्पित करनी ही है, तो वह श्रीकृष्ण को ही करनी है, किसी अन्य को नहीं। हमने इतने समय तक अपनी इन्द्रियों की सेवा की है; अब हमें श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए।\n\nसेवा रोकने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि हम सेवा के लिए ही बने हैं। क्या कोई ऐसा है जो सेवा नहीं करता? यदि हम राष्ट्रपति से पूछें, \"आप किसकी सेवा कर रहे हैं?\" तो वे हमसे कहेंगे कि वे देश की सेवा कर रहे हैं। कोई भी सेवा से रहित नहीं है। सेवा को हम रोक नहीं सकते, किन्तु हमें अपनी सेवा को भ्रम से वास्तविकता की ओर पुनर्निर्देशित अवश्य करना होगा। जब ऐसा हो जाता है, तब हम महात्मा बन जाते हैं।\n\nकीर्तन (kīrtayantaḥ) की यह प्रक्रिया, अर्थात् सदा भगवान् की महिमा का गान करना, महात्मा बनने का आरम्भ है। उस प्रक्रिया को भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने सरल बना दिया, जिन्होंने मानवजाति को हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का यह जप प्रदान किया। भक्ति की नौ विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं, जिनमें से श्रवणं कीर्तनम्, अर्थात् सुनना तथा कीर्तन करना, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। कीर्तनम् का वास्तविक अर्थ है \"वर्णन करना\"। हम संगीत, शब्दों, चित्रों इत्यादि के द्वारा वर्णन कर सकते हैं। श्रवणम् कीर्तनम् के साथ-साथ चलता है, क्योंकि जब तक हम सुनते नहीं, तब तक हम वर्णन नहीं कर सकते। परम को प्राप्त करने के लिए हमें किसी भौतिक योग्यता की आवश्यकता नहीं। हमें केवल प्रामाणिक स्रोतों से सुनना है और जो सुनते हैं उसे यथार्थ रूप में दोहराना है।\n\nप्राचीन काल में शिष्य *वेदों* को आध्यात्मिक गुरु से सुनता था, और इस प्रकार *वेद* श्रुति के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिसका अर्थ है \"जो सुना गया।\" उदाहरणार्थ, *भगवद्गीता* में हम देखते हैं कि अर्जुन युद्धभूमि में श्रीकृष्ण को सुन रहा है। वह वेदान्त-दर्शन के अध्ययन में संलग्न नहीं है। हम परम सत्ता से किसी भी स्थान में, यहाँ तक कि युद्धभूमि में भी, सुन सकते हैं। ज्ञान प्राप्त किया जाता है, गढ़ा नहीं जाता। कुछ लोग सोचते हैं, \"मैं उन्हें क्यों सुनूँ? मैं स्वयं विचार कर सकता हूँ। मैं कुछ नया गढ़ सकता हूँ।\" यह ज्ञान के अवरोहण की वैदिक प्रक्रिया नहीं है। आरोही ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपने स्वयं के प्रयत्न से अपने को उन्नत करने का प्रयास करता है, किन्तु अवरोही ज्ञान के द्वारा वह किसी श्रेष्ठतर स्रोत से ज्ञान प्राप्त करता है। वैदिक परम्परा में ज्ञान शिष्य को आध्यात्मिक गुरु से प्रदान किया जाता है, जैसा कि *भगवद्गीता* में है (evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣayo viduḥ [गीता 4.2])। विनम्र श्रवण इतना सामर्थ्यवान् है कि केवल प्रामाणिक स्रोतों से सुनने मात्र से हम पूर्णतः सिद्ध बन सकते हैं। विनम्र बनने पर हम अपनी ही अपूर्णताओं के प्रति सचेत हो जाते हैं। जब तक हम बद्ध हैं, तब तक हम चार प्रकार की अपूर्णताओं के अधीन हैं : हम अवश्य त्रुटि करते हैं, मोहग्रस्त होते हैं, अपूर्ण इन्द्रियाँ रखते हैं और छल करते हैं। अतः अपनी दोषपूर्ण इन्द्रियों एवं अनुभव के द्वारा परम सत्य को समझने का हमारा प्रयास व्यर्थ है। हमें श्रीकृष्ण के एक ऐसे प्रतिनिधि से सुनना चाहिए जो श्रीकृष्ण का भक्त हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना प्रतिनिधि बनाया, क्योंकि अर्जुन उनका भक्त था : bhakto 'si me sakhā ceti. (गीता 4.3)\n\nभगवान् का भक्त हुए बिना कोई भगवान् का प्रतिनिधि नहीं बन सकता। जो यह सोचता है, \"मैं भगवान् हूँ,\" वह प्रतिनिधि नहीं हो सकता। चूँकि हम भगवान् के अंश हैं, अतः हमारे गुण उन्हीं के समान हैं, और इसी कारण यदि हम अपने भीतर इन गुणों का अध्ययन करें, तो हम भगवान् के विषय में कुछ जान लेते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि हम भगवान् की मात्रा को समझ लेते हैं। आत्म-साक्षात्कार की यह प्रक्रिया भगवान् को समझने का एक उपाय है, किन्तु किसी भी दशा में हम यह उपदेश नहीं दे सकते, \"मैं भगवान् हूँ।\" भगवान् की शक्तियों को प्रदर्शित करने में समर्थ हुए बिना हम भगवान् होने का दावा नहीं कर सकते। जहाँ तक श्रीकृष्ण का प्रश्न है, उन्होंने इतनी शक्ति प्रदर्शित करके तथा अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाकर सिद्ध किया कि वे भगवान् हैं। श्रीकृष्ण ने यह भयावह रूप उन लोगों को निरुत्साहित करने के लिए दिखाया जो भगवान् होने का दावा करते। हमें किसी ऐसे व्यक्ति से छला नहीं जाना चाहिए जो भगवान् होने का दावा करता है; अर्जुन के पदचिह्नों पर चलते हुए हमें किसी को भगवान् के रूप में स्वीकार करने से पूर्व उसका विश्वरूप देखने की माँग करनी चाहिए। केवल एक मूर्ख ही दूसरे मूर्ख को भगवान् के रूप में स्वीकार करेगा।\n\nकोई भी भगवान् के समान नहीं हो सकता, और कोई भी उनसे ऊपर नहीं हो सकता। भगवान् ब्रह्मा तथा शिव, सर्वोच्च देवता तक, उनके अधीन हैं और उन्हें सादर प्रणाम अर्पित करते हैं। किसी न किसी ध्यान-प्रक्रिया के द्वारा भगवान् बनने का प्रयत्न करने के स्थान पर हमें भगवान् के विषय में विनम्रतापूर्वक सुनना चाहिए और उन्हें तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयास करना चाहिए। भगवान् का प्रतिनिधि अथवा भगवान् का अवतार कभी भगवान् होने का दावा नहीं करता, अपितु भगवान् का सेवक होने का करता है। यही प्रामाणिक प्रतिनिधि का लक्षण है।\n\nप्रामाणिक स्रोतों से हम भगवान् के विषय में जो कुछ भी सीखते हैं, उसका वर्णन किया जा सकता है, और वह हमें आध्यात्मिक प्रगति करने में सहायता करेगा। इस वर्णन को कीर्तन कहते हैं। यदि हम जो सुनते हैं उसे दोहराने का प्रयत्न करें, तो हम ज्ञान में स्थित हो जाते हैं। श्रवणं कीर्तनम्, अर्थात् सुनने तथा कीर्तन करने की प्रक्रिया के द्वारा हम भौतिक बद्धता से मुक्त हो सकते हैं और भगवान् के राज्य को प्राप्त कर सकते हैं। इस युग में यज्ञ, कल्पना अथवा योग का अभ्यास करना असम्भव है। प्रामाणिक स्रोतों से विनम्रतापूर्वक सुनने के मार्ग के अतिरिक्त हमारे लिए कोई मार्ग खुला नहीं है। इसी मार्ग से महात्माओं ने सर्वाधिक गुह्य ज्ञान प्राप्त किया। इसी मार्ग से अर्जुन ने श्रीकृष्ण से उसे प्राप्त किया, और इसी मार्ग से हमें उसे अर्जुन से उद्भूत गुरु-परम्परा से प्राप्त करना चाहिए।"}
{"ref": "rv/5", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/5/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "परम्परा : गुरु-परम्परा के माध्यम से ज्ञान", "purport": "śrī bhagavān uvāca\n\nimaṁ vivasvate yogaṁ\n\nproktavān aham avyayam\n\nvivasvān manave prāha\n\nmanur ikṣvākave 'bravīt\n\n\"श्रीभगवान् ने कहा : मैंने योग के इस अविनाशी विज्ञान का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान् को दिया, और विवस्वान् ने इसका उपदेश मानवजाति के पिता मनु को दिया, और मनु ने बदले में इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।\" (गीता 4.1)\n\nअनेक युग पूर्व श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* के दिव्य ज्ञान का उपदेश सूर्य के देवता विवस्वान् को दिया। हमारे ज्ञान के अनुसार सूर्य एक अत्यन्त तप्त स्थान है, और हम वहाँ किसी के निवास करने की सम्भावना नहीं मानते। इन शरीरों के साथ सूर्य के अत्यन्त निकट पहुँचना भी सम्भव नहीं। तथापि, वैदिक साहित्य से हम समझ सकते हैं कि सूर्य भी इस ग्रह की भाँति एक ग्रह है, किन्तु वहाँ प्रत्येक वस्तु अग्नि से बनी है। जिस प्रकार यह ग्रह प्रधानतया पृथ्वी से बना है, उसी प्रकार अन्य ग्रह भी हैं जो प्रधानतया अग्नि, जल तथा वायु से बने हैं।\n\nइन विविध ग्रहों पर रहने वाले जीव उस ग्रह के प्रधान तत्त्व के अनुरूप तत्त्वों से बने शरीर प्राप्त करते हैं; अतः जो जीव सूर्य पर रहते हैं, उनके शरीर अग्नि से बने हैं। सूर्य पर रहने वाले समस्त जीवों में प्रधान व्यक्ति विवस्वान् नामक एक देवता हैं। वे सूर्यदेव (सूर्य-नारायण) के नाम से प्रसिद्ध हैं। समस्त ग्रहों पर प्रधान व्यक्ति होते हैं, ठीक जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रमुख व्यक्ति राष्ट्रपति है। *महाभारत* नामक इतिहास से हम समझते हैं कि प्राचीन काल में इस ग्रह पर महाराज भरत नामक केवल एक राजा था। उसने लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व शासन किया, और इस ग्रह का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा। तत्पश्चात् पृथ्वी अनेक भिन्न-भिन्न देशों में विभाजित हो गई। इस प्रकार ब्रह्माण्ड के विविध ग्रहों के सामान्यतः एक और कभी-कभी अनेक नियन्त्रक होते हैं।\n\nचौथे अध्याय के इस प्रथम श्लोक से हम जानते हैं कि लाखों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का ज्ञान सूर्यदेव विवस्वान् को दिया। श्रीकृष्ण, जो *भगवद्गीता* की शिक्षाएँ अर्जुन को देते हैं, यहाँ संकेत करते हैं कि ये शिक्षाएँ बिलकुल नई नहीं हैं, अपितु अनेक युग पूर्व एक भिन्न ग्रह पर प्रतिपादित की गई थीं। विवस्वान् ने, बदले में, इन शिक्षाओं को अपने पुत्र मनु को दोहराया। बदले में, मनु ने यह ज्ञान अपने शिष्य इक्ष्वाकु को प्रदान किया। महाराज इक्ष्वाकु एक महान् राजा तथा भगवान् रामचन्द्र के पूर्वज थे। यहाँ जो बात कही जा रही है, वह यह है कि यदि कोई *भगवद्गीता* को सीखना तथा उससे लाभान्वित होना चाहे, तो उसे समझने की एक प्रक्रिया है, और वह प्रक्रिया यहाँ वर्णित है। ऐसा नहीं कि श्रीकृष्ण अर्जुन से *भगवद्गीता* प्रथम बार कह रहे हैं। वैदिक प्रमाणों के अनुसार यह अनुमान लगाया जाता है कि भगवान् ने ये दिव्य उपदेश विवस्वान् को लगभग चालीस करोड़ वर्ष पूर्व दिए थे। *महाभारत* से हम समझते हैं कि *भगवद्गीता* अर्जुन से लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व कही गई थी। अर्जुन से पूर्व ये शिक्षाएँ गुरु-परम्परा के द्वारा सौंपी जाती रहीं, किन्तु इतने लम्बे काल में ये शिक्षाएँ लुप्त हो गईं।\n\nevaṁ paramparā-prāptam\n\nimaṁ rājarṣayo viduḥ\n\nsa kāleneha mahatā\n\nyogo naṣṭaḥ parantapa\n\nsa evāyaṁ mayā te 'dya\n\nyogaḥ proktaḥ purātanaḥ\n\nbhakto 'si me sakhā ceti\n\nrahasyaṁ hy etad uttamam\n\n[गीता 4.3]\n\n\"यह परम विज्ञान इस प्रकार गुरु-परम्परा की श्रृंखला के माध्यम से प्राप्त हुआ, और साधु-स्वभाव वाले राजाओं ने इसे उसी रीति से समझा। किन्तु कालक्रम में यह परम्परा भंग हो गई, और इसी कारण यह विज्ञान अपने यथार्थ रूप में लुप्त प्रतीत होता है। परम के साथ सम्बन्ध का वही अति प्राचीन विज्ञान आज मैं तुमसे कह रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे भक्त के साथ-साथ मेरे मित्र भी हो; अतः तुम इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो।\" (गीता 4.2–3)\n\n*भगवद्गीता* में अनेक योग-पद्धतियों का प्रतिपादन हुआ है — भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग — और इसी कारण इसे यहाँ योग कहा गया है। योग शब्द का अर्थ है \"जोड़ना,\" और भाव यह है कि योग में हम अपनी चेतना को भगवान् से जोड़ते हैं। यह भगवान् के साथ पुनर्मिलन अथवा उनके साथ अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित करने का एक साधन है। कालक्रम में श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त यह योग लुप्त हो गया। ऐसा क्यों? क्या जिस समय श्रीकृष्ण अर्जुन से बात कर रहे थे, उस समय कोई विद्वान् ऋषि नहीं थे? नहीं, उस समय अनेक ऋषि उपस्थित थे। \"लुप्त\" से तात्पर्य यह है कि *भगवद्गीता* का तात्पर्य लुप्त हो गया। विद्वान् *भगवद्गीता* की अपनी-अपनी व्याख्या दे सकते हैं और अपनी ही सनक के अनुसार उसका विश्लेषण कर सकते हैं, किन्तु वह *भगवद्गीता* नहीं है। यही वह बात है जिस पर श्रीकृष्ण बल दे रहे हैं, और *भगवद्गीता* के विद्यार्थी को इसका ध्यान रखना चाहिए। कोई व्यक्ति भौतिक दृष्टि से भले ही अत्यन्त अच्छा विद्वान् हो, किन्तु इससे वह *भगवद्गीता* पर टिप्पणी करने के योग्य नहीं हो जाता। *भगवद्गीता* को समझने के लिए हमें गुरु-परम्परा (परम्परा) के सिद्धान्त को स्वीकार करना होगा। हमें *भगवद्गीता* के भाव में प्रवेश करना होगा, न कि केवल पाण्डित्य की दृष्टि से उसके निकट जाना होगा।\n\nसमस्त लोगों में से, श्रीकृष्ण ने इस ज्ञान के पात्र के रूप में अर्जुन को ही क्यों चुना? अर्जुन कोई महान् विद्वान् बिलकुल नहीं था, न ही वह कोई योगी, ध्यानी अथवा साधु पुरुष था। वह एक योद्धा था जो युद्ध में प्रवृत्त होने ही वाला था। उस समय अनेक महान् ऋषि जीवित थे, और श्रीकृष्ण उन्हें *भगवद्गीता* दे सकते थे। इसका उत्तर यह है कि एक साधारण मनुष्य होने के बावजूद अर्जुन में एक महान् योग्यता थी : bhakto 'si me sakhā ceti : \"तुम मेरे भक्त तथा मेरे मित्र हो।\" यही अर्जुन की असाधारण योग्यता थी, ऐसी योग्यता जो उन ऋषियों में नहीं थी। अर्जुन जानता था कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और इसी कारण उसने अपने को उन्हें समर्पित कर दिया, उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करते हुए। जब तक कोई भगवान् श्रीकृष्ण का भक्त न हो, तब तक वह *भगवद्गीता* को समझ ही नहीं सकता। यदि कोई *भगवद्गीता* को समझना चाहे, तो वह अन्य विधियों से सहायता नहीं ले सकता। उसे इसे उसी रीति से समझना होगा जैसा *भगवद्गीता* में ही निर्धारित है, अर्थात् इसे वैसे ही समझकर जैसे अर्जुन ने समझा। यदि हम *भगवद्गीता* को किसी भिन्न रीति से समझना चाहें, अथवा कोई व्यक्तिगत व्याख्या दें, तो वह हमारे पाण्डित्य का प्रदर्शन भले हो, किन्तु वह *भगवद्गीता* नहीं है।\n\nपाण्डित्य के द्वारा हम *भगवद्गीता* का कोई सिद्धान्त गढ़ सकते हैं, ठीक जैसे महात्मा गांधी ने किया, जब उन्होंने अपने अहिंसा-सिद्धान्त को समर्थन देने के प्रयास में *भगवद्गीता* की व्याख्या की। *भगवद्गीता* से अहिंसा को सिद्ध करना कैसे सम्भव है? *भगवद्गीता* का मूल विषय ही अर्जुन की युद्ध करने की अनिच्छा तथा श्रीकृष्ण द्वारा उसे अपने विपक्षियों का वध करने हेतु प्रेरित करना है। वस्तुतः श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि युद्ध का निर्णय परम के द्वारा पहले ही हो चुका है, कि युद्धभूमि पर एकत्र लोगों के लिए कभी न लौटने का विधान पहले से ही निश्चित था। यह श्रीकृष्ण की ही योजना थी कि वे योद्धा मरने के लिए विधान-निश्चित थे, और श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उन पर विजय का श्रेय लेने का अवसर दिया। यदि *भगवद्गीता* में युद्ध को एक आवश्यकता घोषित किया गया है, तो उससे अहिंसा को सिद्ध करना कैसे सम्भव है? ऐसी व्याख्याएँ *भगवद्गीता* को विकृत करने के प्रयास हैं। जैसे ही *गीता* की व्याख्या किसी व्यक्ति के अभिप्राय के अनुसार की जाती है, वैसे ही उसका प्रयोजन लुप्त हो जाता है। कहा गया है कि हम वैदिक साहित्य के निष्कर्ष को अपने ही तर्क अथवा युक्ति के बल पर प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसी अनेक बातें हैं जो हमारे तर्क-बोध के क्षेत्राधिकार में नहीं आतीं। जहाँ तक शास्त्रों का प्रश्न है, हम विभिन्न शास्त्रों को परम सत्य का भिन्न-भिन्न रीतियों से वर्णन करते हुए पाते हैं। यदि हम उन सबका विश्लेषण करें, तो भ्रम उत्पन्न होगा। भिन्न-भिन्न मतों वाले अनेक दार्शनिक भी हैं, और वे सदा एक-दूसरे का खण्डन करते रहते हैं। यदि सत्य को विभिन्न शास्त्रों को पढ़ने से, तार्किक युक्ति से अथवा दार्शनिक सिद्धान्तों से नहीं समझा जा सकता, तो फिर उसे कैसे प्राप्त किया जाए? तथ्य यह है कि परम सत्य की प्रज्ञा अत्यन्त गुह्य है, किन्तु यदि हम प्रामाणिक अधिकारियों का अनुसरण करें, तो उसे समझा जा सकता है।\n\nभारत में रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क, विष्णुस्वामी तथा अन्य महान् ऋषियों से आने वाली गुरु-परम्पराएँ हैं। वैदिक साहित्य श्रेष्ठ आध्यात्मिक गुरुओं के माध्यम से समझा जाता है। अर्जुन ने *भगवद्गीता* को श्रीकृष्ण से समझा, और यदि हम उसे समझना चाहें, तो हमें उसे अर्जुन से ही समझना होगा, किसी अन्य स्रोत से नहीं। यदि हमें *भगवद्गीता* का कोई ज्ञान है, तो हमें देखना होगा कि वह अर्जुन की समझ से कैसे मेल खाता है। यदि हम *भगवद्गीता* को उसी रीति से समझें जैसे अर्जुन ने समझा, तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारी समझ सही है। *भगवद्गीता* के हमारे अध्ययन की यही कसौटी होनी चाहिए। यदि हम वास्तव में *भगवद्गीता* से लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें इस सिद्धान्त का अनुसरण करना होगा। *भगवद्गीता* कोई साधारण ज्ञान-ग्रन्थ नहीं जिसे हम बाज़ार से खरीदकर पढ़ सकें और समझने के लिए मात्र एक शब्दकोश देख लें। यह सम्भव नहीं है। यदि ऐसा होता, तो श्रीकृष्ण अर्जुन से कभी न कहते कि वह विज्ञान लुप्त हो गया था।\n\n*भगवद्गीता* को समझने के लिए गुरु-परम्परा से होकर जाने की आवश्यकता को समझना कठिन नहीं है। यदि हम वकील, अभियन्ता अथवा चिकित्सक बनना चाहें, तो हमें प्रामाणिक वकीलों, अभियन्ताओं तथा चिकित्सकों से ज्ञान प्राप्त करना होगा। एक नए वकील को किसी अनुभवी वकील का शिष्य बनना पड़ता है, अथवा चिकित्सक बनने का अध्ययन करने वाले एक युवक को प्रशिक्षु बनकर उनके साथ काम करना पड़ता है जो पहले से ही प्रमाणित अभ्यासी हैं। किसी विषय का हमारा ज्ञान तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक हम उसे प्रामाणिक स्रोतों से प्राप्त न करें।\n\nज्ञान प्राप्त करने की दो प्रक्रियाएँ हैं — एक आगमनात्मक और दूसरी निगमनात्मक। निगमनात्मक विधि अधिक पूर्ण मानी जाती है। हम कोई एक आधार-वाक्य ले सकते हैं, जैसे, \"सभी मनुष्य मरणशील हैं,\" और किसी को इस बात की चर्चा करने की आवश्यकता नहीं कि मनुष्य कैसे मरणशील है। सामान्यतः यह स्वीकार कर लिया जाता है कि ऐसा ही है। निगमनात्मक निष्कर्ष यह है : \"मि. जॉनसन एक मनुष्य हैं; अतः मि. जॉनसन मरणशील हैं।\" किन्तु यह आधार-वाक्य कि सभी मनुष्य मरणशील हैं, कैसे प्राप्त होता है? आगमनात्मक विधि के अनुयायी इस आधार-वाक्य तक प्रयोग एवं प्रेक्षणों के द्वारा पहुँचना चाहते हैं। हम इस प्रकार अध्ययन कर सकते हैं कि यह मनुष्य मरा और वह मनुष्य मरा, इत्यादि, और इतने सारे मनुष्यों को मरते देखने के पश्चात् हम निष्कर्ष या सामान्यीकरण कर सकते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं, किन्तु इस आगमनात्मक विधि में एक बड़ा दोष है, और वह यह कि हमारा अनुभव सीमित है। हो सकता है हमने ऐसे किसी मनुष्य को कभी न देखा हो जो मरणशील न हो, किन्तु हम इसका निर्णय अपने व्यक्तिगत अनुभव पर कर रहे हैं, जो ससीम है। हमारी इन्द्रियों की शक्ति सीमित है, और हमारी बद्ध दशा में इतने सारे दोष हैं। फलतः आगमनात्मक प्रक्रिया सदा पूर्ण नहीं होती, जबकि पूर्ण ज्ञान के स्रोत से आने वाली निगमनात्मक प्रक्रिया पूर्ण होती है। वैदिक प्रक्रिया ऐसी ही प्रक्रिया है।\n\nयद्यपि प्रमाण स्वीकृत है, तथापि *भगवद्गीता* में अनेक स्थल ऐसे हैं जो हठधर्मी प्रतीत होते हैं। उदाहरणार्थ, सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं :\n\nmattaḥ parataraṁ nānyat\n\nkiñcid asti dhanañjaya\n\nmayi sarvam idaṁ protaṁ\n\nsūtre maṇi-gaṇā iva\n\n\"हे धनञ्जय (अर्जुन), मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है। प्रत्येक वस्तु मुझ पर इस प्रकार आधारित है, जैसे धागे में मोती पिरोए हों।\" (गीता 7.7)\n\nश्रीकृष्ण कह रहे हैं कि उनसे बड़ा कोई प्रमाण नहीं है, और यह अत्यन्त हठधर्मी प्रतीत होता है। यदि मैं कहूँ, \"मुझसे बड़ा कोई नहीं है,\" तो लोग सोचेंगे, \"ओह, स्वामीजी अत्यन्त अहंकारी हैं।\" यदि कोई मनुष्य, जो इतनी सारी अपूर्णताओं से बद्ध है, यह कहे कि वह सबसे महान् है, तो वह ईश्वर-निन्दा करता है। किन्तु श्रीकृष्ण यह कह सकते हैं, क्योंकि हम इतिहासों से समझ सकते हैं कि जब वे इस पृथ्वी पर थे, तब भी वे अपने समय के महानतम व्यक्ति माने जाते थे। निस्सन्देह वे क्रिया के समस्त क्षेत्रों में महानतम थे।\n\nवैदिक पद्धति के अनुसार वह ज्ञान, जो महानतम प्रमाण से प्राप्त किया जाता है, पूर्ण माना जाना चाहिए। *वेदों* के अनुसार तीन प्रकार के प्रमाण हैं : प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द। एक है प्रत्यक्ष दृष्टि-बोध के द्वारा। यदि कोई व्यक्ति मेरे समक्ष बैठा है, तो मैं उसे वहाँ बैठा देख सकता हूँ, और उसके वहाँ बैठे होने का मेरा ज्ञान मेरे नेत्रों के द्वारा प्राप्त होता है। दूसरी विधि, अनुमान, श्रवण-सम्बन्धी है : हम बाहर बालकों को खेलते सुन सकते हैं, और सुनकर हम अनुमान लगा सकते हैं कि वे वहाँ हैं। और तीसरी विधि किसी उच्चतर प्रमाण से सत्यों को ग्रहण करने की विधि है। \"मनुष्य मरणशील है\" जैसा कथन उच्चतर प्रमाणों से स्वीकार किया जाता है। सभी इसे स्वीकार करते हैं, किन्तु किसी ने यह अनुभव नहीं किया कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। परम्परा के अनुसार हमें इसे स्वीकार करना ही होता है। यदि कोई पूछे, \"यह सत्य सबसे पहले किसने खोजा? क्या तुमने इसे खोजा?\" तो यह बताना अत्यन्त कठिन है। हम केवल इतना कह सकते हैं कि यह ज्ञान नीचे आ रहा है और हम इसे स्वीकार करते हैं। ज्ञान प्राप्त करने की तीन विधियों में से *वेद* कहते हैं कि तीसरी विधि, अर्थात् उच्चतर प्रमाणों से ज्ञान प्राप्त करने की विधि, सर्वाधिक पूर्ण है। प्रत्यक्ष बोध सदा अपूर्ण है, विशेषतः जीवन की बद्ध अवस्था में। प्रत्यक्ष बोध के द्वारा हम देख सकते हैं कि सूर्य ठीक एक चकती-सा है, उस थाली से बड़ा नहीं जिसमें हम भोजन करते हैं। किन्तु वैज्ञानिकों से हम समझ पाते हैं कि सूर्य पृथ्वी से अनेक हज़ार गुना बड़ा है। तो फिर हम किसे स्वीकार करें? क्या हम वैज्ञानिक उद्घोषणा को स्वीकार करें, प्रामाणिक अधिकारियों की उद्घोषणा को, अथवा अपने ही अनुभव को? यद्यपि हम स्वयं यह सिद्ध नहीं कर सकते कि सूर्य कितना बड़ा है, तथापि हम खगोलविदों के निर्णय को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार हम अपनी क्रिया के प्रत्येक क्षेत्र में प्रामाणिक अधिकारियों के कथनों को स्वीकार करते हैं। समाचारपत्रों एवं रेडियो से हम यह भी समझते हैं कि चीन तथा भारत और पृथ्वी के चारों ओर अन्य स्थानों में अमुक-अमुक घटनाएँ घट रही हैं। हम इन घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे, और हम नहीं जानते कि ऐसी घटनाएँ वास्तव में घट रही हैं, किन्तु हम समाचारपत्रों एवं रेडियो के प्रमाण को स्वीकार करते हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रामाणिक अधिकारियों पर विश्वास करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प नहीं। और जब प्रमाण पूर्ण होता है, तब हमारा ज्ञान पूर्ण होता है।\n\nवैदिक स्रोतों के अनुसार समस्त प्रमाणों में श्रीकृष्ण महानतम एवं सर्वाधिक पूर्ण हैं (mattaḥ parataraṁ nānyat kiñcid asti dhanañjaya [गीता 7.7])। श्रीकृष्ण न केवल स्वयं को सर्वोच्च प्रमाण घोषित करते हैं, अपितु इसे *भगवद्गीता* के महान् ऋषि तथा विद्वान् भी स्वीकार करते हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को प्रमाण के रूप में स्वीकार न करें और उनके शब्दों को ज्यों-का-त्यों न लें, तो हम *भगवद्गीता* से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यह हठधर्म नहीं है; यह एक तथ्य है। यदि हम सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करें कि श्रीकृष्ण क्या कहते हैं, तो हम पाएँगे कि वह सही है। शंकराचार्य जैसे विद्वान् तक, जिनके मत पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से भिन्न हैं, यह स्वीकार करते हैं कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं — श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं।\n\nवैदिक ज्ञान कोई हाल की खोज नहीं है। यह सब प्राचीन प्रकट ज्ञान है। श्रीकृष्ण इसे purātanaḥ कहते हैं, जिसका अर्थ है प्राचीन। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने यह योग सूर्यदेव से लाखों वर्ष पूर्व कहा था, और हम नहीं जानते कि उससे कितने लाखों वर्ष पूर्व उन्होंने इसे किसी और से कहा था। यह ज्ञान सदा दोहराया जाता रहता है, ठीक जैसे ग्रीष्म, शरद्, शिशिर तथा वसन्त प्रति वर्ष दोहराए जाते हैं। हमारा ज्ञान-कोष अत्यन्त दरिद्र है; हम इस ग्रह का इतिहास पाँच हज़ार वर्ष से अधिक पीछे का भी नहीं जानते, किन्तु वैदिक साहित्य हमें लाखों वर्ष पूर्व तक के इतिहास देता है। केवल इसलिए कि हमें यह ज्ञात नहीं कि इस ग्रह पर तीन हज़ार वर्ष पूर्व क्या हुआ था, हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि तब कोई इतिहास ही नहीं था। निस्सन्देह कोई श्रीकृष्ण की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को नकार सकता है। कोई कह सकता है कि श्रीकृष्ण, *महाभारत* के अनुसार, पाँच हज़ार वर्ष पूर्व जीवित थे, और ऐसी दशा में इतने लाखों वर्ष पूर्व सूर्यदेव से उनके *भगवद्गीता* कहने की कोई सम्भावना नहीं। यदि मैं कहूँ कि मैंने कुछ लाखों वर्ष पूर्व सूर्य पर सूर्यदेव को एक भाषण दिया था, तो लोग कहेंगे, \"स्वामीजी कोई निरर्थक बात कह रहे हैं।\" किन्तु श्रीकृष्ण के साथ ऐसा नहीं है, क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। हम यह विश्वास करें या न करें कि श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* सूर्यदेव से कही, इस तथ्य को अर्जुन स्वीकार कर रहा है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया, और इसी कारण वह जानता था कि श्रीकृष्ण के लिए किसी से लाखों वर्ष पूर्व बात करना पूर्णतः सम्भव था। यद्यपि अर्जुन व्यक्तिगत रूप से श्रीकृष्ण के कथनों को स्वीकार करता है, तथापि अपने पश्चात् आने वाले लोगों के लिए स्थिति को स्पष्ट करने हेतु वह पूछता है :\n\naparaṁ bhavato janma\n\nparaṁ janma vivasvataḥ\n\nkatham etad vijānīyāṁ\n\ntvam ādau proktavān iti\n\n\"सूर्यदेव विवस्वान् जन्म से आपसे ज्येष्ठ हैं। मैं यह कैसे समझूँ कि आरम्भ में आपने यह विज्ञान उन्हें दिया था?\" (गीता 4.4)\n\nवस्तुतः यह एक अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न है, और श्रीकृष्ण इसका उत्तर इस प्रकार देते हैं :\n\nbahūni me vyatītāni\n\njanmāni tava cārjuna\n\ntāny ahaṁ veda sarvāṇi\n\nna tvaṁ vettha parantapa\n\n\"बहुत-बहुत जन्म तुमने और मैंने व्यतीत किए हैं। मैं उन सबको स्मरण रख सकता हूँ, किन्तु तुम नहीं रख सकते, हे परन्तप!\" (गीता 4.5)\n\nयद्यपि श्रीकृष्ण भगवान् हैं, फिर भी वे अनेकानेक बार अवतरित होते हैं। अर्जुन, एक जीव होने के कारण, अनेकानेक बार जन्म लेता है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा जीव के बीच भेद यह है, तान्यहं वेद सर्वाणि : श्रीकृष्ण अपने पूर्व अवतारों की घटनाएँ स्मरण रखते हैं, जबकि जीव स्मरण नहीं रख सकता। ईश्वर तथा मनुष्य के बीच यह एक भेद है। ईश्वर नित्य हैं, और हम भी नित्य हैं, किन्तु भेद यह है कि हम सदा अपने शरीर बदलते रहते हैं। मृत्यु के समय हम अपने जीवन की घटनाएँ भूल जाते हैं; मृत्यु का अर्थ है विस्मृति, बस इतना ही। रात्रि में, जब हम सोने जाते हैं, तब हम भूल जाते हैं कि हम अमुक पत्नी के पति तथा अमुक बालकों के पिता हैं। निद्रा में हम स्वयं को भूल जाते हैं, किन्तु जब जागते हैं, तब स्मरण आता है, \"ओह, मैं अमुक व्यक्ति हूँ, और मुझे अमुक कार्य करना है।\" यह तथ्य है कि अपने पूर्व जन्मों में हमारे अन्य शरीर थे, अन्य देशों में अन्य परिवार, पिता, माता इत्यादि थे, किन्तु हम इन सबको भूल चुके हैं। हम कुत्ते रहे होंगे या बिल्ली या मनुष्य या देवता—जो भी हम रहे हों, उसे अब हम भूल चुके हैं।\n\nइन समस्त परिवर्तनों के होते हुए भी, जीव के रूप में हम नित्य हैं। जिस प्रकार पूर्व जन्मों में हमने इस शरीर हेतु तैयारी की थी, उसी प्रकार इस जीवन में हम दूसरे शरीर हेतु तैयारी कर रहे हैं। हमें अपने कर्म अथवा क्रियाओं के अनुसार शरीर प्राप्त होते हैं। जो सत्त्वगुण में स्थित होते हैं, वे उच्चतर लोकों में, जीवन की उच्चतर स्थिति में उन्नत होते हैं (गीता 14.14)। जो रजोगुण में मरते हैं, वे पृथ्वी पर ही रहते हैं, और जो तमोगुण में मरते हैं, वे पशु-योनियों में गिर सकते हैं अथवा निम्न लोक में स्थानान्तरित हो सकते हैं (गीता 14.15)। यह प्रक्रिया चलती आ रही है, किन्तु हम इसे भूल जाते हैं।\n\nएक बार, स्वर्ग के राजा इन्द्र ने अपने गुरुदेव के चरणों में अपराध किया, और उनके गुरुदेव ने उन्हें शाप दिया कि वे शूकर का जन्म लें। इस प्रकार स्वर्ग-राज्य का सिंहासन रिक्त हो गया, क्योंकि इन्द्र शूकर बनने हेतु पृथ्वी पर चले आए। यह स्थिति देखकर ब्रह्मा पृथ्वी पर आए और शूकर को सम्बोधित किया : \"हे महोदय, आप इस पृथ्वीलोक पर शूकर बन गए हैं। मैं आपको उद्धार करने आया हूँ। तुरन्त मेरे साथ चलें।\" किन्तु शूकर ने उत्तर दिया : \"ओह, मैं आपके साथ नहीं जा सकता। मेरे ऊपर इतने उत्तरदायित्व हैं—मेरे बच्चे, पत्नी और यह सुन्दर शूकर-समाज।\" यद्यपि ब्रह्मा ने उसे स्वर्ग वापस ले जाने का वचन दिया, फिर भी शूकर के रूप में इन्द्र ने अस्वीकार कर दिया। इसी को विस्मृति कहते हैं। इसी प्रकार, भगवान् श्रीकृष्ण आते हैं और हमसे कहते हैं, \"तुम इस भौतिक जगत् में क्या कर रहे हो? सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज [गीता 18.66]। मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें समस्त संरक्षण प्रदान करूँगा।\" किन्तु हम कहते हैं, \"मैं आप पर विश्वास नहीं करता, महोदय। मेरा यहाँ अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है।\" यही बद्धजीव की स्थिति है—विस्मृति। यह विस्मृति गुरु-परम्परा के मार्ग का अनुसरण करने से शीघ्र दूर हो जाती है।"}
{"ref": "rv/6", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/6/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "श्रीकृष्ण के अवतरणों एवं लीलाओं का ज्ञान", "purport": "प्रकृति की दो शक्तियाँ हममें कार्य करती हैं। एक के द्वारा हम निश्चय करते हैं कि इस जीवन में हम आध्यात्मिक उन्नति करेंगे, किन्तु अगले ही क्षण दूसरी शक्ति, माया अथवा माया-शक्ति, कहती है, \"यह सारी झंझट जो तुम मोल ले रहे हो, क्या है? बस इस जीवन का भोग करो और स्वयं के प्रति सहज रहो।\" विस्मृति में गिरने की यह प्रवृत्ति ही ईश्वर तथा मनुष्य के बीच भेद है। अर्जुन श्रीकृष्ण के संगी एवं पार्षद हैं, और जब-जब श्रीकृष्ण किसी भी लोक पर अवतरित होते हैं, तब-तब अर्जुन भी जन्म लेकर उनके साथ प्रकट होते हैं। जब श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव को *भगवद्गीता* सुनाई थी, तब अर्जुन भी उनके साथ उपस्थित थे। किन्तु, एक ससीम जीव होने के कारण, अर्जुन स्मरण नहीं रख सके। विस्मृति जीव का स्वभाव है। हम तो यह भी स्मरण नहीं रख सकते कि कल अथवा एक सप्ताह पूर्व ठीक इसी समय हम क्या कर रहे थे। यदि हम इसे स्मरण नहीं रख सकते, तो यह कैसे सम्भव है कि हम स्मरण रखें कि हमारे पूर्व जन्मों में क्या हुआ था? इस बिन्दु पर हम पूछ सकते हैं कि श्रीकृष्ण कैसे स्मरण रख सकते हैं और हम क्यों नहीं, और उत्तर यह है कि श्रीकृष्ण अपना शरीर नहीं बदलते।\n\najo 'pi sann avyayātmā\n\nbhūtānām īśvaro 'pi san\n\nprakṛtiṁ svām adhiṣṭhāya\n\nsambhavāmy ātma-māyayā\n\n\"यद्यपि मैं अजन्मा हूँ और मेरा दिव्य शरीर कभी क्षीण नहीं होता, और यद्यपि मैं समस्त प्राणियों का स्वामी हूँ, फिर भी मैं प्रत्येक युग में अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ।\" (गीता 4.6)\n\nआत्म-माययाः शब्द का अर्थ है कि श्रीकृष्ण जैसे हैं वैसे ही अवतरित होते हैं। वे अपना शरीर नहीं बदलते, किन्तु हम, बद्धजीव के रूप में, अपना शरीर बदलते हैं, और इसी कारण हम भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण न केवल अपनी लीलाओं के भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानते हैं, अपितु सभी की क्रियाओं के भूत, वर्तमान तथा भविष्य को भी जानते हैं।\n\nvedāhaṁ samatītāni\n\nvartamānāni cārjuna\n\nbhaviṣyāṇi ca bhūtāni\n\nmāṁ tu veda na kaścana\n\n\"हे अर्जुन! पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में, मैं वह सब कुछ जानता हूँ जो भूत में घटित हुआ है, वह सब जो वर्तमान में घटित हो रहा है, और वे समस्त वस्तुएँ जो अभी आने वाली हैं। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ; किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।\" (गीता 7.26)\n\n*श्रीमद्भागवत* में भी हम पाते हैं कि परमेश्वर को उस रूप में परिभाषित किया गया है जो सब कुछ जानते हैं। यह बात ब्रह्मा तथा शिव जैसे अति-उन्नत जीवों के विषय में भी सत्य नहीं है। केवल विष्णु अथवा श्रीकृष्ण ही सब कुछ जानते हैं। हम यह भी पूछ सकते हैं कि यदि भगवान् अपना शरीर नहीं बदलते, तो वे अवतार के रूप में क्यों आते हैं? इस प्रश्न के विषय में दार्शनिकों में बहुत मतभेद है। कुछ कहते हैं कि श्रीकृष्ण जब आते हैं तब भौतिक शरीर धारण करते हैं, किन्तु यह बात सत्य नहीं है। यदि वे हमारे समान भौतिक शरीर धारण करते, तो वे स्मरण नहीं रख सकते, क्योंकि विस्मृति भौतिक शरीर के कारण होती है। वास्तविक निष्कर्ष यह है कि वे अपना शरीर नहीं बदलते। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा जाता है, और उपर्युक्त उद्धृत श्लोक में, उनकी सर्वशक्तिमत्ता की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण का कोई जन्म नहीं है, और वे नित्य हैं। इसी प्रकार, जीव का भी कोई जन्म नहीं है, और वह भी नित्य है। केवल वह शरीर ही जन्म लेता है जिससे जीव अपनी पहचान करता है।\n\n*भगवद्गीता* के सर्वप्रथम आरम्भ में ही, द्वितीय अध्याय में, श्रीकृष्ण व्याख्या करते हैं कि जिसे हम जन्म तथा मृत्यु के रूप में स्वीकार करते हैं, वह शरीर के कारण है, और जैसे ही हम अपना आध्यात्मिक शरीर पुनः प्राप्त कर लेते हैं और जन्म-मृत्यु के संदूषण से बाहर निकल आते हैं, वैसे ही हमें गुणात्मक रूप से श्रीकृष्ण के समान उत्तम हो जाना चाहिए। यही कृष्णभावनामृत की समूची प्रक्रिया है—अपने मूल सच्चिदानन्द आध्यात्मिक शरीर का पुनरुद्धार। वह शरीर नित्य (सत्) है, ज्ञान से पूर्ण (चित्) है, और आनन्दमय (आनन्द) है। यह भौतिक शरीर न तो सत् है, न चित्, न ही आनन्द। यह नाशवान है, जबकि शरीर में निवास करने वाला व्यक्ति अविनाशी है। यह अज्ञान से भी पूर्ण है, और चूँकि यह अज्ञानमय तथा क्षणभंगुर है, अतः यह दुःख से पूर्ण है। भौतिक शरीर के कारण हम तीव्र गर्मी अथवा तीव्र शीत अनुभव करते हैं, किन्तु जैसे ही हम अपना आध्यात्मिक शरीर पुनः प्राप्त करते हैं, वैसे ही हम द्वन्द्वों से अप्रभावित हो जाते हैं। भौतिक शरीरों के भीतर रहते हुए भी ऐसे योगी हैं जो शीत तथा ताप जैसे द्वन्द्वों से अप्रभावित रहते हैं। ज्यों-ज्यों हम भौतिक शरीर में रहते हुए आध्यात्मिक उन्नति करने लगते हैं, त्यों-त्यों हम आध्यात्मिक शरीर के गुण धारण करने लगते हैं। यदि हम लोहे को अग्नि में डाल दें, तो वह तप्त हो जाता है, फिर लाल-तप्त हो जाता है, और अन्ततः वह लोहा नहीं, अपितु अग्नि बन जाता है—जिसे भी वह स्पर्श करता है, वह धधक उठता है। ज्यों-ज्यों हम कृष्णभावनामृत में उन्नत होते हैं, त्यों-त्यों हमारा भौतिक शरीर आध्यात्मिक हो जाएगा और भौतिक संदूषण से प्रभावित नहीं रहेगा।\n\nश्रीकृष्ण का जन्म, उनका प्राकट्य तथा अन्तर्धान, सूर्य के उदय तथा अस्त के समान है। प्रातःकाल ऐसा प्रतीत होता है मानो सूर्य पूर्वी क्षितिज से जन्म ले रहा हो, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। सूर्य न तो उदित होता है और न ही अस्त होता है; वह जैसा है वैसा ही अपनी स्थिति में रहता है। समस्त उदय तथा अस्त पृथ्वी के घूर्णन के कारण हैं। इसी प्रकार, वैदिक साहित्य में श्रीकृष्ण के प्राकट्य तथा अन्तर्धान हेतु विहित समय-सारणियाँ हैं। श्रीकृष्ण का उदय ठीक सूर्य के समान है। सूर्य का उदय तथा अस्त प्रत्येक क्षण होता रहता है; संसार में कहीं-न-कहीं लोग सूर्योदय तथा सूर्यास्त देख रहे होते हैं। ऐसा नहीं है कि एक बिन्दु पर श्रीकृष्ण जन्म लेते हैं और दूसरे बिन्दु पर चले जाते हैं। वे सदा कहीं-न-कहीं रहते हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वे आते-जाते हैं। श्रीकृष्ण अनेक ब्रह्माण्डों में प्रकट तथा अन्तर्धान होते हैं। हमें केवल इस एक ब्रह्माण्ड का अनुभव है, किन्तु वैदिक साहित्य से हम समझ सकते हैं कि यह ब्रह्माण्ड तो परमेश्वर के अनन्त प्रकटीकरणों का एक अंशमात्र है।\n\nयद्यपि श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं तथा अजन्मा एवं अपरिवर्तनीय हैं, फिर भी वे अपनी आदि दिव्य प्रकृति में प्रकट होते हैं। प्रकृति शब्द का अर्थ है \"स्वभाव/प्रकृति\"। *भगवद्गीता* के सप्तम अध्याय में कहा गया है कि अनेक प्रकार की प्रकृति है। इन्हें तीन मूल प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। बाह्य प्रकृति, अन्तरंग प्रकृति तथा तटस्थ प्रकृति है। बाह्य प्रकृति इस भौतिक जगत् का प्रकटीकरण है, और *भगवद्गीता* के सप्तम अध्याय में इसे अपरा अथवा भौतिक प्रकृति के रूप में वर्णित किया गया है। जब श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं, तब वे उच्चतर प्रकृति (प्रकृतिं स्वाम्) को स्वीकार करते हैं, निम्न भौतिक प्रकृति को नहीं। कभी-कभी किसी राज्य का प्रमुख कारागार का निरीक्षण करने तथा वहाँ के बन्दियों को देखने हेतु कारागार में जा सकता है, किन्तु बन्दी भूल में पड़ जाते हैं यदि वे सोचें, \"राज्य का प्रमुख कारागार में आया है, अतः वह भी हमारे समान बन्दी है।\" जैसा पहले बताया गया, श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब वे मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं तब मूर्ख जन उनका उपहास करते हैं (गीता 9.11)।\n\nश्रीकृष्ण, परमेश्वर के रूप में, यहाँ किसी भी समय आ सकते हैं, और हम आपत्ति करके यह नहीं कह सकते कि वे नहीं आ सकते। वे पूर्णतः स्वतन्त्र हैं, और वे अपनी इच्छानुसार आ तथा अन्तर्धान हो सकते हैं। यदि किसी राज्य का प्रमुख कारागार देखने जाता है, तो हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि वह ऐसा करने को विवश है। श्रीकृष्ण एक प्रयोजन से आते हैं, और वह है पतित बद्धजीवों को पुनः अपनाना। हम श्रीकृष्ण से प्रेम नहीं करते, किन्तु श्रीकृष्ण हमसे प्रेम करते हैं। वे प्रत्येक को अपना पुत्र मानते हैं।\n\nsarva-yoniṣu kaunteya\n\nmūrtayaḥ sambhavanti yāḥ\n\ntāsāṁ brahma mahad yonir\n\nahaṁ bīja-pradaḥ pitā\n\n\"हे कुन्तीपुत्र! यह समझना चाहिए कि जीवन की समस्त योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म से सम्भव होती हैं, और मैं ही बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।\" (गीता 14.4)\n\nपिता सदा पुत्र के प्रति स्नेहमय रहता है। पुत्र भले ही पिता को भूल जाए, किन्तु पिता पुत्र को कभी नहीं भूल सकता। श्रीकृष्ण हमारे प्रति अपने प्रेम के कारण भौतिक ब्रह्माण्ड में आते हैं, ताकि हमें जन्म-मृत्यु के दुःखों से उद्धार कर सकें। वे कहते हैं, \"हे मेरे पुत्रो, तुम इस दुःखमय जगत् में क्यों सड़ रहे हो? मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें समस्त संरक्षण प्रदान करूँगा।\" हम परमेश्वर के पुत्र हैं, और हम बिना किसी दुःख तथा बिना किसी सन्देह के अत्यन्त परम रूप से जीवन का भोग कर सकते हैं। अतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रीकृष्ण भी हमारे समान, प्रकृति के नियमों से विवश होकर, यहाँ आते हैं। संस्कृत शब्द अवतार का शाब्दिक अर्थ है \"वह जो अवतरित होता है\"। जो अपनी इच्छा से आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड से भौतिक ब्रह्माण्ड में अवतरित होता है, उसे अवतार कहते हैं। कभी श्रीकृष्ण स्वयं अवतरित होते हैं, और कभी वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं। संसार के प्रमुख धर्म—ईसाई, हिन्दू, बौद्ध तथा मुसलमान—किसी परम सत्ता अथवा व्यक्ति के ईश्वर के राज्य से अवतरित होने में विश्वास करते हैं। ईसाई धर्म में, ईसा मसीह ने ईश्वर का पुत्र होने का तथा बद्धजीवों को पुनः अपनाने हेतु ईश्वर के राज्य से आने का दावा किया। *भगवद्गीता* के अनुयायियों के रूप में, हम इस दावे को सत्य स्वीकार करते हैं। अतः मूल रूप से कोई मतभेद नहीं है। विस्तारों में संस्कृति, जलवायु तथा जनसमुदाय के भेद के कारण भिन्नताएँ हो सकती हैं, किन्तु मूल सिद्धान्त वही रहता है—अर्थात्, ईश्वर अथवा उनके प्रतिनिधि बद्धजीवों को पुनः अपनाने हेतु आते हैं।\n\nyadā yadā hi dharmasya\n\nglānir bhavati bhārata\n\nabhyutthānam adharmasya\n\ntadātmānam sṛjāmy aham\n\n\"हे भरतवंशी! जब-जब और जहाँ-जहाँ धर्म-आचरण में ह्रास तथा अधर्म की प्रधानता से वृद्धि होती है—उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।\" (गीता 4.7)\n\nईश्वर अत्यन्त करुणामय हैं। वे हमारे दुःखों का अन्त देखना चाहते हैं, किन्तु हम इन दुःखों के साथ समायोजन करने का प्रयत्न कर रहे हैं। चूँकि हम परमेश्वर के अंश हैं, अतः हम इन दुःखों के लिए नहीं बने हैं, किन्तु किसी-न-किसी प्रकार हमने स्वेच्छा से इन्हें स्वीकार कर लिया है। शरीर तथा मन से, अन्य जीवों से, तथा प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न होने वाले दुःख हैं। हम या तो इन तीनों प्रकार के दुःखों से, अथवा कम-से-कम किसी एक से, पीड़ित होते हैं। हम सदा इन दुःखों का समाधान करने का प्रयत्न करते रहते हैं, और यही प्रयास हमारे अस्तित्व-संघर्ष का निर्माण करता है। वह समाधान हमारे क्षुद्र मस्तिष्क द्वारा नहीं हो सकता। वह केवल तभी हो सकता है जब हम परमेश्वर की शरण लेते हैं।\n\nहम तभी सुखी हो सकते हैं जब हम अपनी स्वाभाविक स्थिति में पुनः प्रतिष्ठित होते हैं, और *भगवद्गीता* का उद्देश्य हमें उसी स्थिति में पुनः प्रतिष्ठित करना है। ईश्वर तथा उनके प्रतिनिधि भी सहायता करने आते हैं। जैसा पहले बताया गया, वे उच्चतर प्रकृति से भौतिक जगत् पर अवतरित होते हैं और जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु के नियमों के अधीन नहीं होते। श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने जगत् में अवतरण के निम्नलिखित कारण बताते हैं :\n\nparitrāṇāya sādhūnāṁ\n\nvināśāya ca duṣkṛtām\n\ndharma-saṁsthāpanārthāya\n\nsambhavāmi yuge yuge\n\n\"साधुओं का उद्धार करने तथा दुष्टों का संहार करने हेतु, साथ ही धर्म के सिद्धान्तों की पुनर्स्थापना हेतु, मैं युग-युग में स्वयं अवतरित होता हूँ।\" (गीता 4.8)\n\nयहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब धर्म में ह्रास होता है तब वे आते हैं। संस्कृत शब्द धर्म का अंग्रेज़ी में \"faith\" (आस्था) के रूप में अनुवाद किया गया है, किन्तु \"faith\" का अर्थ ईसाई, मुसलमान, हिन्दू, बौद्ध इत्यादि नामों से चलने वाली धार्मिक प्रणाली हो गया है। किन्तु धर्म शब्द का अर्थ \"faith\" के समान नहीं है। किसी व्यक्ति की आस्था हिन्दू से बौद्ध, बौद्ध से ईसाई, ईसाई से मुसलमान इत्यादि में बदल सकती है। लोगों में एक आस्था को स्वीकार करने तथा दूसरी को अस्वीकार करने की क्षमता है, किन्तु धर्म को बदला नहीं जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति का यही स्वभाव है कि वह सेवा करे—चाहे स्वयं की, अपने परिवार की, अपने समुदाय की, राष्ट्र की अथवा समग्र मानवता की। यह सेवा-अर्पण किसी भी प्रकार जीव से पृथक् नहीं किया जा सकता, और यही प्रत्येक जीव के धर्म का निर्माण करता है। सेवा अर्पित किए बिना मनुष्य रह नहीं सकता। संसार इसलिए चलता है क्योंकि हम सब सेवा अर्पित तथा विनिमय कर रहे हैं। हमें यह भूल जाना चाहिए कि हम ईसाई हैं, मुसलमान हैं अथवा हिन्दू हैं, और हमें यह समझना चाहिए कि हम जीव हैं जिनकी स्वाभाविक स्थिति परम जीव की सेवा करना है। जब हम समझ की उस अवस्था पर पहुँचते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं।\n\nमुक्ति उन क्षणिक उपाधियों से स्वतन्त्रता है जिन्हें हमने भौतिक प्रकृति के संग से अर्जित किया है। मुक्ति इससे अधिक कुछ नहीं है। चूँकि हमारे पास भौतिक शरीर हैं, अतः हम इतनी सारी उपाधियाँ धारण कर लेते हैं; इस प्रकार हम स्वयं को मनुष्य, माता-पिता, अमेरिकी, ईसाई, हिन्दू इत्यादि कहते हैं। यदि हम तनिक भी स्वतन्त्र होना चाहते हैं, तो इन उपाधियों का त्याग कर देना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में हम स्वामी नहीं हैं। हम इस समय सेवा कर रहे हैं, किन्तु हम उपाधियों के साथ सेवा कर रहे हैं। हम एक पत्नी के, एक परिवार के, एक नौकरी के, अपनी ही इन्द्रियों के, अपने बालकों के सेवक हैं, और यदि हमारे पास बालक न हों, तो हम अपनी बिल्लियों अथवा कुत्तों के सेवक बन जाते हैं। किसी भी स्थिति में, हमें सेवा करने हेतु कोई-न-कोई, कुछ-न-कुछ चाहिए ही। यदि हमारे पास पत्नी अथवा बालक न हों, तो हमें किसी कुत्ते अथवा अन्य निम्न पशु को पकड़कर उसकी सेवा करनी पड़ती है। यही हमारा स्वभाव है। हम इसे करने को विवश हैं। जब हम अन्ततः इन उपाधियों से मुक्त हो जाते हैं और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति-सेवा अर्पित करने लगते हैं, तब हम अपनी पूर्ण अवस्था को प्राप्त करते हैं। तब हम अपने यथार्थ धर्म में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।\n\nइस प्रकार श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब जीवों के धर्म में विसंगति आती है, तब-तब वे प्रकट होते हैं, अर्थात् जब-जब जीव परमेश्वर की सेवा करना बन्द कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, जब जीव अपनी इन्द्रियों की सेवा में अत्यधिक संलग्न हो जाता है, और इन्द्रियतृप्ति का अत्यधिक भोग होने लगता है, तब भगवान् आते हैं। उदाहरणार्थ, भारत में, जब लोग पशु-वध में अत्यधिक लिप्त हो रहे थे, तब भगवान् बुद्ध समस्त जीवों के प्रति अहिंसा की स्थापना हेतु आए। इसी प्रकार, उपर्युक्त उद्धृत श्लोक में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा हेतु आते हैं (परित्राणाय साधूनाम्)। साधु अपने इस लक्षण से पहचाने जाते हैं कि वे अन्य समस्त जीवों के प्रति सहिष्णु रहते हैं। समस्त असुविधाओं तथा संकटों के होते हुए भी, वे जनसामान्य को यथार्थ ज्ञान देने का प्रयत्न करते हैं। साधु किसी विशिष्ट समाज, समुदाय अथवा देश का मित्र नहीं, अपितु सबका मित्र होता है—न केवल मनुष्यों का, अपितु पशुओं तथा निम्न जीवन-रूपों का भी। संक्षेप में, साधु किसी का शत्रु नहीं और सबका मित्र होता है। फलस्वरूप वह सदा शान्त रहता है। ऐसे व्यक्ति जिन्होंने भगवान् हेतु सर्वस्व का त्याग कर दिया है, भगवान् को अत्यन्त-अत्यन्त प्रिय हैं। यद्यपि साधुओं को इसकी चिन्ता नहीं होती कि उनका अपमान किया जाए, फिर भी श्रीकृष्ण उनके प्रति किसी भी अपमान को सहन नहीं करते। जैसा *भगवद्गीता* के नवम अध्याय में कहा गया है, श्रीकृष्ण सबके प्रति समान हैं, किन्तु वे अपने भक्तों के प्रति विशेष रूप से अनुरक्त हैं :\n\nsamo 'haṁ sarva-bhūteṣu\n\nna me dveṣyo 'sti na priyaḥ\n\nye bhajanti tu māṁ bhaktyā\n\nmayi te teṣu cāpy aham\n\n\"मैं न किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के प्रति पक्षपाती हूँ। मैं सबके प्रति समान हूँ। किन्तु जो कोई भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें है, और मैं भी उसका मित्र हूँ।\" (गीता 9.29)\n\nयद्यपि श्रीकृष्ण सबके प्रति तटस्थ हैं, फिर भी जो निरन्तर कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, जो *भगवद्गीता* के सन्देश का प्रचार कर रहा है, उसे वे विशेष संरक्षण प्रदान करते हैं। यह श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा है कि उनका भक्त कभी विनष्ट नहीं होगा : कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति (गीता 9.31)।\n\nश्रीकृष्ण न केवल अपने भक्तों की रक्षा तथा उद्धार करने आते हैं, अपितु दुष्टों के संहार हेतु भी आते हैं (विनाशाय च दुष्कृताम्)। श्रीकृष्ण अर्जुन तथा पाँचों पाण्डवों को, जो सर्वाधिक पवित्र क्षत्रिय एवं भक्त थे, जगत् का शासक स्थापित करना चाहते थे, और वे दुर्योधन के नास्तिक पक्ष का विनाश भी करना चाहते थे। और जैसा पहले उल्लेख किया गया, उनके आने का एक तीसरा कारण यथार्थ धर्म की स्थापना है (धर्म-संस्थापनार्थाय)। इस प्रकार श्रीकृष्ण के आने का प्रयोजन तीन प्रकार का है : वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, असुरों का संहार करते हैं, और जीव के यथार्थ धर्म की स्थापना करते हैं। वे केवल एक बार नहीं, अपितु अनेकानेक बार आते हैं (सम्भवामि युगे युगे) क्योंकि यह भौतिक जगत् ऐसा है कि समय के साथ, समायोजन हो जाने के पश्चात्, यह पुनः क्षीण हो जाएगा।\n\nसंसार की रचना ऐसी है कि भले ही हम एक अत्युत्तम व्यवस्था कर लें, फिर भी वह क्रमशः क्षीण हो जाएगी। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् एक युद्ध-विराम पर हस्ताक्षर हुए, और शान्ति का एक संक्षिप्त काल रहा, किन्तु शीघ्र ही द्वितीय विश्वयुद्ध आ गया, और अब जब वह समाप्त हो गया है, तब वे तृतीय विश्वयुद्ध की तैयारियाँ कर रहे हैं। यह भौतिक जगत् में समय (काल) का कार्य है। हम एक अत्यन्त सुन्दर भवन का निर्माण करते हैं, और पचास वर्ष पश्चात् वह क्षीण हो जाता है, और सौ वर्ष पश्चात् वह और भी अधिक क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार, जब शरीर युवा होता है, तब लोग उसका ध्यान रखते हैं, सदा उस पर स्नेह उँडेलते तथा उसे चूमते हैं, किन्तु जब वह वृद्ध हो जाता है, तब कोई उसकी चिन्ता नहीं करता। यही भौतिक जगत् का स्वभाव है—भले ही एक अत्यन्त उत्तम व्यवस्था कर ली जाए, फिर भी समय के साथ वह विनष्ट हो जाएगी। अतः समय-समय पर समायोजनों की आवश्यकता होती है, और युग-युग में परमेश्वर अथवा उनके प्रतिनिधि सभ्यता की दिशा में समायोजन करने आते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण अनेक भिन्न-भिन्न धर्मों की स्थापना अथवा पुनरुज्जीवन हेतु अनेक बार अवतरित होते हैं।"}
{"ref": "rv/7", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/7/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "गुरु में श्रद्धा एवं श्रीकृष्ण के प्रति शरणागति के रूप में ज्ञान", "purport": "*भगवद्गीता* के चतुर्थ अध्याय में श्रीकृष्ण यह निष्कर्ष देते हैं कि समस्त यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति है।\n\nśreyān dravya-mayād yajñāj\n\njñāna-yajñaḥ parantapa\n\nsarvaṁ karmākhilaṁ pārtha\n\njñāne parisamāpyate\n\n\"हे परन्तप! ज्ञान का यज्ञ भौतिक सम्पत्तियों के यज्ञ से श्रेष्ठ है। हे पृथापुत्र! आखिरकार, कर्म का यज्ञ दिव्य ज्ञान में परिणत होता है।\" (गीता 4.33)\n\nज्ञान सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है क्योंकि यह बद्ध जीवन अज्ञान के कारण है। यज्ञ, तपस्या, योग तथा दार्शनिक विवेचना का प्रयोजन ज्ञान की प्राप्ति है। दिव्य ज्ञान की तीन अवस्थाएँ हैं, जिनके द्वारा मनुष्य ईश्वर के निर्विशेष पक्ष का साक्षात्कार करता है (ब्रह्म-साक्षात्कार), हृदय के भीतर तथा प्रत्येक अणु के भीतर स्थित ईश्वर के स्थानिक पक्ष का (परमात्मा-साक्षात्कार), और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का साक्षात्कार (भगवान्-साक्षात्कार)। किन्तु ज्ञान की प्राप्ति में सर्वप्रथम पग यह समझ में आना है कि \"मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं आत्मा हूँ, और मेरे जीवन का लक्ष्य इस भौतिक बन्धन से बाहर निकलना है।\" बात यह है कि हम जो भी यज्ञ करते हैं, वह हमें यथार्थ ज्ञान के बिन्दु तक पहुँचाने के लिए होता है। ज्ञान की सर्वोच्च पूर्णता *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण के प्रति शरणागति के रूप में दी गई है (बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते) (गीता 7.19)। ज्ञानवान्, न कि मूर्ख, श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होता है, और यही ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है। इसी प्रकार, *भगवद्गीता* के अन्त में श्रीकृष्ण अर्जुन को परामर्श देते हैं :\n\nsarva-dharmān parityajya\n\nmām ekaṁ śaraṇaṁ vraja\n\nahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo\n\nmokṣayiṣyāmi mā śucaḥ\n\n\"समस्त प्रकार के धर्मों का त्याग करके केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापों के फल से उद्धार कर दूँगा। भय मत करो।\" (गीता 18.66)\n\nयह ज्ञान का सर्वाधिक गोपनीय अंश है। सभी दृष्टिकोणों से, यदि हम वैदिक साहित्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन करें, तो हम पाएँगे कि ज्ञान का परम शिखर श्रीकृष्ण के प्रति शरणागति है। और किस प्रकार की शरणागति की अनुशंसा की गई है? पूर्ण ज्ञान सहित शरणागति—जब मनुष्य पूर्ण अवस्था पर पहुँचता है, तब उसे यह समझना चाहिए कि वासुदेव, श्रीकृष्ण ही सब कुछ हैं। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता में भी होती है :\n\nīśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ\n\nsac-cid-ānanda-vigrahaḥ\n\nanādir ādir govindaḥ\n\nsarva-kāraṇa-kāraṇam\n\n\"श्रीकृष्ण, जो गोविन्द के नाम से विख्यात हैं, परम भगवान् हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबके उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं है, और वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं।\" (ब्रह्म-संहिता 5.1)\n\nसर्व-कारण शब्द संकेत करते हैं कि श्रीकृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं। यदि हम यह खोजें कि हमारे पिता के पिता कौन हैं, और उनके पिता कौन हैं, और इसी प्रकार पीछे, यदि किसी प्रकार समय में पीछे जाकर अपने वंश का अनुसरण करना सम्भव हो, तो हम परम पिता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँच जाएँगे।\n\nनिस्सन्देह प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर को तत्काल देखना चाहता है, किन्तु हम ईश्वर को तभी देख सकते हैं जब हम योग्य हों तथा पूर्ण ज्ञान में स्थित हों। हम ईश्वर को आमने-सामने देख सकते हैं, ठीक जैसे हम एक-दूसरे को देख रहे हैं, किन्तु योग्यता अपेक्षित है, और वह योग्यता कृष्णभावनामृत है। कृष्णभावनामृत का आरम्भ श्रवणम् से होता है—*भगवद्गीता* तथा अन्य वैदिक साहित्य के माध्यम से श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करना, और कीर्तनम्—जो हमने सुना है उसे दोहराना तथा उनके नामों का जप करके श्रीकृष्ण की महिमा करना। श्रीकृष्ण के विषय में जप तथा श्रवण करने से हम वास्तव में उनका संग कर सकते हैं, क्योंकि वे परम हैं और अपने नामों, गुणों, रूपों तथा लीलाओं से अभिन्न हैं। ज्यों-ज्यों हम श्रीकृष्ण का संग करते हैं, त्यों-त्यों वे हमें अपने को समझने में सहायता करते हैं और ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अन्धकार को दूर करते हैं। श्रीकृष्ण गुरु के रूप में कार्य करते हुए हमारे हृदयों में विराजमान हैं। जब हम उनके विषय में विषयों का श्रवण आरम्भ करते हैं, तब इतने वर्षों के भौतिक संदूषण के कारण हमारे मनों पर जो धूल संचित हो गई है, वह क्रमशः स्वच्छ होने लगती है। श्रीकृष्ण सबके मित्र हैं, किन्तु वे अपने भक्तों के विशेष मित्र हैं। जैसे ही हम तनिक उनकी ओर अनुरक्त होते हैं, वैसे ही वे हमारे हृदयों के भीतर से अनुकूल उपदेश देने लगते हैं, ताकि हम क्रमशः प्रगति कर सकें। श्रीकृष्ण प्रथम आध्यात्मिक गुरु हैं, और जब हम उनमें अधिक रुचि लेने लगते हैं, तब हमें किसी साधु अथवा पुण्यात्मा के पास जाना पड़ता है, जो बाहर से आध्यात्मिक गुरु के रूप में सेवा करता है। यह स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा निम्नलिखित श्लोक में आदिष्ट है :\n\ntad viddhi praṇipātena\n\nparipraśnena sevayā\n\nupadekṣyanti te jñānaṁ\n\njñāninas tattva-darśinaḥ\n\n\"आध्यात्मिक गुरु के समीप जाकर सत्य को जानने का प्रयत्न करो। उससे विनम्रतापूर्वक जिज्ञासा करो और उसकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकती है, क्योंकि उसने सत्य का दर्शन किया है।\" (गीता 4.34)\n\nऐसे व्यक्ति का चयन करना आवश्यक है जिसके प्रति हम स्वयं को शरणागत कर सकें। निस्सन्देह कोई भी किसी के प्रति शरणागत होना पसन्द नहीं करता। हमारे पास जो भी ज्ञान है, उससे हम दर्पयुक्त रहते हैं, और हमारी मनोवृत्ति यह रहती है, \"ओह, मुझे ज्ञान कौन दे सकता है?\" कुछ लोग कहते हैं कि आध्यात्मिक साक्षात्कार हेतु आध्यात्मिक गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है, किन्तु जहाँ तक वैदिक साहित्य का सम्बन्ध है, तथा जहाँ तक *भगवद्गीता*, *श्रीमद्भागवत* एवं *उपनिषदों* का सम्बन्ध है, वहाँ आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता है। भौतिक जगत् में भी, यदि कोई संगीतज्ञ बनना सीखना चाहता है, तो उसे सिखाने हेतु किसी संगीतज्ञ की खोज करनी पड़ती है, अथवा यदि कोई अभियन्ता बनना चाहता है, तो उसे किसी प्रौद्योगिकी महाविद्यालय में जाकर उनसे सीखना पड़ता है जो प्रौद्योगिकी जानते हैं। न ही कोई बाज़ार से कोई पुस्तक खरीदकर तथा घर पर उसे पढ़कर चिकित्सक बन सकता है। मनुष्य को किसी चिकित्सा महाविद्यालय में प्रवेश लेकर अधिकृत चिकित्सकों के अधीन प्रशिक्षण लेना पड़ता है। केवल पुस्तकें खरीदकर तथा घर पर उन्हें पढ़कर किसी भी प्रमुख विषय को सीखना सम्भव नहीं है। हमें यह दिखाने हेतु किसी की आवश्यकता होती है कि पुस्तकों में जो ज्ञान पाया जाता है उसका प्रयोग कैसे किया जाए। जहाँ तक ईश्वर के विज्ञान का सम्बन्ध है, स्वयं *श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्*, हमें ऐसे व्यक्ति के पास जाने का परामर्श देते हैं जिसके प्रति हम शरणागत हो सकें। इसका अर्थ यह है कि हमें यह जाँचना होगा कि क्या कोई व्यक्ति *भगवद्गीता* तथा ईश्वर-साक्षात्कार के अन्य ग्रन्थों में उपदेश देने में समर्थ है। ऐसा नहीं है कि हमें आध्यात्मिक गुरु की खोज मनमाने ढंग से करनी है। हमें ऐसे व्यक्ति को खोजने में अत्यन्त गम्भीर होना चाहिए जो वास्तव में उस विषय के ज्ञान में स्थित हो।\n\n*भगवद्गीता* के आरम्भ में अर्जुन श्रीकृष्ण से ठीक एक मित्र के समान बात कर रहे थे, और श्रीकृष्ण प्रश्न कर रहे थे कि वे, एक योद्धा होकर, युद्ध करना कैसे छोड़ सकते हैं। किन्तु जब अर्जुन ने देखा कि मित्रवत् बातचीत से उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब वे श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत हो गए, यह कहते हुए, शिष्यस्ते ऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् : \"अब मैं आपका शिष्य तथा आपके प्रति शरणागत आत्मा हूँ। कृपया मुझे उपदेश दें।\" (गीता 2.7) यही प्रक्रिया है। ऐसा नहीं है कि हमें अन्धेपन से शरणागत होना चाहिए, अपितु हमें बुद्धिमत्ता के साथ जिज्ञासा करने में समर्थ होना चाहिए।\n\nजिज्ञासा के बिना हम उन्नति नहीं कर सकते। विद्यालय में जो विद्यार्थी शिक्षक से जिज्ञासा करता है, वह प्रायः बुद्धिमान विद्यार्थी होता है। जब कोई छोटा बालक अपने पिता से पूछता है, \"ओह, यह क्या है? वह क्या है?\" तो यह सामान्यतः बुद्धिमत्ता का चिह्न होता है। हमारे पास भले ही एक अत्युत्तम आध्यात्मिक गुरु हो, किन्तु यदि हममें जिज्ञासा करने की शक्ति न हो, तो हम प्रगति नहीं कर सकते। न ही जिज्ञासा चुनौती के स्वरूप की होनी चाहिए। मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए, \"अब मैं देखूँगा कि यह किस प्रकार का आध्यात्मिक गुरु है। मैं इसे चुनौती दूँगा।\" हमारी जिज्ञासाएँ (परिप्रश्नेन) सेवा (सेवया) के विषय में होनी चाहिए। सेवा के बिना हमारी जिज्ञासाएँ व्यर्थ होंगी, किन्तु जिज्ञासा करने से पहले भी हममें कुछ योग्यता होनी चाहिए। यदि हम कुछ स्वर्ण अथवा आभूषण खरीदने किसी दुकान पर जाएँ और हम रत्नों अथवा स्वर्ण के विषय में कुछ नहीं जानते, तो सम्भावना है कि हम ठगे जाएँगे। यदि हम किसी जौहरी के पास जाकर कहें, \"क्या आप मुझे एक हीरा दे सकते हैं?\" तो वह समझ जाएगा कि यह मूर्ख है। वह हमसे किसी भी वस्तु के लिए कोई भी मूल्य वसूल सकता है। उस प्रकार की खोज से कुछ भी नहीं होगा। हमें पहले तनिक बुद्धिमान बनना होगा, क्योंकि अन्यथा आध्यात्मिक प्रगति करना सम्भव नहीं है।\n\n*वेदान्त-सूत्र* का प्रारम्भिक निर्देश है : अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। \"अब ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा करने का समय है।\" अथ शब्द का अर्थ है कि जो बुद्धिमान है, जो भौतिक जीवन की मूल हताशाओं का साक्षात्कार करने के बिन्दु पर पहुँच चुका है, वह जिज्ञासा करने में समर्थ है। *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है कि मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु से उन विषयों के बारे में जिज्ञासा करनी चाहिए जो \"इस अन्धकार से परे\" हैं। यह भौतिक जगत् स्वभाव से अन्धकारमय है, और यह कृत्रिम रूप से अग्नि से प्रकाशित है। हमारी जिज्ञासाएँ उन दिव्य लोकों के विषय में होनी चाहिए जो इस ब्रह्माण्ड से परे स्थित हैं। यदि कोई इन आध्यात्मिक लोकों के विषय में जानने का इच्छुक है, तो उसे आध्यात्मिक गुरु की खोज करनी चाहिए; अन्यथा खोजने में कोई सार नहीं है। यदि मैं भौतिक उन्नति करने हेतु *भगवद्गीता* अथवा *वेदान्त-सूत्र* का अध्ययन करना चाहता हूँ, तो आध्यात्मिक गुरु को खोजना आवश्यक नहीं है। मनुष्य को पहले ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा करने की इच्छा होनी चाहिए, और फिर ऐसे गुरु की खोज करनी चाहिए जिसके पास परम सत्य का पूर्ण दर्शन हो (ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः)। श्रीकृष्ण परम तत्त्व, परम सत्य हैं। *भगवद्गीता* के सप्तम अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं :\n\nmanuṣyāṇāṁ sahasreṣu\n\nkaścid yatati siddhaye\n\nyatatām api siddhānāṁ\n\nkaścin māṁ vetti tattvataḥ\n\n\"सहस्रों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि हेतु प्रयत्न करता है, और जिन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली है, उनमें से कदाचित् ही कोई एक मुझे तत्त्वतः जानता है।\" (गीता 7.3)\n\nइस प्रकार अनेक सिद्ध आध्यात्मिकजनों में से कोई एक मनुष्य जान सकता है कि श्रीकृष्ण वस्तुतः क्या हैं। जैसा यह श्लोक संकेत करता है, श्रीकृष्ण का विषय इतना सरल नहीं, अपितु अत्यन्त कठिन है। फिर भी *भगवद्गीता* यह भी संकेत करती है कि यह सरल है।\n\nbhaktyā mām abhijānāti\n\nyāvān yaś cāsmi tattvataḥ\n\ntato māṁ tattvato jñātvā\n\nviśate tad-anantaram\n\n\"मनुष्य पूर्ण पुरुष को, जैसे वे हैं, केवल भक्ति के द्वारा ही जान सकता है। और जब मनुष्य ऐसी भक्ति के द्वारा परमेश्वर की पूर्ण भावना में होता है, तब वह ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है।\" (गीता 18.55)\n\nयदि हम भक्ति की प्रक्रिया को स्वीकार कर लें, तो हम श्रीकृष्ण को अत्यन्त सरलता से समझ सकते हैं। इसके माध्यम से हम श्रीकृष्ण के विज्ञान को पूर्ण रूप से समझ सकते हैं तथा आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश के योग्य बन सकते हैं। यदि, जैसा *भगवद्गीता* कहती है, अनेक जन्मों के पश्चात् हमें अन्ततः श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होना ही है, तो क्यों न तत्काल उनके प्रति शरणागत हो जाएँ? अनेकानेक जन्मों की प्रतीक्षा क्यों करें? यदि शरणागति ही पूर्णता का अन्त है, तो क्यों न पूर्णता को तत्काल स्वीकार कर लें? निस्सन्देह उत्तर यह है कि लोग सामान्यतः सन्देहग्रस्त रहते हैं। कृष्णभावनामृत एक क्षण में प्राप्त की जा सकती है, अथवा सहस्र जन्म-मृत्यु के पश्चात् भी प्राप्त नहीं की जा सकती। यदि हम चुनें, तो हम श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होकर तत्काल महात्मा बन सकते हैं, किन्तु चूँकि हमें सन्देह रहता है कि श्रीकृष्ण वस्तुतः परम हैं अथवा नहीं, अतः इन सन्देहों को शास्त्रों के अध्ययन के द्वारा दूर करने में हमें समय लगता है। किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में *भगवद्गीता* का अध्ययन करके, हम इन सन्देहों को दूर कर सकते हैं तथा निश्चित प्रगति कर सकते हैं।\n\nयह ज्ञान की अग्नि ही है जो समस्त सन्देहों तथा सकाम कर्मों को भस्म कर देती है। जिसने वास्तव में सत्य का दर्शन किया है, उससे सत्य के विषय में जिज्ञासा करने के परिणामों की निम्नलिखित जानकारी श्रीकृष्ण देते हैं।\n\nyaj jñātvā na punar moham\n\nevaṁ yāsyasi pāṇḍava\n\nyena bhūtāny aśeṣāṇi\n\ndrakṣyasy ātmany atho mayi\n\napi ced asi pāpebhyaḥ\n\nsarvebhyaḥ pāpa-kṛttamaḥ\n\nsarvaṁ jñāna-plavenaiva\n\nvṛjinaṁ santariṣyasi\n\nyathaidhāṁsi samiddho 'gnir\n\nbhasmasāt kurute 'rjuna\n\njñānāgniḥ sarva-karmāṇi\n\nbhasmasāt kurute tathā\n\n\"और जब तुम इस प्रकार सत्य को जान लोगे, तब तुम जान जाओगे कि समस्त प्राणी मेरे ही अंश हैं—और वे मुझमें हैं, तथा मेरे हैं। यद्यपि तुम समस्त पापियों में सर्वाधिक पापी समझे जाते हो, तथापि जब तुम दिव्य ज्ञान की नौका में स्थित हो जाओगे, तब तुम दुःख-सागर को पार कर सकोगे। हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि भौतिक कर्मों के समस्त फलों को भस्म कर देती है।\" (गीता 4.35–37)\n\nज्ञान की अग्नि आध्यात्मिक गुरु द्वारा प्रज्वलित की जाती है, और जब वह धधक उठती है, तब हमारे कर्मों के समस्त फल भस्म हो जाते हैं। हमारे कर्मों के फल, अथवा हमारा कर्म, हमारे बन्धन के कारण हैं। शुभ कर्म तथा अशुभ कर्म होते हैं, और इस श्लोक में सर्व-कर्माणि शब्द दोनों का संकेत करता है। जो इस भौतिक बन्धन से मुक्त होना चाहता है, उसके लिए शुभ कर्मों तथा अशुभ कर्मों दोनों के फल हानिकारक हैं। इस भौतिक जगत् में, यदि हम सत्त्वगुण में स्थित हों, तो हम शुभ कर्म करने के प्रति आसक्त रहते हैं। किन्तु यदि हम रजोगुण तथा तमोगुण में हों, तो हम रजोगुण तथा तमोगुण में अशुभ कर्म करते हैं। किन्तु जो कृष्णभावनाभावित होने जा रहे हैं, उनके लिए शुभ कर्म अथवा अशुभ कर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। शुभ कर्म से हमें किसी कुलीन अथवा सम्पन्न परिवार में उत्तम जन्म प्राप्त हो सकता है, और अशुभ कर्म से हम पशु-जगत् में अथवा पतित मानव-परिवारों में भी जन्म ले सकते हैं, किन्तु किसी भी स्थिति में जन्म का अर्थ बन्धन है, और जो कृष्णभावनामृत हेतु प्रयत्न कर रहा है, वह आवागमन के बन्धन से मुक्ति हेतु प्रयत्न कर रहा है। किसी सम्पन्न अथवा कुलीन परिवार में जन्म लेने का क्या लाभ, यदि मनुष्य अपने भौतिक दुःखों से छुटकारा न पाए? चाहे हम शुभ कर्म के फलों का भोग करें अथवा अशुभ के फलों को भोगें, हमें भौतिक शरीर धारण करना पड़ता है और इस प्रकार भौतिक दुःखों से गुज़रना पड़ता है।\n\nश्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में संलग्न होकर, हम वास्तव में जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकल आते हैं। किन्तु चूँकि ज्ञान की अग्नि हमारे मनों में नहीं धधक रही, अतः हम भौतिक अस्तित्व को सुख के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। कुत्ता अथवा शूकर यह नहीं समझ सकता कि वह कैसा दुःखमय जीवन व्यतीत कर रहा है। वह वास्तव में सोचता है कि वह जीवन का भोग कर रहा है, और इसी को माया-शक्ति का आवरण अथवा भ्रामक प्रभाव कहते हैं। बोवरी में, इतने सारे मद्यप सड़क पर पड़े रहते हैं, और वे सब सोचते हैं, \"हम जीवन का भोग कर रहे हैं।\" किन्तु जो उनके पास से गुज़र रहे होते हैं, वे सोचते हैं, \"ओह, ये कितने दुःखी हैं।\" माया-शक्ति का यही ढंग है। हम भले ही दुःखमय दशा में हों, किन्तु हम उसे यह सोचकर स्वीकार कर लेते हैं कि हम अत्यन्त सुखी हैं। इसी को अज्ञान कहते हैं। किन्तु जब मनुष्य ज्ञान में जागृत होता है, तब वह सोचता है, \"ओह, मैं सुखी नहीं हूँ। मुझे स्वतन्त्रता चाहिए, किन्तु कोई स्वतन्त्रता नहीं है। मैं मरना नहीं चाहता, किन्तु मृत्यु है। मैं वृद्ध नहीं होना चाहता, किन्तु वृद्धावस्था है। मुझे रोग नहीं चाहिए, किन्तु रोग हैं।\" ये मानव-अस्तित्व की प्रमुख समस्याएँ हैं, किन्तु हम इनकी उपेक्षा करते हैं और अत्यन्त गौण समस्याओं को सुलझाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। हम आर्थिक विकास को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु मानते हैं, यह भूलकर कि हम इस भौतिक जगत् में कितने काल तक जीवित रहेंगे। आर्थिक विकास हो अथवा न हो, साठ अथवा सौ वर्ष के अन्त में हमारा जीवन समाप्त हो जाएगा। भले ही हम दस लाख डॉलर संचित कर लें, इस शरीर को छोड़ते समय हमें यह सब पीछे छोड़ देना पड़ेगा। हमें यह समझ में आना चाहिए कि भौतिक जगत् में हम जो भी कर रहे हैं, वह भौतिक प्रकृति के प्रभाव से परास्त हो रहा है।\n\nहम स्वतन्त्रता चाहते हैं, और हम समूचे संसार तथा समूचे ब्रह्माण्ड में भ्रमण करना चाहते हैं। वस्तुतः, आत्मा के रूप में यह हमारा अधिकार है। *भगवद्गीता* में आत्मा को सर्व-गतः कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उसमें जहाँ चाहे जाने की क्षमता है। सिद्धलोकों में सिद्ध प्राणी अथवा योगी हैं जो वायुयानों अथवा अन्य यान्त्रिक साधनों की सहायता के बिना जहाँ चाहें वहाँ भ्रमण कर सकते हैं। एक बार जब हम भौतिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, तब हम अत्यन्त शक्तिशाली बन सकते हैं। वास्तव में हमें कोई धारणा नहीं है कि आध्यात्मिक स्फुलिंगों के रूप में हम कितने शक्तिशाली हैं। इसके स्थान पर हम इस पृथ्वी पर रहकर तथा कुछ अन्तरिक्ष यान ऊपर भेजकर अत्यन्त सन्तुष्ट रहते हैं, यह सोचकर कि हमने भौतिक विज्ञान में अत्यधिक उन्नति कर ली है। हम यह जाने बिना कि हममें जहाँ चाहें वहाँ नि:शुल्क भ्रमण करने की क्षमता है, करोड़ों-करोड़ों डॉलर अन्तरिक्ष यानों के निर्माण में व्यय करते हैं।\n\nबात यह है कि हमें ज्ञान के द्वारा अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का परिपोषण करना चाहिए। ज्ञान तो पहले से ही विद्यमान है; हमें केवल उसे स्वीकार करना है। प्राचीन युगों में लोग ज्ञान प्राप्त करने हेतु इतनी सारी तपस्याएँ तथा तप करते थे, किन्तु इस युग में यह प्रक्रिया सम्भव नहीं है क्योंकि हमारा जीवन अत्यन्त संक्षिप्त है और हम सदा विचलित रहते हैं। इस युग की प्रक्रिया कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है, हरे कृष्ण का जप, जिसका शुभारम्भ श्रीचैतन्य महाप्रभु ने किया। यदि, इस प्रक्रिया के द्वारा, हम ज्ञान की अग्नि को प्रज्वलित कर सकें, तो हमारी क्रियाओं के समस्त फल भस्म हो जाएँगे, और हम शुद्ध हो जाएँगे।\n\nna hi jñānena sadṛśaṁ\n\npavitram iha vidyate\n\ntat svayaṁ yoga-saṁsiddhaḥ\n\nkālenātmani vin dati\n\n\"इस संसार में दिव्य ज्ञान के समान उदात्त तथा पवित्र कुछ भी नहीं है। ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक्व फल है। और जिसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह यथासमय अपने भीतर ही आत्मा का आनन्द भोगता है।\" (गीता 4.38)\n\nवह उदात्त तथा पवित्र ज्ञान क्या है? यह वह ज्ञान है कि हम ईश्वर के अंश हैं और हमें अपनी चेतना को परम चेतना के साथ युक्त करना है। यह भौतिक जगत् में सर्वाधिक शुद्ध ज्ञान है। यहाँ सब कुछ प्रकृति के गुणों—सत्त्व, रजस् तथा तमस्—से दूषित है। सत्त्व भी एक प्रकार का संदूषण है। सत्त्व में मनुष्य अपनी स्थिति तथा दिव्य विषयों इत्यादि के प्रति सचेत हो जाता है, किन्तु उसका दोष इस सोच में है, \"अब मैंने सब कुछ समझ लिया है। अब मैं ठीक हूँ।\" वह यहीं रहना चाहता है। दूसरे शब्दों में, सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य प्रथम श्रेणी का बन्दी बन जाता है और, कारागार में सुखी होकर, वहीं रहना चाहता है। और रजोगुण तथा तमोगुण में स्थित लोगों की तो बात ही क्या करें? बात यह है कि हमें सत्त्व के गुण को भी पार करना होगा। दिव्य स्थिति का आरम्भ अहं ब्रह्मास्मि—\"मैं यह पदार्थ नहीं, अपितु आत्मा हूँ\"—के साक्षात्कार से होता है। किन्तु यह स्थिति भी अस्थिर है। इससे अधिक अपेक्षित है।\n\nbrahma-bhūtaḥ prasannātmā\n\nna śocati na kāṅkṣati\n\nsamaḥ sarveṣu bhūteṣu\n\nmad-bhaktiṁ labhate parām\n\n\"जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित होता है, वह तत्काल परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह कभी शोक नहीं करता, न ही किसी वस्तु की कामना करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समान भाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है।\" (गीता 18.54)\n\nब्रह्मभूत अवस्था में मनुष्य अब पदार्थ से अपनी पहचान नहीं करता। मनुष्य के ब्रह्मभूत स्तर पर प्रतिष्ठित हो जाने का प्रथम लक्षण यह है कि वह प्रसन्नचित्त हो जाता है (प्रसन्नात्मा)। उस स्तर पर न तो शोक होता है और न ही कामना। किन्तु यदि हम इस अवस्था तक भी उठ जाएँ और श्रीकृष्ण की प्रेमाभक्ति को न अपनाएँ, तो पुनः भौतिक भँवर में गिर जाने की सम्भावना रहती है। हम भले ही आकाश में अत्यन्त ऊँचे उठ जाएँ, किन्तु यदि वहाँ हमारा कोई आश्रय न हो, यदि हम किसी लोक पर न उतरें, तो हम पुनः नीचे गिर जाएँगे। ब्रह्मभूत अवस्था की मात्र एक समझ हमारी तब तक सहायता नहीं करेगी जब तक हम श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण न लें। जैसे ही हम स्वयं को श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करते हैं, वैसे ही पुनः भौतिक जगत् में गिर जाने की कोई सम्भावना नहीं रहती।\n\nहमारा स्वभाव ऐसा है कि हमें कोई-न-कोई संलग्नता चाहिए। बालक भले ही उपद्रव करे, किन्तु जब तक उसे कोई संलग्नता न दी जाए, तब तक वह उपद्रव से विरत नहीं हो सकता। जब उसे कुछ खिलौने दे दिए जाते हैं, तब उसका ध्यान बँट जाता है और उसकी उपद्रवी क्रियाएँ रुक जाती हैं। हम उपद्रवी बालकों के समान हैं, और इसलिए हमें आध्यात्मिक संलग्नता होनी चाहिए। केवल यह समझ लेना कि हम आत्मा हैं, सहायक नहीं होगा। यह समझकर कि हम आत्मा हैं, हमें आध्यात्मिक संलग्नता के द्वारा आत्मा का परिपोषण करना होगा। भारत में किसी मनुष्य के लिए यह असामान्य नहीं है कि वह समस्त भौतिक संलग्नताओं को त्याग दे, अपना घर तथा परिवार छोड़कर संन्यास आश्रम ग्रहण कर ले, और कुछ समय ध्यान करने के पश्चात्, कुछ अस्पताल खोलकर अथवा राजनीति में संलग्न होकर परोपकार का कार्य करने लगे। अस्पताल बनाने का कार्य तो सरकार द्वारा चलाया जा रहा है; संन्यासी का कर्तव्य ऐसे अस्पताल बनाना है जिनके द्वारा लोग वास्तव में अपने भौतिक शरीरों से छुटकारा पा सकें, न कि उनकी मरम्मत कर सकें। किन्तु यह न जानने के कारण कि यथार्थ आध्यात्मिक क्रिया क्या है, हम भौतिक क्रियाएँ अपना लेते हैं।\n\nकृष्णभावनामृत में पूर्ण बनने से, यथासमय ज्ञान तथा प्रज्ञा प्राप्त होते हैं। आरम्भ में कुछ निराशा हो सकती है, किन्तु कालेन शब्द, जिसका अर्थ है \"यथासमय\", संकेत करता है कि यदि हम केवल दृढ़तापूर्वक लगे रहें, तो हम सफल होंगे। श्रद्धा अपेक्षित है, जैसा अगले श्लोक में कहा गया है।\n\nśraddhāvāḹ labhate jñānaṁ\n\ntat-paraḥ saṁyatendriyaḥ\n\njñānaṁ labdhvā parāṁ śāntim\n\nacireṇādhigacchati\n\n\"जो श्रद्धावान् पुरुष दिव्य ज्ञान में लीन रहता है और जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह शीघ्र ही परम आध्यात्मिक शान्ति को प्राप्त करता है।\" (गीता 4.39)\n\nजो लोग संशयग्रस्त हैं और जिनमें श्रद्धा नहीं है, उनके लिए कृष्णभावनामृत अत्यन्त कठिन है। हमारे दैनिक व्यवहार में भी कुछ-न-कुछ श्रद्धा अपेक्षित होती है। जब हम कोई टिकट ख़रीदते हैं, तब हमें यह श्रद्धा होती है कि विमान-कम्पनी हमें हमारे गन्तव्य तक पहुँचाएगी। श्रद्धा के बिना तो हम भौतिक जगत् में भी नहीं रह सकते, फिर आध्यात्मिक प्रगति की तो बात ही क्या। हम अपनी श्रद्धा कहाँ रखें? अधिकारी में। हमें किसी अनधिकृत कम्पनी से अपना टिकट नहीं लेना चाहिए। श्रद्धा श्रीकृष्ण में होनी चाहिए, जो भगवद्गीता के वक्ता हैं। हम श्रद्धावान् कैसे बनें? इसके लिए इन्द्रियों का संयम (saṁyatendriyaḥ) आवश्यक है। हम भौतिक जगत् में इसलिए हैं क्योंकि हम अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहते हैं। यदि हमें यह श्रद्धा हो कि कोई चिकित्सक हमें रोगमुक्त कर सकता है, और वह हमें अमुक-अमुक वस्तु न खाने को कहे, फिर भी हम उसे खा लें, तो हमारी श्रद्धा कैसी? यदि हमें अपने चिकित्सक में श्रद्धा हो, तो हम रोगमुक्ति हेतु उसके निर्देशों का पालन करेंगे। तात्पर्य यह है कि हमें श्रद्धापूर्वक निर्देशों का पालन करना होता है। तब प्रज्ञा का उदय होता है। जब हम प्रज्ञा की अवस्था तक पहुँचते हैं, तब फल मिलता है—parāṁ śāntim, अर्थात् परम शान्ति। श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि जब मनुष्य इन्द्रियों को वश में करता है, तब श्रद्धा शीघ्र ही (acireṇa) आ जाती है। श्रीकृष्ण में श्रद्धा की उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मनुष्य अनुभव करता है कि वह संसार में सबसे सुखी व्यक्ति है। यही हमारी स्थिति है। हमें इस सूत्र को स्वीकार करके श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना है। यह श्रद्धा परम अधिकारी में होनी चाहिए, किसी तृतीय श्रेणी के व्यक्ति में नहीं। हमें ऐसे आध्यात्मिक गुरु को खोजना चाहिए जिनमें हमारी श्रद्धा हो सके। श्रीकृष्ण सर्वाधिक अधिकृत व्यक्तित्व हैं, किन्तु जो कोई कृष्णभावनाभावित है, उसे भी स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि पूर्ण रूप से कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति श्रीकृष्ण का प्रामाणिक प्रतिनिधि होता है। श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के वचनों का आस्वादन करने पर हमें वैसी ही तृप्ति मिलेगी जैसी भरपूर भोजन कर लेने पर मिलती है।\n\najñaś cāśraddadhānaś ca\n\nsaṁśayātmā vinaśyati\n\nnāyaṁ loko 'sti na paro\n\nna sukhaṁ saṁśayātmanaḥ\n\n\"किन्तु जो अज्ञानी एवं श्रद्धाहीन व्यक्ति प्रकट शास्त्रों में सन्देह करते हैं, वे ईश्वर-भावना को प्राप्त नहीं करते। संशयात्मा के लिए न तो इस लोक में सुख है और न परलोक में।\" (गीता 4.40)\n\nजो लोग इस ज्ञान-पथ को अपनाने में संशयग्रस्त रहते हैं, उनके लिए कोई अवसर नहीं है। संशय अज्ञान के कारण होता है (ajñaś ca)। जो कृष्णभावनामृत को अपनाने में संशयग्रस्त रहता है, उसके लिए यह भौतिक जगत् भी सुखमय नहीं होगा, फिर अगले जीवन की तो बात ही क्या। भौतिक जगत् तो पहले से ही दुःखमय है, किन्तु यदि मनुष्य में श्रद्धा न हो तो यह और भी अधिक दुःखमय हो जाता है। अतः श्रद्धाहीन के लिए स्थिति अत्यन्त संकटपूर्ण है। हम बैंक में हज़ारों डॉलर इसलिए जमा कर देते हैं क्योंकि हमें यह श्रद्धा होती है कि वह बैंक बन्द नहीं होगा। यदि हमें बैंकों और विमान-कम्पनियों में श्रद्धा है, तो श्रीकृष्ण में क्यों न श्रद्धा रखें, जिन्हें इतने सारे वैदिक शास्त्रों ने और इतने सारे ऋषियों ने परम अधिकारी के रूप में स्वीकार किया है? हमारी स्थिति यही है कि हम शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और चैतन्य महाप्रभु जैसे महान् अधिकारियों के पदचिह्नों पर चलें। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए और उनके पदचिह्नों पर चलते हुए अपनी श्रद्धा बनाए रखें, तो सफलता निश्चित है।\n\nजैसा कि पूर्व में कहा गया है, हमें ऐसे किसी का अन्वेषण करना चाहिए जिसने परम सत्य का साक्षात्कार किया हो, और उनकी शरण में जाकर उनकी सेवा करनी चाहिए। ऐसा कर लेने पर मनुष्य के आध्यात्मिक उद्धार में कोई सन्देह नहीं रहता। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर को देखने के लिए उत्सुक है, किन्तु जीवन की हमारी वर्तमान अवस्था में हम बद्ध और भ्रमित हैं। हमें वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप का कोई ज्ञान नहीं है। यद्यपि हम ब्रह्म हैं और स्वभाव से प्रसन्नचित्त हैं, फिर भी हम किसी प्रकार अपनी स्वाभाविक स्थिति से च्युत हो गए हैं। हमारी प्रकृति sac-cid-ānanda है—नित्य, आनन्दमय एवं ज्ञानपूर्ण; तथापि यह शरीर मरणधर्मा है, और जब तक यह विद्यमान रहता है तब तक अज्ञान एवं दुःखों से भरा रहता है। इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं, और उनके माध्यम से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं है। अतएव भगवद्गीता में कहा गया है कि यदि हम दिव्य ज्ञान को सीखना चाहते ही हैं, तो हमें ऐसे किसी के समीप जाना होगा जिसने वास्तव में परम सत्य का साक्षात्कार किया हो (tad-viddhi praṇipātena [गीता 4.34])। परम्परागत रूप से ब्राह्मण ही आध्यात्मिक गुरु होने के लिए नियत हैं, किन्तु इस कलियुग में योग्य ब्राह्मण मिलना अत्यन्त कठिन है। फलस्वरूप योग्य आध्यात्मिक गुरु को खोजना भी अत्यन्त कठिन है। इसी कारण चैतन्य महाप्रभु ने अनुशंसा की है—kibā vipra, kibā nyāsī, śūdra kene naya/yei kṛṣṇa-tattva-vettā, sei 'guru' haya: [चै.च. मध्य 8.128] \"चाहे कोई ब्राह्मण हो या शूद्र, संन्यासी हो या गृहस्थ, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि वह श्रीकृष्ण के विज्ञान को जानता है, तो वह प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु है।\"\n\nभगवद्गीता श्रीकृष्ण का विज्ञान है, और यदि हम अपने समस्त तर्क, बुद्धि एवं दार्शनिक ज्ञान के साथ इसका सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हम उस विज्ञान को जान सकेंगे। ऐसा नहीं है कि हमें आँख मूँदकर आत्मसमर्पण कर देना है। भले ही आध्यात्मिक गुरु आत्म-साक्षात्कार-प्राप्त एवं परम सत्य में स्थित हों, फिर भी समस्त आध्यात्मिक तत्त्वों को समझने के लिए हमें उनसे प्रश्न करने होते हैं। यदि कोई श्रीकृष्ण के विज्ञान सम्बन्धी प्रश्नों का तथ्यतः उत्तर दे सकता है, तो वह आध्यात्मिक गुरु है, चाहे उसका जन्म कहीं भी हुआ हो अथवा वह कोई भी हो—चाहे वह ब्राह्मण हो या शूद्र, अमेरिकी हो, भारतीय हो या कुछ भी। जब हम किसी चिकित्सक के पास जाते हैं, तब हम उससे यह नहीं पूछते कि वह हिन्दू है, ईसाई है या ब्राह्मण है। उसमें चिकित्सक की योग्यता है, और हम बस इतना कहते हुए आत्मसमर्पण कर देते हैं, \"हे चिकित्सक! मेरा उपचार कीजिए। मैं पीड़ित हूँ।\"\n\nश्रीकृष्ण आध्यात्मिक विज्ञान के परम लक्ष्य हैं। निस्सन्देह जब हम श्रीकृष्ण की बात करते हैं, तब हमारा तात्पर्य ईश्वर से होता है। सम्पूर्ण विश्व में और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ईश्वर के अनेक नाम हैं, किन्तु वैदिक ज्ञान के अनुसार श्रीकृष्ण ही परम नाम है। अतएव भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने इस युग में साक्षात्कार के परम साधन के रूप में हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के कीर्तन की अनुशंसा की। चैतन्य महाप्रभु ने जाति अथवा सामाजिक स्थिति के विषय में कोई भेद नहीं किया। वस्तुतः उनके अधिकांश प्रमुख शिष्य समाज में पतित माने जाते थे। चैतन्य महाप्रभु ने तो हरिदास ठाकुर को, जो एक मुसलमान थे, नामाचार्य अर्थात् पवित्र नामों के आचार्य के रूप में नियुक्त किया। इसी प्रकार भगवान् चैतन्य के दो प्रमुख शिष्य रूप एवं सनातन गोस्वामी पहले सकर मल्लिक एवं दबिर खास के नाम से जाने जाते थे, और वे मुसलमान शासन में नियुक्त थे। उन दिनों हिन्दू इतने कट्टर थे कि यदि कोई ब्राह्मण किसी ग़ैर-हिन्दू की सेवा स्वीकार कर लेता, तो उसे तत्काल हिन्दू समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता। इसके बावजूद रूप एवं सनातन गोस्वामी को चैतन्य महाप्रभु ने श्रीकृष्ण के विज्ञान में प्रमुख अधिकारी बनाया। अतः किसी के विरुद्ध कोई वर्जना नहीं है; कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक गुरु बन सकता है, बशर्ते वह श्रीकृष्ण के विज्ञान को जानता हो। यही एकमात्र योग्यता है, और यह विज्ञान सार रूप में भगवद्गीता में निहित है। इस समय इस महान् विज्ञान को सम्पूर्ण विश्व में फैलाने के लिए हज़ारों आध्यात्मिक गुरुओं की आवश्यकता है।\n\nहमें यह समझना चाहिए कि जब श्रीकृष्ण भगवद्गीता में अर्जुन से बात कर रहे हैं, तब वे केवल अर्जुन से ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव-जाति से बात कर रहे हैं। स्वयं श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि केवल श्रीकृष्ण के विज्ञान को जान लेने मात्र से अर्जुन मोह के अधीन नहीं होगा (yaj jñātvā na punar moham)। यदि हमारे पास कोई बहुत अच्छा जहाज़ हो, तो हम सरलता से अटलांटिक महासागर पार कर सकते हैं। इस समय हम अज्ञान के सागर के मध्य में हैं, क्योंकि इस भौतिक जगत् की उपमा अविद्या के विशाल सागर से दी गई है। अतएव भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने श्रीकृष्ण से इस प्रकार प्रार्थना की:\n\nayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ\n\npatitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau\n\nkṛpayā tava pāda-paṅkaja-\n\nsthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya\n\n\"हे नन्द-महाराज के पुत्र! मैं आपका नित्य सेवक हूँ, और ऐसा होते हुए भी मैं किसी प्रकार जन्म-मृत्यु के सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे इस मृत्यु के सागर से उठा लीजिए और अपने चरण-कमलों के एक धूलिकण के समान स्थिर कर दीजिए।\" (शिक्षाष्टक 5)\n\nयदि हमारे पास पूर्ण ज्ञान की नौका हो, तो कोई भय नहीं रहता, क्योंकि हम उस सागर को अत्यन्त सरलता से पार कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति अत्यन्त पापी भी हो, और यदि उसे श्रीकृष्ण के विज्ञान की नौका प्राप्त हो जाए, तो वह उस सागर को अत्यन्त सरलता से पार कर सकता है। जैसा कि पूर्व में कहा गया (गीता 4.36), इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हम अपने पूर्व जन्मों में क्या थे। अज्ञान में रहने के कारण हमने अनेक निन्द्य कर्म किए होंगे। वस्तुतः कोई भी यह नहीं कह सकता कि वह पापकर्म से मुक्त है। किन्तु भगवद्गीता के अनुसार इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। केवल श्रीकृष्ण के विज्ञान को जान लेने मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है।\n\nअतएव यह नितान्त आवश्यक है कि हम ज्ञान का अन्वेषण करें, और ज्ञान की पूर्णता श्रीकृष्ण को समझने में है। आज इतने सारे सिद्धान्त हैं, और प्रत्येक व्यक्ति जीवन जीने का सर्वोत्तम मार्ग जानने का दावा करता है; इसीलिए इतने सारे \"वाद\" विकसित हो गए हैं। इनमें से साम्यवाद विश्व में अत्यन्त प्रमुख हो गया है। किन्तु श्रीमद्भागवत में हमें आध्यात्मिक साम्यवाद का बीज मिलता है। वहाँ नारद मुनि व्याख्या करते हैं कि इस भौतिक ब्रह्माण्ड में—चाहे कोई निम्न, मध्य अथवा उच्च लोक में हो अथवा बाह्य अन्तरिक्ष में ही क्यों न हो—समस्त प्राकृतिक संसाधन परमेश्वर द्वारा प्रकट किए जाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि इस जगत् में जो कुछ भी विद्यमान है, वह किसी मनुष्य द्वारा उत्पन्न नहीं किया गया, अपितु सब कुछ ईश्वर द्वारा सृजित किया गया। कोई भी विवेकशील व्यक्ति इसका खण्डन नहीं कर सकता। श्री ईशोपनिषद् आदेश देती है:\n\nīśāvāsyam idaṁ sarvaṁ\n\nyat kiñca jagatyāṁ jagat\n\ntena tyaktena bhuñjīthā\n\nmā gṛdhaḥ kasya svid dhanam\n\n\"इस ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ भी सजीव या निर्जीव है, वह सब भगवान् द्वारा नियन्त्रित एवं स्वामित्व में है। अतएव मनुष्य को केवल उन्हीं वस्तुओं को स्वीकार करना चाहिए जो उसके लिए आवश्यक हैं, जो उसके अंश के रूप में निर्धारित की गई हैं; और यह भली-भाँति जानते हुए कि शेष वस्तुएँ किसकी हैं, उसे अन्य वस्तुओं को स्वीकार नहीं करना चाहिए।\" (श्री ईशोपनिषद्, मन्त्र 1)\n\nफलस्वरूप समस्त जीवों को—सर्वोच्च देवता ब्रह्मा से लेकर निम्नतम चींटी तक—प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने का अधिकार है। नारद मुनि इंगित करते हैं कि हम इन संसाधनों का उतना ही उपयोग कर सकते हैं जितना हमें आवश्यक है, किन्तु यदि हम आवश्यकता से अधिक ले लेते हैं, तो हम चोर बन जाते हैं। दुर्भाग्यवश प्रत्येक व्यक्ति विजय एवं प्रभुत्व पाने का प्रयत्न कर रहा है। देश चन्द्रमा तक की होड़ लगाते हैं ताकि वहाँ अपने ध्वज गाड़ सकें और उस लोक पर अपना दावा कर सकें। जब यूरोपीय लोग अमेरिका आए, तब उन्होंने अपना ध्वज गाड़ दिया और अपने राष्ट्र के लिए उस पर दावा कर दिया। यह ध्वज गाड़ना और ध्वज लहराना—यह सब अज्ञान के कारण है। हम रुककर यह नहीं सोचते कि हम अपना ध्वज कहाँ गाड़ रहे हैं। वह हमारी सम्पत्ति नहीं है, अपितु ईश्वर की है। इसे जानना ही ज्ञान है, और इसे अपनी सम्पत्ति समझना अज्ञान है। हमें उपयोग करने का अधिकार है, किन्तु दावा करने या संचय करने का नहीं।\n\nयदि हम अनाज की एक बोरी सड़क पर फेंक दें, तो कबूतर आ सकते हैं और चार-पाँच छोटे-छोटे दाने खाकर चले जाते हैं। वे उतना अधिक नहीं लेते जितना वे खा सकें, और खा लेने के पश्चात् वे स्वच्छन्द रूप से अपने मार्ग पर चल देते हैं। किन्तु यदि हम आटे की अनेक बोरियाँ फुटपाथ पर रख दें और लोगों को आकर ले जाने के लिए आमन्त्रित करें, तो एक व्यक्ति दस या बीस बोरियाँ ले जाएगा और दूसरा पन्द्रह या तीस बोरियाँ ले जाएगा, और इसी प्रकार और भी। किन्तु जिनके पास इतना अधिक ढोकर ले जाने का साधन नहीं है, वे एक-दो बोरियों से अधिक नहीं ले जा सकेंगे। इस प्रकार वितरण असमान हो जाएगा। इसी को सभ्यता की प्रगति कहा जाता है; हममें तो वह ज्ञान भी नहीं है जो कबूतरों, कुत्तों एवं बिल्लियों में है। सब कुछ परमेश्वर का है, और हम जितनी आवश्यकता है उतना स्वीकार कर सकते हैं, किन्तु उससे अधिक नहीं। यही ज्ञान है। भगवान् की व्यवस्था से जगत् ऐसा बना है कि किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है। सब कुछ पर्याप्त है, बशर्ते हम जानते हों कि उसका वितरण कैसे किया जाए। तथापि आज की शोचनीय दशा यह है कि एक व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक ले रहा है, जबकि दूसरा भूखा मर रहा है। फलस्वरूप भूखी जनता विद्रोह कर रही है और पूछ रही है, \"हम भूखे क्यों मरें?\" किन्तु उनके उपाय अपूर्ण हैं। आध्यात्मिक साम्यवाद की पूर्णता इस ज्ञान में निहित है कि सब कुछ ईश्वर का है। श्रीकृष्ण के विज्ञान को जानकर हम मिथ्या स्वामित्व के अज्ञान को सरलता से पार कर सकते हैं।\n\nहम वस्तुतः अपने अज्ञान के कारण ही कष्ट भोग रहे हैं। न्यायालय में अज्ञान कोई बहाना नहीं है। यदि हम न्यायाधीश से कहें कि हमें नियम का बोध नहीं था, तो भी हमें दण्ड दिया जाएगा। यदि किसी ने अवैध रूप से इतना धन एकत्र कर लिया है और फिर भी वह अपने अपराध के विषय में अज्ञान का दावा करता है, तो भी उसे दण्डित किया जाएगा। सम्पूर्ण विश्व में इस ज्ञान का अभाव है, और इसीलिए श्रीकृष्ण के विज्ञान के हज़ारों शिक्षकों की आवश्यकता है। इस समय इस ज्ञान की महती आवश्यकता है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रीकृष्ण का जन्म भारत में हुआ था, इसलिए भगवद्गीता का ज्ञान साम्प्रदायिक है अथवा श्रीकृष्ण कोई साम्प्रदायिक ईश्वर हैं। वस्तुतः चौदहवें अध्याय में श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त प्राणियों का पिता घोषित करते हैं, जैसा कि पूर्व में इंगित किया गया था (गीता 14.4)।\n\nआत्मा होने के नाते हम परम आत्मा के अभिन्न अंश हैं, किन्तु इस भौतिक जगत् को भोगने की अपनी इच्छा के कारण हमें भौतिक प्रकृति में डाल दिया गया है। फिर भी हम चाहे किसी भी योनि में हों, श्रीकृष्ण ही पिता हैं। अतएव भगवद्गीता किसी विशेष दल अथवा राष्ट्र के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक के लिए है—पशुओं के लिए भी। अब जबकि परम के पुत्र अज्ञान के कारण चोरी कर रहे हैं, तो जो व्यक्ति भगवद्गीता से परिचित है, उसका कर्तव्य है कि वह इस परम ज्ञान को समस्त प्राणियों में फैलाए। इस प्रकार लोग अपनी सच्ची आध्यात्मिक प्रकृति को और परम आध्यात्मिक समष्टि के साथ अपने सम्बन्ध को समझ सकेंगे।"}
{"ref": "rv/8", "book": "rv", "lang": "hi", "url": "/hi/library/rv/8/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "श्रीकृष्ण के ज्ञान में कर्म", "purport": "na māṁ karmāṇi limpanti\n\nna me karma-phale spṛhā\n\niti māṁ yo 'bhijānāti\n\nkarmabhir na sa badhyate\n\n\"ऐसा कोई कर्म नहीं जो मुझे प्रभावित करे; न ही मैं कर्म के फलों की आकांक्षा करता हूँ। जो मेरे विषय में इस सत्य को समझ लेता है, वह भी कर्म के सकाम फलों में नहीं बँधता।\" (गीता 4.14)\n\nसम्पूर्ण जगत् कर्म से बँधा हुआ है। हम सभी उन सूक्ष्म कीटाणुओं अथवा जीवाणुओं के अस्तित्व को जानते हैं जो एक मिलीमीटर के माप के भीतर लाखों की संख्या में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि सूक्ष्म कीटाणु से लेकर, जिसे इन्द्रगोप कहा जाता है, स्वर्गलोक के राजा इन्द्र तक, सभी कर्म से, अर्थात् कर्म की प्रतिक्रिया से, बँधे हुए हैं। हम सबको अपने कर्मों की प्रतिक्रियाओं को, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, भोगना या आस्वादन करना पड़ता है। जब तक हमें इन प्रतिक्रियाओं को भोगना या आस्वादन करना पड़ता है, तब तक हम इन भौतिक शरीरों से बँधे रहते हैं।\n\nप्रकृति की व्यवस्था से जीव को उसके दुःख भोगने अथवा सुख भोगने के लिए भौतिक शरीर प्रदान किया जाता है। विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं। बाघ का शरीर मारने और कच्चा मांस खाने के लिए बना है। इसी प्रकार सूअर ऐसे बने हैं कि वे विष्ठा खा सकें। और मनुष्य होने के नाते हमारे दाँत शाक एवं फल खाने के लिए बने हैं। ये सभी शरीर जीव द्वारा पूर्व जन्मों में किए गए कर्म के अनुसार बने हैं। हमारे अगले शरीर उस कर्म के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं जो हम अभी कर रहे हैं, किन्तु पूर्वोद्धृत श्लोक में श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि जो उनके कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है। हमारे कर्म ऐसे होने चाहिए कि हम पुनः इस भौतिक जगत् में न उलझें। यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम श्रीकृष्ण का अध्ययन करके, उनके कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानकर, और यह समझकर कि वे इस भौतिक जगत् में तथा आध्यात्मिक जगत् में किस प्रकार आचरण करते हैं, कृष्णभावनाभावित बन जाएँ।\n\nजब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर आते हैं, तब वे हमारे समान नहीं होते; वे पूर्णतः दिव्य होते हैं। हम अपने कर्मों के फलों की कामना करते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण किन्हीं फलों की कामना नहीं करते, और न ही उनके कर्मों की कोई प्रतिक्रिया होती है। न ही उनमें सकाम कर्म की कोई इच्छा होती है (na me karma-phale spṛhā)। जब हम व्यापार में प्रवेश करते हैं, तब हम लाभ की आशा करते हैं, और उस लाभ से हम ऐसी वस्तुएँ ख़रीदने की आशा करते हैं जो हमारे जीवन को सुखमय बनाएँगी। बद्धजीव जब कभी कुछ करते हैं, तब उसके पीछे भोग की इच्छा रहती है। किन्तु श्रीकृष्ण को कुछ भी कामना नहीं करनी है। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और वे प्रत्येक वस्तु से परिपूर्ण हैं। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर आए तब उनकी अनेक सखियाँ एवं सोलह हज़ार से अधिक रानियाँ थीं, और कुछ लोग सोचते हैं कि वे अत्यन्त विषयासक्त थे। किन्तु यह तथ्य नहीं था।\n\nहमें श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्धों का अर्थ समझना चाहिए। इस भौतिक जगत् में हमारे अनेक सम्बन्ध होते हैं—पिता, माता, पत्नी अथवा पति के रूप में। यहाँ हमें जो भी सम्बन्ध मिलता है, वह परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध का विकृत प्रतिबिम्ब मात्र है। इस भौतिक जगत् में हमें जो कुछ भी मिलता है, वह परम सत्य से उत्पन्न है, किन्तु यहाँ वह काल में विकृत रूप से प्रतिबिम्बित होता है। श्रीकृष्ण के साथ हमारा जो भी सम्बन्ध होता है, वह चलता रहता है। यदि सख्य में हमारा कोई सम्बन्ध हो, तो वह मैत्री नित्य है और जन्म-जन्मान्तर तक चलती रहती है। भौतिक जगत् में मैत्री कुछ वर्षों तक रहती है और फिर टूट जाती है; इसीलिए इसे विकृत, कालिक अथवा असत् कहा जाता है। यदि हम श्रीकृष्ण से अपनी मैत्री करें, तो वह कभी नहीं टूटेगी। यदि हम श्रीकृष्ण को अपना स्वामी बनाएँ, तो हम कभी छले नहीं जाएँगे। यदि हम श्रीकृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्रेम करें, तो वे कभी नहीं मरेंगे। यदि हम श्रीकृष्ण को अपने प्रेमी के रूप में प्रेम करें, तो वे सबमें श्रेष्ठ होंगे, और कोई वियोग नहीं होगा। चूँकि श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं, अतः वे असीम हैं और उनके अनन्त भक्तगण हैं। कुछ लोग उन्हें प्रेमी अथवा पति के रूप में प्रेम करने का प्रयत्न कर रहे हैं, अतएव श्रीकृष्ण यह भूमिका स्वीकार करते हैं। हम जिस भी प्रकार से श्रीकृष्ण के समीप जाते हैं, वे हमें स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि वे भगवद्गीता में कहते हैं।\n\nye yathā māṁ prapadyante\n\ntāṁs tathaiva bhajāmy aham\n\nmama vartmānuvartante\n\nmanuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ\n\n\"वे सभी जिस भाव से मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार फल देता हूँ। हे पृथापुत्र! सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।\" (गीता 4.11)\n\nश्रीकृष्ण की गोपियों अथवा ग्वालबालिकाओं ने अपने पूर्व जन्मों में श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने हेतु महान् तपस्या की थी। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में श्रील शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि जो बालक श्रीकृष्ण के साथ खेल रहे थे, उन्होंने श्रीकृष्ण को सखा के रूप में प्राप्त करने हेतु अपने पूर्व जन्मों में महान् तप एवं तपस्या की थी। अतः श्रीकृष्ण के सखा, पार्षद एवं रानियाँ सामान्य जीव नहीं हैं। चूँकि हमें कृष्णभावनामृत का कोई बोध नहीं है, अतः हम उनके कर्मों को तुच्छ समझ लेते हैं, किन्तु वस्तुतः वे उदात्त हैं। हमारी कामनाओं की समस्त पूर्णता वहीं है; हमारी जो भी कामनाएँ स्वाभाविक रूप से हैं, वे कृष्णभावनामृत में स्थित होने पर पूर्ण रूप से पूरी होंगी।\n\nश्रीकृष्ण को अपने साथ खेलने के लिए किन्हीं सखाओं की आवश्यकता नहीं थी, न ही उन्हें एक भी पत्नी की कामना थी। हम पत्नी इसलिए ग्रहण करते हैं क्योंकि हमें कोई इच्छा पूरी करनी होती है, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं में पूर्ण हैं (pūrṇam)। एक निर्धन व्यक्ति बैंक में एक हज़ार डॉलर रखने की इच्छा कर सकता है, किन्तु जिस धनी व्यक्ति के पास लाखों हैं, उसमें ऐसी कोई इच्छा नहीं होती। यदि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तो उन्हें कामनाएँ क्यों होनी चाहिए? अपितु वे तो दूसरों की कामनाएँ पूरी करते हैं। मनुष्य प्रस्ताव करता है और ईश्वर निपटारा करते हैं। यदि श्रीकृष्ण को कोई कामना होती, तो वे अपूर्ण होते, क्योंकि उनमें किसी वस्तु का अभाव होता। अतएव वे कहते हैं कि उन्हें कोई कामना पूरी नहीं करनी है। योगेश्वर अर्थात् समस्त योगियों के स्वामी होने के नाते, वे जो भी संकल्प करते हैं, वह तत्काल साकार हो जाता है। कामना का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वे अपने भक्तों की कामनाएँ पूरी करने के लिए ही पति, प्रेमी अथवा सखा बनते हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को सखा, स्वामी, पुत्र अथवा प्रेमी के रूप में स्वीकार करें, तो हम कभी निराश नहीं होंगे। प्रत्येक जीव का श्रीकृष्ण के साथ एक विशिष्ट सम्बन्ध है, किन्तु इस समय यह सम्बन्ध आच्छादित है। ज्यों-ज्यों हम कृष्णभावनामृत में उन्नत होते हैं, यह प्रकट होता जाएगा।\n\nयद्यपि परमेश्वर पूर्ण हैं और उन्हें कुछ भी करने को नहीं है, फिर भी वे आदर्श स्थापित करने के लिए कर्म करते हैं। वे भौतिक जगत् में अपने कर्मों से बँधे नहीं हैं, और जो इसे जानता है, वह भी प्रतिक्रियापूर्ण कर्मों से मुक्त हो जाता है।\n\nevaṁ jñātvā kṛtaṁ karma\n\npūrvair api mumukṣubhiḥ\n\nkuru karmaiva tasmāt tvaṁ\n\npūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛtam\n\n\"प्राचीन काल में समस्त मुक्त आत्माओं ने इसी ज्ञान के साथ कर्म किया और इस प्रकार मुक्ति प्राप्त की। अतएव, प्राचीनों की भाँति, तुम्हें इसी दिव्य चेतना में अपना कर्तव्य करना चाहिए।\" (गीता 4.15)\n\nकृष्णभावनामृत की प्रक्रिया यह अपेक्षा करती है कि हम उन महान् आचार्यों के पदचिह्नों पर चलें जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त की है। यदि कोई महान् आचार्यों, ऋषियों, भक्तों एवं उन प्रबुद्ध राजाओं द्वारा स्थापित आदर्शों का अनुसरण करते हुए कर्म करता है, जिन्होंने अपने जीवन में कर्मयोग किया, तो वह भी मुक्त हो जाएगा।\n\nकुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन युद्ध में संलग्न होकर अपने कर्मों में उलझ जाने से अत्यधिक भयभीत था। अतएव श्रीकृष्ण ने उसे आश्वासन दिया कि यदि वह उनके निमित्त युद्ध करे, तो उलझाव की कोई सम्भावना नहीं होगी।\n\nkiṁ karma kim akarmeti\n\nkavayo 'py atra mohitāḥ\n\ntat te karma pravakṣyāmi\n\nyaj jñātvā mokṣyase 'śubhāt\n\n\"बुद्धिमान् पुरुष भी यह निर्धारित करने में मोहित हो जाते हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है। अब मैं तुम्हें बताऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम समस्त पापों से मुक्त हो जाओगे।\" (गीता 4.16)\n\nलोग वस्तुतः इस विषय में भ्रमित हैं कि कर्म (karma) क्या है और अकर्म (akarma) क्या है। श्रीकृष्ण यहाँ संकेत करते हैं कि बड़े-बड़े विद्वान् (kavayaḥ) भी कर्म की प्रकृति के विषय में मोहित हो जाते हैं। यह जानना आवश्यक है कि कौन-से कर्म प्रामाणिक हैं और कौन-से नहीं, कौन-से अधिकृत हैं और कौन-से नहीं, कौन-से निषिद्ध हैं और कौन-से नहीं। यदि हम कर्म के सिद्धान्त को समझ लें, तो हम भौतिक बन्धन से मुक्त हो सकते हैं। अतएव यह जानना आवश्यक है कि कर्म कैसे किया जाए ताकि जब हम भौतिक शरीर त्यागें, तब हम दूसरा शरीर ग्रहण करने के लिए विवश न हों, अपितु आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करने के लिए स्वतन्त्र हों। उचित कर्म का सिद्धान्त श्रीकृष्ण ने ग्यारहवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा है:\n\nmat-karma-kṛn mat-paramo\n\nmad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ\n\nnirvairaḥ sarva-bhūteṣu\n\nyaḥ sa mām eti pāṇḍava\n\n\"हे प्रिय अर्जुन! जो मेरी शुद्ध भक्ति में संलग्न है, जो पूर्व कर्मों के कल्मष से एवं मानसिक कल्पना से मुक्त है, जो प्रत्येक जीव के प्रति मैत्रीपूर्ण है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है।\" (गीता 11.55)\n\nयह एक श्लोक ही भगवद्गीता के सार को समझने के लिए पर्याप्त है। मनुष्य को \"मेरे कर्म\" में संलग्न होना चाहिए। और यह कर्म क्या है? यह भगवद्गीता के अन्तिम उपदेश में इंगित किया गया है, जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी शरण में आने को कहते हैं (गीता 18.66)।\n\nअर्जुन के उदाहरण से हमें यह सीखना है कि हमें केवल वही कर्म करना चाहिए जो श्रीकृष्ण द्वारा अनुमोदित हो। यही मानव-जीवन का ध्येय है, किन्तु हम इसे नहीं जानते। अपने अज्ञान के कारण हम इतने सारे कर्मों में संलग्न होते हैं जो जीवन की दैहिक अथवा भौतिक धारणा से जुड़े होते हैं। श्रीकृष्ण चाहते थे कि अर्जुन युद्ध करे, और यद्यपि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था, फिर भी उसने युद्ध किया क्योंकि श्रीकृष्ण ने ऐसा चाहा। हमें इस उदाहरण का अनुसरण करना सीखना है।\n\nनिस्सन्देह श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताने के लिए उपस्थित थे कि उसका कर्म क्या है, किन्तु हमारे विषय में क्या? श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को अमुक-अमुक प्रकार से कर्म करने का निर्देश दे रहे थे, किन्तु केवल इसलिए कि श्रीकृष्ण साक्षात् हमारे समक्ष उपस्थित नहीं हैं, हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि कोई निर्देश नहीं है। वस्तुतः निर्देश है। भगवद्गीता के अन्तिम अध्याय में वह उचित कर्म दिया गया है जो हमें करना है।\n\nya idaṁ paramaṁ guhyaṁ\n\nmad-bhakteṣv abhidhāsyati\n\nbhaktiṁ mayi parāṁ kṛtvā\n\nmām evaiṣyaty asaṁśayaḥ\n\nna ca tasmān manuṣyeṣu\n\nkaścin me priya-kṛttamaḥ\n\nbhavitā na ca me tasmād\n\nanyaḥ priyataro bhuvi\n\n\"जो इस परम रहस्य को भक्तों को समझाता है, उसे भक्ति निश्चित है, और अन्त में वह मेरे पास लौट आएगा। इस संसार में मुझे उससे अधिक प्रिय कोई सेवक नहीं है, न ही कभी उससे अधिक प्रिय कोई होगा।\" (गीता 18.68–69)\n\nअतएव यह हमारा कर्तव्य है कि हम भगवद्गीता की विधि का प्रचार करें और लोगों को कृष्णभावनाभावित बनाएँ। लोग वस्तुतः कृष्णभावनामृत के अभाव में कष्ट भोग रहे हैं। हम सबको सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु श्रीकृष्ण के विज्ञान को फैलाने में संलग्न होना चाहिए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु कृष्णभावनामृत की शिक्षा देने के इसी ध्येय से आए, और उन्होंने कहा कि चाहे किसी की कोई भी स्थिति हो, यदि वह कृष्णभावनामृत की शिक्षा देता है तो उसे आध्यात्मिक गुरु माना जाना चाहिए। भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत दोनों इस सूचना से भरे पड़े हैं कि कृष्णभावनाभावित कैसे बना जाए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने इन दो ग्रन्थों का चयन किया और अनुरोध किया कि विश्व के सभी कोनों में लोग प्रत्येक नगर एवं ग्राम में श्रीकृष्ण के इस विज्ञान को फैलाएँ। भगवान् चैतन्य महाप्रभु साक्षात् श्रीकृष्ण ही थे, और हमें इसे अपने उचित कर्म के विषय में श्रीकृष्ण का संकेत मानना चाहिए। किन्तु हमें सावधान रहना चाहिए कि हम भगवद्गीता को यथारूप ही प्रस्तुत करें, बिना किसी व्यक्तिगत व्याख्या अथवा प्रयोजन के। कुछ लोग भगवद्गीता की व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं, किन्तु हमें वचनों को वैसे ही प्रस्तुत करना चाहिए जैसे वे श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए हैं।\n\nजो श्रीकृष्ण के लिए कर्म करता है, वह भले ही भौतिक जगत् में किसी अन्य के समान कर्म करता प्रतीत हो, किन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। अर्जुन ने भले ही किसी सामान्य सैनिक के समान युद्ध किया हो, किन्तु चूँकि उसने कृष्णभावनामृत में युद्ध किया, अतः वह अपने कर्मों के उलझाव से मुक्त था। इस प्रकार उसका कर्म, भौतिक प्रतीत होते हुए भी, तनिक भी भौतिक नहीं था। श्रीकृष्ण द्वारा अनुमोदित कोई भी कर्म—चाहे वह कुछ भी हो—उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। युद्ध करना भले ही कोई बहुत अच्छी बात न हो, किन्तु कभी-कभी, जैसा कि कुरुक्षेत्र के युद्ध की स्थिति में था, यह नितान्त आवश्यक हो जाता है। दूसरी ओर, हम ऐसा कर्म कर सकते हैं जो संसार की दृष्टि में अत्यन्त परोपकारी अथवा मानवतावादी हो, और फिर भी हम भौतिक कर्म में बँधे रहें। अतः कर्म स्वयं महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु वह चेतना महत्त्वपूर्ण है जिसमें कर्म किया जाता है।\n\nkarmaṇo hy api boddhavyaṁ\n\nboddhavyaṁ ca vikarmaṇaḥ\n\nakarmaṇaś ca boddhavyaṁ\n\ngahanā karmaṇo gatiḥ\n\n\"कर्म की पेचीदगियाँ समझना अत्यन्त कठिन है। अतएव मनुष्य को भली-भाँति जानना चाहिए कि कर्म क्या है, निषिद्ध कर्म क्या है, और अकर्म क्या है।\" (गीता 4.17)\n\nकर्म का पथ अत्यन्त पेचीदा है; अतएव हमें कर्म, अकर्म एवं विकर्म के भेदों को समझना चाहिए। यदि हम केवल कृष्णभावनामृत में संलग्न हो जाएँ, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। अन्यथा हमें यह भेद करना होगा कि उलझने से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। जीवन के सामान्य व्यवहार में हम अनजाने में किसी नियम का उल्लंघन कर देते हैं और हमें उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं। इसी प्रकार प्रकृति के नियम अत्यन्त कठोर एवं दृढ़ हैं, और वे कोई बहाना स्वीकार नहीं करते। यह प्रकृति का नियम है कि अग्नि जलाती है, और यदि कोई बालक भी इसका स्पर्श करे, तो अपने अज्ञान एवं भोलेपन के बावजूद वह जल जाएगा। अतः हमें अपने कर्म का मार्ग अत्यन्त सावधानी से चुनना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि प्रकृति के दृढ़ नियम हमें कष्ट में बाँधने हेतु प्रतिक्रिया करें। अतएव यह जानना आवश्यक है कि कौन-सा कर्म करना है और कौन-से कर्म से बचना है।\n\nकर्म शब्द विहित कर्तव्यों को इंगित करता है। विकर्म शब्द उन कर्मों को इंगित करता है जो मनुष्य के विहित कर्तव्यों के विरुद्ध हैं। और अकर्म शब्द उन कर्मों को इंगित करता है जिनकी तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं होती। अकर्म-कर्मों के सम्पादन में कुछ प्रतिक्रियाएँ प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु वास्तव में होती नहीं। जब हम श्रीकृष्ण के निर्देशन में कर्म करते हैं, तब वास्तव में यही स्थिति होती है—कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। यदि हम स्वेच्छा से किसी की हत्या कर बैठें, तो हम राज्य सरकार द्वारा प्राणदण्ड के पात्र होते हैं। तब हमारे कर्म विकर्म कहलाते हैं, क्योंकि वे विहित कर्मों के विरुद्ध हैं। किन्तु यदि सरकार हमें सेना में भर्ती कर ले, और हम युद्ध में संलग्न होकर किसी का वध करें, तो हम प्रतिक्रियाएँ नहीं भोगते, और इसे अकर्म कहा जाता है। एक स्थिति में हम अपनी मनमानी के अनुसार कर्म कर रहे हैं, और दूसरी में हम सरकार के निर्देशन में कर्म कर रहे हैं। इसी प्रकार जब हम श्रीकृष्ण के निर्देशन में कर्म करते हैं, तब हमारे किए गए कर्म अकर्म कहलाते हैं, क्योंकि उस प्रकार के कर्म की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।\n\nkarmaṇy akarma yaḥ paśyed\n\nakarmaṇi ca karma yaḥ\n\nsa buddhimān manuṣyeṣu\n\nsa yuktaḥ kṛtsna-karma-kṛt\n\n\"जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है, और यद्यपि वह सब प्रकार के कर्मों में संलग्न रहता है, फिर भी वह दिव्य स्थिति में है।\" (गीता 4.18)\n\nजो वस्तुतः यह देख सकता है कि कर्मों के बावजूद कोई कर्म-प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं, जो अकर्म की प्रकृति को समझता है, वही वास्तव में वस्तुओं को यथार्थ रूप में देखता है। अकर्मणि शब्द उसे इंगित करता है जो कर्म की प्रतिक्रियाओं से बचने का प्रयत्न कर रहा है। अपने कर्मों को कृष्णभावनामृत में संयोजित करके, मनुष्य भले ही सब प्रकार के कर्म करे, फिर भी वह मुक्त रहता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन युद्ध में संलग्न हुआ, और दुर्योधन के पक्ष के लोग भी युद्ध में संलग्न हुए। हमें यह समझना चाहिए कि ऐसा कैसे है कि अर्जुन प्रतिक्रिया से मुक्त है जबकि दुर्योधन नहीं। बाह्य रूप से हम देख सकते हैं कि दोनों पक्ष युद्ध में संलग्न हैं, किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि अर्जुन प्रतिक्रियाओं से नहीं बँधा है क्योंकि वह श्रीकृष्ण की आज्ञा के अधीन युद्ध कर रहा है। अतः जब हम किसी को कृष्णभावनामृत में कर्म करते देखें, तब हमें यह समझना चाहिए कि उसका कर्म कोई प्रतिक्रिया नहीं रखता। जो ऐसे कर्म को देख सकता है और उसे समझ सकता है, उसे अत्यन्त बुद्धिमान् (sa buddhimān) माना जाना चाहिए। युक्ति इतनी यह देखने में नहीं है कि कोई व्यक्ति क्या कर रहा है, अपितु यह समझने में है कि वह उसे क्यों कर रहा है।\n\nवस्तुतः अर्जुन युद्धक्षेत्र में अत्यन्त अप्रिय कर्म में संलग्न था, किन्तु चूँकि वह कृष्णभावनामृत में था, अतः उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं भोगनी पड़ी। हम कोई ऐसा कर्म कर रहे होंगे जिसे हम बहुत अच्छा कर्म समझते होंगे, किन्तु यदि हम उसे कृष्णभावनामृत में न करें, तो हमें प्रतिक्रियाएँ भोगनी पड़ती हैं। भौतिक दृष्टिकोण से अर्जुन का युद्ध न करने का आरम्भिक निर्णय अच्छा था, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से वह अच्छा नहीं था। जब हम पुण्य कर्म करते हैं, तब हमें कुछ फल मिलते हैं। हम किसी अत्यन्त उत्तम कुल में, किसी ब्राह्मण अथवा धनवान् व्यक्ति के कुल में जन्म ले सकते हैं, हम अत्यन्त धनवान् अथवा अत्यन्त विद्वान् बन सकते हैं, अथवा हम अत्यन्त सुन्दर बन सकते हैं। दूसरी ओर, यदि हम पापकर्म करें, तो हमें किसी निम्न कुल अथवा पशु-योनि में जन्म लेना पड़ सकता है, अथवा हम अनपढ़ या मूर्ख बन सकते हैं, अथवा अत्यन्त कुरूप। यद्यपि हम अत्यन्त पुण्य कर्म करते हैं और उत्तम जन्म लेते हैं, फिर भी हम कर्म एवं प्रतिक्रिया के दृढ़ नियमों के अधीन रहेंगे। हमारा प्रमुख ध्येय इस भौतिक जगत् के नियमों से छूटना होना चाहिए। यदि हम इसे न समझें, तो हम कुलीन परिवारों, धन, अथवा उत्तम शिक्षा या सुन्दर शरीर के प्रति आकृष्ट हो जाएँगे। हमें यह समझ लेना चाहिए कि भौतिक जीवन की ये समस्त सुविधाएँ होते हुए भी हम जन्म, वृद्धावस्था, रोग एवं मृत्यु से मुक्त नहीं हैं। इस विषय में हमें सावधान करने के लिए श्रीकृष्ण भगवद्गीता में चेतावनी देते हैं:\n\nābrahma-bhuvanāl lokāḥ\n\npunar āvartino 'rjuna\n\nmām upetya tu kaunteya\n\npunar janma na vidyate\n\n\"हे अर्जुन! भौतिक जगत् के सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक तक, सभी दुःख के स्थान हैं जहाँ पुनः-पुनः जन्म एवं मृत्यु होते रहते हैं।\" (गीता 8.16)\n\nब्रह्मलोक पर भी, जो भौतिक ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च लोक है, जन्म एवं मृत्यु की पुनरावृत्ति विद्यमान है। इससे मुक्त होने के लिए हमें श्रीकृष्ण के लोक में जाना होगा। धनवान् व्यक्ति अथवा सुन्दर व्यक्ति होना भले ही बहुत अच्छा हो, किन्तु हम ऐसे कब तक बने रहेंगे? वह हमारा स्थायी जीवन नहीं है। हम पचास, साठ अथवा अधिक-से-अधिक सौ वर्ष तक विद्वान्, धनवान् एवं सुन्दर बने रह सकते हैं, किन्तु वास्तविक जीवन पचास या सौ वर्ष का नहीं है, न ही एक हज़ार वर्ष का, न दस लाख वर्ष का भी। हम नित्य हैं, और हमें अपना नित्य जीवन प्राप्त करना है। हमने उसे प्राप्त नहीं किया है—यही हमारी समूची समस्या है। वह समस्या तभी हल हो सकती है जब हम कृष्णभावनाभावित हों।\n\nयदि हम इस भौतिक शरीर को कृष्णभावनामृत में त्यागें, तो हमें भौतिक जगत् में पुनः नहीं लौटना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि इस भौतिक अस्तित्व से पूर्णतः बचा जाए। यह भौतिक जगत् में अपनी दशा सुधारने का प्रश्न नहीं है। कारागार में कोई व्यक्ति प्रथम श्रेणी का बन्दी बनने के लिए अपनी दशा सुधारना चाह सकता है, और सरकार उसे ए-दर्जा दे सकती है, किन्तु कोई भी विवेकशील व्यक्ति ए-श्रेणी का बन्दी बनकर सन्तुष्ट नहीं होगा। उसे तो कारागार से पूर्णतः बाहर निकलने की इच्छा करनी चाहिए। भौतिक जगत् में हममें से कुछ ए-श्रेणी, बी-श्रेणी अथवा सी-श्रेणी के बन्दी हैं, किन्तु किसी भी स्थिति में हम सब बन्दी ही हैं। वास्तविक ज्ञान केवल एम.ए. या पीएच.डी. प्राप्त कर लेने में नहीं है, अपितु अस्तित्व की इन मूलभूत समस्याओं को समझने में है।\n\nyasya sarve samārambhāḥ\n\nkāma-saṅkalpa-varjitāḥ\n\njñānāgni-dagdha-karmāṇaṁ\n\ntam āhuḥ paṇḍitaṁ budhaḥ\n\n\"जिसका प्रत्येक कर्म इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है, उसे पूर्ण ज्ञान में स्थित समझा जाता है। ऋषिगण उसे ऐसा कर्ता कहते हैं जिसका सकाम कर्म पूर्ण ज्ञान की अग्नि में भस्म हो गया है।\" (गीता 4.19)\n\nपण्डितम् शब्द का अर्थ है विद्वान्, और बुधाः का अर्थ है सुपण्डित। दसवें अध्याय में भी हमें budhā bhāva-samanvitāḥ (गीता 10.8) श्लोक में बुधाः शब्द मिलता है। भगवद्गीता के अनुसार, कोई व्यक्ति केवल इसलिए विद्वान् नहीं हो जाता कि उसने किसी विश्वविद्यालय से बहुत शिक्षा प्राप्त कर ली है। भगवद्गीता कहती है कि वही विद्वान् है जो प्रत्येक वस्तु को समान स्तर पर देख सकता है।\n\nvidyā-vinaya-sampanne\n\nbrāhmaṇe gavi hastini\n\nśuni caiva śva-pāke ca\n\npaṇḍitāḥ sama-darśinaḥ\n\n\"विनम्र ऋषि, सच्चे ज्ञान के बल पर, एक विद्वान् एवं सौम्य ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ते और एक कुत्ता खाने वाले (चाण्डाल) को समान दृष्टि से देखता है।\" (गीता 5.18)\n\nभारत में, वैदिक सभ्यता के अनुसार, जो ब्राह्मण विद्वान् होता है उसे मानव-समाज में सर्वोच्च मनुष्य माना जाता है। पण्डित, जो विद्वान् एवं सौम्य है, ऐसे ब्राह्मण को एक कुत्ते अथवा कुत्ते खाने वाले चाण्डाल के समान स्तर पर देखता है। दूसरे शब्दों में, वह सर्वोच्च एवं निम्नतम के बीच कोई भेद नहीं देखता। तो क्या इसका यह अर्थ हुआ कि विद्वान् ब्राह्मण होना कुत्ता होने से कुछ अच्छा नहीं है? नहीं, ऐसा नहीं है। किन्तु पण्डित उन्हें समान देखता है क्योंकि वह त्वचा को नहीं, अपितु आत्मा को देखता है। जिसने प्रत्येक जीव के भीतर उसी आत्मा को देखने की कला सीख ली है, उसे पण्डित माना जाता है, क्योंकि वस्तुतः प्रत्येक जीव एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है, पूर्ण आध्यात्मिक समष्टि का अभिन्न अंश है। आध्यात्मिक स्फुलिंग सभी में समान है, किन्तु वह विभिन्न वस्त्रों से आच्छादित है। कोई सम्मानित व्यक्ति बहुत फटे-पुराने वस्त्रों में आ सकता है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उसका अपमान किया जाए। भगवद्गीता में इन भौतिक शरीरों की उपमा उन वस्त्रों से दी गई है जिन्हें आत्मा धारण करती है।\n\nvāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya\n\nnavāni gṛhṇāti naro parāṇi\n\ntathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny\n\nanyāni saṁyāti navāni dehī\n\n\"जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने एवं व्यर्थ शरीरों को त्यागकर नए भौतिक शरीर ग्रहण करती है।\" (गीता 2.22)\n\nजब भी हम किसी जीव को देखें, तब हमें सोचना चाहिए, \"यहाँ एक आत्मा है।\" जो कोई जीवन की ऐसी आध्यात्मिक दृष्टि को समझ सकता है, वह पण्डित है। चाणक्य पण्डित शिक्षा का मानक अथवा पण्डित की योग्यता इस प्रकार बताते हैं: \"विद्वान् पुरुष अपनी पत्नी को छोड़कर समस्त स्त्रियों को अपनी माता के समान देखता है; वह समस्त भौतिक सम्पत्ति को सड़क के कूड़े के समान देखता है, और दूसरों के दुःखों को वह वैसे ही देखता है जैसे वह उन्हें अपने में देखता।\" भगवान् बुद्ध ने शिक्षा दी कि हमें पशुओं को वचन अथवा कर्म से भी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। यही पण्डित की योग्यता है, और यही जीवन का मानक होना चाहिए। अतएव यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य को उसके जीवन-दर्शन के अनुसार और उस दर्शन के अनुरूप उसके कर्म के अनुसार शिक्षित माना जाए, न कि उसकी शैक्षणिक उपाधियों के अनुसार। यही भगवद्गीता से पण्डित शब्द की समझ है। इसी प्रकार, बुधाः शब्द विशेष रूप से उसे इंगित करता है जो शास्त्र के अध्ययन में सुपण्डित है। ऐसे साक्षात्कार एवं शास्त्रीय ज्ञान के फल भगवद्गीता में इस प्रकार वर्णित हैं:\n\nahaṁ sarvasya prabhavo\n\nmattaḥ sarvaṁ pravartate\n\niti matvā bhajante māṁ\n\nbudhā bhāva-samanvitāḥ\n\n\"मैं समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक जगतों का स्रोत हूँ। सब कुछ मुझसे ही उद्भूत होता है। जो बुद्धिमान् इसे भली-भाँति जानते हैं, वे मेरी भक्ति में संलग्न होते हैं और पूर्ण हृदय से मेरी आराधना करते हैं।\" (गीता 10.8)\n\nसुपण्डित पुरुष अथवा बुधाः वह है जिसने यह समझ लिया है कि श्रीकृष्ण समस्त उद्भवों के उद्गम हैं। हम जो कुछ भी देखते हैं, वह श्रीकृष्ण का उद्भव मात्र है। लाखों-करोड़ों वर्षों से सूर्य से सूर्यप्रकाश उद्भूत होता आ रहा है, और फिर भी सूर्य जैसा है वैसा ही है। इसी प्रकार समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक ऊर्जाएँ श्रीकृष्ण से ही आ रही हैं। इसे जानने के फलस्वरूप मनुष्य श्रीकृष्ण का भक्त बन जाता है।\n\nअतएव जो यह जानता है कि उसे कृष्णभावनामृत में कर्म करना है, जो अब इस भौतिक जगत् को भोगने की कामना नहीं करता, वही वस्तुतः विद्वान् है। प्रत्येक व्यक्ति काम (kāma) के कारण भौतिक जगत् में कर्म कर रहा है, किन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस काम के निर्देशों से मुक्त है (kāma-saṅkalpa-varjitāḥ)। यह कैसे सम्भव है? Jñānāgni-dagdha-karmāṇam: ज्ञान की अग्नि पापकर्मों की समस्त प्रतिक्रियाओं को भस्म कर देती है। यह समस्त शोधकों में सर्वाधिक सामर्थ्यवान् है। हमारे जीवन का अर्थ एवं दिशा केवल तभी तक है जब तक हम कृष्णभावनामृत के इस दिव्य ज्ञान को, अर्थात् राज-विद्या को, जो समस्त ज्ञान का राजा है, प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं।"}
