{"ref": "ssr/1", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/1/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "आत्मा के विज्ञान की शिक्षा", "purport": "आत्मा की खोज\n\nआप कौन हैं?... क्या आप अपना शरीर हैं? अथवा अपना मन? अथवा क्या आप कुछ उच्चतर हैं? क्या आप जानते हैं कि आप कौन हैं, अथवा आप मात्र यह सोचते हैं कि आप जानते हैं? और क्या इससे सचमुच कुछ अन्तर पड़ता है? हमारे भौतिकतावादी समाज ने, अपने अप्रबुद्ध नेतृत्व के साथ, अपने वास्तविक, उच्चतर आत्मा के विषय में जिज्ञासा करना प्रायः वर्जित-सा बना दिया है। इसके स्थान पर हम अपना बहुमूल्य समय शरीर के निमित्त ही उसका रख-रखाव, सज्जा एवं लाड़-दुलार करने में व्यय करते हैं। क्या कोई विकल्प हो सकता है?\n\nयह अति महत्त्वपूर्ण कृष्णभावनामृत आन्दोलन मानव-समाज को आध्यात्मिक मृत्यु से बचाने हेतु है। इस समय मानव-समाज को ऐसे नेताओं द्वारा भटकाया जा रहा है जो अन्धे हैं, क्योंकि वे मानव-जीवन के लक्ष्य एवं उद्देश्य को नहीं जानते, जो आत्म-साक्षात्कार तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ हमारे विस्मृत सम्बन्ध की पुनर्स्थापना है। यही वह बिन्दु है जो छूट रहा है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन मानव-समाज को इस महत्त्वपूर्ण विषय में प्रबुद्ध करने का प्रयत्न कर रहा है।\n\nवैदिक सभ्यता के अनुसार, जीवन की पूर्णता कृष्ण, अर्थात् भगवान्, के साथ अपने सम्बन्ध का साक्षात्कार करना है। *भगवद्गीता* में, जिसे दिव्य विज्ञान के समस्त अधिकारी समस्त वैदिक ज्ञान के आधार के रूप में स्वीकार करते हैं, हम यह समझते हैं कि न केवल मनुष्य, अपितु समस्त जीव भगवान् के अंश हैं। अंश समग्र की सेवा हेतु होते हैं, जैसे पाँव, हाथ, अँगुलियाँ तथा कान सम्पूर्ण शरीर की सेवा हेतु होते हैं। हम जीव, भगवान् के अंश होने के कारण, उनकी सेवा करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं।\n\nवस्तुतः हमारी स्थिति यह है कि हम सदा किसी न किसी की सेवा कर रहे हैं—चाहे अपने परिवार की, देश की, अथवा समाज की। यदि हमारे पास सेवा करने को कोई न हो, तो कभी-कभी हम एक पालतू बिल्ली या कुत्ता रखते हैं और उसकी सेवा करते हैं। ये सभी बातें यह सिद्ध करती हैं कि हम स्वभावतः सेवा करने हेतु ही बने हैं, फिर भी अपनी पूरी क्षमता से सेवा करने पर भी हम सन्तुष्ट नहीं होते। और न ही वह व्यक्ति सन्तुष्ट होता है जिसकी हम सेवा कर रहे हैं। भौतिक धरातल पर प्रत्येक व्यक्ति कुण्ठित है। इसका कारण यह है कि जो सेवा की जा रही है वह ठीक से दिशायित नहीं है। उदाहरणार्थ, यदि हम किसी वृक्ष की सेवा करना चाहें, तो हमें जड़ में जल देना होगा। यदि हम पत्तों, शाखाओं एवं टहनियों पर जल डालें, तो उससे थोड़ा ही लाभ होता है। यदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा की जाए, तो अन्य समस्त अंश स्वतः सन्तुष्ट हो जाएँगे। फलस्वरूप समाज, परिवार एवं राष्ट्र की सेवा सहित समस्त कल्याण-कार्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करने से ही सिद्ध होते हैं।\n\nप्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह भगवान् के साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति को समझे और तदनुसार आचरण करे। यदि यह सम्भव हो जाए, तो हमारा जीवन सफल हो जाता है। किन्तु कभी-कभी हम चुनौती-भाव से कहते हैं, \"कोई भगवान् नहीं है,\" अथवा \"मैं ही भगवान् हूँ,\" अथवा यहाँ तक कि \"मुझे भगवान् की परवाह नहीं।\" परन्तु वास्तविकता में यह चुनौती-भाव हमें नहीं बचाएगा। भगवान् विद्यमान हैं, और हम प्रत्येक क्षण उन्हें देख सकते हैं। यदि हम अपने जीवन में भगवान् को देखने से इनकार करें, तो वे क्रूर मृत्यु के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित होंगे। यदि हम उन्हें एक रूप में देखना न चाहें, तो हम उन्हें किसी अन्य रूप में देखेंगे। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विभिन्न रूप हैं, क्योंकि वे समस्त विश्व-प्रकटीकरण के आदि-मूल हैं। एक अर्थ में, हमारे लिए उनसे बच निकलना सम्भव ही नहीं है।\n\nयह कृष्णभावनामृत आन्दोलन न तो अन्ध धार्मिक कट्टरता है, और न ही किसी हाल के नवोदित व्यक्ति का विद्रोह; अपितु यह परम भगवान्, परम भोक्ता के सम्बन्ध में हमारी नित्य आवश्यकता के विषय में एक अधिकृत, वैज्ञानिक उपागम है। कृष्णभावनामृत मात्र उनके साथ हमारे नित्य सम्बन्ध तथा उनके प्रति अपने सापेक्ष कर्तव्यों के निर्वहण की प्रक्रिया से सम्बद्ध है। इस प्रकार, कृष्णभावनामृत हमें वर्तमान मानव-जीवन-रूप में प्राप्य जीवन की उच्चतम पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ बनाता है।\n\nहमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि यह विशेष मानव-जीवन-रूप आत्मा के देहान्तरण के चक्र में अनेक करोड़ वर्षों के विकास के पश्चात् प्राप्त होता है। इस विशेष जीवन-रूप में आर्थिक प्रश्न निम्नतर पशु-रूपों की अपेक्षा अधिक सरलता से हल हो जाता है। शूकर, कुत्ते, ऊँट, गधे आदि हैं, जिनकी आर्थिक आवश्यकताएँ हमारी आवश्यकताओं जितनी ही महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु इन पशुओं तथा अन्यों के आर्थिक प्रश्न आदिम परिस्थितियों में हल हो जाते हैं, जबकि मनुष्य को प्रकृति के नियमों द्वारा एक सुखमय जीवन व्यतीत करने की समस्त सुविधाएँ दी गई हैं।\n\nमनुष्य को शूकर या अन्य पशुओं की अपेक्षा जीने का बेहतर अवसर क्यों दिया जाता है? एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी को एक साधारण लिपिक की अपेक्षा सुखमय जीवन की बेहतर सुविधाएँ क्यों दी जाती हैं? उत्तर अत्यन्त सरल है: उस महत्त्वपूर्ण अधिकारी को एक साधारण लिपिक के कर्तव्यों की अपेक्षा अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण प्रकृति के कर्तव्यों का निर्वहण करना होता है। इसी प्रकार, मनुष्य को उन पशुओं की अपेक्षा उच्चतर कर्तव्यों का निर्वहण करना होता है जो सदा अपने भूखे पेट भरने में व्यस्त रहते हैं। किन्तु प्रकृति के नियमों के अनुसार, सभ्यता के आधुनिक पाशविक मानदण्ड ने पेट भरने की समस्याओं को ही बढ़ाया है। जब हम इनमें से कुछ परिष्कृत पशुओं के पास आध्यात्मिक जीवन के लिए जाते हैं, तो वे कहते हैं कि वे केवल अपने पेट की तृप्ति के लिए कार्य करना चाहते हैं और भगवान् के विषय में जिज्ञासा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी कठिन परिश्रम करने की उनकी उत्सुकता के बावजूद, बेरोज़गारी का प्रश्न तथा प्रकृति के नियमों द्वारा उत्पन्न और भी अनेक बाधाएँ सदा बनी रहती हैं। इसके बावजूद, वे भगवान् को स्वीकार करने की आवश्यकता का खण्डन ही करते रहते हैं।\n\nहमें यह मानव-जीवन-रूप शूकर या कुत्ते की भाँति कठिन परिश्रम करने के लिए नहीं, अपितु जीवन की उच्चतम पूर्णता प्राप्त करने के लिए दिया गया है। यदि हम वह पूर्णता नहीं चाहते, तो हमें अत्यन्त कठिन परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि प्रकृति के नियम हमें ऐसा करने को विवश कर देंगे। कलियुग (इस वर्तमान युग) के अन्तिम दिनों में मनुष्यों को मात्र एक रोटी के टुकड़े के लिए गधों की भाँति कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। यह प्रक्रिया पहले ही आरम्भ हो चुकी है, और प्रत्येक वर्ष कम वेतन के लिए अधिक कठिन परिश्रम की आवश्यकता बढ़ती जाएगी। फिर भी मनुष्य पशुओं की भाँति कठिन परिश्रम करने के लिए नहीं बने हैं, और यदि कोई मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वहण करने में विफल रहता है, तो प्रकृति के नियमों द्वारा उसे निम्नतर जीव-योनियों में देहान्तरण करने को विवश किया जाता है। *भगवद्गीता* अत्यन्त सजीव रूप से वर्णन करती है कि किस प्रकार एक आत्मा, प्रकृति के नियमों द्वारा, अपना जन्म लेती है और भौतिक जगत् में पदार्थ का भोग करने हेतु एक उपयुक्त शरीर तथा इन्द्रियाँ प्राप्त करती है।\n\n*भगवद्गीता* में यह भी कहा गया है कि जो लोग भगवान् तक पहुँचने के मार्ग पर प्रयत्न तो करते हैं किन्तु उसे पूर्ण नहीं करते—दूसरे शब्दों में, जो कृष्णभावनामृत में पूर्ण सफलता प्राप्त करने में विफल रहे हैं—उन्हें आध्यात्मिक रूप से उन्नत अथवा आर्थिक रूप से सम्पन्न वणिक्-परिवारों में प्रकट होने का अवसर दिया जाता है। यदि असफल आध्यात्मिक साधकों को ऐसे श्रेष्ठ माता-पिता के अवसर दिए जाते हैं, तो उनका क्या जिन्होंने वास्तव में अपेक्षित सफलता प्राप्त कर ली है? अतएव भगवान् की ओर लौटने का प्रयत्न, चाहे आधा ही सम्पन्न क्यों न हुआ हो, अगले जीवन में एक उत्तम जन्म की गारंटी देता है। आध्यात्मिक तथा आर्थिक रूप से सम्पन्न, दोनों ही परिवार आध्यात्मिक प्रगति के लिए लाभकारी हैं, क्योंकि दोनों ही परिवारों में मनुष्य को उस बिन्दु से, जहाँ वह अपने पूर्व जन्म में रुक गया था, आगे प्रगति करने का उत्तम अवसर मिल सकता है। आध्यात्मिक साक्षात्कार में एक उत्तम परिवार द्वारा उत्पन्न वातावरण आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन के लिए अनुकूल होता है। *भगवद्गीता* ऐसे भाग्यशाली सुकुल-जन्मा व्यक्तियों को स्मरण कराती है कि उनका सौभाग्य उनके अतीत के भक्ति-कार्यों के कारण है। दुर्भाग्यवश, इन परिवारों की सन्तानें, माया (भ्रम) से भटकाई जाकर, *भगवद्गीता* का परामर्श नहीं लेतीं।\n\nएक सम्पन्न परिवार में जन्म लेने से जीवन के आरम्भ से ही पर्याप्त भोजन ढूँढने की समस्या हल हो जाती है, और बाद में तुलनात्मक रूप से अधिक सरल एवं अधिक सुखमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में होने से, मनुष्य को आध्यात्मिक साक्षात्कार में प्रगति करने का उत्तम अवसर मिलता है, किन्तु दुर्भाग्यवश, वर्तमान लौह-युग (जो यन्त्रों एवं यन्त्रवत् मनुष्यों से भरा है) के प्रभाव के कारण, धनवानों के पुत्र इन्द्रिय-भोग की ओर भटका दिए जाते हैं, और वे आध्यात्मिक प्रबोधन के अपने उत्तम अवसर को भूल जाते हैं। अतएव प्रकृति, अपने नियमों द्वारा, इन स्वर्णिम गृहों में अग्नि लगा रही है। यह लंका की स्वर्णिम नगरी ही थी, जो आसुरी रावण के शासनकाल में, भस्म कर दी गई थी। यही प्रकृति का नियम है।\n\n*भगवद्गीता* कृष्णभावनामृत के दिव्य विज्ञान का प्रारम्भिक अध्ययन है, और समस्त उत्तरदायी राष्ट्राध्यक्षों का यह कर्तव्य है कि वे *भगवद्गीता* का सन्दर्भ लेकर अपने आर्थिक एवं अन्य कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाएँ। हमें जीवन के आर्थिक प्रश्नों को एक डगमगाते धरातल पर सन्तुलन साधकर हल करने के लिए नहीं बनाया गया है; अपितु हमें जीवन की उन परम समस्याओं को हल करने के लिए बनाया गया है जो प्रकृति के नियमों के कारण उत्पन्न होती हैं। जब तक आध्यात्मिक गति न हो, सभ्यता स्थिर रहती है। आत्मा शरीर को गतिमान करती है, और जीवित शरीर संसार को गतिमान करता है। हम शरीर के विषय में चिन्तित रहते हैं, किन्तु हमें उस आत्मा का कोई ज्ञान नहीं जो उस शरीर को गतिमान कर रही है। आत्मा के बिना शरीर निश्चल, अथवा मृत है।\n\nमानव-शरीर एक उत्कृष्ट वाहन है जिसके द्वारा हम नित्य जीवन तक पहुँच सकते हैं। यह अविद्या-सागर, अर्थात् भौतिक अस्तित्व, को पार करने हेतु एक दुर्लभ एवं अति महत्त्वपूर्ण नौका है। इस नौका पर एक निपुण नाविक, आध्यात्मिक गुरु, की सेवा उपलब्ध है। दिव्य कृपा से, यह नौका अनुकूल वायु में जल पर चलती है। इन समस्त शुभ कारकों के होते हुए, ऐसा कौन होगा जो अविद्या-सागर को पार करने का अवसर न लेगा? यदि कोई इस उत्तम अवसर की उपेक्षा करता है, तो यह जान लेना चाहिए कि वह मात्र आत्महत्या कर रहा है।\n\nरेल के प्रथम-श्रेणी के डिब्बे में निश्चय ही बहुत सुख होता है, किन्तु यदि रेलगाड़ी अपने गन्तव्य की ओर न चले, तो वातानुकूलित डिब्बे का क्या लाभ? समकालीन सभ्यता भौतिक शरीर को सुखमय बनाने को लेकर कहीं अधिक चिन्तित है। किसी को जीवन के वास्तविक गन्तव्य की कोई सूचना नहीं है, जो कि भगवान् की ओर लौटना है। हमें मात्र एक सुखमय डिब्बे में बैठे ही नहीं रहना चाहिए; हमें यह देखना चाहिए कि हमारा वाहन अपने वास्तविक गन्तव्य की ओर चल रहा है या नहीं। भौतिक शरीर को सुखमय बनाने में जीवन की प्रमुख आवश्यकता को, जो कि अपनी विस्मृत आध्यात्मिक पहचान को पुनः प्राप्त करना है, भुला देने की कीमत पर कोई परम लाभ नहीं है। मानव-जीवन की नौका इस प्रकार रची गई है कि उसे एक आध्यात्मिक गन्तव्य की ओर अवश्य चलना चाहिए। दुर्भाग्यवश यह शरीर पाँच दृढ़ शृंखलाओं द्वारा सांसारिक चेतना से बँधा हुआ है, जो ये हैं: (1) आध्यात्मिक तथ्यों के अज्ञान के कारण भौतिक शरीर के प्रति आसक्ति, (2) देह-सम्बन्धों के कारण सम्बन्धियों के प्रति आसक्ति, (3) जन्म-भूमि तथा घर, फ़र्नीचर, सम्पदा, सम्पत्ति, व्यवसाय-दस्तावेज़ आदि भौतिक सम्पत्तियों के प्रति आसक्ति, (4) भौतिक विज्ञान के प्रति आसक्ति, जो आध्यात्मिक प्रकाश के अभाव में सदा रहस्यमय बना रहता है, तथा (5) पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अथवा उनके उन भक्तों को, जो उन्हें पवित्र बनाते हैं, जाने बिना धार्मिक रूपों एवं पवित्र अनुष्ठानों के प्रति आसक्ति। ये आसक्तियाँ, जो मानव-शरीर की नौका को बाँध रखती हैं, *भगवद्गीता* के पन्द्रहवें अध्याय में विस्तार से समझाई गई हैं। वहाँ इनकी तुलना एक गहराई तक जड़ें जमाए वट-वृक्ष से की गई है जो पृथ्वी पर अपनी पकड़ निरन्तर बढ़ाता रहता है। ऐसे दृढ़ वट-वृक्ष को उखाड़ना अत्यन्त कठिन है, किन्तु भगवान् निम्नलिखित प्रक्रिया की अनुशंसा करते हैं: \"इस वृक्ष का वास्तविक रूप इस जगत् में अनुभव नहीं किया जा सकता। कोई नहीं समझ सकता कि यह कहाँ समाप्त होता है, कहाँ आरम्भ होता है, अथवा इसका आधार कहाँ है। किन्तु दृढ़ संकल्प के साथ मनुष्य को इस वृक्ष को अनासक्ति के अस्त्र से काट डालना चाहिए। ऐसा करते हुए, मनुष्य को उस स्थान को खोजना चाहिए जहाँ से, एक बार जाकर, कोई कभी नहीं लौटता, और वहाँ उस पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेनी चाहिए जिनसे सब कुछ आरम्भ हुआ है और जिनमें अनादि काल से सब कुछ स्थित है।\" (गीता 15.3–4)\n\nन तो वैज्ञानिक और न ही कल्पनावादी दार्शनिक अब तक ब्रह्माण्डीय स्थिति के विषय में किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। उन्होंने जो किया है वह बस इसके विषय में विभिन्न सिद्धान्त प्रतिपादित करना है। उनमें से कुछ कहते हैं कि भौतिक जगत् वास्तविक है, अन्य कहते हैं कि यह एक स्वप्न है, और फिर अन्य कहते हैं कि यह सदा विद्यमान है। इस प्रकार सांसारिक विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न मत रखे जाते हैं, किन्तु तथ्य यह है कि किसी भी सांसारिक वैज्ञानिक अथवा कल्पनावादी दार्शनिक ने ब्रह्माण्ड का आदि अथवा उसकी सीमाएँ कभी नहीं खोजी हैं। कोई नहीं कह सकता कि यह कब आरम्भ हुआ अथवा यह अन्तरिक्ष में किस प्रकार तैरता है। वे सैद्धान्तिक रूप से गुरुत्वाकर्षण के नियम जैसे कुछ नियम प्रस्तावित करते हैं, किन्तु वास्तव में वे इस नियम को व्यावहारिक उपयोग में नहीं ला सकते। सत्य के वास्तविक ज्ञान के अभाव में, प्रत्येक व्यक्ति किसी प्रकार की ख्याति पाने के लिए अपने ही सिद्धान्त को बढ़ावा देने को व्यग्र है, किन्तु वास्तविक तथ्य यह है कि यह भौतिक जगत् दुःखों से भरा है और कोई भी इस विषय के बारे में कुछ सिद्धान्तों को बढ़ावा देकर मात्र उन पर विजय नहीं पा सकता। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो अपनी सृष्टि की प्रत्येक वस्तु से पूर्णतः अवगत हैं, हमें सूचित करते हैं कि यह हमारे ही सर्वोत्तम हित में है कि हम इस दुःखमय अस्तित्व से बाहर निकलने की इच्छा करें। हमें प्रत्येक भौतिक वस्तु से स्वयं को विरक्त करना चाहिए। एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए, हमारे भौतिक अस्तित्व को शत-प्रतिशत आध्यात्मिक बनाया जाना चाहिए। लोहा अग्नि नहीं है, किन्तु अग्नि के निरन्तर संग से इसे अग्नि में बदला जा सकता है। इसी प्रकार, भौतिक कार्यों से विरक्ति आध्यात्मिक कार्यों द्वारा सम्पादित की जा सकती है, न कि भौतिक जड़ता द्वारा। भौतिक जड़ता भौतिक क्रिया का नकारात्मक पक्ष है, किन्तु आध्यात्मिक क्रिया केवल भौतिक क्रिया का निषेध ही नहीं, अपितु हमारे वास्तविक जीवन का सक्रियण है। हमें नित्य जीवन, अर्थात् ब्रह्म, परम सत्य, में आध्यात्मिक अस्तित्व को खोजने को व्यग्र रहना चाहिए। ब्रह्म के नित्य राज्य का वर्णन *भगवद्गीता* में उस नित्य देश के रूप में किया गया है जहाँ से कोई नहीं लौटता। वही भगवान् का राज्य है।\n\nहमारे वर्तमान भौतिक जीवन का आरम्भ खोजा नहीं जा सकता, और न ही हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि हम भौतिक अस्तित्व में किस प्रकार बद्ध हुए। हमें इस समझ से सन्तुष्ट रहना होगा कि किसी न किसी प्रकार यह भौतिक जीवन अनादि काल से चलता आ रहा है और अब हमारा कर्तव्य है कि हम परम भगवान् की शरण लें, जो समस्त कारणों के आदि-कारण हैं। भगवान् की ओर लौटने की प्रारम्भिक योग्यता *भगवद्गीता* (15.5) में दी गई है: \"जो भ्रम, मिथ्या प्रतिष्ठा एवं मिथ्या संगति से मुक्त है, जो नित्य को समझता है, जो भौतिक काम से निवृत्त है तथा सुख-दुःख के द्वन्द्व से मुक्त है, और जो परम पुरुष की शरण लेना जानता है, वह उस नित्य राज्य को प्राप्त करता है।\"\n\nजो अपनी आध्यात्मिक पहचान के प्रति आश्वस्त है तथा अस्तित्व की भौतिक धारणा से मुक्त है, जो भ्रम से मुक्त है तथा प्रकृति के गुणों से परे है, जो आध्यात्मिक ज्ञान को समझने में निरन्तर संलग्न रहता है तथा जिसने स्वयं को इन्द्रिय-भोग से पूर्णतः विच्छिन्न कर लिया है, वह भगवान् की ओर लौट सकता है। ऐसे व्यक्ति को अमूढ कहा जाता है, मूढ, अर्थात् मूर्ख एवं अज्ञानी, से भिन्न रूप में, क्योंकि वह सुख-दुःख के द्वन्द्व से मुक्त है।\n\nऔर भगवान् के राज्य की प्रकृति क्या है? इसका वर्णन *भगवद्गीता* (15.6) में इस प्रकार किया गया है: \"मेरा वह धाम न सूर्य से, न चन्द्रमा से, और न ही विद्युत् से प्रकाशित होता है। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह इस भौतिक जगत् में कभी नहीं लौटता।\"\n\nयद्यपि सृष्टि का प्रत्येक स्थान भगवान् के राज्य के भीतर है, क्योंकि भगवान् समस्त लोकों के परम स्वामी हैं, फिर भी भगवान् का एक व्यक्तिगत धाम है, जो उस ब्रह्माण्ड से पूर्णतः भिन्न है जिसमें हम अब निवास कर रहे हैं। और इस धाम को परमम्, अर्थात् परम धाम, कहा जाता है। इसी पृथ्वी पर भी ऐसे देश हैं जहाँ जीवन-स्तर ऊँचा है तथा ऐसे देश हैं जहाँ जीवन-स्तर निम्न है। इस पृथ्वी के अतिरिक्त, समस्त ब्रह्माण्ड में फैले अनगिनत अन्य लोक हैं, और कुछ श्रेष्ठ स्थान तथा कुछ निम्न स्थान माने जाते हैं। किसी भी स्थिति में, बाह्य ऊर्जा, भौतिक प्रकृति, के अधिकार-क्षेत्र के भीतर के समस्त लोकों को अपने अस्तित्व के लिए सूर्य की किरणों अथवा अग्नि के प्रकाश की आवश्यकता होती है, क्योंकि भौतिक ब्रह्माण्ड अन्धकार का प्रदेश है। किन्तु इस प्रदेश से परे, एक आध्यात्मिक धाम है, जिसका वर्णन भगवान् की उत्कृष्ट प्रकृति के अधीन कार्य करते हुए के रूप में किया गया है। उस धाम का वर्णन *उपनिषदों* में इस प्रकार किया गया है: \"वहाँ न सूर्य, न चन्द्रमा, न तारों की आवश्यकता है, और न ही वह धाम विद्युत् अथवा अग्नि के किसी रूप से प्रकाशित होता है। ये समस्त भौतिक ब्रह्माण्ड उस आध्यात्मिक प्रकाश के एक प्रतिबिम्ब से प्रकाशित होते हैं, और क्योंकि वह उत्कृष्ट प्रकृति सदा स्वयं-ज्योतिर्मय है, हम रात्रि के सघनतम अन्धकार में भी एक प्रकाश की आभा का अनुभव कर सकते हैं।\" हरिवंश में आध्यात्मिक प्रकृति की व्याख्या स्वयं परम भगवान् द्वारा इस प्रकार की गई है: \"निराकार ब्रह्म [निर्विशेष परम] की देदीप्यमान आभा समस्त अस्तित्वों को, भौतिक तथा आध्यात्मिक, दोनों को, प्रकाशित करती है। किन्तु, हे भारत, तुम्हें यह समझना चाहिए कि यह ब्रह्म-प्रकाश मेरे शरीर की ही आभा है।\" ब्रह्मसंहिता में भी यह निष्कर्ष पुष्ट किया गया है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम उस धाम को अन्तरिक्ष-यान जैसे किसी भौतिक साधन से प्राप्त कर सकते हैं, अपितु हमें निश्चय ही यह जान लेना चाहिए कि जो श्रीकृष्ण के उस आध्यात्मिक धाम को प्राप्त कर सकता है वह नित्य, आध्यात्मिक आनन्द को अविच्छिन्न रूप से भोग सकता है। पतनशील जीवों के रूप में, हमारे अस्तित्व की दो अवस्थाएँ हैं। एक को भौतिक अस्तित्व कहा जाता है, जो जन्म, मृत्यु, जरा एवं रोग के दुःखों से भरा है, तथा दूसरे को आध्यात्मिक अस्तित्व कहा जाता है, जिसमें नित्यता, आनन्द एवं ज्ञान का एक अविरल आध्यात्मिक जीवन होता है। भौतिक अस्तित्व में हम शरीर एवं मन की भौतिक धारणा द्वारा शासित होते हैं, किन्तु आध्यात्मिक अस्तित्व में हम सदा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आनन्दमय, दिव्य सान्निध्य का आस्वादन कर सकते हैं। आध्यात्मिक अस्तित्व में, भगवान् हमसे कभी नहीं छूटते।\n\nकृष्णभावनामृत आन्दोलन उस आध्यात्मिक अस्तित्व को समग्र मानवता तक लाने का प्रयत्न कर रहा है। अपनी वर्तमान भौतिक चेतना में, हम जीवन की ऐन्द्रिक भौतिक धारणा के प्रति आसक्त हैं, किन्तु यह धारणा श्रीकृष्ण की भक्ति, अर्थात् कृष्णभावनामृत, द्वारा तत्काल हटाई जा सकती है। यदि हम भक्ति के सिद्धान्तों को अपनाएँ, तो हम जीवन की भौतिक धारणाओं से परे हो सकते हैं और विविध भौतिक कार्यों के बीच रहते हुए भी सत्त्व, रजस् एवं तमस् के गुणों से मुक्त हो सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति जो भौतिक कार्यों में संलग्न है, बैक टु गॉडहेड तथा इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन के अन्य साहित्य के पृष्ठों से सर्वोच्च लाभ प्राप्त कर सकता है। यह साहित्य समस्त लोगों को भौतिक अस्तित्व के अथक वट-वृक्ष की जड़ें काटने में सहायता करता है। यह साहित्य हमें इस बात का प्रशिक्षण देने के लिए अधिकृत है कि हम जीवन की भौतिक धारणा से सम्बद्ध प्रत्येक वस्तु का त्याग करें तथा प्रत्येक वस्तु में आध्यात्मिक अमृत का आस्वादन करें। यह अवस्था केवल भक्ति द्वारा ही प्राप्य है, अन्य किसी वस्तु द्वारा नहीं। ऐसी सेवा करने से, मनुष्य इसी वर्तमान जीवन में भी तत्काल मुक्ति (मुक्ति) प्राप्त कर सकता है। अधिकांश आध्यात्मिक प्रयास भौतिकता के रंगों से रँगे होते हैं, किन्तु शुद्ध भक्ति समस्त भौतिक कल्मष से परे है। जो लोग भगवान् की ओर लौटना चाहते हैं, उन्हें केवल इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सिद्धान्तों को अपनाना है तथा अपनी चेतना को परम भगवान्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, श्रीकृष्ण के चरण-कमलों पर मात्र केन्द्रित करना है।\n\nकृष्णभावनामृत क्या है?\n\nस्वतन्त्र संवाददाता सैंडी निक्सन के साथ निम्नलिखित साक्षात्कार जुलाई 1975 में, फ़िलाडेल्फ़िया के कृष्ण-केन्द्र में श्रील प्रभुपाद के निवास-स्थान में हुआ था। यह चर्चा कृष्णभावनामृत के एक उत्कृष्ट परिचय के रूप में कार्य करती है और हरे कृष्ण मन्त्र, आध्यात्मिक गुरु एवं भगवान् के बीच सम्बन्ध, सच्चे एवं नक़ली गुरुओं के बीच अन्तर, कृष्णभावनामृत में स्त्रियों की भूमिका, भारतीय जाति-व्यवस्था, तथा ख्रीस्त-भावना एवं कृष्णभावनामृत के बीच सम्बन्ध जैसे मूलभूत विषयों को आवृत्त करती है।\n\nMs. Nixon: मेरा पहला प्रश्न अत्यन्त मूलभूत है। कृष्णभावनामृत क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: कृष्ण का अर्थ है भगवान्। हम सभी उनसे घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं, क्योंकि वे हमारे आदि-पिता हैं। किन्तु हम इस सम्बन्ध को भूल चुके हैं। जब हमें यह जानने में रुचि उत्पन्न होती है कि \"भगवान् के साथ मेरा सम्बन्ध क्या है? जीवन का लक्ष्य क्या है?\", तब हम कृष्णभावनाभावित कहलाते हैं।\n\nMs. Nixon: कृष्णभावनामृत साधक में किस प्रकार विकसित होता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: कृष्णभावनामृत पहले से ही प्रत्येक के हृदय के अन्तर्तम में विद्यमान है। किन्तु अपने भौतिक रूप से बद्ध जीवन के कारण, हम इसे भूल चुके हैं। हरे कृष्ण महामन्त्र—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—का जप करने की प्रक्रिया उस कृष्णभावनामृत को पुनर्जीवित कर देती है जो हमारे पास पहले से ही है। उदाहरणार्थ, कुछ महीने पूर्व इन अमेरिकी तथा यूरोपीय बालक-बालिकाओं को कृष्ण के विषय में ज्ञात नहीं था, किन्तु अभी कल ही हमने देखा कि किस प्रकार वे सम्पूर्ण रथ-यात्रा शोभायात्रा भर [संसार के नगरों में कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा प्रायोजित एक वार्षिक उत्सव] हरे कृष्ण का जप करते तथा भाव-विभोर होकर नृत्य करते रहे। क्या आप सोचती हैं कि वह कृत्रिम था? नहीं। कृत्रिम रूप से, कोई भी घण्टों तक एक साथ जप एवं नृत्य नहीं कर सकता। उन्होंने एक प्रामाणिक प्रक्रिया का अनुसरण करके वास्तव में अपने कृष्णभावनामृत को जागृत किया है। यह *चैतन्य-चरितामृत* (मध्य 22.107) में समझाया गया है।\n\nnitya-siddha kṛṣṇa-prema 'sādhya' kabhu naya\n\nśravaṇādi-śuddha-citte karaye udaya\n\nकृष्णभावनामृत प्रत्येक के हृदय में सुप्त रहता है, और जब कोई भक्तों के सम्पर्क में आता है, तो वह जागृत हो जाता है। कृष्णभावनामृत कृत्रिम नहीं है। जैसे एक युवक किसी युवती के सान्निध्य में उसके प्रति अपना स्वाभाविक आकर्षण जागृत कर लेता है, उसी प्रकार, यदि कोई भक्तों के सान्निध्य में कृष्ण के विषय में सुनता है, तो वह अपने सुप्त कृष्णभावनामृत को जागृत कर लेता है।\n\nMs. Nixon: कृष्णभावनामृत तथा ख्रीस्त-भावना के बीच क्या अन्तर है?\n\nŚrīla Prabhupāda: ख्रीस्त-भावना भी कृष्णभावनामृत ही है, किन्तु क्योंकि इस समय लोग ख्रीस्त-धर्म के नियमों एवं विधि-विधानों—ईसा मसीह की आज्ञाओं—का अनुसरण नहीं करते, अतः वे ईश्वर-भावना के स्तर तक नहीं पहुँचते।\n\nMs. Nixon: समस्त धर्मों में कृष्णभावनामृत की अद्वितीयता क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: मुख्यतः, धर्म का अर्थ है भगवान् को जानना तथा उनसे प्रेम करना। यही धर्म है। आजकल, प्रशिक्षण के अभाव के कारण, कोई भगवान् को नहीं जानता, उनसे प्रेम करने की तो बात ही क्या। लोग मात्र गिरजाघर जाकर तथा यह प्रार्थना करके सन्तुष्ट हो जाते हैं कि \"हे भगवान्, हमें हमारी दैनिक रोटी दीजिए।\" *श्रीमद्भागवत* में इसे एक छली धर्म कहा गया है, क्योंकि इसका लक्ष्य भगवान् को जानना तथा उनसे प्रेम करना नहीं, अपितु किसी व्यक्तिगत लाभ को प्राप्त करना है। दूसरे शब्दों में, यदि मैं किसी धर्म के अनुसरण का दावा करूँ किन्तु यह न जानूँ कि भगवान् कौन हैं अथवा उनसे प्रेम कैसे किया जाए, तो मैं एक छली धर्म का अभ्यास कर रहा हूँ। जहाँ तक ख्रीस्त-धर्म की बात है, भगवान् को समझने का पर्याप्त अवसर दिया गया है, किन्तु कोई उसे ग्रहण नहीं कर रहा। उदाहरणार्थ, बाइबल में यह आज्ञा है कि \"तू हत्या न करना,\" किन्तु ईसाइयों ने संसार के सर्वश्रेष्ठ कसाईख़ाने बना डाले हैं। यदि वे भगवान् ईसा मसीह की आज्ञाओं की अवहेलना करते हैं, तो वे ईश्वर-भावनाभावित कैसे हो सकते हैं? और यह केवल ख्रीस्त-धर्म में ही नहीं, अपितु प्रत्येक धर्म में हो रहा है। \"हिन्दू,\" \"मुसलमान,\" अथवा \"ईसाई\" की उपाधि मात्र एक रबड़ की मुहर है। उनमें से कोई नहीं जानता कि भगवान् कौन हैं तथा उनसे प्रेम कैसे किया जाए।\n\nMs. Nixon: कोई एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को नक़ली से कैसे पहचाने?\n\nŚrīla Prabhupāda: जो कोई यह सिखाए कि भगवान् को कैसे जाना जाए तथा उनसे प्रेम कैसे किया जाए—वही आध्यात्मिक गुरु है। कभी-कभी कूट धूर्त लोगों को भटका देते हैं। वे दावा करते हैं, \"मैं भगवान् हूँ,\" और जो लोग नहीं जानते कि भगवान् क्या हैं, वे उन पर विश्वास कर लेते हैं। यह समझने के लिए कि भगवान् कौन हैं तथा उनसे प्रेम कैसे किया जाए, आपको एक गम्भीर विद्यार्थी होना होगा। अन्यथा, आप मात्र अपना समय व्यर्थ करेंगे। अतः अन्यों एवं हममें यह अन्तर है कि हम ही एकमात्र ऐसा आन्दोलन हैं जो वास्तव में किसी को यह सिखा सकता है कि भगवान् को कैसे जाना जाए तथा उनसे प्रेम कैसे किया जाए। हम यह विज्ञान प्रस्तुत कर रहे हैं कि मनुष्य *भगवद्गीता* तथा *श्रीमद्भागवत* की शिक्षाओं का अभ्यास करके *श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्*, को कैसे जान सकता है। वे हमें सिखाते हैं कि हमारा एकमात्र कार्य भगवान् से प्रेम करना है। हमारा कार्य भगवान् से अपनी आवश्यकताएँ माँगना नहीं है। भगवान् प्रत्येक को आवश्यकताएँ देते हैं—उसे भी जिसका कोई धर्म नहीं। उदाहरणार्थ, बिल्लियों एवं कुत्तों का कोई धर्म नहीं है, फिर भी श्रीकृष्ण उन्हें जीवन की आवश्यकताएँ प्रदान करते हैं। तो हम अपनी दैनिक रोटी के लिए श्रीकृष्ण को कष्ट क्यों दें? वे पहले से ही उसे प्रदान कर रहे हैं। वास्तविक धर्म का अर्थ है यह सीखना कि उनसे प्रेम कैसे किया जाए। *श्रीमद्भागवत* (1.2.6) कहता है,\n\nsa vai puṁsāṁ paro dharmo\n\nyato bhaktir adhokṣaje\n\nahaituky apratihatā\n\nyayātmā suprasīdati\n\nप्रथम-श्रेणी का धर्म मनुष्य को यह सिखाता है कि बिना किसी प्रयोजन के भगवान् से प्रेम कैसे किया जाए। यदि मैं किसी लाभ के लिए भगवान् की सेवा करता हूँ, तो वह व्यवसाय है—प्रेम नहीं। भगवान् का वास्तविक प्रेम अहैतुक्य प्रतिहता है: इसे किसी भौतिक कारण से रोका नहीं जा सकता। यह निरुपाधिक है। यदि कोई वास्तव में भगवान् से प्रेम करना चाहता है, तो कोई बाधा नहीं है। मनुष्य उनसे प्रेम कर सकता है, चाहे वह दरिद्र हो या धनवान्, युवा हो या वृद्ध, श्याम हो या श्वेत।\n\nMs. Nixon: क्या सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। मनुष्यों के चार वर्ग हैं—कर्मी, ज्ञानी, योगी तथा भक्त—और प्रत्येक एक भिन्न लक्ष्य प्राप्त करता है। कर्मी किसी भौतिक लाभ के लिए कार्य करते हैं। उदाहरणार्थ, नगर में, अनेक लोग दिन-रात कठिन परिश्रम करते हैं, और उनका प्रयोजन कुछ धन प्राप्त करना है। इस प्रकार, वे सकाम कर्मी, अर्थात् कर्मी, हैं। ज्ञानी वह व्यक्ति है जो सोचता है, \"मैं इतना कठिन परिश्रम क्यों कर रहा हूँ? पक्षी, मधुमक्खियाँ, हाथी तथा अन्य प्राणी, जिनका कोई पेशा नहीं, फिर भी वे भी भोजन कर रहे हैं। तो मैं अनावश्यक रूप से इतना कठिन परिश्रम क्यों करूँ? इसके बजाय, मुझे जीवन की समस्याओं—जन्म, मृत्यु, जरा एवं रोग—को हल करने का प्रयत्न करने दो।\" ज्ञानी अमर बनने का प्रयत्न करते हैं। वे सोचते हैं कि यदि वे भगवान् के अस्तित्व में लीन हो जाएँ, तो वे जन्म, मृत्यु, जरा एवं रोग से अप्रभावित हो जाएँगे। और योगी किसी अद्भुत प्रदर्शन को प्रकट करने के लिए कुछ योग-शक्ति अर्जित करने का प्रयत्न करते हैं। उदाहरण के लिए, एक योगी अत्यन्त सूक्ष्म बन सकता है: यदि आप उसे एक बन्द कमरे में डाल दें, तो वह किसी छोटे-से स्थान से भी बाहर आ सकता है। इस प्रकार का जादू दिखाकर, योगी तत्काल एक अत्यन्त अद्भुत व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। निस्सन्देह, आधुनिक योगी मात्र कुछ कसरत दिखाते हैं—उनमें कोई वास्तविक शक्ति नहीं है। किन्तु एक वास्तविक योगी में कुछ शक्ति होती है, जो आध्यात्मिक नहीं अपितु भौतिक होती है। अतः योगी योग-शक्ति चाहता है, ज्ञानी जीवन के दुःखों से उद्धार चाहता है, और कर्मी भौतिक लाभ चाहता है। किन्तु भक्त अपने लिए कुछ नहीं चाहता। वह मात्र प्रेमवश भगवान् की सेवा करना चाहता है, जैसे एक माता अपने शिशु की सेवा करती है। माता की अपने शिशु के प्रति सेवा में लाभ का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। शुद्ध स्नेह एवं प्रेमवश, वह उसकी देखभाल करती है।\n\nजब आप भगवान् से प्रेम करने की इस अवस्था में पहुँचते हैं, तो वही पूर्णता है। न कर्मी, न ज्ञानी, और न ही योगी भगवान् को जान सकता है—केवल भक्त ही जान सकता है। जैसा कि श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* (18.55) में कहते हैं, भक्त्या माम् अभिजानाति: \"केवल भक्ति की प्रक्रिया द्वारा ही मनुष्य भगवान् को समझ सकता है।\" श्रीकृष्ण कभी नहीं कहते कि मनुष्य उन्हें अन्य प्रक्रियाओं से समझ सकता है। नहीं। केवल भक्ति द्वारा। यदि आप भगवान् को जानने तथा उनसे प्रेम करने में रुचि रखती हैं, तो आपको भक्ति की प्रक्रिया स्वीकार करनी होगी। अन्य कोई प्रक्रिया आपकी सहायता नहीं करेगी।\n\nMs. Nixon: इस मार्ग पर मनुष्य किस रूपान्तरण से गुज़रता है...\n\nŚrīla Prabhupāda: कोई रूपान्तरण नहीं—आपकी मूल चेतना ही कृष्णभावनामृत है। अभी आपकी चेतना इतने कूड़े-कचरे से ढकी हुई है। आपको इसे स्वच्छ करना है, और तब—कृष्णभावनामृत। हमारी चेतना जल के समान है। जल स्वभाव से स्वच्छ एवं पारदर्शी होता है, किन्तु कभी-कभी वह गँदला हो जाता है। यदि आप जल से समस्त कीचड़ छान दें, तो वह पुनः अपनी मूल स्वच्छ, पारदर्शी अवस्था में आ जाता है।\n\nMs. Nixon: क्या कृष्णभावनाभावित बनकर मनुष्य समाज में बेहतर ढंग से कार्य कर सकता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, आप देख सकती हैं कि मेरे शिष्य न तो मद्यप हैं और न मांसाहारी, और शरीर-क्रिया-विज्ञान की दृष्टि से वे अत्यन्त स्वच्छ हैं—उन पर गम्भीर रोगों का आक्रमण कभी नहीं होगा। वस्तुतः, मांसाहार त्यागना कृष्णभावनामृत का नहीं, अपितु सभ्य मानव-जीवन का प्रश्न है। भगवान् ने मानव-समाज को खाने के लिए इतनी सारी वस्तुएँ दी हैं—सुन्दर फल, सब्ज़ियाँ, अन्न, तथा प्रथम-श्रेणी का दूध। दूध से मनुष्य सैकड़ों पौष्टिक भोजन बना सकता है, किन्तु कोई इस कला को नहीं जानता। इसके बजाय, लोग बड़े-बड़े कसाईख़ाने चलाते हैं और मांस खाते हैं। वे सभ्य भी नहीं हैं। जब मनुष्य असभ्य होता है, तो वह निरीह पशुओं की हत्या करता है और उन्हें खाता है।\n\nसभ्य मनुष्य दूध से पौष्टिक भोजन बनाने की कला जानते हैं। उदाहरणार्थ, पश्चिमी वर्जीनिया में हमारे न्यू वृन्दावन फ़ार्म पर, हम दूध से सैकड़ों प्रथम-श्रेणी के व्यंजन बनाते हैं। जब भी आगन्तुक आते हैं, वे विस्मित हो जाते हैं कि दूध से ऐसे सुन्दर भोजन बनाए जा सकते हैं। गाय का रक्त अत्यन्त पौष्टिक है, किन्तु सभ्य मनुष्य उसका उपयोग दूध के रूप में करते हैं। दूध गाय के रक्त के रूपान्तरित रूप के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आप दूध को इतनी सारी वस्तुओं में बदल सकते हैं—दही, छेना, घी (परिष्कृत मक्खन) आदि—और इन दुग्ध-उत्पादों को अन्न, फलों एवं सब्ज़ियों के साथ मिलाकर, आप सैकड़ों व्यंजन बना सकते हैं। यही सभ्य जीवन है—किसी पशु को सीधे मारकर उसका मांस खाना नहीं। निरीह गाय मात्र भगवान् द्वारा दी गई घास खाती है और दूध प्रदान करती है, जिस पर आप जीवित रह सकते हैं। क्या आप सोचती हैं कि गाय का गला काटकर उसका मांस खाना सभ्यता है?\n\nMs. Nixon: नहीं, मैं शत-प्रतिशत आपसे सहमत हूँ।... एक बात के विषय में मुझे बड़ी जिज्ञासा है: क्या *वेदों* को शाब्दिक रूप से ही नहीं, अपितु प्रतीकात्मक रूप से भी लिया जा सकता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। उन्हें जैसा है वैसा ही लिया जाना चाहिए, प्रतीकात्मक रूप से नहीं। इसीलिए हम *भगवद्गीता यथारूप* प्रस्तुत कर रहे हैं।\n\nMs. Nixon: क्या आप पश्चिम में प्राचीन भारतीय जाति-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न कर रहे हैं? *गीता* में जाति-व्यवस्था का उल्लेख है...\n\nŚrīla Prabhupāda: *भगवद्गीता* में जाति-व्यवस्था का उल्लेख कहाँ है? श्रीकृष्ण कहते हैं, चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः: \"मैंने मनुष्यों के गुण एवं कर्म के अनुसार चार विभागों की सृष्टि की।\" (गीता 4.13) उदाहरणार्थ, आप यह समझ सकती हैं कि समाज में अभियन्ता भी होते हैं तथा चिकित्सक भी। क्या आप कहती हैं कि वे भिन्न-भिन्न जातियों के हैं—कि एक अभियन्ता-जाति में है और दूसरा चिकित्सक-जाति में? नहीं। यदि किसी मनुष्य ने चिकित्सा-विद्यालय में योग्यता अर्जित कर ली है, तो आप उसे चिकित्सक के रूप में स्वीकार करती हैं; और यदि किसी अन्य मनुष्य के पास अभियान्त्रिकी की उपाधि है, तो आप उसे अभियन्ता के रूप में स्वीकार करती हैं। इसी प्रकार, *भगवद्गीता* समाज में मनुष्यों के चार वर्ग परिभाषित करती है: अत्यन्त बुद्धिमान् मनुष्यों का एक वर्ग, प्रशासकों का एक वर्ग, उत्पादक मनुष्यों का एक वर्ग, तथा साधारण श्रमिक। ये विभाग स्वाभाविक हैं। उदाहरणार्थ, मनुष्यों का एक वर्ग अत्यन्त बुद्धिमान् है। किन्तु *भगवद्गीता* में वर्णित प्रथम-श्रेणी के मनुष्यों की योग्यताओं पर वास्तव में खरे उतरने के लिए, उन्हें प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है, ठीक जैसे एक बुद्धिमान् बालक को योग्य चिकित्सक बनने के लिए महाविद्यालय में प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अतः कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हम बुद्धिमान् मनुष्यों को प्रशिक्षित कर रहे हैं कि वे अपने मन को कैसे नियन्त्रित करें, अपनी इन्द्रियों को कैसे नियन्त्रित करें, सत्यवादी कैसे बनें, भीतर एवं बाहर से स्वच्छ कैसे बनें, बुद्धिमान् कैसे बनें, अपने ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में कैसे प्रयुक्त करें, तथा ईश्वर-भावनाभावित कैसे बनें। इन सभी बालकों [आसीन शिष्यों की ओर संकेत करते हुए] में प्रथम-श्रेणी की बुद्धि है, और अब हम उन्हें इसका समुचित उपयोग करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं।\n\nहम जाति-व्यवस्था का प्रवर्तन नहीं कर रहे, जिसमें ब्राह्मण-परिवार में जन्मा कोई भी धूर्त स्वतः ब्राह्मण बन जाता है। उसमें भले ही पाँचवें-श्रेणी के मनुष्य की आदतें हों, फिर भी ब्राह्मण-परिवार में जन्म के कारण उसे प्रथम-श्रेणी का स्वीकार कर लिया जाता है। हम इसे स्वीकार नहीं करते। हम उस मनुष्य को प्रथम-श्रेणी का मानते हैं जो ब्राह्मण के रूप में प्रशिक्षित है। चाहे वह भारतीय हो, यूरोपीय हो, अथवा अमेरिकी; नीच-कुल का हो या उच्च-कुल का—इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। किसी भी बुद्धिमान् मनुष्य को प्रथम-श्रेणी की आदतें अपनाने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। हम इस निरर्थक धारणा को रोकना चाहते हैं कि हम अपने शिष्यों पर भारतीय जाति-व्यवस्था थोप रहे हैं। हम तो मात्र प्रथम-श्रेणी की बुद्धि वाले मनुष्यों को चुन रहे हैं और उन्हें प्रत्येक दृष्टि से प्रथम-श्रेणी का बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं।\n\nMs. Nixon: स्त्री-स्वतन्त्रता के विषय में आपका क्या विचार है?\n\nŚrīla Prabhupāda: स्त्रियों के लिए तथाकथित समान अधिकारों का अर्थ यह है कि पुरुष स्त्रियों को छलते हैं। मान लीजिए कोई स्त्री एवं कोई पुरुष मिलते हैं, वे प्रेमी बन जाते हैं, उनमें यौन-सम्बन्ध बनता है, स्त्री गर्भवती हो जाती है, और पुरुष चला जाता है। स्त्री को शिशु का भार उठाना पड़ता है तथा सरकार से भिक्षा माँगनी पड़ती है, अन्यथा वह गर्भपात कराकर शिशु को मार डालती है। यही स्त्री की स्वतन्त्रता है। भारत में, यद्यपि कोई स्त्री दरिद्रता से ग्रस्त हो सकती है, फिर भी वह अपने पति की देखरेख में रहती है, और वह उसका उत्तरदायित्व लेता है। जब वह गर्भवती होती है, तो उसे शिशु को मारने अथवा भिक्षा माँगकर उसका पालन करने को विवश नहीं किया जाता। तो वास्तविक स्वतन्त्रता कौन-सी है—पति की देखरेख में रहना, अथवा प्रत्येक के द्वारा भोगा जाना?\n\nMs. Nixon: और आध्यात्मिक जीवन में—क्या स्त्रियाँ भी कृष्णभावनामृत में सफल हो सकती हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हम लिंग के आधार पर कोई भेद नहीं करते। हम कृष्णभावनामृत स्त्रियों एवं पुरुषों, दोनों को समान रूप से देते हैं। हम स्त्रियों, पुरुषों, दरिद्रों, धनवानों—सभी का स्वागत करते हैं। श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* (5.18) में कहते हैं:\n\nvidyā-vinaya-sampanne\n\nbrāhmaṇe ga vi hastini\n\nśuni caiva śvapāke ca\n\npaṇḍitāḥ sama-darśinaḥ\n\n\"विनम्र ऋषि, सच्चे ज्ञान के बल पर, एक विद्वान् एवं सौम्य ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ते, तथा एक कुत्ता-भक्षी (चाण्डाल) को समान दृष्टि से देखता है।\"\n\nMs. Nixon: क्या आप हरे कृष्ण मन्त्र का अर्थ समझा सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: यह अत्यन्त सरल है। हरे का अर्थ है, \"हे भगवान् की ऊर्जा,\" और कृष्ण का अर्थ है, \"हे भगवान् श्रीकृष्ण।\" जैसे भौतिक जगत् में नर एवं नारी होते हैं, उसी प्रकार, भगवान् आदि-पुरुष (पुरुष) हैं, और उनकी ऊर्जा (प्रकृति) आदि-नारी है। अतः, जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं, तो हम कहते हैं, \"हे भगवान् श्रीकृष्ण, हे कृष्ण की ऊर्जा, कृपया मुझे अपनी सेवा में संलग्न कीजिए।\"\n\nMs. Nixon: क्या आप कृपया मुझे अपने जीवन के विषय में कुछ बता सकते हैं और यह कि आपको कैसे ज्ञात हुआ कि आप कृष्णभावनामृत आन्दोलन के आध्यात्मिक गुरु हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: मेरा जीवन सरल है। मैं पत्नी एवं सन्तानों के साथ एक गृहस्थ था—अब मेरे पौत्र हैं—जब मेरे आध्यात्मिक गुरु ने मुझे पश्चिमी देशों में जाकर कृष्णभावनामृत के मत का प्रचार करने का आदेश दिया। अतः मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश पर सब कुछ छोड़ दिया, और अब मैं उनके आदेश तथा श्रीकृष्ण के आदेशों को निष्पादित करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।\n\nMs. Nixon: जब उन्होंने आपसे पश्चिम जाने को कहा, तब आपकी आयु कितनी थी?\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारी पहली भेंट पर ही, उन्होंने मुझे पश्चिम में कृष्णभावनामृत का प्रचार करने का आदेश दिया। मैं तब पच्चीस वर्ष का था, दो सन्तानों वाला एक विवाहित व्यक्ति। मैंने उनके आदेशों का पालन करने का यथासम्भव प्रयत्न किया और सन् 1944 में, जब मैं अभी गृहस्थ-जीवन में ही था, बैक टु गॉडहेड पत्रिका का प्रबन्धन आरम्भ किया। मैंने सन् 1959 में पारिवारिक जीवन से निवृत्त होकर पुस्तकें लिखना आरम्भ किया, और सन् 1965 में मैं संयुक्त राज्य अमेरिका आया।\n\nMs. Nixon: आपने कहा है कि आप भगवान् नहीं हैं, फिर भी एक बाहरी व्यक्ति के रूप में मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपके भक्त आपके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो आप भगवान् हों।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यही उनका कर्तव्य है। क्योंकि आध्यात्मिक गुरु भगवान् के आदेश को निष्पादित कर रहे हैं, अतः उनका उतना ही सम्मान होना चाहिए जितना भगवान् का, ठीक जैसे एक सरकारी अधिकारी का उतना ही सम्मान होना चाहिए जितना सरकार का, क्योंकि वह सरकार के आदेश को निष्पादित करता है। यदि एक साधारण आरक्षी (पुलिसमैन) भी आए, तो आपको उसका सम्मान करना होता है क्योंकि वह एक सरकारी व्यक्ति है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह सरकार है। साक्षाद्धरित्वेन समस्त-शास्त्रैर्/ उक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः: \"आध्यात्मिक गुरु का उतना ही सम्मान किया जाना चाहिए जितना परम भगवान् का, क्योंकि वे भगवान् के सर्वाधिक विश्वस्त सेवक हैं। यह समस्त प्रकट शास्त्रों में स्वीकार किया गया है तथा समस्त अधिकारियों द्वारा अनुसरित है।\"\n\nMs. Nixon: मुझे उन अनेक सुन्दर भौतिक वस्तुओं के विषय में भी आश्चर्य होता है जो भक्त आपके लिए लाते हैं। उदाहरणार्थ, आप विमानस्थल से एक सुन्दर, भव्य कार में आए। मुझे इस पर आश्चर्य होता है क्योंकि...\n\nŚrīla Prabhupāda: यह शिष्यों को सिखाता है कि आध्यात्मिक गुरु को भगवान् के तुल्य कैसे माना जाए। यदि आप सरकारी प्रतिनिधि का उतना ही सम्मान करते हैं जितना सरकार का, तो आपको उसके साथ ऐश्वर्यपूर्ण व्यवहार करना होगा। यदि आप आध्यात्मिक गुरु का उतना ही सम्मान करते हैं जितना भगवान् का, तो आपको उन्हें वही सुविधाएँ अर्पित करनी होंगी जो आप भगवान् को अर्पित करेंगे। भगवान् एक स्वर्णिम रथ में यात्रा करते हैं। यदि शिष्य आध्यात्मिक गुरु को एक साधारण मोटरकार अर्पित करें, तो वह पर्याप्त नहीं होगी, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु के साथ भगवान् के तुल्य व्यवहार करना होता है। यदि भगवान् आपके घर आएँ, तो क्या आप उनके लिए एक साधारण मोटरकार लाएँगी—अथवा एक स्वर्णिम रथ की व्यवस्था करेंगी?\n\nMs. Nixon: एक बाहरी व्यक्ति के लिए कृष्णभावनामृत के सर्वाधिक कठिन पक्षों में से एक मन्दिर में अर्चाविग्रह को स्वीकार करना है—कि वह किस प्रकार श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है। क्या आप इस विषय में थोड़ा बता सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। इस समय, क्योंकि आपको श्रीकृष्ण को देखने का प्रशिक्षण नहीं मिला है, अतः वे कृपापूर्वक आपके सम्मुख प्रकट होते हैं ताकि आप उन्हें देख सकें। आप काठ एवं पत्थर देख सकती हैं, किन्तु जो आध्यात्मिक है उसे आप नहीं देख सकतीं। मान लीजिए आपके पिता अस्पताल में हैं, और उनका देहान्त हो जाता है। आप उनके शय्या के पास रोती हैं, \"अब मेरे पिता चले गए!\" किन्तु आप यह क्यों कहती हैं कि वे चले गए? वह कौन-सी वस्तु है जो चली गई?\n\nMs. Nixon: ख़ैर, उनकी आत्मा चली गई।\n\nŚrīla Prabhupāda: और क्या आपने उस आत्मा को देखा है?\n\nMs. Nixon: नहीं।\n\nŚrīla Prabhupāda: तो आप आत्मा को नहीं देख सकतीं, और भगवान् परम आत्मा हैं। वस्तुतः, वे ही सब कुछ हैं—आत्मा एवं पदार्थ—किन्तु आप उन्हें उनकी आध्यात्मिक पहचान में नहीं देख सकतीं। अतएव, आपके प्रति दया दिखाने के लिए, वे अपनी असीम कृपा से एक काठ अथवा पत्थर के अर्चाविग्रह के रूप में प्रकट होते हैं ताकि आप उन्हें देख सकें।\n\nMs. Nixon: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण!\n\nभगवान् की एक परिभाषा\n\nभगवान् के विषय में आधुनिक मनुष्य की धारणाएँ अनेक एवं विविध हैं। बच्चे प्रायः श्वेत दाढ़ी वाले एक वृद्ध पुरुष की कल्पना करते हैं। अनेक प्रौढ़ भगवान् को एक अदृश्य शक्ति, अथवा एक मानसिक धारणा, अथवा समस्त मानवता, ब्रह्माण्ड, या यहाँ तक कि स्वयं के रूप में मानते हैं। इस प्रवचन में, श्रील प्रभुपाद कृष्णभावनामृत की धारणा का विस्तार से वर्णन करते हैं—भगवान् का एक आश्चर्यजनक रूप से अन्तरंग दृष्टिकोण।\n\nदेवियो एवं सज्जनो, मैं इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में कृपापूर्वक भाग लेने के लिए आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ। जब इस संघ का पंजीकरण सन् 1966 में न्यूयॉर्क में हुआ, तो एक मित्र ने सुझाव दिया कि इसका नाम ईश्वर-भावना संघ रखा जाए। उसने सोचा कि कृष्ण नाम साम्प्रदायिक था। शब्दकोश भी कहता है कि कृष्ण एक हिन्दू देवता का नाम है। किन्तु वास्तविकता में, यदि भगवान् को कोई भी नाम दिया जा सकता है, तो वह \"कृष्ण\" है।\n\nवस्तुतः भगवान् का कोई विशेष नाम नहीं है। यह कहकर कि उनका कोई नाम नहीं है, हमारा अभिप्राय यह है कि कोई नहीं जानता कि उनके कितने नाम हैं। चूँकि भगवान् असीम हैं, अतः उनके नाम भी असीम होने चाहिए। अतएव हम किसी एक नाम पर स्थिर नहीं हो सकते। उदाहरणार्थ, कृष्ण को कभी-कभी यशोदा-नन्दन कहा जाता है, अर्थात् माता यशोदा के पुत्र; अथवा देवकी-नन्दन, देवकी के पुत्र; अथवा वसुदेव-नन्दन, वसुदेव के पुत्र; अथवा नन्द-नन्दन, नन्द के पुत्र। कभी-कभी उन्हें पार्थ-सारथि कहा जाता है, जो यह इंगित करता है कि उन्होंने अर्जुन के सारथि के रूप में कार्य किया, जिन्हें कभी-कभी पार्थ, पृथा के पुत्र, कहा जाता है।\n\nभगवान् के अपने अनेक भक्तों के साथ अनेक व्यवहार होते हैं, और उन व्यवहारों के अनुसार, उन्हें कुछ नामों से पुकारा जाता है। चूँकि उनके अनगिनत भक्त हैं तथा उनके साथ अनगिनत सम्बन्ध हैं, अतः उनके अनगिनत नाम भी हैं। हम किसी एक नाम पर नहीं पहुँच सकते। किन्तु कृष्ण नाम का अर्थ है \"सर्व-आकर्षक।\" भगवान् प्रत्येक को आकर्षित करते हैं; यही भगवान् की परिभाषा है। हमने कृष्ण के अनेक चित्र देखे हैं, और हम देखते हैं कि वे वृन्दावन में गायों, बछड़ों, पक्षियों, पशुओं, वृक्षों, पौधों, और यहाँ तक कि जल को भी आकर्षित करते हैं। वे गोप-बालकों को, गोपियों को, नन्द महाराज को, पाण्डवों को, तथा समस्त मानव-समाज को आकर्षक हैं। अतएव यदि भगवान् को कोई विशेष नाम दिया जा सकता है, तो वह नाम \"कृष्ण\" है।\n\nपराशर मुनि, एक महान् ऋषि तथा व्यासदेव के पिता, जिन्होंने समस्त वैदिक वाङ्मय का संकलन किया, ने भगवान् की निम्नलिखित परिभाषा दी:\n\naiśvaryasya samagrasya\n\nvīryasya yaśasaḥ śriyaḥ\n\njñāna-vairāgyayoś caiva\n\nsaṇṇāṁ bhaga itiṅgana\n\n(*विष्णु पुराण* 6.5.47)\n\nभगवान्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, को इस प्रकार पराशर मुनि द्वारा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो छह ऐश्वर्यों में पूर्ण है—जिनमें पूर्ण बल, यश, धन, ज्ञान, सौन्दर्य तथा वैराग्य है।\n\nभगवान्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, समस्त धन-सम्पदा के स्वामी हैं। संसार में अनेक धनवान् मनुष्य हैं, किन्तु कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसके पास समस्त धन है। और न ही कोई यह दावा कर सकता है कि उससे अधिक धनवान् कोई नहीं है। किन्तु हम *श्रीमद्भागवत* से यह समझते हैं कि जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर उपस्थित थे तब उनकी 16,108 पत्नियाँ थीं, और प्रत्येक पत्नी संगमरमर से बने तथा रत्नों से जड़ित एक भवन में रहती थी। कक्ष हाथीदाँत एवं स्वर्ण के फ़र्नीचर से भरे थे, और प्रत्येक स्थान पर महान् ऐश्वर्य था। इन समस्त वर्णनों का *श्रीमद्भागवत* में सजीव रूप से वर्णन किया गया है। मानव-समाज के इतिहास में हम ऐसे किसी को नहीं पा सकते जिसकी सोलह हज़ार पत्नियाँ अथवा सोलह हज़ार भवन रहे हों। और न ही श्रीकृष्ण एक दिन एक पत्नी के पास तथा दूसरे दिन दूसरी पत्नी के पास जाते थे। नहीं, वे एक ही समय में प्रत्येक भवन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहते थे। इसका अर्थ है कि उन्होंने स्वयं को 16,108 रूपों में विस्तारित किया। यह एक साधारण मनुष्य के लिए असम्भव है, किन्तु भगवान् के लिए यह अति कठिन नहीं है। यदि भगवान् असीम हैं, तो वे स्वयं को असीम रूपों में विस्तारित कर सकते हैं, अन्यथा असीम शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं; वे न केवल सोलह हज़ार पत्नियों का, अपितु एक करोड़ साठ लाख पत्नियों का भी पालन कर सकते हैं और फिर भी कोई कठिनाई अनुभव नहीं करते, अन्यथा सर्वशक्तिमान् शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता।\n\nये सभी आकर्षक लक्षण हैं। हम इस भौतिक जगत् में अनुभव करते हैं कि यदि कोई मनुष्य अत्यन्त धनवान् है, तो वह आकर्षक होता है। उदाहरणार्थ, अमेरिका में, रॉकफ़ेलर तथा फ़ोर्ड अपनी सम्पदा के कारण अत्यन्त आकर्षक हैं। वे आकर्षक हैं यद्यपि उनके पास संसार की समस्त सम्पदा नहीं है। तो फिर भगवान्, जो समस्त धन-सम्पदा के स्वामी हैं, कितने अधिक आकर्षक होंगे।\n\nइसी प्रकार, श्रीकृष्ण में असीम बल है। उनका बल उनके जन्म के क्षण से ही विद्यमान था। जब श्रीकृष्ण मात्र तीन मास के थे, तब पूतना असुर ने उन्हें मारने का प्रयत्न किया, किन्तु इसके बजाय वह श्रीकृष्ण द्वारा मारी गई। यही भगवान् हैं। भगवान् आरम्भ से ही भगवान् हैं। वे किसी ध्यान अथवा योग-शक्ति से भगवान् नहीं बनते। श्रीकृष्ण उस प्रकार के भगवान् नहीं हैं। श्रीकृष्ण अपने आविर्भाव के आरम्भ से ही भगवान् थे।\n\nश्रीकृष्ण का यश भी असीम है। निस्सन्देह, हम श्रीकृष्ण के भक्त हैं और उन्हें जानते एवं उनका गुणगान करते हैं, किन्तु हमारे अतिरिक्त, संसार में अनेक करोड़ लोग *भगवद्गीता* के यश से अवगत हैं। संसार भर के समस्त देशों में दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा धर्मवेत्ता *भगवद्गीता* को पढ़ते हैं। हम अपनी *भगवद्गीता यथारूप* की भी अत्यन्त अच्छी बिक्री पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि यह वस्तु शुद्ध स्वर्ण है। *भगवद्गीता* के अनेक संस्करण हैं, किन्तु वे शुद्ध नहीं हैं। हमारा अधिक बिक रहा है क्योंकि हम *भगवद्गीता* को जैसी है वैसी ही प्रस्तुत कर रहे हैं। *भगवद्गीता* का यश श्रीकृष्ण का ही यश है।\n\nसौन्दर्य, एक और ऐश्वर्य, श्रीकृष्ण में असीम रूप से विद्यमान है। श्रीकृष्ण स्वयं अत्यन्त सुन्दर हैं, जैसे उनके समस्त पार्षद हैं। जो लोग पूर्व जन्म में पुण्यवान् थे, उन्हें इस भौतिक जगत् में उत्तम परिवारों एवं उत्तम राष्ट्रों में जन्म लेने का अवसर मिलता है। अमेरिकी जन अत्यन्त धनवान् एवं सुन्दर हैं, और ये ऐश्वर्य पुण्य-कर्मों का परिणाम हैं। संसार भर में लोग अमेरिकियों की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि वे वैज्ञानिक ज्ञान, धन, सौन्दर्य आदि में उन्नत हैं। यह ग्रह ब्रह्माण्ड के भीतर एक तुच्छ ग्रह है, फिर भी इस ग्रह के भीतर, एक देश—अमेरिका—में इतने सारे आकर्षक लक्षण हैं। तो हम मात्र कल्पना कर सकते हैं कि भगवान्, जो सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण के स्रष्टा हैं, में कितने आकर्षक लक्षण होंगे। वे कितने सुन्दर होंगे—वे जिन्होंने समस्त सौन्दर्य की सृष्टि की।\n\nकोई व्यक्ति न केवल अपने सौन्दर्य के कारण, अपितु अपने ज्ञान के कारण भी आकर्षक होता है। एक वैज्ञानिक अथवा दार्शनिक अपने ज्ञान के कारण आकर्षक हो सकता है, किन्तु उस ज्ञान से अधिक उदात्त कौन-सा ज्ञान है जो श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* में दिया है? संसार में ऐसे ज्ञान की कोई तुलना नहीं है। साथ ही, श्रीकृष्ण में पूर्ण वैराग्य (वैराग्य) विद्यमान है। इस भौतिक जगत् में श्रीकृष्ण के निर्देशन में इतनी सारी वस्तुएँ कार्य कर रही हैं, किन्तु वास्तव में श्रीकृष्ण यहाँ उपस्थित नहीं हैं। एक बड़ा कारख़ाना चलता रह सकता है, यद्यपि स्वामी उपस्थित न हो। इसी प्रकार, श्रीकृष्ण की शक्तियाँ उनके सहायकों, देवताओं, के निर्देशन में कार्य कर रही हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं भौतिक जगत् से विरक्त हैं। यह सब प्रकट शास्त्रों में वर्णित है।\n\nअतएव, भगवान् के अपने कार्यों के अनुसार अनेक नाम हैं, किन्तु क्योंकि वे इतने सारे ऐश्वर्य धारण करते हैं, और क्योंकि इन ऐश्वर्यों से वे प्रत्येक को आकर्षित करते हैं, अतः वे कृष्ण कहलाते हैं। वैदिक वाङ्मय यह दृढ़ता से कहता है कि भगवान् के अनेक नाम हैं, किन्तु \"कृष्ण\" प्रमुख नाम है।\n\nइस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का उद्देश्य भगवान् के नाम, भगवान् के गुणगान, भगवान् के कार्यों, भगवान् के सौन्दर्य, तथा भगवान् के प्रेम का प्रसार करना है। इस भौतिक जगत् में अनेक वस्तुएँ हैं, और वे सभी श्रीकृष्ण के भीतर हैं। इस भौतिक जगत् का सर्वाधिक प्रमुख लक्षण यौनाकर्षण है, और वह भी श्रीकृष्ण में विद्यमान है। हम राधा एवं कृष्ण की आराधना करते हैं, और उनके बीच आकर्षण है, किन्तु भौतिक आकर्षण एवं आध्यात्मिक आकर्षण समान नहीं हैं। श्रीकृष्ण में यौनाकर्षण वास्तविक है, किन्तु यहाँ भौतिक जगत् में वह अवास्तविक है। प्रत्येक वस्तु जिससे हम यहाँ व्यवहार करते हैं, आध्यात्मिक जगत् में विद्यमान है, किन्तु यहाँ उसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। यह मात्र एक प्रतिबिम्ब है। दुकानों की खिड़कियों में हम अनेक पुतले देखते हैं, किन्तु कोई उनकी परवाह नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक जानता है कि वे मिथ्या हैं। एक पुतला अत्यन्त सुन्दर हो सकता है, किन्तु फिर भी वह मिथ्या है। किन्तु जब लोग एक सुन्दर स्त्री को देखते हैं, तो वे आकर्षित होते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वह वास्तविक है। वास्तविकता में, तथाकथित जीवित भी मृत ही हैं, क्योंकि यह शरीर मात्र पदार्थ का एक पिण्ड है; ज्यों ही आत्मा शरीर को छोड़ देती है, कोई भी स्त्री के उस तथाकथित सुन्दर शरीर को देखने की परवाह नहीं करेगा। वास्तविक कारक, वास्तविक आकर्षक शक्ति, आध्यात्मिक आत्मा है।\n\nभौतिक जगत् में प्रत्येक वस्तु मृत पदार्थ से बनी है; अतएव यह मात्र एक अनुकृति है। वस्तुओं की वास्तविकता आध्यात्मिक जगत् में विद्यमान है। जिन्होंने *भगवद्गीता* पढ़ी है, वे समझ सकते हैं कि आध्यात्मिक जगत् कैसा है, क्योंकि वहाँ उसका वर्णन इस प्रकार किया गया है:\n\nparas tasmāt tu bhāvo 'nyo\n\n'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ\n\nyaḥ sa sarveṣu bhūteṣu\n\nnaśyatsu na vinaśyati\n\n\"किन्तु एक और प्रकृति है, जो नित्य है तथा इस व्यक्त एवं अव्यक्त पदार्थ से परे, दिव्य है। वह परम है तथा कभी विनष्ट नहीं होती। जब इस जगत् में सब कुछ विनष्ट हो जाता है, तब भी वह अंश ज्यों-का-त्यों बना रहता है।\" (*Bhagavad-gītā* 8.20)\n\nवैज्ञानिक इस भौतिक जगत् की लम्बाई एवं चौड़ाई की गणना करने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु वे आरम्भ ही नहीं कर पाते। निकटतम तारे तक मात्र यात्रा करने में ही उन्हें सहस्रों वर्ष लग जाएँगे। फिर आध्यात्मिक जगत् की तो बात ही क्या? जब हम भौतिक जगत् को ही नहीं जान सकते, तो उससे परे जो है उसे कैसे जान सकते हैं? तात्पर्य यह है कि हमें प्रामाणिक स्रोतों से ही जानना होगा।\n\nसर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत श्रीकृष्ण हैं, क्योंकि वे समस्त ज्ञान के आगार हैं। श्रीकृष्ण से अधिक बुद्धिमान् अथवा ज्ञानवान् कोई नहीं है। श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि इस भौतिक जगत् से परे एक आध्यात्मिक आकाश है, जो असंख्य लोकों से भरा हुआ है। वह आकाश भौतिक अन्तरिक्ष से कहीं अधिक, कहीं अधिक विशाल है, जो सम्पूर्ण सृष्टि का मात्र एक-चौथाई भाग है। इसी प्रकार, भौतिक जगत् के भीतर के जीव समस्त सृष्टि के जीवों का एक लघु अंश मात्र हैं। इस भौतिक जगत् की तुलना एक कारागार से की जाती है, और जिस प्रकार बन्दी कुल जनसंख्या का एक अल्प प्रतिशत मात्र होते हैं, उसी प्रकार भौतिक जगत् के भीतर के जीव समस्त जीवों का एक खण्डिक अंश मात्र हैं।\n\nजिन्होंने ईश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया है—जो अपराधी हैं—उन्हें इस भौतिक जगत् में रखा जाता है। कभी-कभी अपराधी कहते हैं कि वे सरकार की परवाह नहीं करते, तथापि उन्हें बन्दी बनाया जाता है तथा दण्ड दिया जाता है। इसी प्रकार, जो जीव ईश्वर के प्रति अपनी अवज्ञा घोषित करते हैं, उन्हें भौतिक जगत् में रखा जाता है।\n\nमूलतः समस्त जीव ईश्वर के अंश हैं तथा उनसे ठीक वैसे ही सम्बन्धित हैं जैसे पुत्र अपने पिता से सम्बन्धित होते हैं। ईसाई भी ईश्वर को परम पिता मानते हैं। ईसाई गिरजाघर जाते हैं तथा प्रार्थना करते हैं, \"हे हमारे पिता, जो स्वर्ग में हो।\" ईश्वर को पिता मानने की धारणा *Bhagavad-gītā* (14.4) में भी है:\n\nsarva-yoniṣu kaunteya\n\nmūrtayaḥ sambhavanti yāḥ\n\ntāsāṁ brahma mahad yonir\n\nahaṁ bīja-pradaḥ pitā\n\n\"हे कुन्तीपुत्र, यह समझ लेना चाहिए कि जीवन की समस्त योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव होती हैं, और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।\"\n\nजीवन की 84,00,000 योनियाँ हैं—जिनमें जलचर, वनस्पति, पक्षी, पशु, कीट तथा मनुष्य सम्मिलित हैं। मानव योनि में अधिकांश असभ्य हैं, और थोड़ी-सी सभ्य योनियों में से भी मनुष्यों की एक अल्प संख्या ही धार्मिक जीवन को अपनाती है। अनेक तथाकथित धर्मनिष्ठों में से अधिकांश स्वयं को उपाधियों से पहचानते हैं, यह दावा करते हुए, \"मैं हिन्दू हूँ,\" \"मैं मुसलमान हूँ,\" \"मैं ईसाई हूँ,\" इत्यादि। कुछ परोपकार-कार्य में संलग्न होते हैं, कुछ निर्धनों को दान देते हैं, तथा विद्यालय एवं अस्पताल खोलते हैं। इस परोपकारी प्रक्रिया को कर्म-काण्ड कहते हैं। ऐसे लाखों कर्म-काण्डियों में से एक ज्ञानी (\"जो जानता है\") हो सकता है। लाखों ज्ञानियों में से एक मुक्त हो सकता है, और अरबों मुक्त आत्माओं में से एक श्रीकृष्ण को समझने में समर्थ हो सकता है। अतः यही श्रीकृष्ण की स्थिति है। जैसा कि श्रीकृष्ण स्वयं *Bhagavad-gītā* (7.3) में कहते हैं:\n\nmanuṣyāṇāṁ sahasreṣu\n\nkaścid yatati siddhaye\n\nyatatām api siddhānāṁ\n\nkaścin māṁ vetti tattvataḥ\n\n\"सहस्रों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और जिन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली है उनमें से कदाचित् ही कोई मुझे तत्त्वतः जानता है।\"\n\nअतः श्रीकृष्ण को समझना अत्यन्त कठिन है। किन्तु यद्यपि ईश्वर को समझना एक कठिन विषय है, तथापि ईश्वर *Bhagavad-gītā* में स्वयं को समझाते हैं। वे कहते हैं, \"मैं ऐसा हूँ, और मैं ऐसा हूँ। भौतिक प्रकृति ऐसी है, और आध्यात्मिक प्रकृति वैसी है। जीव ऐसे हैं, और परमात्मा वैसे हैं।\" इस प्रकार *Bhagavad-gītā* में सब कुछ पूर्णतः वर्णित है। यद्यपि ईश्वर को समझना अत्यन्त कठिन है, तथापि जब ईश्वर स्वयं हमें अपना ज्ञान प्रदान करते हैं तब यह कठिन नहीं रहता। वस्तुतः यही एकमात्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम ईश्वर को समझ सकते हैं। अपनी कल्पना से ईश्वर को समझना सम्भव नहीं है, क्योंकि ईश्वर असीम हैं और हम सीमित हैं। हमारा ज्ञान एवं हमारी अनुभूति दोनों अत्यन्त सीमित हैं, अतः हम असीम को कैसे समझ सकते हैं? यदि हम असीम के कथन को सहज स्वीकार कर लें, तो हम उन्हें समझ पाएँगे। वही समझ हमारी सिद्धि है।\n\nईश्वर का काल्पनिक ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जाएगा। यदि कोई बालक जानना चाहे कि उसका पिता कौन है, तो सरल प्रक्रिया यह है कि वह अपनी माता से पूछे। तब माता कहेगी, \"यह तेरा पिता है।\" यही पूर्ण ज्ञान का मार्ग है। निःसन्देह, कोई अपने पिता के विषय में कल्पना कर सकता है, यह सोचते हुए कि क्या यह व्यक्ति है अथवा वह व्यक्ति है, और कोई समूचे नगर में घूम सकता है, यह पूछते हुए, \"क्या आप मेरे पिता हैं? क्या आप मेरे पिता हैं?\" किन्तु ऐसी प्रक्रिया से प्राप्त ज्ञान सदा अपूर्ण ही रहेगा। इस प्रकार कोई कभी अपने पिता को नहीं पाएगा। सरल प्रक्रिया यह है कि किसी प्रमाण से—इस स्थिति में, माता से—ज्ञान ग्रहण किया जाए। वह सहज कहती है, \"मेरे प्रिय पुत्र, यह तेरा पिता है।\" इस प्रकार हमारा ज्ञान पूर्ण होता है। दिव्य ज्ञान भी इसी के समान है। मैं अभी कुछ क्षण पूर्व एक आध्यात्मिक जगत् की बात कर रहा था। यह आध्यात्मिक जगत् हमारी कल्पना का विषय नहीं है। ईश्वर कहते हैं, \"एक आध्यात्मिक जगत् है, और वह मेरा प्रधान धाम है।\" इस प्रकार हम श्रीकृष्ण से, सर्वश्रेष्ठ प्रमाण से, ज्ञान प्राप्त करते हैं। हम भले ही पूर्ण न हों, किन्तु हमारा ज्ञान पूर्ण है क्योंकि वह पूर्ण स्रोत से प्राप्त हुआ है।\n\nकृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन मानव समाज को पूर्ण ज्ञान देना है। ऐसे ज्ञान से मनुष्य समझ सकता है कि वह कौन है, ईश्वर कौन है, भौतिक जगत् क्या है, हम यहाँ क्यों आए हैं, हमें इतने क्लेश एवं दुःख क्यों भोगने पड़ते हैं, और हमें क्यों मरना पड़ता है। निःसन्देह, कोई मरना नहीं चाहता, किन्तु मृत्यु आएगी। कोई वृद्ध नहीं होना चाहता, तथापि वृद्धावस्था आती है। कोई रोग से पीड़ित नहीं होना चाहता, किन्तु निश्चय ही रोग आता है। ये मानव जीवन की वास्तविक समस्याएँ हैं, और इनका समाधान अभी होना शेष है। सभ्यता भोजन, निद्रा, मैथुन तथा रक्षा को सुधारने का प्रयत्न करती है, किन्तु ये वास्तविक समस्याएँ नहीं हैं। मनुष्य सोता है, और कुत्ता भी सोता है। मनुष्य मात्र इस कारण अधिक उन्नत नहीं हो जाता कि उसके पास एक सुन्दर भवन है। दोनों ही स्थितियों में कार्य समान है—सोना। मनुष्य ने रक्षा हेतु परमाणु अस्त्र खोज निकाले हैं, किन्तु कुत्ते के भी दाँत एवं नख हैं और वह भी अपनी रक्षा कर सकता है। दोनों ही स्थितियों में रक्षा विद्यमान है। मनुष्य यह नहीं कह सकता कि चूँकि उसके पास परमाणु बम है, इसलिए वह समूचे संसार अथवा समूचे ब्रह्माण्ड पर विजय प्राप्त कर सकता है। यह सम्भव नहीं है। मनुष्य के पास रक्षा की विस्तृत विधि हो सकती है, अथवा भोजन, निद्रा या मैथुन की भव्य विधि हो सकती है, किन्तु इससे वह उन्नत नहीं हो जाता। हम उसकी उन्नति को परिष्कृत पशुता कह सकते हैं, बस इतना ही।\n\nवास्तविक उन्नति का अर्थ है ईश्वर को जानना। यदि हममें ईश्वर का ज्ञान नहीं है, तो वस्तुतः हम उन्नत नहीं हैं। अनेक धूर्त ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं, क्योंकि यदि ईश्वर न हो तो वे अपने पापमय कर्म जारी रख सकते हैं। उनके लिए यह सोचना बड़ा सुखद हो सकता है कि ईश्वर नहीं है, किन्तु ईश्वर मात्र इस कारण नहीं मर जाएँगे कि हम उन्हें नकारते हैं। ईश्वर हैं, और उनका शासन है। उनके आदेश से सूर्य उदित होता है, चन्द्रमा उदित होता है, जल प्रवाहित होता है, और समुद्र ज्वार-भाटे का पालन करता है। इस प्रकार सब कुछ उनके आदेश के अधीन कार्य करता है। चूँकि सब कुछ भली-भाँति चल रहा है, तो कोई यथार्थतः यह कैसे सोच सकता है कि ईश्वर मर चुके हैं? यदि कुप्रबन्ध हो, तो हम कह सकते हैं कि कोई सरकार नहीं है, किन्तु यदि सुप्रबन्ध हो, तो हम कैसे कह सकते हैं कि कोई सरकार नहीं है? मात्र इस कारण कि लोग ईश्वर को नहीं जानते, वे कहते हैं कि ईश्वर मर चुके हैं, कि कोई ईश्वर नहीं है, अथवा कि ईश्वर का कोई रूप नहीं है। किन्तु हम दृढ़तापूर्वक आश्वस्त हैं कि ईश्वर हैं और श्रीकृष्ण ही ईश्वर हैं। इसीलिए हम उनकी आराधना करते हैं। यही कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है। इसे समझने का प्रयत्न करें। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।\n\nपुनर्जन्म तथा उससे आगे\n\nसन् 1976 के अगस्त में श्रील प्रभुपाद ने लन्दन से पन्द्रह मील उत्तर स्थित भक्तिवेदान्त मैनर में कुछ सप्ताह व्यतीत किए। उस अवधि में लन्दन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी के माइक रॉबिन्सन ने उनके निवास में उनका साक्षात्कार लिया। उनकी बातचीत, जो शीघ्र पश्चात् प्रसारित हुई, उसमें श्रील प्रभुपाद ने प्रकट किया कि कृष्णभावनामृत \"'मैं विश्वास करता हूँ, तुम विश्वास करते हो' का कोई कर्मकाण्डीय अनुष्ठान नहीं है,\" अपितु एक गहन दार्शनिक तंत्र है जिसमें पुनर्जन्म का विज्ञान स्पष्ट एवं संक्षिप्त रूप से समझाया गया है।\n\nMike Robinson: क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आप किसमें विश्वास करते हैं—हरे कृष्ण आन्दोलन का दर्शन क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। कृष्णभावनामृत विश्वास का प्रश्न नहीं है; यह एक विज्ञान है। प्रथम चरण है एक जीवित शरीर एवं एक मृत शरीर के बीच का अन्तर जानना। अन्तर क्या है? अन्तर यह है कि जब कोई मरता है, तब आत्मा, अथवा जीवनी शक्ति, शरीर को छोड़ देती है। और इसीलिए शरीर को \"मृत\" कहा जाता है। अतः दो वस्तुएँ हैं: एक, यह शरीर; और दूसरी, शरीर के भीतर की जीवनी शक्ति। हम शरीर के भीतर की जीवनी शक्ति की बात करते हैं। यही कृष्णभावनामृत के विज्ञान में, जो आध्यात्मिक है, तथा साधारण भौतिक विज्ञान में अन्तर है। ऐसा होने से, आरम्भ में एक साधारण मनुष्य के लिए हमारे आन्दोलन को समझना अत्यन्त, अत्यन्त कठिन होता है। मनुष्य को सर्वप्रथम यह समझना चाहिए कि वह एक आत्मा है, अथवा अपने शरीर से भिन्न कुछ है।\n\nMike Robinson: और हम यह कब समझेंगे?\n\nŚrīla Prabhupāda: आप इसे किसी भी क्षण समझ सकते हैं, किन्तु इसके लिए थोड़ी बुद्धि अपेक्षित है। उदाहरणार्थ, जैसे-जैसे बालक बढ़ता है, वह किशोर बन जाता है, किशोर युवक बन जाता है, युवक प्रौढ़ बन जाता है, और प्रौढ़ वृद्ध बन जाता है। इस समूचे काल में, यद्यपि उसका शरीर बालक से वृद्ध तक बदलता रहता है, तथापि वह स्वयं को वही व्यक्ति, वही पहचान वाला अनुभव करता रहता है। ज़रा देखिए: शरीर बदल रहा है, किन्तु शरीर का धारक, आत्मा, वही रहता है। अतः हमें तार्किक रूप से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जब हमारा वर्तमान शरीर मरता है, तब हमें दूसरा शरीर प्राप्त होता है। इसे आत्मा का देहान्तरण कहते हैं।\n\nMike Robinson: तो जब लोग मरते हैं, तब मात्र भौतिक शरीर ही मरता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। इसे *Bhagavad-gītā* (2.20) में अत्यन्त विस्तारपूर्वक समझाया गया है: na jāyate mriyate vā kadācin... na hanyate hanyamāne śarīre.\n\nMike Robinson: क्या आप प्रायः सन्दर्भ उद्धृत करते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, हम अनेक सन्दर्भ उद्धृत करते हैं। कृष्णभावनामृत एक गम्भीर शिक्षा है, कोई साधारण धर्म नहीं। [एक भक्त से:] *Bhagavad-gītā* में वह श्लोक ढूँढ़िए।\n\nDisciple:\n\nna jāyate mriyate vā kadācin\n\nnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ\n\najo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo\n\nna hanyate hanyamāne śarīre\n\n[Bg. 2.20]\n\n\"आत्मा का न कभी जन्म होता है, न मृत्यु। और न ही, एक बार होकर, वह कभी अस्तित्व खोता है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत, अविनाशी तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।\"\n\nMike Robinson: उसे पढ़ने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। तो क्या आप मुझे थोड़ा और समझा सकते हैं? यदि आत्मा अविनाशी है, तो क्या मृत्यु के समय प्रत्येक की आत्मा ईश्वर के पास चली जाती है?\n\nŚrīla Prabhupāda: आवश्यक नहीं। यदि कोई योग्य हो—यदि वह इस जीवन में स्वयं को भगवद्धाम वापस जाने के योग्य बना ले—तब वह जा सकता है। यदि वह स्वयं को योग्य न बनाए, तब उसे दूसरा भौतिक शरीर प्राप्त होता है। और 84,00,000 भिन्न-भिन्न शारीरिक योनियाँ हैं। उसकी इच्छाओं तथा कर्म के अनुसार, प्रकृति के नियम उसे एक उपयुक्त शरीर देते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे जब कोई मनुष्य किसी रोग से ग्रस्त होता है और फिर उस रोग को विकसित करता है। क्या यह समझना कठिन है?\n\nMike Robinson: इस सबको समझना अत्यन्त कठिन है।\n\nŚrīla Prabhupāda: मान लीजिए किसी को चेचक हो गई है। तो, सात दिन पश्चात् उसमें लक्षण विकसित होते हैं। उस अवधि को क्या कहते हैं?\n\nMike Robinson: उद्भवन-काल?\n\nŚrīla Prabhupāda: उद्भवन-काल। तो आप इससे बच नहीं सकते। यदि आप किसी रोग से ग्रस्त हो गए हैं, तो वह प्रकृति के नियम से विकसित होगा। इसी प्रकार, इस जीवन के दौरान आप भौतिक प्रकृति के विविध गुणों के संसर्ग में रहते हैं, और वह संसर्ग यह निश्चित करेगा कि अगले जीवन में आपको किस प्रकार का शरीर प्राप्त होने वाला है। यह कठोरतापूर्वक प्रकृति के नियमों के अधीन है। प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के नियमों द्वारा नियन्त्रित है—वे पूर्णतः परतंत्र हैं—किन्तु अज्ञानवश लोग सोचते हैं कि वे स्वतंत्र हैं। वे स्वतंत्र नहीं हैं; वे कल्पना कर रहे हैं कि वे स्वतंत्र हैं, किन्तु वे पूर्णतः प्रकृति के नियमों के अधीन हैं। अतः आपका अगला जन्म आपके कर्मों के अनुसार निश्चित होगा—पापमय अथवा पुण्यमय, जैसी भी स्थिति हो।\n\nMike Robinson: हे आचार्य, क्या आप उस बात पर एक क्षण के लिए पुनः लौट सकते हैं? आपने कहा कि कोई भी स्वतंत्र नहीं है। क्या आप यह कह रहे हैं कि यदि हम एक अच्छा जीवन जिएँ, तो हम किसी प्रकार अपने लिए एक अच्छा भविष्य निर्धारित करते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nMike Robinson: तो हम यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि हम किसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं? धर्म महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यदि हम ईश्वर में विश्वास करें और एक अच्छा जीवन जिएँ...\n\nŚrīla Prabhupāda: यह विश्वास का प्रश्न नहीं है। विश्वास के इस प्रश्न को मत लाइए। यह नियम है। उदाहरणार्थ, एक सरकार है। आप विश्वास करें या न करें, किन्तु यदि आप नियम तोड़ते हैं, तो सरकार द्वारा आपको दण्ड दिया जाएगा। इसी प्रकार, चाहे आप विश्वास करें या न करें, एक ईश्वर है। यदि आप ईश्वर में विश्वास न करें और स्वतंत्र रूप से जो चाहें वही करें, तब प्रकृति के नियमों द्वारा आपको दण्ड दिया जाएगा।\n\nMike Robinson: समझा। क्या इससे अन्तर पड़ता है कि आप किस धर्म में विश्वास करते हैं? क्या इससे अन्तर पड़ेगा यदि कोई श्रीकृष्ण का भक्त हो?\n\nŚrīla Prabhupāda: यह धर्म का प्रश्न नहीं है। यह विज्ञान का प्रश्न है। आप एक आध्यात्मिक सत्ता हैं, किन्तु चूँकि आप भौतिक रूप से बद्ध हैं, इसलिए आप भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन हैं। अतः आप ईसाई धर्म में विश्वास कर सकते हैं, और मैं हिन्दू धर्म में विश्वास कर सकता हूँ, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि आप वृद्ध होने वाले हैं और मैं नहीं। हम वृद्ध होने के विज्ञान की बात कर रहे हैं। यह प्राकृतिक नियम है। ऐसा नहीं कि चूँकि आप ईसाई हैं इसलिए आप वृद्ध हो रहे हैं अथवा चूँकि मैं हिन्दू हूँ इसलिए मैं वृद्ध नहीं हो रहा। प्रत्येक वृद्ध हो रहा है। तो, इसी प्रकार, प्रकृति के समस्त नियम सभी पर लागू होते हैं। चाहे आप इस धर्म में विश्वास करें या उस धर्म में, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।\n\nMike Robinson: तो, आप यह कह रहे हैं कि हम सबका नियन्त्रण करने वाला केवल एक ही ईश्वर है?\n\nŚrīla Prabhupāda: एक ही ईश्वर है, और एक ही प्रकृति का नियम है, और हम सब उस प्रकृति के नियम के अधीन हैं। हमारा नियन्त्रण परमेश्वर करते हैं। अतः यदि हम सोचें कि हम स्वतंत्र हैं अथवा हम जो चाहें वही कर सकते हैं, तो यह हमारी मूर्खता है।\n\nMike Robinson: समझा। क्या आप मुझे समझा सकते हैं कि हरे कृष्ण आन्दोलन का सदस्य होने से क्या अन्तर पड़ता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण आन्दोलन उन लोगों के लिए है जो इस विज्ञान को समझने के विषय में गम्भीर हैं। हमारे किसी सम्प्रदायवादी समूह होने का प्रश्न ही नहीं है। नहीं। कोई भी इसमें सम्मिलित हो सकता है। महाविद्यालय के विद्यार्थी प्रवेश पा सकते हैं। आप ईसाई हो सकते हैं, आप हिन्दू हो सकते हैं, आप मुसलमान हो सकते हैं—इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। कृष्णभावनामृत आन्दोलन उस किसी को भी प्रवेश देता है जो ईश्वर के विज्ञान को समझना चाहता है।\n\nMike Robinson: और किसी को—हरे कृष्ण व्यक्ति होना सिखाए जाने से—क्या अन्तर पड़ेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: उसकी वास्तविक शिक्षा आरम्भ होगी। प्रथम बात यह समझना है कि आप एक आत्मा हैं। और चूँकि आप एक आत्मा हैं, इसलिए आप अपना शरीर बदल रहे हैं। यह आध्यात्मिक बोध की वर्णमाला है। अतः जब आपका शरीर समाप्त हो जाता है, विनष्ट हो जाता है, तब आप समाप्त नहीं होते। आपको दूसरा शरीर प्राप्त होता है, ठीक वैसे ही जैसे आप अपना कोट तथा कमीज़ बदलते हैं। यदि आप कल मुझसे मिलने भिन्न कमीज़ तथा भिन्न कोट पहनकर आएँ, तो क्या इसका अर्थ यह है कि आप भिन्न व्यक्ति हैं? नहीं। इसी प्रकार, प्रत्येक बार जब आप मरते हैं, आप शरीर बदलते हैं, किन्तु आप, शरीर के भीतर की आत्मा, वही रहते हैं। इस बात को समझना आवश्यक है; तब मनुष्य कृष्णभावनामृत के विज्ञान में आगे प्रगति कर सकता है।\n\nMike Robinson: मैं समझने लगा हूँ, किन्तु मुझे जो कठिन लग रहा है वह यह है कि इसका सम्बन्ध आपके उन बड़ी संख्या में लोगों से कैसे जुड़ता है, जिन्हें हम ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट पर हरे कृष्ण साहित्य बाँटते देखते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह साहित्य लोगों को आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता के विषय में आश्वस्त करने के लिए है।\n\nMike Robinson: और आपको वास्तव में इससे कोई सरोकार नहीं कि वे हरे कृष्ण आन्दोलन में सम्मिलित हों या न हों?\n\nŚrīla Prabhupāda: इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हमारा लक्ष्य उन्हें शिक्षित करना है। लोग अज्ञान में हैं; वे एक मूर्ख के स्वर्ग में जी रहे हैं, यह सोचते हुए कि जब उनका शरीर समाप्त हो जाएगा, तब सब कुछ समाप्त हो जाएगा। यही मूर्खता है।\n\nMike Robinson: और मूलतः आपको बस इतना सरोकार है कि आप उन्हें बताएँ कि जीवन का एक आध्यात्मिक आयाम है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारा प्रथम सरोकार आपको यह बताना है कि आप यह शरीर नहीं हैं, कि शरीर आपका आवरण है (आपकी कमीज़ तथा कोट) और कि शरीर के भीतर आप जी रहे हैं।\n\nMike Robinson: हाँ, मुझे लगता है कि अब मैं यह समझ गया हूँ। यदि हम वहाँ से आगे बढ़ सकें—आपने कहा कि आपका जीने का ढंग मृत्यु के पश्चात् आपके जीवन में अन्तर लाता है, कि प्राकृतिक नियम हैं जो आपके अगले जीवन का निर्धारण करते हैं। देहान्तरण की प्रक्रिया कैसे कार्य करती है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यह प्रक्रिया अत्यन्त सूक्ष्म है। आत्मा हमारी भौतिक आँखों के लिए अदृश्य है। वह आकार में अणुमात्र है। स्थूल शरीर के विनाश के पश्चात्, जो इन्द्रियों, रक्त, अस्थि, मेद इत्यादि से बना है, मन, बुद्धि तथा अहंकार का सूक्ष्म शरीर कार्य करता रहता है। अतः मृत्यु के समय यह सूक्ष्म शरीर उस लघु आत्मा को दूसरे स्थूल शरीर तक ले जाता है। यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे वायु किसी सुगन्ध को ले जाती है। कोई नहीं देख सकता कि यह गुलाब की सुगन्ध कहाँ से आ रही है, किन्तु हम जानते हैं कि उसे वायु द्वारा ले जाया जा रहा है। आप यह नहीं देख सकते कि कैसे, किन्तु यह हो रहा है। इसी प्रकार, आत्मा के देहान्तरण की प्रक्रिया अत्यन्त सूक्ष्म है। मृत्यु के समय मन की दशा के अनुसार, वह सूक्ष्म आत्मा एक विशेष माता के गर्भ में एक पिता के वीर्य के द्वारा प्रवेश करती है, और फिर वह आत्मा माता द्वारा प्रदत्त एक विशेष प्रकार का शरीर विकसित करती है। वह मनुष्य हो सकता है, वह बिल्ली, कुत्ता, अथवा कुछ भी हो सकता है।\n\nMike Robinson: क्या आप यह कह रहे हैं कि इस जीवन से पूर्व हम कुछ और थे?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nMike Robinson: और हम अगली बार पुनः कुछ और बनकर लौटते रहते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, क्योंकि आप नित्य हैं। अपने कर्म के अनुसार, आप मात्र शरीर बदल रहे हैं। अतः, आपको यह जानना चाहना चाहिए कि इस व्यापार को कैसे रोका जाए, कि आप अपने मूल, आध्यात्मिक शरीर में कैसे बने रह सकते हैं। यही कृष्णभावनामृत है।\n\nMike Robinson: समझा। तो यदि मैं कृष्णभावनाभावित हो जाऊँ, तो मुझे कुत्ते के रूप में लौटने का जोखिम नहीं रहेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। [एक भक्त से:] यह श्लोक ढूँढ़िए: janma karma ca me divyam... [Bg. 4.9].\n\nDisciple:\n\njanma karma ca me divyam\n\nevaṁ yo vetti tattvataḥ\n\ntyaktvā dehaṁ punar janma\n\nnaiti mām eti so 'rjuna\n\n\"हे अर्जुन, जो मेरे प्राकट्य तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है।\" (Bg. 4.9)\n\nŚrīla Prabhupāda: ईश्वर कह रहे हैं, \"जो कोई मुझे समझता है वह जन्म एवं मृत्यु से मुक्त हो जाता है।\" किन्तु भौतिकतावादी कल्पना से ईश्वर को नहीं समझा जा सकता। यह सम्भव नहीं है। मनुष्य को सर्वप्रथम आध्यात्मिक स्तर पर आना होगा। तब उसे ईश्वर को समझने हेतु अपेक्षित बुद्धि प्राप्त होती है। और जब वह ईश्वर को समझ लेता है, तब उसे और भौतिक शरीर प्राप्त नहीं होते। वह भगवद्धाम वापस जाता है। वह नित्य जीता है; शरीर का और परिवर्तन नहीं होता।\n\nMike Robinson: समझा। अब, आपने अपने शास्त्रों से दो बार पढ़ा। ये शास्त्र कहाँ से आते हैं? क्या आप संक्षेप में यह समझा सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारे शास्त्र वैदिक साहित्य से आ रहे हैं, जो सृष्टि के आरम्भ से विद्यमान है। जब भी कोई नई भौतिक रचना होती है—जैसे, उदाहरणार्थ, यह माइक्रोफ़ोन—तब उसके साथ कुछ साहित्य भी होता है जो समझाता है कि उसका कैसे प्रयोग किया जाए। क्या ऐसा नहीं है?\n\nMike Robinson: हाँ, यह ठीक है, ऐसा होता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: और वह साहित्य माइक्रोफ़ोन की रचना के साथ ही आता है।\n\nMike Robinson: यह ठीक है, हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: तो, इसी प्रकार, वैदिक साहित्य ब्रह्माण्डीय रचना के साथ ही आता है, यह समझाने हेतु कि उसका कैसे प्रयोग किया जाए।\n\nMike Robinson: समझा। तो, ये शास्त्र सृष्टि के आरम्भ से विद्यमान रहे हैं। अब, यदि हम किसी ऐसी बात पर आगे बढ़ सकें जिसके विषय में मेरा विश्वास है कि आपकी प्रबल अनुभूति है। कृष्णभावनामृत तथा पश्चिम में सिखाई जा रही अन्य पौर्वात्य विधाओं में मुख्य अन्तर क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: अन्तर यह है कि हम मूल साहित्य का अनुसरण कर रहे हैं, और वे अपना ही साहित्य गढ़ रहे हैं। यही अन्तर है। जब आध्यात्मिक विषयों पर कोई प्रश्न उठे, तब आपको मूल साहित्य से परामर्श लेना चाहिए, किसी कूट व्यक्ति द्वारा प्रकाशित किसी साहित्य से नहीं।\n\nMike Robinson: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण... के जप के विषय में क्या कहेंगे?\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण जप शुद्ध होने की सबसे सरल प्रक्रिया है, विशेषकर इस युग में, जब लोग इतने मन्दबुद्धि हैं कि वे आध्यात्मिक ज्ञान को बड़ी सरलता से नहीं समझ सकते। यदि कोई हरे कृष्ण जपता है, तब उसकी बुद्धि शुद्ध हो जाती है, और वह आध्यात्मिक वस्तुओं को समझ सकता है।\n\nMike Robinson: क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आप जो करते हैं उसमें आपका मार्गदर्शन कैसे होता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हम वैदिक साहित्य से मार्गदर्शन लेते हैं।\n\nMike Robinson: उन शास्त्रों से जिन्हें आपने उद्धृत किया?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यह सब साहित्य में है। हम उन्हें अंग्रेज़ी में समझा रहे हैं। किन्तु हम कुछ गढ़ नहीं रहे। यदि हम ज्ञान गढ़ने लगें, तब सब कुछ बिगड़ जाएगा। वैदिक साहित्य उस साहित्य के समान है जो समझाता है कि इस माइक्रोफ़ोन को कैसे स्थापित किया जाए। वह कहता है, \"इसे ऐसे करो: कुछ पेच इस ओर होने चाहिए, धातु के चारों ओर।\" आप कोई परिवर्तन नहीं कर सकते; अन्यथा सब कुछ बिगड़ जाएगा। इसी प्रकार, चूँकि हम कुछ गढ़ नहीं रहे, इसलिए मनुष्य को बस हमारी एक पुस्तक पढ़नी होती है, और उसे वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो जाता है।\n\nMike Robinson: कृष्णभावनामृत का दर्शन लोगों के जीने के ढंग को कैसे प्रभावित कर सकता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यह लोगों के दुःख का निवारण कर सकता है। लोग दुःखी हैं क्योंकि वे स्वयं को भूलवश शरीर समझते हैं। यदि आप सोचें कि आप अपना कोट तथा कमीज़ हैं, और आप अत्यन्त सावधानीपूर्वक कोट तथा कमीज़ धोएँ किन्तु भोजन करना भूल जाएँ, तो क्या आप सुखी रहेंगे?\n\nMike Robinson: नहीं, मैं नहीं रहूँगा।\n\nŚrīla Prabhupāda: इसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति मात्र शरीर के \"कोट तथा कमीज़\" को धो रहा है, किन्तु शरीर के भीतर की आत्मा को भूल रहा है। उनके पास इसका कोई ज्ञान नहीं कि शरीर के \"कोट तथा कमीज़\" के भीतर क्या है। किसी से भी पूछिए कि वह क्या है, और वह कहेगा, \"हाँ, मैं एक अंग्रेज़ हूँ,\" अथवा \"मैं एक भारतीय हूँ।\" और यदि हम कहें, \"मैं देख सकता हूँ कि आपका अंग्रेज़ अथवा भारतीय शरीर है, किन्तु आप क्या हैं?\"—तो वह यह नहीं बता सकता।\n\nMike Robinson: समझा।\n\nŚrīla Prabhupāda: समूची आधुनिक सभ्यता इस भ्रम पर चल रही है कि शरीर ही स्व है (dehātma-buddhi)। यह बिल्लियों एवं कुत्तों की मनोवृत्ति है। मान लीजिए मैं इंग्लैंड में प्रवेश करने का प्रयत्न करता हूँ, और आप मुझे सीमा पर रोक देते हैं: \"मैं एक अंग्रेज़ हूँ,\" आप कहते हैं, \"किन्तु आप भारतीय हैं। आप यहाँ क्यों आए हैं?\" और कुत्ता भौंकता है, \"रौ, रौ, तुम क्यों आ रहे हो?\" तो मनोवृत्ति में क्या अन्तर है? कुत्ता सोच रहा है कि वह एक कुत्ता है और मैं एक अजनबी हूँ, और आप सोच रहे हैं कि आप एक अंग्रेज़ हैं और मैं एक भारतीय हूँ। मनोवृत्ति में कोई अन्तर नहीं है। अतः यदि आप लोगों को कुत्ते की मनोवृत्ति के अन्धकार में रखें और यह घोषणा करें कि आप सभ्यता में उन्नति कर रहे हैं, तो आप अत्यन्त भ्रमित हैं।\n\nMike Robinson: अब, एक अन्य बिन्दु पर आगे बढ़ते हुए, मैं समझता हूँ कि हरे कृष्ण आन्दोलन को संसार के उन क्षेत्रों के प्रति कुछ सरोकार है जहाँ दुःख है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, हमें ही एकमात्र सरोकार है। अन्य लोग मात्र मुख्य समस्याओं से बच रहे हैं: जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु। अन्यों के पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं है; वे मात्र हर प्रकार की बकवास कर रहे हैं। लोग भ्रमित किए जा रहे हैं। उन्हें अन्धकार में रखा जा रहा है। हम उन्हें कुछ प्रकाश देना आरम्भ करें।\n\nMike Robinson: हाँ, किन्तु आध्यात्मिक प्रबोध देने के अतिरिक्त, क्या आपको लोगों की भौतिक कुशलता के प्रति भी सरोकार है?\n\nŚrīla Prabhupāda: भौतिक कुशलता आध्यात्मिक कुशलता के स्वतः पीछे-पीछे चलती है।\n\nMike Robinson: और वह कैसे होता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: मान लीजिए आपके पास एक मोटरगाड़ी है। तो, स्वाभाविक रूप से, आप मोटरगाड़ी की भी देखभाल करते हैं और स्वयं की भी। किन्तु आप स्वयं को मोटरगाड़ी नहीं मानते। आप यह नहीं कहते, \"मैं यह मोटरगाड़ी हूँ।\" यह बकवास है। किन्तु लोग यही कर रहे हैं। वे शारीरिक \"मोटरगाड़ी\" की अत्यधिक देखभाल कर रहे हैं, यह सोचते हुए कि मोटरगाड़ी ही स्व है। वे भूल जाते हैं कि वे मोटरगाड़ी से भिन्न हैं, कि वे एक आत्मा हैं और उनका एक भिन्न व्यापार है। जिस प्रकार कोई पेट्रोल पीकर सन्तुष्ट नहीं हो सकता, उसी प्रकार कोई शारीरिक क्रियाओं से सन्तुष्ट नहीं हो सकता। मनुष्य को आत्मा के लिए उचित भोजन ढूँढ़ना ही चाहिए। यदि कोई मनुष्य सोचे, \"मैं एक मोटरगाड़ी हूँ, और मुझे यह पेट्रोल पीना चाहिए,\" तो वह पागल माना जाता है। इसी प्रकार, जो यह सोचता है कि वह यह शरीर है, और जो शारीरिक सुखों से सुखी होने का प्रयत्न करता है, वह भी पागल है।\n\nMike Robinson: यहाँ एक उद्धरण है जिस पर मैं चाहूँगा कि आप टिप्पणी करें। आने से पहले मुझे आपके लोगों ने यह साहित्य दिया था, और जो बातें आप यहाँ कहते हैं उनमें से एक यह है कि \"तर्कसंगत आधार रहित धर्म मात्र भावुकता है।\" क्या आप इसे समझा सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: अधिकांश धार्मिक लोग कहते हैं, \"हम विश्वास करते हैं...\" किन्तु इस विश्वास का क्या मूल्य है? आप किसी ऐसी बात में विश्वास कर सकते हैं जो वस्तुतः सही नहीं है। उदाहरणार्थ, कुछ ईसाई लोग कहते हैं, \"हम विश्वास करते हैं कि पशुओं में आत्मा नहीं होती।\" यह सही नहीं है। वे विश्वास करते हैं कि पशुओं में आत्मा नहीं होती क्योंकि वे पशुओं को खाना चाहते हैं, किन्तु वास्तव में पशुओं में आत्मा होती है।\n\nMike Robinson: आप कैसे जानते हैं कि पशु में आत्मा होती है?\n\nŚrīla Prabhupāda: आप भी जान सकते हैं। यहाँ वैज्ञानिक प्रमाण है: पशु खाता है, आप खाते हैं; पशु सोता है, आप सोते हैं; पशु मैथुन करता है, आप मैथुन करते हैं; पशु भी रक्षा करता है, आप भी रक्षा करते हैं। तो आपमें तथा पशु में क्या अन्तर है? आप कैसे कह सकते हैं कि आपमें आत्मा है किन्तु पशु में नहीं?\n\nMike Robinson: मैं यह पूर्णतः समझ सकता हूँ। किन्तु ईसाई शास्त्र कहते हैं...\n\nŚrīla Prabhupāda: किसी शास्त्र को मत लाइए; यह सामान्य बुद्धि का विषय है। समझने का प्रयत्न कीजिए। पशु खा रहा है, आप खा रहे हैं; पशु सो रहा है, आप सो रहे हैं; पशु रक्षा कर रहा है, आप रक्षा कर रहे हैं; पशु मैथुन कर रहा है, आप मैथुन कर रहे हैं; पशुओं के सन्तान होती है, आपके सन्तान होती है; उनका एक निवास-स्थान है, आपका एक निवास-स्थान है। यदि पशु का शरीर काटा जाए, तो रक्त निकलता है; यदि आपका शरीर काटा जाए, तो रक्त निकलता है। तो, ये सब समानताएँ विद्यमान हैं। अब, आप इस एक समानता को, आत्मा की उपस्थिति को, क्यों नकारते हैं? यह तर्कसंगत नहीं है। क्या आपने तर्कशास्त्र पढ़ा है? तर्कशास्त्र में अनुमान नामक एक वस्तु होती है। अनुमान का अर्थ है समानता के अनेक बिन्दु ढूँढ़कर निष्कर्ष निकालना। यदि मनुष्यों तथा पशुओं के बीच इतने सारे समानता के बिन्दु हैं, तो एक समानता को क्यों नकारें? यह तर्क नहीं है। यह विज्ञान नहीं है।\n\nMike Robinson: किन्तु यदि आप उस तर्क को लें और उसे दूसरी ओर से प्रयोग करें...\n\nŚrīla Prabhupāda: कोई दूसरी ओर नहीं है। यदि आप तर्क के आधार पर युक्ति नहीं कर रहे, तब आप तर्कसंगत नहीं हैं।\n\nMike Robinson: हाँ, ठीक है, किन्तु किसी अन्य परिकल्पना से आरम्भ करें। मान लीजिए हम यह मान लें कि एक मनुष्य में आत्मा नहीं होती...\n\nŚrīla Prabhupāda: तब आपको एक जीवित शरीर तथा एक मृत शरीर के बीच का अन्तर समझाना होगा। मैं यह आरम्भ में ही समझा चुका हूँ। जैसे ही जीवनी शक्ति, आत्मा, शरीर से चली जाती है, तब सबसे सुन्दर शरीर का भी कोई मूल्य नहीं रहता। कोई उसकी परवाह नहीं करता; उसे फेंक दिया जाता है। किन्तु अभी, यदि मैं आपका केश छुऊँ, तो झगड़ा हो जाएगा। यही एक जीवित शरीर तथा एक मृत शरीर के बीच का भेद है। एक जीवित शरीर में आत्मा होती है, और एक मृत शरीर में आत्मा नहीं होती। जैसे ही आत्मा शरीर को छोड़ती है, शरीर का कोई मूल्य नहीं रहता। वह व्यर्थ है। यह समझना अत्यन्त सरल है, किन्तु बड़े-से-बड़े तथाकथित वैज्ञानिक तथा दार्शनिक भी इसे समझने के लिए अत्यन्त मन्दबुद्धि हैं। आधुनिक समाज एक अत्यन्त निन्दनीय दशा में है। कोई भी मनुष्य वास्तविक मस्तिष्क वाला नहीं है।\n\nMike Robinson: क्या आप उन समस्त वैज्ञानिकों की ओर संकेत कर रहे हैं जो जीवन के आध्यात्मिक आयाम को समझने में विफल रहते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। वास्तविक विज्ञान का अर्थ है प्रत्येक वस्तु का पूर्ण ज्ञान, भौतिक तथा आध्यात्मिक।\n\nMike Robinson: किन्तु आप सांसारिक जीवन में एक रसायनशास्त्री थे, क्या आप नहीं थे?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, मैं अपने पूर्ववर्ती जीवन में एक रसायनशास्त्री था। किन्तु रसायनशास्त्री बनने के लिए किसी महान् बुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी सामान्य बुद्धि वाला मनुष्य यह कर सकता है।\n\nMike Robinson: किन्तु सम्भवतः आप सोचते हैं कि भौतिक विज्ञान भी महत्त्वपूर्ण है, भले ही आज के वैज्ञानिक मन्दबुद्धि हों।\n\nŚrīla Prabhupāda: भौतिक विज्ञान केवल एक सीमा तक महत्त्वपूर्ण है। यह सर्वोपरि नहीं है।\n\nMike Robinson: समझा। क्या मैं पहले के एक प्रश्न पर लौट सकता हूँ? जब कुछ क्षण पूर्व हम मतभेद कर रहे थे, तब आप कह रहे थे, \"शास्त्रों को मत लाइए; मात्र सामान्य बुद्धि का प्रयोग कीजिए।\" किन्तु आपके धर्म में शास्त्रों की क्या भूमिका है? वे कितने महत्त्वपूर्ण हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारा धर्म एक विज्ञान है। जब हम कहते हैं कि एक बालक बढ़कर किशोर बनता है, तो यह विज्ञान है। यह धर्म नहीं है। प्रत्येक बालक बढ़कर किशोर बनता है। इसमें धर्म का क्या प्रश्न है? प्रत्येक मनुष्य मरता है। इसमें धर्म का क्या प्रश्न है? और जब मनुष्य मरता है, तब शरीर व्यर्थ हो जाता है। इसमें धर्म का क्या प्रश्न है? यह विज्ञान है। चाहे आप ईसाई हों या हिन्दू या मुसलमान, जब आप मरते हैं तब आपका शरीर व्यर्थ हो जाता है। यह विज्ञान है। जब आपका कोई सम्बन्धी मरता है, तब आप यह नहीं कह सकते, \"हम ईसाई हैं; हम विश्वास करते हैं कि वह मरा नहीं है।\" नहीं, वह मर गया है। चाहे आप ईसाई हों या हिन्दू या मुसलमान, वह मर गया है। अतः जब हम बोलते हैं, तब हम इसी आधार पर बोलते हैं: कि शरीर केवल तभी तक महत्त्वपूर्ण है जब तक आत्मा शरीर में है। जब आत्मा वहाँ नहीं होती, तब वह व्यर्थ है। यह विज्ञान प्रत्येक पर लागू होता है, और हम लोगों को इसी आधार पर शिक्षित करने का प्रयत्न कर रहे हैं।\n\nMike Robinson: किन्तु यदि मैं आपको ठीक से समझ रहा हूँ, तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप लोगों को विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक आधार पर शिक्षित कर रहे हैं। इसमें धर्म कहाँ आता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: धर्म का अर्थ भी विज्ञान है। लोगों ने भूलवश धर्म का अर्थ श्रद्धा—\"मैं विश्वास करता हूँ\"—मान लिया है। [एक भक्त से:] शब्दकोश में \"धर्म\" (religion) शब्द देखिए।\n\nDisciple: धर्म के अन्तर्गत शब्दकोश कहता है, \"अतिमानवीय नियन्त्रण अथवा शक्ति की, और विशेषकर आज्ञापालन के अधिकारी एक व्यक्तिगत ईश्वर की मान्यता, तथा उचित मानसिक मनोवृत्ति के साथ ऐसी मान्यता को साकार करना।\"\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। धर्म का अर्थ है यह सीखना कि परम नियन्ता की आज्ञा का पालन कैसे किया जाए। तो, आप ईसाई हो सकते हैं और मैं हिन्दू हो सकता हूँ; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हम दोनों को यह स्वीकार करना ही चाहिए कि एक परम नियन्ता है। प्रत्येक को यह स्वीकार करना पड़ता है; यही वास्तविक धर्म है। यह नहीं कि \"हम विश्वास करते हैं कि पशुओं में आत्मा नहीं होती।\" यह धर्म नहीं है। यह अत्यन्त अवैज्ञानिक है। धर्म का अर्थ है परम नियन्ता का वैज्ञानिक बोध: परम नियन्ता को समझना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना—बस इतना ही। राज्य में, अच्छा नागरिक वह है जो सरकार को समझता है तथा सरकार के नियमों का पालन करता है, और बुरा नागरिक वह है जो सरकार की परवाह नहीं करता। तो, यदि आप ईश्वर की सरकार की अवहेलना करके एक बुरे नागरिक बन जाएँ, तब आप अधार्मिक हैं। और यदि आप एक अच्छे नागरिक हैं, तब आप धार्मिक हैं।\n\nMike Robinson: समझा। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपके अनुसार जीवन का अर्थ क्या है? सर्वप्रथम हम अस्तित्व में क्यों हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: जीवन का अर्थ है आनन्द भोगना। किन्तु अभी आप जीवन के एक मिथ्या स्तर पर हैं, और इसीलिए आप आनन्द भोगने के स्थान पर दुःख भोग रहे हैं। हर ओर हम अस्तित्व के लिए संघर्ष देखते हैं। प्रत्येक संघर्ष कर रहा है, किन्तु अन्त में उनका आनन्द क्या है? वे मात्र दुःख भोग रहे हैं तथा मर रहे हैं। अतः, यद्यपि जीवन का अर्थ आनन्द है, तथापि इस समय आपका जीवन आनन्द नहीं है। किन्तु यदि आप जीवन के वास्तविक, आध्यात्मिक स्तर पर आ जाएँ, तब आप आनन्द भोगेंगे।\n\nMike Robinson: अन्त में, क्या आप मुझे आध्यात्मिक जीवन में पार किए जाने वाले कुछ चरण समझा सकते हैं? श्रीकृष्ण का एक नया भक्त किन आध्यात्मिक चरणों से गुज़रता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: प्रथम चरण यह है कि आप जिज्ञासु होते हैं। \"तो,\" आप कहते हैं, \"यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन क्या है? मैं इसका अध्ययन करूँ।\" इसे श्रद्धा कहते हैं। यही आरम्भ है। फिर, यदि आप गम्भीर हैं, तब आप उनके साथ मिलते-जुलते हैं जो इस ज्ञान का अनुशीलन कर रहे हैं। आप यह समझने का प्रयत्न करते हैं कि वे कैसा अनुभव कर रहे हैं। फिर आप अनुभव करेंगे, \"मैं उनमें से एक क्यों न बन जाऊँ?\" और जब आप उनमें से एक बन जाते हैं, तब आपकी समस्त आशंकाएँ शीघ्र ही दूर हो जाती हैं। आप अधिक श्रद्धावान् बन जाते हैं, और फिर आपको कृष्णभावनामृत के प्रति एक वास्तविक रुचि प्राप्त होती है। ये बालक चलचित्र देखने क्यों नहीं जाते? ये मांस क्यों नहीं खाते अथवा रात्रि-विहार-गृह क्यों नहीं जाते? क्योंकि इनकी रुचि बदल गई है। अब वे इन सब वस्तुओं से घृणा करते हैं। इस प्रकार, आप प्रगति करते हैं। पहले श्रद्धा, फिर भक्तों का संग, फिर समस्त आशंकाओं का निवारण, फिर दृढ़ श्रद्धा, फिर रुचि, फिर ईश्वर-साक्षात्कार, और फिर ईश्वर-प्रेम, जो सिद्धि है। यही प्रथम श्रेणी का धर्म है। न कि \"मैं विश्वास करता हूँ, तुम विश्वास करते हो\" का कोई कर्मकाण्डीय अनुष्ठान। यह धर्म नहीं है। यह छल है। वास्तविक धर्म का अर्थ है ईश्वर के प्रति अपने प्रेम का विकास करना। यही धर्म की सिद्धि है।\n\nMike Robinson: मुझसे बात करने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। आपसे बात करना सुखद रहा।\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण।\n\nसत्य तथा सौन्दर्य\n\nश्रील प्रभुपाद ने यह निबन्ध सर्वप्रथम भारत में, अपनी तत्कालीन पाक्षिक पत्रिका Back to Godhead के पुराने टैब्लॉइड संस्करण में प्रकाशित किया (20 नवम्बर, 1958)। इसमें \"तरल सौन्दर्य\" की वह अविस्मरणीय कथा है, जिसमें श्रील प्रभुपाद नाटकीय रूप से मानव कामुकता के अन्तर्निहित सिद्धान्त को उजागर करते हैं। सत्य तथा सौन्दर्य की प्रकृति पर यह प्रकाशमय व्याख्या कालातीत है तथा \"अन्तरात्मा\" की खोज में लगे लोगों के लिए चौंकाने वाली सीमा तक प्रासंगिक है।\n\nकभी-कभी इस विषय पर तर्क-वितर्क हो सकता है कि क्या \"सत्य\" तथा \"सौन्दर्य\" संगत पद हैं। कोई कह सकता है कि वह सत्य व्यक्त करने को स्वेच्छा से सहमत होगा, किन्तु चूँकि सत्य सदा सुन्दर नहीं होता—वस्तुतः वह प्रायः कुछ चौंकाने वाला तथा अप्रिय होता है—तो कोई एक ही समय में सत्य तथा सौन्दर्य कैसे व्यक्त करे?\n\nउत्तर में, हम सभी सम्बन्धित जनों को सूचित कर सकते हैं कि \"सत्य\" तथा \"सौन्दर्य\" संगत पद हैं। वस्तुतः, हम दृढ़तापूर्वक यह कह सकते हैं कि वास्तविक सत्य, जो परम है, सदा सुन्दर होता है। सत्य इतना सुन्दर है कि वह सबको आकर्षित करता है, स्वयं सत्य को भी सम्मिलित करते हुए। सत्य इतना सुन्दर है कि अनेक मुनियों, सन्तों तथा भक्तों ने सत्य के लिए सब कुछ त्याग दिया। महात्मा गाँधी, आधुनिक संसार के एक आदर्श, ने अपना जीवन सत्य के साथ प्रयोग करने में समर्पित किया, और उनकी समस्त गतिविधियाँ केवल सत्य की ओर लक्षित थीं।\n\nकेवल महात्मा गाँधी ही क्यों? हममें से प्रत्येक में केवल सत्य की खोज करने की प्रेरणा है, क्योंकि सत्य न केवल सुन्दर है अपितु सर्वशक्तिमान्, सर्व-साधन-सम्पन्न, सर्व-विख्यात, सर्व-त्यागी तथा सर्वज्ञ भी है।\n\nदुर्भाग्यवश, लोगों के पास वास्तविक सत्य की कोई जानकारी नहीं है। वस्तुतः, जीवन के समस्त क्षेत्रों में 99.9 प्रतिशत मनुष्य सत्य के नाम पर केवल असत्य का ही पीछा कर रहे हैं। हम वास्तव में सत्य के सौन्दर्य से आकर्षित होते हैं, किन्तु अनादि काल से हम सत्य के समान प्रतीत होने वाले असत्य से प्रेम करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। अतः, सांसारिक मनुष्य के लिए \"सत्य\" तथा \"सौन्दर्य\" असंगत पद हैं। सांसारिक सत्य तथा सौन्दर्य को इस प्रकार समझाया जा सकता है।\n\nएक बार एक मनुष्य, जो अत्यन्त बलवान् तथा सुगठित था किन्तु जिसका चरित्र अत्यन्त सन्देहास्पद था, एक सुन्दर युवती से प्रेम करने लगा। वह युवती न केवल दिखने में सुन्दर थी अपितु चरित्र में भी साध्वी थी, और ऐसा होने से उसे उस मनुष्य के प्रणय-निवेदन पसन्द नहीं आए। तथापि, वह मनुष्य अपनी कामुक इच्छाओं के कारण हठ करता रहा, और इसलिए युवती ने उससे केवल सात दिन प्रतीक्षा करने की प्रार्थना की, और उसने उसके पश्चात् एक समय निश्चित किया जब वह उससे मिल सकता था। वह मनुष्य सहमत हो गया, और बड़ी आशाओं के साथ वह नियत समय की प्रतीक्षा करने लगा।\n\nतथापि, उस साध्वी युवती ने, परम सत्य के वास्तविक सौन्दर्य को प्रकट करने के लिए, एक अत्यन्त शिक्षाप्रद विधि अपनाई। उसने रेचक तथा विरेचक की अत्यन्त प्रबल मात्राएँ लीं, और सात दिनों तक वह निरन्तर पतले दस्त करती रही तथा जो कुछ खाती उस सबकी वमन करती रही। इसके अतिरिक्त, उसने वह समस्त पतला मल तथा वमन उपयुक्त पात्रों में संचित कर लिया। रेचकों के परिणामस्वरूप, वह तथाकथित सुन्दर युवती कंकाल के समान दुर्बल तथा क्षीण हो गई, उसका वर्ण काला पड़ गया, और उसकी सुन्दर आँखें उसकी खोपड़ी के गड्ढों में धँस गईं। इस प्रकार नियत घड़ी पर वह उस उत्सुक मनुष्य का स्वागत करने हेतु व्याकुलतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगी।\n\nवह पुरुष भली-भाँति सज्जित एवं सुशील रूप में वहाँ आया और जो कुरूप कन्या उसे प्रतीक्षा करती मिली, उससे उसने उस सुन्दर कन्या के विषय में पूछा जिससे वह मिलने आया था। उस पुरुष को जो कन्या दिखाई दी, उसे वह उसी सुन्दर कन्या के रूप में पहचान न सका जिसके विषय में वह पूछ रहा था; वस्तुतः यद्यपि उसने बार-बार अपनी पहचान बताई, तथापि उसकी शोचनीय दशा के कारण वह उसे पहचान न सका।\n\nअन्ततः उस कन्या ने उस सामर्थ्यवान् पुरुष को बताया कि उसने अपने सौन्दर्य के अवयवों को पृथक् करके पात्रों में रख दिया है। उसने यह भी बताया कि वह उन सौन्दर्य के रसों का भोग कर सकता है। जब उस लौकिक कवि-स्वभाव वाले पुरुष ने सौन्दर्य के उन रसों को देखने की इच्छा की, तब उसे शिथिल मल तथा तरल वमन के भण्डार की ओर निर्देशित किया गया, जिनसे असह्य दुर्गन्ध निकल रही थी। इस प्रकार सौन्दर्य-रस की समूची कथा उस पर प्रकट हो गई। अन्ततः उस साध्वी कन्या की कृपा से वह नीच चरित्र वाला पुरुष छाया तथा वस्तु में भेद कर सका, और इस प्रकार उसकी चेतना लौट आई।\n\nइस पुरुष की स्थिति हम सभी की उस स्थिति के समान थी जो मिथ्या, भौतिक सौन्दर्य से आकृष्ट हैं। ऊपर वर्णित कन्या का भौतिक शरीर उसके मन की इच्छाओं के अनुरूप सुन्दर रूप से विकसित था, किन्तु वास्तव में वह उस क्षणभंगुर भौतिक शरीर तथा मन से पृथक् थी। वस्तुतः वह एक आध्यात्मिक स्फुलिंग थी, और वैसा ही वह प्रेमी भी था जो उसकी मिथ्या त्वचा से आकृष्ट हुआ था।\n\nकिन्तु लौकिक बुद्धिजीवी तथा सौन्दर्यवादी सापेक्ष सत्य के बाह्य सौन्दर्य तथा आकर्षण से मोहित रहते हैं और उस आध्यात्मिक स्फुलिंग से अनभिज्ञ रहते हैं, जो एक ही समय में सत्य भी है और सौन्दर्य भी। वह आध्यात्मिक स्फुलिंग इतनी सुन्दर है कि जब वह तथाकथित सुन्दर शरीर को, जो वास्तव में मल तथा वमन से भरा होता है, छोड़ देती है, तब उस शरीर को कोई स्पर्श करना नहीं चाहता, भले ही वह बहुमूल्य परिधान से सुसज्जित क्यों न हो।\n\nहम सभी एक मिथ्या, सापेक्ष सत्य के पीछे भाग रहे हैं, जो वास्तविक सौन्दर्य के साथ असंगत है। किन्तु वास्तविक सत्य नित्य सुन्दर है, जो असंख्य वर्षों तक सौन्दर्य के उसी मानक को बनाए रखता है। वह आध्यात्मिक स्फुलिंग अविनाशी है। बाह्य त्वचा का सौन्दर्य किसी तीव्र विरेचक की एक मात्रा से ही कुछ ही घंटों में नष्ट किया जा सकता है, किन्तु सत्य का सौन्दर्य अविनाशी है और सदैव एक-सा रहता है। दुर्भाग्यवश, लौकिक कलाकार तथा बुद्धिजीवी आत्मा के इस सुन्दर स्फुलिंग से अनभिज्ञ हैं। वे उस समग्र अग्नि से भी अनभिज्ञ हैं, जो इन आध्यात्मिक स्फुलिंगों का स्रोत है, और वे स्फुलिंगों तथा अग्नि के उन सम्बन्धों से भी अनभिज्ञ हैं, जो दिव्य लीलाओं का रूप धारण करते हैं। जब वे लीलाएँ सर्वशक्तिमान् की कृपा से यहाँ प्रदर्शित होती हैं, तब मूर्ख लोग, जो अपनी इन्द्रियों से परे नहीं देख सकते, सत्य तथा सौन्दर्य की उन लीलाओं को ऊपर वर्णित शिथिल मल तथा वमन के प्राकट्य के साथ भ्रमित कर लेते हैं। इस प्रकार वे हताशा में पूछते हैं कि सत्य तथा सौन्दर्य एक ही समय में किस प्रकार समाहित हो सकते हैं।\n\nलौकिक लोग यह नहीं जानते कि वह समग्र आध्यात्मिक सत्ता ही वह सुन्दर पुरुष है जो प्रत्येक वस्तु को आकृष्ट करता है। वे इससे अनभिज्ञ हैं कि वे ही आदि वस्तु हैं, समस्त विद्यमान वस्तुओं के आदि स्रोत तथा उद्गम हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक स्फुलिंग, उस समग्र आत्मा के अंश होने के कारण, सौन्दर्य तथा नित्यता में गुणात्मक रूप से उन्हीं के समान हैं। अन्तर केवल इतना है कि समग्र नित्य रूप से समग्र है और अंश नित्य रूप से अंश हैं। किन्तु दोनों ही परम सत्य, परम सौन्दर्य, परम ज्ञान, परम ऊर्जा, परम त्याग तथा परम ऐश्वर्य हैं।\n\nयद्यपि किसी महानतम लौकिक कवि अथवा बुद्धिजीवी द्वारा रचित हो, फिर भी जो भी साहित्य परम सत्य तथा सौन्दर्य का वर्णन नहीं करता, वह सापेक्ष सत्य के शिथिल मल तथा वमन का भण्डार मात्र है। वास्तविक साहित्य वही है जो परम सत्य के परम सत्य तथा सौन्दर्य का वर्णन करता है।\n\nमृत्यु की कला\n\nयद्यपि संचार-माध्यम प्रायः हिंसा तथा मृत्यु से ग्रस्त रहते हैं, फिर भी मृत्यु तथा मरण के विषय में हमारी समझ सतही है। श्रील प्रभुपाद कहते हैं, \"जब तक मनुष्य जीवन के पूर्ण ओज में रहता है, तब तक वह मृत्यु के उस नग्न सत्य को भूल जाता है, जिससे उसे अवश्य ही मिलना है।\" हम अपनी मृत्यु से प्रभावी रूप से किस प्रकार निपट सकते हैं? इस निबन्ध में (जो सर्वप्रथम पुराने टैब्लॉइड बैक टु गॉडहेड में, 20 अप्रैल 1960 को प्रकाशित हुआ था) श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि *श्रीमद्भागवत* की प्राचीन शिक्षाएँ किस प्रकार एक व्यावहारिक उत्तर प्रदान करती हैं।\n\nअपने पिता के साथ चलता हुआ कोई छोटा बालक निरन्तर प्रश्न पूछता रहता है। वह अपने पिता से अनेक विचित्र बातें पूछता है, और पिता को उचित उत्तरों से उसे सन्तुष्ट करना पड़ता है। जब मैं अपने गृहस्थ जीवन में युवा पिता था, तब मेरे दूसरे पुत्र के, जो मेरा नित्य संगी था, सैकड़ों प्रश्नों से मैं अभिभूत रहता था। एक दिन ऐसा हुआ कि एक वर-यात्रा हमारी ट्रामगाड़ी के पास से निकल रही थी, और उस चार वर्षीय बालक ने, यथारीति, पूछा कि वह बड़ी शोभायात्रा क्या है। विवाह-यात्रा के विषय में उसके हज़ारों-एक प्रश्नों के सभी सम्भव उत्तर उसे दिए गए, और अन्ततः उसने पूछा कि क्या उसके अपने पिता का विवाह हुआ था! इस प्रश्न से वहाँ उपस्थित सभी वृद्ध सज्जनों में ज़ोरदार हँसी फूट पड़ी, यद्यपि बालक यह समझने में असमर्थ था कि हम क्यों हँस रहे थे। जो भी हो, वह बालक किसी प्रकार अपने विवाहित पिता से सन्तुष्ट हो गया।\n\nइस घटना से शिक्षा यह है कि चूँकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है, अतः वह प्रश्न करने हेतु ही जन्म लेता है। प्रश्नों की संख्या जितनी अधिक होगी, ज्ञान तथा विज्ञान की उन्नति उतनी ही अधिक होगी। समूची भौतिक सभ्यता युवकों द्वारा अपने ज्येष्ठजनों से पूछे गए इस मूलतः विशाल प्रश्न-समूह पर आधारित है। जब वृद्धजन युवकों के प्रश्नों के उचित उत्तर देते हैं, तब सभ्यता एक के बाद एक पग आगे बढ़ती है। किन्तु सर्वाधिक बुद्धिमान् मनुष्य यह पूछता है कि मृत्यु के पश्चात् क्या होता है। अल्पबुद्धि वाले लोग कम प्रश्न करते हैं, किन्तु जो अधिक बुद्धिमान् हैं, उनके प्रश्न ऊँचे और उससे भी ऊँचे जाते हैं।\n\nसर्वाधिक बुद्धिमान् मनुष्यों में महाराज परीक्षित थे, जो समस्त संसार के महान् राजा थे, और जिन्हें संयोगवश एक ब्राह्मण ने यह शाप दिया कि सात दिनों के भीतर एक सर्प के दंश से उनकी मृत्यु होगी। जिस ब्राह्मण ने उन्हें शाप दिया, वह केवल एक बालक था, फिर भी अत्यन्त शक्तिशाली था, और चूँकि वह उस महान् राजा के महत्त्व को नहीं जानता था, अतः उस बालक ने मूर्खतावश उन्हें सात दिनों के भीतर मृत्यु को प्राप्त होने का शाप दे दिया। इस पर बाद में उस बालक के पिता ने शोक किया, जिनका राजा ने अपमान किया था। जब राजा को उस दुर्भाग्यपूर्ण शाप की सूचना मिली, तब उन्होंने तत्काल अपना राजमहल छोड़ दिया और अपनी आसन्न मृत्यु की तैयारी हेतु गंगा के तट पर चले गए, जो उनकी राजधानी के समीप था। चूँकि वे एक महान् राजा थे, अतः लगभग सभी महान् ऋषि तथा विद्वान् पण्डित उस स्थान पर एकत्र हो गए जहाँ राजा अपने नश्वर शरीर को त्यागने से पूर्व उपवास कर रहे थे। अन्ततः श्रील शुकदेव गोस्वामी, जो उस समय के सबसे युवा सन्त थे, भी वहाँ पधारे, और यद्यपि उनके महान् पिता भी उपस्थित थे, तथापि उस सभा की अध्यक्षता हेतु उन्हें सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। राजा ने श्रील शुकदेव गोस्वामी को आदरपूर्वक सम्मान का प्रमुख आसन अर्पित किया और उनसे नश्वर संसार से अपने प्रयाण के विषय में सम्बद्ध प्रश्न पूछे, जो वहाँ से सातवें दिन होने वाला था। उस महान् राजा ने, पाण्डवों के योग्य वंशज के रूप में, जो सभी महान् भक्त थे, महान् ऋषि शुकदेव के समक्ष निम्नलिखित सम्बद्ध प्रश्न रखे। \"हे महोदय, आप महान् दिव्यदर्शियों में महानतम हैं, अतः मैं विनम्रतापूर्वक आपसे इस क्षण में अपने कर्तव्यों के विषय में पूछने की प्रार्थना करता हूँ। मैं अभी अपनी मृत्यु के कगार पर हूँ। अतः इस संकटपूर्ण घड़ी में मुझे क्या करना चाहिए? कृपया मुझे बताएँ, हे प्रभु—अब मुझे क्या सुनना चाहिए, किसकी आराधना करनी चाहिए, अथवा किसका स्मरण करना चाहिए? आप जैसे महान् ऋषि किसी गृहस्थ के घर में आवश्यकता से अधिक नहीं ठहरते, अतः यह मेरा सौभाग्य है कि आप कृपापूर्वक मेरी मृत्यु के समय यहाँ पधारे हैं। अतः कृपया इस संकटपूर्ण घड़ी में मुझे अपने निर्देश दें।\"\n\nउस महान् ऋषि ने, इस प्रकार राजा द्वारा सुखपूर्वक प्रार्थना किए जाने पर, उनके प्रश्नों का प्रामाणिक रूप से उत्तर दिया, क्योंकि वे ऋषि एक महान् दिव्य विद्वान् थे और दिव्य गुणों से भी भली-भाँति सम्पन्न थे, क्योंकि वे बादरायण अथवा व्यासदेव के, जो वैदिक साहित्य के आदि संकलनकर्ता थे, योग्य पुत्र थे।\n\nश्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा, \"हे राजन्, आपका प्रश्न अत्यन्त सम्बद्ध है, और यह सभी कालों के सभी लोगों के लिए कल्याणकारी भी है। ऐसे प्रश्न, जो सबसे श्रेष्ठ हैं, इसलिए सम्बद्ध हैं क्योंकि उनकी पुष्टि वेदान्त-दर्शन की शिक्षाओं से, अर्थात् वैदिक ज्ञान के निष्कर्ष से होती है, और वे आत्मवित्-सम्मताः हैं; दूसरे शब्दों में, मुक्त आत्माएँ, जिन्हें अपनी आध्यात्मिक पहचान का पूर्ण ज्ञान है, दिव्य तत्त्व के विषय में और अधिक जानकारी प्रकट करने हेतु ऐसे सम्बद्ध प्रश्न रखती हैं।\"\n\n*श्रीमद्भागवत* महान् वेदान्त (अथवा शारीरक) सूत्रों का स्वाभाविक भाष्य है, जिनका संकलन श्रील व्यासदेव ने किया। वेदान्त-सूत्र सर्वोच्च वैदिक साहित्य हैं, और उनमें आध्यात्मिक ज्ञान के दिव्य विषय के विषय में मूलभूत प्रश्नों का केन्द्र निहित है। फिर भी, यद्यपि श्रील व्यासदेव ने इस महान् ग्रन्थ का संकलन किया, तथापि उनका मन सन्तुष्ट नहीं हुआ। तत्पश्चात् उनका भेंट श्रीनारद से, अपने आध्यात्मिक गुरु से हुई, जिन्होंने उन्हें भगवान् की पहचान का वर्णन करने का परामर्श दिया। यह परामर्श पाकर व्यासदेव ने भक्तियोग के सिद्धान्त पर ध्यान किया, जिसने उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाया कि परम सत्य क्या है और सापेक्षता, अथवा माया, क्या है। इन तथ्यों की पूर्ण अनुभूति प्राप्त करके, उन्होंने *श्रीमद्भागवत*, अथवा सुन्दर *भागवत*, की महान् कथा का संकलन किया, जिसका आरम्भ महाराज परीक्षित के जीवन से सम्बन्धित वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों से होता है।\n\n*वेदान्त-सूत्र* का आरम्भ दिव्य तत्त्व के विषय में मुख्य प्रश्न से होता है, अथातो ब्रह्म जिज्ञासा: \"अब मनुष्य को ब्रह्म, अथवा दिव्य तत्त्व, के विषय में जिज्ञासा करनी चाहिए।\"\n\nजब तक मनुष्य जीवन के पूर्ण ओज में रहता है, तब तक वह मृत्यु के उस नग्न सत्य को भूल जाता है, जिससे उसे अवश्य ही मिलना है। इस प्रकार मूर्ख मनुष्य जीवन की वास्तविक समस्याओं के विषय में कोई सम्बद्ध प्रश्न नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति यह सोचता है कि वह कभी मरेगा ही नहीं, यद्यपि वह प्रत्येक क्षण अपनी आँखों के सामने मृत्यु का प्रमाण देखता है। यहीं पशुता तथा मानवता के बीच भेद है। बकरी जैसे पशु को अपनी आसन्न मृत्यु का कोई बोध नहीं होता। यद्यपि उसका सहोदर बकरा वध किया जा रहा होता है, फिर भी वह बकरी, उसे दी गई हरी घास से लुभाई हुई, अगली बार वध होने की प्रतीक्षा में शान्तिपूर्वक खड़ी रहती है। दूसरी ओर, यदि कोई मनुष्य अपने सहचर मनुष्य को किसी शत्रु द्वारा मारा जाते देखता है, तो वह या तो अपने भाई को बचाने हेतु लड़ता है, या सम्भव हो तो अपना प्राण बचाने हेतु वहाँ से चला जाता है। यही मनुष्य तथा बकरी के बीच का अन्तर है।\n\nबुद्धिमान् मनुष्य जानता है कि मृत्यु उसके अपने जन्म के साथ ही उत्पन्न होती है। वह जानता है कि वह प्रत्येक क्षण मर रहा है और ज्यों ही उसकी आयु की अवधि समाप्त होगी, अन्तिम स्पर्श दे दिया जाएगा। अतः वह स्वयं को अगले जीवन के लिए, अथवा बार-बार के जन्म-मृत्यु रूपी रोग से मुक्ति के लिए तैयार करता है।\n\nकिन्तु मूर्ख मनुष्य यह नहीं जानता कि यह मनुष्य-योनि प्रकृति के नियमों द्वारा अतीत में आरोपित जन्म-मृत्यु की एक शृंखला के पश्चात् प्राप्त होती है। वह यह नहीं जानता कि जीव एक नित्य सत्ता है, जिसका न जन्म है न मृत्यु। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग जीव पर बाह्य आरोप हैं और भौतिक प्रकृति के साथ उसके सम्पर्क के कारण तथा अपने नित्य, दिव्य स्वरूप एवं परम समग्र के साथ गुणात्मक एकता के विस्मरण के कारण हैं।\n\nमनुष्य-जीवन इस नित्य तथ्य, अथवा सत्य, को जानने का अवसर प्रदान करता है। अतः *वेदान्त-सूत्र* का आरम्भ ही यह परामर्श देता है कि चूँकि हमें यह बहुमूल्य मनुष्य-योनि प्राप्त है, अतः अभी—यह जिज्ञासा करना हमारा कर्तव्य है कि ब्रह्म, परम सत्य, क्या है?\n\nजो मनुष्य पर्याप्त रूप से बुद्धिमान् नहीं है, वह इस दिव्य जीवन के विषय में जिज्ञासा नहीं करता; अपितु वह अनेक असम्बद्ध विषयों के विषय में पूछता है, जिनका उसके नित्य अस्तित्व से कोई सरोकार नहीं। अपने जीवन के आरम्भ से ही, वह अपनी माता, पिता, शिक्षकों, प्राध्यापकों, पुस्तकों तथा अनेक अन्य स्रोतों से पूछता रहता है, किन्तु उसे अपने वास्तविक जीवन के विषय में सही प्रकार की जानकारी प्राप्त नहीं होती।\n\nजैसा कि पहले उल्लेख किया गया, परीक्षित महाराज को यह चेतावनी-सूचना दी गई थी कि वे सात दिनों के भीतर मृत्यु को प्राप्त होंगे, और उन्होंने अगली अवस्था की तैयारी हेतु तत्काल अपना महल छोड़ दिया। राजा के पास मृत्यु की तैयारी हेतु कम-से-कम सात दिन थे, किन्तु जहाँ तक हमारा प्रश्न है, यद्यपि हम कम-से-कम यह जानते हैं कि हमारी मृत्यु निश्चित है, फिर भी उसके घटित होने के लिए निर्धारित तिथि की हमें कोई जानकारी नहीं है। मुझे यह नहीं पता कि मैं अगले ही क्षण मृत्यु को प्राप्त होने वाला हूँ या नहीं। महात्मा गांधी जैसा महान् पुरुष भी यह आकलन नहीं कर सका कि वह अगले पाँच मिनट में मृत्यु को प्राप्त होने वाला है, न ही उसके महान् सहयोगी उसकी आसन्न मृत्यु का अनुमान लगा सके। फिर भी, ऐसे सभी सज्जन स्वयं को जनता के महान् नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।\n\nमृत्यु तथा जीवन की अज्ञानता ही पशु को मनुष्य से पृथक् करती है। मनुष्य, शब्द के वास्तविक अर्थ में, अपने विषय में तथा यह कि वह क्या है, जिज्ञासा करता है। वह इस जीवन में कहाँ से आया है, और मृत्यु के पश्चात् कहाँ जा रहा है? वह त्रिविध तापों के कष्टों में क्यों डाला गया है, यद्यपि वह उन्हें नहीं चाहता? अपने बचपन से आरम्भ करके, मनुष्य अपने जीवन में अनेक वस्तुओं के विषय में जिज्ञासा करता रहता है, किन्तु वह जीवन के वास्तविक सार के विषय में कभी जिज्ञासा नहीं करता। यही पशुता है। जहाँ तक पशु-जीवन के चार सिद्धान्तों का प्रश्न है, मनुष्य तथा पशु में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि प्रत्येक प्राणी खाने, सोने, भय करने तथा मैथुन द्वारा अस्तित्व रखता है। किन्तु केवल मनुष्य-जीवन नित्य जीवन तथा दिव्य तत्त्व के विषय में तथ्यों की सम्बद्ध जिज्ञासा हेतु अभिप्रेत है। अतः मनुष्य-जीवन नित्य जीवन की खोज हेतु अभिप्रेत है, और *वेदान्त-सूत्र* मनुष्य को परामर्श देता है कि वह यह खोज अभी करे अथवा कभी नहीं। यदि मनुष्य अभी जीवन के विषय में इन सम्बद्ध विषयों की जिज्ञासा करने में चूक जाता है, तो वह प्रकृति के नियमों द्वारा निश्चय ही पुनः पशु-योनि में लौट जाएगा। अतः, भले ही कोई मूर्ख मनुष्य भौतिक विज्ञान में—अर्थात् खाने, सोने, भय करने, मैथुन इत्यादि में—उन्नत प्रतीत हो, फिर भी वह प्रकृति के नियम द्वारा मृत्यु के क्रूर हाथों से मुक्त नहीं हो सकता। प्रकृति का नियम तीन गुणों के अधीन कार्य करता है—सत्त्व, रज तथा तम। जो सत्त्वगुण की दशा में जीते हैं, वे जीवन की उच्चतर, आध्यात्मिक स्थिति में उन्नत किए जाते हैं, और जो रजोगुण की दशा में जीते हैं, वे भौतिक जगत् में उसी स्थान पर स्थित रहते हैं जहाँ वे अभी हैं, किन्तु जो तमोगुण की दशा में जीते हैं, वे निश्चय ही निम्न योनियों में अपकर्षित किए जाते हैं।\n\nमनुष्य-सभ्यता की आधुनिक व्यवस्था एक जोखिमपूर्ण व्यवस्था है, क्योंकि यह जीवन के आवश्यक सिद्धान्तों के विषय में सम्बद्ध जिज्ञासाओं के विषय में कोई शिक्षा नहीं देती। पशुओं की भाँति, लोग यह नहीं जानते कि वे प्रकृति के नियमों द्वारा वध किए जाने वाले हैं। वे हरी घास के एक गट्ठर से, अथवा एक तथाकथित आनन्दमय जीवन से सन्तुष्ट हैं, ठीक वध-गृह में प्रतीक्षारत बकरी की भाँति। मनुष्य-जीवन की ऐसी दशा को देखते हुए, हम बैक टु गॉडहेड के सन्देश द्वारा मनुष्य को बचाने का एक विनम्र प्रयत्न मात्र कर रहे हैं। यह विधि काल्पनिक नहीं है। यदि वास्तविकता का कोई युग कभी आना ही है, तो बैक टु गॉडहेड का यह सन्देश उस युग का आरम्भ है।\n\nश्रीशुकदेव गोस्वामी के अनुसार, वास्तविक तथ्य यह है कि गृहमेधी, अर्थात् वह व्यक्ति जिसने वध हेतु अभिप्रेत बकरी की भाँति स्वयं को परिवार, समाज, समुदाय, राष्ट्र, अथवा समस्त मानवता के कार्य में, पशु-जीवन की समस्याओं तथा आवश्यकताओं—अर्थात् खाने, सोने, भय करने तथा मैथुन—के सम्बन्ध में बाँध लिया है, और जिसे दिव्य तत्त्व का कोई ज्ञान नहीं है, वह पशु से उत्तम नहीं है। उसने भौतिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, अथवा क्षणभंगुर, भौतिक सरोकार के ऐसे ही अन्य विषयों के विषय में जिज्ञासा की होगी, किन्तु यदि उसने दिव्य जीवन के सिद्धान्तों के विषय में जिज्ञासा नहीं की है, तो उसे एक अन्धे मनुष्य के रूप में माना जाना चाहिए, जो अनियन्त्रित इन्द्रियों द्वारा आगे धकेला जा रहा है और किसी गड्ढे में गिरने को है। यही गृहमेधी का वर्णन है।\n\nकिन्तु गृह-मेधी का विपरीत गृह-स्थ है। गृहस्थ आश्रम, अथवा आध्यात्मिक पारिवारिक जीवन का आश्रय, संन्यासी के, अर्थात् त्याग-आश्रम के सदस्य के, जीवन के समान ही श्रेष्ठ है। चाहे कोई गृहस्थ हो अथवा संन्यासी, महत्त्वपूर्ण बात सम्बद्ध जिज्ञासाओं की है। यदि संन्यासी सम्बद्ध जिज्ञासाओं में रुचि नहीं रखता, तो वह कूट है, और गृहस्थ, अथवा गृहपति, यदि ऐसी जिज्ञासाएँ रखने की ओर प्रवृत्त है, तो वह प्रामाणिक है। किन्तु गृहमेधी केवल जीवन की पशुवत् आवश्यकताओं में रुचि रखता है। प्रकृति के नियमों द्वारा, गृहमेधी का जीवन विपत्तियों से भरा होता है, जबकि गृहस्थ का जीवन सुख से भरा होता है। किन्तु आधुनिक मनुष्य-सभ्यता में, गृहमेधी स्वयं को गृहस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। अतः हमें जानना चाहिए कि कौन क्या है। गृहमेधी का जीवन दोषों से भरा होता है, क्योंकि वह पारिवारिक जीवन जीना नहीं जानता। वह यह नहीं जानता कि उसके नियन्त्रण से परे एक शक्ति है, जो उसके कार्यों का निरीक्षण तथा नियन्त्रण करती है, और उसे अपने भावी जीवन की कोई धारणा नहीं है। गृहमेधी अपने भविष्य के प्रति अन्धा है और उसमें सम्बद्ध जिज्ञासाएँ करने की कोई योग्यता नहीं है। उसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह उन मिथ्या वस्तुओं के प्रति आसक्ति की बेड़ियों से बँधा हुआ है, जिनसे उसका सम्पर्क अपने क्षणभंगुर अस्तित्व में हुआ है।\n\nरात्रि में ऐसे गृहमेधी अपना बहुमूल्य समय सोने में अथवा अपनी विभिन्न प्रकार की यौन इच्छाओं को सिनेमा-प्रदर्शन देखकर तथा क्लबों एवं जुआ-घरों में जाकर सन्तुष्ट करने में नष्ट करते हैं, जहाँ स्त्री तथा मद्य का प्रचुर मात्रा में सेवन किया जाता है। और दिन में, वे अपना बहुमूल्य जीवन धन संचित करने में, अथवा यदि उनके पास व्यय करने हेतु पर्याप्त धन है तो अपने परिवार के सदस्यों के सुख-साधनों को समायोजित करने में नष्ट करते हैं। उनके जीवन-स्तर तथा उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताएँ उनकी धन-आय में वृद्धि के साथ बढ़ती हैं। इस प्रकार उनके व्यय की कोई सीमा नहीं होती, और वे कभी तृप्त नहीं होते। फलस्वरूप आर्थिक विकास के क्षेत्र में असीमित प्रतिस्पर्धा होती है, और इसी कारण मनुष्य-जगत् के किसी भी समाज में शान्ति नहीं है।\n\nप्रत्येक व्यक्ति अर्जन तथा व्यय के विषय में उन्हीं प्रश्नों से व्याकुल है, किन्तु अन्ततः मनुष्य को प्रकृति-माता की कृपा पर ही निर्भर रहना पड़ता है। जब उत्पादन में अभाव होता है अथवा दैव द्वारा उत्पन्न विघ्न होते हैं, तब वह दरिद्र योजना-निर्माता राजनेता इसका दोष क्रूर प्रकृति पर मढ़ता है, किन्तु यह अध्ययन करने से सावधानीपूर्वक बचता है कि प्रकृति के नियम कैसे और किसके द्वारा नियन्त्रित होते हैं। किन्तु *भगवद्गीता* बताती है कि प्रकृति के नियम परम भगवान् द्वारा नियन्त्रित होते हैं। केवल ईश्वर ही प्रकृति तथा प्राकृतिक नियमों के नियन्ता हैं। महत्त्वाकांक्षी भौतिकतावादी कभी-कभी प्रकृति के नियम के एक अंश की परीक्षा करते हैं, किन्तु वे इन नियमों के रचयिता को जानने की चिन्ता कभी नहीं करते। उनमें से अधिकांश किसी परम पुरुष अथवा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, जो प्रकृति के नियमों को नियन्त्रित करते हैं। अपितु, वे केवल उन सिद्धान्तों से सरोकार रखते हैं जिनके द्वारा विभिन्न तत्त्व परस्पर क्रिया करते हैं, किन्तु वे उस परम निर्देशन का कोई उल्लेख नहीं करते जो ऐसी अन्तःक्रियाओं को सम्भव बनाता है। इस सम्बन्ध में उनके पास कोई सम्बद्ध प्रश्न अथवा उत्तर नहीं हैं। किन्तु वेदान्त-सूत्रों का द्वितीय सूत्र ब्रह्म के विषय में आवश्यक प्रश्न का उत्तर यह कहकर देता है कि परम ब्रह्म, परम दिव्य तत्त्व, वे हैं जिनसे प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होती है। अन्ततः, वे ही परम पुरुष हैं।\n\nमूर्ख गृहमेधी न केवल अपने द्वारा प्राप्त विशेष प्रकार के शरीर की क्षणभंगुर प्रकृति से अनभिज्ञ रहता है, अपितु वह अपने जीवन के दैनिक कार्यों में अपने सामने जो घट रहा है, उसकी वास्तविक प्रकृति के प्रति भी अन्धा रहता है। वह अपने पिता को मरते, अपनी माता को मरते, अथवा किसी सम्बन्धी या पड़ोसी को मरते देख सकता है, फिर भी वह यह सम्बद्ध जिज्ञासा नहीं करता कि उसके परिवार के अन्य विद्यमान सदस्य मरेंगे या नहीं। कभी-कभी वह सोचता है और जानता है कि उसके परिवार के सभी सदस्य आज अथवा कल मर जाएँगे और वह भी मर जाएगा। वह जानता होगा कि समूचा पारिवारिक तमाशा—अथवा, उसी प्रकार, समुदाय, समाज, राष्ट्र तथा ऐसी सभी वस्तुओं का समूचा तमाशा—वायु में एक क्षणभंगुर बुलबुले मात्र है, जिसका कोई स्थायी मूल्य नहीं है। फिर भी वह ऐसी क्षणभंगुर व्यवस्थाओं के पीछे पागल है और किसी भी सम्बद्ध जिज्ञासा से सरोकार नहीं रखता। उसे यह कोई ज्ञान नहीं है कि अपनी मृत्यु के पश्चात् उसे कहाँ जाना है। वह अपने परिवार, समाज, अथवा राष्ट्र की क्षणभंगुर व्यवस्थाओं हेतु अत्यन्त परिश्रम करता है, किन्तु वह न तो अपने लिए और न उन अन्य लोगों के लिए कोई भावी व्यवस्था करता है जो जीवन की इस वर्तमान अवस्था से प्रयाण कर जाएँगे।\n\nरेलगाड़ी के डिब्बे जैसे किसी सार्वजनिक वाहन में, हम कुछ अपरिचित मित्रों से मिलते हैं और साथ बैठते हैं तथा अल्प समय के लिए उसी वाहन के सदस्य बन जाते हैं, किन्तु यथासमय हम पृथक् हो जाते हैं, फिर कभी न मिलने के लिए। इसी प्रकार, जीवन के एक दीर्घ प्रवास में, हमें एक तथाकथित परिवार, देश, अथवा समाज में एक क्षणभंगुर बैठने का स्थान मिल जाता है, किन्तु जब समय समाप्त हो जाता है, तब हम अनिच्छापूर्वक एक-दूसरे से पृथक् कर दिए जाते हैं, फिर कभी न मिलने के लिए। जीवन में हमारी क्षणभंगुर व्यवस्थाओं तथा इन क्षणभंगुर व्यवस्थाओं में हमारे मित्रों से सम्बद्ध अनेक प्रश्न हैं, किन्तु जो मनुष्य गृहमेधी है, वह कभी किसी स्थायी प्रकृति की वस्तुओं के विषय में जिज्ञासा नहीं करता। हम सभी विभिन्न नेतृत्व-स्तरों पर स्थायी योजनाएँ बनाने में व्यस्त हैं, वस्तुओं की उनके यथार्थ रूप में स्थायी प्रकृति को जाने बिना। श्रीपाद शंकराचार्य, जिन्होंने विशेष रूप से समाज में इस अज्ञान को दूर करने का प्रयत्न किया और जिन्होंने सर्वव्यापी निराकार ब्रह्म के विषय में आध्यात्मिक ज्ञान के मत का प्रतिपादन किया, हताशा में कहते हैं, \"बालक खेल में लगे हैं, युवा बालक युवतियों के साथ तथाकथित प्रेम-प्रसंगों में लगे हैं, और वृद्ध संघर्ष के विफल जीवन को समायोजित करने के विषय में गम्भीरतापूर्वक चिन्तित हैं। किन्तु, हाय, कोई भी ब्रह्म, परम सत्य, के विज्ञान के विषय में सम्बद्ध जिज्ञासा करने को तैयार नहीं है।\"\n\nश्रीशुकदेव गोस्वामी ने, जिनसे महाराज परीक्षित ने निर्देश माँगा था, राजा की सम्बद्ध जिज्ञासाओं का उत्तर उन्हें इस प्रकार परामर्श देकर दिया:\n\ntasmād bhārata sarvātmā\n\nbhagavān īśvaro hariḥ\n\nśrotavyaḥ kīrtitavyaś ca\n\nsmartavyaś cecchatābhayam\n\n\"हे भरतवंशी, मरणशील मनुष्यों का यह कर्तव्य है कि वे भगवान् के विषय में जिज्ञासा करें, श्रवण करें, गुणगान करें तथा उनका ध्यान करें, जो अपनी ऐश्वर्य-पूर्णता के कारण सर्वाधिक आकर्षक पुरुष हैं। उन्हें हरि कहा जाता है, क्योंकि केवल वे ही किसी जीव के बद्ध अस्तित्व को मिटा सकते हैं। यदि हम बद्ध अस्तित्व से मुक्त होना चाहते ही हैं, तो हमें परम सत्य के विषय में सम्बद्ध जिज्ञासा करनी चाहिए, ताकि वे प्रसन्न होकर हमें जीवन में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करें।\" (*श्रीमद्भागवत* 2.1.5)\n\nश्रीशुकदेव गोस्वामी ने परम भगवान् के सम्बन्ध में विशेष रूप से चार शब्दों का प्रयोग किया है। ये शब्द परम पुरुष, अथवा परब्रह्म, को अन्य पुरुषों से पृथक् करते हैं, जो गुणात्मक रूप से उनके समान हैं। परम भगवान् को सर्वात्मा, अथवा सर्वव्यापी, कहकर सम्बोधित किया जाता है, क्योंकि कोई भी उनसे पृथक् नहीं है, यद्यपि सबको यह अनुभूति नहीं होती। भगवान्, अपने पूर्ण प्रतिनिधि-रूप द्वारा, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा, अर्थात् अन्तर्यामी, के रूप में प्रत्येक व्यष्टि आत्मा के साथ निवास करते हैं। अतः प्रत्येक व्यष्टि आत्मा का उनके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। उनके साथ इस नित्य विद्यमान घनिष्ठ सम्बन्ध का विस्मरण ही अनादि काल से बद्ध जीवन का कारण है। किन्तु चूँकि वे भगवान्, अर्थात् परम पुरुष, हैं, अतः वे किसी भक्त की प्रतिक्रिया-सहित पुकार का तत्काल प्रत्युत्तर दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त, चूँकि वे पूर्ण पुरुष हैं, अतः उनका सौन्दर्य, ऐश्वर्य, यश, बल, ज्ञान तथा त्याग, सभी व्यष्टि आत्मा के लिए दिव्य आनन्द के असीम स्रोत हैं। व्यष्टि आत्मा इन सभी विभिन्न ऐश्वर्यों से तब आकृष्ट हो जाती है जब वे अन्य बद्ध आत्माओं द्वारा अपूर्ण रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं, किन्तु व्यष्टि आत्मा ऐसे अपूर्ण रूपों से सन्तुष्ट नहीं होती, अतः वह निरन्तर उस पूर्ण को खोजती है। भगवान् के सौन्दर्य की कोई तुलना नहीं, न ही उनके ज्ञान तथा त्याग की। किन्तु सबसे बढ़कर, वे ईश्वर, अर्थात् परम नियन्ता, हैं। हम इस समय इस महान् राजा की पुलिस-कार्रवाई द्वारा नियन्त्रित किए जा रहे हैं। यह पुलिस-नियन्त्रण हम पर नियम के प्रति हमारी अवज्ञा के कारण आरोपित है। किन्तु चूँकि भगवान् हरि हैं, अतः वे हमें आध्यात्मिक अस्तित्व में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करके हमारे बद्ध जीवन को लुप्त करने में समर्थ हैं। अतः प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह उनके विषय में सम्बद्ध जिज्ञासा करे और इस प्रकार भगवान् के पास लौट जाए।\n\nआत्मा-अनुसन्धान\n\nसन् 1972 में, एक विशिष्ट विशेषज्ञ-मण्डली विंडसर, ओंटारियो में मिली और उसने \"मृत्यु के यथार्थ क्षण को परिभाषित करने के प्रयासों से सम्बद्ध समस्याओं\" पर विचार-विमर्श किया। मण्डली के सदस्यों में विश्वविख्यात हृदय-शल्यचिकित्सक डॉ. विलफ्रेड जी. बिगेलो, ओंटारियो उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एडसन एल. हेन्स, तथा विंडसर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष जे. फ्रांसिस लेडी सम्मिलित थे। डॉ. बिगेलो ने आत्मा के अस्तित्व का समर्थन किया और यह निर्धारित करने हेतु व्यवस्थित अनुसन्धान का आग्रह किया कि आत्मा क्या है और कहाँ से आती है। डॉ. बिगेलो तथा अन्य मण्डली-सदस्यों की टिप्पणियाँ बाद में मॉन्ट्रियल गज़ट में प्रकाशित हुईं। जब वह लेख श्रील प्रभुपाद के ध्यान में आया, तब उन्होंने डॉ. बिगेलो को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने आत्मा के विज्ञान का सारगर्भित वैदिक ज्ञान प्रस्तुत किया और उसे वैज्ञानिक रूप से समझने हेतु एक व्यावहारिक विधि सुझाई। गज़ट का लेख तथा श्रील प्रभुपाद का उत्तर इस प्रकार है।\n\nगज़ट का शीर्षक:\n\nहृदय-शल्यचिकित्सक जानना चाहते हैं कि आत्मा क्या है\n\nविंडसर—एक विश्वविख्यात कनाडाई हृदय-शल्यचिकित्सक कहते हैं कि उनका विश्वास है कि शरीर में एक आत्मा है, जो मृत्यु के समय प्रस्थान कर जाती है, और धर्मशास्त्रियों को इसके विषय में और अधिक जानने का प्रयत्न करना चाहिए।\n\nटोरंटो जनरल हॉस्पिटल में हृदय-धमनी शल्यचिकित्सा इकाई के प्रमुख डॉ. विलफ्रेड जी. बिगेलो ने कहा कि \"एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो विश्वास करता है कि आत्मा है,\" उन्हें लगता है कि वह समय आ गया है \"जब इसमें से रहस्य को निकाला जाए और जाना जाए कि यह क्या है।\"\n\nबिगेलो उस मण्डली के एक सदस्य थे, जो एसेक्स काउंटी चिकित्सा-विधिक समाज के समक्ष मृत्यु के यथार्थ क्षण को परिभाषित करने के प्रयासों से सम्बद्ध समस्याओं पर विचार-विमर्श हेतु उपस्थित हुई थी।\n\nयह प्रश्न हृदय तथा अन्य अंगों के प्रत्यारोपण के युग में, उन प्रकरणों में जब दाता अनिवार्यतः मर रहे होते हैं, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बन गया है।\n\nकनाडाई चिकित्सा संघ ने मृत्यु की एक व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा प्रस्तुत की है, जो उस क्षण को मृत्यु बताती है जब रोगी मूर्च्छावस्था में हो, किसी भी प्रकार के उद्दीपन का कोई प्रत्युत्तर न दे, और यन्त्र पर अंकित मस्तिष्क-तरंगें समतल हों।\n\nमण्डली के अन्य सदस्य ओंटारियो उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एडसन एल. हेन्स तथा विंडसर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष जे. फ्रांसिस लेडी थे।\n\nबिगेलो ने, विचार-विमर्श के दौरान उठाए गए बिन्दुओं को विस्तार से बताते हुए, बाद में एक साक्षात्कार में कहा कि शल्यचिकित्सक के रूप में उनके बत्तीस वर्षों ने उन्हें इसमें कोई सन्देह नहीं रहने दिया कि आत्मा है।\n\n\"कुछ ऐसे प्रकरण होते हैं जब आप उस क्षण उपस्थित होते हैं जब लोग जीवित अवस्था से मृत्यु को प्राप्त होते हैं, और कुछ रहस्यमय परिवर्तन घटित होते हैं।\n\n\"सबसे अधिक ध्यान देने योग्य परिवर्तनों में से एक है आँखों में जीवन अथवा कान्ति का अकस्मात् लोप। वे अपारदर्शी और सचमुच निर्जीव हो जाती हैं।\n\n\"आप जो देखते हैं, उसे प्रलेखित करना कठिन है। वस्तुतः, मुझे नहीं लगता कि इसे भली-भाँति प्रलेखित किया जा सकता है।\"\n\nबिगेलो, जो \"गहन-शीतलन\" शल्यक्रिया की उस तकनीक में, जिसे अल्पताप कहा जाता है, अपने अग्रणी कार्य हेतु तथा अपनी हृदय-कपाट शल्यक्रिया हेतु विश्वविख्यात हुए, ने कहा कि \"आत्मा-अनुसन्धान\" को विश्वविद्यालय के भीतर धर्मशास्त्र तथा सम्बद्ध विद्याओं द्वारा हाथ में लिया जाना चाहिए।\n\nइस विचार-विमर्श के दौरान लेडी ने कहा कि \"यदि आत्मा है, तो आप उसे देख नहीं पाएँगे। आप उसे पा नहीं सकेंगे।\"\n\n\"यदि कोई जीवनी-शक्ति अथवा प्राण का सिद्धान्त है, तो वह क्या है?\" समस्या यह थी कि \"आत्मा कहीं विशेष रूप से, भौगोलिक रूप से, विद्यमान नहीं है। वह सर्वत्र है और फिर भी शरीर में कहीं नहीं है।\"\n\n\"प्रयोग आरम्भ करना तो अच्छा होगा, किन्तु मुझे नहीं पता कि आप इनमें से किसी भी वस्तु को कैसे साध पाएँगे,\" लेडी ने कहा। उन्होंने कहा कि इस विचार-विमर्श ने उन्हें उस सोवियत अन्तरिक्षयात्री की याद दिला दी, जो अन्तरिक्ष से लौटकर यह बताने आया था कि कोई ईश्वर नहीं है, क्योंकि उसने उन्हें वहाँ ऊपर नहीं देखा।\n\nहो सकता है ऐसा हो, बिगेलो ने कहा, किन्तु आधुनिक चिकित्सा में जब कोई ऐसी वस्तु सामने आती है, जिसकी व्याख्या नहीं हो पाती, तब \"ध्येय-वाक्य यह होता है कि उत्तर खोजो, उसे प्रयोगशाला में ले जाओ, उसे कहीं ऐसे स्थान पर ले जाओ जहाँ तुम सत्य की खोज कर सको।\"\n\nकेन्द्रीय प्रश्न, बिगेलो ने कहा, यह था कि \"आत्मा कहाँ है और कहाँ से आती है?\"\n\nश्रील प्रभुपाद वैदिक प्रमाण देते हैं\n\nप्रिय डॉ. बिगेलो:\n\nकृपया मेरा अभिवादन स्वीकार करें। हाल ही में मैंने गज़ट में राय कोरेली द्वारा लिखित एक लेख पढ़ा, जिसका शीर्षक था \"हृदय-शल्यचिकित्सक जानना चाहते हैं कि आत्मा क्या है,\" और वह अत्यन्त रोचक था। आपकी टिप्पणियाँ महान् अन्तर्दृष्टि प्रकट करती हैं, अतः मैंने इस विषय पर आपको लिखने का विचार किया। सम्भवतः आप जानते होंगे कि मैं अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ का संस्थापक-आचार्य हूँ। कनाडा में मेरे कई मन्दिर हैं—मॉन्ट्रियल, टोरंटो, वैंकूवर तथा हैमिल्टन। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन विशेष रूप से प्रत्येक आत्मा को उसकी मूल, आध्यात्मिक स्थिति की शिक्षा देने हेतु अभिप्रेत है।\n\nनिःसन्देह आत्मा जीव के हृदय में विद्यमान है, और वह शरीर के पालन-पोषण हेतु समस्त ऊर्जाओं का स्रोत है। आत्मा की ऊर्जा समस्त शरीर में व्याप्त है, और इसे चेतना कहा जाता है। चूँकि यह चेतना आत्मा की ऊर्जा को समस्त शरीर में फैलाती है, अतः मनुष्य शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा तथा सुख का अनुभव कर सकता है। आत्मा व्यष्टि है, और वह एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करती रहती है, ठीक जैसे मनुष्य शैशव से बाल्यावस्था में, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में, किशोरावस्था से यौवन में, और फिर प्रौढ़ वृद्धावस्था में संक्रमण करता है। तत्पश्चात् मृत्यु नामक परिवर्तन तब घटित होता है जब हम एक नए शरीर में परिवर्तित होते हैं, ठीक जैसे हम अपना पुराना वस्त्र बदलकर नया वस्त्र धारण करते हैं। इसे आत्मा का देहान्तरण कहा जाता है।\n\nजब कोई आत्मा आध्यात्मिक जगत् में अपने वास्तविक घर को भूलकर इस भौतिक जगत् का भोग करना चाहती है, तब वह अस्तित्व के कठोर संघर्ष का यह जीवन ग्रहण करती है। बार-बार के जन्म, मृत्यु, रोग तथा वृद्धावस्था के इस अप्राकृतिक जीवन को तब रोका जा सकता है जब उसकी चेतना ईश्वर की परम चेतना के साथ संयोजित हो जाए। यही हमारे कृष्ण-आन्दोलन का मूल सिद्धान्त है।\n\nजहाँ तक हृदय-प्रत्यारोपण का प्रश्न है, जब तक हृदय में आत्मा विद्यमान न हो, तब तक सफलता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अतः आत्मा की उपस्थिति को स्वीकार करना ही होगा। मैथुन में, यदि आत्मा न हो, तो न गर्भाधान होता है, न गर्भधारण। गर्भनिरोध गर्भाशय को इस प्रकार बिगाड़ देता है कि वह आत्मा के लिए उत्तम स्थान नहीं रह जाता। यह ईश्वर के आदेश के विरुद्ध है। ईश्वर के आदेश से, किसी आत्मा को एक विशेष गर्भ में भेजा जाता है, किन्तु इस गर्भनिरोधक द्वारा उसे वह गर्भ नहीं मिलता और उसे किसी अन्य में रखा जाना पड़ता है। यह परमेश्वर के प्रति अवज्ञा है। उदाहरणार्थ, एक ऐसे मनुष्य को लें, जिसे एक विशेष अपार्टमेंट में रहना है। यदि वहाँ की स्थिति इतनी विक्षुब्ध हो कि वह उस अपार्टमेंट में प्रवेश ही न कर सके, तो वह बड़ी हानि में पड़ जाता है। यह अवैध हस्तक्षेप है और दण्डनीय है।\n\n\"आत्मा-अनुसन्धान\" का यह उपक्रम निश्चय ही विज्ञान की उन्नति का चिह्न होगा। किन्तु विज्ञान की उन्नति आत्मा को खोज नहीं पाएगी। आत्मा की उपस्थिति को केवल परिस्थितिजन्य बोध के आधार पर ही स्वीकार किया जा सकता है। आप वैदिक साहित्य में पाएँगे कि आत्मा का परिमाण एक बिन्दु के आकार का दस-हज़ारवाँ भाग है। भौतिक वैज्ञानिक किसी बिन्दु की लम्बाई तथा चौड़ाई नहीं माप सकता। अतः भौतिक वैज्ञानिक के लिए आत्मा को पकड़ पाना सम्भव नहीं है। आप आत्मा के अस्तित्व को केवल प्रामाणिक स्रोत से ग्रहण करके ही स्वीकार कर सकते हैं। जो कुछ महानतम वैज्ञानिक खोज रहे हैं, उसे हमने बहुत पहले ही समझा दिया है।\n\nज्यों ही मनुष्य आत्मा के अस्तित्व को समझ लेता है, त्यों ही वह तत्काल ईश्वर के अस्तित्व को समझ सकता है। ईश्वर तथा आत्मा के बीच अन्तर यह है कि ईश्वर एक अत्यन्त महान् आत्मा हैं, और जीव एक अत्यन्त लघु आत्मा है; किन्तु गुणात्मक रूप से वे समान हैं। अतः ईश्वर सर्वव्यापी हैं, और जीव स्थानिक है। किन्तु प्रकृति तथा गुण समान हैं।\n\nकेन्द्रीय प्रश्न, आपके अनुसार, यह है कि \"आत्मा कहाँ है, और कहाँ से आती है?\" इसे समझना कठिन नहीं है। हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि आत्मा जीव के हृदय में निवास करती है और मृत्यु के पश्चात् किसी अन्य शरीर में आश्रय ले लेती है। मूलतः आत्मा ईश्वर से आती है। ठीक जैसे कोई स्फुलिंग अग्नि से निकलता है, और जब वह स्फुलिंग नीचे गिरता है तो बुझा हुआ प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा का स्फुलिंग मूलतः आध्यात्मिक जगत् से भौतिक जगत् में आता है। भौतिक जगत् में वह तीन भिन्न दशाओं में गिर पड़ता है, जिन्हें प्रकृति के गुण कहा जाता है। जब अग्नि का कोई स्फुलिंग सूखी घास पर गिरता है, तो अग्निमय गुण बना रहता है; जब वह स्फुलिंग भूमि पर गिरता है, तब तक वह अपना अग्निमय प्राकट्य प्रकट नहीं कर पाता जब तक भूमि अनुकूल रूप से स्थित न हो; और जब वह स्फुलिंग जल पर गिरता है, तो बुझ जाता है। इसी प्रकार, हमें जीवन की तीन प्रकार की दशाएँ मिलती हैं। एक जीव अपनी आध्यात्मिक प्रकृति को पूर्णतया भूला हुआ है; दूसरा प्रायः भूला हुआ है किन्तु फिर भी उसमें आध्यात्मिक प्रकृति की एक सहज वृत्ति है; और तीसरा पूर्णतया आध्यात्मिक पूर्णता की खोज में है। आत्मा के आध्यात्मिक स्फुलिंग द्वारा आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति हेतु एक प्रामाणिक विधि है, और यदि उसका उचित मार्गदर्शन हो, तो उसे अत्यन्त सरलता से वापस घर, भगवान् के पास भेज दिया जाता है, जहाँ से वह मूलतः गिरा था।\n\nयदि वैदिक साहित्य की यह प्रामाणिक जानकारी आधुनिक वैज्ञानिक बोध के आधार पर आधुनिक संसार के समक्ष प्रस्तुत की जाए, तो यह मनुष्य-समाज के लिए एक महान् योगदान होगा। तथ्य तो पहले से ही विद्यमान है। उसे केवल आधुनिक बोध के लिए प्रस्तुत किया जाना है।\n\nआपका सच्चा,\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी"}
{"ref": "ssr/2", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/2/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "आध्यात्मिक गुरु का वरण", "purport": "गुरु क्या है?\n\nगुरु शब्द सुनते ही, हम एक व्यंग्यचित्र-सदृश छवि की कल्पना करने लगते हैं: लम्बी, लटकती दाढ़ी तथा प्रवाहमान वस्त्रों वाला एक विचित्र दिखने वाला वृद्ध व्यक्ति, जो दूरस्थ, गूढ़ सत्यों पर ध्यान कर रहा है। अथवा हम एक ऐसे लौकिक ठग की कल्पना करते हैं, जो युवा साधकों की आध्यात्मिक भोलेपन को भुना रहा है। किन्तु वास्तव में गुरु क्या है? वह ऐसा क्या जानता है जो हम नहीं जानते? वह हमें किस प्रकार प्रबुद्ध करता है? सन् 1973 में इंग्लैण्ड में दिए गए एक प्रवचन में, श्रील प्रभुपाद कुछ प्रबोधक उत्तर प्रदान करते हैं।\n\noṁ ajñāna-timirāndhasya\n\njñānāñjana-śalākayā\n\ncakṣur unmīlitaṁ yena\n\ntasmai śrī-gurave namaḥ\n\n\"मेरा जन्म घोरतम अज्ञान में हुआ था, और मेरे गुरु, मेरे आध्यात्मिक गुरु, ने ज्ञान की मशाल से मेरे नेत्र खोल दिए। मैं उन्हें अपना सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ।\"\n\nअज्ञान शब्द का अर्थ है \"अनभिज्ञता\" अथवा \"अन्धकार\"। यदि इस कक्ष के सभी प्रकाश तत्काल बुझ जाएँ, तो हम यह नहीं बता पाएँगे कि हम अथवा अन्य कहाँ बैठे हैं। सब कुछ भ्रमपूर्ण हो जाएगा। इसी प्रकार, हम सभी इस भौतिक जगत् में अन्धकार में हैं, जो तमस् का जगत् है। तमस् अथवा तिमिर का अर्थ है \"अन्धकार\"। यह भौतिक जगत् अन्धकारमय है, अतः इसे प्रकाशित करने हेतु सूर्यप्रकाश अथवा चन्द्रप्रकाश की आवश्यकता होती है। किन्तु एक अन्य जगत् है, एक आध्यात्मिक जगत्, जो इस अन्धकार से परे है। उस जगत् का वर्णन श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* (15.6) में करते हैं:\n\nna tad bhāsayate sūryo\n\nna śaśāṅko na pāvakaḥ\n\nyad gatvā na nivartante\n\ntad dhāma paramaṁ mama\n\n\"मेरा वह धाम न सूर्य से प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा से, न विद्युत् से। जो उसे प्राप्त कर लेता है, वह कभी इस भौतिक जगत् में नहीं लौटता।\"\n\nगुरु का कार्य अपने शिष्यों को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाना है। इस समय प्रत्येक व्यक्ति अज्ञान के कारण कष्ट भोग रहा है, ठीक जैसे कोई अज्ञानवश रोग को प्राप्त होता है। यदि कोई स्वास्थ्य-सिद्धान्तों को नहीं जानता, तो वह यह नहीं जान पाएगा कि उसे क्या संक्रमित करेगा। अतः अज्ञान के कारण संक्रमण होता है, और हम रोग से कष्ट भोगते हैं। कोई अपराधी कह सकता है, \"मैं नियम नहीं जानता था,\" किन्तु यदि वह अपराध करता है तो उसे क्षमा नहीं किया जाएगा। अज्ञान कोई बहाना नहीं है। इसी प्रकार, कोई बालक, यह न जानते हुए कि अग्नि जला देगी, अग्नि को स्पर्श करेगा। अग्नि यह नहीं सोचती, \"यह एक बालक है, और यह नहीं जानता कि मैं जला दूँगी।\" नहीं, कोई बहाना नहीं है। ठीक जैसे राज्य के नियम हैं, वैसे ही प्रकृति के भी कठोर नियम हैं, और ये नियम हमारे उनके प्रति अज्ञान के बावजूद कार्य करेंगे। यदि हम अज्ञानवश कुछ ग़लत करते हैं, तो हमें कष्ट भोगना ही पड़ता है। यही नियम है। चाहे वह नियम राज्य का नियम हो अथवा प्रकृति का नियम, यदि हम उसे भंग करते हैं तो हम कष्ट भोगने का जोखिम उठाते हैं।\n\nगुरु का कार्य यह देखना है कि कोई भी मनुष्य इस भौतिक जगत् में कष्ट न भोगे। कोई यह दावा नहीं कर सकता कि वह कष्ट नहीं भोग रहा। यह सम्भव ही नहीं है। इस भौतिक जगत् में तीन प्रकार के कष्ट हैं: अध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदैविक। ये भौतिक शरीर एवं मन से, अन्य जीवों से, तथा प्रकृति की शक्तियों से उत्पन्न होने वाले ताप हैं। हम मानसिक व्यथा भोग सकते हैं, अथवा हम अन्य जीवों से—चींटियों, मच्छरों अथवा मक्खियों से—कष्ट भोग सकते हैं, अथवा हम किसी उच्चतर शक्ति के कारण कष्ट भोग सकते हैं। वर्षा न हो, अथवा बाढ़ आ जाए। अत्यधिक ताप हो अथवा अत्यधिक शीत। प्रकृति द्वारा अनेक प्रकार के कष्ट आरोपित किए जाते हैं। इस प्रकार भौतिक जगत् के भीतर तीन प्रकार के ताप हैं, और प्रत्येक व्यक्ति इनमें से एक, दो अथवा तीन से कष्ट भोग रहा है। कोई यह नहीं कह सकता कि वह कष्ट से पूर्णतया मुक्त है।\n\nतब हम पूछ सकते हैं कि जीव कष्ट क्यों भोग रहा है। उत्तर है: अज्ञानवश। वह यह नहीं सोचता, \"मैं भूलें कर रहा हूँ और एक पापमय जीवन जी रहा हूँ; यही कारण है कि मैं कष्ट भोग रहा हूँ।\" अतः गुरु का प्रथम कार्य अपने शिष्य को इस अज्ञान से उबारना है। हम अपने बच्चों को कष्ट से बचाने हेतु विद्यालय भेजते हैं। यदि हमारे बच्चे शिक्षा प्राप्त नहीं करते, तो हमें भय रहता है कि वे भविष्य में कष्ट भोगेंगे। गुरु देखते हैं कि कष्ट अज्ञान के कारण है, जिसकी तुलना अन्धकार से की जाती है। अन्धकार में पड़े मनुष्य को कैसे बचाया जा सकता है? प्रकाश द्वारा। गुरु ज्ञान की मशाल लेते हैं और उसे अन्धकार से घिरे जीव के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वह ज्ञान उसे अज्ञान के अन्धकार के कष्टों से मुक्त करता है।\n\nकोई पूछ सकता है कि क्या गुरु नितान्त आवश्यक है। *वेद* हमें बताते हैं कि वह आवश्यक है:\n\ntad-vijñānārthaṁ sa gurum evābhigacchet\n\nsamit-pāṇiḥ śrotriyaṁ brahma-niṣṭham\n\n[MU 1.2.12]\n\n*वेद* हमें आदेश देते हैं कि हम एक गुरु को खोजें; वस्तुतः, वे कहते हैं कि उस गुरु को खोजें, केवल किसी गुरु को नहीं। गुरु एक ही है, क्योंकि वह गुरु-परम्परा में आता है। व्यासदेव तथा श्रीकृष्ण ने पाँच हज़ार वर्ष पूर्व जो शिक्षा दी, वही अब भी सिखाई जा रही है। दोनों उपदेशों में कोई अन्तर नहीं है। यद्यपि सैकड़ों-हज़ारों आचार्यगण आए और गए, तथापि सन्देश एक ही है। वास्तविक गुरु दो नहीं हो सकते, क्योंकि वास्तविक गुरु अपने पूर्ववर्तियों से भिन्न नहीं बोलते। कुछ आध्यात्मिक शिक्षक कहते हैं, \"मेरे मत में तुम्हें यह करना चाहिए,\" किन्तु यह गुरु नहीं है। ऐसे तथाकथित गुरु केवल धूर्त हैं। वास्तविक गुरु का केवल एक ही मत होता है, और वह वही मत है जो श्रीकृष्ण, व्यासदेव, नारद, अर्जुन, श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा गोस्वामियों द्वारा व्यक्त किया गया है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* कही, और व्यासदेव ने उसे अंकित किया। श्रील व्यासदेव ने यह नहीं कहा, \"यह मेरा मत है।\" अपितु, उन्होंने लिखा, श्री-भगवान् उवाच, अर्थात् \"पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कहते हैं।\" व्यासदेव ने जो कुछ लिखा, वह मूलतः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा कहा गया था। श्रील व्यासदेव ने अपना मत नहीं दिया।\n\nफलस्वरूप, श्रील व्यासदेव एक गुरु हैं। वे श्रीकृष्ण के शब्दों का ग़लत अर्थ नहीं लगाते, अपितु उन्हें ठीक वैसे ही प्रेषित करते हैं जैसे वे कहे गए थे। यदि हम कोई तार भेजते हैं, तो जो व्यक्ति वह तार पहुँचाता है, उसे उसे सुधारना, सम्पादित करना, अथवा उसमें कुछ जोड़ना नहीं पड़ता। वह उसे केवल प्रस्तुत कर देता है। यही गुरु का कार्य है। गुरु यह व्यक्ति हो अथवा वह, किन्तु सन्देश एक ही है; अतः कहा जाता है कि गुरु एक है।\n\nगुरु-परम्परा में हमें केवल उसी विषय की पुनरावृत्ति मिलती है। *भगवद्गीता* (9.34) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nman-manā bhava mad-bhakto\n\nmad-yājī māṁ namaskuru\n\nmām evaiṣyasi yuktvaivam\n\nātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ\n\n\"अपने मन को सदा मेरा चिन्तन करने में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो, और मेरी आराधना करो। पूर्ण रूप से मुझमें तल्लीन होकर, तुम निश्चय ही मुझे प्राप्त करोगे।\" इन्हीं उपदेशों को सभी आचार्यगण, जैसे रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु, ने दोहराया। छहों गोस्वामियों ने भी वही सन्देश प्रेषित किया, और हम केवल उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। कोई अन्तर नहीं है। हम श्रीकृष्ण के शब्दों की यह कहकर व्याख्या नहीं करते कि \"मेरे मत में, कुरुक्षेत्र का युद्धक्षेत्र मनुष्य-शरीर का प्रतीक है।\" ऐसी व्याख्याएँ धूर्तों द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। संसार में अनेक धूर्त गुरु हैं जो अपना मत देते हैं, किन्तु हम किसी भी धूर्त को चुनौती दे सकते हैं। कोई धूर्त गुरु कह सकता है, \"मैं ईश्वर हूँ,\" अथवा, \"हम सभी ईश्वर हैं।\" यह ठीक है, किन्तु हमें शब्दकोश से यह जान लेना चाहिए कि ईश्वर का अर्थ क्या है। सामान्यतः, कोई शब्दकोश हमें बताएगा कि ईश्वर शब्द परम सत्ता को इंगित करता है। अतः हम ऐसे गुरु से पूछ सकते हैं, \"क्या आप परम सत्ता हैं?\" यदि वह इसे समझ न सके, तो हमें परम का अर्थ देना चाहिए। कोई भी शब्दकोश हमें बताएगा कि परम का अर्थ है \"सर्वोच्च अधिकारी।\" तब हम पूछ सकते हैं, \"क्या आप सर्वोच्च अधिकारी हैं?\" ऐसा धूर्त गुरु, भले ही स्वयं को ईश्वर घोषित करता हो, ऐसे प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। ईश्वर परम सत्ता तथा सर्वोच्च अधिकारी है। कोई भी उनके समान अथवा उनसे बड़ा नहीं है। फिर भी अनेक गुरु-ईश्वर हैं, अनेक धूर्त हैं जो स्वयं को परम होने का दावा करते हैं। ऐसे धूर्त भौतिक अस्तित्व के अन्धकार से बच निकलने में हमारी सहायता नहीं कर सकते। वे आध्यात्मिक ज्ञान की मशाल से हमारे अन्धकार को प्रकाशित नहीं कर सकते।\n\nप्रामाणिक गुरु केवल वही प्रस्तुत करेगा जो परम गुरु, ईश्वर, प्रामाणिक शास्त्र में कहते हैं। गुरु गुरु-परम्परा के सन्देश को बदल नहीं सकता।\n\nहमें यह समझना चाहिए कि हम परम सत्य को खोजने हेतु अनुसन्धान नहीं कर सकते। चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं कहा, \"मेरे गुरु महाराज, मेरे आध्यात्मिक गुरु, ने मुझे एक महामूर्ख माना।\" जो अपने गुरु के समक्ष एक महामूर्ख बना रहता है, वही स्वयं गुरु है। किन्तु यदि कोई कहता है, \"मैं इतना उन्नत हूँ कि अपने गुरु से उत्तम बोल सकता हूँ,\" तो वह केवल एक धूर्त है। *भगवद्गीता* (4.2) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nevaṁ paramparā-prāptam\n\nimaṁ rājarṣayo viduḥ\n\nsa kāleneha mahatā\n\nyogo naṣṭaḥ parantapa\n\n\"यह परम विज्ञान इस प्रकार गुरु-परम्परा की शृंखला द्वारा प्राप्त हुआ, और राजर्षियों ने उसे उसी प्रकार समझा। किन्तु कालक्रम से वह परम्परा भंग हो गई, अतः वह विज्ञान अपने यथार्थ रूप में लुप्त-सा प्रतीत होता है।\"\n\nगुरु धारण करना केवल एक फ़ैशन नहीं है। जो आध्यात्मिक जीवन को समझने के विषय में गम्भीर है, उसे एक गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु आवश्यकता का प्रश्न है, क्योंकि मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन, ईश्वर, उचित कर्म, तथा ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने हेतु अत्यन्त गम्भीर होना चाहिए। जब हम इन विषयों को समझने के विषय में अत्यन्त गम्भीर होते हैं, तब हमें एक गुरु की आवश्यकता होती है। हमें केवल इसलिए किसी गुरु के पास नहीं जाना चाहिए कि उस समय गुरु धारण करना फ़ैशन में हो। शरणागति वहाँ अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि शरणागति के बिना हम कुछ भी नहीं सीख सकते। यदि हम किसी गुरु के पास केवल उसे चुनौती देने जाते हैं, तो हम कुछ नहीं सीखेंगे। हमें गुरु को ठीक उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए जैसे अर्जुन ने अपने गुरु, स्वयं श्रीकृष्ण, को स्वीकार किया:\n\nkārpaṇya-doṣopahata-svabhāvaḥ\n\npṛcchāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-cetāḥ\n\nyac chreyaḥ syān niścitaṁ brūhi tan me\n\nśiṣyas te 'haṁ śādhi māṁ tvāṁ prapannam\n\n\"अब मैं अपने कर्तव्य के विषय में भ्रमित हूँ और दुर्बलता के कारण अपना समस्त धैर्य खो बैठा हूँ। इस दशा में मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे स्पष्ट रूप से बताएँ कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है। अब मैं आपका शिष्य हूँ और आपके शरणागत एक आत्मा हूँ। कृपया मुझे शिक्षा दें।\" (*भगवद्गीता* 2.7)\n\nयही गुरु को स्वीकार करने की विधि है। गुरु श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं, पूर्ववर्ती आचार्यों के प्रतिनिधि हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि समस्त आचार्यगण उनके प्रतिनिधि हैं; अतः गुरु को वही सम्मान अर्पित किया जाना चाहिए जो मनुष्य ईश्वर को अर्पित करता है। जैसा कि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर आध्यात्मिक गुरु के प्रति अपनी प्रार्थनाओं में कहते हैं, यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादः: \"आध्यात्मिक गुरु की कृपा से, मनुष्य को श्रीकृष्ण का वरदान प्राप्त होता है।\" अतः, यदि हम प्रामाणिक गुरु के शरणागत होते हैं, तो हम ईश्वर के शरणागत होते हैं। ईश्वर गुरु के प्रति हमारी शरणागति को स्वीकार करते हैं।\n\n*भगवद्गीता* (18.66) में श्रीकृष्ण आदेश देते हैं:\n\nsarva-dharmān parityajya\n\nmām ekaṁ śaraṇaṁ vraja\n\nahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo\n\nmokṣayiṣyāmi mā śucaḥ\n\n\"समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करके केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों से उबार लूँगा। भयभीत मत होओ।\" कोई तर्क कर सकता है, \"श्रीकृष्ण कहाँ हैं? मैं उनके शरणागत हो जाऊँगा।\" किन्तु नहीं, विधि यह है कि हम पहले श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के शरणागत होते हैं; तत्पश्चात् हम श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं। अतः कहा जाता है, साक्षाद्-धरित्वेन समस्त-शास्त्रैः: गुरु ईश्वर के समान ही श्रेष्ठ है। जब हम गुरु को सम्मान अर्पित करते हैं, तब हम ईश्वर को सम्मान अर्पित करते हैं। चूँकि हम ईश्वर-भावनाभावित होने का प्रयत्न कर रहे हैं, अतः यह आवश्यक है कि हम ईश्वर के प्रतिनिधि के माध्यम से ईश्वर को सम्मान अर्पित करना सीखें। समस्त शास्त्रों में गुरु को ईश्वर के समान ही श्रेष्ठ बताया गया है, किन्तु गुरु कभी यह नहीं कहता, \"मैं ईश्वर हूँ।\" शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु को ठीक उसी प्रकार सम्मान अर्पित करे जैसे वह ईश्वर को सम्मान अर्पित करता है, किन्तु गुरु कभी यह नहीं सोचता, \"मेरे शिष्य मुझे वही सम्मान अर्पित कर रहे हैं जो वे ईश्वर को अर्पित करते हैं; अतः मैं ईश्वर बन गया हूँ।\" ज्यों ही वह ऐसा सोचता है, त्यों ही वह ईश्वर के स्थान पर कुत्ता बन जाता है। अतः विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, किन्तु प्रभोर् यः प्रिय एव तस्य। चूँकि वह ईश्वर का सर्वाधिक अन्तरंग सेवक है, अतः गुरु को वही सम्मान अर्पित किया जाता है जो हम ईश्वर को अर्पित करते हैं। ईश्वर सदा ईश्वर है, गुरु सदा गुरु है। शिष्टाचार के अनुसार, ईश्वर आराध्य ईश्वर है, और गुरु आराधक ईश्वर है (सेवक-भगवान्)। अतः गुरु को प्रभुपाद कहकर सम्बोधित किया जाता है। प्रभु शब्द का अर्थ है \"स्वामी,\" और पाद का अर्थ है \"स्थान।\" इस प्रकार प्रभुपाद का अर्थ है \"वह जिसने भगवान् का स्थान ग्रहण किया है।\" यह वही है जो साक्षाद्-धरित्वेन समस्त-शास्त्रैः।\n\nगुरु की आवश्यकता केवल तभी है जब हम ईश्वर के विज्ञान को समझने के विषय में अत्यन्त गम्भीर हों। हमें गुरु को फ़ैशन के तौर पर रखने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। जिसने गुरु को स्वीकार कर लिया है, वह विवेकपूर्वक बोलता है। वह कभी निरर्थक बात नहीं बोलता। यही प्रामाणिक गुरु को स्वीकार करने का चिह्न है। हमें निश्चय ही आध्यात्मिक गुरु को सम्पूर्ण सम्मान अर्पित करना चाहिए, किन्तु हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उनके आदेशों का पालन कैसे किया जाए। *भगवद्गीता* (4.34) में श्रीकृष्ण स्वयं हमें गुरु को खोजने तथा उसके समीप जाने की विधि बताते हैं:\n\ntad viddhi praṇipātena\n\nparipraśnena sevayā\n\nupadekṣyanti te jñānaṁ\n\njñāninas tattva-darśinaḥ\n\n\"सत्य को जानने का प्रयत्न आध्यात्मिक गुरु के समीप जाकर करो। उससे विनम्रतापूर्वक जिज्ञासा करो और उसकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकती है, क्योंकि उसने सत्य का दर्शन किया है।\" प्रथम विधि शरणागति की है। हमें एक उन्नत व्यक्ति को खोजना है और स्वेच्छा से उसके समक्ष शरणागत होना है। शास्त्र आदेश देते हैं कि गुरु धारण करने से पूर्व हम उसका सावधानीपूर्वक अध्ययन करें, यह जानने हेतु कि क्या हम उसके शरणागत हो सकते हैं। हमें किसी कट्टरता के वशीभूत होकर अकस्मात् गुरु को स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह अत्यन्त ख़तरनाक है। गुरु को भी उस व्यक्ति का अध्ययन करना चाहिए जो शिष्य बनना चाहता है, यह देखने हेतु कि क्या वह योग्य है। इसी प्रकार गुरु तथा शिष्य के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है। सब कुछ प्रदान किया गया है, किन्तु हमें इस विधि को गम्भीरतापूर्वक ग्रहण करना होगा। तब हमें एक प्रामाणिक शिष्य बनने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। पहले हमें एक प्रामाणिक गुरु खोजना होगा, उसके साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करना होगा, और तदनुसार कार्य करना होगा। तब हमारा जीवन सफल होगा, क्योंकि गुरु उस सच्चे शिष्य को प्रबुद्ध कर सकता है जो अन्धकार में है।\n\nप्रत्येक व्यक्ति एक धूर्त तथा मूर्ख के रूप में जन्म लेता है। यदि हम विद्वान् रूप में जन्म लेते, तो हमें विद्यालय जाने की क्या आवश्यकता होती? यदि हम ज्ञान का अनुशीलन नहीं करते, तो हम पशुओं से उत्तम नहीं हैं। कोई पशु कह सकता है कि पुस्तकों की कोई आवश्यकता नहीं और वह गुरु बन गया है, किन्तु विज्ञान तथा दर्शन पर प्रामाणिक पुस्तकों के अध्ययन के बिना कोई ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकता है? धूर्त गुरु इन वस्तुओं से बचने का प्रयत्न करते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हम सभी धूर्त तथा मूर्ख रूप में जन्म लेते हैं और हमें प्रबुद्ध किया जाना है। हमें अपने जीवन को पूर्ण बनाने हेतु ज्ञान प्राप्त करना है। यदि हम अपने जीवन को पूर्ण नहीं बनाते, तो हम पराजित हो जाते हैं। यह पराजय क्या है? अस्तित्व का संघर्ष। हम एक श्रेष्ठतर जीवन प्राप्त करने का, एक उच्चतर स्थान प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और इसके लिए हम अत्यन्त परिश्रम कर रहे हैं। किन्तु हम यह नहीं जानते कि वास्तव में उच्चतर स्थान क्या है।\n\nइस भौतिक जगत् में हमारा जो भी स्थान हो, उसे त्यागना ही होगा। हमारा अच्छा स्थान हो अथवा बुरा; किसी भी दशा में, हम यहाँ नहीं रह सकते। हम लाखों रुपये कमाकर सोच सकते हैं, \"अब मैं एक अच्छे स्थान पर हूँ,\" किन्तु थोड़ी-सी पेचिश अथवा हैजा हमारे स्थान का अन्त कर देगा। यदि बैंक डूब जाए, तो हमारा स्थान चला जाता है। अतः वस्तुतः इस भौतिक जगत् में कोई अच्छा स्थान नहीं है। यह एक प्रहसन है। जो लोग भौतिक जगत् में एक श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, वे अन्ततः पराजित होते हैं, क्योंकि कोई श्रेष्ठतर स्थान है ही नहीं। *भगवद्गीता* (14.26) बताती है कि श्रेष्ठतर स्थान क्या है:\n\nmāṁ ca yo 'vyabhicāreṇa\n\nbhakti-yogena sevate\n\nsa guṇān samatītyaitān\n\nbrahma-bhūyāya kalpate\n\n\"जो अनन्य भक्तियोग की आध्यात्मिक क्रियाओं में संलग्न होता है, वह तत्काल प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और आध्यात्मिक स्तर पर उन्नत हो जाता है।\"\n\nक्या कोई ऐसा विज्ञान है जो हमें वह ज्ञान देता है जिसके द्वारा हम अमर बन सकें? हाँ, हम अमर बन सकते हैं, किन्तु भौतिक अर्थ में नहीं। हम यह ज्ञान तथाकथित विश्वविद्यालयों में प्राप्त नहीं कर सकते। किन्तु, वैदिक शास्त्रों में एक ऐसा ज्ञान निहित है, जिसके द्वारा हम अमर बन सकते हैं। वह अमरता ही हमारा श्रेष्ठतर स्थान है। न पुनः जन्म, न पुनः मृत्यु, न पुनः वृद्धावस्था, न पुनः रोग। इस प्रकार गुरु एक अत्यन्त महान् उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है। उसे अपने शिष्य का मार्गदर्शन करना है और उसे पूर्ण स्थान—अमरता—हेतु एक योग्य अभ्यर्थी बनने में समर्थ बनाना है। गुरु को अपने शिष्य को वापस घर, भगवान् के पास ले जाने में सक्षम होना चाहिए।\n\nसन्त तथा ठग\n\nप्रतिदिन योग तथा ध्यान का अभ्यास करने में रुचि रखने वाले लोगों की संख्या हज़ारों की संख्या में बढ़ती जाती है। दुर्भाग्यवश, एक उपयुक्त मार्गदर्शक खोजने वाले व्यक्ति का सामना सम्भवतः जादूगरों, स्वयंभू गुरुओं तथा स्वघोषित ईश्वरों की एक भ्रमित कर देने वाली पंक्ति से होता है। लंदन टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में, श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि एक सच्चा साधक एक कूट तथा प्रामाणिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के बीच अन्तर कैसे जान सकता है।\n\nReporter: मुझे स्पष्ट रूप से जो चिन्ता है, वह यह है कि कुछ समय पूर्व ब्रिटेन में एक भारतीय योगी के आगमन के बाद से, जो अधिकांश लोगों द्वारा कभी सुना गया प्रथम \"गुरु\" था, अनेक \"गुरु\" अचानक कहीं से प्रकट हो गए हैं। कभी-कभी मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उन सभी में से सभी उतने प्रामाणिक नहीं हैं जितने उन्हें होना चाहिए। क्या उन लोगों को सावधान करना उचित होगा, जो आध्यात्मिक जीवन ग्रहण करने का विचार कर रहे हैं, कि वे यह सुनिश्चित कर लें कि उन्हें शिक्षा देने हेतु उनके पास एक प्रामाणिक गुरु है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। निःसन्देह, गुरु को खोजना तो अत्यन्त उत्तम है, किन्तु यदि आप एक सस्ता गुरु चाहते हैं, अथवा यदि आप छले जाना चाहते हैं, तो आपको अनेक छलिया गुरु मिल जाएँगे। किन्तु यदि आप सच्चे हैं, तो आपको एक सच्चा गुरु मिलेगा। चूँकि लोग प्रत्येक वस्तु अत्यन्त सस्ते में चाहते हैं, अतः वे छले जाते हैं। हम अपने शिष्यों से अवैध मैथुन, मांस-भक्षण, जुआ तथा नशे से विरत रहने को कहते हैं। लोग सोचते हैं कि यह सब अत्यन्त कठिन है—एक झंझट। किन्तु यदि कोई दूसरा कहता है, \"तुम जो भी निरर्थक कार्य चाहो करो, केवल मेरा मन्त्र ले लो,\" तब लोग उसे पसन्द करेंगे। बात यह है कि लोग छले जाना चाहते हैं, अतः छलिया आते हैं। कोई भी कोई तपस्या नहीं करना चाहता। मनुष्य-जीवन तपस्या हेतु अभिप्रेत है, किन्तु कोई भी तपस्या करने को तैयार नहीं है। फलस्वरूप, छलिया आते हैं और कहते हैं, \"कोई तपस्या नहीं। तुम्हें जो भी अच्छा लगे, करो। केवल मुझे धन दो, और मैं तुम्हें कोई मन्त्र दे दूँगा, और तुम छह महीने में ईश्वर बन जाओगे।\" यह सब चल रहा है। यदि आप इस प्रकार छले जाना चाहते हैं, तो छलिया अवश्य आएँगे।\n\nReporter: उस व्यक्ति के विषय में क्या जो गम्भीरतापूर्वक आध्यात्मिक जीवन खोजना चाहता है किन्तु जो संयोगवश एक ग़लत गुरु के पास पहुँच जाता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यदि आप केवल एक सामान्य शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, तो उसके लिए भी आपको अत्यधिक समय, श्रम और बुद्धि लगानी पड़ती है। इसी प्रकार, यदि आप आध्यात्मिक जीवन अपनाने जा रहे हैं, तो आपको गम्भीर होना चाहिए। ऐसा कैसे हो सकता है कि केवल कुछ अद्भुत मन्त्रों से कोई छह माह में ही ईश्वर बन जाए? लोग ऐसा क्यों चाहते हैं? इसका अर्थ यह है कि वे ठगे जाना चाहते हैं।\n\nReporter: कोई व्यक्ति यह कैसे जान सकता है कि उसे प्रामाणिक गुरु मिल गया है?\n\nŚrīla Prabhupāda: क्या मेरा कोई शिष्य इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है?\n\nDisciple: मुझे स्मरण है कि एक बार जॉन लेनन ने आपसे पूछा था, \"मैं कैसे जानूँगा कि प्रामाणिक गुरु कौन है?\" और आपने उत्तर दिया था, \"बस उसे ढूँढ़ निकालो जो श्रीकृष्ण के प्रति सर्वाधिक अनुरक्त है। वही प्रामाणिक है।\"\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। प्रामाणिक गुरु ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं, और वे ईश्वर के विषय में ही बोलते हैं, अन्य किसी विषय में नहीं। प्रामाणिक गुरु वही है जिसकी भौतिकतावादी जीवन में कोई रुचि नहीं होती। वे ईश्वर के अनुगामी होते हैं, केवल ईश्वर के। यह प्रामाणिक गुरु की एक कसौटी है: ब्रह्म-निष्ठम्। वे परम सत्य में निमग्न रहते हैं। मुण्डक उपनिषद् में कहा गया है, *śrotriyaṁ brahma-niṣṭham:* [MU 1.2.12] \"प्रामाणिक गुरु शास्त्रों एवं वैदिक ज्ञान में पारंगत होता है, और वह पूर्णतया ब्रह्म पर आश्रित रहता है।\" उसे यह जानना चाहिए कि ब्रह्म [आत्मा] क्या है और ब्रह्म में किस प्रकार स्थित हुआ जाता है। ये लक्षण वैदिक साहित्य में दिए गए हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, वास्तविक गुरु ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं। वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं, ठीक जैसे कोई राजप्रतिनिधि राजा का प्रतिनिधित्व करता है। वास्तविक गुरु कुछ भी मनगढ़न्त नहीं करते। वे जो कुछ भी कहते हैं, वह शास्त्रों एवं पूर्ववर्ती आचार्यों के अनुरूप होता है। वे आपको कोई मन्त्र देकर यह नहीं कहेंगे कि आप छह माह में ईश्वर बन जाएँगे। यह गुरु का कार्य नहीं है। गुरु का कार्य तो प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर का भक्त बनने हेतु प्रेरित करना है। यही वास्तविक गुरु के कार्य का सार है। वस्तुतः उनका कोई अन्य कार्य नहीं होता। वे जिसे भी देखते हैं, उससे कहते हैं, \"कृपया ईश्वर-भावनाभावित बनें।\" यदि वे किसी न किसी प्रकार ईश्वर की ओर से प्रचार करते हैं और प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर का भक्त बनाने का प्रयत्न करते हैं, तो वे प्रामाणिक गुरु हैं।\n\nReporter: और किसी ईसाई पादरी के विषय में क्या कहेंगे?\n\nŚrīla Prabhupāda: ईसाई हो, मुसलमान हो, या हिन्दू—इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि वह केवल ईश्वर की ओर से बोल रहा है, तो वह गुरु है। उदाहरणार्थ, भगवान् ईसा मसीह। उन्होंने लोगों को प्रेरित किया, यह कहते हुए, \"बस ईश्वर से प्रेम करने का प्रयत्न करो।\" कोई भी—चाहे वह कोई भी हो—चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो, या ईसाई, वह गुरु है यदि वह लोगों को ईश्वर से प्रेम करने हेतु अनुप्रेरित करता है। यही कसौटी है। गुरु कभी नहीं कहते, \"मैं ईश्वर हूँ,\" अथवा \"मैं तुम्हें ईश्वर बना दूँगा।\" वास्तविक गुरु कहते हैं, \"मैं ईश्वर का सेवक हूँ, और मैं तुम्हें भी ईश्वर का सेवक बना दूँगा।\" गुरु ने किस प्रकार के वस्त्र धारण किए हैं, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। जैसा कि चैतन्य महाप्रभु ने कहा, \"जो कोई श्रीकृष्ण के विषय में ज्ञान प्रदान कर सके, वही आध्यात्मिक गुरु है।\" प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु तो केवल लोगों को श्रीकृष्ण, अर्थात् ईश्वर का भक्त बनाने का प्रयत्न करते हैं। उनका कोई अन्य कार्य नहीं होता।\n\nReporter: किन्तु बुरे गुरु…\n\nŚrīla Prabhupāda: और \"बुरा\" गुरु क्या होता है?\n\nReporter: बुरा गुरु तो बस कुछ धन या कुछ यश चाहता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: ठीक है, यदि वह बुरा है, तो वह गुरु कैसे बन सकता है? [हास्य।] लोहा सोना कैसे बन सकता है? वास्तव में, गुरु बुरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि यदि कोई बुरा है, तो वह गुरु बन ही नहीं सकता। आप \"बुरा गुरु\" कह ही नहीं सकते। यह स्वयं में एक विरोधाभास है। आपको तो बस यह समझने का प्रयत्न करना है कि प्रामाणिक गुरु क्या होता है। प्रामाणिक गुरु की परिभाषा यह है कि वह केवल ईश्वर के विषय में बात करता है—बस इतना ही। यदि वह किसी अन्य निरर्थक विषय पर बात कर रहा है, तो वह गुरु नहीं है। गुरु बुरा हो ही नहीं सकता। बुरे गुरु का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, जैसे लाल गुरु या श्वेत गुरु का प्रश्न नहीं उठता। गुरु का अर्थ ही है \"प्रामाणिक गुरु।\" हमें तो बस इतना जानना है कि प्रामाणिक गुरु केवल ईश्वर के विषय में बात करते हैं और लोगों को ईश्वर का भक्त बनाने का प्रयत्न करते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे प्रामाणिक हैं।\n\nReporter: यदि मैं आपके समाज में दीक्षित होना चाहूँ, तो मुझे क्या करना होगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: सर्वप्रथम, आपको अवैध यौन-जीवन का त्याग करना होगा।\n\nReporter: क्या इसमें समस्त यौन-जीवन सम्मिलित है? अवैध यौन-जीवन क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: अवैध यौन-सम्बन्ध विवाह के बाहर का यौन-सम्बन्ध है। पशु बिना किसी प्रतिबन्ध के यौन-सम्बन्ध रखते हैं, किन्तु मानव-समाज में प्रतिबन्ध होते हैं। प्रत्येक देश में और प्रत्येक धर्म में यौन-जीवन को सीमित करने की कोई न कोई व्यवस्था होती है। आपको चाय, सिगरेट, मदिरा, गाँजा सहित समस्त नशीले पदार्थों का भी त्याग करना होगा—जो कुछ भी नशा करता है।\n\nReporter: और कुछ?\n\nŚrīla Prabhupāda: आपको माँस, अण्डे और मछली खाना भी त्यागना होगा। और आपको जुआ भी त्यागना होगा। जब तक आप इन चार पापमय कर्मों का त्याग न करें, तब तक आप दीक्षित नहीं हो सकते।\n\nReporter: समस्त विश्व में आपके कितने अनुयायी हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: जो कुछ भी प्रामाणिक हो, उसके अनुयायी बहुत थोड़े हो सकते हैं। जो कुछ भी निकृष्ट हो, उसके अनुयायी बहुत अधिक हो सकते हैं। फिर भी, हमारे लगभग पाँच हज़ार दीक्षित शिष्य हैं।\n\nReporter: क्या कृष्णभावनामृत आन्दोलन निरन्तर बढ़ रहा है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यह बढ़ रहा है—किन्तु धीरे-धीरे। इसका कारण यह है कि हमारे यहाँ इतने सारे प्रतिबन्ध हैं। लोगों को प्रतिबन्ध पसन्द नहीं आते।\n\nReporter: आपके अनुयायी सर्वाधिक कहाँ हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में। और निस्सन्देह, भारत में लाखों लोग कृष्णभावनामृत का अभ्यास करते हैं।\n\nReporter: क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपके आन्दोलन का लक्ष्य क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन मनुष्य की मूल चेतना को जाग्रत करना है। इस समय हमारी चेतना उपाधियों से युक्त है। कोई सोच रहा है, \"मैं एक अंग्रेज़ हूँ,\" और दूसरा सोच रहा है, \"मैं एक अमेरिकी हूँ।\" वस्तुतः हम इनमें से किसी भी उपाधि से सम्बन्धित नहीं हैं। हम सब ईश्वर के अंश हैं; यही हमारी वास्तविक पहचान है। यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल उस चेतना तक पहुँच जाए, तो संसार की समस्त समस्याएँ हल हो जाएँगी। तब हम यह जान सकेंगे कि हम एक हैं—समान गुण वाली आत्मा। वही समान गुण वाली आत्मा प्रत्येक के भीतर विद्यमान है, यद्यपि वह भिन्न वस्त्र में हो सकती है। यही व्याख्या *Bhagavad-gītā* में दी गई है।\n\nकृष्णभावनामृत वस्तुतः एक शुद्धिकरण-प्रक्रिया है (*sarvopādhi-vinirmuktam* [Cc. Madhya 19.170])। इसका प्रयोजन लोगों को समस्त उपाधियों से मुक्त करना है (*tat-paratvena nirmalam*)। जब हमारी चेतना समस्त उपाधियों से शुद्ध हो जाती है, तब अपनी शुद्ध इन्द्रियों से जो कर्म हम सम्पन्न करते हैं, वे हमें पूर्ण बना देते हैं। अन्ततः हम मानव-जीवन की आदर्श पूर्णता तक पहुँच जाते हैं। कृष्णभावनामृत एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया भी है। महान् दार्शनिक, वैज्ञानिक अथवा अन्य कुछ बनना आवश्यक नहीं है। हमें तो केवल भगवान् के पवित्र नाम का जप करना है, यह समझते हुए कि उनका व्यक्तित्व, उनका नाम और उनके गुण—ये सभी परम (absolute) हैं।\n\nकृष्णभावनामृत एक महान् विज्ञान है। दुर्भाग्यवश, विश्वविद्यालयों में इस विज्ञान हेतु कोई विभाग नहीं है। अतः हम उन समस्त गम्भीर पुरुषों को, जो मानव-समाज के कल्याण में रुचि रखते हैं, आमन्त्रित करते हैं कि वे इस महान् आन्दोलन को समझें और यदि सम्भव हो तो इसमें सहभागी बनें तथा हमारे साथ सहयोग करें। संसार की समस्याएँ हल हो जाएँगी। यही *Bhagavad-gītā* का भी निर्णय है, जो आध्यात्मिक ज्ञान की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक पुस्तक है। आपमें से अनेक लोगों ने *Bhagavad-gītā* के विषय में सुना होगा। हमारा आन्दोलन इसी पर आधारित है। हमारे आन्दोलन को भारत के समस्त महान् आचार्यों ने अनुमोदित किया है। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, भगवान् चैतन्य, और अन्य अनेक। आप सब समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि हैं, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि समस्त मानव-समाज के कल्याण हेतु इस आन्दोलन को यथासम्भव समझने का प्रयत्न करें।\n\nReporter: क्या आप मानते हैं कि आपका आन्दोलन ही ईश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nReporter: आप इस विषय में इतने आश्वस्त कैसे हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: प्रामाणिक अधिकारियों से और ईश्वर, श्रीकृष्ण से। श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\n*sarva-dharmān parityajya*\n\n*mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja*\n\n*ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo*\n\n*mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ*\n\n[Bg. 18.66]\n\n\"समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। भयभीत मत होओ।\"\n\nReporter: क्या \"शरणागति\" का अर्थ यह है कि किसी को अपना परिवार छोड़ना पड़ेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं।\n\nReporter: किन्तु मान लीजिए कि मैं दीक्षित हो जाऊँ। क्या मुझे आकर मन्दिर में नहीं रहना पड़ेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: आवश्यक रूप से नहीं।\n\nReporter: क्या मैं घर पर रह सकता हूँ?\n\nŚrīla Prabhupāda: ओह, हाँ।\n\nReporter: और कार्य का क्या? क्या मुझे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ेगी?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, आपको तो केवल अपनी बुरी आदतें त्यागनी होंगी और इन मालाओं पर हरे कृष्ण मन्त्र का जप करना होगा—बस इतना ही।\n\nReporter: क्या मुझे कोई आर्थिक सहायता देनी पड़ेगी?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, वह तो आपकी स्वैच्छिक इच्छा है। यदि आप दें, तो ठीक है। और यदि आप न दें, तो हमें कोई आपत्ति नहीं। हम किसी के आर्थिक योगदान पर निर्भर नहीं हैं। हम श्रीकृष्ण पर निर्भर हैं।\n\nReporter: क्या मुझे कोई भी धन बिल्कुल नहीं देना पड़ेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं।\n\nReporter: क्या यही उन प्रमुख बातों में से एक है जो प्रामाणिक गुरु को कूट गुरु से पृथक् करती है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, प्रामाणिक गुरु व्यापारी नहीं होते। वे ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं। ईश्वर जो कुछ भी कहते हैं, गुरु उसी को दोहराते हैं। वे अन्यथा कुछ नहीं बोलते।\n\nReporter: किन्तु क्या आप किसी वास्तविक गुरु से, मान लीजिए, रॉल्स रॉयस में यात्रा करते हुए और किसी शानदार होटल के पेंटहाउस सुइट में ठहरे हुए मिलने की अपेक्षा करेंगे?\n\nŚrīla Prabhupāda: कभी-कभी लोग हमें किसी प्रथम-श्रेणी के होटल में कक्ष उपलब्ध करा देते हैं, किन्तु हम सामान्यतः अपने ही मन्दिरों में ठहरते हैं। संसार भर में हमारे लगभग एक सौ मन्दिर हैं, अतः हमें किसी होटल में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।\n\nReporter: मैं कोई आरोप लगाने का प्रयत्न नहीं कर रहा था। मैं तो केवल यह दर्शाने का प्रयत्न कर रहा था कि मेरे विचार से आपकी चेतावनी उचित है। इतने सारे लोग हैं जो आध्यात्मिक जीवन ढूँढ़ने में रुचि रखते हैं, और साथ ही बहुत से लोग हैं जो \"गुरु-व्यापार\" से धन कमाने में रुचि रखते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: क्या आपकी यह धारणा है कि आध्यात्मिक जीवन का अर्थ स्वेच्छा से दरिद्रता स्वीकार करना है?\n\nReporter: ठीक है, मैं नहीं जानता।\n\nŚrīla Prabhupāda: कोई दरिद्रताग्रस्त व्यक्ति भौतिकतावादी हो सकता है, और कोई धनवान व्यक्ति अत्यन्त आध्यात्मिक हो सकता है। आध्यात्मिक जीवन न तो दरिद्रता पर निर्भर है और न ही धन पर। आध्यात्मिक जीवन दिव्य है। उदाहरणार्थ, अर्जुन पर विचार करें। अर्जुन एक राजपरिवार के सदस्य थे, फिर भी वे ईश्वर के शुद्ध भक्त थे। और *Bhagavad-gītā* (4.2) में श्रीकृष्ण कहते हैं, *evaṁ paramparā-prāptaṁ imaṁ rājarṣayo viduḥ:* \"यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा की श्रृंखला से प्राप्त हुआ, और सन्त-स्वभाव वाले राजाओं ने इसे उसी प्रकार समझा।\" अतीत में, जितने भी राजा सन्त-स्वभाव वाले थे, वे आध्यात्मिक विज्ञान को समझते थे। अतः आध्यात्मिक जीवन व्यक्ति की भौतिक अवस्था पर निर्भर नहीं है। किसी व्यक्ति की भौतिक अवस्था कुछ भी हो—चाहे वह राजा हो या निर्धन—वह फिर भी आध्यात्मिक जीवन को समझ सकता है। सामान्यतः लोग नहीं जानते कि आध्यात्मिक जीवन क्या है, और इसीलिए वे अनावश्यक रूप से हमारी आलोचना करते हैं। यदि मैं आपसे पूछूँ कि आध्यात्मिक जीवन क्या है, तो आप क्या उत्तर देंगे?\n\nReporter: ठीक है, मैं निश्चित नहीं हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: यद्यपि आप नहीं जानते कि आध्यात्मिक जीवन क्या है, फिर भी आप कहते हैं, \"यह ऐसा है,\" अथवा \"यह वैसा है।\" किन्तु सर्वप्रथम आपको यह जानना चाहिए कि आध्यात्मिक जीवन क्या है। आध्यात्मिक जीवन तब आरम्भ होता है जब आप यह समझ जाते हैं कि आप अपना शरीर नहीं हैं। यही आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक आरम्भ है। अपने आत्म और अपने शरीर के बीच का अन्तर देखकर आप यह समझ जाते हैं कि आप एक आत्मा हैं (*ahaṁ brahmāsmi*)।\n\nReporter: क्या आप मानते हैं कि यह ज्ञान प्रत्येक की शिक्षा का एक अंग होना चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। लोगों को सर्वप्रथम यह सिखाया जाना चाहिए कि वे क्या हैं। क्या वे अपने शरीर हैं, अथवा कुछ और? यही शिक्षा का आरम्भ है। अब प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचने की शिक्षा दी जाती है कि वह अपना शरीर है। चूँकि किसी को संयोगवश अमेरिकी शरीर मिल जाता है, अतः वह सोचता है, \"मैं एक अमेरिकी हूँ।\" यह ठीक ऐसे ही है जैसे यह सोचना कि \"मैं एक लाल कमीज़ हूँ,\" केवल इसलिए कि आपने लाल कमीज़ पहन रखी है। आप लाल कमीज़ नहीं हैं; आप एक मनुष्य हैं। इसी प्रकार, यह शरीर वास्तविक व्यक्ति—आत्मा—के ऊपर एक कमीज़ या कोट के समान है। यदि हम स्वयं को केवल अपने शारीरिक \"कमीज़\" या \"कोट\" से पहचानते हैं, तो हमें कोई आध्यात्मिक शिक्षा नहीं है।\n\nReporter: क्या आप मानते हैं कि ऐसी शिक्षा विद्यालयों में दी जानी चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ—विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में। इस विषय पर एक विशाल साहित्य है—ज्ञान का एक विशाल भण्डार। वस्तुतः आवश्यकता इस बात की है कि समाज के नेता आगे आकर इस आन्दोलन को समझें।\n\nReporter: क्या आपके पास कभी ऐसे लोग आए हैं जो पहले किसी कूट गुरु से जुड़े रहे थे?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, बहुत से हैं।\n\nReporter: क्या उन कूट गुरुओं ने किसी भी प्रकार से उनके आध्यात्मिक जीवन को नष्ट किया?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, वे सच्चे मन से कुछ आध्यात्मिक खोज रहे थे, और यही उनकी योग्यता थी। ईश्वर प्रत्येक के हृदय में विद्यमान हैं, और जैसे ही कोई सच्चे मन से उन्हें खोजता है, वे उस व्यक्ति को प्रामाणिक गुरु खोजने में सहायता करते हैं।\n\nReporter: क्या आप जैसे वास्तविक गुरुओं ने कभी इन कूट गुरुओं पर रोक लगाने का—अर्थात्, उन पर दबाव डालकर उन्हें उनके व्यापार से बाहर करने का, यदि ऐसा कहा जा सके—प्रयत्न किया है?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, यह मेरा प्रयोजन नहीं है। मैंने अपना आन्दोलन केवल हरे कृष्ण का कीर्तन करके आरम्भ किया। मैंने न्यूयॉर्क में टॉम्पकिन्स स्क्वायर पार्क नामक स्थान पर कीर्तन किया, और शीघ्र ही लोग मेरे पास आने लगे। इस प्रकार, कृष्णभावनामृत आन्दोलन धीरे-धीरे विकसित हुआ। अनेकों ने इसे स्वीकार किया, और अनेकों ने स्वीकार नहीं किया। जो भाग्यशाली हैं, उन्होंने इसे स्वीकार किया है।\n\nReporter: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि कूट गुरुओं के साथ अपने अनुभव के कारण लोग सन्देहग्रस्त हैं? यदि आप किसी अनाड़ी दन्त-चिकित्सक के पास जाएँ और वह आपका दाँत तोड़ दे, तो आप किसी अन्य दन्त-चिकित्सक के पास जाने में सन्देह कर सकते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। स्वाभाविक है, यदि आप ठगे जाते हैं, तो आप सन्देहग्रस्त हो जाते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि यदि आप एक बार ठगे गए, तो आप सदा ठगे जाएँगे। आपको कोई प्रामाणिक व्यक्ति खोजना चाहिए। किन्तु कृष्णभावनामृत तक पहुँचने के लिए आपको या तो अत्यन्त भाग्यशाली होना चाहिए अथवा इस विज्ञान से भली-भाँति परिचित होना चाहिए। *Bhagavad-gītā* से हम यह समझते हैं कि प्रामाणिक साधक बहुत थोड़े होते हैं: *manuṣyāṇāṁ sahasreṣu kaścid yatati siddhaye* [Bg. 7.3]। अनेक लाखों लोगों में से, सम्भवतः केवल एक ही ऐसा होता है जो आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखता है। सामान्यतः लोग खाने, सोने, मैथुन करने और रक्षा करने में रुचि रखते हैं। तो हम अनेक अनुयायी खोजने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? यह देखना कठिन नहीं है कि लोगों ने अपनी आध्यात्मिक रुचि खो दी है। और जो वस्तुतः रुचि रखते हैं, उनमें से प्रायः सभी तथाकथित अध्यात्मवादियों द्वारा ठगे जा रहे हैं। आप किसी आन्दोलन का मूल्यांकन केवल उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं कर सकते। यदि एक व्यक्ति भी प्रामाणिक है, तो आन्दोलन सफल है। यह संख्या का प्रश्न नहीं है, अपितु गुणवत्ता का।\n\nReporter: मुझे जिज्ञासा है कि आपके विचार से कितने लोग कूट गुरुओं द्वारा ठगे गए होंगे।\n\nŚrīla Prabhupāda: व्यावहारिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति। [हास्य।] गिनती का तो कोई प्रश्न ही नहीं। प्रत्येक व्यक्ति।\n\nReporter: इसका अर्थ तो सहस्रों लोग होंगे, है न?\n\nŚrīla Prabhupāda: लाखों। लाखों लोग ठगे गए हैं, क्योंकि वे ठगे जाना चाहते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ हैं। वे आपकी इच्छाओं को समझ सकते हैं। वे आपके हृदय में विद्यमान हैं, और यदि आप ठगे जाना चाहते हैं, तो ईश्वर आपके पास एक ठग भेज देते हैं।\n\nReporter: क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए उस पूर्णता की अवस्था को प्राप्त करना सम्भव है जिसके विषय में आपने पहले बात की थी?\n\nŚrīla Prabhupāda: एक क्षण में। कोई भी एक क्षण में पूर्णता प्राप्त कर सकता है—बशर्ते वह इच्छुक हो। कठिनाई यह है कि कोई इच्छुक नहीं है। *Bhagavad-gītā* (18.66) में श्रीकृष्ण कहते हैं, *sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja:* \"केवल मेरी शरण में आ जाओ।\" किन्तु ईश्वर की शरण में कौन जाएगा? प्रत्येक व्यक्ति कहता है, \"ओह, मैं ईश्वर की शरण में क्यों जाऊँ? मैं स्वतन्त्र रहूँगा।\" यदि आप केवल शरण में चले जाएँ, तो यह एक क्षण का कार्य है। बस इतना ही। किन्तु कोई इच्छुक नहीं है, और यही कठिनाई है।\n\nReporter: जब आप कहते हैं कि बहुत से लोग ठगे जाना चाहते हैं, तो क्या आपका तात्पर्य यह है कि बहुत से लोग अपने सांसारिक भोगों को जारी रखना चाहते हैं और साथ ही, किसी मन्त्र का जप करके अथवा कोई पुष्प पकड़कर, आध्यात्मिक जीवन भी प्राप्त करना चाहते हैं? क्या ठगे जाने की इच्छा से आपका यही तात्पर्य है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यह ठीक ऐसे ही है जैसे कोई रोगी यह सोचे, \"मैं अपना रोग जारी रखूँगा, और साथ ही स्वस्थ भी हो जाऊँगा।\" यह विरोधाभासी है। पहली आवश्यकता यह है कि मनुष्य आध्यात्मिक जीवन में शिक्षित हो। आध्यात्मिक जीवन ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कुछ मिनटों की वार्ता से समझा जा सके। दर्शन एवं धर्मशास्त्र की अनेक पुस्तकें हैं, किन्तु लोगों की उनमें रुचि नहीं है। यही कठिनाई है। उदाहरणार्थ, *Śrīmad-Bhāgavatam* एक अत्यन्त दीर्घ ग्रन्थ है, और यदि आप इस पुस्तक को पढ़ने का प्रयत्न करें, तो इसकी केवल एक पंक्ति को समझने में ही अनेक दिन लग सकते हैं। *Bhāgavatam* ईश्वर, परम सत्य का वर्णन करता है, किन्तु लोगों की रुचि नहीं है। और यदि संयोगवश किसी की आध्यात्मिक जीवन में थोड़ी रुचि जाग्रत हो जाए, तो वह कुछ तात्कालिक एवं सस्ता चाहता है। अतः वह ठगा जाता है। वस्तुतः, मानव-जीवन तपस्या एवं तप के लिए है। यही वैदिक सभ्यता का मार्ग है। वैदिक काल में वे बालकों को ब्रह्मचारी के रूप में प्रशिक्षित करते थे; पच्चीस वर्ष की आयु तक किसी प्रकार के यौन-जीवन की अनुमति बिल्कुल नहीं थी। अब वह शिक्षा कहाँ है? ब्रह्मचारी वह विद्यार्थी है जो पूर्ण ब्रह्मचर्य का जीवन जीता है और गुरुकुल [आध्यात्मिक गुरु के विद्यालय] में अपने गुरु की आज्ञाओं का पालन करता है। अब विद्यालय एवं महाविद्यालय आरम्भ से ही यौन-शिक्षा दे रहे हैं, और बारह या तेरह वर्ष के बालक-बालिकाएँ यौन-सम्बन्ध बना रहे हैं। वे आध्यात्मिक जीवन कैसे जी सकते हैं? आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है ईश्वर-साक्षात्कार के निमित्त स्वेच्छा से कुछ तपस्याएँ स्वीकार करना। यही कारण है कि हम अपने दीक्षित विद्यार्थियों के लिए अवैध यौन-सम्बन्ध, माँसाहार, जुआ अथवा नशा न करने पर बल देते हैं। इन प्रतिबन्धों के बिना, कोई भी \"योग-ध्यान\" अथवा तथाकथित आध्यात्मिक अनुशासन प्रामाणिक नहीं हो सकता। यह तो केवल ठगने वालों और ठगे जाने वालों के बीच का एक व्यापारिक सौदा है।\n\nReporter: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण।\n\nआध्यात्मिक गुरु की परम आवश्यकता\n\nफरवरी 1936 में, भारत के बॉम्बे नगर में, एक प्रतिष्ठित धार्मिक समाज, गौड़ीय मठ के सदस्य एक युवा सदस्य के सशक्त एवं वाग्मितापूर्ण शब्दों से अचम्भित रह गए, जो अपने आध्यात्मिक गुरु, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी के सम्मान में बोल रहा था। तीन दशकों के पश्चात्, वह युवा वक्ता कृष्णभावनामृत आन्दोलन के विश्व-विख्यात संस्थापक एवं आध्यात्मिक गुरु बन गए। श्रील प्रभुपाद का यह प्रस्तुतीकरण आध्यात्मिक जीवन में गुरु के महत्त्व पर एक स्मरणीय वक्तव्य है।\n\n*sākṣād-dharitvena samasta-śāstrair*\n\n*uktas tathā bhāvyata eva sadbhiḥ*\n\n*kintu prabhor yaḥ priya eva tasya*\n\n*vande guroḥ śrī-caraṇāravindam* **\n\n\"प्रकट शास्त्रों में यह घोषित किया गया है कि आध्यात्मिक गुरु की पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समान आराधना की जानी चाहिए, और इस आदेश का पालन भगवान् के शुद्ध भक्त करते हैं। आध्यात्मिक गुरु भगवान् के सर्वाधिक अन्तरंग सेवक होते हैं। अतः हम अपने आध्यात्मिक गुरु के चरणकमलों में अपना सादर प्रणाम अर्पित करें।\"\n\nसज्जनो, गौड़ीय मठ की बॉम्बे शाखा के सदस्यों की ओर से, मुझे आप सबका स्वागत करने दें, क्योंकि आप आज सायंकाल इतनी कृपापूर्वक हमारे साथ जगद्गुरु, आचार्यदेव के चरणकमलों में हमारी सामूहिक श्रद्धांजलि-अर्पण में सम्मिलित हुए हैं, जो इस गौड़ीय मिशन के संस्थापक हैं और श्री श्री विश्व-वैष्णव राज-सभा के अध्यक्ष-आचार्य हैं—मेरा तात्पर्य मेरे नित्य दिव्य गुरु, परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज से है।\n\nबासठ वर्ष पूर्व, इसी मंगलमय दिन, आचार्यदेव ने पुरी में श्री-क्षेत्र जगन्नाथ-धाम में ठाकुर भक्तिविनोद के आह्वान से अपना प्राकट्य किया।\n\nसज्जनो, जैसी श्रद्धांजलि आज सायंकाल आचार्यदेव के लिए आयोजित की गई है, वह कोई साम्प्रदायिक विषय नहीं है, क्योंकि जब हम गुरुदेव, अथवा आचार्यदेव के मूल सिद्धान्त की बात करते हैं, तब हम किसी ऐसी वस्तु की बात करते हैं जो सार्वभौमिक रूप से लागू होती है। मेरे गुरु को आपके अथवा किसी अन्य के गुरु से पृथक् करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। केवल एक ही गुरु हैं, जो आपको, मुझे और अन्य सभी को शिक्षा देने हेतु अनन्त रूपों में प्रकट होते हैं।\n\nगुरु, अथवा आचार्यदेव, जैसा कि हम प्रामाणिक शास्त्रों से सीखते हैं, परम जगत् का, परम व्यक्ति के दिव्य धाम का सन्देश प्रदान करते हैं, जहाँ प्रत्येक वस्तु अभेद रूप से परम सत्य की सेवा करती है। हमने अनेक बार सुना है: *mahājano yena gataḥ sa panthāḥ* (\"उस मार्ग पर चलो जिस पर तुम्हारे पूर्ववर्ती आचार्य चले हैं\"), किन्तु हमने इस श्लोक का वास्तविक तात्पर्य समझने का प्रयत्न शायद ही किया है। यदि हम इस प्रस्ताव का सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हम समझ जाते हैं कि महाजन एक ही है, और दिव्य जगत् का राजमार्ग भी एक ही है। मुण्डक उपनिषद् (1.2.12) में कहा गया है:\n\n*tad-vijñānārthaṁ sa gurum evābhigacchet*\n\n*samit-pāṇiḥ śrotriyaṁ brahma-niṣṭham*\n\n\"दिव्य विज्ञान को सीखने के लिए, मनुष्य को गुरु-परम्परा में प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना चाहिए, जो परम सत्य में स्थिर है।\"\n\nअतः यहाँ यह अनुशासित किया गया है कि उस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को गुरु की शरण में जाना चाहिए। अतएव, यदि परम सत्य एक है, जिसके विषय में हम मानते हैं कि कोई मतभेद नहीं है, तो गुरु भी दो नहीं हो सकते। जिन आचार्यदेव के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु हम आज सायंकाल एकत्र हुए हैं, वे किसी साम्प्रदायिक संस्था के गुरु नहीं हैं अथवा सत्य के अनेक भिन्न-भिन्न व्याख्याताओं में से एक नहीं हैं। इसके विपरीत, वे जगद्गुरु हैं, अथवा हम सबके गुरु हैं; अन्तर केवल इतना है कि कुछ लोग पूर्ण हृदय से उनकी आज्ञा का पालन करते हैं, जबकि अन्य प्रत्यक्ष रूप से उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते।\n\n*Śrīmad-Bhāgavatam* (11.17.27) में कहा गया है:\n\n*ācāryaṁ māṁ vijānīyān*\n\n*nāvamanyeta karhicit*\n\n*na martya-buddhyāsūyeta*\n\n*sarva-devamayo guruḥ*\n\n\"मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु को मेरे ही समान समझना चाहिए,\" श्रीभगवान् ने कहा। \"किसी को भी आध्यात्मिक गुरु से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए अथवा उन्हें एक सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिए, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु समस्त देवताओं का योग हैं।\" अर्थात्, आचार्य को साक्षात् ईश्वर के साथ अभिन्न माना गया है। उनका इस लौकिक जगत् के कार्य-कलापों से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे यहाँ अस्थायी आवश्यकताओं के कार्यों में हस्तक्षेप करने के लिए अवतरित नहीं होते, अपितु पतित, बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए—वे जीव, अथवा सत्ताएँ, जो मन एवं इन्द्रिय-बोध की पाँच इन्द्रियों से भोग की मनोवृत्ति लेकर यहाँ भौतिक जगत् में आए हैं। वे हमारे समक्ष वेदों का प्रकाश प्रकट करने के लिए और हमें पूर्ण स्वातन्त्र्य का आशीर्वाद प्रदान करने के लिए प्रकट होते हैं, जिसके लिए हमें अपनी जीवन-यात्रा के प्रत्येक पग पर लालायित रहना चाहिए।\n\nवेदों का दिव्य ज्ञान सर्वप्रथम ईश्वर द्वारा इस विशिष्ट ब्रह्माण्ड के स्रष्टा ब्रह्मा से कहा गया। ब्रह्मा से यह ज्ञान नारद को अवतरित हुआ, नारद से व्यासदेव को, व्यासदेव से मध्व को, और गुरु-परम्परा की इस प्रक्रिया में दिव्य ज्ञान एक शिष्य से दूसरे शिष्य को संचारित होता गया, जब तक यह भगवान् गौराङ्ग, श्रीकृष्ण चैतन्य तक नहीं पहुँचा, जिन्होंने श्री ईश्वर पुरी के शिष्य एवं उत्तराधिकारी का रूप धारण किया। वर्तमान आचार्यदेव श्री रूप गोस्वामी से दसवें परम्परागत प्रतिनिधि हैं, जो भगवान् चैतन्य के मूल प्रतिनिधि थे जिन्होंने इस दिव्य परम्परा का पूर्णता से प्रचार किया। जो ज्ञान हम अपने गुरुदेव से प्राप्त करते हैं, वह उस ज्ञान से भिन्न नहीं है जो साक्षात् ईश्वर द्वारा और ब्रह्मा की उपदेशक-परम्परा में आचार्यों की श्रृंखला द्वारा प्रदान किया गया। हम इस मंगलमय दिन को श्री व्यास-पूजा-तिथि के रूप में आराधते हैं, क्योंकि आचार्य व्यासदेव के जीवित प्रतिनिधि हैं—वेदों, पुराणों, *Bhagavad-gītā*, *Mahābhārata* और *Śrīmad-Bhāgavatam* के दिव्य संकलनकर्ता।\n\nजो कोई दिव्य ध्वनि, अथवा शब्द-ब्रह्म की व्याख्या अपने अपूर्ण इन्द्रिय-बोध से करता है, वह वास्तविक आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता, क्योंकि प्रामाणिक आचार्य के अधीन उचित अनुशासनात्मक प्रशिक्षण के अभाव में, वह व्याख्याता निश्चय ही व्यासदेव से भिन्न मत रखेगा (जैसा कि मायावादी करते हैं)। श्रील व्यासदेव वैदिक प्रकाशन के प्रमुख अधिकारी हैं, और अतः ऐसे असंगत व्याख्याता को गुरु, अथवा आचार्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, भले ही वह भौतिक ज्ञान की समस्त उपलब्धियों से कितना ही सुसज्जित क्यों न हो। जैसा कि *Padma Purāṇa* में कहा गया है:\n\n*sampradāya-vihīnā ye*\n\n*mantrās te niṣphalā matāḥ*\n\n\"जब तक आप गुरु-परम्परा में किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से दीक्षित नहीं होते, तब तक आपको जो मन्त्र प्राप्त हुआ हो, वह बिना किसी प्रभाव के रहता है।\"\n\nदूसरी ओर, जिसने परम्परा-श्रृंखला में प्रामाणिक उपदेशक से श्रवण द्वारा दिव्य ज्ञान प्राप्त किया है, और जिसका वास्तविक आचार्य के प्रति निष्ठापूर्ण आदर है, वह अवश्य ही वेदों के प्रकट ज्ञान से प्रकाशित होगा। किन्तु यह ज्ञान अनुभववादियों के संज्ञानात्मक उपागम के लिए स्थायी रूप से मुद्रित रहता है। जैसा कि श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.23) में कहा गया है:\n\n*yasya deve parā bhaktir*\n\n*yathā deve tathā gurau*\n\n*tasyaite kathitā hy arthāḥ*\n\n*prakāśante mahātmanaḥ*\n\n[ŚU 6.23]\n\n\"केवल उन्हीं महान् आत्माओं को, जिनकी भगवान् एवं आध्यात्मिक गुरु दोनों में एक साथ अविचल श्रद्धा होती है, वैदिक ज्ञान के समस्त अभिप्राय स्वतः प्रकट हो जाते हैं।\"\n\nसज्जनो, हमारा ज्ञान इतना अल्प है, हमारी इन्द्रियाँ इतनी अपूर्ण हैं, और हमारे साधन इतने सीमित हैं कि श्री व्यासदेव अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि के चरणकमलों में आत्मसमर्पण किए बिना परम क्षेत्र का तनिक भी ज्ञान प्राप्त करना हमारे लिए सम्भव नहीं है। प्रत्येक क्षण हम अपने प्रत्यक्ष बोध के ज्ञान से ठगे जा रहे हैं। यह सब मन की सृष्टि अथवा कल्पना है, जो सदा ठगता, बदलता और झिलमिलाता रहता है। हम अवलोकन एवं प्रयोग की अपनी सीमित, विकृत विधि से दिव्य क्षेत्र का कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। किन्तु हम सब अपने उत्सुक कानों को उस दिव्य ध्वनि के श्रवण के लिए लगा सकते हैं, जो श्री गुरुदेव अथवा श्री व्यासदेव के अमिश्रित माध्यम से उस क्षेत्र से इस क्षेत्र तक संचारित होती है। अतः, सज्जनो, हमें आज श्री व्यासदेव के प्रतिनिधि के चरणों में आत्मसमर्पण करना चाहिए, ताकि हमारे अधीन न होने वाले मनोभाव से उत्पन्न समस्त मतभेद दूर हो जाएँ। तदनुसार श्री *Gītā* (4.34) में कहा गया है:\n\n*tad viddhi praṇipātena*\n\n*paripraśnena sevayā*\n\n*upadekṣyanti te jñānaṁ*\n\n*jñāninas tattva-darśinaḥ*\n\n\"बस बुद्धिमान् एवं प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाओ। सर्वप्रथम उनके समक्ष आत्मसमर्पण करो और जिज्ञासा एवं सेवा द्वारा उन्हें समझने का प्रयत्न करो। ऐसे बुद्धिमान् आध्यात्मिक गुरु तुम्हें दिव्य ज्ञान से प्रकाशित करेंगे, क्योंकि वे परम सत्य को पहले ही जान चुके हैं।\"\n\nदिव्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें उत्कट जिज्ञासा एवं सेवा के भाव से वास्तविक आचार्य के समक्ष पूर्णतया आत्मसमर्पण करना चाहिए। आचार्य के मार्गदर्शन में परम की सेवा का वास्तविक निष्पादन ही एकमात्र वाहन है जिसके द्वारा हम दिव्य ज्ञान को आत्मसात् कर सकते हैं। आचार्यदेव के चरणों में अपनी विनम्र सेवाएँ एवं श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु आज की यह सभा हमें उस क्षमता से अनुग्रहीत होने में समर्थ बनाएगी, जिससे हम उस दिव्य ज्ञान को आत्मसात् कर सकें जो उन्होंने बिना किसी भेदभाव के, समस्त व्यक्तियों को इतनी कृपापूर्वक संचारित किया है।\n\nसज्जनो, हम सब अपनी अतीत की भारतीय सभ्यता पर कमोबेश गर्व करते हैं, किन्तु हम वस्तुतः उस सभ्यता के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। हम अपनी अतीत की भौतिक सभ्यता पर गर्व नहीं कर सकते, जो अब बीते दिनों की तुलना में सहस्र गुना अधिक है। कहा जाता है कि हम अन्धकार के युग, कलियुग में से गुज़र रहे हैं। यह अन्धकार क्या है? यह अन्धकार भौतिक ज्ञान में पिछड़ेपन के कारण नहीं हो सकता, क्योंकि अब हमारे पास इसका पहले से अधिक है। यदि हमारे पास नहीं, तो किसी भी हाल में हमारे पड़ोसियों के पास इसका प्रचुर भण्डार है। अतः हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वर्तमान युग का अन्धकार भौतिक प्रगति के अभाव के कारण नहीं है, अपितु इसलिए कि हमने अपनी आध्यात्मिक प्रगति का सूत्र खो दिया है, जो मानव-जीवन की प्रमुख आवश्यकता है और उच्चतम प्रकार की मानव-सभ्यता की कसौटी है। वायुयानों से बम गिराना, पहाड़ियों की चोटियों से शत्रुओं के सिरों पर बड़े पत्थर गिराने की आदिम, असभ्य प्रथा से सभ्यता की कोई प्रगति नहीं है। मशीनगनों एवं विषैली गैसों के माध्यम से अपने पड़ोसियों की हत्या की कला में सुधार निश्चय ही उस आदिम बर्बरता से कोई प्रगति नहीं है, जो धनुष-बाण से हत्या की अपनी कला पर गर्व करती थी। न ही लाड़-प्यार में पले स्वार्थ की भावना का विकास बौद्धिक पशुता से अधिक कुछ सिद्ध करता है। सच्ची मानव-सभ्यता इन सभी अवस्थाओं से अत्यन्त भिन्न है, और अतएव कठ उपनिषद् (1.3.14) में यह सशक्त आह्वान है:\n\n*uttiṣṭhata jāgrata*\n\n*prāpya varān nibodhata*\n\n*kṣurasya dhārā niśitā duratyayā*\n\n*durgaṁ pathas tat kavayo vadanti*\n\n\"कृपया जागो और इस मानव-जीवन रूपी वरदान को समझने का प्रयत्न करो, जो अब तुम्हारे पास है। आत्म-साक्षात्कार का मार्ग अत्यन्त कठिन है; यह छुरे की धार के समान तीक्ष्ण है। यही विद्वान् दिव्य मनीषियों का मत है।\"\n\nइस प्रकार, जब अन्य लोग अभी ऐतिहासिक विस्मृति के गर्भ में ही थे, तब भारत के ऋषियों ने एक भिन्न प्रकार की सभ्यता विकसित कर ली थी, जिसने उन्हें स्वयं को जानने में समर्थ बनाया। उन्होंने यह खोज लिया था कि हम बिल्कुल भी भौतिक सत्ताएँ नहीं हैं, अपितु हम सब परम के आध्यात्मिक, नित्य और अविनाशी सेवक हैं। किन्तु चूँकि हमने अपने श्रेष्ठ विवेक के विरुद्ध, स्वयं को पूर्णतया इस वर्तमान भौतिक अस्तित्व से तदाकार करना चुना है, अतः जन्म-मृत्यु के अटल नियम के अनुसार, उससे उत्पन्न रोगों एवं चिन्ताओं सहित, हमारे दुःख कई गुना बढ़ गए हैं। ये दुःख भौतिक सुख की किसी भी व्यवस्था से वस्तुतः शमित नहीं किए जा सकते, क्योंकि पदार्थ एवं आत्मा पूर्णतया भिन्न तत्त्व हैं। यह ठीक ऐसे ही है जैसे आप किसी जलचर प्राणी को जल से बाहर निकालकर स्थल पर रख दें, और उसे स्थल पर सम्भव प्रत्येक प्रकार का सुख प्रदान करें। उस प्राणी के घातक दुःख तब तक तनिक भी शमित नहीं हो सकते जब तक उसे उसके पराये वातावरण से बाहर न निकाल लिया जाए। आत्मा एवं पदार्थ पूर्णतया विरोधी वस्तुएँ हैं। हम सब आध्यात्मिक सत्ताएँ हैं। हम पूर्ण सुख प्राप्त नहीं कर सकते, जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, चाहे हम लौकिक वस्तुओं के कार्यों में कितना ही हस्तक्षेप क्यों न करें। पूर्ण सुख हमें केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब हम अपनी आध्यात्मिक अस्तित्व की स्वाभाविक अवस्था में पुनः स्थापित हो जाएँ। यही हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता का विशिष्ट सन्देश है, यही *Gītā* का सन्देश है, यही वेदों एवं पुराणों का सन्देश है, और यही भगवान् चैतन्य की परम्परा में, हमारे वर्तमान आचार्यदेव सहित, समस्त वास्तविक आचार्यों का सन्देश है।\n\nसज्जनो, यद्यपि यह अपूर्ण रूप से ही है कि हम उनकी कृपा से अपने आचार्यदेव, ॐ विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज के उदात्त सन्देशों को समझने में समर्थ हुए हैं, फिर भी हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमने निश्चित रूप से यह अनुभव किया है कि उनके पवित्र अधरों से निकला दिव्य सन्देश पीड़ित मानवता के लिए अनुकूल वस्तु है। हम सबको धैर्यपूर्वक उन्हें सुनना चाहिए। यदि हम बिना अनावश्यक विरोध के उस दिव्य ध्वनि को सुनें, तो वे निश्चय ही हम पर कृपा करेंगे। आचार्य का सन्देश हमें हमारे मूल घर वापस, ईश्वर के पास वापस ले जाने का है। अतः मुझे पुनः कहने दें कि हमें धैर्यपूर्वक उन्हें सुनना चाहिए, अपनी प्रतीति के अनुपात में उनका अनुसरण करना चाहिए, और उनके चरणकमलों में प्रणत होना चाहिए, ताकि वे हमें परम एवं समस्त आत्माओं की सेवा के प्रति हमारी वर्तमान निष्कारण अनिच्छा से मुक्त कर दें।\n\n*Gītā* से हम सीखते हैं कि शरीर के विनाश के पश्चात् भी, आत्मा का विनाश नहीं होता; वह सदा एक समान है, सदा नवीन एवं ताज़ी है। अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गला नहीं सकता, वायु उसे सुखा नहीं सकती, और तलवार उसे मार नहीं सकती। वह शाश्वत एवं नित्य है, और इसकी पुष्टि *Śrīmad-Bhāgavatam* (10.84.13) में भी होती है:\n\n*yasyātma-buddhiḥ kuṇape tri-dhātuke*\n\n*sva-dhīḥ kalatrādiṣu bhauma ijya-dhīḥ*\n\n*yat-tīrtha-buddhiḥ salile na karhicij*\n\n*janeṣv abhijñeṣu sa eva go-kharaḥ*\n\n\"जो कोई तीन तत्त्वों [पित्त, कफ और वायु] के इस शारीरिक थैले को अपना आत्म मानता है, जिसकी अपनी पत्नी एवं सन्तानों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में आसक्ति है, जो अपनी भूमि को आराध्य मानता है, जो तीर्थस्थानों के जल में स्नान करता है किन्तु कभी उन व्यक्तियों का लाभ नहीं उठाता जो वास्तविक ज्ञान में स्थित हैं—वह गधे अथवा गाय से कुछ अधिक नहीं है।\"\n\nदुर्भाग्यवश, इन दिनों हम सब अपने वास्तविक सुख की उपेक्षा करके और भौतिक पिंजरे को अपने साथ तदाकार करके मूर्ख बन गए हैं। हमने अपनी समस्त ऊर्जाएँ भौतिक पिंजरे के, उसी के निमित्त, निरर्थक रख-रखाव पर केन्द्रित कर दी हैं, और भीतर बन्दी आत्मा की पूर्णतया उपेक्षा कर दी है। पिंजरा तो पक्षी के विनाश के लिए होता है; पक्षी पिंजरे के कल्याण के लिए नहीं होता। अतः हमें इस पर गहराई से विचार करना चाहिए। हमारे समस्त कार्य अब पिंजरे के रख-रखाव की ओर मुड़ गए हैं, और अधिक से अधिक हम जो करते हैं वह यह है कि कला एवं साहित्य द्वारा मन को कुछ भोजन देने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु हम यह नहीं जानते कि यह मन भी एक अधिक सूक्ष्म रूप में भौतिक है। यह *Gītā* (7.4) में कहा गया है:\n\n*bhūmir āpo 'nalo vāyuḥ*\n\n*khaṁ mano buddhir eva ca*\n\nahaṅkāra itīyaṁ me\n\nbhinnā prakṛtir aṣṭadhā\n\n\"पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, बुद्धि, मन और अहंकार — ये सब मेरी पृथक् ऊर्जाएँ हैं।\"\n\nहमने आत्मा को, जो शरीर तथा मन से भिन्न है, कोई आहार देने का प्रयत्न तक नहीं किया; अतः शब्द के यथार्थ अर्थ में हम सब आत्महत्या कर रहे हैं। आचार्यदेव का सन्देश हमें ऐसी भ्रान्त क्रियाओं को रोकने की चेतावनी देता है। अतएव आइए, उनके चरणकमलों में नतमस्तक हों, उस अनन्य कृपा एवं करुणा के लिए जो उन्होंने हम पर अर्पित की है।\n\nसज्जनो, क्षण-भर के लिए भी यह न समझें कि मेरे गुरुदेव आधुनिक सभ्यता पर पूर्ण विराम लगाना चाहते हैं — यह तो असम्भव कार्य है। किन्तु आइए, उनसे एक बुरे सौदे से सर्वोत्तम लाभ निकालने की कला सीखें, और इस मानव-जीवन के महत्त्व को समझें, जो सच्ची चेतना के उच्चतम विकास के योग्य है। इस दुर्लभ मानव-जीवन के सर्वोत्तम उपयोग की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। जैसा कि *श्रीमद्भागवत* (11.9.29) में कहा गया है:\n\nlabdhvā sudurlabham idaṁ bahu-sambhavānte\n\nmānuṣyam arthadam anityam apīha dhīraḥ\n\ntūrṇaṁ yateta na pated anu mṛtyu yāvan\n\nniḥśreyasāya viṣayaḥ khalu sarvataḥ syāt\n\n\"यह मानव-जीवन अनेकानेक जन्मों के पश्चात् प्राप्त होता है, और यद्यपि यह नित्य नहीं है, फिर भी यह उच्चतम लाभ प्रदान कर सकता है। अतः धीर एवं बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि अगली मृत्यु के आने से पूर्व ही वह तुरन्त अपने ध्येय की पूर्ति करे और जीवन का परम लाभ प्राप्त करे। उसे इन्द्रियतृप्ति से बचना चाहिए, जो सब परिस्थितियों में उपलब्ध रहती है।\"\n\nआइए, इस मानव-जीवन का दुरुपयोग भौतिक भोग की व्यर्थ खोज में न करें, अथवा दूसरे शब्दों में, केवल खाने, सोने, भयभीत होने और विषयी क्रियाओं के लिए न करें। आचार्यदेव का सन्देश श्री रूप गोस्वामी के शब्दों द्वारा प्रकट होता है (*भक्ति-रसामृत-सिन्धु* 1.2.255–256):\n\nanāsaktasya viṣayān\n\nyathārham upayuñjataḥ\n\nnirbandhaḥ kṛṣṇa-sambandhe\n\nyuktaṁ vairāgyam ucyate\n\nprāpañcikatayā buddhyā\n\nhari-sambandhi-vastunaḥ\n\nmumukṣubhiḥ parityāgo\n\nvairāgyaṁ phalgu kathyate\n\n\"वह व्यक्ति पूर्ण संन्यास-आश्रम में स्थित कहलाता है जो कृष्णभावनामृत के अनुरूप जीवन व्यतीत करता है। उसे इन्द्रियतृप्ति के प्रति आसक्ति-रहित होना चाहिए और केवल उतना ही स्वीकार करना चाहिए जितना शरीर के पालन हेतु आवश्यक है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति उन वस्तुओं का त्याग करता है जो कृष्ण की सेवा में प्रयुक्त हो सकती हैं, यह बहाना बनाकर कि वे भौतिक हैं, वह पूर्ण वैराग्य का अभ्यास नहीं करता।\n\nइन श्लोकों का तात्पर्य केवल अपने जीवन के विवेकशील भाग के पूर्ण विकास से ही अनुभव किया जा सकता है, पाशविक भाग से नहीं। आचार्यदेव के चरणों में बैठकर आइए, ज्ञान के इस दिव्य स्रोत से समझने का प्रयत्न करें कि हम क्या हैं, यह विश्व क्या है, ईश्वर क्या है, और उनके साथ हमारा सम्बन्ध क्या है। भगवान् चैतन्य का सन्देश जीवों के लिए सन्देश है और जीवित जगत् का सन्देश है। भगवान् चैतन्य ने इस मृत जगत् के उद्धार के लिए स्वयं को कष्ट नहीं दिया, जिसका उपयुक्त नाम मर्त्यलोक है — वह जगत् जहाँ प्रत्येक वस्तु मरने को नियत है। वे साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व हमारे समक्ष प्रकट हुए, ताकि हमें उस दिव्य विश्व का कुछ परिचय दें, जहाँ प्रत्येक वस्तु नित्य है और प्रत्येक वस्तु परम सत्य की सेवा के लिए है। किन्तु अभी हाल ही में कुछ धूर्त व्यक्तियों ने भगवान् चैतन्य का मिथ्या निरूपण किया है, और भगवान् के उच्चतम दर्शन की व्याख्या निम्नतम कोटि के समाज के सम्प्रदाय के रूप में कर दी गई है। आज रात्रि हमें यह घोषित करते हुए हर्ष होता है कि हमारे आचार्यदेव ने अपनी सहज करुणा से हमें इस घोर पतन से उबार लिया, और अतएव हम पूर्ण विनम्रता के साथ उनके चरणकमलों में नतमस्तक होते हैं।\n\nसज्जनो, आज के सुसंस्कृत (अथवा असंस्कृत) समाज की यह सनक रही है कि वह भगवान् को केवल निराकार लक्षणों से युक्त बताए और यह दावा करके उन्हें कुण्ठित कर दे कि उनकी कोई इन्द्रियाँ नहीं, कोई रूप नहीं, कोई क्रिया नहीं, कोई शिर नहीं, कोई पाँव नहीं, और कोई आनन्द नहीं। यह आधुनिक विद्वानों का भी प्रिय विषय रहा है, क्योंकि उन्हें उचित मार्गदर्शन तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में सच्चे आत्मनिरीक्षण का नितान्त अभाव है। ये सभी अनुभववादी एक-सा ही सोचते हैं: सभी भोग्य वस्तुओं पर मानव-समाज का, अथवा किसी विशेष वर्ग मात्र का एकाधिकार होना चाहिए, और निराकार ईश्वर को उनके मनमाने कारनामों के लिए केवल आदेश-पालक होना चाहिए। हमें हर्ष है कि हिज़ डिवाइन ग्रेस परमहंस परिव्राजकाचार्य भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज की कृपा से हम इस घोर व्याधि से मुक्त हो गए हैं। वे ही हमारी आँखें खोलने वाले, हमारे नित्य पिता, हमारे नित्य उपदेष्टा एवं हमारे नित्य मार्गदर्शक हैं। अतएव आइए, इस मंगलमय दिन उनके चरणकमलों में नतमस्तक हों।\n\nसज्जनो, यद्यपि दिव्य ज्ञान में हम अज्ञानी बालकों के समान हैं, फिर भी हिज़ डिवाइन ग्रेस, मेरे गुरुदेव ने अनुभवजन्य ज्ञान के दुर्जेय अन्धकार को दूर करने के लिए हमारे भीतर एक छोटी-सी अग्नि प्रज्वलित कर दी है। अब हम इतने सुरक्षित पक्ष में हैं कि अनुभववादी विचारधाराओं का कितना भी दार्शनिक तर्क हमें हिज़ डिवाइन ग्रेस के चरणकमलों पर अपनी नित्य निर्भरता की स्थिति से एक इंच भी विचलित नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, हम मायावाद-सम्प्रदाय के सर्वाधिक पण्डित विद्वानों को भी चुनौती देने को तैयार हैं और सिद्ध करने को तत्पर हैं कि भगवान् तथा गोलोक में उनकी दिव्य लीलाएँ ही *वेदों* की उदात्त शिक्षा का सार हैं। इसका स्पष्ट संकेत छान्दोग्य उपनिषद् (8.13.1) में है:\n\nśyāmāc chavalaṁ prapadye\n\nśavalāc chyāmaṁ prapadye\n\n\"कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए मैं उनकी ऊर्जा (राधा) की शरण ग्रहण करता हूँ, और उनकी ऊर्जा की कृपा प्राप्त करने के लिए मैं कृष्ण की शरण ग्रहण करता हूँ।\" इसी प्रकार ऋग्वेद (1.22.20) में भी:\n\ntad viṣṇoḥ paramaṁ padaṁ sadā\n\npaśyanti sūrayaḥ divīva cakṣur ātatam\n\nviṣṇor yat paramaṁ padam\n\n\"भगवान् विष्णु के चरणकमल समस्त देवताओं के परम लक्ष्य हैं। भगवान् के ये चरणकमल आकाश में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं।\"\n\n*गीता* में इतनी सजीवता से व्याख्यायित वह सरल सत्य, जो *वेदों* का केन्द्रीय उपदेश है, अनुभववादी विचारधाराओं के सर्वाधिक प्रबल विद्वानों द्वारा न तो समझा जाता है और न ही उसका संदेह तक किया जाता है। यहीं श्री व्यास-पूजा का रहस्य निहित है। जब हम परम भगवान् की दिव्य लीलाओं का ध्यान करते हैं, तब हमें यह अनुभव करते हुए गर्व होता है कि हम उनके नित्य सेवक हैं, और हम आनन्द-विभोर होकर हर्ष से नृत्य करते हैं। मेरे दिव्य गुरुदेव की समस्त जय हो, क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने अपनी अविच्छिन्न कृपा-धारा से हमारे भीतर नित्य अस्तित्व का ऐसा आन्दोलन जागृत कर दिया। आइए, उनके चरणकमलों में नतमस्तक हों।\n\nसज्जनो, यदि वे इस स्थूल सांसारिक भ्रम की दासता से हमें उबारने के लिए हमारे समक्ष प्रकट न हुए होते, तो निश्चय ही हम जन्म-जन्मान्तरों एवं युगों तक असहाय बन्धन के अन्धकार में पड़े रहते। यदि वे हमारे समक्ष प्रकट न हुए होते, तो हम भगवान् चैतन्य की उदात्त शिक्षा के नित्य सत्य को समझने में समर्थ न हो पाते। यदि वे हमारे समक्ष प्रकट न हुए होते, तो हम ब्रह्म-संहिता के प्रथम श्लोक का महत्त्व जान न पाते:\n\nīśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ\n\nsac-cid-ānanda-vigrahaḥ\n\nanādir ādir govindaḥ\n\nsarva-kāraṇa-kāraṇam\n\n[Bs. 5.1]\n\n\"कृष्ण, जो गोविन्द के नाम से विख्यात हैं, परम भगवान् हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय एवं आध्यात्मिक है। वे समस्त के उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं, और वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं।\"\n\nव्यक्तिगत रूप से, मुझे अपने जीवन-यात्रा के आगामी करोड़ों जन्मों तक किसी प्रत्यक्ष सेवा की कोई आशा नहीं, किन्तु मुझे विश्वास है कि किसी न किसी दिन मैं इस भ्रम के पंक से उद्धार पा जाऊँगा, जिसमें इस समय मैं इतनी गहराई से धँसा हुआ हूँ। अतएव मैं अपनी समस्त निष्ठा के साथ अपने दिव्य गुरुदेव के चरणकमलों में प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे अपने पूर्व कुकर्मों के कारण नियत भाग्य का भोग करने दें, किन्तु मुझे यह स्मरण-शक्ति प्रदान करें: कि मैं अपने दिव्य गुरुदेव की अटल कृपा से अनुभूत सर्वशक्तिमान् परम भगवान् का एक तुच्छ सेवक मात्र हूँ। अतएव आइए, अपनी समस्त सामर्थ्य भर विनम्रता के साथ मैं उनके चरणकमलों में नतमस्तक होऊँ।"}
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जगत् के अन्धकार में\n\nमनुष्य के पुनर्जन्म की विनाशिनी,\n\nमैं तेरा ध्यान करता हूँ।\n\n-2-\n\nहे व्यास, तुझे प्रणाम।\n\nतू महान् बुद्धि से सम्पन्न है,\n\nऔर तेरे नेत्र\n\nपूर्ण-विकसित कमल की\n\nपँखुड़ियों के समान विशाल हैं।\n\nतू ही था\n\nजिसने प्रज्ञा के इस दीप को प्रदीप्त किया,\n\nउसे *महाभारत* के\n\nतैल से भरकर।\n\nतात्पर्य\n\nश्रीपाद शंकराचार्य भौतिक दृष्टिकोण से निराकारवादी थे। किन्तु उन्होंने उस आध्यात्मिक स्वरूप का, जो सच्चिदानन्द-विग्रह [Bs. 5.1] के नाम से ज्ञात है, अथवा उस नित्य, सर्वानन्दमय ज्ञान-स्वरूप का, जो भौतिक सृष्टि से पूर्व विद्यमान था, कभी निषेध नहीं किया। जब उन्होंने परब्रह्म को निराकार कहा, तब उनका अभिप्राय यह था कि भगवान् के सच्चिदानन्द स्वरूप को व्यक्तित्व की भौतिक धारणा से भ्रमित नहीं करना चाहिए। *गीता* पर अपने भाष्य के सर्वारम्भ में ही वे यह प्रतिपादित करते हैं कि नारायण, परमेश्वर, भौतिक सृष्टि से परे दिव्य हैं। भगवान् सृष्टि से पूर्व दिव्य व्यक्तित्व के रूप में विद्यमान थे, और भौतिक व्यक्तित्व से उनका कोई सम्बन्ध नहीं। भगवान् श्रीकृष्ण वही परम भगवान् हैं, और भौतिक शरीर से उनका कोई सम्बन्ध नहीं। वे अपने आध्यात्मिक, नित्य स्वरूप में अवतरित होते हैं, किन्तु मूर्ख लोग उनके शरीर को हमारे समान समझ बैठते हैं। शंकर का निराकारवाद का प्रचार विशेषतः उन मूर्ख व्यक्तियों को शिक्षा देने हेतु है जो कृष्ण को भौतिक तत्त्वों से बना एक साधारण मनुष्य मानते हैं।\n\nयदि *गीता* किसी भौतिक मनुष्य द्वारा कही गई होती, तो कोई भी उसे पढ़ने की चिन्ता न करता, और निश्चय ही व्यासदेव ने उसे *महाभारत* के इतिहास में सम्मिलित करने का कष्ट न उठाया होता। उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार, *महाभारत* प्राचीन जगत् का इतिहास है, और व्यासदेव इस महान् महाकाव्य के रचयिता हैं। *भगवद्गीता* कृष्ण से अभिन्न है; और चूँकि कृष्ण परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतः कृष्ण तथा उनके वचनों में कोई भेद नहीं। अतएव *भगवद्गीता* उतनी ही आराध्य है जितने स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण, क्योंकि दोनों परम हैं। जो व्यक्ति *भगवद्गीता* को \"यथारूप\" सुनता है, वह वस्तुतः भगवान् के अधरकमलों से साक्षात् वचन सुनता है। किन्तु दुर्भाग्यशाली व्यक्ति कहते हैं कि *गीता* आधुनिक मनुष्य के लिए अत्यधिक पुरातन है, जो ईश्वर को कल्पना अथवा ध्यान द्वारा खोजना चाहता है।\n\n-3-\n\nहे कृष्ण, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ,\n\nहे तू जो शरण है\n\nसमुद्र-जनित लक्ष्मी का\n\nतथा उन सबका जो शरण ग्रहण करते हैं\n\nतेरे चरणकमलों में।\n\nतू वस्तुतः है\n\nइच्छा-पूर्ति-करने वाला कल्पवृक्ष\n\nअपने भक्त के लिए।\n\nतेरा एक हाथ धारण करता है दण्ड\n\nगौओं को हाँकने हेतु,\n\nऔर तेरा दूसरा हाथ उठा हुआ है —\n\nअँगूठा छूता है तर्जनी के\n\nअग्रभाग को,\n\nदिव्य ज्ञान का संकेत करता हुआ।\n\nहे परमेश्वर, तुझे प्रणाम,\n\nक्योंकि तू ही दोहन करने वाला है\n\n*गीता* के अमृत का।\n\nतात्पर्य\n\nश्रीपाद शंकराचार्य स्पष्ट रूप से कहते हैं, \"अरे मूर्खो, बस गोविन्द की आराधना करो और स्वयं नारायण द्वारा कही गई उस *भगवद्गीता* की उपासना करो,\" फिर भी मूर्ख लोग आज भी नारायण को खोज निकालने के लिए अपना अनुसन्धान-कार्य करते रहते हैं; फलस्वरूप वे अभागे हैं, और वे व्यर्थ ही अपना समय गँवाते हैं। नारायण कभी अभागे अथवा दरिद्र नहीं हैं; अपितु, उनकी आराधना भाग्य की देवी लक्ष्मी द्वारा, साथ ही समस्त जीवों द्वारा की जाती है। शंकर ने स्वयं को \"ब्रह्म\" घोषित किया, किन्तु वे स्वीकार करते हैं कि नारायण, अथवा कृष्ण, वही परम भगवान् हैं जो भौतिक सृष्टि से परे हैं। वे कृष्ण को परब्रह्म, अथवा परम ब्रह्म, के रूप में अपना सम्मान अर्पित करते हैं, क्योंकि वे (कृष्ण) सबके आराध्य हैं। केवल मूर्ख तथा कृष्ण के शत्रु, जो यह समझ ही नहीं पाते कि *भगवद्गीता* क्या है (यद्यपि वे उस पर भाष्य रचते हैं), कहते हैं, \"वह साकार कृष्ण नहीं, जिनके प्रति हमें पूर्णतया आत्मसमर्पण करना है, अपितु वह अजन्मा, अनादि नित्य तत्त्व है जो कृष्ण के माध्यम से बोलता है।\" मूर्ख वहाँ धँस पड़ते हैं जहाँ देवदूत भी पाँव रखने से डरते हैं। जहाँ निराकारवादियों में महानतम शंकर कृष्ण तथा उनके ग्रन्थ *भगवद्गीता* को अपना उचित सम्मान अर्पित करते हैं, वहीं वे मूर्ख कहते हैं कि \"हमें साकार कृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं।\" ऐसे अप्रबुद्ध लोग नहीं जानते कि कृष्ण परम हैं और उनके भीतर तथा बाहर में कोई भेद नहीं। भीतर तथा बाहर का भेद द्वैतमय, भौतिक जगत् में अनुभव किया जाता है। परम जगत् में ऐसा कोई भेद नहीं, क्योंकि परम में प्रत्येक वस्तु आध्यात्मिक (सच्चिदानन्द) है, और नारायण, अथवा कृष्ण, परम जगत् से सम्बन्धित हैं। परम जगत् में केवल यथार्थ व्यक्तित्व ही होता है, और शरीर तथा आत्मा में कोई भेद नहीं होता।\n\n-4-\n\n*उपनिषद्*\n\nएक गौओं के झुंड के समान हैं,\n\nभगवान् श्रीकृष्ण, एक गोप के पुत्र,\n\nउनके दोहक हैं,\n\nअर्जुन बछड़ा है,\n\n*गीता* का परम अमृत\n\nदुग्ध है,\n\nऔर शुद्ध बुद्धि वाला\n\nबुद्धिमान् मनुष्य\n\nउसका पान करने वाला है।\n\nतात्पर्य\n\nजब तक मनुष्य आध्यात्मिक वैविध्य को न समझे, तब तक वह भगवान् की दिव्य लीलाओं को नहीं समझ सकता। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि कृष्ण के नाम, रूप, गुण, लीला, पार्षद-मण्डली तथा साज-सामग्री — ये सब आनन्द-चिन्मय-रस हैं — संक्षेप में, उनके दिव्य सम्बन्ध की प्रत्येक वस्तु आध्यात्मिक आनन्द, ज्ञान एवं नित्यता के एक ही तत्त्व से रचित है। उनके नाम, रूप आदि का कोई अन्त नहीं, जबकि भौतिक जगत् में, जहाँ समस्त वस्तुओं का अन्त है, वैसा नहीं। जैसा कि *भगवद्गीता* में कहा गया है, केवल मूर्ख ही उनका उपहास करते हैं; जबकि वही शंकर, निराकारवादियों में महानतम, उनकी, उनकी गौओं की, तथा वसुदेव-पुत्र एवं देवकी के आनन्द-स्वरूप के रूप में उनकी लीलाओं की आराधना करते हैं।\n\n-5-\n\nहे वसुदेव-पुत्र,\n\nकंस तथा चाणूर असुरों के विनाशक,\n\nहे माता देवकी के परम आनन्द,\n\nहे तू, विश्व के गुरु,\n\nलोकों के शिक्षक,\n\nहे कृष्ण, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।\n\nतात्पर्य\n\nशंकर उन्हें वसुदेव तथा देवकी के पुत्र के रूप में वर्णित करते हैं। क्या इससे उनका अभिप्राय यह है कि वे किसी साधारण, भौतिक मनुष्य की आराधना कर रहे हैं? वे कृष्ण की आराधना करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि कृष्ण का जन्म तथा उनकी क्रियाएँ सब अलौकिक हैं। जैसा कि *भगवद्गीता* (4.9) में कहा गया है, कृष्ण का जन्म तथा क्रियाएँ रहस्यमय एवं दिव्य हैं, और अतएव केवल कृष्ण के भक्त ही उन्हें भली-भाँति जान सकते हैं। शंकर ऐसे मूर्ख न थे कि वे कृष्ण को साधारण मनुष्य स्वीकार करते और साथ ही उन्हें देवकी एवं वसुदेव का पुत्र जानते हुए उन्हें समस्त भक्तिमय प्रणाम अर्पित करते। *भगवद्गीता* के अनुसार, केवल कृष्ण के दिव्य जन्म तथा क्रियाओं को जानकर ही मनुष्य कृष्ण के समान आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है। पाँच भिन्न-भिन्न प्रकार के मोक्ष हैं। जो व्यक्ति कृष्ण की आध्यात्मिक आभा में, जो निराकार ब्रह्म-ज्योति के नाम से ज्ञात है, विलीन हो जाता है, वह अपने आध्यात्मिक शरीर का पूर्ण विकास नहीं करता। किन्तु जो अपने आध्यात्मिक अस्तित्व का पूर्ण विकास करता है, वह विभिन्न आध्यात्मिक धामों में नारायण अथवा कृष्ण का पार्षद बन जाता है। जो व्यक्ति नारायण के धाम में प्रवेश करता है, वह ठीक नारायण के समान (चतुर्भुज) आध्यात्मिक स्वरूप विकसित कर लेता है, और जो व्यक्ति कृष्ण के सर्वोच्च आध्यात्मिक धाम में, जो गोलोक वृन्दावन के नाम से ज्ञात है, प्रवेश करता है, वह कृष्ण के समान दो हाथों वाला आध्यात्मिक स्वरूप विकसित कर लेता है। शंकर, भगवान् शिव के अवतार के रूप में, इन समस्त आध्यात्मिक अस्तित्वों को जानते हैं, किन्तु उन्होंने अपने तत्कालीन बौद्ध अनुयायियों के समक्ष इन्हें प्रकट नहीं किया, क्योंकि उनके लिए आध्यात्मिक जगत् के विषय में जानना असम्भव था। भगवान् बुद्ध ने यह प्रचार किया कि शून्य ही परम लक्ष्य है, तो फिर उनके अनुयायी आध्यात्मिक वैविध्य को कैसे समझ सकते थे? अतएव शंकर ने कहा, ब्रह्म सत्यं जगन् मिथ्या, अर्थात्, भौतिक वैविध्य मिथ्या है किन्तु आध्यात्मिक वैविध्य तथ्य है। *पद्म पुराण* में भगवान् शिव ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें कलियुग में माया, अथवा भ्रम, के दर्शन का प्रचार बुद्ध के \"शून्य\" दर्शन के एक अन्य संस्करण के रूप में करना पड़ा। उन्हें यह विशिष्ट कारणों से भगवान् के आदेश पर करना पड़ा। तथापि, उन्होंने यह संस्तुति करके अपना यथार्थ अभिप्राय प्रकट कर दिया कि लोग कृष्ण की आराधना करें, क्योंकि शब्द-जाल तथा व्याकरणीय चालों से रचित मानसिक कल्पनाओं मात्र से कोई भी उद्धार नहीं पा सकता। शंकर आगे उपदेश देते हैं:\n\nbhaja govindaṁ bhaja govindaṁ\n\nbhaja govindam mūḍha-mate\n\nsamprāpte sannihite kāle\n\nna hi na hi rakṣati ḍukṛñ-karaṇe\n\n\"अरे बुद्धि के मूर्खो, बस गोविन्द की आराधना करो, बस गोविन्द की आराधना करो, बस गोविन्द की आराधना करो। तुम्हारा व्याकरणीय ज्ञान तथा शब्द-जाल मृत्यु के समय तुम्हें नहीं बचाएँगे।\"\n\n-6-\n\nकुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र की\n\nउस भयावह नदी की,\n\nजिसे पाण्डव विजयपूर्वक पार कर गए,\n\nभीष्म तथा द्रोण उसके ऊँचे तट थे,\n\nजयद्रथ नदी का जल था,\n\nगान्धार-नरेश नील कुमुदिनी,\n\nशल्य शार्क, कृप धारा,\n\nकर्ण प्रचण्ड तरंगें,\n\nअश्वत्थामा तथा विकर्ण भयंकर घड़ियाल,\n\nऔर दुर्योधन स्वयं भँवर —\n\nकिन्तु तू, हे कृष्ण, उसका केवट था!\n\n-7-\n\n*महाभारत* का वह निष्कलंक कमल\n\nजो व्यास के वचनों के\n\nजल पर उगता है\n\nऔर जिसकी *भगवद्गीता*\n\nअप्रतिरोध्य मधुर सुगन्ध है\n\nतथा जिसकी वीर-गाथाएँ\n\nपूर्ण-विकसित पँखुड़ियाँ हैं\n\nभगवान् हरि की कथा से पूर्णतः उद्घाटित,\n\nजो कलियुग के पापों का\n\nसंहार करते हैं,\n\nऔर जिस पर नित्य प्रकाश पाकर\n\nअमृत के अभिलाषी जीव,\n\nअनेक भ्रमरों के समान\n\nआनन्दपूर्वक मँडराते हैं—\n\nमहाभारत का यह कमल\n\nहमें परम कल्याण प्रदान करे।\n\n-8-\n\nभगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम,\n\nजो परमानन्द के साकार स्वरूप हैं,\n\nजिनकी कृपा और करुणा से\n\nगूँगे वाक्पटु हो जाते हैं\n\nऔर लँगड़े पर्वत लाँघ जाते हैं—\n\nउन्हें मैं प्रणाम करता हूँ!\n\nतात्पर्य\n\nमूर्ख कल्पनावादियों के मूर्ख अनुयायी आनन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित करने का अर्थ नहीं समझ पाते। शंकर ने स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित किया, ताकि उनके कुछ बुद्धिमान् अनुयायी अपने महान् गुरु शंकर—जो भगवान् शिव के अवतार थे—द्वारा प्रस्तुत उदाहरण से वास्तविक तथ्य को समझ सकें। किन्तु शंकर के अनेक हठी अनुयायी ऐसे हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित करने से इनकार करते हैं और इसके स्थान पर भगवद्गीता में भौतिकवाद का अन्तःक्षेप करके निर्दोष व्यक्तियों को पथभ्रष्ट करते हैं तथा अपनी टीकाओं से निर्दोष पाठकों को भ्रमित करते हैं; फलस्वरूप पाठकों को कभी भी समस्त कारणों के कारण भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित करके धन्य होने का अवसर नहीं मिलता। मानवता के प्रति सबसे बड़ा अपकार यही है कि गीता के अर्थ को विकृत करके मानव-जाति को कृष्ण के विज्ञान, अर्थात् कृष्णभावनामृत के विषय में अन्धकार में रखा जाए।\n\n-9-\n\nउस परम तेजोमय को प्रणाम,\n\nजिसकी स्तुति सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, वरुण,\n\nइन्द्र, रुद्र, मरुत् तथा समस्त दिव्य प्राणी\n\nस्तोत्रों से करते हैं,\n\nजिसकी महिमा का गान\n\nवेदों के मन्त्र करते हैं,\n\nजिसका गान सामगायक करते हैं\n\nऔर जिसकी महिमा का घोष\n\nउपनिषद् सम्पूर्ण स्वर-समूह में करते हैं,\n\nजिसे योगीजन\n\nपूर्ण ध्यान में लीन\n\nअपने मन से देखते हैं,\n\nऔर जिसकी सीमाओं को\n\nदेवताओं तथा असुरों के\n\nसमस्त समूह नहीं जानते।\n\nउन्हें, परमेश्वर श्रीकृष्ण को, समस्त प्रणाम—\n\nउन्हें हम प्रणाम करते हैं! उन्हें हम प्रणाम करते हैं! उन्हें हम प्रणाम करते हैं!\n\nतात्पर्य\n\nश्रीमद्भागवत से उद्धृत अपने ध्यान के नवें श्लोक के पाठ द्वारा शंकर ने यह संकेत किया है कि भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं उन सहित सभी के लिए आराध्य हैं। वे भौतिकतावादियों, निर्विशेषवादियों, मनोधर्मियों, \"शून्यवादी\" दार्शनिकों तथा भौतिक दुःखों के दण्ड के अधीन समस्त अन्य उम्मीदवारों को संकेत देते हैं—बस भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित करो, जिनकी आराधना ब्रह्मा, शिव, वरुण, इन्द्र तथा समस्त अन्य देवता करते हैं। तथापि उन्होंने विष्णु का नाम नहीं लिया, क्योंकि विष्णु कृष्ण के साथ अभिन्न हैं। वेद तथा उपनिषद् उस विधि को समझने हेतु हैं जिसके द्वारा मनुष्य कृष्ण की शरण ले सकता है। योगीजन ध्यान द्वारा उन्हें (कृष्ण को) अपने भीतर देखने का प्रयत्न करते हैं। दूसरे शब्दों में, यह उन समस्त देवताओं तथा असुरों के लिए है जो नहीं जानते कि परम लक्ष्य कहाँ है—शंकर उन्हें यही शिक्षा देते हैं, और वे विशेष रूप से असुरों तथा मूर्खों को निर्देश देते हैं कि वे उनके पदचिह्नों पर चलकर कृष्ण को तथा उनके शब्दों, भगवद्गीता को, प्रणाम अर्पित करें। ऐसे कर्मों से ही असुरों का कल्याण होगा, न कि अपने निर्दोष अनुयायियों को तथाकथित मानसिक कल्पनाओं अथवा दिखावटी ध्यान से पथभ्रष्ट करने से। शंकर साक्षात् कृष्ण को प्रणाम अर्पित करते हैं, मानो प्रकाश की खोज में लगे मूर्खों को दिखाने के लिए कि यहाँ सूर्य के समान प्रकाश है। किन्तु पतित असुर उन उल्लुओं के समान हैं जो सूर्य के प्रकाश के भय से ही अपनी आँखें नहीं खोलेंगे। ये उल्लू कृष्ण तथा उनके शब्दों भगवद्गीता के उदात्त प्रकाश को देखने हेतु कभी अपनी आँखें नहीं खोलेंगे। तथापि वे अपने अभागे पाठकों तथा अनुयायियों को पथभ्रष्ट करने हेतु अपनी मुँदी उल्लू-आँखों से गीता पर टीका करेंगे। शंकर, तथापि, अपने अल्पबुद्धि अनुयायियों के समक्ष प्रकाश को प्रकट करते हैं और दर्शाते हैं कि भगवद्गीता तथा कृष्ण ही प्रकाश का एकमात्र स्रोत हैं। यह सब सत्य के निष्ठावान् खोजियों को यह सिखाने हेतु है कि वे भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम अर्पित करें और इस प्रकार बिना किसी सन्देह के उनकी शरण लें। यही जीवन की परम सिद्धि है, और यही शंकर की परम शिक्षा है—वे महान् विद्वान् पण्डित, जिनकी शिक्षाओं ने बुद्ध के शून्यवादी दर्शन को भारत, ज्ञान की भूमि, से बाहर खदेड़ दिया। ॐ तत् सत्।\n\nकृष्णभावनामृत का शास्त्रीय आधार\n\n11 जनवरी, 1970 को लॉस एंजेलिस टाइम्स में एक लेख ने सूचित किया कि बर्कली स्थित कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के संकाय-सदस्यों ने, जिनमें दर्शनशास्त्र तथा दक्षिण एशियाई भाषाओं के प्रोफ़ेसर डॉ. जे. एफ. स्टाल भी सम्मिलित थे, हरे कृष्ण आन्दोलन के बर्कली केन्द्र के अध्यक्ष हान्स कैरी द्वारा पढ़ाए जाने वाले कृष्णभावनामृत के एक प्रयोगात्मक पाठ्यक्रम को श्रेय (credit) प्रदान करने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। प्रस्तावित पाठ्यक्रम को अस्वीकार करते हुए डॉ. स्टाल ने सुझाव दिया कि भक्तगण \"दर्शन विकसित करने की तुलना में जप में अधिक समय व्यतीत करते हैं।\" जब यह लेख हरे कृष्ण आन्दोलन के संस्थापक तथा आध्यात्मिक गुरु श्रील प्रभुपाद के ध्यान में आया, तब उन्होंने उस सुप्रसिद्ध प्रोफ़ेसर के साथ एक असाधारण पत्र-व्यवहार आरम्भ किया।\n\nलॉस एंजेलिस टाइम्स के लेख से उद्धरण\n\n\"यू.सी. बर्कली में दर्शनशास्त्र तथा निकट-पूर्वी [sic] भाषाओं के प्रोफ़ेसर तथा भारतीय दर्शन के एक प्राध्यापक डॉ. जे. एफ. स्टाल मानते हैं कि कृष्ण-सम्प्रदाय एक प्रामाणिक भारतीय धर्म है और इसके अनुयायी निष्ठावान् हैं। वे संघ के सदस्यों की तीव्र वृद्धि का श्रेय आज की युवा पीढ़ी की उस प्रवृत्ति को देते हैं, जो संगठित गिरजाघर-गमन को अस्वीकार करते हुए साथ ही रहस्यवाद में आस्था की परिपूर्ति की खोज में रहती है।\n\n\"तथापि वे इंगित करते हैं कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म, मुहम्मदी धर्म तथा यहूदी धर्म से विमुख होते हैं, वे प्रायः उन धर्मों के सगुण भगवान् से श्रद्धा खो बैठे होते हैं और बिना निरपेक्षों के एक रहस्यवादी धर्म की खोज में रहते हैं।\n\n\"'कृष्ण आन्दोलन के ये लोग हिन्दू धर्म की ओर मुड़े हैं, किन्तु कुतूहल की बात यह है कि यह एक अत्यन्त सगुणवादी सम्प्रदाय है,' स्टाल ने कहा। 'वे एक सगुण भगवान्, कृष्ण, को स्वीकार करते हैं, और ईसाई धर्म में भी वह है। मुझे लगता है कि उन्होंने अपनी ईसाई पृष्ठभूमि का कुछ अंश एक हिन्दू सम्प्रदाय में अन्तरित कर लिया है।'\n\n\"वे यह भी अनुभव करते हैं कि वे दर्शन विकसित करने की तुलना में जप में अधिक समय व्यतीत करते हैं। इन्हीं आधारों पर उन्होंने तथा संकाय के अन्य सदस्यों ने कृष्णभावनामृत के एक प्रयोगात्मक पाठ्यक्रम को श्रेय प्रदान करने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जो शीत-त्रैमास के दौरान सम्प्रदाय के बर्कली मन्दिर के अध्यक्ष हान्स कैरी द्वारा पढ़ाया जाएगा।\"\n\nश्रील प्रभुपाद का लॉस एंजेलिस टाइम्स को पत्र\n\n14 जनवरी, 1970\n\nसम्पादक\n\nलॉस एंजेलिस टाइम्स\n\nमहोदय: रविवार, 11 जनवरी, 1970 को दिनांकित लॉस एंजेलिस टाइम्स में \"कृष्ण-जप\" शीर्षक के अन्तर्गत आपके लेख के सन्दर्भ में, मैं यह इंगित करना चाहता हूँ कि हिन्दू धर्म पूर्णतः ईश्वर अथवा विष्णु की सगुण धारणा पर आधारित है। ईश्वर की निर्गुण धारणा एक गौण विषय है, अथवा ईश्वर के तीन पक्षों में से एक है। परम सत्य अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, परमात्मा-धारणा उनकी सर्वव्यापकता का स्थानिक पक्ष है, और निर्गुण धारणा उनकी महानता तथा नित्यता का पक्ष है। किन्तु ये सब मिलकर ही पूर्ण समग्र का निर्माण करते हैं।\n\nडॉ. जे. एफ. स्टाल का यह कथन कि कृष्ण-सम्प्रदाय ईसाई तथा हिन्दू धर्म का मिश्रण है—मानो कोई वस्तु बनावट से गढ़ी गई हो—सही नहीं है। यदि ईसाई, मुहम्मदी अथवा बौद्ध धर्म सगुण हैं, तो यह पूर्णतः स्वागत-योग्य है। किन्तु कृष्ण-धर्म तो उस सुदूर अतीत से सगुण रहा है, जब ईसाई, मुहम्मदी तथा बौद्ध धर्म अभी अस्तित्व में आए ही नहीं थे। वैदिक धारणा के अनुसार, धर्म मूलतः सगुण भगवान् द्वारा उनके नियमों के रूप में रचा जाता है। धर्म को मनुष्य अथवा मनुष्य से श्रेष्ठ ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी गढ़ नहीं सकता। धर्म केवल ईश्वर का नियम है।\n\nदुर्भाग्यवश, जो भी स्वामी इस देश में मुझसे पूर्व आए, उन्होंने ईश्वर के सगुण पक्ष का पर्याप्त ज्ञान न रखते हुए ईश्वर के निर्गुण पक्ष पर बल दिया। अतएव भगवद्गीता में कहा गया है कि केवल अल्पबुद्धि व्यक्ति ही यह मानते हैं कि ईश्वर मूलतः निर्गुण हैं किन्तु अवतार लेने पर एक रूप धारण कर लेते हैं। तथापि वेदों के प्रमाण पर आधारित कृष्ण-दर्शन यह है कि मूलतः परम सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। उनका पूर्ण विस्तार उनके स्थानिक पक्ष में प्रत्येक के हृदय में विद्यमान है, और निर्गुण ब्रह्म-तेज वह दिव्य प्रकाश तथा ऊष्मा है जो सर्वत्र वितरित है।\n\nभगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परम सत्य की खोज करने की वैदिक प्रणाली का लक्ष्य सगुण भगवान् को प्राप्त करना है। जो केवल परम सत्य के अन्य पक्षों, अर्थात् परमात्मा-पक्ष अथवा ब्रह्म-पक्ष, से ही सन्तुष्ट है, उसे अल्प ज्ञान-निधि से युक्त समझा जाना चाहिए। हाल ही में हमने अपना श्रीईशोपनिषद् नामक एक वैदिक साहित्य प्रकाशित किया है, और इस लघु पुस्तिका में हमने इस बिन्दु पर विस्तार से चर्चा की है।\n\nजहाँ तक हिन्दू धर्म का सम्बन्ध है, भारत में लाखों कृष्ण-मन्दिर हैं, और एक भी ऐसा हिन्दू नहीं है जो कृष्ण की आराधना न करता हो। अतः यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन कोई गढ़ी हुई धारणा नहीं है। हम समस्त विद्वानों, दार्शनिकों, धर्माचार्यों तथा सामान्य जनता के सदस्यों को आमन्त्रित करते हैं कि वे आलोचनात्मक अध्ययन द्वारा इस आन्दोलन को समझें। और यदि कोई ऐसा निष्ठापूर्वक करे, तो वह इस महान् आन्दोलन की उदात्त स्थिति को समझ लेगा।\n\nजप-प्रणाली भी अधिकृत है। कृष्ण के पवित्र नाम के निरन्तर जप के विषय में प्रोफ़ेसर स्टाल की वितृष्णा की भावना कृष्णभावनामृत के इस अधिकृत आन्दोलन में उनके ज्ञान के अभाव का निश्चित प्रमाण है। कैरी के पाठ्यक्रम को श्रेय देने के अनुरोध को अस्वीकार करने के बजाय, उन्हें तथा बर्कली स्थित कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के समस्त अन्य विद्वान् प्रोफ़ेसरों को धैर्यपूर्वक इस अधिकृत आन्दोलन के सत्य के विषय में सुनना चाहिए, जिसकी ईश्वरविहीन समाज में इस समय इतनी अधिक आवश्यकता है। [पाठ्यक्रम का श्रेय बाद में स्थापित कर दिया गया।] यही एकमात्र आन्दोलन है जो भ्रमित युवा पीढ़ी को बचा सकता है। मैं इस देश के समस्त उत्तरदायी संरक्षकों को आमन्त्रित करता हूँ कि वे इस दिव्य आन्दोलन को समझें और फिर हमें सबके कल्याण हेतु इसके प्रसार के लिए समस्त सच्ची सुविधाएँ प्रदान करें।\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\nहरे कृष्ण आन्दोलन के आध्यात्मिक गुरु\n\nश्रील प्रभुपाद तथा डॉ. स्टाल के बीच विचार-विमर्श\n\n23 जनवरी, 1970\n\nस्वामी ए. सी. भक्तिवेदान्त\n\nप्रिय स्वामीजी:\n\nलॉस एंजेलिस टाइम्स को लिखे अपने पत्र की एक प्रति मुझे भेजने के लिए, जो अब डेली कैलिफ़ोर्नियन में भी प्रकाशित हो चुका है, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि प्रचार के अतिरिक्त, समाचारपत्रों में साक्षात्कारों तथा पत्रों के माध्यम से धार्मिक अथवा दार्शनिक विषयों पर चर्चा करने से बहुत कम लाभ होता है; किन्तु मुझे दो संक्षिप्त टिप्पणियाँ करने की अनुमति दें।\n\nप्रथम, मैं जानता हूँ कि कृष्ण के प्रति भक्ति प्राचीन है (यद्यपि निश्चित रूप से वेदों जितनी प्राचीन नहीं) और इस पर ईसाई धर्म, इस्लाम अथवा यहूदी धर्म का कभी प्रभाव नहीं रहा (मैंने इस सन्दर्भ में बौद्ध धर्म का कभी उल्लेख नहीं किया)। सगुण तथा निर्गुण के बीच के अन्तर अपेक्षाकृत अस्पष्ट हैं, किन्तु सरलता हेतु इस भेद को अपनाते हुए, मैंने यह देखकर आश्चर्य व्यक्त किया कि एक पाश्चात्य संस्कृति में पले-बढ़े लोग, जो सगुण पर बल देती है, एक ऐसे भारतीय सम्प्रदाय की ओर मुड़ें जो वही करता है। मुझे तब कम आश्चर्य होता है जब पाश्चात्य एकेश्वरवाद से असन्तुष्ट लोग एक ऐसे भारतीय दर्शन की ओर मुड़ते हैं जो एक निर्गुण निरपेक्ष पर बल देता है।\n\nद्वितीय, मैंने न तो कृष्ण के नाम के जप पर कभी वितृष्णा व्यक्त की और न अनुभव की। मैं न केवल इससे चिढ़ता नहीं हूँ (कुछ लोगों की भाँति), अपितु मुझे यह प्रिय ही लगता है। किन्तु यह एक निर्विवाद तथ्य है कि भगवद्गीता (वेदों का उल्लेख तो दूर) ऐसे निरन्तर जप की अपेक्षा नहीं करती। गीता तो सर्वथा भिन्न विषयों से सम्बन्ध रखती है, जिनका मैं भारत के दर्शनों पर अपने पाठ्यक्रमों में कुछ विस्तार से विवेचन करता हूँ।\n\nआपको धन्यवाद देते हुए,\n\nआपका विश्वासी,\n\nजे. एफ. स्टाल\n\nदर्शनशास्त्र तथा दक्षिण एशियाई भाषाओं के प्रोफ़ेसर\n\n30 जनवरी, 1970\n\nजे. एफ. स्टाल\n\nदर्शनशास्त्र तथा दक्षिण एशियाई भाषाओं के प्रोफ़ेसर\n\nकैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय\n\nबर्कली, कैलिफ़ोर्निया\n\nमेरे प्रिय प्रोफ़ेसर स्टाल:\n\n23 जनवरी, 1970 को दिनांकित आपके कृपापूर्ण पत्र के लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ। अपने पत्र के अन्तिम अनुच्छेद में आपने उल्लेख किया है कि आप हरे कृष्ण मन्त्र के जप से चिढ़ते नहीं हैं (कुछ लोगों की भाँति), अपितु आपको यह प्रिय ही लगता है। इससे मुझे बहुत सन्तोष हुआ, और मैं इसके साथ हमारी पत्रिका, बैक टु गॉडहेड, अंक संख्या 28 की एक प्रति भेज रहा हूँ, जिसमें आप देखेंगे कि किस प्रकार विद्यार्थियों को [ओहायो स्टेट विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में] हरे कृष्ण मन्त्र का यह जप प्रिय लगा, यद्यपि वे सभी जप के इस सम्प्रदाय में नवदीक्षित थे। वस्तुतः यह जप हृदय को अत्यन्त प्रिय है और सामान्य जनता के हृदयों में आध्यात्मिक चेतना, अर्थात् कृष्णभावनामृत, का संचार करने का सर्वोत्तम साधन है।\n\nयह आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वसुलभ प्रणाली है और वेदों में इसकी अनुशंसा की गई है। बृहन्नारदीय पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केवल हरि [कृष्ण] के पवित्र नाम का जप ही लोगों को भौतिकतावादी अस्तित्व की समस्याओं से बचा सकता है, और इस कलियुग में कोई अन्य विकल्प नहीं, कोई अन्य विकल्प नहीं, कोई अन्य विकल्प नहीं है।\n\nपाश्चात्य संस्कृति एकेश्वरवादी है, किन्तु पाश्चात्य लोगों को निर्गुण भारतीय कल्पना द्वारा पथभ्रष्ट किया जा रहा है। पश्चिम के युवक हताश हैं, क्योंकि उन्हें एकेश्वरवाद के विषय में तत्परतापूर्वक शिक्षा नहीं दी जाती। वे शिक्षा तथा बोध की इस प्रणाली से सन्तुष्ट नहीं हैं। कृष्णभावनामृत आन्दोलन उनके लिए एक वरदान है, क्योंकि उन्हें वास्तव में अधिकृत वैदिक प्रणाली के अन्तर्गत पाश्चात्य एकेश्वरवाद को समझने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हम केवल सैद्धान्तिक रूप से चर्चा नहीं करते; अपितु हम वैदिक विधि-विधानों की विहित पद्धति से सीखते हैं।\n\nकिन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि अपने पत्र के अन्तिम अनुच्छेद में आप कहते हैं, \"यह एक निर्विवाद तथ्य है कि भगवद्गीता (वेदों का उल्लेख तो दूर) ऐसे निरन्तर जप की अपेक्षा नहीं करती।\" मेरा विचार है कि आपसे भगवद्गीता का निम्नलिखित श्लोक, तथा ऐसे ही अनेक अन्य श्लोक, छूट गए हैं:\n\nsatataṁ kīrtayanto māṁ\n\nyatantaś ca dṛḍha-vratāḥ\n\nnamasyantaś ca māṁ bhaktyā\n\nnitya-yuktā upāsate\n\n(Bg. 9.14)\n\nमोह से मुक्त तथा ईश्वर की अनुभूति में पूर्ण महान् आत्माओं की प्रवृत्ति का यहाँ वर्णन किया गया है: satataṁ kīrtayanto māṁ—वे सदा (satataṁ) मेरी महिमा का कीर्तन (kīrtayantaḥ) करते हैं और—nitya-yuktā upāsate—सदा मेरी (कृष्ण की) आराधना करते हैं।\n\nअतः मैं नहीं जानता कि आप \"निर्विवाद\" कैसे कह सकते हैं। और, यदि आप वेदों से सन्दर्भ चाहते हैं, तो मैं आपको अनेक दे सकता हूँ। वेदों में, प्रमुख दिव्य ध्वनि-कम्पन ॐकार भी कृष्ण ही है। प्रणव ॐकार वेदों का दिव्य तत्त्व है। वेदों का अनुसरण करने का अर्थ है वैदिक मन्त्रों का जप, और कोई भी वैदिक मन्त्र ॐकार के बिना पूर्ण नहीं होता। माण्डूक्य उपनिषद् में ॐकार को परमेश्वर का सर्वाधिक मंगलमय ध्वनि-निरूपण कहा गया है। अथर्ववेद में भी इसकी पुनः पुष्टि होती है। ॐकार परमेश्वर का ध्वनि-निरूपण है और इसीलिए वेदों का प्रमुख शब्द है। इस सन्दर्भ में, परमेश्वर कृष्ण कहते हैं, praṇavaḥ sarva-vedeṣu: \"समस्त वैदिक मन्त्रों में मैं ॐकार हूँ।\" (Bg. 7.8)\n\nइसके अतिरिक्त, भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय, श्लोक 15 में, कृष्ण कहते हैं, \"मैं प्रत्येक के हृदय में स्थित हूँ। समस्त वेदों द्वारा मुझे ही जानने योग्य है; मैं ही वेदान्त का रचयिता हूँ, और मैं ही वेद को यथार्थ रूप में जानता हूँ।\" प्रत्येक के हृदय में स्थित परमेश्वर का वर्णन मुण्डक तथा श्वेताश्वतर दोनों उपनिषदों में हुआ है: dvā suparṇā sayujā sakhāyā... परमेश्वर तथा व्यष्टि-आत्मा वृक्ष में दो मित्र पक्षियों के समान शरीर में बैठे हैं। एक पक्षी वृक्ष के फल, अर्थात् भौतिक कर्मों की प्रतिक्रियाएँ, खा रहा है, और दूसरा पक्षी, परमात्मा, साक्षी है।\n\nअतः वेदान्त-अध्ययन का लक्ष्य परमेश्वर कृष्ण को जानना है। इस बिन्दु पर भगवद्गीता के आठवें अध्याय, श्लोक 13 में बल दिया गया है, जहाँ कहा गया है कि योग की रहस्यमयी प्रणाली द्वारा, अन्ततः पवित्र अक्षर ॐ का उच्चारण करते हुए, मनुष्य उनके परम आध्यात्मिक लोक को प्राप्त होता है। वेदान्त-सूत्र में, जिसे आपने निश्चय ही पढ़ा है, चतुर्थ अध्याय, अधिकरण 4, सूत्र 22 में सकारात्मक रूप से कहा गया है, anāvṛttiḥ śabdāt: \"ध्वनि-कम्पन द्वारा मनुष्य मुक्त हो जाता है।\" भक्ति द्वारा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को भली-भाँति समझकर, मनुष्य उनके धाम को जा सकता है और इस भौतिक अवस्था में पुनः कभी वापस नहीं आता। यह कैसे सम्भव है? उत्तर है, केवल उनके नाम का निरन्तर जप करके।\n\nइसे आदर्श शिष्य अर्जुन ने स्वीकार किया है, जिन्होंने योगेश्वर, रहस्यमयी ज्ञान के स्वामी, कृष्ण से आध्यात्मिक विज्ञान के सिद्धान्त को पूर्ण रूप से सीखा है। कृष्ण को परब्रह्म मानते हुए, अर्जुन उन्हें सम्बोधित करते हैं, sthāne hṛṣīkeśa...: \"आपका नाम सुनकर जगत् आनन्दित हो जाता है, और इस प्रकार सभी आपके प्रति आसक्त हो जाते हैं।\" (Bg. 11.36) जप-प्रणाली यहाँ परम परब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, से सम्पर्क करने के प्रत्यक्ष साधन के रूप में अधिकृत की गई है। केवल पवित्र नाम कृष्ण के जप से, आत्मा परम पुरुष कृष्ण द्वारा अपने घर, ईश्वर के धाम, की ओर लौटने हेतु आकृष्ट हो जाती है।\n\nनारद-पञ्चरात्र में कहा गया है कि समस्त वैदिक अनुष्ठान, मन्त्र तथा बोध आठ शब्दों—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे—में संक्षिप्त हैं। इसी प्रकार, कलि-सन्तरण उपनिषद् में कहा गया है कि ये सोलह शब्द, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, विशेष रूप से कलि के इस भौतिकतावादी युग के अधःपतनकारी तथा कलुषकारी प्रभाव का प्रतिकार करने हेतु हैं।\n\nये समस्त बिन्दु मेरी पुस्तक भगवान् श्रीचैतन्य की शिक्षाएँ में विस्तार से प्रस्तुत किए गए हैं।\n\nअतः जप-प्रणाली केवल जीवन की व्यावहारिक सिद्धि की उदात्त विधि ही नहीं है, अपितु महानतम वैदिक विद्वान् तथा भक्त, भगवान् चैतन्य (जिन्हें हम कृष्ण का अवतार मानते हैं), द्वारा प्रवर्तित अधिकृत वैदिक सिद्धान्त है। हम केवल उनके अधिकृत पदचिह्नों पर चल रहे हैं।\n\nकृष्णभावनामृत आन्दोलन का परिक्षेत्र सार्वभौमिक है। आनन्द तथा ज्ञान से परिपूर्ण नित्य जीवन की अपनी मूल आध्यात्मिक स्थिति को पुनः प्राप्त करने की प्रणाली कोई अमूर्त, शुष्क सिद्धान्त-निर्माण नहीं है। आध्यात्मिक जीवन का वर्णन वेदों में सैद्धान्तिक, शुष्क अथवा निर्गुण रूप में नहीं किया गया है। वेदों का लक्ष्य केवल ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम का संचार है, और यह सामंजस्यपूर्ण निष्कर्ष कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा, अथवा हरे कृष्ण मन्त्र के जप द्वारा, व्यावहारिक रूप से अनुभूत होता है।\n\nजिस प्रकार आध्यात्मिक अनुभूति का लक्ष्य केवल एक है—ईश्वर के प्रति प्रेम—उसी प्रकार वेद दिव्य बोध के विषय में एक एकल समग्र पूर्ण के रूप में खड़े हैं। केवल प्रामाणिक वैदिक शिक्षा-परम्पराओं से पृथक् विविध मतों के अपूर्ण दृष्टिकोण ही भगवद्गीता को परस्पर-विरोधी प्रतीति प्रदान करते हैं। वेदों के समस्त प्रतीयमान विविध प्रस्तावों का समन्वय करने वाला सामंजस्यकारी तत्त्व वेद का सार, अर्थात् कृष्णभावनामृत (ईश्वर के प्रति प्रेम) है।\n\nआपको एक बार पुनः धन्यवाद देते हुए,\n\nआपका विश्वासी,\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\n8 फ़रवरी, 1970\n\nस्वामी ए. सी. भक्तिवेदान्त\n\nप्रिय स्वामीजी:\n\n30 जनवरी के अपने दीर्घ तथा रोचक पत्र को बैक टु गॉडहेड के अन्तिम अंक के साथ मुझे भेजने की कृपा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अब तक मैंने यहाँ आपके संघ के सदस्यों के साथ कुछ चर्चाएँ की हैं, किन्तु मेरे दृष्टिकोण से वे पूर्णतः सन्तोषजनक नहीं थीं। किन्तु अब मेरे पास आपका कहीं अधिक प्रामाणिक पत्र है, जिससे चर्चा एक उच्चतर स्तर पर पहुँच जाती है।\n\nफिर भी, मुझे भय है कि आपने मुझे यह विश्वास नहीं दिलाया है कि आप जिन समस्त शास्त्रों को उद्धृत करते हैं, वे केवल कृष्ण के नाम का जप ही विहित करते हैं। मुझे केवल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शास्त्रों का सन्दर्भ देने दें।\n\nभगवद्गीता (9.14) में, kīrtayantaḥ का अर्थ कृष्ण के नाम का जप होना आवश्यक नहीं है। इसका अर्थ महिमागान, कीर्तन, पाठ, वार्तालाप हो सकता है और यह गीतों, स्तोत्रों, वर्णनों अथवा संवादों की ओर संकेत कर सकता है। टीकाकार इसे इसी रूप में लेते हैं। शंकर अपनी टीका में केवल शब्द की पुनरावृत्ति करते हैं, किन्तु आनन्दगिरि अपने व्याख्या में कीर्तन को vedānta-śravaṇaṁ praṇava-japaś ca, \"वेदान्त का श्रवण तथा ॐ का जप\" के रूप में वर्गीकृत करते हैं (कि वैदिक ॐ कृष्ण है, यह भगवद्गीता में कहा गया है, जहाँ कृष्ण को अनेक अन्य वस्तुओं के साथ भी अभिन्न बताया गया है, और जो स्मृति है, किन्तु वेदों में नहीं, जो श्रुति हैं)। एक अन्य टीकाकार, हनुमान्, अपने पैशाच-भाष्य में कहते हैं कि kīrtayantaḥ का अर्थ केवल bhāṣamānaḥ—\"[के विषय में] वार्तालाप करना\" है।\n\nइस शब्द के यथार्थ अर्थ की तुलना में, मेरे विचार से, अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि सम्पूर्ण श्लोक यह अपेक्षा नहीं करता कि प्रत्येक व्यक्ति सदा कीर्तन में संलग्न रहे, अपितु केवल यह कहता है कि कुछ महान् आत्माएँ ऐसा करती हैं। यह अगले श्लोक से स्पष्ट है, जिसमें कहा गया है कि anye, \"अन्य लोग\", ज्ञान में संलग्न होते हैं: yajñena... yajanto mām, \"ज्ञान की आराधना से... मेरी आराधना करते हुए।\" भगवद्गीता उदार-हृदय है और विविध धार्मिक उपायों के प्रति सहिष्णु है, यद्यपि वह एक पक्ष पर समस्त अन्य पक्षों से अधिक बल भी देती है (अर्थात् sarva-phala-tyāga)।\n\nअन्ततः, वेदान्त-सूत्र के अन्तिम सूत्र में, anāvṛttiḥ śabdāt..., śabda शास्त्र अथवा वेदों के प्रकाशन की ओर संकेत करता है, जैसा कि सन्दर्भ से तथा टीकाकारों से स्पष्ट है। शंकर इसके समर्थन में अनेक पाठ उद्धृत करते हैं (जो ity ādi-śabdebhyaḥ, \"इन शब्दों के अनुसार\" से समाप्त होते हैं), अर्थात् इस कथन के समर्थन में कि \"शास्त्र के अनुसार कोई वापसी नहीं होती।\" वे इस सूत्र में śabda का उल्लेख mantrārtha-vādādi..., \"मन्त्र, वर्णन, इत्यादि\" कहकर भी करते हैं। वाचस्पति मिश्र भामती में इसका समर्थन करते हैं और यह जोड़कर इसे और स्पष्ट करते हैं कि एक विपरीत दृष्टिकोण śruti-smṛti-virodhaḥ, \"स्मृति तथा श्रुति के विरुद्ध\" है।\n\nआपके कृपापूर्ण ध्यान के लिए एक बार पुनः धन्यवाद देते हुए।\n\nआपका अत्यन्त विश्वासी,\n\nजे. एफ. स्टाल\n\n15 फ़रवरी, 1970\n\nजे. एफ. स्टाल\n\nदर्शनशास्त्र तथा दक्षिण एशियाई भाषाओं के प्रोफ़ेसर\n\nमेरे प्रिय डॉ. स्टाल:\n\nरविवार, 8 फ़रवरी, 1970 को दिनांकित आपका पत्र पाकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उसकी विषय-वस्तु को देखकर भी मुझे बहुत प्रसन्नता है।\n\nआपको यह विश्वास दिलाने के सन्दर्भ में कि समस्त शास्त्र कृष्ण के नाम का जप विहित करते हैं, मैं केवल भगवान् चैतन्य का प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूँ। भगवान् चैतन्य ने अनुशंसा की, kīrtanīyaḥ sadā hariḥ [\"हरि, कृष्ण, की निरन्तर स्तुति की जानी चाहिए\" (शिक्षाष्टक 3) [चै.च. आदि 17.31]]। इसी प्रकार, मध्वाचार्य उद्धृत करते हैं, vede rāmāyaṇe caiva hariḥ sarvatra gīyate [\"वेदों तथा रामायण में सर्वत्र हरि का गान किया गया है\"]। इसी प्रकार, भगवद्गीता (15.15) में भगवान् कहते हैं, vedaiś ca sarvair aham eva vedyaḥ [\"समस्त वेदों द्वारा मुझे ही जानने योग्य है\"]।\n\nइस प्रकार हम समस्त शास्त्रों को परम पुरुष की ओर लक्षित पाते हैं। ऋग्वेद (1.22.20) में मन्त्र है oṁ tad viṣṇoḥ paramaṁ padaṁ sadā paśyanti sūrayaḥ [\"देवता सदा विष्णु के उस परम धाम की ओर निहारते रहते हैं\"]। अतः सम्पूर्ण वैदिक प्रणाली भगवान् विष्णु को समझने हेतु है, और कोई भी शास्त्र प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से परमेश्वर विष्णु की महिमा का कीर्तन करता है।\n\nभगवद्गीता, श्लोक 9.14 के सन्दर्भ में, kīrtayantaḥ का अर्थ निश्चय ही महिमागान, कीर्तन, पाठ तथा वार्तालाप है, जैसा आपने कहा है; किन्तु महिमागान, कीर्तन अथवा पाठ—किसका? वह निश्चय ही कृष्ण का है। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त शब्द है mām [\"मेरा\"]। अतः जब कोई व्यक्ति कृष्ण की महिमा गाता है, जैसा शुकदेव ने श्रीमद्भागवत में किया, तो हम असहमत नहीं होते। यह भी कीर्तन है। समस्त वैदिक साहित्य में सर्वोच्च ग्रन्थ परमेश्वर कृष्ण की ऐसी महिमा हेतु उपयुक्त स्थान है, और यह इस श्लोक से भली-भाँति समझा जाना चाहिए:\n\nnigama-kalpa-taror galitaṁ phalaṁ\n\nśuka-mukhād amṛta-drava-saṁyutam\n\npibata bhāgavataṁ rasam ālayaṁ\n\nmuhur aho rasikā bhuvi bhāvukāḥ\n\n[SB 1.1.3]\n\n\"हे निपुण तथा विचारशील पुरुषो, श्रीमद्भागवत का रसपान करो, जो वैदिक साहित्य के कल्पतरु का परिपक्व फल है। यह श्रील शुकदेव गोस्वामी के अधरों से प्रकट हुआ। अतः यह फल और भी अधिक स्वादिष्ट हो गया है, यद्यपि इसका अमृतमय रस मुक्त आत्माओं सहित सभी के लिए पहले से ही आस्वाद-योग्य था।\" (श्रीमद्भागवत 1.1.3)\n\nकहा जाता है कि महाराज परीक्षित ने केवल श्रवण से मोक्ष प्राप्त किया, और इसी प्रकार शुकदेव गोस्वामी ने केवल कीर्तन से मोक्ष प्राप्त किया। हमारी भक्ति में एक ही लक्ष्य, ईश्वर के प्रति प्रेम, को प्राप्त करने हेतु नौ भिन्न-भिन्न विधियाँ हैं, और प्रथम विधि श्रवण है। यह श्रवण-विधि श्रुति कहलाती है। अगली विधि कीर्तन है। कीर्तन-विधि स्मृति है। हम श्रुति तथा स्मृति दोनों को एक साथ स्वीकार करते हैं। हम श्रुति को माता तथा स्मृति को बहन मानते हैं, क्योंकि बालक माता से सुनता है और फिर पुनः बहन से वर्णन द्वारा सीखता है।\n\nश्रुति तथा स्मृति दो समानान्तर रेखाएँ हैं। अतः श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं:\n\nśruti-smṛti-purāṇādi-\n\npañcarātra-vidhiṁ vinā\n\naikāntikī harer bhaktir\n\nutpātāyaiva kalpate\n\n[BRS 1.2.101]\n\nअर्थात्, श्रुति, स्मृति, पुराणों तथा पञ्चरात्रों के सन्दर्भ के बिना, अमिश्रित भक्ति कभी प्राप्त नहीं होती। अतः जो कोई भी शास्त्रों [वैदिक ग्रन्थों] के सन्दर्भ के बिना भक्ति-भाव प्रदर्शित करता है, वह केवल उपद्रव खड़े करता है। दूसरी ओर, यदि हम केवल श्रुतियों से ही चिपके रहें, तो हम veda-vāda-ratāḥ* बन जाते हैं, जिनकी भगवद्गीता में बहुत अधिक प्रशंसा नहीं की गई है।\n\nअतः भगवद्गीता, यद्यपि स्मृति है, समस्त वैदिक शास्त्र का सार है, sarvopaniṣado gāvaḥ.* यह ठीक उस गाय के समान है जो दूध, अर्थात् समस्त वेदों तथा उपनिषदों का सार, दे रही है, और शंकराचार्य सहित समस्त आचार्य भगवद्गीता को इसी रूप में स्वीकार करते हैं। अतः आप भगवद्गीता के प्रामाण्य को इस आधार पर अस्वीकार नहीं कर सकते कि वह स्मृति है; वह दृष्टिकोण śruti-smṛti-virodhaḥ, \"स्मृति तथा श्रुति के विरुद्ध\" है, जैसा आपने ठीक ही कहा है।\n\nआनन्दगिरि के इस उद्धरण के सन्दर्भ में कि कीर्तन का अर्थ vedānta-śravaṇaṁ praṇava japaś ca [\"वेदान्त का श्रवण तथा ॐ का जप\"] है, वेदान्त के ज्ञाता कृष्ण ही हैं, और वही वेदान्त के रचयिता हैं। वे veda-vit तथा vedānta-kṛt हैं। तो फिर vedānta-śravaṇa के लिए इससे बड़ा अवसर कहाँ है कि उसे कृष्ण से ही सुना जाए?\n\nअगले श्लोक के सन्दर्भ में, जिसमें उल्लेख है कि jñāna-yajñena... yajanto mām, आराधना का विषय कृष्ण ही हैं, जैसा कि mām [\"मेरा\"] से इंगित होता है। यह विधि ईशोपनिषद्, मन्त्र 11 में वर्णित है:\n\nvidyāṁ cāvidyāṁ ca yas\n\ntad vedobhayaṁ saha\n\navidyayā mṛtyuṁ tīrtvā\n\nvidyayāmṛtam aśnute\n\n\"केवल वही, जो अविद्या की प्रक्रिया तथा दिव्य ज्ञान की प्रक्रिया को साथ-साथ सीख सकता है, बारम्बार जन्म-मृत्यु के प्रभाव को लाँघ सकता है और अमरता का पूर्ण आशीर्वाद भोग सकता है।\"\n\nविद्या, अर्थात् दिव्य ज्ञान, का अनुशीलन मनुष्य के लिए अनिवार्य है, अन्यथा अविद्या, अर्थात् अज्ञान, का अनुशीलन उसे भौतिक धरातल पर बद्ध अस्तित्व में बाँध देता है। भौतिकतावादी अस्तित्व का अर्थ है इन्द्रियतृप्ति का अनुसरण अथवा अनुशीलन, और इन्द्रियतृप्ति का यह ज्ञान (अविद्या) बारम्बार जन्म-मृत्यु की वृद्धि का अर्थ रखता है। जो इस ज्ञान में लीन हैं, वे प्रकृति के नियमों से कोई शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाते, और मायिक वस्तुओं के सौन्दर्य पर मोहित होकर बारम्बार वही कर्म दोहराते हैं। दूसरी ओर, विद्या, अर्थात् यथार्थ ज्ञान, का अर्थ है अविद्यामय कर्मों की प्रक्रिया को भली-भाँति जानना और साथ ही दिव्य विज्ञान का अनुशीलन करना तथा इस प्रकार अविचलित रूप से मुक्ति के मार्ग पर चलना।\n\nमुक्ति अमरत्व के पूर्ण आशीर्वादों का भोग है। इस अमरत्व का भोग ईश्वर के नित्य राज्य में (सम्भूत्य्-अमृतम् अश्नुते) होता है, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का धाम है; और यह समस्त कारणों के कारण परमेश्वर की आराधना का फल है, सम्भवात्। अतः इस प्रकार वास्तविक ज्ञान, विद्या, का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करना; यही ज्ञान-यज्ञेन है, ज्ञान की आराधना।\n\nयह ज्ञान-यज्ञेन… यजन्तो माम् ज्ञान की पूर्णता है, जैसा कि *भगवद्गीता* (7.19) में कहा गया है:\n\nbahūnāṁ janmanām ante\n\njñānavān māṁ prapadyate\n\nvāsudevaḥ sarvam iti\n\nsa mahātmā sudurlabhaḥ\n\n\"अनेक जन्म-मृत्यु के पश्चात् जो वास्तव में ज्ञानवान् है, वह मुझ [श्रीकृष्ण] की शरण में आता है, यह जानकर कि मैं ही समस्त कारणों का कारण हूँ तथा जो कुछ है वह सब मैं ही हूँ। ऐसी महान् आत्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\"\n\nयदि कोई अभी तक ज्ञान के इस निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा है और श्रीकृष्ण के बिना केवल शुष्क कल्पना में रत रहता है, तो उसका यह कठोर कल्पनात्मक परिश्रम अनाज के खाली छिलकों को कूटने के समान है। बिना छिले धान तथा धान के खाली छिलके देखने में बहुत समान प्रतीत होते हैं। जो बिना छिले धान में से अनाज निकालना जानता है वही विवेकवान् है, किन्तु जो किसी फल की आशा में खाली छिलके कूटता है, वह व्यर्थ ही अपना परिश्रम गँवाता है। इसी प्रकार, यदि कोई *वेदों* का अध्ययन *वेदों* के लक्ष्य श्रीकृष्ण को पाए बिना करता है, तो वह केवल अपना अमूल्य समय गँवाता है।\n\nअतः श्रीकृष्ण की आराधना हेतु ज्ञान की साधना अनेकानेक जन्म-मृत्यु के पश्चात् तब फल देती है जब मनुष्य वास्तव में विवेकवान् बन जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार विवेकवान् बनता है, तब वह श्रीकृष्ण की शरण में जाता है और उन्हें अन्ततः समस्त कारणों का कारण तथा जो कुछ है वह सब मानने लगता है। ऐसी महान् आत्मा अत्यन्त दुर्लभ है। अतः जिन्होंने तन-मन से श्रीकृष्ण की शरण ली है, वे दुर्लभ सुदुर्लभ महात्मा हैं। वे साधारण महात्मा नहीं हैं।\n\nभगवान् चैतन्य की कृपा से जीवन की यह सर्वोच्च सिद्धावस्था अत्यन्त उदारता से वितरित की जा रही है। इसका प्रभाव भी अत्यन्त उत्साहवर्धक है; अन्यथा, वैदिक संस्कृति की कोई पृष्ठभूमि न रखने वाले युवक-युवतियाँ केवल इस दिव्य ध्वनि—हरे कृष्ण—का उच्चारण करके दुर्लभ महात्माओं के पदों को इतनी शीघ्रता से किस प्रकार ग्रहण कर रहे हैं? और केवल इसी कीर्तन के आधार पर, उनमें से अधिकांश (जो अत्यन्त निष्ठावान् हैं) भक्ति में स्थिर हैं और भौतिक पापमय जीवन के चार सिद्धान्तों की ओर नहीं गिरते, अर्थात् (1) मांसाहार, (2) अवैध यौन सम्बन्ध, (3) कॉफ़ी, चाय तथा तम्बाकू सहित मादक द्रव्यों का सेवन, और (4) द्यूत। और यही *वेदान्त-सूत्र* का अन्तिम सूत्र है, अर्थात् अनावृत्तिः शब्दात् [\"ध्वनि-कम्पन से मनुष्य मुक्त हो जाता है\"]।\n\nमनुष्य को फल से सीखना होता है (फलेन परिचीयते)। हमारे विद्यार्थियों को इसी प्रकार आचरण करने का आदेश है, और वे नहीं गिरते। अविद्या, अर्थात् इन्द्रियतृप्ति, के उपर्युक्त सिद्धान्तों की साधना की लालसा किए बिना उनका शुद्ध आध्यात्मिक जीवन के स्तर पर बने रहना ही *वेदों* की उनकी समुचित समझ की कसौटी है। वे भौतिक स्तर पर लौटकर नहीं आते, क्योंकि वे ईश्वर-प्रेम के अमृतमय फल का रसास्वादन कर रहे हैं।\n\nसर्व-फल-त्याग [\"अपने कर्म के समस्त फलों का त्याग\"] की व्याख्या *भगवद्गीता* में स्वयं भगवान् ने इन शब्दों में की है—सर्व-धर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज [गीता 18.66]: \"सब कुछ त्यागकर केवल मेरी [श्रीकृष्ण की] शरण में आओ।\" हरे कृष्ण मन्त्र का अर्थ है \"हे श्रीकृष्ण की परम शक्ति, और हे भगवान् श्रीकृष्ण, कृपया मुझे अपनी नित्य सेवा में संलग्न करें।\" अतः हमने सब कुछ त्याग दिया है और केवल भगवान् की सेवा में संलग्न हैं। श्रीकृष्ण हमें जो करने का आदेश देते हैं वही हमारी एकमात्र प्रवृत्ति है। हमने कर्म, ज्ञान तथा योग के समस्त फलजनक कर्मों का त्याग कर दिया है; और यही शुद्ध भक्ति की अवस्था है, भक्तिर् उत्तमा।\n\nभवदीय,\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\n25 फ़रवरी, 1970\n\nस्वामी ए. सी. भक्तिवेदान्त\n\nसंस्थापक-आचार्य\n\nअन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ\n\nप्रिय स्वामीजी:\n\n15 फ़रवरी, 1970 के आपके अत्यन्त रोचक पत्र तथा उसके साथ संलग्न सामग्री के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।\n\nमुझे आशंका है कि जब भी आप कोई ऐसा अंश उद्धृत करते हैं जिसका तात्पर्य यह दिखाना है कि केवल कृष्ण नाम का कीर्तन ही अपेक्षित है, तब मैं कोई दूसरा अंश उद्धृत कर सकता हूँ जो किसी और बात की अपेक्षा रखता है, और यह जोड़ता हूँ—यदि श्लोको ऽपि प्रमाणम्, अयम् अपि श्लोकः प्रमाणं भवितुम् अर्हति: \"यदि मात्र श्लोक ही प्रमाण हैं, तो यह श्लोक भी प्रमाण माना जाना चाहिए।\" और निकट भविष्य में इसका कोई अन्त नहीं हो सकता, जैसा कि पतञ्जलि भी कहते हैं—महान् हि शब्दस्य प्रयोग-विषयः: \"क्योंकि शब्दों के प्रयोग का क्षेत्र विशाल है।\"\n\nभवदीय,\n\nजे. एफ. स्टाल\n\n3764 वाटसेका एवेन्यू\n\nलॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया 90034\n\n24 अप्रैल, 1970\n\nप्रिय डॉ. स्टाल:\n\n25 फ़रवरी, 1970 के आपके कृपापूर्ण पत्र के लिए मैं आपका हार्दिक धन्यवाद करता हूँ। मुझे खेद है कि मैं आपके पत्र का उत्तर पहले नहीं दे सका, क्योंकि उपर्युक्त पते पर एक नई चर्च-सम्पत्ति क्रय करने के विषय में मैं कुछ व्यस्त था। हमने एक पृथक् मन्दिर, व्याख्यान-कक्ष, मेरे निवास तथा भक्तों के आवासीय निवास हेतु एक अत्यन्त सुन्दर स्थान सुरक्षित किया है, जो समस्त आधुनिक सुविधाओं सहित एक मनोरम स्थान पर एक साथ है।\n\nमैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि अपनी सुविधानुसार इस स्थान पर पधारें, और यदि आप कृपया एक दिन पूर्व मुझे सूचित कर दें, तो मेरे विद्यार्थी आपका समुचित स्वागत करके अत्यन्त प्रसन्न होंगे।\n\nहमारे पत्राचार के विषय में, वास्तव में यह उद्धरण तथा प्रति-उद्धरण समस्या का समाधान नहीं कर सकते। न्यायालय में दोनों विद्वान् अधिवक्ता विधि-पुस्तकों से उद्धरण देते हैं, किन्तु वह मुक़दमे का समाधान नहीं है। मुक़दमे का निर्णय तो पीठासीन न्यायाधीश का निर्णय ही है। अतः तर्क हमें किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा सकता।\n\nशास्त्रीय उद्धरण कभी-कभी परस्पर विरोधी होते हैं, और प्रत्येक दार्शनिक का भिन्न मत होता है, क्योंकि कोई भिन्न प्रतिज्ञा प्रस्तुत किए बिना प्रसिद्ध दार्शनिक नहीं बन सकता। अतः सही निष्कर्ष तक पहुँचना कठिन है। निष्कर्ष यही है, जैसा ऊपर कहा गया—प्रामाणिक अधिकारी का निर्णय स्वीकार करना। हम भगवान् चैतन्य महाप्रभु के अधिकार का अनुसरण करते हैं, जो श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं, और वैदिक शास्त्र के अनुसार उनका कथन यह है कि इस युग में यह कीर्तन ही जीवन की समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान है। और यह वास्तव में व्यावहारिक अनुभव से सिद्ध हो रहा है।\n\nहाल ही में बर्कले में भगवान् चैतन्य के आविर्भाव-दिवस पर हमारे विद्यार्थियों का एक विशाल जुलूस निकला, और जनता ने इस प्रकार टिप्पणी की: \"यह जनसमूह उन अन्य लोगों जैसा नहीं है, जो खिड़कियाँ तोड़ने तथा उपद्रव मचाने हेतु एकत्र होते हैं।\" इसकी पुष्टि पुलिस ने भी इन शब्दों में की: \"कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सदस्यों ने पुलिस के साथ पूर्ण सहयोग किया, और सम्पूर्ण शोभायात्रा में शान्तिपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के उनके प्रयत्न इतने सफल रहे कि केवल न्यूनतम पुलिस-हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी।\"\n\nइसी प्रकार, डेट्रॉइट में एक विशाल शान्ति-मार्च हुआ, और जनसमूह में हमारे लोग \"देवदूतों\" के रूप में सराहे गए। अतः यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन वास्तव में इस समय मानव समाज की सभी प्रकार की समस्याओं के सर्वरोगनाशक के रूप में आवश्यक है।\n\nअन्य उद्धरण इस समय बहुत सराहनीय रूप से कार्य नहीं करेंगे। किसी औषधालय में अनेक औषधियाँ हो सकती हैं, और वे सभी असली हो सकती हैं, किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि एक अनुभवी चिकित्सक किसी विशेष रोगी के लिए औषधि निर्धारित करे। इस स्थिति में हम यह नहीं कह सकते, \"यह भी औषधि है, और यह भी औषधि है।\" नहीं। जो औषधि किसी विशेष व्यक्ति के लिए प्रभावकारी है, वही उसके लिए औषधि है—फलेन परिचीयते।\n\nभवदीय,\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\nश्रील प्रभुपाद की अन्तिम टिप्पणी\n\nन्याय के न्यायालय में दो अधिवक्ता किसी विषय का निर्णय करने हेतु प्रामाणिक विधि-पुस्तकों से लिए गए अपने-अपने सम्बद्ध तर्क प्रस्तुत करते हैं, किन्तु किसी एक पक्षकार के पक्ष में मुक़दमे का निर्णय करना न्यायाधीश पर निर्भर है। जब विरोधी अधिवक्ता अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं, तब वे दोनों वैध तथा प्रामाणिक होते हैं, किन्तु निर्णय इस आधार पर दिया जाता है कि कौन-सा तर्क उस विशेष मुक़दमे पर लागू होता है।\n\nभगवान् चैतन्य शास्त्रों के अधिकार पर अपना निर्णय देते हैं कि भगवान् के पवित्र नामों का कीर्तन ही मनुष्य को दिव्य स्तर तक ऊपर उठाने का एकमात्र साधन है, और वास्तव में हम देख सकते हैं कि यह प्रभावकारी है। हमारे प्रत्येक विद्यार्थी की, जिसने गम्भीरता से इस विधि को अपनाया है, व्यक्तिगत रूप से परीक्षा की जा सकती है, और कोई भी निष्पक्ष न्यायाधीश सहजता से देख लेगा कि उन्होंने अपनी दिव्य अनुभूति में किसी भी दार्शनिक, धार्मिक, योगी, कर्मी आदि से कहीं अधिक उन्नति की है।\n\nहमें परिस्थिति के अनुकूल प्रत्येक वस्तु को स्वीकार करना होता है। किसी विशेष परिस्थिति में अन्य विधियों के अस्वीकरण का अर्थ यह नहीं कि अस्वीकृत विधियाँ प्रामाणिक नहीं हैं। किन्तु तत्कालिक रूप से, युग, काल तथा प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए, प्रामाणिक होते हुए भी कभी-कभी विधियाँ अस्वीकृत कर दी जाती हैं। हमें प्रत्येक वस्तु को उसके व्यावहारिक फल से परखना होता है। ऐसी परीक्षा से, इस युग में हरे कृष्ण महामन्त्र का निरन्तर कीर्तन निःसन्देह अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध होता है।\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\nकृष्णभावनामृत:\n\nहिन्दू सम्प्रदाय या दिव्य संस्कृति?\n\nएक भ्रान्ति है कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करता है। किन्तु वास्तव में, कृष्णभावनामृत किसी भी प्रकार से ऐसा पन्थ या धर्म नहीं है जो अन्य पन्थों या धर्मों को परास्त करना चाहता हो। अपितु, यह समस्त मानव समाज के लिए एक अनिवार्य सांस्कृतिक आन्दोलन है और किसी विशेष साम्प्रदायिक पन्थ का विचार नहीं करता। यह सांस्कृतिक आन्दोलन विशेष रूप से लोगों को यह शिक्षा देने हेतु है कि वे किस प्रकार ईश्वर से प्रेम कर सकते हैं।\n\nकभी-कभी भारत के भीतर तथा बाहर के भारतीय यह सोचते हैं कि हम हिन्दू धर्म का प्रचार कर रहे हैं, किन्तु वास्तव में हम ऐसा नहीं कर रहे। *भगवद्गीता* में हिन्दू शब्द नहीं मिलेगा। वस्तुतः, सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में हिन्दू जैसा कोई शब्द नहीं है। यह शब्द भारत के निकटवर्ती प्रान्तों, जैसे अफ़ग़ानिस्तान, बलूचिस्तान तथा फ़ारस के, मुसलमानों द्वारा प्रचलित किया गया। भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों की सीमा पर सिन्धु नामक एक नदी है, और चूँकि वहाँ के मुसलमान सिन्धु का सही उच्चारण नहीं कर सकते थे, अतः उन्होंने उस नदी को हिन्दू कहा, और इस भूखण्ड के निवासियों को हिन्दू कहा। भारत में, वैदिक भाषा के अनुसार, यूरोपियनों को म्लेच्छ अथवा यवन कहा जाता है। इसी प्रकार, हिन्दू मुसलमानों द्वारा दिया गया नाम है।\n\nभारत की वास्तविक संस्कृति का वर्णन *भगवद्गीता* में है, जहाँ कहा गया है कि प्रकृति के भिन्न गुणों के अनुसार भिन्न प्रकार के मनुष्य होते हैं, जिन्हें सामान्यतया चार सामाजिक वर्णों तथा चार आध्यात्मिक आश्रमों में वर्गीकृत किया जाता है। सामाजिक तथा आध्यात्मिक विभाजन की यह व्यवस्था वर्णाश्रम-धर्म के नाम से जानी जाती है। चार वर्ण, अर्थात् सामाजिक श्रेणियाँ, हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। चार आश्रम, अर्थात् आध्यात्मिक श्रेणियाँ, हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्णन *पुराणों* नामक वैदिक शास्त्रों में है। वैदिक संस्कृति की इस संस्था का लक्ष्य प्रत्येक मनुष्य को श्रीकृष्ण, अर्थात् ईश्वर, के ज्ञान में उन्नति हेतु शिक्षित करना है। यही सम्पूर्ण वैदिक कार्यक्रम है।\n\nजब भगवान् चैतन्य ने महान् भक्त रामानन्द राय के साथ वार्तालाप किया, तब भगवान् ने उनसे पूछा, \"मानव जीवन का मूल सिद्धान्त क्या है?\" रामानन्द राय ने उत्तर दिया कि मानव सभ्यता तब आरम्भ होती है जब वर्णाश्रम-धर्म स्वीकार किया जाता है। वर्णाश्रम-धर्म के स्तर पर आए बिना मानव सभ्यता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अतः कृष्णभावनामृत आन्दोलन मानव सभ्यता की इसी सही व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयत्न कर रहा है, जो कृष्णभावनामृत, अर्थात् दैव-वर्णाश्रम—दिव्य संस्कृति, के नाम से जानी जाती है।\n\nभारत में, वर्णाश्रम व्यवस्था को अब विकृत रूप में ग्रहण कर लिया गया है, और इस प्रकार ब्राह्मण (सर्वोच्च सामाजिक वर्ण) के परिवार में जन्मा व्यक्ति यह दावा करता है कि उसे ब्राह्मण माना जाना चाहिए। किन्तु यह दावा शास्त्र द्वारा स्वीकृत नहीं है। गोत्र, अर्थात् पारिवारिक वंशानुगत क्रम, के अनुसार किसी का पूर्वज ब्राह्मण रहा हो सकता है, किन्तु वास्तविक वर्णाश्रम-धर्म जन्म अथवा वंश-परम्परा की परवाह किए बिना उस वास्तविक गुण पर आधारित है जिसे मनुष्य ने अर्जित किया हो। अतः हम हिन्दुओं की वर्तमान व्यवस्था का प्रचार नहीं कर रहे, विशेषतः उन हिन्दुओं की जो शंकराचार्य के प्रभाव में हैं, क्योंकि शंकराचार्य ने यह शिक्षा दी कि परम सत्य निराकार है, और इस प्रकार उन्होंने परोक्ष रूप से ईश्वर के अस्तित्व का निषेध किया।\n\nशंकराचार्य का मिशन विशेष था; वे बौद्ध धर्म के प्रभाव के पश्चात् वैदिक प्रभाव को पुनः स्थापित करने हेतु प्रकट हुए। चूँकि बौद्ध धर्म को सम्राट अशोक का संरक्षण प्राप्त था, छब्बीस सौ वर्ष पूर्व बौद्ध धर्म ने व्यावहारिक रूप से सम्पूर्ण भारत में व्याप्ति कर ली थी। वैदिक साहित्य के अनुसार, बुद्ध श्रीकृष्ण के अवतार थे जिनके पास एक विशेष शक्ति थी और जो एक विशेष प्रयोजन हेतु प्रकट हुए थे। उनकी विचार-पद्धति, अथवा पन्थ, व्यापक रूप से स्वीकार की गई, किन्तु बुद्ध ने *वेदों* के अधिकार को अस्वीकार कर दिया। जब बौद्ध धर्म फैल रहा था, तब वैदिक संस्कृति भारत में तथा अन्य स्थानों पर भी रुक गई। अतः, चूँकि शंकराचार्य का एकमात्र उद्देश्य बुद्ध की दर्शन-पद्धति को हटाना था, उन्होंने मायावाद नामक एक पद्धति प्रस्तुत की।\n\nठीक-ठीक कहें तो, मायावाद दर्शन नास्तिकता है, क्योंकि यह एक ऐसी विधि है जिसमें मनुष्य कल्पना करता है कि ईश्वर है। यह मायावाद दर्शन-पद्धति अनादि काल से विद्यमान है। धर्म अथवा संस्कृति की वर्तमान भारतीय व्यवस्था शंकराचार्य के मायावाद दर्शन पर आधारित है, जो बौद्ध दर्शन के साथ एक समझौता है। मायावाद दर्शन के अनुसार वास्तव में कोई ईश्वर नहीं है, अथवा यदि ईश्वर का अस्तित्व है, तो वह निराकार तथा सर्वव्यापी है और अतः किसी भी रूप में कल्पित किया जा सकता है। यह निष्कर्ष वैदिक साहित्य के अनुरूप नहीं है। वह साहित्य अनेक देवताओं का नामोल्लेख करता है, जिनकी आराधना भिन्न-भिन्न प्रयोजनों हेतु की जाती है, किन्तु प्रत्येक स्थिति में परमेश्वर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, विष्णु, को परम नियन्ता के रूप में स्वीकार किया जाता है। यही वास्तविक वैदिक संस्कृति है।\n\nकृष्णभावनामृत का दर्शन ईश्वर तथा देवताओं के अस्तित्व का निषेध नहीं करता, किन्तु मायावाद दर्शन दोनों का निषेध करता है; यह मानता है कि न तो देवता हैं और न ही ईश्वर। मायावादियों के लिए, अन्ततः सब कुछ शून्य है। वे कहते हैं कि मनुष्य किसी भी अधिकारी की कल्पना कर सकता है—चाहे विष्णु, दुर्गा, भगवान् शिव, अथवा सूर्यदेव—क्योंकि ये वे देवता हैं जिनकी समाज में सामान्यतया आराधना की जाती है। किन्तु मायावाद दर्शन वास्तव में इनमें से किसी के भी अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। मायावादी कहते हैं कि चूँकि मनुष्य निराकार ब्रह्म पर अपने मन को केन्द्रित नहीं कर सकता, अतः वह इनमें से किसी भी रूप की कल्पना कर सकता है। यह एक नई पद्धति है, जिसे पञ्चोपासना कहते हैं। इसे शंकराचार्य ने प्रचलित किया, किन्तु *भगवद्गीता* ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं सिखाती, और अतः वे प्रामाणिक नहीं हैं।\n\n*भगवद्गीता* देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार करती है। देवताओं का वर्णन *वेदों* में है, और कोई उनके अस्तित्व का निषेध नहीं कर सकता, किन्तु उन्हें शंकराचार्य की रीति के अनुसार समझा अथवा आराधा नहीं जाना चाहिए। देवताओं की आराधना *भगवद्गीता* में अस्वीकृत की गई है। *गीता* (7.20) स्पष्ट रूप से कहती है:\n\nkāmais tais tair hṛta jñānāḥ\n\nprapadyante 'nya-devatāḥ\n\ntaṁ taṁ niyamam āsthāya\n\nprakṛtyā niyatāḥ svayā\n\n\"जिनकी बुद्धि भौतिक कामनाओं से विकृत हो गई है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार आराधना के विशेष नियमों का पालन करते हैं।\" इसके अतिरिक्त, *भगवद्गीता* (2.44) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nbhogaiśvarya-prasaktānāṁ\n\ntayāpahṛta-cetasām\n\nvyavasāyātmikā buddhiḥ\n\nsamādhau na vidhīyate\n\n\"जो लोग इन्द्रिय-भोग तथा भौतिक ऐश्वर्य में अत्यधिक आसक्त हैं, और जो ऐसी वस्तुओं से मोहित हैं, उनके मन में भक्ति हेतु दृढ़ संकल्प उत्पन्न नहीं होता।\" जो लोग विविध देवताओं का अनुगमन कर रहे हैं, उन्हें हृत-ज्ञानाः कहा गया है, जिसका अर्थ है \"वे जिनकी विवेक-बुद्धि लुप्त हो गई है।\" इसकी और भी व्याख्या *भगवद्गीता* (7.23) में की गई है:\n\nantavat tu phalaṁ teṣāṁ\n\ntad bhavaty alpa-medhasām\n\ndevān deva-yajo yānti\n\nmad-bhaktā yānti mām api\n\n\"अल्पबुद्धि वाले मनुष्य देवताओं की आराधना करते हैं, और उनके फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं। जो देवताओं की आराधना करते हैं वे देवताओं के लोकों को जाते हैं, किन्तु मेरे भक्त मेरे परम धाम को प्राप्त करते हैं।\" देवताओं द्वारा प्रदत्त पुरस्कार क्षणिक होते हैं, क्योंकि कोई भी भौतिक सुविधा क्षणिक शरीर के सम्बन्ध में ही कार्य करती है। मनुष्य जो भी भौतिक सुविधाएँ प्राप्त करता है, चाहे आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से अथवा देवताओं से वरदान प्राप्त करके, वे शरीर के साथ ही समाप्त हो जाएँगी। किन्तु आध्यात्मिक उन्नति कभी समाप्त नहीं होगी।\n\nलोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि हम किसी साम्प्रदायिक धर्म का प्रचार कर रहे हैं। नहीं। हम तो केवल यह प्रचार कर रहे हैं कि ईश्वर से किस प्रकार प्रेम किया जाए। ईश्वर के अस्तित्व के विषय में अनेक सिद्धान्त हैं। उदाहरणार्थ, नास्तिक कभी ईश्वर में विश्वास नहीं करेगा। प्रोफ़ेसर जैक्स मोनॉड जैसे नास्तिक, जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, यह घोषणा करते हैं कि सब कुछ संयोग है (यह सिद्धान्त भारत के चार्वाक जैसे नास्तिक दार्शनिकों ने बहुत पूर्व ही प्रस्तुत कर दिया था)। फिर अन्य दर्शन, जैसे कर्म-मीमांसा दर्शन, यह स्वीकार करते हैं कि यदि मनुष्य अपना कर्म भली-भाँति तथा ईमानदारी से करता रहे, तो स्वतः ही फल आ जाएगा, बिना ईश्वर की ओर निर्देश किए। प्रमाण हेतु, ऐसे सिद्धान्तों के समर्थक यह तर्क देते हैं कि यदि कोई संक्रमण से रोगग्रस्त है और उसका प्रतिकार करने हेतु औषधि लेता है, तो रोग निष्प्रभावित हो जाएगा। किन्तु इस सन्दर्भ में हमारा तर्क यह है कि यदि किसी मनुष्य को श्रेष्ठतम औषधि भी दी जाए, तब भी वह मर सकता है। फल सदा पूर्वानुमेय नहीं होते। अतः, एक उच्चतर अधिकारी है, दैव-नेत्रेण, एक परम निर्देशक। अन्यथा, ऐसा कैसे होता है कि किसी धनी तथा धार्मिक व्यक्ति का पुत्र सड़क पर हिप्पी बन जाता है, अथवा जो व्यक्ति अत्यन्त परिश्रम करके धनी बनता है उसे उसका चिकित्सक कहता है, \"अब आप कोई भोजन नहीं कर सकते, केवल जौ का पानी\"?\n\nकर्म-मीमांसा सिद्धान्त यह मानता है कि संसार ईश्वर के परम निर्देश के बिना चल रहा है। ऐसे दर्शन कहते हैं कि सब कुछ काम के कारण होता है (काम-हैतुकम्)। काम के कारण मनुष्य किसी स्त्री की ओर आकृष्ट होता है, और संयोगवश यौन-सम्बन्ध होता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है। वास्तव में स्त्री को गर्भवती करने की कोई योजना नहीं होती, किन्तु एक स्वाभाविक क्रम से जब पुरुष तथा स्त्री संयुक्त होते हैं, तब एक परिणाम उत्पन्न होता है। नास्तिक सिद्धान्त, जिसका वर्णन *भगवद्गीता* के सोलहवें अध्याय में आसुरी, अर्थात् असुर-तुल्य, के रूप में किया गया है, यह है कि वास्तव में सब कुछ इसी प्रकार चल रहा है, संयोग के कारण तथा स्वाभाविक आकर्षण से उत्पन्न होकर। यह आसुरी सिद्धान्त इस विचार का समर्थन करता है कि यदि कोई सन्तान से बचना चाहता है, तो वह गर्भनिरोधक विधि का प्रयोग कर सकता है।\n\nकिन्तु वास्तव में, प्रत्येक वस्तु हेतु एक महान् योजना है—वैदिक योजना। वैदिक साहित्य इस विषय में निर्देश देता है कि पुरुष तथा स्त्री को किस प्रकार संयुक्त होना चाहिए, उन्हें किस प्रकार सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए, और यौन-जीवन का प्रयोजन क्या है। श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* में कहते हैं कि वैदिक विधान द्वारा अनुमोदित यौन-जीवन, अथवा वैदिक नियमों के निर्देशन में यौन-जीवन, प्रामाणिक है और उन्हें स्वीकार्य है। किन्तु संयोगवश यौन-जीवन स्वीकार्य नहीं है। यदि संयोगवश कोई यौन-आकर्षण में पड़ जाए और सन्तान हो जाए, तो वे वर्ण-संकर, अवांछित जनसंख्या, कहलाती हैं। यह तो निम्न पशुओं की रीति है; यह मनुष्यों के लिए स्वीकार्य नहीं है। मनुष्यों के लिए एक योजना है। हम यह सिद्धान्त स्वीकार नहीं कर सकते कि मानव जीवन हेतु कोई योजना नहीं है अथवा कि सब कुछ संयोग तथा भौतिक आवश्यकता से जन्म लेता है।\n\nशंकराचार्य का यह सिद्धान्त कि कोई ईश्वर नहीं है और कि समाज में केवल शान्ति तथा स्थिरता बनाए रखने हेतु मनुष्य अपना कर्म करता रह सकता है तथा ईश्वर की किसी भी रूप में कल्पना कर सकता है, भी कमोबेश इसी संयोग तथा आवश्यकता के विचार पर आधारित है। किन्तु हमारी रीति, जो पूर्णतया भिन्न है, अधिकार पर आधारित है। यही वह दिव्य वर्णाश्रम-धर्म है जिसकी श्रीकृष्ण अनुशंसा करते हैं, न कि वह जाति-व्यवस्था जैसी आज समझी जाती है। यह आधुनिक जाति-व्यवस्था अब भारत में भी निन्दित है, और इसकी निन्दा होनी ही चाहिए, क्योंकि जन्म के अनुसार भिन्न प्रकार के मनुष्यों का वर्गीकरण वैदिक अथवा दिव्य जाति-व्यवस्था नहीं है।\n\nसमाज में मनुष्यों की अनेक श्रेणियाँ हैं—कुछ मनुष्य अभियन्ता हैं, कुछ चिकित्सक हैं, कुछ रसायनज्ञ, व्यापारी, उद्यमी, इत्यादि। किन्तु ये विविध श्रेणियाँ जन्म से नहीं, अपितु गुण से निर्धारित होनी चाहिए। जन्म-आधारित जाति जैसी कोई वस्तु वैदिक साहित्य द्वारा अनुमोदित नहीं है, और न ही हम उसे स्वीकार करते हैं। जाति-व्यवस्था से हमारा कोई सरोकार नहीं, जो इस समय भारत में जनता द्वारा भी अस्वीकृत की जा रही है। अपितु, हम प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मण बनने तथा इस प्रकार जीवन की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करने का अवसर देते हैं।\n\nचूँकि इस समय ब्राह्मणों, आध्यात्मिक मार्गदर्शकों, तथा क्षत्रियों, प्रशासनिक मनुष्यों, की कमी है, और चूँकि सम्पूर्ण संसार पर शूद्रों, अर्थात् शारीरिक श्रमिक वर्ग के मनुष्यों, का शासन है, अतः समाज में अनेक विसंगतियाँ हैं। इन समस्त विसंगतियों को दूर करने हेतु ही हमने यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन अपनाया है। यदि ब्राह्मण वर्ग वास्तव में पुनः स्थापित हो जाए, तो सामाजिक कल्याण की अन्य श्रेणियाँ स्वतः ही अनुसरण करेंगी, ठीक जैसे जब मस्तिष्क पूर्णतया व्यवस्थित होता है, तब शरीर के अन्य अंग, जैसे भुजाएँ, उदर तथा पाँव, सभी भली-भाँति कार्य करते हैं।\n\nइस आन्दोलन का परम लक्ष्य लोगों को यह शिक्षा देना है कि ईश्वर से किस प्रकार प्रेम किया जाए। चैतन्य महाप्रभु इस निष्कर्ष का अनुमोदन करते हैं कि मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि यह सीखना है कि ईश्वर से किस प्रकार प्रेम किया जाए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का हिन्दू धर्म अथवा किसी भी धर्म-व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं। कोई ईसाई सज्जन अपना पन्थ ईसाई से हिन्दू में बदलने में रुचि नहीं लेगा। इसी प्रकार, संस्कृति-सम्पन्न कोई हिन्दू सज्जन ईसाई पन्थ में बदलने को तैयार नहीं होगा। ऐसा परिवर्तन तो उन मनुष्यों के लिए है जिनकी कोई विशेष सामाजिक स्थिति नहीं। किन्तु प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर के दर्शन तथा विज्ञान को समझने तथा उसे गम्भीरता से लेने में रुचि लेगा। मनुष्य को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन तथाकथित हिन्दू धर्म का प्रचार नहीं कर रहा। हम एक ऐसी आध्यात्मिक संस्कृति दे रहे हैं जो जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान कर सकती है, और अतः यह सम्पूर्ण विश्व में स्वीकार की जा रही है।"}
{"ref": "ssr/4", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/4/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "श्रीकृष्ण तथा ईसा मसीह को समझना", "purport": "कृष्ण, क्रिस्तोस, क्राइस्ट\n\n1974 में, पश्चिमी जर्मनी के फ्रैंकफ़र्ट एम मेन में इस्कॉन के केन्द्र के निकट, श्रील प्रभुपाद तथा उनके कई शिष्यों ने नीडरऑल्टाइष मठ के एक बेनेडिक्टिन भिक्षु, फ़ादर एमानुएल युंगक्लॉसेन, के साथ एक प्रातःकालीन भ्रमण किया। यह देखकर कि श्रील प्रभुपाद माला के समान ध्यान की माला लिए हुए थे, फ़ादर एमानुएल ने बताया कि वे भी एक निरन्तर प्रार्थना का जप करते थे: \"हे प्रभु ईसा मसीह, हम पर कृपालु हों।\" तत्पश्चात् निम्नलिखित वार्तालाप हुआ।\n\nश्रील प्रभुपाद: क्राइस्ट शब्द का क्या अर्थ है?\n\nफ़ादर एमानुएल: क्राइस्ट यूनानी शब्द क्रिस्तोस से आया है, जिसका अर्थ है \"अभिषिक्त जन।\"\n\nश्रील प्रभुपाद: क्रिस्तोस कृष्ण शब्द का यूनानी रूप है।\n\nफ़ादर एमानुएल: यह अत्यन्त रोचक है।\n\nश्रील प्रभुपाद: जब कोई भारतीय व्यक्ति कृष्ण को पुकारता है, तब वह प्रायः कहता है, \"कृष्ट।\" कृष्ट एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है \"आकर्षण।\" अतः जब हम ईश्वर को \"क्राइस्ट,\" \"कृष्ट,\" अथवा \"कृष्ण\" कहकर सम्बोधित करते हैं, तब हम उसी सर्वाकर्षक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का संकेत करते हैं। जब ईसा ने कहा, \"हे हमारे पिता, जो स्वर्ग में हैं, आपका नाम पवित्र माना जाए,\" तब ईश्वर का वह नाम \"कृष्ट\" अथवा \"कृष्ण\" था। क्या आप सहमत हैं?\n\nफ़ादर एमानुएल: मेरा विचार है कि ईसा ने, ईश्वर के पुत्र के रूप में, हम पर ईश्वर का वास्तविक नाम प्रकट किया है: क्राइस्ट। हम ईश्वर को \"पिता\" कह सकते हैं, किन्तु यदि हम उन्हें उनके वास्तविक नाम से सम्बोधित करना चाहें, तो हमें \"क्राइस्ट\" कहना होगा।\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। \"क्राइस्ट\" कृष्ट कहने का ही एक और प्रकार है, और \"कृष्ट\" कृष्ण, ईश्वर के नाम, का उच्चारण करने का ही एक और प्रकार है। ईसा ने कहा कि मनुष्य को ईश्वर के नाम का महिमागान करना चाहिए, किन्तु कल मैंने एक धर्मशास्त्री को यह कहते सुना कि ईश्वर का कोई नाम नहीं है—कि हम उन्हें केवल \"पिता\" ही कह सकते हैं। पुत्र अपने पिता को \"पिता\" कह सकता है, किन्तु पिता का एक विशिष्ट नाम भी होता है। इसी प्रकार, \"ईश्वर\" पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सामान्य नाम है, जिनका विशिष्ट नाम कृष्ण है। अतः आप ईश्वर को चाहे \"क्राइस्ट,\" \"कृष्ट,\" अथवा \"कृष्ण\" कहें, अन्ततः आप उसी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सम्बोधित कर रहे हैं।\n\nफ़ादर एमानुएल: हाँ, यदि हम ईश्वर के वास्तविक नाम की बात करें, तो हमें \"क्रिस्तोस\" कहना होगा। हमारे धर्म में, हमारी त्रिमूर्ति है: पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा। हम विश्वास करते हैं कि हम ईश्वर का नाम केवल ईश्वर के पुत्र के प्रकटीकरण से ही जान सकते हैं। ईसा मसीह ने पिता का नाम प्रकट किया, और अतः हम क्राइस्ट नाम को ईश्वर के प्रकट नाम के रूप में ग्रहण करते हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: वास्तव में, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता—कृष्ण अथवा क्राइस्ट—नाम वही है। मुख्य बात उन वैदिक शास्त्रों के विधानों का अनुसरण करना है जो इस युग में ईश्वर के नाम का कीर्तन करने की अनुशंसा करते हैं। सरलतम विधि महामन्त्र का कीर्तन करना है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। राम तथा कृष्ण ईश्वर के नाम हैं, और हरे ईश्वर की ऊर्जा है। अतः जब हम महामन्त्र का कीर्तन करते हैं, तब हम ईश्वर को उनकी ऊर्जा सहित सम्बोधित करते हैं। यह ऊर्जा दो प्रकार की है, आध्यात्मिक तथा भौतिक। इस समय हम भौतिक ऊर्जा के चंगुल में हैं। अतः हम श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे कृपया हमें भौतिक ऊर्जा की सेवा से मुक्त करें और हमें आध्यात्मिक ऊर्जा की सेवा में स्वीकार करें। यही हमारा सम्पूर्ण दर्शन है। हरे कृष्ण का अर्थ है, \"हे ईश्वर की ऊर्जा, हे ईश्वर [श्रीकृष्ण], कृपया मुझे अपनी सेवा में संलग्न करें।\" सेवा करना हमारा स्वभाव है। किसी न किसी प्रकार हम भौतिक वस्तुओं की सेवा में आ गए हैं, किन्तु जब यह सेवा आध्यात्मिक ऊर्जा की सेवा में रूपान्तरित हो जाती है, तब हमारा जीवन पूर्ण हो जाता है। भक्तियोग [ईश्वर की प्रेममयी सेवा] का अभ्यास करने का अर्थ है \"हिन्दू,\" \"मुसलमान,\" \"ईसाई,\" इस अथवा उस जैसी उपाधियों से मुक्त होना, और केवल ईश्वर की सेवा करना। हमने ईसाई, हिन्दू तथा मुहम्मदी धर्म रच लिए हैं, किन्तु जब हम उपाधियों से रहित धर्म पर आते हैं, जिसमें हम स्वयं को हिन्दू अथवा ईसाई अथवा मुहम्मदी नहीं मानते, तब हम शुद्ध धर्म, अथवा भक्ति, की बात कर सकते हैं।\n\nफ़ादर एमानुएल: मुक्ति?\n\nश्रील प्रभुपाद: नहीं, भक्ति। जब हम भक्ति की बात करते हैं, तब मुक्ति [भौतिक दुःखों से मुक्ति] उसमें सम्मिलित होती है। भक्ति के बिना मुक्ति नहीं है, किन्तु यदि हम भक्ति के स्तर पर कार्य करें, तब मुक्ति उसमें सम्मिलित है। हम यह *भगवद्गीता* (14.26) से सीखते हैं:\n\nmāṁ ca yo 'vyabhicāreṇa\n\nbhakti-yogena sevate\n\nsa guṇān samatītyaitān\n\nbrahma-bhūyāya kalpate\n\n\"जो पूर्ण भक्ति में संलग्न होता है, जो किसी भी परिस्थिति में पतित नहीं होता, वह तत्काल प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है।\"\n\nफ़ादर एमानुएल: क्या ब्रह्म ही कृष्ण है?\n\nश्रील प्रभुपाद: श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। ब्रह्म की अनुभूति तीन रूपों में होती है: निराकार ब्रह्म के रूप में, स्थानिक परमात्मा के रूप में, तथा साकार ब्रह्म के रूप में। श्रीकृष्ण साकार हैं, और वे परम ब्रह्म हैं, क्योंकि ईश्वर अन्ततः एक व्यक्ति हैं। *श्रीमद्भागवत* (1.2.11) में इसकी पुष्टि होती है:\n\nvadanti tat tattva-vidas\n\ntattvam yaj jñānam advayam\n\nbrahmeti paramātmeti\n\nbhagavān iti śabdyate\n\n\"परम सत्य को जानने वाले विद्वान् तत्त्ववेत्ता इस अद्वय तत्त्व को ब्रह्म, परमात्मा अथवा भगवान् कहते हैं।\" भगवान् का स्वरूप ही ईश्वर की परम अनुभूति है। उनमें सभी छह ऐश्वर्य पूर्ण रूप से विद्यमान हैं: वे सर्वाधिक बलवान्, सर्वाधिक धनवान्, सर्वाधिक सुन्दर, सर्वाधिक यशस्वी, सर्वाधिक ज्ञानवान्, तथा सर्वाधिक विरक्त हैं।\n\nफ़ादर एमानुएल: हाँ, मैं सहमत हूँ।\n\nश्रील प्रभुपाद: चूँकि ईश्वर परम हैं, अतः उनका नाम, उनका रूप तथा उनके गुण भी परम हैं, और वे उनसे अभिन्न हैं। अतः ईश्वर के पवित्र नाम का कीर्तन करने का अर्थ है साक्षात् उनकी संगति करना। जब कोई ईश्वर की संगति करता है, तब वह ईश्वरीय गुण अर्जित करता है, और जब वह पूर्णतया शुद्ध हो जाता है, तब वह परमेश्वर का पार्षद बन जाता है।\n\nफ़ादर एमानुएल: किन्तु ईश्वर के नाम की हमारी समझ सीमित है।\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ, हम सीमित हैं, किन्तु ईश्वर असीम हैं। और चूँकि वे असीम, अथवा परम, हैं, अतः उनके असीम नाम हैं, जिनमें से प्रत्येक ईश्वर है। हम उनके नामों को उतना ही समझ सकते हैं जितनी हमारी आध्यात्मिक समझ विकसित होती है।\n\nफ़ादर एमानुएल: क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? हम ईसाई भी ईश्वर-प्रेम का उपदेश देते हैं, और हम ईश्वर-प्रेम की अनुभूति करने तथा अपने समस्त हृदय एवं समस्त आत्मा से उनकी सेवा करने का प्रयत्न करते हैं। अब, आपके आन्दोलन तथा हमारे आन्दोलन में क्या अन्तर है? जब ईसा मसीह का सुसमाचार वही सन्देश दे रहा है, तब आप अपने शिष्यों को ईश्वर-प्रेम का उपदेश देने हेतु पश्चिमी देशों में क्यों भेजते हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: समस्या यह है कि ईसाई ईश्वर के आदेशों का अनुसरण नहीं करते। क्या आप सहमत हैं?\n\nफ़ादर एमानुएल: हाँ, बहुत हद तक आप सही हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: तो ईसाइयों के ईश्वर-प्रेम का क्या अर्थ है? यदि आप ईश्वर के आदेशों का पालन नहीं करते, तो आपका प्रेम कहाँ है? अतः हम यह सिखाने आए हैं कि ईश्वर से प्रेम करने का क्या अर्थ है: यदि आप उनसे प्रेम करते हैं, तो आप उनके आदेशों की अवज्ञा नहीं कर सकते। और यदि आप अवज्ञा करते हैं, तो आपका प्रेम सच्चा नहीं है।\n\nसम्पूर्ण विश्व में, लोग ईश्वर से नहीं, अपितु अपने कुत्तों से प्रेम करते हैं। अतः कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को यह सिखाने हेतु आवश्यक है कि वे ईश्वर के प्रति अपने विस्मृत प्रेम को किस प्रकार पुनर्जीवित करें। केवल ईसाई ही नहीं, अपितु हिन्दू, मुहम्मदी तथा अन्य सभी दोषी हैं। उन्होंने स्वयं को \"ईसाई,\" \"हिन्दू,\" अथवा \"मुहम्मदी\" की मुहर लगा ली है, किन्तु वे ईश्वर की आज्ञा नहीं मानते। यही समस्या है। आगन्तुक: क्या आप बता सकते हैं कि ईसाई किस प्रकार अवज्ञाकारी हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। पहली बात यह है कि वे कसाईखाने चलाकर \"तू हत्या न करना\" आदेश का उल्लंघन करते हैं। क्या आप सहमत हैं कि इस आदेश का उल्लंघन हो रहा है?\n\nफ़ादर एमानुएल: व्यक्तिगत रूप से, मैं सहमत हूँ।\n\nश्रील प्रभुपाद: उत्तम। अतः यदि ईसाई ईश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें पशुओं की हत्या बन्द करनी होगी।\n\nफ़ादर एमानुएल: किन्तु क्या सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं—\n\nश्रील प्रभुपाद: यदि आप एक बात छोड़ देते हैं, तो आपकी गणना में एक त्रुटि रह जाती है। उसके पश्चात् आप चाहे जो जोड़ें अथवा घटाएँ, त्रुटि तो पहले से ही गणना में है, और उसके बाद जो कुछ आता है वह भी दोषपूर्ण होगा। हम केवल शास्त्र के उसी अंश को स्वीकार नहीं कर सकते जो हमें प्रिय है, और जो प्रिय नहीं उसे अस्वीकार कर दें, और फिर भी फल पाने की आशा रखें। उदाहरणार्थ, मुर्गी अपने पिछले भाग से अण्डे देती है और अपनी चोंच से खाती है। कोई कृषक सोच सकता है, \"मुर्गी का अगला भाग बहुत महँगा है, क्योंकि मुझे उसे खिलाना पड़ता है। अच्छा हो कि उसे काट दूँ।\" किन्तु यदि सिर ही न रहे तो अण्डे भी न रहेंगे, क्योंकि शरीर मृत हो जाएगा। इसी प्रकार, यदि हम शास्त्रों के कठिन अंश को अस्वीकार कर दें और जो प्रिय है उसका पालन करें, तो ऐसी व्याख्या हमारी सहायता नहीं करेगी। हमें शास्त्र के समस्त विधानों को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करना होगा, केवल उन्हीं को नहीं जो हमें अनुकूल लगें। यदि आप पहले आदेश, \"तू हत्या न करना,\" का पालन नहीं करते, तो ईश्वर-प्रेम का प्रश्न ही कहाँ है?\n\nआगन्तुक: ईसाई इस आदेश को मनुष्यों पर लागू मानते हैं, पशुओं पर नहीं।\n\nश्रील प्रभुपाद: इसका अर्थ तो यह हुआ कि ईसा सही शब्द—murder (वध)—का प्रयोग करने जितने बुद्धिमान् नहीं थे। हत्या (killing) है, और वध (murder) है। वध मनुष्यों के सन्दर्भ में होता है। क्या आप सोचते हैं कि ईसा killing शब्द के स्थान पर सही शब्द—murder—का प्रयोग करने जितने बुद्धिमान् नहीं थे? Killing का अर्थ है किसी भी प्रकार की हत्या, और विशेषकर पशु-हत्या। यदि ईसा का अभिप्राय केवल मनुष्यों की हत्या से होता, तो वे murder शब्द का प्रयोग करते।\n\nफ़ादर एमानुएल: किन्तु पुराने नियम में आदेश \"तू हत्या न करना\" वध की ओर ही संकेत करता है। और जब ईसा ने कहा, \"तू हत्या न करना,\" तब उन्होंने इस आदेश का विस्तार करके यह अर्थ दिया कि मनुष्य को न केवल दूसरे मनुष्य की हत्या से विरत रहना चाहिए, अपितु उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार भी करना चाहिए। उन्होंने कभी मनुष्य के अन्य जीवों के साथ सम्बन्ध की बात नहीं की, अपितु केवल अन्य मनुष्यों के साथ उसके सम्बन्ध की बात की। जब उन्होंने कहा, \"तू हत्या न करना,\" तब उनका अभिप्राय मानसिक तथा भावनात्मक अर्थ में भी था—कि तुम्हें किसी का अपमान नहीं करना चाहिए अथवा उसे ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए, उसके साथ बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए, इत्यादि।\n\nश्रील प्रभुपाद: हमें इस अथवा उस नियम (टेस्टामेन्ट) से सरोकार नहीं, अपितु केवल आदेशों में प्रयुक्त शब्दों से। यदि आप इन शब्दों की व्याख्या करना चाहते हैं, तो वह दूसरी बात है। हम सीधा अर्थ समझते हैं। \"तू हत्या न करना\" का अर्थ है, \"ईसाइयों को हत्या नहीं करनी चाहिए।\" आप अपनी वर्तमान कार्य-रीति को जारी रखने हेतु व्याख्याएँ प्रस्तुत कर सकते हैं, किन्तु हम भली-भाँति समझते हैं कि व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं। व्याख्या तब आवश्यक है जब बातें स्पष्ट न हों। किन्तु यहाँ अर्थ स्पष्ट है। \"तू हत्या न करना\" एक स्पष्ट निर्देश है। हम इसकी व्याख्या क्यों करें?\n\nफ़ादर एमानुएल: क्या पौधों को खाना भी हत्या नहीं है?\n\nश्रील प्रभुपाद: वैष्णव दर्शन सिखाता है कि हमें अनावश्यक रूप से पौधों तक की हत्या नहीं करनी चाहिए। *भगवद्गीता* (9.26) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\npatraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ\n\nyo me bhaktyā prayacchati\n\ntad ahaṁ bhakty-upahṛtam\n\naśnāmi prayatātmanaḥ\n\n\"यदि कोई मुझे प्रेम तथा भक्ति सहित एक पत्र, एक पुष्प, एक फल, अथवा थोड़ा-सा जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।\" हम श्रीकृष्ण को केवल वही भोजन अर्पित करते हैं जिसकी वे माँग करते हैं, और फिर हम उसका शेष ग्रहण करते हैं। यदि श्रीकृष्ण को शाकाहारी भोजन अर्पित करना पापमय होता, तो वह श्रीकृष्ण का पाप होता, हमारा नहीं। किन्तु ईश्वर अपाप-विद्ध हैं—पापमय प्रतिक्रियाएँ उन पर लागू नहीं होतीं। वे सूर्य के समान हैं, जो इतना शक्तिशाली है कि वह मूत्र तक को शुद्ध कर सकता है—जो हमारे लिए असम्भव है। श्रीकृष्ण उस राजा के समान भी हैं, जो किसी हत्यारे को फाँसी देने का आदेश दे सकता है, किन्तु जो स्वयं दण्ड से परे है, क्योंकि वह अत्यन्त शक्तिशाली है। पहले भगवान् को अर्पित किया गया भोजन ग्रहण करना भी युद्धकाल में किसी सैनिक की हत्या के समान है। युद्ध में, जब सेनापति किसी मनुष्य को आक्रमण करने का आदेश देता है, तब जो आज्ञाकारी सैनिक शत्रु का वध करता है उसे पदक मिलेगा। किन्तु यदि वही सैनिक स्वयं अपनी इच्छा से किसी की हत्या करे, तो उसे दण्डित किया जाएगा। इसी प्रकार, जब हम केवल प्रसाद [श्रीकृष्ण को अर्पित भोजन का शेष] ग्रहण करते हैं, तब हम कोई पाप नहीं करते। इसकी पुष्टि *भगवद्गीता* (3.13) में होती है:\n\nyajña-śiṣṭāśinaḥ santo\n\nmucyante sarva-kilbiṣaiḥ\n\nbhuñjate te tv aghaṁ pāpā\n\nye pacanty ātma-kāraṇāt\n\n\"भगवान् के भक्त समस्त प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि वे वही भोजन ग्रहण करते हैं जो पहले यज्ञ हेतु अर्पित किया जाता है। अन्य, जो व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति हेतु भोजन बनाते हैं, वे वस्तुतः केवल पाप ही खाते हैं।\"\n\nफ़ादर एमानुएल: क्या श्रीकृष्ण पशुओं को खाने की अनुमति नहीं दे सकते?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ—पशु-जगत् में। किन्तु सभ्य मनुष्य, धार्मिक मनुष्य, पशुओं की हत्या तथा भक्षण हेतु नहीं है। यदि आप पशुओं की हत्या बन्द कर दें और पवित्र नाम क्राइस्ट का कीर्तन करें, तो सब कुछ पूर्ण हो जाएगा। मैं आपको शिक्षा देने नहीं आया, अपितु केवल आपसे यह अनुरोध करने आया हूँ कि कृपया ईश्वर के नाम का कीर्तन करें। बाइबिल भी आपसे इसकी माँग करती है। अतः आइए हम कृपापूर्वक सहयोग करें और कीर्तन करें, और यदि आपको कृष्ण नाम के कीर्तन के प्रति कोई पूर्वाग्रह हो, तो \"क्रिस्तोस\" अथवा \"कृष्ट\" का कीर्तन करें—इसमें कोई अन्तर नहीं। श्रीचैतन्य ने कहा: नाम्नाम् अकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिः। \"ईश्वर के लाखों-लाख नाम हैं, और चूँकि ईश्वर के नाम तथा स्वयं ईश्वर में कोई अन्तर नहीं, अतः इनमें से प्रत्येक नाम में ईश्वर के समान ही सामर्थ्य है।\" अतः, यदि आप \"हिन्दू,\" \"ईसाई,\" अथवा \"मुहम्मदी\" जैसी उपाधियाँ भी स्वीकार करते हैं, यदि आप केवल अपने ही शास्त्रों में पाए जाने वाले ईश्वर के नाम का कीर्तन करें, तो आप आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त कर लेंगे। मानव जीवन आत्म-साक्षात्कार हेतु है—यह सीखने हेतु कि ईश्वर से किस प्रकार प्रेम किया जाए। यही मनुष्य की वास्तविक सुन्दरता है। आप इस कर्तव्य को चाहे हिन्दू, ईसाई, अथवा मुहम्मदी के रूप में निभाएँ, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता—किन्तु इसे निभाएँ!\n\nफ़ादर एमानुएल: मैं सहमत हूँ।\n\nश्रील प्रभुपाद [108 ध्यान-मनकों की एक माला की ओर संकेत करते हुए]: हमारे पास सदा ये मनके रहते हैं, ठीक जैसे आपके पास आपकी माला रहती है। आप तो कीर्तन करते हैं, किन्तु अन्य ईसाई कीर्तन क्यों नहीं करते? मनुष्य के रूप में वे इस अवसर को क्यों गँवाएँ? बिल्लियाँ तथा कुत्ते कीर्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम कर सकते हैं, क्योंकि हमारे पास मानव जिह्वा है। यदि हम ईश्वर के पवित्र नामों का कीर्तन करें, तो हम कुछ नहीं खो सकते; इसके विपरीत, हम बहुत कुछ पाते हैं। मेरे शिष्य निरन्तर हरे कृष्ण कीर्तन का अभ्यास करते हैं। वे चलचित्र देखने अथवा अन्य अनेक कार्य भी कर सकते थे, किन्तु उन्होंने सब कुछ त्याग दिया है। वे न मछली खाते हैं, न मांस, न अण्डे, वे मादक द्रव्य नहीं लेते, वे मद्यपान नहीं करते, वे धूम्रपान नहीं करते, वे द्यूत में भाग नहीं लेते, वे कल्पना (सट्टा) नहीं करते, और वे अवैध यौन सम्बन्ध नहीं रखते। किन्तु वे ईश्वर के पवित्र नाम का कीर्तन अवश्य करते हैं। यदि आप हमारे साथ सहयोग करना चाहें, तो गिरिजाघरों में जाकर \"क्राइस्ट,\" \"कृष्ट,\" अथवा \"कृष्ण\" का कीर्तन करें। इसमें क्या आपत्ति हो सकती है?\n\nफ़ादर एमानुएल: कोई आपत्ति नहीं। अपनी ओर से, मैं आपके साथ सम्मिलित होकर प्रसन्न होऊँगा।\n\nश्रील प्रभुपाद: नहीं, हम आपसे ईसाई गिरजे के एक प्रतिनिधि के रूप में बात कर रहे हैं। गिरजाघरों को बन्द रखने के बजाय, उन्हें हमें क्यों न दे दें? हम वहाँ दिन के चौबीसों घण्टे ईश्वर के पवित्र नाम का कीर्तन करेंगे। अनेक स्थानों पर हमने ऐसे गिरजाघर क्रय किए हैं जो व्यावहारिक रूप से बन्द थे, क्योंकि वहाँ कोई नहीं जाता था। लन्दन में मैंने सैकड़ों गिरजाघर देखे जो बन्द थे अथवा लौकिक प्रयोजनों हेतु प्रयुक्त हो रहे थे। हमने लॉस एंजिल्स में एक ऐसा ही गिरजाघर क्रय किया। वह इसलिए बेचा गया था क्योंकि वहाँ कोई नहीं आता था, किन्तु यदि आप आज उसी गिरजाघर में जाएँ, तो आप वहाँ हज़ारों लोग देखेंगे। कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति पाँच मिनट में समझ सकता है कि ईश्वर क्या हैं; इसमें पाँच घण्टे नहीं लगते।\n\nफ़ादर एमानुएल: मैं समझ गया।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु लोग नहीं चाहते। उनका रोग यही है कि वे समझना ही नहीं चाहते।\n\nVisitor: मेरे विचार से ईश्वर को समझना बुद्धि का प्रश्न नहीं, अपितु विनम्रता का प्रश्न है।\n\nŚrīla Prabhupāda: विनम्रता का अर्थ ही बुद्धि है। विनम्र एवं सरल जन ही ईश्वर के राज्य के अधिकारी होते हैं। यह बाइबल में कहा गया है, क्या नहीं? किन्तु धूर्तों का दर्शन यह है कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर है, और आज यह विचार लोकप्रिय हो गया है। अतः कोई भी विनम्र एवं सरल नहीं है। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि वह ईश्वर है, तो वह विनम्र एवं सरल क्यों बने? इसीलिए मैं अपने शिष्यों को सिखाता हूँ कि विनम्र एवं सरल कैसे बना जाए। वे मन्दिर में तथा आध्यात्मिक गुरु को सदा अपना सादर प्रणाम अर्पित करते हैं, और इस प्रकार उन्नति करते हैं। विनम्रता एवं सरलता के गुण अति शीघ्र आध्यात्मिक अनुभूति की ओर ले जाते हैं। वैदिक शास्त्रों में कहा गया है, \"जिन्हें ईश्वर तथा उनके प्रतिनिधि आध्यात्मिक गुरु में दृढ़ श्रद्धा होती है, उन्हें वैदिक शास्त्रों का अर्थ प्रकट हो जाता है।\"\n\nFather Emmanuel: किन्तु क्या यह विनम्रता शेष सभी के प्रति भी अर्पित नहीं की जानी चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, किन्तु आदर के दो प्रकार हैं: विशेष तथा सामान्य। श्रीकृष्ण चैतन्य ने सिखाया कि हमें अपने लिए सम्मान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपितु शेष सभी का सदा आदर करना चाहिए, भले ही वह हमारे प्रति अनादर ही क्यों न करे। किन्तु विशेष आदर ईश्वर तथा उनके शुद्ध भक्त को दिया जाना चाहिए।\n\nFather Emmanuel: हाँ, मैं सहमत हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: मेरे विचार से ईसाई पुरोहितों को कृष्णभावनामृत आन्दोलन के साथ सहयोग करना चाहिए। उन्हें ईसा अथवा क्राइस्टोस नाम का जप करना चाहिए और पशुओं के वध को क्षमायुक्त ठहराना बन्द करना चाहिए। यह कार्यक्रम बाइबल की शिक्षाओं का अनुसरण करता है; यह मेरा दर्शन नहीं है। कृपया तदनुसार आचरण करें और आप देखेंगे कि विश्व की स्थिति किस प्रकार परिवर्तित होगी।\n\nFather Emmanuel: मैं आपका हृदय से अत्यन्त आभार मानता हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: हरे कृष्ण।\n\nईसा मसीह एक गुरु थे\n\nयहाँ हरे कृष्ण आन्दोलन के आध्यात्मिक नेता भगवान् ईसा मसीह को \"ईश्वर का पुत्र, ईश्वर का प्रतिनिधि… हमारा गुरु… हमारा आध्यात्मिक गुरु\" स्वीकार करते हैं, तथापि उनके पास उन लोगों के लिए कुछ तीखे शब्द हैं जो आजकल ईसा के अनुयायी होने का दावा करते हैं…\n\n*श्रीमद्भागवत* में कहा गया है कि ईश्वर-भावना का कोई भी प्रामाणिक प्रचारक तितिक्षा (सहनशीलता) तथा करुणा (दया) के गुणों से युक्त होना चाहिए। भगवान् ईसा मसीह के चरित्र में हमें ये दोनों गुण मिलते हैं। वे इतने सहनशील थे कि क्रूस पर चढ़ाए जाते समय भी उन्होंने किसी की निन्दा नहीं की। और वे इतने करुणामय थे कि उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि उन्हीं व्यक्तियों को क्षमा कर दें जो उन्हें मारने का प्रयत्न कर रहे थे। (निस्सन्देह, वे वस्तुतः उन्हें मार नहीं सकते थे। किन्तु वे यह सोच रहे थे कि उन्हें मारा जा सकता है, अतः वे महान् अपराध कर रहे थे।) क्रूस पर चढ़ाए जाते समय ईसा ने प्रार्थना की, \"हे पिता, इन्हें क्षमा करो। ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।\"\n\nईश्वर-भावना का प्रचारक समस्त जीवों का मित्र होता है। भगवान् ईसा मसीह ने यह शिक्षा देकर इसका उदाहरण प्रस्तुत किया, \"तू हत्या मत कर।\" किन्तु ईसाई इस आदेश का मनमाना अर्थ लगाना पसन्द करते हैं। वे सोचते हैं कि पशुओं में आत्मा नहीं होती, और इसी कारण वे सोचते हैं कि वे वधशालाओं में अरबों निर्दोष पशुओं को स्वच्छन्द रूप से मार सकते हैं। अतः यद्यपि अनेक व्यक्ति ईसाई होने का दावा करते हैं, ऐसा कोई एक व्यक्ति खोजना अत्यन्त कठिन होगा जो भगवान् ईसा मसीह के आदेशों का कठोरता से पालन करता हो।\n\nवैष्णव दूसरों के कष्ट को देखकर दुःखी होता है। अतः भगवान् ईसा मसीह दूसरों को उनके कष्ट से मुक्त करने हेतु क्रूस पर चढ़ने को सहमत हुए। किन्तु उनके अनुयायी इतने श्रद्धाहीन हैं कि उन्होंने निश्चय कर लिया है, \"ईसा को हमारे लिए कष्ट सहने दो, और हम पाप करते रहेंगे।\" वे ईसा से इतना प्रेम करते हैं कि वे सोचते हैं, \"हे प्रिय ईसा, हम अति दुर्बल हैं। हम अपने पापमय कर्मों को त्याग नहीं सकते। अतः आप कृपया हमारे लिए कष्ट सहें।\"\n\nईसा मसीह ने शिक्षा दी, \"तू हत्या मत कर।\" किन्तु उनके अनुयायियों ने अब निश्चय कर लिया है, \"हम तो हत्या करेंगे ही,\" और वे बड़ी-बड़ी, आधुनिक, वैज्ञानिक वधशालाएँ खोलते हैं। \"यदि कोई पाप होगा, तो ईसा हमारे लिए कष्ट सहेंगे।\" यह अति घृणित निष्कर्ष है।\n\nईसा अपने भक्तों के पूर्व पापों का कष्ट ले सकते हैं। किन्तु पहले उन्हें विवेकी होना चाहिए: \"मैं अपने पापों के लिए ईसा मसीह को कष्ट में क्यों डालूँ? मुझे अपने पापमय कर्म बन्द कर देने चाहिए।\"\n\nमान लीजिए कोई व्यक्ति—अपने पिता का प्रिय पुत्र—हत्या कर बैठता है। और मान लीजिए वह सोचता है, \"यदि कोई दण्ड आएगा, तो मेरे स्थान पर मेरे पिता कष्ट सह सकते हैं।\" क्या विधि इसकी अनुमति देगी? जब हत्यारा बन्दी बनाया जाए और कहे, \"नहीं, नहीं। आप मुझे छोड़ दें और मेरे पिता को बन्दी बना लें; मैं उनका दुलारा पुत्र हूँ,\" तो क्या पुलिस अधिकारी उस मूर्ख के अनुरोध का पालन करेंगे? हत्या उसने की, किन्तु वह सोचता है कि उसके पिता को दण्ड भोगना चाहिए! क्या यह कोई विवेकपूर्ण प्रस्ताव है? \"नहीं। हत्या तुमने की है; तुम्हें ही फाँसी होनी चाहिए।\" इसी प्रकार, जब तुम पापमय कर्म करते हो, तो तुम्हें ही कष्ट भोगना होगा—ईसा मसीह को नहीं। यही ईश्वर का विधान है।\n\nईसा मसीह इतने महान् व्यक्तित्व थे—ईश्वर के पुत्र, ईश्वर के प्रतिनिधि। उनमें कोई दोष नहीं था। फिर भी, वे क्रूस पर चढ़ाए गए। वे ईश्वर-भावना प्रदान करना चाहते थे, किन्तु बदले में उन लोगों ने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया—वे इतने कृतघ्न थे। वे उनके प्रचार की क़द्र न कर सके। किन्तु हम उनकी क़द्र करते हैं और ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें समस्त सम्मान देते हैं।\n\nनिस्सन्देह, जो सन्देश ईसा ने प्रचारित किया वह उनके विशिष्ट काल, स्थान तथा देश के ठीक अनुकूल था, और एक विशिष्ट जनसमूह के लिए सर्वथा उपयुक्त था। किन्तु निश्चय ही वे ईश्वर के प्रतिनिधि हैं। अतः हम भगवान् ईसा मसीह की आराधना करते हैं और उन्हें अपना प्रणाम अर्पित करते हैं।\n\nएक बार, मेलबर्न में, ईसाई पादरियों का एक समूह मुझसे मिलने आया। उन्होंने पूछा, \"ईसा मसीह के विषय में आपकी क्या धारणा है?\" मैंने उनसे कहा, \"वे हमारे गुरु हैं। वे ईश्वर-भावना का प्रचार कर रहे हैं, अतः वे हमारे आध्यात्मिक गुरु हैं।\" पादरियों ने इसकी बहुत प्रशंसा की।\n\nवस्तुतः जो कोई ईश्वर की महिमा का प्रचार करता है, उसे गुरु के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। ईसा मसीह ऐसे ही एक महान् व्यक्तित्व हैं। हमें उन्हें एक सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि जो कोई आध्यात्मिक गुरु को एक सामान्य मनुष्य समझता है, उसकी नारकीय मनोवृत्ति होती है। यदि ईसा मसीह एक सामान्य मनुष्य होते, तो वे ईश्वर-भावना प्रदान न कर पाते।\n\n\"तू हत्या मत कर\" अथवा \"तू मनुष्य का वध मत कर\"?\n\nजुलाई 1973 में, पेरिस के निकट एक मठ-आश्रम में, श्रील प्रभुपाद ने कार्डिनल जीन डेनियलू से वार्ता की: \"…बाइबल यह नहीं कहती कि 'केवल मनुष्य की हत्या मत करो।' वह व्यापक रूप से कहती है, 'तू हत्या मत कर।'… आप इसकी व्याख्या अपनी सुविधानुसार क्यों करते हैं?\"\n\nŚrīla Prabhupāda: ईसा मसीह ने कहा, \"तू हत्या मत कर।\" तो ऐसा क्यों है कि ईसाई जन पशु-वध में संलग्न हैं?\n\nCardinal Danielou: निश्चय ही ईसाई धर्म में हत्या वर्जित है, किन्तु हमारा विश्वास है कि मनुष्य के जीवन तथा पशुओं के जीवन में अन्तर है। मनुष्य का जीवन पवित्र है क्योंकि मनुष्य ईश्वर के प्रतिरूप में बना है; अतः मनुष्य की हत्या वर्जित है।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु बाइबल यह नहीं कहती कि \"केवल मनुष्य की हत्या मत करो।\" वह व्यापक रूप से कहती है, \"तू हत्या मत कर।\"\n\nCardinal Danielou: हमारा विश्वास है कि केवल मानव-जीवन ही पवित्र है।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह आपकी व्याख्या है। आदेश तो यही है कि \"तू हत्या मत कर।\"\n\nCardinal Danielou: मनुष्य के लिए भोजन प्राप्त करने हेतु पशुओं को मारना आवश्यक है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। मनुष्य अन्न, शाक-सब्ज़ी, फल तथा दुग्ध खा सकता है।\n\nCardinal Danielou: मांस नहीं?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। मनुष्य शाकाहारी भोजन करने के लिए हैं। बाघ आपके फल खाने नहीं आता। उसका विहित भोजन पशु-मांस है। किन्तु मनुष्य का भोजन शाक, फल, अन्न तथा दुग्ध-उत्पाद हैं। तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि पशु-वध पाप नहीं है?\n\nCardinal Danielou: हमारा विश्वास है कि यह प्रेरणा का प्रश्न है। यदि किसी पशु की हत्या भूखों को भोजन देने के लिए हो, तो वह न्यायसंगत है।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु गाय पर विचार करें: हम उसका दुग्ध पीते हैं; अतः वह हमारी माता है। क्या आप सहमत हैं?\n\nCardinal Danielou: हाँ, निश्चय ही।\n\nŚrīla Prabhupāda: तो यदि गाय आपकी माता है, तो आप उसके वध का समर्थन कैसे कर सकते हैं? आप उससे दुग्ध लेते हैं, और जब वह वृद्ध हो जाती है और आपको दुग्ध नहीं दे पाती, तो आप उसका गला काट देते हैं। क्या यह कोई अति मानवीय प्रस्ताव है? भारत में जो मांसाहारी हैं उन्हें बकरी, सूअर अथवा भैंस जैसे किसी निम्न पशु को मारने की सलाह दी जाती है। किन्तु गो-वध सबसे बड़ा पाप है। कृष्णभावनामृत के प्रचार में हम लोगों से कहते हैं कि वे किसी भी प्रकार का मांस न खाएँ, और मेरे शिष्य इस सिद्धान्त का कठोरता से पालन करते हैं। किन्तु यदि, किन्हीं परिस्थितियों में, दूसरे लोग मांस खाने को विवश हों, तो उन्हें किसी निम्न पशु का मांस खाना चाहिए। गायों को मत मारो। यह सबसे बड़ा पाप है। और जब तक मनुष्य पापी है, वह ईश्वर को नहीं समझ सकता। मनुष्य का मुख्य कार्य ईश्वर को समझना तथा उनसे प्रेम करना है। किन्तु यदि आप पापी बने रहे, तो आप ईश्वर को कभी समझ ही न पाएँगे—फिर उनसे प्रेम करने की तो बात ही क्या।\n\nCardinal Danielou: मेरे विचार से सम्भवतः यह कोई मूलभूत बिन्दु नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात ईश्वर से प्रेम करना है। व्यावहारिक आदेश एक धर्म से दूसरे धर्म में भिन्न हो सकते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: तो, बाइबल में ईश्वर का व्यावहारिक आदेश यह है कि तुम हत्या नहीं कर सकते; अतः गायों को मारना आपके लिए पाप है।\n\nCardinal Danielou: ईश्वर भारतीयों से कहते हैं कि हत्या करना अच्छा नहीं, और वे यहूदियों से कहते हैं कि…\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं। ईसा मसीह ने शिक्षा दी, \"तू हत्या मत कर।\" आप इसकी व्याख्या अपनी सुविधानुसार क्यों करते हैं?\n\nCardinal Danielou: किन्तु ईसा ने पास्कल मेमने की बलि की अनुमति दी थी।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु उन्होंने कभी वधशाला नहीं चलाई।\n\nCardinal Danielou: [हँसते हुए।] नहीं, किन्तु उन्होंने मांस तो खाया।\n\nŚrīla Prabhupāda: जब अन्य कोई भोजन न हो, तो कोई व्यक्ति भूख से बचने के लिए मांस खा सकता है। वह दूसरी बात है। किन्तु केवल अपनी जिह्वा को तृप्त करने के लिए नियमित रूप से वधशालाएँ चलाना अत्यन्त पापमय है। वस्तुतः जब तक वधशालाएँ चलाने की यह क्रूर प्रथा बन्द नहीं होती, तब तक आपके पास कोई मानव-समाज होगा ही नहीं। और यद्यपि जीवित रहने के लिए पशु-वध कभी-कभी आवश्यक हो सकता है, तथापि कम-से-कम माता-पशु, गाय, को नहीं मारा जाना चाहिए। यह तो मात्र मानवीय शिष्टता है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हमारी प्रथा यह है कि हम किसी भी पशु के वध की अनुमति नहीं देते। श्रीकृष्ण कहते हैं, patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayacchati: \"शाक, फल, दुग्ध तथा अन्न मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित किए जाने चाहिए।\" (*भगवद्गीता* 9.26) हम केवल श्रीकृष्ण के भोजन का अवशेष (प्रसादम्) ग्रहण करते हैं। वृक्ष हमें अनेक प्रकार के फल अर्पित करते हैं, किन्तु वृक्ष मारे नहीं जाते। निस्सन्देह, एक जीव दूसरे जीव का भोजन है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप भोजन के लिए अपनी माता को मार सकते हैं। गायें निर्दोष हैं; वे हमें दुग्ध देती हैं। आप उनका दुग्ध लेते हैं—और फिर उन्हें वधशाला में मार डालते हैं। यह पापमय है।\n\nStudent: श्रील प्रभुपाद, मांसाहार को ईसाई धर्म की स्वीकृति इस दृष्टिकोण पर आधारित है कि जीवन की निम्न योनियों में मनुष्य की भाँति आत्मा नहीं होती।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह मूर्खता है। सर्वप्रथम, हमें शरीर के भीतर आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण समझना होगा। तब हम देख सकते हैं कि मनुष्य में आत्मा है तथा गाय में नहीं। गाय एवं मनुष्य के विभिन्न लक्षण क्या हैं? यदि हमें लक्षणों में कोई अन्तर मिले, तब हम कह सकते हैं कि पशु में आत्मा नहीं है। किन्तु यदि हम देखें कि पशु एवं मनुष्य के एक ही समान लक्षण हैं, तो आप कैसे कह सकते हैं कि पशु में आत्मा नहीं है? सामान्य लक्षण ये हैं कि पशु खाता है, आप खाते हैं; पशु सोता है, आप सोते हैं; पशु मैथुन करता है, आप मैथुन करते हैं; पशु रक्षा करता है, और आप रक्षा करते हैं। अन्तर कहाँ है?\n\nCardinal Danielou: हम स्वीकार करते हैं कि पशु में भी मनुष्यों जैसा ही जैविक अस्तित्व हो सकता है, किन्तु आत्मा नहीं होती। हमारा विश्वास है कि आत्मा मानव-आत्मा है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारी *भगवद्गीता* कहती है sarva-yoniṣu, \"जीवन की समस्त योनियों में आत्मा विद्यमान है।\" शरीर वस्त्रों के एक जोड़े के समान है। आपके पास काले वस्त्र हैं; मैं गेरुए वस्त्र पहने हूँ। किन्तु वस्त्र के भीतर आप एक मनुष्य हैं, और मैं भी एक मनुष्य हूँ। इसी प्रकार, विभिन्न योनियों के शरीर भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्रों के समान ही हैं। उनमें आत्मा है, जो ईश्वर का अंश है। मान लीजिए किसी मनुष्य के दो पुत्र हैं, जो समान रूप से योग्य नहीं हैं। एक उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो सकता है और दूसरा एक सामान्य मज़दूर, किन्तु पिता दोनों को अपने पुत्र मानता है। वह यह भेद नहीं करता कि न्यायाधीश पुत्र अति महत्त्वपूर्ण है और मज़दूर पुत्र महत्त्वपूर्ण नहीं। और यदि न्यायाधीश पुत्र कहे, \"हे प्रिय पिता, आपका दूसरा पुत्र निरर्थक है; मुझे उसे काटकर खा जाने दीजिए,\" तो क्या पिता इसकी अनुमति देगा?\n\nCardinal Danielou: निश्चय ही नहीं, किन्तु यह विचार कि समस्त जीवन ईश्वर के जीवन का अंश है, हमारे लिए स्वीकार करना कठिन है। मानव-जीवन तथा पशु-जीवन में महान् अन्तर है।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह अन्तर चेतना के विकास के कारण है। मानव-शरीर में विकसित चेतना है। वृक्ष में भी आत्मा है, किन्तु वृक्ष की चेतना अधिक विकसित नहीं है। यदि आप किसी वृक्ष को काटें तो वह प्रतिरोध नहीं करता। वस्तुतः वह प्रतिरोध करता तो है, किन्तु अति अल्प मात्रा में। जगदीशचन्द्र बसु नामक एक वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने एक यन्त्र बनाया जो दर्शाता है कि वृक्ष तथा पौधे काटे जाने पर पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं। और हम प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं कि जब कोई किसी पशु को मारने आता है, तो वह प्रतिरोध करता है, चीत्कार करता है, एक भयंकर ध्वनि करता है। अतः यह चेतना के विकास का विषय है। किन्तु आत्मा समस्त जीवों के भीतर विद्यमान है।\n\nCardinal Danielou: किन्तु तत्त्वमीमांसा की दृष्टि से, मनुष्य का जीवन पवित्र है। मनुष्य पशुओं की अपेक्षा उच्चतर स्तर पर चिन्तन करते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह उच्चतर स्तर क्या है? पशु अपने शरीर के पालन हेतु खाता है, और आप भी अपने शरीर के पालन हेतु खाते हैं। गाय खेत में घास खाती है, और मनुष्य आधुनिक यन्त्रों से भरी एक विशाल वधशाला का मांस खाता है। किन्तु केवल इसलिए कि आपके पास बड़े-बड़े यन्त्र तथा एक वीभत्स दृश्य है, जबकि पशु मात्र घास खाता है, इसका अर्थ यह नहीं कि आप इतने उन्नत हैं कि आत्मा केवल आपके शरीर के भीतर है और पशु के शरीर के भीतर आत्मा नहीं है। यह अतार्किक है। हम देख सकते हैं कि पशु एवं मनुष्य में मूलभूत लक्षण एक ही समान हैं।\n\nCardinal Danielou: किन्तु केवल मनुष्यों में ही हमें जीवन के अर्थ की तत्त्वमीमांसीय खोज मिलती है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। तो तत्त्वमीमांसीय रूप से यह खोज निकालें कि आप यह क्यों मानते हैं कि पशु के भीतर आत्मा नहीं है—यही तत्त्वमीमांसा है। यदि आप तत्त्वमीमांसीय रूप से सोच रहे हैं, तो ठीक है। किन्तु यदि आप पशु की भाँति सोच रहे हैं, तो आपके तत्त्वमीमांसीय अध्ययन का क्या लाभ? तत्त्वमीमांसीय का अर्थ है \"भौतिक से परे\" अथवा, दूसरे शब्दों में, \"आध्यात्मिक।\" *भगवद्गीता* में श्रीकृष्ण कहते हैं, sarva-yoniṣu kaunteya: [गीता 14.4] \"प्रत्येक जीव में एक आत्मा है।\" यही तत्त्वमीमांसीय बोध है। अब या तो आप श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को तत्त्वमीमांसीय रूप में स्वीकार करें, अथवा आपको किसी तृतीय-श्रेणी के मूर्ख के मत को तत्त्वमीमांसीय मानना पड़ेगा। आप किसे स्वीकार करते हैं?\n\nCardinal Danielou: किन्तु ईश्वर कुछ ऐसे पशु क्यों रचते हैं जो अन्य पशुओं को खाते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि सृष्टि में कोई दोष है।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह दोष नहीं है। ईश्वर अति कृपालु हैं। यदि आप पशुओं को खाना चाहते हैं, तो वे आपको पूरी सुविधा देंगे। ईश्वर आपको अगले जीवन में बाघ का शरीर देंगे ताकि आप मांस अति स्वच्छन्द रूप से खा सकें। \"तुम वधशालाएँ क्यों चला रहे हो? मैं तुम्हें दाँत तथा पंजे दूँगा। अब खाओ।\" अतः मांसाहारी ऐसे दण्ड की प्रतीक्षा में हैं। पशु-भक्षी अगले जीवन में बाघ, भेड़िये, बिल्ली तथा कुत्ते बनते हैं—अधिक सुविधा पाने के लिए।"}
{"ref": "ssr/5", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/5/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "आधुनिक युग में योगाभ्यास", "purport": "अधिचेतना\n\nआधुनिक पाश्चात्य योग-प्रेमियों के लक्ष्य भारत के प्राचीन योगियों की उपलब्धियों के समक्ष बौने पड़ जाते हैं, जो ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, परमाणुओं से छोटे तथा वायु से हल्के हो सकते थे और जो ब्रह्माण्ड में कहीं भी बिना किसी सहायता के यात्रा कर सकते थे। तथापि ये अति-उपलब्धियाँ भी, श्रील प्रभुपाद कहते हैं, \"केवल एक पग आगे\" मात्र हैं। मानव-चेतना का सच्चा शिखर, अधिचेतना, किस प्रकार—यहीं और अभी—प्राप्य है, इसका उद्घाटन श्रील प्रभुपाद 1967 में दिए गए निम्नलिखित प्रवचन में करते हैं।\n\nकृष्णभावनामृत प्रशिक्षित भक्तियोगियों द्वारा सम्पन्न सर्वोच्च योग-साधना है। योग-पद्धति, जैसा कि *भगवद्गीता* में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए मानक योग-साधना-सूत्र में कही गई है, तथा जैसी पतञ्जलि के योग-अनुशासन में अनुशंसित है, उस आजकल अभ्यास की जाने वाली हठयोग से भिन्न है जैसी कि पाश्चात्य देशों में सामान्यतः समझी जाती है।\n\nवास्तविक योगाभ्यास का अर्थ है इन्द्रियों को वश में करना और, ऐसा संयम स्थापित होने के पश्चात्, मन को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के नारायण-रूप पर एकाग्र करना। भगवान् श्रीकृष्ण मूल परम पुरुष हैं, साक्षात् भगवान्, और अन्य समस्त विष्णु-रूप—चार भुजाओं वाले, शंख, कमल, गदा तथा चक्र से अलंकृत—श्रीकृष्ण के पूर्ण विस्तार हैं।\n\n*भगवद्गीता* में अनुशंसा की गई है कि हमें भगवान् के रूप का ध्यान करना चाहिए। मन की एकाग्रता के अभ्यास हेतु, मनुष्य को किसी एकान्त स्थान में बैठना होता है जो किसी पवित्र वातावरण से शुद्ध हो, और योगी को ब्रह्मचर्य के नियमों एवं विधानों का पालन करना चाहिए—कठोर आत्म-संयम तथा ब्रह्मचर्य का जीवन जीना चाहिए। कोई भी किसी भीड़भाड़ वाले नगर में, विलासिता का जीवन जीते हुए, जिसमें असंयमित यौन-भोग तथा जिह्वा का व्यभिचार सम्मिलित हो, योगाभ्यास नहीं कर सकता।\n\nहम पहले ही कह चुके हैं कि योगाभ्यास का अर्थ है इन्द्रियों को वश में करना, और इन्द्रियों को वश में करने का आरम्भ जिह्वा को वश में करना है। आप जिह्वा को सब प्रकार के निषिद्ध खाद्य-पेय ग्रहण करने की अनुमति नहीं दे सकते, और साथ ही योगाभ्यास में उन्नति भी नहीं कर सकते। यह अति खेदजनक तथ्य है कि अनेक भटके हुए, अनधिकृत तथाकथित योगी अब पश्चिम में आते हैं और योग की ओर लोगों के झुकाव का शोषण करते हैं। ऐसे अनधिकृत योगी तो सार्वजनिक रूप से यह कहने का साहस तक करते हैं कि मनुष्य मद्यपान में लिप्त रह सकता है और साथ ही ध्यान का अभ्यास भी कर सकता है।\n\nपाँच हज़ार वर्ष पूर्व, *भगवद्गीता* के संवाद में, भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को योगाभ्यास की अनुशंसा की, किन्तु अर्जुन ने स्पष्ट रूप से योग के कठोर नियमों एवं विधानों का पालन करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। मनुष्य को कर्म के प्रत्येक क्षेत्र में व्यावहारिक होना चाहिए। मनुष्य को अपना अमूल्य समय योग के नाम पर मात्र कुछ व्यायामी करतब करने में नहीं गँवाना चाहिए। वास्तविक योग अपने हृदय के भीतर चतुर्भुज परमात्मा को खोजना और ध्यान में उन्हें निरन्तर देखना है। ऐसे सतत ध्यान को समाधि कहते हैं। किन्तु यदि कोई किसी शून्य अथवा निराकार का ध्यान करना चाहे, तो योगाभ्यास से कुछ भी प्राप्त करने में अति दीर्घ समय लगेगा। हम अपने मन को किसी शून्य अथवा निराकार पर एकाग्र नहीं कर सकते। वास्तविक योगाभ्यास मन को उन चतुर्भुज नारायण के व्यक्तित्व पर स्थिर करना है जो प्रत्येक के हृदय में निवास करते हैं।\n\nकभी-कभी कहा जाता है कि ध्यान द्वारा मनुष्य समझ जाएगा कि ईश्वर सदा उसके हृदय में विराजमान हैं, भले ही वह इसे न जानता हो। ईश्वर प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं। वे न केवल मनुष्य के हृदय में विराजमान हैं, अपितु बिल्ली तथा कुत्ते के हृदयों में भी हैं। *भगवद्गीता* इस घोषणा के साथ इसका प्रमाण देती है कि ईश्वर, जगत् के परम नियन्ता, प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं। वे न केवल प्रत्येक के हृदय में उपस्थित हैं, अपितु परमाणुओं के भीतर भी हैं। कोई भी स्थान रिक्त नहीं; कोई भी स्थान भगवान् की उपस्थिति से रहित नहीं।\n\nभगवान् का वह पक्ष जिसके द्वारा वे सर्वत्र उपस्थित हैं, परमात्मा कहलाता है। आत्मा का अर्थ है व्यष्टि आत्मा, और परमात्मा का अर्थ है व्यष्टि परमात्मा। आत्मा तथा परमात्मा दोनों ही व्यष्टि पुरुष हैं। तथापि उनमें अन्तर यह है कि आत्मा, अर्थात् जीवात्मा, केवल एक विशिष्ट स्थान में उपस्थित होती है, जबकि परमात्मा सर्वत्र उपस्थित हैं।\n\nइस सम्बन्ध में, सूर्य का उदाहरण अति उत्तम है। एक व्यष्टि पुरुष एक स्थान में स्थित हो सकता है, किन्तु सूर्य, यद्यपि एक विशिष्ट व्यष्टि सत्ता है, प्रत्येक व्यष्टि पुरुष के सिर के ऊपर उपस्थित है। *भगवद्गीता* में इसकी अति उत्तम व्याख्या की गई है। अतः, यद्यपि भगवान् सहित समस्त सत्ताओं के गुण समान हैं, परमात्मा व्यष्टि आत्मा से विस्तार की मात्रा के कारण भिन्न हैं। भगवान्, अथवा परमात्मा, स्वयं को लाखों भिन्न-भिन्न रूपों में विस्तारित कर सकते हैं, जबकि व्यष्टि आत्मा ऐसा नहीं कर सकती।\n\nपरमात्मा, प्रत्येक के हृदय में विराजमान होकर, प्रत्येक के क्रियाकलापों के—भूत, वर्तमान तथा भविष्य के—साक्षी हो सकते हैं। *उपनिषदों* में परमात्मा को व्यष्टि आत्मा के साथ एक मित्र तथा साक्षी के रूप में बैठा हुआ कहा गया है। मित्र के रूप में वे सदा व्यष्टि आत्मा को घर वापस, भगवद्धाम वापस लाने हेतु उत्सुक रहते हैं। साक्षी के रूप में, वे उन समस्त वरदानों के प्रदाता हैं जो व्यक्ति के कर्मों के फलस्वरूप होते हैं। परमात्मा व्यष्टि आत्मा को जो कुछ भी वह इच्छा करे, उसे प्राप्त करने की समस्त सुविधा देते हैं। किन्तु वे अपने मित्र को उपदेश देते हैं, ताकि वह अन्ततः समस्त अन्य प्रवृत्तियों को त्यागकर मात्र ईश्वर के प्रति शाश्वत आनन्द तथा ज्ञानपूर्ण नित्य जीवन हेतु आत्मसमर्पण कर सके। यह *भगवद्गीता* का अन्तिम उपदेश है, जो योग के समस्त रूपों पर सर्वाधिक प्रामाणिक एवं व्यापक रूप से पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ है।\n\n*भगवद्गीता* का अन्तिम शब्द, जैसा ऊपर कहा गया, योग-पद्धति को सिद्ध करने के विषय में अन्तिम शब्द है। *भगवद्गीता* में आगे कहा गया है कि जो व्यक्ति सदा कृष्णभावनामृत में निमग्न रहता है वही सर्वोच्च योगी है। यह कृष्णभावनामृत क्या है?\n\nजिस प्रकार व्यष्टि आत्मा अपनी चेतना द्वारा समस्त शरीर में उपस्थित रहती है, उसी प्रकार परमात्मा अपनी अधिचेतना द्वारा समस्त सृष्टि में उपस्थित रहते हैं। इस अधिचेतना का अनुकरण व्यष्टि आत्मा नहीं कर सकती, जिसका बोध सीमित है: मैं समझ सकता हूँ कि मेरे सीमित शरीर के भीतर क्या घटित हो रहा है, किन्तु मैं यह अनुभव नहीं कर सकता कि किसी अन्य के शरीर में क्या घटित हो रहा है। मैं अपनी चेतना द्वारा अपने समस्त शरीर में उपस्थित हूँ, किन्तु मैं अपनी चेतना द्वारा किसी अन्य के शरीर में उपस्थित नहीं हूँ। तथापि परमात्मा, प्रत्येक के भीतर उपस्थित होकर, सर्वत्र स्थित होकर, प्रत्येक अस्तित्व के प्रति सचेत हैं। यह सिद्धान्त कि आत्मा तथा परमात्मा एक हैं, स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि व्यष्टि आत्मा की चेतना अधिचेतना में कार्य नहीं कर सकती। यह अधिचेतना केवल व्यष्टि चेतना को अधिचेतना के साथ संयुक्त करके ही प्राप्त की जा सकती है; और इस संयुक्त करने की प्रक्रिया को आत्मसमर्पण, अथवा कृष्णभावनामृत कहते हैं।\n\n*भगवद्गीता* की शिक्षाओं से हम अति स्पष्ट रूप से सीखते हैं कि आरम्भ में अर्जुन अपने सम्बन्धियों से युद्ध नहीं करना चाहता था, किन्तु *भगवद्गीता* को समझने के पश्चात्, जब उसने अपनी चेतना को श्रीकृष्ण की अधिचेतना के साथ संयुक्त कर लिया, तब उसकी चेतना कृष्णभावनामृत बन गई। पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति श्रीकृष्ण के निर्देश से कार्य करता है, और इसीलिए अर्जुन कुरुक्षेत्र का युद्ध करने को सहमत हो गया।\n\nकृष्णभावनामृत के आरम्भ में भगवान् का यह निर्देश आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम से प्राप्त होता है। जब मनुष्य पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित हो जाता है और प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में, श्रीकृष्ण के प्रति विनम्र श्रद्धा एवं प्रेम से कार्य करता है, तब यह संयोजन-प्रक्रिया अधिक दृढ़ एवं सटीक हो जाती है। इस स्तर पर श्रीकृष्ण भीतर से निर्देश देते हैं। बाहर से, भक्त को श्रीकृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि आध्यात्मिक गुरु से सहायता मिलती है, और भीतर से भगवान् भक्त की चैत्य-गुरु के रूप में सहायता करते हैं, जो प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं।\n\nकेवल यह समझ लेना कि ईश्वर प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं, सिद्धि नहीं है। मनुष्य को ईश्वर से भीतर तथा बाहर दोनों ओर से परिचित होना चाहिए और इस प्रकार कृष्णभावनामृत में कार्य करना चाहिए। यह मानव-जीवन की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है, तथा समस्त योग-पद्धतियों में सर्वोच्च अवस्था है।\n\nएक सिद्ध योगी के लिए आठ प्रकार की अति-उपलब्धियाँ होती हैं:\n\n1. मनुष्य परमाणु से छोटा हो सकता है।\n\n2. मनुष्य पर्वत से बड़ा हो सकता है।\n\n3. मनुष्य वायु से हल्का हो सकता है।\n\n4. मनुष्य किसी भी धातु से भारी हो सकता है।\n\n5. मनुष्य अपनी इच्छानुसार कोई भी भौतिक परिणाम प्राप्त कर सकता है (उदाहरणार्थ, किसी लोक की रचना करना)।\n\n6. मनुष्य भगवान् की भाँति दूसरों को वश में कर सकता है।\n\n7. मनुष्य ब्रह्माण्ड के भीतर (अथवा परे) कहीं भी स्वच्छन्द रूप से यात्रा कर सकता है।\n\n8. मनुष्य अपनी मृत्यु का काल एवं स्थान स्वयं चुन सकता है, और जहाँ चाहे वहाँ पुनर्जन्म ले सकता है।\n\nकिन्तु जब मनुष्य भगवान् से निर्देश प्राप्त करने की सिद्ध अवस्था तक ऊपर उठ जाता है, तब वह ऊपर वर्णित भौतिक उपलब्धियों की अवस्था से ऊपर होता है।\n\nयोग-पद्धति का जो श्वास-व्यायाम सामान्यतः किया जाता है, वह पद्धति का मात्र आरम्भ है। परमात्मा पर ध्यान मात्र एक पग आगे है। अद्भुत भौतिक सफलता की उपलब्धि भी मात्र एक पग आगे है। किन्तु परमात्मा से प्रत्यक्ष सम्पर्क प्राप्त करना तथा उनसे निर्देश ग्रहण करना ही सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है।\n\nयोग के श्वास-व्यायाम तथा ध्यान-साधनाएँ इस युग में अति कठिन हैं। वे पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भी कठिन थीं, अन्यथा अर्जुन ने श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार न किया होता। इस कलियुग को पतित युग कहा जाता है। वर्तमान समय में, सामान्य जन अल्पायु तथा आत्म-साक्षात्कार, अर्थात् आध्यात्मिक जीवन को समझने में अति मन्द हैं। वे अधिकांशतः अभागे हैं, और इस कारण, यदि कोई आत्म-साक्षात्कार में थोड़ा-सा भी रुचि रखता है, तो अनेक छलियों द्वारा वह दिग्भ्रमित कर दिया जाता है। योग की सिद्ध अवस्था की अनुभूति का एकमात्र वास्तविक मार्ग *भगवद्गीता* के सिद्धान्तों का अनुसरण करना है, जैसे उनका अभ्यास भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने किया। यह योगाभ्यास की सरलतम एवं सर्वोच्च सिद्धि है।\n\nभगवान् चैतन्य ने कृष्णभावनामृत-योग का व्यावहारिक प्रदर्शन मात्र श्रीकृष्ण के पवित्र नामों का कीर्तन करके किया, जैसे कि वे वेदान्त, *श्रीमद्भागवत* तथा अनेक प्रमुख *पुराणों* में उल्लिखित हैं। भारतीयों का सबसे बड़ा भाग इस योगाभ्यास का अनुसरण करता है, और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य देशों में भी यह अनेक नगरों में धीरे-धीरे बढ़ रहा है। यह इस युग के लिए अति सरल एवं व्यावहारिक है, विशेषकर उनके लिए जो योग में सफलता के प्रति गम्भीर हैं। इस युग में कोई अन्य प्रक्रिया सफल नहीं हो सकती।\n\nसच्ची लगन के साथ ध्यान की प्रक्रिया स्वर्णयुग, सत्ययुग में सम्भव थी, क्योंकि उस समय लोग औसतन एक लाख वर्ष जीते थे।\n\nतथापि वर्तमान युग में, यदि आप व्यावहारिक योग में सफलता चाहते हैं, तो हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का कीर्तन आरम्भ करें, और स्वयं अनुभव करें कि आप किस प्रकार प्रगति कर रहे हैं। मनुष्य को स्वयं जान लेना चाहिए कि वह योगाभ्यास में कितनी प्रगति कर रहा है।\n\n*भगवद्गीता* में कृष्णभावनामृत के इस अभ्यास को राजविद्या, समस्त विद्याओं का राजा; राजगुह्यम्, आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वाधिक गोपनीय पद्धति; पवित्रम्, समस्त पवित्र वस्तुओं में पवित्रतम; सुसुखम्, अति सुखपूर्वक सम्पन्न होने वाली; तथा अव्ययम्, अक्षय—के रूप में वर्णित किया गया है।\n\nजिन्होंने इस परम उदात्त भक्तियोग-पद्धति को, श्रीकृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम में इस भक्ति के अभ्यास को अपनाया है, वे यह साक्ष्य दे सकते हैं कि वे किस प्रकार इसके सुखमय एवं सरल निष्पादन का भली-भाँति आनन्द ले रहे हैं। योग का अर्थ है इन्द्रियों को वश में करना, और भक्तियोग का अर्थ है इन्द्रियों को शुद्ध करना। जब इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब वे स्वतः ही वश में भी हो जाती हैं। आप इन्द्रियों के क्रियाकलापों को किसी कृत्रिम साधन से रोक नहीं सकते, किन्तु यदि आप इन्द्रियों को शुद्ध कर लें, तो वे न केवल निरर्थक प्रवृत्तियों से रोक ली जाती हैं, अपितु वे भगवान् की दिव्य सेवा में सकारात्मक रूप से संलग्न भी हो जाती हैं।\n\nकृष्णभावनामृत हमारे द्वारा मानसिक कल्पना से गढ़ा हुआ नहीं है। यह *भगवद्गीता* में विहित है, जो कहती है कि जब हम श्रीकृष्ण में सोचते हैं, श्रीकृष्ण में कीर्तन करते हैं, श्रीकृष्ण में जीते हैं, श्रीकृष्ण में खाते हैं, श्रीकृष्ण में बात करते हैं, श्रीकृष्ण में आशा रखते हैं, और श्रीकृष्ण में स्थित रहते हैं, तब हम नि:सन्देह श्रीकृष्ण के पास लौट जाते हैं। और यही कृष्णभावनामृत का सार है।\n\nभगवान् चैतन्य का आविर्भाव\n\nमात्र पाँच सौ वर्ष पूर्व भगवान् चैतन्य महाप्रभु, एक महान् सन्त एवं योगी, ने भविष्यवाणी की कि हरे कृष्ण महामन्त्र विश्व के प्रत्येक नगर एवं ग्राम में गूँजेगा। एक ऐसे समय में जब पाश्चात्य मनुष्य अपनी अन्वेषक प्रवृत्ति को भौतिक ब्रह्माण्ड के अध्ययन तथा भूमण्डल की परिक्रमा की ओर निर्देशित कर रहा था, भारत में श्रीचैतन्य अन्तर्मुखी एक क्रान्ति का सूत्रपात एवं संचालन कर रहे थे। उनका आन्दोलन समस्त उपमहाद्वीप में व्याप्त हो गया, लाखों अनुयायी अर्जित किए, और भारत तथा पश्चिम दोनों में धार्मिक एवं दार्शनिक चिन्तन के भविष्य को गहराई से प्रभावित किया। नवम्बर 1969 में लन्दन के कॉनवे हॉल में प्रस्तुत निम्नलिखित प्रवचन में, श्रील प्रभुपाद श्रीचैतन्य के दिव्य आविर्भाव का वर्णन करते हैं।\n\nश्रीचैतन्य महाप्रभु, स्वर्ण-अवतार, प्रायः पाँच सौ वर्ष पूर्व भारत में प्रकट हुए। भारत में यह प्रथा है कि जब कोई बालक जन्म लेता है, तो एक ज्योतिषी को बुलाया जाता है। जब *भगवान् श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्*, पाँच हज़ार वर्ष पूर्व प्रकट हुए, तो उनके पिता द्वारा गर्गमुनि बुलाए गए, और उन्होंने कहा, \"यह बालक पूर्व में तीन वर्णों में अवतरित हुआ था, जैसे रक्त तथा स्वर्ण, और अब यह कृष्ण वर्ण में प्रकट हुआ है।\" शास्त्रों में श्रीकृष्ण का वर्ण श्याम बताया गया है, ठीक मेघ के वर्ण के समान। भगवान् चैतन्य को स्वर्ण वर्ण में प्रकट होने वाले श्रीकृष्ण के रूप में समझा जाता है।\n\nवैदिक साहित्य में बहुत प्रमाण है कि चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण के अवतार हैं, और इसकी पुष्टि विद्वान् एवं भक्त करते हैं। *श्रीमद्भागवत* में इसकी पुष्टि होती है कि इस वर्तमान युग, कलियुग, में श्रीकृष्ण, अर्थात् ईश्वर, का अवतार सदा श्रीकृष्ण का वर्णन करने में संलग्न रहेगा। वे श्रीकृष्ण ही हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के एक भक्त के रूप में वे स्वयं का वर्णन करते हैं। और इस युग में उनका शारीरिक वर्ण श्याम नहीं होगा। इसका अर्थ है कि वह श्वेत हो सकता है, रक्त हो सकता है, अथवा पीत हो सकता है, क्योंकि ये चार वर्ण—श्वेत, रक्त, पीत तथा श्याम—भिन्न-भिन्न युगों हेतु अवतारों द्वारा धारण किए जाने वाले वर्ण हैं। अतः, चूँकि रक्त, श्वेत तथा श्याम वर्ण पूर्व अवतारों द्वारा पहले ही ग्रहण किए जा चुके थे, शेष वर्ण, स्वर्ण, चैतन्य महाप्रभु द्वारा धारण किया गया। उनका वर्ण श्याम नहीं है, किन्तु वे श्रीकृष्ण ही हैं।\n\nइस अवतार का एक और लक्षण यह है कि वे सदा अपने पार्षदों से घिरे रहते हैं। चैतन्य महाप्रभु के चित्र में मनुष्य पाएगा कि उनके पीछे सदा अनेक भक्त कीर्तन करते हुए चलते हैं। जब भी ईश्वर अवतार लेते हैं, तब उनके दो उद्देश्य होते हैं, जैसा *भगवद्गीता* में कहा गया है। वहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, \"जब भी मैं प्रकट होता हूँ, मेरा उद्देश्य पुण्यात्मा भक्तों का उद्धार करना तथा असुरों का संहार करना है।\" जब श्रीकृष्ण प्रकट हुए, तो उन्हें अनेक असुरों का वध करना पड़ा। यदि हम विष्णु का कोई चित्र देखें तो हम पाएँगे कि उनके पास शंख, कमल-पुष्प, गदा तथा चक्र है। ये अन्तिम दो वस्तुएँ असुरों के वध हेतु हैं। इस जगत् के भीतर दो प्रकार के मनुष्य हैं—असुर तथा भक्त। भक्तगण देवता कहलाते हैं; वे प्रायः ईश्वर के समान होते हैं क्योंकि उनमें ईश्वरीय गुण होते हैं। जो भक्त हैं वे ईश्वरीय व्यक्ति कहलाते हैं, और जो अभक्त, नास्तिक हैं वे असुर कहलाते हैं। अतः श्रीकृष्ण, अर्थात् ईश्वर, दो उद्देश्यों से आते हैं: भक्तों को रक्षा प्रदान करना तथा असुरों का संहार करना। इस युग में चैतन्य महाप्रभु का उद्देश्य भी वैसा ही है: भक्तों का उद्धार करना तथा अभक्तों, असुरों का संहार करना। किन्तु इस युग में उनके पास एक भिन्न शस्त्र है। वह शस्त्र गदा अथवा चक्र अथवा कोई घातक शस्त्र नहीं है—उनका शस्त्र संकीर्तन आन्दोलन है। उन्होंने संकीर्तन आन्दोलन का प्रवर्तन करके लोगों की आसुरी मनोवृत्ति का वध किया। यही भगवान् चैतन्य का विशिष्ट महत्त्व है। इस युग में लोग पहले ही स्वयं को मार रहे हैं। उन्होंने ऐसे परमाणु शस्त्र खोज लिए हैं जिनसे वे स्वयं को मार सकें, अतः ईश्वर को उन्हें मारने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु वे उनकी आसुरी मनोवृत्ति को मारने के लिए प्रकट हुए। यह इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा सम्भव है।\n\nअतः, *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है कि इस युग में यही ईश्वर का अवतार है। और कौन उनकी आराधना करता है? प्रक्रिया अति सरल है। बस भगवान् चैतन्य का उनके पार्षदों सहित एक चित्र रखें। भगवान् चैतन्य मध्य में हैं, अपने प्रमुख पार्षदों—नित्यानन्द, अद्वैत, गदाधर तथा श्रीवास—से घिरे हुए। मनुष्य को बस यह चित्र रखना है। इसे कहीं भी रखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इस चित्र को देखने के लिए मनुष्य को हमारे पास आना पड़े। कोई भी इस चित्र को अपने घर में रख सकता है, इस हरे कृष्ण महामन्त्र का जप कर सकता है, और इस प्रकार भगवान् चैतन्य की आराधना कर सकता है। यह सरल विधि है। किन्तु इस सरल विधि को कौन अपनाएगा? जिनके पास अच्छी बुद्धि है। अधिक झंझट के बिना, यदि मनुष्य बस श्रीचैतन्य महाप्रभु का एक चित्र घर में रखे और हरे कृष्ण का जप करे, तो वह ईश्वर का साक्षात्कार कर लेगा। कोई भी इस सरल विधि को अपना सकता है। न कोई व्यय है, न कोई कर, न ही कोई अति विशाल गिरजाघर अथवा मन्दिर बनाने की आवश्यकता है। कोई भी, कहीं भी, मार्ग पर अथवा किसी वृक्ष के नीचे बैठकर हरे कृष्ण महामन्त्र का जप कर सकता है और ईश्वर की आराधना कर सकता है। अतः यह एक महान् अवसर है। उदाहरणार्थ, व्यवसाय अथवा राजनीतिक जीवन में मनुष्य को कभी-कभी एक महान् अवसर मिलता है। जो बुद्धिमान् राजनीतिज्ञ हैं वे अच्छे अवसर को लेते हैं और प्रथम बार आने पर ही उसे सफल बना लेते हैं। इसी प्रकार, इस युग में, जिनके पास पर्याप्त बुद्धि है वे इस संकीर्तन आन्दोलन को अपनाते हैं, और वे अति शीघ्र उन्नति करते हैं।\n\nभगवान् चैतन्य \"स्वर्ण-अवतार\" कहलाते हैं। अवतार का अर्थ है \"अवतरण, नीचे आना।\" जिस प्रकार कोई भवन के पाँचवें तल अथवा सौवें तल से नीचे आता है, उसी प्रकार एक अवतार आध्यात्मिक आकाश में स्थित आध्यात्मिक लोकों से नीचे आता है। जिस आकाश को हम अपनी नंगी आँखों से अथवा दूरबीन से देखते हैं, वह केवल भौतिक आकाश है। किन्तु इससे परे एक अन्य आकाश है, जिसे अपनी आँखों अथवा यन्त्रों से देखना सम्भव नहीं। वह जानकारी *भगवद्गीता* में है; यह कल्पना नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि भौतिक आकाश से परे एक अन्य आकाश है, आध्यात्मिक आकाश।\n\nहमें श्रीकृष्ण के वचन को जैसा है वैसा ही ग्रहण करना होगा। उदाहरणार्थ, हम छोटे बालकों को सिखाते हैं कि इंग्लैण्ड से परे अन्य स्थान हैं, जिन्हें जर्मनी, भारत इत्यादि कहते हैं, और बालक को इन स्थानों के विषय में शिक्षक के कथन से सीखना पड़ता है क्योंकि वे उसके क्षेत्र से परे हैं। इसी प्रकार, इस भौतिक आकाश से परे एक अन्य आकाश है। मनुष्य इसे खोजने के लिए प्रयोग नहीं कर सकता, जैसे कोई छोटा बालक जर्मनी अथवा भारत को खोजने के लिए प्रयोग नहीं कर सकता। वह सम्भव नहीं है। यदि हम ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें प्रामाणिक सत्ता को स्वीकार करना होगा। इसी प्रकार, यदि हम जानना चाहते हैं कि भौतिक जगत् से परे क्या है, तो हमें वैदिक प्रामाणिकता को स्वीकार करना होगा, अन्यथा जानने की कोई सम्भावना नहीं है। यह भौतिक ज्ञान से परे है। मनुष्य इस ब्रह्माण्ड के दूरस्थ लोकों तक नहीं जा सकता, फिर इस ब्रह्माण्ड से परे जाने की तो बात ही क्या। अनुमान यह है कि आधुनिक यन्त्रों से इस ब्रह्माण्ड के उच्चतम लोक तक जाने के लिए मनुष्य को चालीस हज़ार प्रकाश-वर्ष तक यात्रा करनी पड़ेगी। अतः हम इस भौतिक आकाश के भीतर भी यात्रा नहीं कर सकते। हमारा जीवनकाल तथा साधन इतने सीमित हैं कि हम इस भौतिक जगत् का भी समुचित ज्ञान नहीं रख सकते।\n\n*भगवद्गीता* में, जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा, \"क्या आप कृपया यह बताएँगे कि आपकी ऊर्जाएँ किस सीमा तक कार्य कर रही हैं?\" तब परमेश्वर ने उसे इतने सारे उदाहरण दिए, और अन्त में उन्होंने अन्ततः कहा, \"हे प्रिय अर्जुन, मैं अपनी ऊर्जाओं के विषय में क्या समझाऊँ? वस्तुतः तुम्हारे लिए समझना सम्भव ही नहीं है। किन्तु तुम मेरी ऊर्जाओं के विस्तार की मात्र कल्पना कर सकते हो: यह भौतिक जगत्, जो लाखों ब्रह्माण्डों से बना है, मेरी सृष्टि के केवल चतुर्थांश का प्रदर्शन है।\" हम एक ब्रह्माण्ड की भी स्थिति का अनुमान नहीं लगा सकते, और ऐसे लाखों ब्रह्माण्ड हैं। फिर उससे परे आध्यात्मिक आकाश है, और वहाँ लाखों आध्यात्मिक लोक हैं। यह समस्त जानकारी वैदिक साहित्य से उपलब्ध है। यदि कोई वैदिक साहित्य को स्वीकार करे, तो वह यह ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यदि कोई इसे स्वीकार न करे, तो कोई अन्य साधन नहीं है। यही हमारा चयन है। अतः, वैदिक सभ्यता के अनुसार, जब भी कोई आचार्य बोलते हैं तो वे तत्काल वैदिक साहित्य से सन्दर्भ देते हैं। तब अन्य लोग इसे स्वीकार करेंगे: \"हाँ, यह सही है।\" किसी न्यायालय में वकील न्यायालय के पूर्व निर्णयों से सन्दर्भ देता है, और यदि उसका मामला सुदृढ़ है, तो न्यायाधीश स्वीकार कर लेता है। इसी प्रकार, यदि कोई *वेदों* से प्रमाण दे सके, तो समझा जाता है कि उसका पक्ष तथ्यपूर्ण है।\n\nइस युग के अवतार, भगवान् चैतन्य, का वर्णन वैदिक साहित्य में है। हम किसी को भी अवतार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते जब तक उसमें वे लक्षण न हों जो शास्त्रों में वर्णित हैं। हम भगवान् चैतन्य को मतों के आधार पर मनमाने रूप से अवतार स्वीकार नहीं करते। आजकल यह एक फ़ैशन बन गया है कि कोई भी मनुष्य आकर कह सकता है कि वह ईश्वर है अथवा ईश्वर का अवतार है, और कुछ मूर्ख तथा धूर्त इसे स्वीकार कर लेंगे: \"ओह, वह ईश्वर है।\" हम उस प्रकार किसी अवतार को स्वीकार नहीं करते। हम *वेदों* से प्रमाण लेते हैं। एक अवतार को *वेदों* में वर्णित विवरणों के अनुरूप होना चाहिए। तब हम उसे स्वीकार करते हैं; अन्यथा नहीं। प्रत्येक अवतार के लिए *वेदों* में एक वर्णन है: वह अमुक-अमुक स्थान पर, अमुक-अमुक रूप में प्रकट होगा, और वह इस प्रकार कार्य करेगा। यही वैदिक प्रमाण का स्वभाव है।\n\n*श्रीमद्भागवत* में अवतारों की एक सूची है, और उसमें भगवान् बुद्ध के नाम का उल्लेख है। यह *श्रीमद्भागवत* पाँच हज़ार वर्ष पूर्व लिखा गया था, और यह भावी कालों के लिए भिन्न-भिन्न नामों का उल्लेख करता है। यह कहता है कि भविष्य में भगवान् भगवान् बुद्ध के रूप में प्रकट होंगे, उनकी माता का नाम अञ्जना होगा, और वे गया में प्रकट होंगे। अतः बुद्ध छब्बीस सौ वर्ष पूर्व प्रकट हुए, और *श्रीमद्भागवत*, जो पाँच हज़ार वर्ष पूर्व लिखा गया था, ने उल्लेख किया कि भविष्य में वे प्रकट होंगे। इसी प्रकार, भगवान् चैतन्य का उल्लेख है, और इसी प्रकार इस कलियुग के अन्तिम अवतार का भी *भागवत* में उल्लेख है। उल्लेख है कि इस युग का अन्तिम अवतार कल्कि है। वे एक ऐसे ब्राह्मण के पुत्र के रूप में प्रकट होंगे जिसका नाम विष्णुयशा है, शम्भल नामक स्थान में। भारत में उस नाम का एक स्थान है, अतः सम्भवतः वहीं भगवान् प्रकट होंगे।\n\nअतः एक अवतार को *उपनिषदों*, *श्रीमद्भागवत*, *महाभारत* तथा अन्य वैदिक साहित्य में वर्णित विवरणों के अनुरूप होना चाहिए। और वैदिक साहित्य की प्रामाणिकता तथा जीव गोस्वामी जैसे महान्, धुरन्धर गोस्वामियों की टीका के आधार पर, जो विश्व के सबसे बड़े विद्वान् एवं दार्शनिक थे, हम भगवान् चैतन्य को श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में स्वीकार कर सकते हैं।\n\nभगवान् चैतन्य क्यों प्रकट हुए? *भगवद्गीता* में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, \"समस्त अन्य प्रवृत्तियों को त्यागकर मात्र मेरी सेवा में संलग्न हो जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों के फलों से रक्षा प्रदान करूँगा।\" इस भौतिक जगत् में, बद्ध जीवन में, हम मात्र पापमय प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर रहे हैं। बस इतना ही। और पापमय प्रतिक्रियाओं के कारण, हमने यह शरीर प्राप्त किया है। यदि हमारी पापमय प्रतिक्रियाएँ रुक जाएँ तो हमें कोई भौतिक शरीर ग्रहण न करना पड़े; हमें एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होना चाहिए।\n\nआध्यात्मिक शरीर क्या है? आध्यात्मिक शरीर वह शरीर है जो मृत्यु, जन्म, रोग तथा वृद्धावस्था से मुक्त है। यह एक नित्य शरीर है, ज्ञान एवं आनन्द से परिपूर्ण। भिन्न-भिन्न शरीर भिन्न-भिन्न इच्छाओं द्वारा रचे जाते हैं। जब तक हमारे भीतर भिन्न-भिन्न प्रकार के भोग की इच्छाएँ हैं, हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के भौतिक शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। श्रीकृष्ण, ईश्वर, इतने कृपालु हैं कि वे हमें जो भी हम चाहते हैं, प्रदान करते हैं। यदि हम बाघ का शरीर चाहते हैं, बाघ जैसे बल तथा दाँतों सहित जिनसे पशुओं को पकड़कर ताज़ा रक्त चूसा जा सके, तो श्रीकृष्ण हमें यह अवसर देंगे। और यदि हम किसी सन्त-पुरुष का शरीर चाहते हैं, जो केवल भगवान् की सेवा में संलग्न एक भक्त हो, तो वे हमें वह शरीर देंगे। यह *भगवद्गीता* में कहा गया है।\n\nयदि आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया, योग, में संलग्न कोई व्यक्ति किसी न किसी कारण प्रक्रिया को पूर्ण करने में असफल रहता है, तो उसे एक और अवसर दिया जाता है; उसे किसी शुद्ध ब्राह्मण अथवा किसी धनी व्यक्ति के कुल में जन्म दिया जाता है। यदि कोई ऐसे कुल में जन्म लेने का सौभाग्य पाता है, तो उसे आत्म-साक्षात्कार के महत्त्व को समझने की समस्त सुविधा मिलती है। जीवन के अति आरम्भ से ही हमारे कृष्णभावनाभावित बालक जप एवं नृत्य सीखने का अवसर पा रहे हैं, अतः जब वे बड़े होंगे तब वे बदलेंगे नहीं, अपितु स्वतः ही प्रगति करेंगे। वे अति भाग्यशाली हैं। चाहे वह अमेरिका में जन्मा हो अथवा यूरोप में, यदि उसके माता-पिता भक्त हों तो बालक उन्नति करेगा। उसे यह अवसर मिलता है। यदि कोई बालक भक्तों के कुल में जन्म लेता है, तो इसका अर्थ है कि अपने पिछले जीवन में उसने योग-प्रक्रिया को पहले ही अपना लिया था, किन्तु किसी न किसी कारण वह उसे पूर्ण नहीं कर सका। अतः बालक को एक अच्छे माता-पिता की देखरेख में प्रगति करने का एक और अवसर दिया जाता है ताकि वह पुनः उन्नति करे। इस प्रकार, ज्योंही मनुष्य ईश्वर-भावना के अपने विकास को पूर्ण कर लेता है, त्योंही उसे इस भौतिक जगत् में पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता, अपितु वह आध्यात्मिक जगत् को लौट जाता है।\n\nश्रीकृष्ण *भगवद्गीता* में कहते हैं: \"हे प्रिय अर्जुन, यदि कोई मेरे आविर्भाव, तिरोभाव तथा क्रियाकलापों को समझ ले, तो मात्र इस बोध के कारण उसे इस शरीर को त्यागने के पश्चात् आध्यात्मिक जगत् में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है।\" मनुष्य को यह शरीर त्यागना ही होगा—आज, कल, अथवा सम्भवतः परसों। त्यागना ही होगा। किन्तु जिस व्यक्ति ने श्रीकृष्ण को समझ लिया है उसे एक और भौतिक शरीर ग्रहण नहीं करना पड़ेगा। वह सीधे आध्यात्मिक जगत् में जाता है और किसी आध्यात्मिक लोक में जन्म लेता है। अतः श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्योंही मनुष्य यह शरीर प्राप्त करता है—चाहे वह भारत से हो अथवा चन्द्रमा या सूर्य या ब्रह्मलोक से या इस भौतिक जगत् के भीतर कहीं से भी—मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि यह उसके पापमय कर्मों के कारण है। पापमय कर्मों की मात्राएँ होती हैं, अतः पाप की मात्रा के अनुसार, मनुष्य एक भौतिक शरीर ग्रहण करता है। अतः हमारी वास्तविक समस्या यह नहीं कि कैसे खाएँ, सोएँ, मैथुन करें तथा रक्षा करें—हमारी वास्तविक समस्या यह है कि ऐसा शरीर कैसे प्राप्त करें जो भौतिक नहीं अपितु आध्यात्मिक हो। यही समस्त समस्याओं का परम समाधान है। अतः श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि यदि कोई उनके प्रति आत्मसमर्पण कर दे, यदि कोई पूर्णतः कृष्णभावनाभावित हो जाए, तो वे उसे पापमय जीवन की समस्त प्रतिक्रियाओं से रक्षा प्रदान करेंगे।\n\nयह आश्वासन श्रीकृष्ण द्वारा *भगवद्गीता* में दिया गया, किन्तु अनेक मूर्ख थे जो श्रीकृष्ण को समझ न सके। *भगवद्गीता* में उन्हें मूढ़ कहकर वर्णित किया गया है। मूढ़ का अर्थ है \"धूर्त,\" और श्रीकृष्ण *गीता* में कहते हैं, \"वे नहीं जानते कि मैं वस्तुतः क्या हूँ।\" अतः अनेक लोगों ने श्रीकृष्ण को ग़लत समझा। यद्यपि श्रीकृष्ण ने हमें *भगवद्गीता* का यह सन्देश दिया ताकि हम उन्हें समझ सकें, अनेक लोगों ने अवसर खो दिया। अतः श्रीकृष्ण, अपनी करुणा से, एक भक्त के रूप में पुनः आए, और हमें दिखाया कि श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण कैसे किया जाए। श्रीकृष्ण स्वयं हमें आत्मसमर्पण करना सिखाने आए। *भगवद्गीता* में उनका अन्तिम उपदेश आत्मसमर्पण करना है, किन्तु लोग—मूढ़, धूर्त—बोले, \"मैं आत्मसमर्पण क्यों करूँ?\" अतः, यद्यपि चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं, इस बार वे हमें व्यावहारिक रूप से सिखाते हैं कि *भगवद्गीता* के उद्देश्य को कैसे निष्पादित किया जाए। बस इतना ही। चैतन्य महाप्रभु कोई असाधारण वस्तु नहीं सिखा रहे, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति आत्मसमर्पण की प्रक्रिया से परे कुछ भी नहीं, जो पहले ही *भगवद्गीता* में सिखाई गई थी। कोई अन्य शिक्षा नहीं है, किन्तु वही शिक्षा भिन्न-भिन्न रीतियों से प्रस्तुत की जाती है ताकि भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग उसे ग्रहण करें और ईश्वर के समीप पहुँचने का अवसर लें।\n\nचैतन्य महाप्रभु हमें ईश्वर तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँचने का अवसर देते हैं। जब भगवान् चैतन्य के प्रमुख शिष्य रूप गोस्वामी ने पहली बार चैतन्य महाप्रभु को देखा, तब वे बंगाल की सरकार में एक मन्त्री थे किन्तु चैतन्य महाप्रभु के आन्दोलन में सम्मिलित होना चाहते थे। अतः उन्होंने मन्त्री के अपने पद को त्याग दिया, और सम्मिलित होने के पश्चात्, जब उन्होंने आत्मसमर्पण किया, तो उन्होंने भगवान् चैतन्य को एक सुन्दर प्रार्थना अर्पित की। यह प्रार्थना कहती है:\n\nnamo mahā-vadānyāya\n\nkṛṣṇa-prema-pradāya te\n\nkṛṣṇāya kṛṣṇa-caitanya-\n\nnāmne gaura-tviṣe namaḥ\n\n[Madhya 19.53]\n\n\"हे प्रिय प्रभु, आप समस्त अवतारों में सर्वाधिक उदार हैं।\" क्यों? कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते: \"आप प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर-प्रेम प्रदान कर रहे हैं। आपका कोई अन्य प्रयोजन नहीं। आपकी प्रक्रिया इतनी सुन्दर है कि मनुष्य तत्काल ईश्वर से प्रेम करना सीख सकता है। अतः आप समस्त अवतारों में सर्वाधिक उदार हैं। और स्वयं श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्तित्व के लिए यह वरदान देना सम्भव नहीं; अतः मैं कहता हूँ कि आप श्रीकृष्ण ही हैं।\" कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने: \"आप श्रीकृष्ण हैं, किन्तु आपने कृष्ण चैतन्य का नाम धारण किया है। मैं आपके प्रति आत्मसमर्पण करता हूँ।\"\n\nअतः यही प्रक्रिया है। चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं, और वे एक अति सरल विधि द्वारा ईश्वर-प्रेम का विकास करना सिखा रहे हैं। वे बस इतना कहते हैं कि हरे कृष्ण का जप करो।\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\n\"इस युग में, बस हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते रहो। कोई अन्य विकल्प नहीं है।\" लोग अनुभूति की इतनी सारी विधियों से उलझन में पड़ जाते हैं। वे ध्यान अथवा योग की वास्तविक कर्मकाण्डी प्रक्रियाओं को नहीं अपना सकते; यह सम्भव नहीं है। अतः भगवान् चैतन्य कहते हैं कि यदि कोई जप की इस प्रक्रिया को अपना ले, तो वह तत्काल अनुभूति के स्तर तक पहुँच सकता है।\n\nईश्वर-प्रेम की प्राप्ति हेतु भगवान् चैतन्य द्वारा प्रस्तुत जप-प्रक्रिया संकीर्तन कहलाती है। संकीर्तन एक संस्कृत शब्द है। सम् का अर्थ है सम्यक्—\"पूर्ण।\" और कीर्तन का अर्थ है \"महिमागान\" अथवा \"वर्णन।\" अतः पूर्ण वर्णन का अर्थ है परम का, अथवा परम पूर्ण ब्रह्म का, पूर्ण महिमागान। ऐसा नहीं है कि मनुष्य किसी का भी वर्णन कर सके अथवा किसी की भी महिमा गा सके और वह कीर्तन होगा। व्याकरण की दृष्टि से वह कीर्तन हो सकता है, किन्तु वैदिक पद्धति के अनुसार, कीर्तन का अर्थ है परम सत्ता, परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का वर्णन करना। वही कीर्तन कहलाता है।\n\nयह भक्ति श्रवण की विधि से आरम्भ होती है। श्रवण का अर्थ है \"सुनना,\" और कीर्तन का अर्थ है \"वर्णन करना।\" एक को वर्णन करना चाहिए, और दूसरे को सुनना चाहिए। अथवा वही मनुष्य स्वयं वर्णन भी कर सकता है और सुन भी सकता है। उसे किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं। जब हम हरे कृष्ण का जप करते हैं, तब हम जप भी करते हैं और सुनते भी हैं। यह पूर्ण है। यह एक पूर्ण विधि है। किन्तु वह जप एवं श्रवण क्या है? मनुष्य को विष्णु, श्रीकृष्ण का ही जप एवं श्रवण करना चाहिए। किसी अन्य का नहीं। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः: [भा. 7.5.23] मनुष्य विष्णु, सर्वव्यापी परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को श्रवण की विधि से समझ सकता है।\n\nहमें सुनना होगा; यदि कोई मात्र सुनता है, तो वही आरम्भ है। मनुष्य को किसी शिक्षा अथवा भौतिक ज्ञान के विकास की आवश्यकता नहीं। ठीक एक बालक की भाँति: ज्योंही वह सुनता है, त्योंही वह तुरन्त प्रत्युत्तर दे सकता है और नृत्य कर सकता है। अतः प्रकृति-स्वरूप ईश्वर ने हमें ये सुन्दर यन्त्र—कान—दिए हैं, ताकि हम सुन सकें। किन्तु हमें सही स्रोत से सुनना चाहिए। यह *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है। मनुष्य को उनसे सुनना चाहिए जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति समर्पित हैं। वे सताम् कहलाते हैं। यदि कोई सही स्रोत से, किसी अनुभूत आत्मा से सुनता है, तो वह प्रभावी होगा। और ईश्वर, अर्थात् श्रीकृष्ण के ये वचन, अति रसमय हैं। यदि कोई पर्याप्त बुद्धिमान् है, तो वह सुनेगा कि अनुभूत आत्मा द्वारा क्या कहा जा रहा है। तब वह अति शीघ्र भौतिक बन्धनों से मुक्त हो जाएगा।\n\nयह मानव-जीवन मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए है। वह अपवर्ग कहलाता है, बन्धन से मुक्ति। हम सब बँधे हुए हैं। इस भौतिक शरीर का हमारा स्वीकरण ही यह दर्शाता है कि हम पहले से ही बँधे हुए हैं। किन्तु हमें बन्धन की प्रक्रिया में प्रगति नहीं करनी चाहिए। वह प्रक्रिया कर्म कहलाती है। जब तक मन कर्म में निमग्न रहता है, हमें एक भौतिक शरीर ग्रहण करना ही पड़ेगा। मृत्यु के समय, हमारा मन सोच रहा होगा, \"ओह, मैं यह कार्य पूर्ण न कर सका। ओह, मैं मर रहा हूँ! मुझे यह करना है। मुझे वह करना है।\" इसका अर्थ है कि श्रीकृष्ण हमें इसे करने का एक और अवसर देंगे, और इस प्रकार हमें एक और शरीर ग्रहण करना पड़ेगा। वे हमें अवसर देंगे: \"ठीक है। तुम इसे न कर सके। अब करो। यह शरीर लो।\" अतः *श्रीमद्भागवत* कहता है, \"ये धूर्त उन्मत्त रूप से मतवाले हो गए हैं; मत्तता के कारण वे कुछ ऐसा कर रहे हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए था।\" वे क्या कर रहे हैं? महाराज धृतराष्ट्र एक अति उत्तम उदाहरण हैं। महाराज धृतराष्ट्र अपने ही पुत्रों का पक्ष लेने हेतु पाण्डवों को मारने का धूर्ततापूर्ण षड्यन्त्र रच रहे थे, अतः श्रीकृष्ण ने अपने चाचा, अक्रूर को, उन्हें यह न करने की सलाह देने हेतु भेजा। धृतराष्ट्र अक्रूर के उपदेशों को समझ गए, किन्तु उन्होंने कहा, \"हे प्रिय अक्रूर, आप जो कह रहे हैं वह सर्वथा सही है, किन्तु यह मेरे हृदय में टिकता नहीं, अतः मैं अपनी नीति बदल नहीं सकता। मुझे इसी नीति का अनुसरण करना है और जो भी हो, उसे होने देना है।\"\n\nअतः जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहते हैं, तब वे उन्मत्त हो जाते हैं, और इस उन्माद में वे कुछ भी और सब कुछ कर डालेंगे। उदाहरणार्थ, भौतिक जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण हुए हैं जहाँ कोई किसी वस्तु के पीछे उन्मत्त हो गया है और हत्या जैसा कोई आपराधिक कृत्य कर बैठा है। वह व्यक्ति स्वयं को रोक न सका। इसी प्रकार, हम इन्द्रियतृप्ति के अभ्यस्त हैं। हम उन्मत्त हैं, और इसीलिए हमारे मन पूर्णतः कर्म में निमग्न हैं। यह अति दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि हमारा शरीर, यद्यपि क्षणभंगुर है, समस्त दुर्भाग्यों एवं दुःखों का आगार है; यह हमें सदा कष्ट देता रहता है। ये विषय अध्ययन करने योग्य हैं। हमें उन्मत्त नहीं होना चाहिए। मानव-जीवन इसके लिए नहीं है। वर्तमान सभ्यता का दोष यह है कि लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे उन्मत्त हैं। बस इतना ही। वे जीवन के वास्तविक मूल्य को नहीं जानते, और इसीलिए वे जीवन के सर्वाधिक मूल्यवान रूप, इस मानव-रूप, की उपेक्षा कर रहे हैं।\n\nजब यह शरीर समाप्त हो जाता है तो कोई प्रत्याभूति नहीं कि मनुष्य अगला कैसा शरीर ग्रहण करेगा। मान लीजिए मेरे अगले जीवन में मुझे संयोगवश किसी वृक्ष का शरीर मिल जाए। हज़ारों वर्षों तक मुझे खड़ा रहना पड़ेगा। किन्तु लोग अधिक गम्भीर नहीं हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं, \"वह क्या है? भले ही मुझे खड़ा रहना पड़े, मैं भूल जाऊँगा।\" जीवन की निम्न योनियाँ विस्मृति में स्थित हैं। यदि वृक्ष विस्मृत न होता तो उसका जीवित रहना असम्भव होता। मान लीजिए हमसे कहा जाए, \"तुम यहाँ तीन दिन तक खड़े रहो!\" चूँकि हम विस्मृत नहीं हैं, अतः हम उन्मत्त हो जाएँगे। अतः, प्रकृति के विधान से, ये समस्त निम्न योनियाँ विस्मृत हैं। उनकी चेतना विकसित नहीं है। वृक्ष में जीवन है, किन्तु यदि कोई उसे काट भी दे, तो चूँकि उसकी चेतना विकसित नहीं है, वह प्रत्युत्तर नहीं देता। अतः हमें जीवन के इस मानव-रूप का समुचित उपयोग करने में अति सावधान रहना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन जीवन में सिद्धि प्राप्त करने के लिए है। यह कोई धोखा अथवा शोषण नहीं है, किन्तु दुर्भाग्यवश लोग धोखा खाने के अभ्यस्त हैं। एक भारतीय कवि का एक श्लोक है: \"यदि कोई अच्छी बातें कहता है, तो लोग उससे झगड़ा करेंगे: 'ओह, तुम क्या बकवास कह रहे हो।' किन्तु यदि वह उन्हें धोखा देता है और छलता है, तो वे अति प्रसन्न होंगे।\" अतः यदि कोई छली कहे, \"बस यह करो, मुझे मेरी फ़ीस दो, और छह मास के भीतर तुम ईश्वर बन जाओगे,\" तो वे सहमत हो जाएँगे: \"हाँ, यह फ़ीस लो, और मैं छह मास के भीतर ईश्वर बन जाऊँगा।\" नहीं। ये छल की प्रक्रियाएँ हमारी समस्या का समाधान नहीं करेंगी। यदि कोई वस्तुतः इस युग में जीवन की समस्याओं का समाधान करना चाहता है, तो उसे कीर्तन की इस प्रक्रिया को अपनाना होगा। यही अनुशंसित प्रक्रिया है।\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\nइस युग, कलियुग में, मनुष्य कीर्तन के अतिरिक्त आत्म-साक्षात्कार अथवा जीवन की सिद्धि की कोई प्रक्रिया निष्पादित नहीं कर सकता। इस युग में कीर्तन अनिवार्य है।\n\nसमस्त वैदिक साहित्य में इसकी पुष्टि होती है कि मनुष्य को परम परब्रह्म, विष्णु का ध्यान करना चाहिए, किसी अन्य वस्तु का नहीं। किन्तु भिन्न-भिन्न युगों के लिए भिन्न-भिन्न ध्यान-प्रक्रियाएँ अनुशंसित हैं। योगियों की रहस्यमयी ध्यान-प्रक्रिया सत्ययुग में सम्भव थी, जब मनुष्य अनेक सहस्र वर्ष जीते थे। अब लोग इस पर विश्वास न करेंगे, किन्तु एक पूर्व युग में ऐसे लोग थे जो एक लाख वर्ष जीते थे। वह युग सत्ययुग कहलाता था, और रहस्यमयी योग का ध्यान उस समय सम्भव था। उस युग में महान् योगी वाल्मीकि मुनि ने साठ हज़ार वर्ष तक ध्यान किया। अतः वह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसे इस युग में निष्पादित करना सम्भव नहीं। यदि कोई कोई स्वाँग रचना चाहे, तो वह दूसरी बात है। किन्तु यदि कोई वस्तुतः ऐसे ध्यान का अभ्यास करना चाहे, तो उसे सिद्ध करने में अत्यन्त दीर्घ समय लगता है। अगले युग, त्रेतायुग में, अनुभूति की प्रक्रिया *वेदों* में अनुशंसित विभिन्न कर्मकाण्डी यज्ञों को सम्पन्न करना थी। अगले युग, द्वापरयुग में, प्रक्रिया मन्दिर-पूजा थी। इस वर्तमान युग में वही परिणाम हरि-कीर्तन की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, हरि, *श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्*, की महिमा का गान।\n\nकोई अन्य कीर्तन अनुशंसित नहीं है। यह हरि-कीर्तन पाँच सौ वर्ष पूर्व बंगाल में भगवान् चैतन्य द्वारा आरम्भ किया गया था। बंगाल में वैष्णवों तथा शाक्तों के बीच प्रतिस्पर्धा है। शाक्तों ने एक विशेष प्रकार का कीर्तन प्रस्तुत किया है जो काली-कीर्तन कहलाता है। किन्तु वैदिक शास्त्रों में काली-कीर्तन की कोई अनुशंसा नहीं है। कीर्तन का अर्थ है हरि-कीर्तन। कोई यह नहीं कह सकता, \"ओह, तुम वैष्णव हो। तुम हरि-कीर्तन कर सकते हो। मैं शिव-कीर्तन अथवा देवी-कीर्तन अथवा गणेश-कीर्तन करूँगा।\" नहीं। वैदिक शास्त्र हरि-कीर्तन के अतिरिक्त किसी कीर्तन को अधिकृत नहीं करते। कीर्तन का अर्थ है हरि-कीर्तन, श्रीकृष्ण की महिमा का गान।\n\nअतः हरि-कीर्तन की यह प्रक्रिया अति सरल है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। वस्तुतः केवल तीन ही शब्द हैं: हरे, कृष्ण, तथा राम। किन्तु वे जप के लिए अति सुन्दर रूप से व्यवस्थित हैं ताकि प्रत्येक व्यक्ति मन्त्र ग्रहण कर सके और हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे का जप कर सके। जब से हमने पाश्चात्य देशों में यह आन्दोलन आरम्भ किया है, यूरोपीय, अमेरिकी, अफ़्रीकी, मिस्री तथा जापानी सभी जप कर रहे हैं। कोई कठिनाई नहीं है। वे अति प्रसन्नतापूर्वक जप कर रहे हैं, और वे परिणाम पा रहे हैं। क्या कठिनाई है? हम इस जप को निःशुल्क वितरित कर रहे हैं, और यह अति सरल है। मात्र जप करके, मनुष्य आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर-साक्षात्कार पा सकता है, और जब ईश्वर-साक्षात्कार होता है, तब प्रकृति-साक्षात्कार भी उसमें सम्मिलित हो जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ तथा शून्य सीख ले, तो उसने सम्पूर्ण गणित का अध्ययन कर लिया, क्योंकि गणित का अर्थ है मात्र इन दस अंकों के स्थान बदलना। बस इतना ही। इसी प्रकार, यदि कोई मात्र श्रीकृष्ण का अध्ययन कर ले, तो उसका समस्त ज्ञान पूर्ण हो जाता है। और श्रीकृष्ण इस मन्त्र, हरे कृष्ण, का मात्र जप करके सरलता से समझ लिए जाते हैं। तो इस अवसर को क्यों न लें?\n\nमानव समाज को प्रदान किए जा रहे इस अवसर को ग्रहण करें। यह अत्यन्त प्राचीन एवं वैज्ञानिक है। ऐसा नहीं कि यह कोई गढ़ी हुई वस्तु हो जो केवल तीन-चार वर्ष तक चले। नहीं। *भगवद्गीता* में स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं, \"यह दर्शन अक्षय एवं अविनाशी है। यह कभी लुप्त अथवा नष्ट नहीं होता।\" यह कुछ समय के लिए आवृत भले हो जाए, किन्तु कभी नष्ट नहीं होता। अतः इसे अव्ययम् कहा जाता है। व्यय का अर्थ है \"क्षय\"। उदाहरणार्थ, किसी के पास सौ डॉलर हों, और यदि वे एक-एक करके व्यय कर दिए जाएँ, तो अगले दिन वे शून्य पर आ जाएँगे। यही व्यय है, क्षयशील। किन्तु कृष्णभावनामृत ऐसा नहीं है। यदि आप कृष्णभावनामृत के इस ज्ञान का अनुशीलन करें, तो यह वृद्धि को प्राप्त होगा। इसकी पुष्टि भगवान् चैतन्य महाप्रभु करते हैं। आनन्दाम्बुधि-वर्धनम्। आनन्द का अर्थ है \"सुख\", \"दिव्य आनन्द\", और अम्बुधि का अर्थ है \"सागर\"। भौतिक जगत् में हम देखते हैं कि सागर वृद्धि को प्राप्त नहीं होता। किन्तु यदि कोई कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करे, तो उसका दिव्य आनन्द केवल बढ़ता ही जाएगा। आनन्दाम्बुधि-वर्धनम्। और मैं सदा सबको स्मरण कराता रहूँगा कि यह प्रक्रिया अत्यन्त सरल है। कोई भी जप कर सकता है, कहीं भी, बिना किसी कर भार अथवा हानि के, किन्तु लाभ अत्यन्त महान् है।\n\nश्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस कीर्तन-आन्दोलन की व्याख्या अपने शिक्षाष्टक में की है। शिक्षा का अर्थ है \"उपदेश\", और अष्टक का अर्थ है \"आठ\"। उन्होंने इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को समझने में हमारी सहायता हेतु आठ श्लोक दिए हैं, और इनमें से प्रथम उपदेश की मैं व्याख्या करूँगा। भगवान् कहते हैं, चेतो-दर्पण-मार्जनम्: [चै.च. अन्त्य 20.12] मनुष्य को हृदय को स्वच्छ करना चाहिए। मैंने इसे अनेक बार समझाया है, किन्तु यह नीरस नहीं होता। यह ठीक हरे कृष्ण के जप के समान है; यह कभी थकाने वाला नहीं होता। हमारे विद्यार्थी हरे कृष्ण मन्त्र का दिन में चौबीस घंटे जप कर सकते हैं, और वे कभी नहीं थकेंगे। वे नाचते और जप करते रहेंगे। और कोई भी इसे आज़मा सकता है; क्योंकि यह भौतिक नहीं है, अतः हरे कृष्ण के जप से मनुष्य कभी नहीं थकेगा। भौतिक जगत् में, यदि कोई किसी वस्तु का, किसी प्रिय नाम का, तीन, चार अथवा दस बार जप करे, तो वह उससे ऊब जाएगा। यह तथ्य है। किन्तु क्योंकि हरे कृष्ण भौतिक नहीं है, अतः यदि कोई इस मन्त्र का जप करे, तो वह कभी नहीं थकेगा। जितना अधिक मनुष्य जप करता है, उतना ही अधिक उसका हृदय भौतिक मल से स्वच्छ होता है, और उतनी ही अधिक इस भौतिक जगत् के भीतर उसके जीवन की समस्याएँ हल हो जाती हैं।\n\nहमारे जीवन की समस्या क्या है? यही हम नहीं जानते। आधुनिक शिक्षा जीवन की वास्तविक समस्या के विषय में कभी प्रकाश नहीं देती। इसका संकेत *भगवद्गीता* में दिया गया है। जो शिक्षित हैं और ज्ञान में अग्रसर हो रहे हैं, उन्हें जानना चाहिए कि जीवन की समस्या क्या है। यह समस्या *भगवद्गीता* में बताई गई है: मनुष्य को सदा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग की असुविधाओं को देखना चाहिए। दुर्भाग्यवश कोई भी इन समस्याओं पर ध्यान नहीं देता। जब कोई मनुष्य रोगग्रस्त होता है तो सोचता है, \"ठीक है। मैं चिकित्सक के पास जाता हूँ। वह मुझे कुछ औषधि देगा, और मैं स्वस्थ हो जाऊँगा।\" किन्तु वह इस समस्या पर गम्भीरता से विचार नहीं करता। \"मैं यह रोग नहीं चाहता था। रोग क्यों है? क्या रोग से मुक्त होना सम्भव नहीं?\" वह कभी इस प्रकार नहीं सोचता। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसकी बुद्धि अत्यन्त निम्न श्रेणी की है, ठीक किसी पशु के समान। पशु कष्ट भोगता है, किन्तु उसमें कोई बोध नहीं होता। यदि किसी पशु को वधशाला में लाया जाए और वह देखे कि उसके आगे वाले पशु का वध हो रहा है, तब भी वह वहाँ सन्तुष्ट होकर घास खाता हुआ खड़ा रहेगा। यही पशु-जीवन है। वह नहीं जानता कि अगली बार उसकी बारी होगी और उसका वध होगा। मैंने इसे देखा है। एक काली-मन्दिर में मैंने देखा कि एक बकरा बलि हेतु तैयार खड़ा था और दूसरा बकरा अत्यन्त प्रसन्नता से घास खा रहा था।\n\nइसी प्रकार, महाराज युधिष्ठिर से यमराज ने पूछा, \"इस संसार में सर्वाधिक आश्चर्यजनक वस्तु क्या है? क्या तुम बता सकते हो?\" तब महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, \"हाँ। सर्वाधिक आश्चर्यजनक वस्तु यह है कि प्रत्येक क्षण मनुष्य देख सकता है कि उसके मित्र, उसके पिता एवं उसके सम्बन्धी मर चुके हैं, किन्तु वह सोचता है, 'मैं सदा जीवित रहूँगा।'\" वह कभी यह नहीं सोचता कि वह मरेगा, ठीक जैसे कोई पशु कभी यह नहीं सोचता कि अगले क्षण उसका वध हो सकता है। वह घास से सन्तुष्ट है, बस इतना ही। वह इन्द्रियतृप्ति से सन्तुष्ट है। वह नहीं जानता कि वह भी मरने वाला है।\n\nमेरे पिता मर चुके हैं, मेरी माता मर चुकी है, वह मर चुका है, वह मर चुकी है। अतः मुझे भी मरना ही होगा। तब मृत्यु के पश्चात् क्या? यह मैं नहीं जानता। यही समस्या है। लोग इस समस्या को गम्भीरता से नहीं लेते, किन्तु *भगवद्गीता* संकेत करती है कि वही वास्तविक शिक्षा है। वास्तविक शिक्षा यह जिज्ञासा करना है कि यद्यपि हम मरना नहीं चाहते, फिर भी मृत्यु क्यों आती है। यही वास्तविक जिज्ञासा है। हम वृद्ध नहीं होना चाहते। हम पर वृद्धावस्था क्यों आती है? हमारी अनेक समस्याएँ हैं, किन्तु इन सबका सार यही है।\n\nइस समस्या का समाधान करने हेतु, भगवान् चैतन्य महाप्रभु हरे कृष्ण के जप का विधान करते हैं। ज्यों ही हमारा हृदय इस हरे कृष्ण मन्त्र के जप से स्वच्छ होता है, त्यों ही हमारे समस्याग्रस्त भौतिक अस्तित्व की प्रज्वलित अग्नि बुझ जाती है। यह कैसे बुझती है? जब हम अपने हृदय को स्वच्छ करते हैं तो हमें अनुभूति होती है कि हम इस भौतिक जगत् के नहीं हैं। क्योंकि लोग इस भौतिक जगत् के साथ तादात्म्य करते हैं, अतः वे सोचते हैं, \"मैं भारतीय हूँ, मैं अंग्रेज़ हूँ, मैं यह हूँ, मैं वह हूँ।\" किन्तु यदि कोई हरे कृष्ण मन्त्र का जप करे, तो उसे अनुभूति होगी कि वह यह भौतिक शरीर नहीं है। \"मैं इस भौतिक शरीर अथवा इस भौतिक जगत् का नहीं हूँ। मैं एक आत्मा हूँ, परमेश्वर का अंश। मैं उनके साथ नित्य रूप से सम्बद्ध हूँ, और भौतिक जगत् से मेरा कोई सरोकार नहीं।\" इसी को मुक्ति कहते हैं, ज्ञान। यदि भौतिक जगत् से मेरा कोई सरोकार नहीं, तो मैं मुक्त हूँ। और उस ज्ञान को ब्रह्म-भूत कहते हैं।\n\nऐसी अनुभूति वाले व्यक्ति का कोई कर्तव्य नहीं रहता जिसे सम्पन्न करना हो। क्योंकि हम अब अपने अस्तित्व का तादात्म्य इस भौतिक जगत् से करते हैं, अतः हमारे इतने सारे कर्तव्य हैं। *श्रीमद्भागवत* कहता है कि जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं होता, तब तक हमारे इतने सारे कर्तव्य एवं ऋण हैं। हम देवताओं के ऋणी हैं। देवता मात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे वास्तविक हैं। ऐसे देवता हैं जो सूर्य, चन्द्र एवं वायु पर नियन्त्रण रखते हैं। जैसे सरकारी विभागों के निदेशक होते हैं, वैसे ही ताप-विभाग हेतु सूर्यदेव हैं, वायु-विभाग हेतु वरुण हैं, और इसी प्रकार अन्य विभागीय देवता हैं। *वेदों* में उन्हें नियन्त्रक देवताओं के रूप में वर्णित किया गया है, अतः हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। साथ ही, ऐसे महान् ऋषि एवं दार्शनिक हैं जिन्होंने हमें ज्ञान दिया है, और हम उनके ऋणी हैं। अतः ज्यों ही हम जन्म लेते हैं, हम इतने सारे जीवों के ऋणी हो जाते हैं, किन्तु इन समस्त ऋणों को चुका पाना असम्भव है। अतएव वैदिक साहित्य अनुशंसा करता है कि मनुष्य श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण ले। और श्रीकृष्ण कहते हैं, \"यदि कोई मेरी शरण ले, तो उसे किसी अन्य की शरण लेने की आवश्यकता नहीं रहती।\"\n\nअतएव जो कृष्णभावनाभावित भक्त हैं, उन्होंने श्रीकृष्ण की शरण ले ली है, और इसका आरम्भ श्रवण एवं कीर्तन से होता है। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः [भा. 7.5.23]। अतः सबसे हमारी सादर, विनम्र प्रार्थना है कि कृपया इस जप को स्वीकार करें। कृष्णभावनामृत का यह आन्दोलन पाँच सौ वर्ष पूर्व भगवान् चैतन्य ने बंगाल में प्रवर्तित किया, और अब समस्त भारत में तथा विशेषकर बंगाल में चैतन्य महाप्रभु के लाखों अनुयायी हैं। अब यह आन्दोलन पाश्चात्य देशों में आरम्भ हो रहा है, अतः इसे समझने में अत्यन्त गम्भीर रहें। हम किसी अन्य धर्म की आलोचना नहीं करते। इसे उस रूप में न लें। हमें किसी अन्य धार्मिक प्रक्रिया की आलोचना करने का कोई काम नहीं। कृष्णभावनामृत लोगों को सर्वोच्च धर्म दे रहा है—ईश्वर-प्रेम। बस इतना ही। हम ईश्वर से प्रेम करना सिखा रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति पहले से ही प्रेम कर रहा है, किन्तु वह प्रेम विस्थापित है। हम इस बालक से अथवा इस बालिका से अथवा इस देश से अथवा उस समाज से अथवा बिल्लियों एवं कुत्तों से भी प्रेम करते हैं, किन्तु हम सन्तुष्ट नहीं हैं। अतः हमें अपना प्रेम ईश्वर में स्थापित करना होगा। यदि कोई अपना प्रेम ईश्वर में स्थापित करे, तो वह सुखी होगा।\n\nयह न सोचें कि यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन कोई नवीन प्रकार का धर्म है। वह धर्म कहाँ है जो ईश्वर को स्वीकार न करता हो? कोई ईश्वर को \"अल्लाह\" कहे अथवा \"कृष्ण\" अथवा कुछ और, किन्तु वह धर्म कहाँ है जो ईश्वर को स्वीकार न करता हो? हम सिखा रहे हैं कि मनुष्य को केवल ईश्वर से प्रेम करने का प्रयत्न करना चाहिए। हम इतनी सारी वस्तुओं से आकृष्ट हैं, किन्तु यदि हमारा प्रेम ईश्वर में निहित हो, तो हम सुखी होंगे। हमें किसी अन्य वस्तु से प्रेम करना सीखने की आवश्यकता नहीं; अन्य सब कुछ स्वतः ही सम्मिलित हो जाता है। केवल ईश्वर से प्रेम करने का प्रयत्न करें। मात्र वृक्षों अथवा पौधों अथवा कीटों से प्रेम करने का प्रयत्न न करें। यह कभी सन्तुष्ट नहीं करेगा। ईश्वर से प्रेम करना सीखें। यही चैतन्य महाप्रभु का ध्येय है; यही हमारा ध्येय है।\n\nहरे कृष्ण महामन्त्र का जप\n\nयद्यपि \"हरे कृष्ण\" एक घर-घर का शब्द बन गया है, फिर भी व्यावहारिक रूप से कोई नहीं जानता कि इसका क्या अर्थ है। क्या यह मात्र एक पुनरावृत्तिमूलक मन्त्रोच्चार है जो अपने अभ्यासियों को सम्मोहित करने हेतु रचा गया है? क्या यह पलायनवाद का एक रूप है? अथवा क्या यह एक वास्तविक ध्यान है जो वस्तुतः उच्चतर चेतना का आह्वान कर सकता है? इस लघु निबन्ध में, जो 1966 के अन्त में उनके प्रथम एलपी पर अभिलिखित हुआ, श्रील प्रभुपाद हरे कृष्ण मन्त्र के आन्तरिक अर्थ को प्रकाशित करते हैं।\n\nहरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के जप से स्थापित दिव्य ध्वनि-कम्पन हमारी दिव्य चेतना को पुनर्जीवित करने की उदात्त विधि है। जीवित आध्यात्मिक आत्माओं के रूप में, हम सब मूलतः कृष्णभावनाभावित सत्ताएँ हैं, किन्तु अनादि काल से जड़ पदार्थ के साथ अपने सम्पर्क के कारण, हमारी चेतना अब भौतिक वातावरण से दूषित हो गई है। जिस भौतिक वातावरण में हम अब रह रहे हैं, उसे माया अथवा भ्रम कहते हैं। माया का अर्थ है \"जो नहीं है\"। और यह भ्रम क्या है? भ्रम यह है कि हम सब भौतिक प्रकृति के स्वामी बनने का प्रयत्न कर रहे हैं, जबकि वस्तुतः हम उसके कठोर नियमों की पकड़ में हैं। जब कोई सेवक कृत्रिम रूप से सर्वशक्तिमान् स्वामी का अनुकरण करने का प्रयत्न करता है, तो उसे भ्रम में कहा जाता है। हम भौतिक प्रकृति के संसाधनों का दोहन करने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु वस्तुतः हम उसकी जटिलताओं में अधिकाधिक उलझते जा रहे हैं। अतएव, यद्यपि हम प्रकृति पर विजय पाने के कठिन संघर्ष में संलग्न हैं, फिर भी हम उस पर सदा अधिक निर्भर होते जाते हैं। भौतिक प्रकृति के विरुद्ध यह भ्रामक संघर्ष हमारे नित्य कृष्णभावनामृत के पुनरुज्जीवन से तत्क्षण रोका जा सकता है।\n\nहरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे इस मूल, शुद्ध चेतना को पुनर्जीवित करने की दिव्य प्रक्रिया है। इस दिव्य ध्वनि-कम्पन का जप करके, हम अपने हृदयों के भीतर के समस्त भ्रमों को स्वच्छ कर सकते हैं। ऐसे समस्त भ्रमों का मूल सिद्धान्त यह मिथ्या चेतना है कि जो कुछ मैं देखता हूँ, उन सबका मैं स्वामी हूँ।\n\nकृष्णभावनामृत मन पर कोई कृत्रिम आरोपण नहीं है। यह चेतना जीव की मूल, स्वाभाविक ऊर्जा है। जब हम इस दिव्य ध्वनि-कम्पन को सुनते हैं, तो यह चेतना पुनर्जीवित हो जाती है। ध्यान की यह सरलतम विधि इस युग हेतु अनुशंसित है। व्यावहारिक अनुभव से भी, मनुष्य अनुभव कर सकता है कि इस महामन्त्र, अथवा मुक्ति हेतु महान् जप, का जप करके मनुष्य आध्यात्मिक स्तर से आती हुई एक दिव्य परमानन्दानुभूति को तत्क्षण अनुभव कर सकता है। जीवन की भौतिक धारणा में हम इन्द्रियतृप्ति के विषय में व्यस्त रहते हैं, मानो हम निम्न, पशु-अवस्था में हों। इन्द्रियतृप्ति की इस अवस्था से कुछ ऊपर उठकर, मनुष्य भौतिक पकड़ से बाहर निकलने के प्रयोजन से मानसिक कल्पना में संलग्न होता है। इस कल्पनात्मक अवस्था से कुछ ऊपर उठकर, जब मनुष्य पर्याप्त बुद्धिमान् होता है, तो वह समस्त कारणों के परम कारण को—भीतर एवं बाहर—खोजने का प्रयत्न करता है। और जब मनुष्य तथ्यतः आध्यात्मिक बोध के तल पर होता है, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि की अवस्थाओं को लाँघकर, तब वह दिव्य तल पर होता है। हरे कृष्ण मन्त्र का यह जप आध्यात्मिक स्तर से सम्पन्न होता है, और इस प्रकार यह ध्वनि-कम्पन चेतना के समस्त निम्न स्तरों को—अर्थात् ऐन्द्रिक, मानसिक एवं बौद्धिक—लाँघ जाता है। अतएव, न तो मन्त्र की भाषा को समझने की आवश्यकता है, न इस महामन्त्र के जप हेतु किसी मानसिक कल्पना अथवा किसी बौद्धिक समायोजन की। यह आध्यात्मिक स्तर से स्वतः होता है, और इसी कारण कोई भी बिना किसी पूर्व योग्यता के जप में भाग ले सकता है। निस्सन्देह, अधिक उन्नत अवस्था में, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह आध्यात्मिक बोध के आधार पर अपराध न करे।\n\nआरम्भ में, समस्त दिव्य परमानन्दानुभूतियों की उपस्थिति नहीं हो सकती, जो संख्या में आठ हैं। ये हैं: (1) मानो गूँगा हो जाने के समान स्तब्ध होना, (2) स्वेद, (3) शरीर के रोमों का खड़ा हो जाना, (4) स्वर का अवरुद्ध होना, (5) कम्पन, (6) शरीर का विवर्ण होना, (7) परमानन्द में रुदन, और (8) समाधि। किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि कुछ काल तक जप मनुष्य को तत्क्षण आध्यात्मिक स्तर पर ले जाता है, और इसका प्रथम लक्षण मनुष्य मन्त्र के जप के साथ नाचने की उत्कण्ठा में प्रकट करता है। हमने इसे व्यावहारिक रूप से देखा है। एक बालक भी जप एवं नृत्य में भाग ले सकता है। निस्सन्देह, जो भौतिक जीवन में अत्यधिक उलझा है, उसे मानक बिन्दु तक आने में कुछ अधिक समय लगता है, किन्तु ऐसा भौतिकता में लीन मनुष्य भी अत्यन्त शीघ्र आध्यात्मिक स्तर पर उठ जाता है। जब मन्त्र का जप भगवान् के किसी शुद्ध भक्त द्वारा प्रेमपूर्वक किया जाता है, तो उसका श्रोताओं पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, और इसी कारण यह जप भगवान् के किसी शुद्ध भक्त के मुख से सुना जाना चाहिए, ताकि तत्काल प्रभाव प्राप्त किया जा सके। यथासम्भव, अभक्तों के मुख से जप सुनने से बचना चाहिए। सर्प के मुख से स्पर्शित दूध के विषैले प्रभाव होते हैं।\n\nहरा शब्द भगवान् की ऊर्जा को सम्बोधित करने का रूप है, और कृष्ण एवं राम शब्द स्वयं भगवान् को सम्बोधित करने के रूप हैं। कृष्ण एवं राम दोनों का अर्थ है \"परम सुख\", और हरा भगवान् की परम सुख-ऊर्जा है, जो सम्बोधन में बदलकर हरे हो जाती है। भगवान् की परम सुख-ऊर्जा हमें भगवान् तक पहुँचने में सहायता करती है।\n\nभौतिक ऊर्जा, जिसे माया कहते हैं, भी भगवान् की बहुविध ऊर्जाओं में से एक है। और हम, जीव भी भगवान् की ऊर्जा हैं, तटस्थ ऊर्जा। जीवों को भौतिक ऊर्जा से श्रेष्ठ बताया गया है। जब श्रेष्ठ ऊर्जा निम्न ऊर्जा के सम्पर्क में आती है, तो एक असंगत स्थिति उत्पन्न होती है; किन्तु जब श्रेष्ठ तटस्थ ऊर्जा श्रेष्ठ ऊर्जा, हरा, के सम्पर्क में आती है, तो वह अपनी सुखमय, स्वाभाविक अवस्था में स्थापित हो जाती है।\n\nये तीन शब्द, अर्थात् हरे, कृष्ण एवं राम, महामन्त्र के दिव्य बीज हैं। यह जप बद्धजीव को रक्षा प्रदान करने हेतु भगवान् एवं उनकी ऊर्जा के लिए एक आध्यात्मिक पुकार है। यह जप ठीक उस बालक के यथार्थ क्रन्दन के समान है जो अपनी माता की उपस्थिति हेतु करता है। माता हरा भक्त को पिता भगवान् की कृपा प्राप्त करने में सहायता करती हैं, और जो भक्त इस मन्त्र का निष्ठापूर्वक जप करता है, उसके समक्ष भगवान् स्वयं को प्रकट करते हैं।\n\nकलह एवं कपट के इस युग में आध्यात्मिक साक्षात्कार का कोई अन्य साधन इस महामन्त्र के जप के समान प्रभावी नहीं है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।\n\nकृष्णभावनामृत—आधुनिक युग का योग\n\nआजकल हम योग को अनेक पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता और जन-बाज़ार की पुस्तकों में स्वास्थ्य प्राप्त करने, वजन घटाने, दूसरों पर मानसिक शक्ति विकसित करने, धन कमाने में सफलता प्राप्त करने, अथवा यौन-सामर्थ्य बढ़ाने के साधन के रूप में प्रचारित होते देखते हैं। किन्तु वास्तविक योग कुछ पूर्णतया भिन्न वस्तु है। यहाँ श्रील प्रभुपाद हमें वास्तविक योग के विषय में कुछ प्राचीन रहस्यों से अवगत कराते हैं।\n\nceto-darpaṇa-mārjanaṁ bhava-mahā-dāvāgni-nirvāpaṇaṁ\n\nśreyaḥ-kairava-candrikā-vitaraṇaṁ vidyā-vadhū-jīvanam\n\nānandāmbudhi-vardhanaṁ prati-padaṁ pūrṇāmṛtāsvādanaṁ\n\nsarvātma-snapanaṁ paraṁ vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam\n\n[Cc. Antya 20.12]\n\nसंकीर्तन-आन्दोलन की जय हो। परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने, जब वे मात्र सोलह वर्ष के बालक थे, पाँच सौ वर्ष पूर्व भारत के नवद्वीप में इस संकीर्तन-आन्दोलन को प्रवर्तित किया। ऐसा नहीं था कि उन्होंने कोई धार्मिक प्रणाली गढ़ी, जैसा आजकल इतनी सारी धार्मिक प्रणालियाँ गढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः धर्म गढ़ा नहीं जा सकता। धर्मं तु साक्षाद् भगवत्-प्रणीतम् [भा. 6.3.19]। धर्म का अर्थ है ईश्वर के विधान, ईश्वर के नियम, बस इतना ही। निश्चय ही हम राज्य के नियमों का पालन किए बिना जीवित नहीं रह सकते, और इसी प्रकार हम ईश्वर के नियमों का पालन किए बिना जीवित नहीं रह सकते। और *भगवद्गीता* (4.7) में भगवान् कहते हैं कि जब-जब धार्मिक गतिविधियों के अनुष्ठान में विसंगतियाँ आती हैं (यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत) और अधार्मिक गतिविधियों की प्रधानता होती है (अभ्युत्थानम् अधर्मस्य), तब-तब मैं (कृष्ण) प्रकट होता हूँ (तदात्मानं सृजाम्यहम्)। और भौतिक जगत् में हम वही सिद्धान्त प्रदर्शित होते देख सकते हैं, क्योंकि जब-जब राज्य के नियमों की अवज्ञा होती है, तब-तब \"व्यवस्था ठीक करने\" हेतु किसी विशेष राज्य-अधिकारी अथवा आरक्षक का आगमन होता है।\n\nभगवान् चैतन्य महाप्रभु की आराधना गोस्वामीगण करते हैं। छह गोस्वामी थे: रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट गोस्वामी, एवं श्री रघुनाथ दास गोस्वामी। गो के तीन अर्थ हैं। गो का अर्थ है \"भूमि\", गो का अर्थ है \"गौ\", और गो का अर्थ है \"इन्द्रियाँ\"। और स्वामी का अर्थ है \"स्वामी\"। अतः गोस्वामी का अर्थ है कि वे इन्द्रियों के स्वामी थे। जब कोई इन्द्रियों का स्वामी, अथवा गोस्वामी, बन जाता है, तो वह आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कर सकता है। यही स्वामी का वास्तविक अर्थ है। स्वामी का अर्थ है कि मनुष्य इन्द्रियों का सेवक नहीं, अपितु उनका स्वामी है।\n\nइन छह गोस्वामियों में से एक, रूप गोस्वामी, प्रमुख थे, और उन्होंने भगवान् चैतन्य महाप्रभु के सम्मान में एक सुन्दर श्लोक की रचना की। वे कहते हैं:\n\nanarpita-carīṁ cirāt karuṇayāvatīrṇaḥ kalau\n\nsamarpayitum unnatojjvala-rasāṁ sva-bhakti-śriyam\n\nhariḥ puraṭa-sundara-dyuti-kadamba-sandīpitaḥ\n\nsadā hṛdaya-kandare sphuratu vaḥ śacī-nandanaḥ\n\n(*Caitanya-caritāmṛta*, Ādi 1.4)\n\nकलौ का अर्थ है यह युग, यह कलियुग, लौह युग, जो अत्यधिक दूषित है, कलह एवं असहमति का युग। रूप गोस्वामी कहते हैं कि इस कलियुग में, जब सब कुछ असहमति एवं कलह है, \"आप ईश्वर का सर्वोच्च प्रेम प्रदान करने हेतु अवतरित हुए हैं।\" समर्पयितुम् उन्नतोज्ज्वल-रसाम्: और केवल सर्वोच्च ही नहीं, अपितु एक अत्यन्त उज्ज्वल रस, अथवा दिव्य रस। पुरट-सुन्दर-द्युति: आपकी कान्ति स्वर्ण के समान है, स्वर्ण की द्युति के समान। \"आप इतने कृपालु हैं कि मैं सबको आशीर्वाद देता हूँ [गोस्वामीगण आशीर्वाद दे सकते हैं क्योंकि वे इन्द्रियों के स्वामी हैं] कि भगवान् का यह रूप, भगवान् चैतन्य महाप्रभु, सदा सबके हृदय में नाचता रहे।\"\n\nजब रूप गोस्वामी ने प्रयाग में भगवान् चैतन्य महाप्रभु से प्रथम बार भेंट की, तो भगवान् चैतन्य मार्ग में जप करते और नाचते हुए \"हरे कृष्ण, हरे कृष्ण\" कह रहे थे। उस समय भी रूप गोस्वामी ने एक प्रार्थना अर्पित की। नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते: [मध्य 19.53] \"ओह, आप समस्त अवतारों में सर्वाधिक उदार हैं क्योंकि आप ईश्वर-प्रेम का वितरण कर रहे हैं।\" कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते/ कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः: \"आप स्वयं कृष्ण हैं, क्योंकि यदि आप कृष्ण न होते तो आप कृष्ण-प्रेम, अथवा ईश्वर-प्रेम का वितरण न कर पाते, क्योंकि कृष्ण-प्रेम इतनी सरलता से प्राप्त नहीं होता। किन्तु आप इस प्रेम का निःशुल्क वितरण सबको कर रहे हैं।\"\n\nइस प्रकार संकीर्तन-आन्दोलन का प्रवर्तन भारत के बंगाल में, नवद्वीप में हुआ। इस अर्थ में, बंगाली अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि उनके देश में इस आन्दोलन का प्रवर्तन भगवान् चैतन्य ने किया, जिन्होंने भविष्यवाणी की:\n\npṛthivīte ache yata nagarādi grāma\n\nsarvatra pracāra haibe mora nāma\n\n\"समस्त गाँवों एवं नगरों में, सम्पूर्ण विश्व में, सर्वत्र, इस संकीर्तन-आन्दोलन का प्रचार होगा।\" यही उनकी भविष्यवाणी है।\n\nअतः भगवान् चैतन्य की कृपा से, यह आन्दोलन पाश्चात्य देशों में पहले ही प्रवर्तित हो चुका है, जिसका आरम्भ न्यूयॉर्क से हुआ। हमारा संकीर्तन-आन्दोलन सर्वप्रथम 1966 में न्यूयॉर्क में प्रवर्तित हुआ। उस समय मैं आया और टॉम्पकिन्स स्क्वायर में इस हरे कृष्ण मन्त्र का जप करने लगा। मैं वहाँ एक छोटी मृदंग (ढोल) के साथ तीन घंटे तक जप कर रहा था, और ये अमेरिकी बालक एकत्र हुए और क्रमशः सम्मिलित हो गए, और इस प्रकार यह बढ़ रहा है। सर्वप्रथम इसका आरम्भ न्यूयॉर्क के एक भण्डार-कक्ष में, 26 सेकंड एवेन्यू में हुआ, फिर हमने सैन फ्रांसिस्को, मॉन्ट्रियल, बोस्टन, लॉस एंजिल्स, बफ़ेलो, कोलंबस में अपनी शाखाएँ आरम्भ कीं। अब हमारी [1970] चौबीस शाखाएँ हैं, जिनमें एक लंदन में एवं एक हैम्बर्ग में है। लंदन में वे सब अमेरिकी बालक एवं बालिकाएँ हैं, और वे प्रचार कर रहे हैं। वे न तो संन्यासी हैं, न वेदान्ती, न हिन्दू, न भारतीय, किन्तु उन्होंने इस आन्दोलन को अत्यन्त गम्भीरता से लिया है। लंदन टाइम्स में भी एक लेख इस शीर्षक से छपा, \"कृष्ण-जप ने लंदन को चकित कर दिया।\" अतः अब हमारे आन्दोलन में अनेक लोग हैं। मेरे सभी शिष्य, कम-से-कम इस देश में, अमेरिकी एवं यूरोपीय हैं। वे जप कर रहे हैं, नाच रहे हैं, और एक पत्रिका, बैक टू गॉडहेड, का वितरण कर रहे हैं। अब हमने अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं—*श्रीमद्भागवत*, *भगवद्गीता यथारूप*, *भगवान् चैतन्य की शिक्षाएँ*, एवं *ईशोपनिषद्*। ऐसा नहीं कि यह आन्दोलन मात्र एक भावुकतापूर्ण आन्दोलन है। यह न सोचें कि ये बालक किसी धार्मिक भावुकता अथवा कट्टरता से नाच रहे हैं। नहीं। हमारी पृष्ठभूमि सर्वोच्च दार्शनिक एवं ब्रह्मविद्यात्मक है।\n\nउदाहरण के रूप में, हम चैतन्य महाप्रभु पर विचार करें। जब वे प्रचार कर रहे थे, तो वे बनारस गए, जो मायावादी संन्यासियों का केन्द्र है। शंकराचार्य के अनुयायी अधिकतर बनारस में देखे जाते हैं। जब चैतन्य महाप्रभु वहाँ थे, तो वे जप एवं नृत्य कर रहे थे। कुछ लोगों ने इसकी अत्यधिक सराहना की, और इस प्रकार वे शीघ्र प्रसिद्ध हो गए। एक प्रमुख संन्यासी, प्रकाशानन्द सरस्वती, जो अनेक सहस्र मायावादी संन्यासियों के नेता थे, को सूचित किया गया: \"ओह, बंगाल से एक युवा संन्यासी आया है। वह इतनी सुन्दरता से जप एवं नृत्य कर रहा है।\" प्रकाशानन्द सरस्वती एक महान् वेदान्ती थे, और उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा, \"ओह, वह एक कूट संन्यासी है। वह जप एवं नृत्य कर रहा है, और यह संन्यासी का काम नहीं है। संन्यासी को सदा दर्शन एवं वेदान्त के अध्ययन में स्वयं को संलग्न रखना चाहिए।\"\n\nतब उन भक्तों में से एक, जिसे प्रकाशानन्द सरस्वती की टिप्पणी अच्छी नहीं लगी, लौटकर आया और उसने भगवान् चैतन्य को सूचित किया कि उनकी आलोचना की जा रही है। अतः उस भक्त ने समस्त संन्यासियों की एक सभा आयोजित की, और प्रकाशानन्द सरस्वती एवं भगवान् चैतन्य महाप्रभु के बीच वेदान्त पर एक दार्शनिक चर्चा हुई। ये विवरण एवं दार्शनिक चर्चाएँ हमारी *भगवान् चैतन्य की शिक्षाएँ* में दी गई हैं। यह उल्लेखनीय है कि प्रकाशानन्द स्वयं अपने समस्त शिष्यों सहित वैष्णव बन गए।\n\nइसी प्रकार, चैतन्य महाप्रभु की उस समय के सबसे बड़े तार्किक सार्वभौम भट्टाचार्य के साथ एक महान् चर्चा हुई, जो मायावादी, निर्विशेषवादी भी थे, और वे भी परिवर्तित हो गए। अतः चैतन्य महाप्रभु का आन्दोलन मात्र भावुकता नहीं है। यदि कोई इस संकीर्तन-आन्दोलन को दर्शन एवं तर्क के माध्यम से समझना चाहे, तो इसकी एक अत्यन्त समृद्ध पृष्ठभूमि है। पर्याप्त अवसर है, क्योंकि यह आन्दोलन विज्ञान पर तथा *वेदों* के प्रामाण्य पर आधारित है। किन्तु यह सब सरलीकृत है। यही इस आन्दोलन की सुन्दरता है। कोई महान् विद्वान् हो अथवा दार्शनिक अथवा बालक, वह बिना किसी कठिनाई के भाग ले सकता है। आत्म-साक्षात्कार की अन्य प्रणालियाँ, ज्ञान-प्रक्रिया अथवा योग-प्रक्रिया, भी मान्य हैं, किन्तु इस युग में उनका अभ्यास करना सम्भव नहीं। यही *वेदों* का निर्णय है:\n\nkṛte yad dhyāyato viṣṇuṁ\n\ntretāyāṁ yajato makhaiḥ\n\ndvāpare paricaryāyāṁ\n\nkalau tad dhari-kīrtanāt\n\n(*Śrīmad-Bhāgavatam* 12.3.52)\n\nसत्ययुग, स्वर्ण युग में, ध्यान-प्रक्रिया को सम्पन्न करना सम्भव था। उदाहरणार्थ, वाल्मीकि मुनि ने पूर्णता प्राप्त करने हेतु साठ हज़ार वर्ष तक ध्यान किया। किन्तु हमारी इतनी आयु कहाँ? इसके अतिरिक्त, ध्यान-प्रक्रिया हेतु, जैसा *भगवद्गीता* में वर्णित है, मनुष्य को एक एकान्त स्थान चुनना होता है, उसे इसे अकेले सम्पन्न करना होता है, उसे एक दृढ़ आसन में बैठना होता है, उसे पूर्ण ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करना होता है, इत्यादि। अनेक नियम एवं विधान हैं। अतः अष्टांग-योग का ध्यान सम्भव नहीं। यदि कोई अनुकरण से सन्तुष्ट है, तो वह भिन्न बात है, किन्तु यदि कोई पूर्णता चाहता है, तो उसे अष्टांग-योग की समस्त आठ अवस्थाओं को सम्पन्न करना होगा। यदि यह सम्भव नहीं, तो यह समय का अपव्यय है।\n\nयोग-प्रक्रिया अथवा ध्यान का परम लक्ष्य क्या है? परमेश्वर, परमात्मा, परम भगवान् के साथ सम्पर्क ही समस्त योग-प्रक्रियाओं का लक्ष्य एवं उद्देश्य है। इसी प्रकार, दार्शनिक अनुसन्धान, ज्ञान-प्रक्रिया, भी परब्रह्म को समझने का लक्ष्य रखती है। ये मान्य प्रक्रियाएँ हैं, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु प्रामाणिक वर्णन के अनुसार, वे कलि के इस लौह युग में व्यावहारिक नहीं हैं। अतएव मनुष्य को हरि-कीर्तन की इस प्रक्रिया को अपनाना होता है। कोई भी बिना पूर्व-योग्यता के अभ्यास कर सकता है। मनुष्य को दर्शन अथवा वेदान्त पढ़ने की आवश्यकता नहीं। यही प्रकाशानन्द सरस्वती के साथ भगवान् चैतन्य की भेंट का तात्पर्य था।\n\nजब भगवान् चैतन्य एवं प्रकाशानन्द सरस्वती के बीच वेदान्त-दर्शन पर भली-भाँति चर्चा हुई, तो प्रकाशानन्द सरस्वती ने सर्वप्रथम चैतन्य महाप्रभु से पूछा, \"मैं समझता हूँ कि आप अपने प्रारम्भिक जीवन में एक अत्यन्त अच्छे विद्वान् थे। [भगवान् चैतन्य वस्तुतः एक अत्यन्त महान् विद्वान् थे। उनका नाम निमाई पण्डित था, और सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने कश्मीर के एक महान् विद्वान्, केशव काश्मीरी, को पराजित किया था।] और मैं समझता हूँ कि आप एक महान् संस्कृत विद्वान् हैं, और विशेषकर तर्क में आप एक अत्यन्त विद्वान् हैं। आप एक ब्राह्मण कुल में भी जन्मे थे, और अब आप संन्यासी हैं। ऐसा कैसे कि आप जप एवं नृत्य कर रहे हैं और वेदान्त नहीं पढ़ रहे?\" यह प्रकाशानन्द सरस्वती द्वारा पूछा गया प्रथम प्रश्न था, और भगवान् चैतन्य ने उत्तर दिया, \"हाँ, कारण यह है कि जब मेरे आध्यात्मिक गुरु द्वारा मुझे दीक्षा दी गई, तो उन्होंने कहा कि मैं मूर्ख नम्बर एक हूँ। 'तुम वेदान्त की चर्चा मत करो,' उन्होंने मुझसे कहा। 'तुम केवल अपना समय नष्ट करोगे। बस हरे कृष्ण के इस जप को अपनाओ, और तुम सफल हो जाओगे।'\" यही उनका उत्तर था। निस्सन्देह, चैतन्य महाप्रभु मूर्ख नहीं थे, और निश्चय ही वेदान्त मूर्खों के लिए नहीं है। मनुष्य को पर्याप्त शिक्षा चाहिए, और वेदान्त समझने से पूर्व उसे एक निश्चित स्तर प्राप्त करना होता है। प्रत्येक एक-एक शब्द में अर्थों के ग्रन्थ भरे हैं, और शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य द्वारा अनेक भाष्य हैं, संस्कृत में विशाल ग्रन्थ। किन्तु हम वेदान्त को कैसे समझें? यह सम्भव नहीं। एक अथवा दो व्यक्तियों के लिए समझना सम्भव हो सकता है, किन्तु जन-समूह के लिए यह सम्भव नहीं। न ही योग का अभ्यास करना सम्भव है। अतएव, यदि कोई चैतन्य महाप्रभु की विधि, हरे कृष्ण के जप को अपनाए, तो लाभ की प्रथम किस्त होगी चेतो-दर्पण-मार्जनम्: [चै.च. अन्त्य 20.12] केवल जप से ही हृदय की समस्त मलिन वस्तुएँ स्वच्छ हो जाएँगी। जप करें। न कोई व्यय है और न कोई हानि। यदि कोई मात्र एक सप्ताह जप करे, तो वह देखेगा कि वह आध्यात्मिक ज्ञान में कितनी प्रगति करेगा।\n\nहम मात्र जप से अनेक विद्यार्थियों को आकृष्ट कर रहे हैं, और वे सम्पूर्ण दर्शन को समझ रहे हैं और शुद्ध हो रहे हैं। इस संघ का आन्दोलन मात्र चार वर्ष पूर्व, 1966 में आरम्भ हुआ, और हमारी पहले ही इतनी सारी शाखाएँ हैं। अमेरिकी बालक एवं बालिकाएँ इसे अत्यन्त गम्भीरता से ले रहे हैं, और वे सुखी हैं। उनमें से किसी से भी पूछें। चेतो-दर्पण-मार्जनम्। वे हृदय की मलिन वस्तुओं को मात्र हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे के जप से स्वच्छ कर रहे हैं।\n\nअगला बिन्दु है भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणम्: ज्यों ही हृदय समस्त मलिन वस्तुओं से स्वच्छ होता है, त्यों ही भौतिक अस्तित्व की समस्त समस्याएँ तत्क्षण हल हो जाती हैं। इस संसार की तुलना दावाग्नि से की गई है, जिसका अर्थ है वन में प्रज्वलित अग्नि। इस भौतिक अस्तित्व में कोई दुःख नहीं चाहता, किन्तु वह बलपूर्वक आ जाता है। यही भौतिक प्रकृति का नियम है। कोई अग्नि नहीं चाहता, किन्तु नगर में हम जहाँ भी जाएँ, अग्निशमन दल सदा सक्रिय रहता है। अग्नि सदा रहती है। इसी प्रकार, अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो कोई नहीं चाहता। कोई मृत्यु नहीं चाहता—मृत्यु है। कोई रोग नहीं चाहता—रोग है। कोई वृद्धावस्था नहीं चाहता—वृद्धावस्था है। वे विद्यमान हैं, हमारी इच्छा के विरुद्ध, हमारी अभिलाषा के विरुद्ध।\n\nअतः हमें इस भौतिक अस्तित्व की अवस्था पर विचार करना चाहिए। यह मानव जीवन-रूप समझने के लिए है, न कि खाने, सोने, मैथुन एवं रक्षण द्वारा पशुओं के समान बहुमूल्य जीवन को नष्ट करने के लिए। यह सभ्यता की उन्नति नहीं है। *भागवत* कहता है कि यह शरीर मात्र इन्द्रियतृप्ति हेतु कठोर परिश्रम करने के लिए नहीं है।\n\nnāyaṁ deho deha-bhājāṁ nṛ-loke\n\nkaṣṭān kāmān arhate viḍ-bhujāṁ ye\n\n(Bhāg. 5.5.1)\n\nअत्यन्त कठोर परिश्रम करके इन्द्रियतृप्ति द्वारा स्वयं को तृप्त करना सूअरों का काम है, मनुष्यों का नहीं। मनुष्य को तपस्या सीखनी चाहिए। विशेषकर भारत में, इतने सारे महान् ऋषियों, इतने सारे महान् राजाओं, तथा इतने सारे ब्रह्मचारियों एवं संन्यासियों ने महान् तपस्या में अपना जीवन व्यतीत किया है, ताकि आगे और निद्रा में न जाएँ। भगवान् बुद्ध एक राजकुमार थे जिन्होंने सब कुछ त्यागकर स्वयं को तपस्या में संलग्न किया। यही जीवन है। जब राजा भरत, जिनके नाम पर भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा, चौबीस वर्ष के थे, तो उन्होंने अपना राज्य, अपनी युवा पत्नी, एवं युवा सन्तानों को त्यागकर तपस्या हेतु चले गए। जब भगवान् चैतन्य महाप्रभु मात्र चौबीस वर्ष के थे, तो उन्होंने अपनी युवा पत्नी, माता, सब कुछ त्याग दिया। अनेकानेक उदाहरण हैं। भारत तपस्या की भूमि है, किन्तु हम उसे भूलते जा रहे हैं। अब हम इसे प्रौद्योगिकी की भूमि बना रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि भारत अब इस तपस्या का प्रचार नहीं कर रहा, क्योंकि भारत धर्म की भूमि है: धर्म-क्षेत्रे कुरु-क्षेत्रे [भ.गी. 1.1]।\n\nकिन्तु यह केवल भारत में ही नहीं; इस लौह युग में सर्वत्र सब कुछ पतित है, इस अर्थ में पतित: प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलाव् अस्मिन् युगे जनाः (भाग. 1.1.10)। इस कलियुग में आयु की अवधि घट गई है, और मनुष्य आत्म-साक्षात्कार को समझने हेतु प्रेरित नहीं होते, और यदि होते भी हैं, तो वे अनिवार्यतः इतने सारे छली नेताओं द्वारा भटका दिए जाते हैं। यह युग अत्यन्त भ्रष्ट है। अतएव चैतन्य महाप्रभु की हरे कृष्ण जप की प्रक्रिया सर्वोत्तम एवं सरलतम विधि है।\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[Adi 17.21]\n\n\"इस कलियुग में भगवान् के पवित्र नाम के उच्चारण द्वारा उनकी महिमा गाने के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म नहीं है, और यही समस्त प्रकट शास्त्रों का आदेश है। कोई अन्य मार्ग नहीं, कोई अन्य मार्ग नहीं, कोई अन्य मार्ग नहीं है।\" यह श्लोक बृहन्नारदीय पुराण में आता है। हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। केवल हरे कृष्ण का जप करें। कोई अन्य विकल्प नहीं है। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिर् अन्यथा। इस युग, कलि में, आत्म-साक्षात्कार हेतु कोई अन्य विकल्प नहीं है। अतः हमें इसे स्वीकार करना होगा।\n\n*श्रीमद्भागवत* में एक अन्य समान श्लोक है। बारहवें स्कन्ध, तृतीय अध्याय में, परीक्षित महाराज को शुकदेव गोस्वामी ने इस युग के दोषों के विषय में बताया, और अब कलियुग के समस्त लक्षण प्रकट हैं। तथापि, निष्कर्षात्मक भाग में, शुकदेव गोस्वामी ने कहा, कलेर् दोष-निधे राजन्न् अस्ति ह्य् एको महान् गुणः: \"हे प्रिय राजन्, यह युग, कलि, दोषपूर्ण वस्तुओं से भरा है, किन्तु इसमें एक अच्छा अवसर है।\" वह क्या है? कीर्तनाद् एव कृष्णस्य मुक्त-संगः परं व्रजेत्: \"केवल इस हरे कृष्ण मन्त्र के जप से मनुष्य मुक्त हो सकता है और भगवद्धाम लौट सकता है।\"\n\nयह व्यावहारिक एवं प्रामाणिक है, और मनुष्य मात्र जप करके स्वयं की परीक्षा भी कर सकता है कि वह कैसे प्रगति कर रहा है। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन कोई नवीन वस्तु नहीं है, कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हमने प्रवर्तित अथवा गढ़ा हो। यह वैदिक सिद्धान्तों पर प्रामाणित है, चैतन्य महाप्रभु एवं अन्य आचार्यगण द्वारा प्रामाणित है। और विधि अत्यन्त सरल है; कोई हानि नहीं है। हम कुछ शुल्क नहीं ले रहे, हम कोई फ़ीस नहीं माँग रहे और लोगों को कोई गुप्त मन्त्र देकर यह वचन नहीं दे रहे कि छह महीने के भीतर वे ईश्वर बन जाएँगे। नहीं। यह सबके लिए खुला है—बच्चों, स्त्रियों, बालिकाओं, बालकों, वृद्ध जनों—सब जप कर सकते हैं और परिणाम देख सकते हैं।\n\nइस ध्येय को आगे बढ़ाने हेतु हम न केवल वेस्ट वर्जीनिया में अपनी कृषि-परियोजना न्यू वृन्दावन की स्थापना कर रहे हैं, अपितु अन्य आध्यात्मिक समुदायों, जैसे न्यू नवद्वीप एवं न्यू जगन्नाथ पुरी की भी स्थापना कर रहे हैं। हमने सैन फ्रांसिस्को में न्यू जगन्नाथ पुरी पहले ही आरम्भ कर दिया है, और रथयात्रा उत्सव चल रहा है। इस वर्ष लंदन में भी रथयात्रा का एक महान् समारोह होगा। तीन रथ होंगे, जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलराम के लिए, और उन्हें टेम्स नदी तक ले जाया जाएगा। और अमेरिका ने न्यू इंग्लैंड एवं न्यूयॉर्क का आयात किया है, तो न्यू वृन्दावन क्यों नहीं? हमें विशेषकर इस न्यू वृन्दावन की स्थापना करनी चाहिए, क्योंकि भगवान् चैतन्य ने अनुशंसा की, आराध्यो भगवान् व्रजेश-तनयस् तद्-धाम वृन्दावनम्: \"व्रजभूमि के वृन्दावन-धाम में नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण परम आराध्य देव हैं, और उनका स्थान वृन्दावन भी आराध्य है।\" पाश्चात्य बालक एवं बालिकाएँ कृष्णभावनामृत को अपना रहे हैं, और उनके पास वृन्दावन जैसा एक स्थान होना चाहिए। स्वामी कीर्तनानन्द, जो दो वर्ष पूर्व मेरे साथ वृन्दावन गए थे, जानते हैं कि वृन्दावन कैसा है, अतः मैंने उन्हें कम-से-कम सात मन्दिर निर्मित करने का निर्देश दिया है। वृन्दावन में राधा-कृष्ण के पाँच हज़ार मन्दिर हैं, किन्तु सबसे प्रमुख मन्दिर सात हैं, जो गोस्वामियों द्वारा स्थापित हैं। हमारा कार्यक्रम है न्यू वृन्दावन में रहना, आर्थिक समाधान के रूप में कृषि एवं गौओं पर निर्भर रहना, और शान्तिपूर्वक कृष्णभावनामृत का अनुष्ठान करना, हरे कृष्ण का जप करना—यही वृन्दावन-योजना है। युक्ताहार-विहारस्य... योगो भवति दुःख-हा (*भगवद्गीता* 6.17)। यह मानव जीवन-रूप कृत्रिम आवश्यकताओं को बढ़ाने के लिए नहीं है। हमें केवल शरीर एवं आत्मा को एक साथ बनाए रखने में सन्तुष्ट रहना चाहिए, और शेष समय हमें अपने कृष्णभावनामृत को बढ़ाना चाहिए, ताकि इस शरीर को त्यागने के पश्चात् हमें कोई अन्य भौतिक शरीर न लेना पड़े, अपितु हम घर, भगवद्धाम लौट सकें। यही मानव जीवन का ध्येय-वाक्य होना चाहिए।\n\nभौतिक जीवन का अर्थ है खाना, सोना, मैथुन एवं रक्षण, और आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है इससे कुछ अधिक। यही पशु-जीवन एवं मानव-जीवन के बीच भी अन्तर है। पशु-जीवन में, सामान्य सूत्र है खाना, सोना, मैथुन एवं रक्षण। कुत्ता खाता है, मनुष्य भी खाता है। मनुष्य सोता है, और कुत्ता भी सोता है। मनुष्य का यौन-जीवन है, और कुत्ते का भी यौन-जीवन है। कुत्ता अपनी रीति से रक्षा करता है, और मनुष्य भी अपनी रीति से रक्षा करता है, सम्भवतः परमाणु बमों द्वारा। ये चार सिद्धान्त मनुष्यों एवं पशुओं में समान हैं, और इन चार सिद्धान्तों की उन्नति मानव सभ्यता नहीं अपितु पशु सभ्यता है। मानव सभ्यता का अर्थ है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। *वेदान्त-सूत्र* में प्रथम सूत्र है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा: \"अब ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा का समय है।\" यही मानव जीवन है। जब तक मनुष्य आध्यात्मिक रूप से जिज्ञासु नहीं, जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्, वह एक पशु है, क्योंकि वह इन चार सिद्धान्तों के अनुसार जीता है, बस इतना ही। उसे यह जानने हेतु जिज्ञासु होना चाहिए कि वह क्या है और क्यों उसे जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग के इन दुःखों में डाला गया है। क्या कोई उपाय है? इन विषयों पर प्रश्न पूछे जाने चाहिए। यही मानव जीवन है; यही आध्यात्मिक जीवन है।\n\nआध्यात्मिक जीवन का अर्थ है मानव जीवन, और भौतिक जीवन का अर्थ है पशु-जीवन। बस इतना ही। हमें वे समायोजन करने होंगे जिनकी अनुशंसा *भगवद्गीता* में की गई है। युक्ताहार-विहारस्य। उदाहरणार्थ, क्योंकि मैं आध्यात्मिक मनुष्य बनने जा रहा हूँ, इसका अर्थ यह नहीं कि मैं खाना छोड़ दूँगा। अपितु, मेरा आहार समायोजित होना चाहिए। *भगवद्गीता* वर्णन करती है कि किस श्रेणी का भोजन प्रथम श्रेणी का, सत्त्व में है, और किस श्रेणी का भोजन रजस् में, और तीसरी श्रेणी का, तमस् में है। हमें स्वयं को मानव सभ्यता के सात्त्विक (सत्त्व) स्तर तक उठाना होगा, फिर अपनी दिव्य चेतना, अथवा कृष्णभावनामृत को पुनर्जीवित करना होगा। सब कुछ शास्त्रों में विद्यमान है। दुर्भाग्यवश, हम उनका परामर्श नहीं लेते।\n\nevaṁ prasanna-manaso\n\nbhagavad-bhakti-yogataḥ\n\nbhagavat-tattva-vijñānaṁ\n\nmukta-saṅgasya jāyate\n\n(Bhāg. 1.2.20)\n\nजब तक मनुष्य भौतिक प्रकृति के इन तीन गुणों की पकड़ से मुक्त नहीं होता, तब तक वह ईश्वर को नहीं समझ सकता। प्रसन्न-मनसः। मनुष्य को ब्रह्म-साक्षात्कृत आत्मा होना चाहिए। ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति (भ.गी. 18.54)। ये आदेश विद्यमान हैं, अतः मनुष्य को इन शास्त्रों का लाभ उठाकर प्रचार करना चाहिए। यही बुद्धिमान् मनुष्यों का उत्तरदायित्व है। जन-समूह जानता है कि ईश्वर महान् है, किन्तु वे नहीं जानते कि ईश्वर वस्तुतः कितना महान् है। वही हमें वैदिक साहित्य में मिलेगा। यही इस लौह युग में हमारा कर्तव्य है। यही हरि-कीर्तन है, परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्: परमेश्वर की महिमा-गान।\n\nध्यान एवं अन्तःस्थित आत्मा\n\nक्या ध्यान हमारी दैनिक समस्याओं का समाधान कर सकता है? क्या मृत्यु के पश्चात् जीवन है? क्या मादक द्रव्य हमें आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं? 1976 में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान, श्रील प्रभुपाद ने डरबन नैटाल मर्करी के साक्षात्कारकर्ता बिल फैल के लिए इन तथा अन्य प्रश्नों के उत्तर दिए।\n\nश्रील प्रभुपाद: कृष्ण ईश्वर का एक नाम है जिसका अर्थ है \"सर्व-आकर्षक\"। जब तक कोई सर्व-आकर्षक न हो, वह ईश्वर नहीं हो सकता। अतः कृष्णभावनामृत का अर्थ है ईश्वर-भावनामृत। हम सब ईश्वर के लघु कण हैं, गुण में उनके समान। जीवों के रूप में हमारी स्थिति वैसी ही है जैसे एक बड़ी मात्रा के स्वर्ण के सम्बन्ध में स्वर्ण का एक लघु कण।\n\nश्री फैल: क्या हम अग्नि में चिनगारियों के समान कुछ हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। अग्नि एवं चिनगारी दोनों अग्नि हैं, किन्तु एक बड़ी है, और दूसरी अत्यन्त छोटी। तथापि, चिनगारी एवं अग्नि के सम्बन्ध के विपरीत, ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध नित्य है, यद्यपि इस समय हम भौतिक ऊर्जा के सम्पर्क के कारण उस सम्बन्ध को भूल गए हैं। हम इतनी सारी समस्याओं का सामना केवल इसी विस्मरण के कारण कर रहे हैं। यदि हम अपनी मूल ईश्वर-भावना को पुनर्जीवित कर सकें, तो हम सुखी हो जाएँगे। यही कृष्णभावनामृत का सार है। यह हमारी मूल ईश्वर-भावना को पुनर्जीवित करने की सर्वोत्तम प्रक्रिया है। आत्म-साक्षात्कार की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएँ हैं, किन्तु वर्तमान कलियुग में, लोग अत्यन्त पतित हैं, और उन्हें कृष्णभावनामृत की सरल प्रक्रिया की आवश्यकता है। अब वे सोच रहे हैं कि तथाकथित भौतिक उन्नति उनकी समस्याओं का समाधान है, किन्तु यह तथ्य नहीं है। वास्तविक समाधान है कृष्णभावनाभावित बनकर भौतिक अवस्था से पूर्णतया बाहर निकल जाना। क्योंकि ईश्वर नित्य है, अतः हम भी नित्य हैं, किन्तु भौतिक अवस्था में हम सोच रहे हैं, \"मैं यह शरीर हूँ,\" और इसीलिए हमें बारम्बार एक शरीर से दूसरे शरीर में बदलना पड़ता है। यह अज्ञान के कारण है। वस्तुतः हम अपने शरीर नहीं हैं अपितु आध्यात्मिक चिनगारियाँ हैं, ईश्वर के अंश।\n\nश्री फैल: तो शरीर मात्र आत्मा के लिए एक वाहन के समान है?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। यह ठीक एक मोटरकार के समान है। जैसे आप एक कार में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं, वैसे ही जीवन की भौतिक अवस्था में मानसिक कल्पना के कारण, हम एक स्थिति से दूसरी स्थिति को जा रहे हैं, सुखी होने का प्रयत्न करते हुए। किन्तु जब तक हम अपनी वास्तविक स्थिति पर नहीं आते, तब तक कोई वस्तु हमें सुखी नहीं करेगी, जो यह है कि हम सब ईश्वर के अंश हैं और हमारा वास्तविक कार्य है ईश्वर के साथ संग करना और उनके साथ सहयोग करके समस्त जीवों की सहायता करना। सभ्य मानव जीवन 84,00,000 जीव-योनियों के एक दीर्घ विकास के पश्चात् ही प्राप्त होता है। अतः यदि हम इस सभ्य मानव जीवन का लाभ यह समझने हेतु न उठाएँ कि ईश्वर कौन है, हम कौन हैं, और हमारा सम्बन्ध क्या है, अपितु इसके स्थान पर बिल्लियों एवं कुत्तों के समान मात्र अपना जीवन नष्ट कर दें, इन्द्रियतृप्ति की खोज में इधर-उधर जाते हुए, तो हम एक महान् अवसर गँवा देंगे। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन लोगों को यह सिखाना है कि वे ईश्वर एवं उनके साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करके मानव जीवन-रूप का पूर्ण लाभ कैसे उठाएँ।\n\nश्री फैल: यदि हम इस जीवन का अधिकतम लाभ न उठाएँ, तो क्या हमें किसी अन्य जीवन में दूसरा अवसर मिलता है?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। मृत्यु के समय आपकी इच्छाओं के अनुसार, आपको दूसरा शरीर मिलता है। तथापि, उस शरीर के मानव शरीर होने की कोई गारंटी नहीं। जैसा मैंने पहले ही समझाया, 84,00,000 भिन्न-भिन्न जीवन-रूप हैं। आप मृत्यु के समय अपनी मानसिक अवस्था के अनुसार उनमें से किसी में भी प्रवेश कर सकते हैं। मृत्यु के समय हम जो सोचते हैं वह इस पर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन के दौरान कैसे कार्य करते हैं। जब तक हम भौतिक चेतना में हैं, हमारे कर्म भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण में हैं, जो तीन गुणों में संचालित होती है: सत्त्व, रजस् एवं तमस्। ये गुण तीन मूल रंगों के समान हैं—पीला, लाल एवं नीला। जैसे कोई लाल, पीले एवं नीले को मिलाकर लाखों रंग उत्पन्न कर सकता है, वैसे ही प्रकृति के गुण मिलकर जीवन की अनेक विविधताएँ उत्पन्न कर रहे हैं। भिन्न-भिन्न जीवन-रूपों में जन्म एवं मृत्यु की पुनरावृत्ति को रोकने हेतु, हमें भौतिक प्रकृति के आवरण को लाँघकर शुद्ध चेतना के तल पर आना होगा। किन्तु यदि हम कृष्णभावनामृत के दिव्य विज्ञान को न सीखें, तो मृत्यु के समय हमें किसी अन्य शरीर में, अपने वर्तमान शरीर से या तो श्रेष्ठ या निकृष्ट, स्थानान्तरित होना होगा। यदि हम सत्त्वगुण का अनुशीलन करें, तो हम उच्चतर लोक-व्यवस्था में उन्नत होते हैं, जहाँ जीवन का एक श्रेष्ठ स्तर है। यदि हम रजोगुण का अनुशीलन करें, तो हम वर्तमान अवस्था में ही रहेंगे। किन्तु यदि अज्ञानवश हम पापमय कर्म करें और प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करें, तो हम पशु अथवा वनस्पति जीवन में अधःपतित हो जाएँगे। तब हमें पुनः मानव रूप तक विकसित होना होगा, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लाखों वर्ष लग सकते हैं। अतएव मनुष्य को उत्तरदायी होना चाहिए। उसे ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझकर एवं तदनुसार कार्य करके मानव जीवन के दुर्लभ अवसर का लाभ उठाना चाहिए। तब वह भिन्न-भिन्न जीवन-रूपों में जन्म एवं मृत्यु के चक्र से बाहर निकल सकता है और घर, भगवद्धाम लौट सकता है।\n\nश्री फैल: क्या आप सोचते हैं कि भावातीत ध्यान लोगों की सहायता कर रहा है?\n\nश्रील प्रभुपाद: वे नहीं जानते कि वास्तविक ध्यान क्या है। उनका ध्यान मात्र एक प्रहसन है—तथाकथित स्वामियों एवं योगियों द्वारा एक अन्य छल-प्रक्रिया। आप मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या ध्यान लोगों की सहायता कर रहा है, किन्तु क्या आप जानते हैं कि ध्यान क्या है?\n\nश्री फैल: मन को शान्त करना—दोनों ओर झुके बिना केन्द्र में बैठने का प्रयत्न करना।\n\nश्रील प्रभुपाद: और केन्द्र क्या है?\n\nश्री फैल: मैं नहीं जानता।\n\nश्रील प्रभुपाद: तो हर कोई ध्यान के विषय में बहुत बात कर रहा है, किन्तु कोई नहीं जानता कि ध्यान वस्तुतः क्या है। ये धोखेबाज़ \"ध्यान\" शब्द का प्रयोग करते हैं, किन्तु वे ध्यान के उपयुक्त विषय को नहीं जानते। वे मात्र कूट प्रचार कर रहे हैं।\n\nश्री फैल: क्या ध्यान केवल लोगों को सही ढंग से सोचने पर लगाने के लिए ही मूल्यवान नहीं है?\n\nश्रील प्रभुपाद: नहीं। वास्तविक ध्यान का अर्थ है ऐसी अवस्था प्राप्त करना जिसमें मन ईश्वर-भावना से ओत-प्रोत हो। किन्तु यदि आप यह नहीं जानते कि ईश्वर क्या है, तो आप ध्यान कैसे कर सकते हैं? इसके अतिरिक्त, इस युग में लोगों के मन इतने उद्विग्न हैं कि वे एकाग्र नहीं हो सकते। मैंने यह तथाकथित ध्यान देखा है; वे मात्र सो रहे होते हैं और खर्राटे ले रहे होते हैं। दुर्भाग्यवश, ईश्वर-भावना अथवा \"आत्म-साक्षात्कार\" के नाम पर, अनेक धोखेबाज़ वैदिक ज्ञान के प्रामाणिक ग्रन्थों का सन्दर्भ लिए बिना ध्यान की अमानक विधियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। वे मात्र एक अन्य प्रकार का शोषण कर रहे हैं।\n\nश्री फैल: कुछ अन्य शिक्षकों, जैसे आउस्पेन्स्की एवं गुर्जिएफ के विषय में क्या? अतीत में वे पश्चिम में आपके समान एक सन्देश लाए थे।\n\nश्रील प्रभुपाद: यह जानने हेतु कि क्या वे वैदिक मानक पर खरे उतरते हैं, हमें उनकी शिक्षाओं की विशिष्टताओं का अध्ययन करना होगा। ईश्वर-भावना एक विज्ञान है, ठीक चिकित्सा-विज्ञान अथवा किसी अन्य विज्ञान के समान। यह इसलिए भिन्न नहीं हो सकती क्योंकि इसे भिन्न-भिन्न मनुष्यों द्वारा कहा जाता है। दो जोड़ दो सर्वत्र चार होते हैं, कभी पाँच नहीं, अथवा तीन। यही विज्ञान है।\n\nश्री फैल: क्या आप अनुभव करते हैं कि अन्य लोगों ने सम्भवतः ईश्वर-भावना की यथार्थ विधि सिखाई हो?\n\nश्रील प्रभुपाद: जब तक मैं उनकी शिक्षाओं का विस्तार से अध्ययन न करूँ, यह कहना अत्यन्त कठिन होगा। इतने सारे धोखेबाज़ हैं।\n\nश्री फैल: केवल धन के लिए यह कर रहे हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: बस इतना ही। उनके पास कोई मानक विधि नहीं है। अतएव हम *भगवद्गीता* को यथारूप प्रस्तुत कर रहे हैं, बिना किसी व्यक्तिगत व्याख्या के। यही मानक है।\n\nश्री फैल: हाँ, यदि आप वस्तुओं को सजाने-सँवारने लगते हैं, तो आप अनिवार्यतः उन्हें बदल देते हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: कृष्णभावनामृत कोई नवीन प्रक्रिया नहीं है। यह अत्यन्त, अत्यन्त प्राचीन—एवं मानक है। इसे बदला नहीं जा सकता। ज्यों ही आप इसे बदलने का प्रयत्न करते हैं, त्यों ही इसकी शक्ति लुप्त हो जाती है। यह शक्ति ठीक विद्युत् के समान है। यदि आप विद्युत् उत्पन्न करना चाहते हैं, तो आपको मानक विधानों का पालन करना होगा, समस्त ऋणात्मक एवं धनात्मक ध्रुवों को उचित रूप से व्यवस्थित करते हुए। आप जनित्र को मनमाने ढंग से नहीं बना सकते और फिर भी विद्युत् उत्पन्न नहीं कर सकते। इसी प्रकार, उपयुक्त अधिकारियों से कृष्णभावनाभावित दर्शन को समझने की एक मानक विधि है। यदि हम उनके उपदेशों का पालन करें, तो प्रक्रिया कार्य करेगी। दुर्भाग्यवश, आधुनिक मनुष्य के खतरनाक रोगों में से एक यह है कि हर कोई वस्तुओं को अपनी ही सनक के अनुसार करना चाहता है। कोई मानक मार्ग का पालन नहीं करना चाहता। अतएव हर कोई असफल हो रहा है, आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों रूप से।\n\nश्री फैल: क्या कृष्णभावनामृत आन्दोलन बढ़ रहा है?\n\nश्रील प्रभुपाद: ओह, हाँ, बहुत अधिक। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि हम पुस्तकें हज़ारों की संख्या में बेच रहे हैं। हमारी लगभग पचास पुस्तकें हैं, और अनेक ग्रन्थपाल एवं महाविद्यालय के प्राध्यापक उनकी अत्यधिक सराहना करते हैं, क्योंकि उनके प्रकाशन तक ऐसा कोई साहित्य अस्तित्व में नहीं था। यह विश्व में एक नवीन योगदान है।\n\nश्री फैल: कृष्णभावनामृत में मस्तक मुँडाना एवं गेरुआ वस्त्र पहनना सम्मिलित प्रतीत होता है। गृहस्थ जीवन में फँसा एक साधारण मनुष्य कृष्णभावनामृत का अभ्यास कैसे कर सकता है?\n\nश्रील प्रभुपाद: गेरुआ वस्त्र एवं मुँडा हुआ मस्तक आवश्यक नहीं हैं, यद्यपि वे एक अच्छी मानसिक स्थिति उत्पन्न करते हैं, ठीक जैसे जब कोई सैनिक उचित रूप से सज्जित होता है तो उसे ऊर्जा मिलती है—वह स्वयं को सैनिक अनुभव करता है। क्या इसका अर्थ यह है कि जब तक वह वर्दी में न हो, वह लड़ नहीं सकता? नहीं। इसी प्रकार, ईश्वर-भावना को रोका नहीं जा सकता—इसे किसी भी परिस्थिति में पुनर्जीवित किया जा सकता है—किन्तु कुछ अवस्थाएँ सहायक हैं। अतएव हम विधान करते हैं कि आप एक निश्चित ढंग से रहें, एक निश्चित ढंग से वस्त्र धारण करें, एक निश्चित ढंग से खाएँ, इत्यादि। ये वस्तुएँ कृष्णभावनामृत के अभ्यास हेतु सहायक हैं, किन्तु ये आवश्यक नहीं हैं।\n\nश्री फैल: तो कोई सामान्य दैनिक जीवन व्यतीत करते हुए भी कृष्णभावनामृत का विद्यार्थी हो सकता है?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ।\n\nश्री फैल: मादक द्रव्यों के विषय में क्या? क्या वे ईश्वर-साक्षात्कार की प्रक्रिया में सहायता कर सकते हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: यदि मादक द्रव्य ईश्वर-साक्षात्कार में सहायता कर सकते, तो मादक द्रव्य ईश्वर से अधिक शक्तिशाली होते। हम इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं? मादक द्रव्य रासायनिक पदार्थ हैं, जो भौतिक हैं। कोई भौतिक वस्तु किसी की ईश्वर को साक्षात्कार करने में कैसे सहायता कर सकती है, जो पूर्णतया आध्यात्मिक है? यह असम्भव है। मादक द्रव्य लेने से मनुष्य जो अनुभव करता है वह मात्र एक प्रकार का मद अथवा विभ्रम है; यह ईश्वर-साक्षात्कार नहीं है।\n\nश्री फैल: क्या आप सोचते हैं कि युगों से चले आ रहे महान् रहस्यदर्शियों ने वस्तुतः उस आध्यात्मिक चिनगारी को देखा है जिसका आपने पहले उल्लेख किया?\n\nश्रील प्रभुपाद: \"रहस्यदर्शी\" से आपका क्या अभिप्राय है?\n\nश्री फैल: यह केवल उन लोगों को दिया गया एक नाम है जिन्हें वास्तविकता के किसी अन्य स्तर का अनुभव हुआ है।\n\nश्रील प्रभुपाद: हम रहस्यदर्शी शब्द का प्रयोग नहीं करते। हमारी वास्तविकता ईश्वर-साक्षात्कार है, जो तब घटित होती है जब हम आध्यात्मिक स्तर पर आते हैं। जब तक हमारी जीवन की देहात्म-बुद्धि है, तब तक हमारा बोध इन्द्रियतृप्ति है, क्योंकि शरीर इन्द्रियों से बना है। जब हम देह-स्तर से प्रगति करते हैं और हम मन को इन्द्रिय-क्रिया के केन्द्र के रूप में देखते हैं, तो हम मन को साक्षात्कार की अन्तिम अवस्था मान लेते हैं। यही मानसिक स्तर है। मानसिक स्तर से हम बौद्धिक स्तर पर आ सकते हैं, और बौद्धिक स्तर से हम दिव्य स्तर पर उठ सकते हैं। अन्ततः हम दिव्य स्तर से भी ऊपर उठकर परिपक्व, आध्यात्मिक स्तर पर आ सकते हैं। ये ईश्वर-साक्षात्कार की अवस्थाएँ हैं। तथापि, इस युग में, क्योंकि लोग इतने पतित हैं, अतः शास्त्र [scriptures] यह विशेष अनुशंसा देते हैं कि लोग ईश्वर के पवित्र नामों का जप करके सीधे आध्यात्मिक स्तर पर आएँ: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। यदि हम इस अभ्यास का अनुशीलन आध्यात्मिक स्तर पर करें, तो हम तत्क्षण अपनी आध्यात्मिक पहचान का साक्षात्कार कर सकते हैं। तब ईश्वर-साक्षात्कार की प्रक्रिया अत्यन्त शीघ्र सफल हो जाती है।\n\nश्री फैल: आज बहुत से लोग कह रहे हैं कि सत्य के लिए हमें इन्द्रियों के बाह्य जगत् में बाहर देखने के बजाय भीतर देखना चाहिए।\n\nश्रील प्रभुपाद: भीतर देखने का अर्थ है यह जानना कि आप एक आत्मा हैं। जब तक आप यह न समझें कि आप शरीर नहीं अपितु एक आत्मा हैं, तब तक भीतर देखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nसर्वप्रथम हमें अध्ययन करना होगा, \"क्या मैं यह शरीर हूँ, अथवा क्या मैं इस शरीर के भीतर कोई वस्तु हूँ?\" दुर्भाग्यवश, यह विषय किसी विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता। हर कोई सोच रहा है, \"मैं यह शरीर हूँ।\" उदाहरणार्थ, इस देश में सर्वत्र लोग सोच रहे हैं, \"मैं दक्षिण अफ्रीकी हूँ, वे भारतीय हैं, वे यूनानी हैं,\" इत्यादि। वस्तुतः, सम्पूर्ण विश्व में हर कोई जीवन की देहात्म-बुद्धि में है। कृष्णभावनामृत तब आरम्भ होता है जब कोई इस देहात्म-बुद्धि से ऊपर होता है।\n\nश्री फैल: तो आध्यात्मिक चिनगारी की पहचान सर्वप्रथम आती है?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। शरीर के भीतर आत्मा के अस्तित्व को पहचानना प्रथम सोपान है। जब तक कोई इस सरल तथ्य को न समझे, तब तक आध्यात्मिक प्रगति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nश्री फैल: क्या यह केवल इसे बौद्धिक रूप से समझने का प्रश्न है?\n\nश्रील प्रभुपाद: आरम्भ में, हाँ। ज्ञान के दो विभाग हैं: सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक। सर्वप्रथम मनुष्य को आध्यात्मिक विज्ञान को सैद्धान्तिक रूप से सीखना होता है; फिर, उस आध्यात्मिक स्तर पर कार्य करते हुए, वह व्यावहारिक साक्षात्कार के बिन्दु पर आता है।\n\nदुर्भाग्यवश, आज लगभग हर कोई जीवन की देहात्म-बुद्धि के अन्धकार में है। अतएव यह आन्दोलन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह सभ्य मनुष्यों को उस अन्धकार से बाहर निकाल सकता है। जब तक वे जीवन की देहात्म-बुद्धि में हैं, तब तक वे पशुओं से श्रेष्ठ नहीं हैं। \"मैं एक कुत्ता हूँ,\" \"मैं एक बिल्ली हूँ,\" \"मैं एक गौ हूँ।\" पशु इसी प्रकार सोचते हैं। ज्यों ही कोई गुज़रता है, एक कुत्ता भौंकेगा, यह सोचते हुए, \"मैं एक कुत्ता हूँ। मुझे यहाँ पहरेदार कुत्ते के रूप में नियुक्त किया गया है।\" इसी प्रकार, यदि मैं कुत्ते की मनोवृत्ति अपनाऊँ और विदेशियों को ललकारूँ—\"तुम इस देश में क्यों आए हो? तुम मेरे अधिकार-क्षेत्र में क्यों आए हो?\"—तो कुत्ते एवं मुझमें क्या अन्तर है?\n\nश्री फैल: कोई नहीं। विषय को थोड़ा बदलने के लिए, क्या आध्यात्मिक जीवन का अभ्यास करने हेतु कुछ आहार-सम्बन्धी आदतों का पालन करना आवश्यक है?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ, सम्पूर्ण प्रक्रिया हमें शुद्ध करने के लिए है, और आहार उस शुद्धिकरण का अंग है। मेरे विचार से आपके यहाँ एक कहावत है, \"आप वही हैं जो आप खाते हैं,\" और यह तथ्य है। हमारी शारीरिक संरचना एवं मानसिक वातावरण इस अनुसार निर्धारित होते हैं कि हम कैसे एवं क्या खाते हैं। अतएव शास्त्र अनुशंसा करते हैं कि कृष्णभावनाभावित बनने हेतु, आपको कृष्ण द्वारा छोड़ा गया भोजन का उच्छिष्ट खाना चाहिए। यदि कोई क्षयरोग का रोगी कुछ खाए और आप उसका उच्छिष्ट खाएँ, तो आप क्षयरोग से संक्रमित हो जाएँगे। इसी प्रकार, यदि आप कृष्ण-प्रसादम् खाएँ, तो आप कृष्णभावनामृत से संक्रमित हो जाएँगे। अतः हमारी प्रक्रिया यह है कि हम कोई वस्तु तत्क्षण नहीं खाते। सर्वप्रथम हम भोजन कृष्ण को अर्पित करते हैं, फिर हम उसे खाते हैं। यह हमें कृष्णभावनामृत में प्रगति करने में सहायता करता है।\n\nश्री फैल: क्या आप सब शाकाहारी हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ, क्योंकि कृष्ण शाकाहारी हैं। कृष्ण कुछ भी खा सकते हैं क्योंकि वे ईश्वर हैं, किन्तु *भगवद्गीता* (9.26) में वे कहते हैं, \"यदि कोई मुझे प्रेम एवं भक्ति सहित एक पत्र, एक पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करे, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।\" वे कभी नहीं कहते, \"मुझे मांस एवं मद्य दो।\"\n\nश्री फैल: तम्बाकू के प्रश्न के विषय में क्या?\n\nश्रील प्रभुपाद: तम्बाकू भी एक मादक द्रव्य है। हम जीवन की देहात्म-बुद्धि में रहकर पहले से ही मदग्रस्त हैं, और यदि हम मद को बढ़ाएँ, तो हम खो जाते हैं।\n\nश्री फैल: आपका अभिप्राय है कि मांस, मद्य एवं तम्बाकू जैसी वस्तुएँ केवल देह-चेतना को सुदृढ़ करती हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। मान लीजिए आपको कोई रोग है और आप स्वस्थ होना चाहते हैं। आपको किसी चिकित्सक के उपदेशों का पालन करना होता है। यदि वह कहता है, \"यह मत खाओ; केवल यह खाओ,\" तो आपको उसकी व्यवस्था का पालन करना होता है। इसी प्रकार, हमारे पास भी जीवन की देहात्म-बुद्धि से स्वस्थ होने हेतु एक व्यवस्था है: हरे कृष्ण का जप करना, कृष्ण की लीलाओं के विषय में सुनना, एवं कृष्ण-प्रसादम् खाना। यही उपचार कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया है।"}
{"ref": "ssr/6", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/6/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "भौतिक समस्याओं के आध्यात्मिक समाधान खोजना", "purport": "अपराध: क्यों एवं क्या करें?\n\nप्रति वर्ष विश्व अपराध-निवारण एवं नियन्त्रण पर अधिक धन व्यय करता है। फिर भी इन प्रयासों के बावजूद अपराध-दर आकाश छू रही है, और विशेषकर अमेरिकी सार्वजनिक विद्यालयों में, अपराध लगभग अनियन्त्रणीय स्तरों तक पहुँच गया है। शिकागो पुलिस विभाग के मीडिया सम्बन्ध अधिकारी, लेफ्टिनेंट डेविड मोज़ी के साथ जुलाई 1975 की इस चर्चा में, श्रील प्रभुपाद ने अपराध की प्रतीयमान दुर्लंघ्य समस्या का एक आश्चर्यजनक रूप से सरल किन्तु व्यावहारिक समाधान प्रस्तावित किया।\n\nलेफ्टिनेंट मोज़ी: मैं समझता हूँ कि आपके पास कुछ विचार हैं जो अपराध-निवारण के हमारे प्रयासों में हमारी सहायता कर सकते हैं। मुझे उन्हें सुनने में अत्यन्त रुचि होगी।\n\nश्रील प्रभुपाद: एक धार्मिक मनुष्य एवं एक अपराधी के बीच अन्तर यह है कि एक हृदय से शुद्ध है और दूसरा मलिन है। यह मल अपराधी के हृदय में अनियन्त्रित काम एवं लोभ के रूप में एक रोग के समान है। आज सामान्य रूप से लोग इसी रोगग्रस्त अवस्था में हैं, और इस प्रकार अपराध अत्यन्त व्यापक है। जब लोग इन मलिन वस्तुओं से शुद्ध हो जाएँगे, तो अपराध लुप्त हो जाएगा। शुद्धिकरण की सरलतम प्रक्रिया है सामूहिक रूप से एकत्र होना एवं ईश्वर के पवित्र नामों का जप करना। इसे संकीर्तन कहते हैं और यही हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन का आधार है। अतः, यदि आप अपराध रोकना चाहते हैं, तो आपको सामूहिक संकीर्तन हेतु यथासम्भव अधिक लोगों को एकत्र करना होगा। ईश्वर के पवित्र नाम का यह सामूहिक जप सबके हृदय की समस्त मलिन वस्तुओं को विसर्जित कर देगा। तब कोई अपराध नहीं रहेगा।\n\nलेफ्टिनेंट मोज़ी: क्या आपके मन में अपने देश भारत के अपराध की तुलना में यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के अपराध के विषय में कुछ अनुभूतियाँ हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: अपराध की आपकी परिभाषा क्या है?\n\nLieutenant Mozee: किसी एक व्यक्ति के अधिकारों पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया कोई भी अतिक्रमण।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। हमारी परिभाषा भी यही है। *उपनिषदों* में कहा गया है, ईशावास्यम् इदं सर्वम्—\"सब कुछ ईश्वर का है।\" अतः प्रत्येक व्यक्ति को वह सब उपयोग करने का अधिकार है जो ईश्वर ने उसे आबंटित किया है, किन्तु किसी को दूसरों की सम्पत्ति पर अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह अपराधी बन जाता है। वस्तुतः प्रथम अपराध तो यह है कि तुम अमेरिकावासी यह समझते हो कि अमेरिका की यह भूमि तुम्हारी है। यद्यपि दो सौ वर्ष पूर्व यह तुम्हारी नहीं थी, तुम संसार के अन्य भागों से आए और इसे अपनी भूमि के रूप में दावा कर लिया। वास्तव में यह ईश्वर की भूमि है, और इसलिए यह सबकी है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की सन्तान है। किन्तु जनसमुदाय के विशाल बहुमत को ईश्वर का कोई बोध नहीं है। व्यावहारिक रूप से कहें तो प्रत्येक व्यक्ति ईश्वरविहीन है। अतः उन्हें ईश्वर से प्रेम करना सिखाया जाना चाहिए। अमेरिका में तुम्हारी सरकार का एक सूत्र-वाक्य है: \"in God we trust\" (हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं)। क्या यह सही है?\n\nLieutenant Mozee: हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु ईश्वर के विषय में शिक्षा कहाँ है? विश्वास करना अति उत्तम है, परन्तु केवल विश्वास तब तक टिकाऊ नहीं होगा जब तक उसे ईश्वर के वैज्ञानिक ज्ञान का आधार प्राप्त न हो। कोई जान सकता है कि उसका एक पिता है, किन्तु जब तक वह यह न जाने कि उसका पिता कौन है, तब तक उसका ज्ञान अपूर्ण है। और ईश्वर-विज्ञान की वह शिक्षा अनुपस्थित है।\n\nLieutenant Mozee: क्या आपको ऐसा प्रतीत होता है कि यह कमी केवल यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका में ही है?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं। सर्वत्र। जिस युग में हम रहते हैं उसे कलियुग कहा जाता है, ईश्वर को विस्मृत करने का युग। यह भ्रान्ति और कलह का युग है, और लोगों के हृदय मलिन वस्तुओं से भरे हुए हैं। किन्तु ईश्वर इतने शक्तिशाली हैं कि यदि हम उनके पवित्र नाम का जप करें तो हम शुद्ध हो जाते हैं, ठीक जैसे मेरे शिष्य अपनी बुरी आदतों से शुद्ध हो गए हैं। हमारा आन्दोलन ईश्वर के पवित्र नाम के जप के इसी सिद्धान्त पर आधारित है। हम बिना किसी भेदभाव के सबको यह अवसर देते हैं। वे हमारे मन्दिर में आ सकते हैं, हरे कृष्ण मन्त्र का जप कर सकते हैं, अल्पाहार के रूप में थोड़ा प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, और क्रमशः शुद्ध हो सकते हैं। अतः यदि शासकीय अधिकारी हमें कुछ सुविधाएँ प्रदान करें, तो हम विशाल संकीर्तन कर सकते हैं। तब निःसन्देह समूचा समाज परिवर्तित हो जाएगा।\n\nLieutenant Mozee: यदि मैं आपको ठीक से समझ रहा हूँ, महोदय, तो आप यह कह रहे हैं कि हमें धार्मिक सिद्धान्तों की ओर लौटने पर बल देना चाहिए।\n\nŚrīla Prabhupāda: निश्चय ही। धार्मिक सिद्धान्तों के बिना कुत्ते और मनुष्य में क्या अन्तर है? मनुष्य धर्म को समझ सकता है, किन्तु कुत्ता नहीं समझ सकता। यही अन्तर है। अतः यदि मानव समाज कुत्तों और बिल्लियों के स्तर पर ही रहे, तो तुम शान्तिपूर्ण समाज की आशा कैसे कर सकते हो? यदि तुम एक दर्जन कुत्तों को लाकर एक कमरे में एकत्र कर दो, तो क्या उन्हें शान्त रख पाना सम्भव होगा? इसी प्रकार, यदि मानव समाज ऐसे मनुष्यों से भरा हो जिनकी मनोवृत्ति कुत्तों के स्तर की है, तो तुम शान्ति की आशा कैसे कर सकते हो?\n\nLieutenant Mozee: यदि मेरे कुछ प्रश्न अनादरपूर्ण प्रतीत हों, तो इसका कारण केवल यह है कि मैं आपकी धार्मिक मान्यताओं को पूर्णतः नहीं समझता। मेरा तनिक भी अनादर करने का अभिप्राय नहीं है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, यह मेरी धार्मिक मान्यताओं का प्रश्न नहीं है। मैं तो केवल मानव जीवन और पशु जीवन के बीच का अन्तर बता रहा हूँ। पशु ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं सीख सकते, किन्तु मनुष्य सीख सकते हैं। तथापि, यदि मनुष्यों को ईश्वर के विषय में सीखने की सुविधा न दी जाए, तो वे बिल्लियों और कुत्तों के स्तर पर ही रह जाते हैं। बिल्लियों और कुत्तों के समाज में तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती। अतः यह देखना शासकीय अधिकारियों का कर्तव्य है कि लोगों को ईश्वर-भावनाभावित बनना सिखाया जाए। अन्यथा संकट उत्पन्न होगा, क्योंकि ईश्वर-भावना के बिना कुत्ते और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं है: कुत्ता खाता है, हम खाते हैं; कुत्ता सोता है, हम सोते हैं; कुत्ता मैथुन करता है, हम मैथुन करते हैं; कुत्ता अपनी रक्षा का प्रयत्न करता है, और हम भी अपनी रक्षा का प्रयत्न करते हैं। ये समान घटक हैं। एकमात्र अन्तर यह है कि कुत्ते को ईश्वर के साथ उसके सम्बन्ध के विषय में शिक्षा नहीं दी जा सकती, किन्तु मनुष्य को दी जा सकती है।\n\nLieutenant Mozee: क्या शान्ति धर्म की ओर लौटने की अग्रदूत नहीं होगी? क्या हमें पहले शान्ति प्राप्त नहीं करनी चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं, यही तो कठिनाई है। वर्तमान समय में कोई भी धर्म का वास्तविक अर्थ नहीं जानता। धर्म का अर्थ है ईश्वर के नियमों का पालन करना, ठीक जैसे सुनागरिकता का अर्थ है सरकार के नियमों का पालन करना। क्योंकि किसी को भी ईश्वर का कोई बोध नहीं है, अतः कोई भी ईश्वर के नियमों अथवा धर्म के अर्थ को नहीं जानता। आज के समाज में लोगों की यही दशा है। वे धर्म को विस्मृत कर रहे हैं, उसे एक प्रकार का विश्वास मात्र मान रहे हैं। विश्वास अन्धविश्वास भी हो सकता है। विश्वास धर्म का यथार्थ वर्णन नहीं है। धर्म का अर्थ है ईश्वर द्वारा प्रदत्त नियम, और जो कोई उन नियमों का पालन करता है वह धार्मिक है, चाहे वह ईसाई हो, हिन्दू हो, अथवा मुसलमान।\n\nLieutenant Mozee: समस्त आदर सहित कहूँ, क्या यह सत्य नहीं है कि भारत में, जहाँ शताब्दियों से धार्मिक प्रथाओं का पालन होता आया है, हम आध्यात्मिक जीवन की ओर लौटने के बजाय उससे दूर खिसकते हुए देख रहे हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, किन्तु यह केवल कुनेतृत्व के कारण है। अन्यथा, भारतीय जनता का विशाल बहुमत पूर्णतः ईश्वर-भावनाभावित है, और वे ईश्वर के नियमों का पालन करने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ पश्चिम में, बड़े-बड़े महाविद्यालयी प्राध्यापक तक ईश्वर अथवा मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते। किन्तु भारत में, निर्धनतम मनुष्य भी ईश्वर में और अगले जीवन में विश्वास करता है। वह जानता है कि यदि वह पाप करेगा तो दुःख भोगेगा और यदि वह पुण्य कर्म करेगा तो सुख भोगेगा। आज भी, यदि दो ग्रामवासियों के बीच कोई मतभेद हो जाए, तो वे उसे सुलझाने के लिए मन्दिर जाएँगे, क्योंकि सब जानते हैं कि विरोधी पक्ष विग्रहों के समक्ष असत्य बोलने में संकोच करेंगे। अतः अधिकांश दृष्टियों से भारत आज भी अस्सी प्रतिशत धार्मिक है। यही भारत में जन्म लेने का विशेष सौभाग्य है, और विशेष उत्तरदायित्व भी। श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है,\n\nbhārata-bhūmite haila manuṣya-janma yāra\n\njanma sārthaka kari' kara para-upakāra\n\n(*Caitanya-caritāmṛta*, Ādi 9.41)\n\nजिस किसी ने भारत में जन्म लिया है, उसे कृष्णभावनाभावित बनकर अपने जीवन को पूर्ण बनाना चाहिए। तत्पश्चात् उसे समस्त विश्व में कृष्णभावनामृत का वितरण करना चाहिए।\n\nLieutenant Mozee: महोदय, एक ईसाई दृष्टान्त है जो कहता है कि किसी धनी मनुष्य के लिए ईश्वर के सिंहासन के समक्ष आने की अपेक्षा ऊँट के लिए सुई के छेद से निकल जाना सरल है। क्या आपको लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की सम्पन्नता आध्यात्मिक श्रद्धा में बाधक है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। अत्यधिक धन एक बाधा है। श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* (2.44) में कहते हैं:\n\nbhogaiśvarya-prasaktānāṁ\n\ntayāpahṛta-cetasām\n\nvyavasāyātmikā buddhiḥ\n\nsamādhau na vidhīyate\n\nयदि कोई भौतिक रूप से अत्यधिक सम्पन्न है, तो वह ईश्वर को विस्मृत कर देता है। अतः अत्यधिक भौतिक धन ईश्वर को समझने के लिए एक अयोग्यता है। यद्यपि ऐसा कोई निरपेक्ष नियम नहीं है कि केवल निर्धन मनुष्य ही ईश्वर को समझ सकता है, सामान्यतः यदि कोई असाधारण रूप से धनी हो, तो उसकी एकमात्र महत्त्वाकांक्षा धन अर्जित करना होती है, और उसके लिए आध्यात्मिक शिक्षाओं को समझना कठिन हो जाता है।\n\nLieutenant Mozee: अमेरिका में, जो लोग ईसाई धर्म से सम्बद्ध हैं वे भी इन बातों में विश्वास करते हैं। मुझे एक धार्मिक समूह और दूसरे की आध्यात्मिक मान्यताओं के बीच कोई बड़ा अन्तर नहीं दिखाई देता।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, समस्त धर्म का सार एक ही है। हमारा प्रस्ताव यह है कि कोई जिस भी धार्मिक प्रणाली का अनुसरण करता हो, उसे ईश्वर को समझने और उनसे प्रेम करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि तुम ईसाई हो, तो हम यह नहीं कहते, \"वह किसी काम का नहीं; तुम्हें हमारे जैसा बनना होगा।\" हमारा प्रस्ताव यह है कि चाहे तुम ईसाई हो, मुसलमान हो, अथवा हिन्दू, केवल ईश्वर को समझने और उनसे प्रेम करने का प्रयत्न करो।\n\nLieutenant Mozee: यदि मैं अपने आने के मूल प्रयोजन पर लौट सकूँ, तो क्या मैं पूछ सकता हूँ कि अपराध घटाने में हमारी सहायता हेतु आप क्या परामर्श दे सकते हैं? मैं स्वीकार करता हूँ कि सर्वप्रथम एवं सर्वोपरि उपाय ईश्वर की ओर लौटना ही होगा, जैसा आप कहते हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं—किन्तु क्या कोई ऐसी बात है जो हम तत्काल कर सकें जिससे इस फैलती हुई आपराधिक मनोवृत्ति को घटाया जा सके?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। जैसा कि मैंने अपनी वार्ता के आरम्भ में ही रूपरेखा प्रस्तुत की है, तुम्हें हमें ईश्वर के पवित्र नाम का जप करने और प्रसाद वितरित करने की सुविधा देनी चाहिए। तब जनसमुदाय में अत्यन्त विशाल परिवर्तन होगा। मैं भारत से अकेला आया, और अब मेरे अनेक अनुयायी हैं। मैंने क्या किया? मैंने उनसे बैठकर हरे कृष्ण मन्त्र का जप करने को कहा, और तत्पश्चात् मैंने थोड़ा प्रसाद वितरित किया। यदि यह विशाल पैमाने पर किया जाए, तो समूचा समाज अत्यन्त मनोहर बन जाएगा। यह एक तथ्य है।\n\nLieutenant Mozee: क्या आप यह कार्यक्रम सम्पन्नता के क्षेत्र में आरम्भ करना चाहेंगे अथवा निर्धनता के क्षेत्र में?\n\nŚrīla Prabhupāda: हम ऐसे भेद नहीं करते। कोई भी ऐसा स्थान जो सभी प्रकार के मनुष्यों के लिए सहज सुलभ हो, संकीर्तन करने के लिए अत्यन्त उपयुक्त होगा। ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि केवल निर्धन मनुष्यों को ही इस लाभ की आवश्यकता है किन्तु धनवानों को नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को शुद्ध होने की आवश्यकता है। क्या तुम सोचते हो कि अपराधिता केवल समाज के निर्धन वर्ग में ही विद्यमान है?\n\nLieutenant Mozee: नहीं। किन्तु मेरा अभिप्राय यह पूछने से था कि क्या अधिक हितकारी प्रभाव पड़ेगा—समुदाय का अधिक सुदृढ़ीकरण होगा—यदि यह कार्यक्रम किसी सम्पन्न क्षेत्र के बजाय किसी निर्धन क्षेत्र में आयोजित किया जाए।\n\nŚrīla Prabhupāda: हमारा उपचार आध्यात्मिक रूप से रोगग्रस्त व्यक्ति के लिए है। जब कोई व्यक्ति किसी रोग से ग्रस्त होता है, तो निर्धन मनुष्य और धनी मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं होता। दोनों एक ही चिकित्सालय में भर्ती किए जाते हैं। जिस प्रकार चिकित्सालय ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहाँ निर्धन मनुष्य और धनी मनुष्य दोनों सहजता से आ सकें, उसी प्रकार संकीर्तन-सुविधा का स्थान भी सबके लिए सहज सुलभ होना चाहिए। चूँकि प्रत्येक व्यक्ति भौतिक रूप से संक्रमित है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को इसका लाभ उठाने में समर्थ होना चाहिए।\n\nकठिनाई यह है कि धनी मनुष्य सोचता है कि वह पूर्णतः स्वस्थ है, यद्यपि वह सबसे अधिक रोगग्रस्त है। किन्तु एक पुलिस-अधिकारी होने के नाते, तुम भली-भाँति जानते हो कि धनी मनुष्यों और निर्धन मनुष्यों, दोनों में समान रूप से अपराधिता विद्यमान है। अतः हमारी जप-प्रक्रिया सबके लिए है, क्योंकि यह हृदय को स्वच्छ करती है, चाहे मनुष्य सम्पन्न हो अथवा निर्धन। आपराधिक प्रवृत्ति को स्थायी रूप से बदलने का एकमात्र उपाय अपराधी के हृदय को बदलना है। जैसा तुम भली-भाँति जानते हो, अनेक चोर असंख्य बार बन्दी बनाए जाते हैं और कारागार में डाले जाते हैं। यद्यपि वे जानते हैं कि यदि वे चोरी करेंगे तो कारागार जाएँगे, फिर भी वे चोरी करने के लिए विवश हो जाते हैं, अपने मलिन हृदयों के कारण। अतः अपराधी के हृदय को स्वच्छ किए बिना, तुम केवल और अधिक कठोर विधि-प्रवर्तन से अपराध को रोक नहीं सकते। चोर और हत्यारा पहले से ही विधि जानते हैं, फिर भी वे हिंसक अपराध करते हैं, अपने मलिन हृदयों के कारण। अतः हमारी प्रक्रिया हृदय को स्वच्छ करना है। तब इस भौतिक जगत् के समस्त संकट सुलझ जाएँगे।\n\nLieutenant Mozee: यह तो अत्यन्त कठिन कार्य है, महोदय।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह कठिन नहीं है। बस सबको आमन्त्रित करो: \"आओ, हरे कृष्ण का जप करो, नृत्य करो, और भरपूर प्रसाद ग्रहण करो।\" इसमें क्या कठिनाई है? हम अपने केन्द्रों में यही कर रहे हैं, और लोग आ रहे हैं। किन्तु क्योंकि हमारे पास अत्यल्प धन है, अतः हम संकीर्तन केवल छोटे पैमाने पर ही कर पाते हैं। हम सबको आमन्त्रित करते हैं, और क्रमशः लोग हमारे केन्द्रों में आ रहे हैं और भक्त बन रहे हैं। तथापि यदि सरकार हमें कोई विशाल सुविधा दे, तो हम असीमित रूप से विस्तार कर सकते हैं। और समस्या तो बड़ी है; अन्यथा राष्ट्रीय समाचार-पत्रों में यह पूछते हुए लेख क्यों आते हैं कि क्या किया जाए? कोई भी सभ्य राज्य इस अपराधिता को नहीं चाहता। यह एक तथ्य है। किन्तु नेता यह नहीं जानते कि इसे कैसे रोका जाए। तथापि यदि वे हमारी बात सुनें, तो हम उन्हें उत्तर दे सकते हैं। अपराध क्यों? क्योंकि लोग ईश्वरविहीन हैं। और क्या करें? हरे कृष्ण का जप करो और प्रसाद ग्रहण करो। यदि तुम चाहो, तो तुम संकीर्तन की इस प्रक्रिया को अपना सकते हो। अन्यथा, हम इसे छोटे पैमाने पर ही संचालित करते रहेंगे। हम तो बस उस निर्धन चिकित्सक के समान हैं जिसका छोटा-सा निजी कार्य-व्यवसाय है किन्तु जो सुविधा मिलने पर एक बड़ा चिकित्सालय खोल सकता है। सरकार ही निष्पादक है। यदि वे हमारा परामर्श मानें और संकीर्तन की प्रक्रिया अपनाएँ, तो अपराध की समस्या सुलझ जाएगी।\n\nLieutenant Mozee: संयुक्त राज्य अमेरिका में अनेक ईसाई संगठन हैं जो पवित्र समागम (holy communion) देते हैं। यह क्यों कार्य नहीं करता? यह हृदय को स्वच्छ क्यों नहीं कर रहा?\n\nŚrīla Prabhupāda: स्पष्ट रूप से कहूँ तो, मुझे एक भी यथार्थ ईसाई पाना कठिन लगता है। तथाकथित ईसाई बाइबिल के आदेश का पालन नहीं करते। बाइबिल की दस आज्ञाओं में से एक है, \"तू हत्या मत कर।\" किन्तु वह ईसाई कहाँ है जो गाय का मांस खाकर हत्या नहीं करता? भगवान् के पवित्र नाम का जप करने और प्रसाद वितरित करने की प्रक्रिया तभी प्रभावकारी होगी जब इसे उन व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न किया जाए जो वास्तव में धर्म का आचरण कर रहे हैं। मेरे शिष्य धार्मिक सिद्धान्तों का कठोरता से पालन करने हेतु प्रशिक्षित हैं, और इसलिए ईश्वर के पवित्र नाम का उनका जप अन्यों के जप से भिन्न है। उनका जप केवल रबर-मुहर लगी स्थिति मात्र नहीं है। उन्होंने अभ्यास के द्वारा पवित्र नाम की शुद्धिकारी शक्ति का अनुभव किया है।\n\nLieutenant Mozee: महोदय, क्या कठिनाई यह नहीं है कि यद्यपि पुरोहितों और भक्तों का एक छोटा-सा वृत्त धार्मिक सिद्धान्तों का पालन कर सकता है, किन्तु जो परिधि पर हैं वे विचलित हो जाते हैं और संकट उत्पन्न करते हैं? उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि हरे कृष्ण आन्दोलन विशाल अनुपात तक बढ़ जाता है, जैसे ईसाई धर्म बढ़ा है। तब क्या आपको उन लोगों से समस्या नहीं होगी जो आन्दोलन की परिधि पर हैं, जो स्वयं को अनुयायी घोषित करते हैं किन्तु वास्तव में नहीं हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: वह सम्भावना तो सदैव रहती है, किन्तु मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि यदि तुम यथार्थ ईसाई नहीं हो, तो तुम्हारा उपदेश प्रभावकारी नहीं होगा। और क्योंकि हम धार्मिक सिद्धान्तों का कठोरता से पालन कर रहे हैं, अतः हमारा उपदेश ईश्वर-भावना के प्रसार और अपराध की समस्या के निवारण में प्रभावकारी होगा।\n\nLieutenant Mozee: महोदय, आपके समय के लिए मैं आपको धन्यवाद देने दीजिए। मैं यह टेप-अभिलेख अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुँचाऊँगा। आशा है, यह प्रभावकारी होगा, जैसे आप प्रभावकारी हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।\n\nमानव समाज अथवा पशु समाज?\n\nअगस्त 1976 में भारत की Bhavan's Journal को दिए गए एक साक्षात्कार में श्रील प्रभुपाद ने पूछा, \"पशु समाज में सुख अथवा शान्ति कैसे हो सकती है? वे लोगों को पशुओं के समान रखना चाहते हैं, और वे एक संयुक्त राष्ट्र (United Nations) बना रहे हैं.... यह केवल एक कुत्ते की दौड़ है। कुत्ता चार पैरों पर दौड़ रहा है, और तुम चार पहियों पर दौड़ रहे हो—बस इतना ही। और तुम सोचते हो कि चार पहियों की यह दौड़ सभ्यता की उन्नति है!\"\n\nInterviewer: प्रथम प्रश्न यह है: क्या धर्म का प्रभाव क्षीण हो रहा है? और यदि ऐसा है, तो क्या यह घटक भ्रष्टाचार की वृद्धि और नैतिक मूल्यों के व्यापक ह्रास का कारण है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, धर्म क्षीण हो रहा है। इसकी भविष्यवाणी *श्रीमद्भागवत* (12.2.1) में की गई है:\n\ntataś cānudinaṁ dharmaḥ\n\nsatyaṁ śaucaṁ kṣamā dayā\n\nkālena balinā rājan\n\nnaṅkṣyaty āyur balaṁ smṛtiḥ\n\n\"कलियुग में [कलह और कपट के इस वर्तमान युग में] निम्नलिखित वस्तुएँ क्षीण होती जाएँगी: धर्म, सत्यता, स्वच्छता, क्षमा, आयु की अवधि, शारीरिक बल और स्मृति।\"\n\nये मानवीय सम्पदाएँ हैं, जो मनुष्य को पशु से भिन्न बनाती हैं। किन्तु ये वस्तुएँ घटती जाएँगी। दया नहीं रहेगी, सत्यता नहीं रहेगी, स्मृति अल्प हो जाएगी, और आयु की अवधि छोटी हो जाएगी। इसी प्रकार, धर्म लुप्त हो जाएगा। इसका अर्थ है कि क्रमशः हम पशुओं के स्तर पर आ जाएँगे।\n\nInterviewer: धर्म लुप्त हो जाएगा? हम पशु बन जाएँगे?\n\nŚrīla Prabhupāda: विशेषकर जब धर्म नहीं रहता, तब वह केवल पशु जीवन ही होता है। कोई भी सामान्य मनुष्य यह विवेक कर सकता है कि कुत्ता यह नहीं समझता कि धर्म क्या है। कुत्ता भी एक जीव है, किन्तु उसकी *भगवद्गीता* अथवा *श्रीमद्भागवत* को समझने में कोई रुचि नहीं है। उसकी रुचि नहीं है। यही मनुष्य और कुत्ते के बीच का अन्तर है: पशु की रुचि नहीं होती।\n\nअतः जब मनुष्य धार्मिक वस्तुओं में अरुचि रखने लगते हैं, तब वे पशु हैं। और पशु समाज में सुख अथवा शान्ति कैसे हो सकती है? वे लोगों को पशुओं के समान रखना चाहते हैं, और वे एक संयुक्त राष्ट्र बना रहे हैं। यह कैसे सम्भव है? संयुक्त पशु, संयुक्त पशुओं के लिए समाज? ये बातें चल रही हैं।\n\nInterviewer: क्या आपको कोई आशाप्रद संकेत दिखाई देते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: कम से कम उन्होंने यह तो जान लिया है कि धर्म क्षीण हो रहा है। यह अच्छा है। \"क्षीण होना\" का अर्थ है कि वे पशु बनने जा रहे हैं। तर्कशास्त्र में कहा जाता है कि मनुष्य एक विवेकशील पशु है। जब विवेकशीलता ही लुप्त हो जाए, तब वह केवल एक पशु है, मनुष्य नहीं। मानव समाज में या तो तुम ईसाई बनो, मुसलमान बनो, हिन्दू बनो, अथवा बौद्ध; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। धर्म की कोई न कोई प्रणाली अवश्य होनी चाहिए। धर्म-रहित मानव समाज पशु समाज है। यह एक स्पष्ट तथ्य है। लोग अब इतने दुःखी क्यों हैं? क्योंकि कोई धर्म नहीं है। वे धर्म की उपेक्षा कर रहे हैं।\n\nएक सज्जन ने मुझे लिखा है कि टॉल्स्टॉय ने एक बार कहा था, \"जब तक गिरजाघर के नीचे डायनामाइट न रखा जाए, तब तक कोई शान्ति नहीं हो सकती।\" अब भी रूसी सरकार ईश्वर-भावना के अत्यन्त कठोरता से विरुद्ध है, क्योंकि वे सोचते हैं कि धर्म ने समूचे सामाजिक वातावरण को बिगाड़ दिया है।\n\nInterviewer: ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें कुछ सत्य हो सकता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: धार्मिक प्रणाली का दुरुपयोग हुआ होगा, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म से बचा जाए। यथार्थ धर्म ग्रहण करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि क्योंकि तथाकथित पुरोहितों द्वारा धर्म का समुचित निष्पादन नहीं हुआ, इसलिए धर्म को अस्वीकार कर दिया जाए। यदि मोतियाबिन्द के कारण मेरी आँख मुझे कुछ कष्ट दे रही हो, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आँख को ही निकाल फेंका जाए। मोतियाबिन्द को हटाना चाहिए। वही कृष्णभावनामृत है।\n\nInterviewer: मुझे लगता है कि इतिहास दर्शाता है कि अनेक लोगों ने धर्म का दुरुपयोग किया है। क्या यह एक तथ्य नहीं है?\n\nŚrīla Prabhupāda: इन लोगों को ईश्वर का कोई बोध नहीं है, और वे धर्म का उपदेश दे रहे हैं। धर्म क्या है? धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्: [भा. 6.3.19] \"धर्म का मार्ग साक्षात् परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित है।\" उन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं है—वे नहीं जानते कि ईश्वर क्या है—और वे किसी धर्म का व्यवसाय कर रहे हैं। यह कृत्रिम रूप से कितने समय तक चल सकता है? यह क्षीण होता जाएगा।\n\nयही वर्तमान दशा बन गई है। उन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं है, तो वे यह कैसे जानेंगे कि ईश्वर का आदेश क्या है? धर्म का अर्थ है ईश्वर का आदेश। उदाहरण के लिए, विधि का अर्थ है राज्य का आदेश। यदि राज्य ही न हो, तो आदेश कहाँ है? हमारे पास ईश्वर—श्रीकृष्ण—का स्पष्ट बोध है। वे अपना आदेश दे रहे हैं, और हम उसे स्वीकार करते हैं। यह स्पष्ट धर्म है। यदि ईश्वर ही न हो, ईश्वर का कोई बोध न हो, ईश्वर का कोई आदेश न हो, तो धर्म कहाँ है? यदि सरकार ही न हो, तो विधि कहाँ है?\n\nInterviewer: तो, कोई विधि नहीं होगी। वह एक विधि-विहीन समाज होगा।\n\nŚrīla Prabhupāda: विधि-विहीन—प्रत्येक व्यक्ति विधि-विहीन है, अपनी ही गढ़ी हुई धर्म-प्रणाली रच रहा है। यही चल रहा है।\n\nबस पूछो—किसी भी धार्मिक प्रणाली में, ईश्वर का उनका बोध क्या है? क्या कोई स्पष्ट रूप से बता सकता है? कोई नहीं बता सकता। किन्तु हम तत्काल कहेंगे,\n\nveṇuṁ kvaṇantam aravinda-dalāyatākṣaṁ\n\nbarhāvataṁsam asitāmbuda-sundarāṅgam\n\nkandarpa-koṭi-kamanīya-viśeṣa-śobhaṁ\n\ngovindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi\n\n\"मैं उन आदिपुरुष गोविन्द की आराधना करता हूँ, जो अपनी वंशी बजाने में निपुण हैं, जिनके प्रस्फुटित नेत्र कमल-पंखुड़ियों के समान हैं, जिनका मस्तक मयूर-पंख से सुशोभित है, जिनकी सौन्दर्यमयी छवि नील मेघों की आभा से रँगी है, और जिनका अनुपम लावण्य करोड़ों कामदेवों को मोहित करता है।\" (Brahma-saṁhitā 5.30) हम तत्काल ईश्वर का वर्णन दे सकते हैं।\n\nयदि ईश्वर का कोई बोध ही न हो, तो वह किस प्रकार का धर्म है?\n\nInterviewer: मैं नहीं जानता।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह कूट है। लोगों को ईश्वर का कोई बोध नहीं है, और इसलिए उन्हें धर्म की कोई समझ नहीं है। यही ह्रास है, और क्योंकि धर्म क्षीण हो रहा है, मनुष्य अधिकाधिक पशुओं के समान बनते जा रहे हैं।\n\n\"पशु\" का अर्थ है कि उसकी कोई स्मृति नहीं होती। कुत्ता तब आता है जब कुछ खाद्य वस्तुएँ होती हैं; मैं कहता हूँ \"हट्!\" और वह चला जाता है। किन्तु वह फिर आ जाता है—उसकी कोई स्मृति नहीं है। अतः जब ईश्वर के प्रति हमारी स्मृति घटती जा रही है, तो इसका अर्थ है कि हमारे मानवीय गुण घटते जा रहे हैं। कलियुग में ये मानवीय गुण घटते जाएँगे। इसका अर्थ है कि लोग बिल्लियों और कुत्तों के समान बनते जा रहे हैं।\n\nInterviewer: यह रहा दूसरा प्रश्न: \"वैदिक संस्कृति के विरुद्ध परम्परागत आरोप यह है कि वह भाग्यवादी है, कि वह लोगों को पूर्वनियति में विश्वास का दास बना देती है, और इसलिए वह प्रगति को अवरुद्ध करती है। यह आरोप कहाँ तक सत्य है?\"\n\nŚrīla Prabhupāda: वह प्रगति क्या है? क्या कुत्ते का कूदना प्रगति है? क्या वह प्रगति है? कुत्ता चार पैरों पर इधर-उधर दौड़ रहा है, और तुम मोटरगाड़ी के चार पहियों पर इधर-उधर दौड़ रहे हो। क्या वह प्रगति है? वह वैदिक प्रणाली नहीं है। वैदिक प्रणाली के अनुसार, मनुष्य के पास ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा होती है, और चूँकि मनुष्य की चेतना पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है, अतः मनुष्यों की ऊर्जा पशुओं की ऊर्जा की अपेक्षा अधिक मूल्यवान है।\n\nInterviewer: सम्भवतः कोई भी इस बात पर विवाद नहीं करेगा कि मनुष्य के पास पशुओं की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्रता, अथवा मेरा अनुमान है, उत्तरदायित्व है।\n\nŚrīla Prabhupāda: अतः मानवीय ऊर्जा का उपयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाना चाहिए, यह नहीं कि उस ऊर्जा को कुत्ते के साथ स्पर्धा करने में लगाया जाए। सन्त-पुरुष कुत्ते के समान व्यस्त नहीं रहता। आज लोग सोचते हैं कि \"कुत्तापन\" ही जीवन है, किन्तु यथार्थ जीवन तो आध्यात्मिक प्रगति है। अतः वैदिक साहित्य कहता है,\n\ntasyaiva hetoḥ prayateta kovido\n\nna labhyate yad bhramatām upary adhaḥ\n\ntal labhyate duḥkha vad anyataḥ sukhaṁ\n\nkālena sarvatra gabhīra-raṁhasā\n\n\"जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान् और दार्शनिक प्रवृत्ति के हैं, उन्हें केवल उसी प्रयोजनपूर्ण लक्ष्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए जो सर्वोच्च लोक [ब्रह्मलोक] से लेकर निम्नतम लोक [पाताल] तक भ्रमण करने पर भी प्राप्त नहीं होता। जहाँ तक इन्द्रिय-भोग से प्राप्त सुख का सम्बन्ध है, वह समय के क्रम में स्वतः प्राप्त हो जाता है, ठीक जैसे समय के क्रम में हम दुःख प्राप्त करते हैं, यद्यपि हम उनकी इच्छा नहीं करते।\" (*श्रीमद्भागवत* 1.5.18)\n\nInterviewer: क्या आप इसे थोड़ा और समझा सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: मनुष्य को अपनी ऊर्जा उस वस्तु के लिए लगानी चाहिए जो उसे अनेकानेक जन्मों में प्राप्त नहीं हुई। अनेकानेक जन्मों में आत्मा कुत्तों, अथवा देवताओं, अथवा बिल्लियों, पक्षियों, पशुओं और अन्य अनेकों के रूपों में रही है। शरीरों के 84,00,000 भिन्न प्रकार हैं। अतः आत्मा का यह देहान्तरण चल रहा है। प्रत्येक स्थिति में कार्य-व्यवसाय इन्द्रियतृप्ति ही है।\n\nInterviewer: जिसका अर्थ है?\n\nŚrīla Prabhupāda: उदाहरण के लिए, कुत्ता इन्द्रियतृप्ति के लिए व्यस्त रहता है: भोजन कहाँ है, आश्रय कहाँ है, मादा कहाँ है, रक्षा कहाँ है? मनुष्य भी वही कार्य-व्यवसाय कर रहा है, भिन्न-भिन्न ढंगों से। यह कार्य-व्यवसाय जन्म-जन्मान्तर चल रहा है। एक छोटा-सा कीट भी इसी वस्तु के लिए प्रयत्न कर रहा है। पक्षी, पशु, मछली—सर्वत्र वही संघर्ष चल रहा है। भोजन कहाँ है, मैथुन कहाँ है, आश्रय कहाँ है, और रक्षा कैसे करें? वैदिक साहित्य कहता है कि ये वस्तुएँ हमने अनेकानेक जन्मों तक की हैं, और यदि हम अस्तित्व के इस संघर्ष से बाहर न निकलें, तो हमें इन्हें पुनः अनेकानेक जन्मों तक करना पड़ेगा।\n\nInterviewer: मैं समझने लगा हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, अतः इन वस्तुओं को रोका जाना चाहिए। इसलिए प्रह्लाद महाराज यह कथन करते हैं:\n\nsukham aindriyakaṁ daityā\n\ndeha-yogena dehinām\n\nsarvatra labhyate daivād\n\nyathā duḥkham ayatnataḥ\n\n\"हे दैत्य-कुलोत्पन्न मेरे प्रिय मित्रो, शरीर के सम्पर्क से इन्द्रिय-विषयों के सन्दर्भ में जो सुख अनुभव किया जाता है, वह किसी भी जीवन-योनि में, अपने पूर्व सकाम कर्मों के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा सुख बिना प्रयत्न के स्वतः प्राप्त हो जाता है, ठीक जैसे हम दुःख प्राप्त करते हैं।\" (भा. 7.6.3)\n\nकुत्ते के पास एक शरीर है, और मेरे पास एक शरीर है। अतः, मेरा मैथुन-सुख और कुत्ते का मैथुन-सुख—इनमें कोई अन्तर नहीं है। मैथुन से प्राप्त सुख समान है। कुत्ता सबके समक्ष गली में मैथुन-सुख भोगने में नहीं डरता, और हम उसे छिपाते हैं। बस इतना ही। लोग सोचते हैं कि किसी सुन्दर भवन में मैथुन-सुख भोगना उन्नत है। तथापि, वह उन्नत नहीं है। और वे इस तथाकथित उन्नति के लिए कुत्ते की दौड़ लगा रहे हैं। लोग यह नहीं जानते कि जिसने जिस प्रकार का शरीर प्राप्त किया है, उसके अनुसार सुख पहले से ही संचित है।\n\nInterviewer: आपका क्या अभिप्राय है, \"सुख पहले से ही संचित है\"?\n\nŚrīla Prabhupāda: उसी को नियति कहते हैं। सूअर को एक निश्चित प्रकार का शरीर मिला है, और उसका खाद्य विष्ठा है। तुम इसे बदल नहीं सकते। सूअर हलवा [मीठे, घी में सिके भुने अनाज से बनी एक मिठाई] खाना पसन्द नहीं करेगा। यह सम्भव नहीं है। क्योंकि उसके पास एक विशेष प्रकार का शरीर है, अतः उसे वैसे ही खाना होगा। क्या कोई वैज्ञानिक सूअर के जीवन-स्तर को सुधार सकता है?\n\nInterviewer: मुझे सन्देह है।\n\nŚrīla Prabhupāda: अतः प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि यह पहले से ही संचित है। सुख मूलतः समान ही है, किन्तु शरीर के अनुसार कुछ भिन्न है। जंगल में रहने वाला असभ्य मनुष्य भी वही वस्तु भोग रहा है।\n\nअब लोग सोचते हैं कि सभ्यता का अर्थ है गगनचुम्बी भवनों का निर्माण करना। किन्तु वैदिक सभ्यता कहती है, नहीं, वह उन्नति नहीं है। मानव जीवन की यथार्थ उन्नति आत्म-साक्षात्कार है, कि तुमने अपने स्व का कितना साक्षात्कार किया है। यह नहीं कि तुमने गगनचुम्बी भवनों का निर्माण किया है।\n\nInterviewer: किन्तु क्या आप जो कह रहे हैं वह अधिकांश लोगों को संगत प्रतीत नहीं होगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: कभी-कभी लोग गलत समझ लेते हैं। किसी उच्च न्यायालय में, एक न्यायाधीश गम्भीरता से बैठा रहता है, प्रत्यक्षतः कुछ नहीं करता, और उसे उच्च वेतन मिलता है। कोई दूसरा सोच रहा है, \"मैं इसी न्यायालय में इतना कठोर परिश्रम कर रहा हूँ, रबर-मुहर लगा रहा हूँ—और मुझे न्यायाधीश के वेतन का दसवाँ भाग भी नहीं मिलता।\" वह सोच रहा है, \"मैं इतना व्यस्त हूँ, इतना कठोर परिश्रम कर रहा हूँ, और मुझे उस मनुष्य जितना अच्छा वेतन नहीं मिलता जो केवल आसन पर बैठा रहता है।\" स्थिति वैसी ही है: वैदिक सभ्यता आत्म-साक्षात्कार के लिए है, कुत्ते की दौड़ के लिए नहीं।\n\nInterviewer: फिर भी, क्या कठोर परिश्रम करना, संघर्ष करना, और अन्ततः जीवन में \"आगे निकल जाना\" प्रायः सम्माननीय नहीं माना जाता?\n\nŚrīla Prabhupāda: *भगवद्गीता* में कर्मियों, सकाम कर्म करने वालों, का वर्णन मूढ़ों, गधों के रूप में किया गया है। उन्हें गधों से क्यों उपमित किया गया है? क्योंकि गधा अपनी पीठ पर भार लादकर अत्यन्त कठोर परिश्रम करता है, और बदले में उसका स्वामी उसे केवल घास का एक छोटा-सा ग्रास देता है। वह धोबी के द्वार पर खड़ा रहता है और घास खाता है जबकि धोबी पुनः उसकी पीठ पर भार लाद देता है। उसके पास यह सोचने का विवेक नहीं कि \"यदि मैं धोबी की कुटिया से बाहर निकल जाऊँ, तो मुझे कहीं भी घास मिल सकती है। मैं इतना भार क्यों ढो रहा हूँ?\"\n\nInterviewer: इससे मुझे कुछ ऐसे लोगों का स्मरण हो आता है जिन्हें मैं जानता हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: सकाम कर्मी वैसा ही है। वह कार्यालय में अत्यन्त व्यस्त रहता है, और यदि तुम उससे मिलना चाहो तो वह कहेगा, \"मैं अत्यन्त व्यस्त हूँ।\" तो तुम्हारे इतने व्यस्त रहने का परिणाम क्या है? वह दो टुकड़े टोस्ट और एक प्याला चाय लेता है। और इसी प्रयोजन के लिए तुम इतने व्यस्त हो? वह नहीं जानता कि वह क्यों व्यस्त है। बही-खातों में वह पाएगा कि शेष राशि दस लाख डॉलर थी और अब वह बीस लाख हो गई है। वह इससे सन्तुष्ट है, किन्तु वह केवल दो टुकड़े टोस्ट और एक प्याला चाय ही लेगा, फिर भी वह अत्यन्त कठोर परिश्रम करेगा। कर्मी का यही अर्थ है। गधे—वे गधों के समान कार्य करते हैं, जीवन में बिना किसी लक्ष्य के।\n\nकिन्तु वैदिक सभ्यता भिन्न है। यह आरोप सही नहीं है—वैदिक सभ्यता के लोग तनिक भी आलसी नहीं होते। वे किसी उच्चतर विषय के लिए व्यस्त रहते हैं। प्रह्लाद महाराज इस बात पर बल देते हैं कि यह व्यस्तता इतनी महत्त्वपूर्ण है कि इसे बाल्यकाल से ही आरम्भ कर देना चाहिए। कौमार आचरेत् प्राज्ञः: मनुष्य को एक क्षण का भी समय नहीं गँवाना चाहिए। यही वैदिक सभ्यता है। गधे देखते हैं, \"ये मनुष्य मेरी भाँति कार्य नहीं कर रहे\"—कुत्तों और गधों की भाँति—और वे यह समझते हैं कि हम पलायन कर रहे हैं। हाँ, तुम्हारे निष्फल प्रयास से पलायन कर रहे हैं। वैदिक सभ्यता आत्म-साक्षात्कार के लिए है।\n\nInterviewer: क्या आप हमें वैदिक सभ्यता कैसी है, इसका और अधिक बोध दे सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: वैदिक सभ्यता वर्णाश्रम प्रणाली से आरम्भ होती है। वर्णाश्रम प्रणाली में यह व्यवस्था है: ब्राह्मण [बुद्धिजीवी, परामर्शदाता], क्षत्रिय [प्रशासक], वैश्य [वणिक्, कृषक], शूद्र [श्रमिक], ब्रह्मचारी [ब्रह्मचर्यनिष्ठ विद्यार्थी], गृहस्थ [गृहस्थी], वानप्रस्थ [सेवानिवृत्त विवाहित जन], और संन्यासी [विरक्त संन्यासी]।\n\nपरम लक्ष्य यह है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण की आराधना की जाए। अतः यदि तुम श्रीकृष्ण की आराधना करते हो, तो तुम अपने समस्त वृत्तिगत कर्तव्यों को पूर्ण करते हो, चाहे ब्राह्मण के रूप में, क्षत्रिय के रूप में, वैश्य के रूप में, शूद्र के रूप में, ब्रह्मचारी के रूप में, किसी भी रूप में। इसे तत्काल अपनाओ—कृष्णभावनामृत को अपनाओ। यह इतना महत्त्वपूर्ण है।\n\nInterviewer: यदि लोग वास्तव में किसी ऐसी जीवन-शैली के विषय में जानते जो अधिक स्वाभाविक, अधिक परितृप्तिकारी हो, तो क्या समस्या होती? वे तो, जैसा आप कहते हैं, वास्तव में उसे अपना लेते।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु वे नहीं जानते, और इसलिए कोई धर्म नहीं है, केवल एक कुत्ते की दौड़ है। कुत्ता चार पैरों पर दौड़ रहा है, और तुम चार पहियों पर दौड़ रहे हो—बस इतना ही। और तुम सोचते हो कि चार पहियों की यह दौड़ सभ्यता की उन्नति है।\n\nअतः, आधुनिक सभ्यता व्यावहारिक रूप से कुछ न करने वाली कही जाती है। नियति द्वारा जो भी प्राप्य है वह तुम्हें मिल जाएगा, तुम जहाँ भी हो। बल्कि, कृष्णभावनामृत को अपनाओ। प्रह्लाद महाराज द्वारा यह उदाहरण दिया गया है कि तुम कोई अप्रिय वस्तु नहीं चाहते फिर भी वह तुम पर आ पड़ती है। इसी प्रकार, यदि तुम वह सुख भी न चाहो जिसके लिए तुम नियत हो, तो वह तुम पर आ पड़ेगा। तुम्हें भौतिक सुख के लिए अपनी ऊर्जा का अपव्यय नहीं करना चाहिए। तुम उससे अधिक भौतिक सुख प्राप्त नहीं कर सकते जितने के लिए तुम नियत हो।\n\nInterviewer: आप इस विषय में इतने निश्चित कैसे हो सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: मैं इस पर विश्वास कैसे करूँ? क्योंकि तुम्हें कोई दुःखपूर्ण दशा प्राप्त होती है, यद्यपि तुम उसे नहीं चाहते। उदाहरण के लिए, राष्ट्रपति केनेडी अपने ही देशवासी के हाथों मारे गए। उसे कौन चाहता था, और वह क्यों आ पड़ा? वे एक महान् व्यक्ति थे, अनेकों द्वारा सुरक्षित थे, फिर भी वे मारे जाने के लिए नियत थे। तुम्हारी रक्षा कौन कर सकता है?\n\nअतः यदि नियति द्वारा कोई दुःखपूर्ण दशा मुझ पर आ पड़ती है, तो विपरीत स्थिति—सुख—भी आ पड़ेगी। मैं इस सुधार के लिए अपना समय क्यों गँवाऊँ? मुझे अपनी ऊर्जा कृष्णभावनामृत के लिए लगाने दो। वही बुद्धिमत्ता है। तुम अपनी नियति को रोक नहीं सकते। प्रत्येक व्यक्ति सुख की एक निश्चित मात्रा और दुःख की एक निश्चित मात्रा का अनुभव करेगा। कोई भी अबाधित सुख नहीं भोग रहा। यह सम्भव नहीं है।\n\nजिस प्रकार तुम अपने दुःख को रोक नहीं सकते, उसी प्रकार तुम अपने सुख को भी रोक नहीं सकते। यह स्वतः आएगा। अतः इन वस्तुओं के लिए अपना समय व्यर्थ मत गँवाओ। बल्कि, तुम्हें अपना समय कृष्णभावनामृत में उन्नति करने के लिए उपयोग करना चाहिए।\n\nInterviewer: क्या एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति प्रगति के लिए प्रयत्न नहीं करेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: बात यह है कि यदि तुम व्यर्थ ही प्रगति के लिए प्रयत्न करो, तो उसका क्या लाभ? यदि यह तथ्य है कि तुम अपनी नियति को बदल नहीं सकते, तो प्रयत्न करने का क्या लाभ? हम सुख और दुःख की उस मात्रा से सन्तुष्ट रहेंगे जिसके लिए हम नियत हैं।\n\nवैदिक सभ्यता ईश्वर के साक्षात्कार के लिए है। यही मुख्य बात है। तुम भारत में आज भी पाओगे कि महत्त्वपूर्ण पर्वों के समय कई करोड़ों लोग गंगा में स्नान करने आते हैं, क्योंकि उनकी रुचि इसमें है कि मुक्त कैसे हुआ जाए। वे आलसी नहीं हैं। वे हजारों मील, दो हजार मील दूर जाकर गंगा में स्नान करते हैं। वे आलसी नहीं हैं, किन्तु वे कुत्ते की दौड़ में व्यस्त नहीं हैं। बल्कि, वे अपने बाल्यकाल से ही आत्म-साक्षात्कारी बनने का प्रयत्न करने में व्यस्त रहते हैं। कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतान् इह [भा. 7.6.1]। वे इतने व्यस्त रहते हैं कि वे इस कार्य-व्यवसाय को अपने बाल्यकाल से ही आरम्भ करना चाहते हैं। अतः यह सोचना गलत धारणा है कि वे आलसी हैं।\n\nInterviewer: तब यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यदि नियति को रोका नहीं जा सकता, तो क्यों न प्रत्येक नवजात शिशु को केवल एक पशु की भाँति इधर-उधर दौड़ने दिया जाए, और जो भी उसके साथ होना नियत है वह हो जाएगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, लाभ यह है कि तुम उसे आध्यात्मिक रूप से प्रशिक्षित कर सकते हो। इसीलिए कहा गया है, तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदः: तुम्हें अपनी ऊर्जा आत्म-साक्षात्कार के लिए लगानी चाहिए। अहैतुक्य् अप्रतिहता: भक्ति, कृष्णभावनामृत, रोकी नहीं जा सकती। जिस प्रकार भौतिक नियति को रोका नहीं जा सकता, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में तुम्हारी उन्नति को भी रोका नहीं जा सकता यदि तुम उसके लिए प्रयत्न करो।\n\nवास्तव में, श्रीकृष्ण नियति को बदल देंगे—किन्तु केवल अपने भक्त के लिए। वे कहते हैं, अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि: \"मैं तुम्हें समस्त पापकर्मों की प्रतिक्रियाओं से पूर्ण रक्षा प्रदान करूँगा।\" (*भगवद्गीता* 18.66)\n\nउदाहरण के लिए, यदि किसी को न्यायालय द्वारा फाँसी का दण्ड दिया गया हो, तो उसे कोई रोक नहीं सकता। यहाँ तक कि वही न्यायाधीश जिसने यह निर्णय दिया है, वह भी इसे रोक नहीं सकता। किन्तु यदि अभियुक्त राजा से, जो समस्त विधियों के ऊपर है, कृपा की याचना करे, तो राजा इसे रोक सकता है।\n\nअतः, हमारा कार्य-व्यवसाय श्रीकृष्ण के प्रति शरणागत होना है। यदि हम आर्थिक विकास से कृत्रिम रूप से अधिक सुखी होना चाहें, तो वह सम्भव नहीं है। इतने सारे मनुष्य इतना कठोर परिश्रम कर रहे हैं, किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति Henry Ford अथवा Rockefeller बन जाएगा? प्रत्येक व्यक्ति अपना सर्वोत्तम प्रयत्न कर रहा है। श्री Ford की नियति धनी मनुष्य बनने की थी, किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक अन्य मनुष्य जिसने Ford जितना कठोर परिश्रम किया है, वह Ford के समान धनी मनुष्य बन जाएगा? नहीं। यह व्यावहारिक है। तुम गधे अथवा कुत्ते की भाँति केवल कठोर परिश्रम करके अपनी नियति को बदल नहीं सकते। किन्तु तुम उस ऊर्जा का उपयोग अपने कृष्णभावनामृत को उन्नत करने के लिए कर सकते हो।\n\nInterviewer: कृष्णभावनामृत वास्तव में क्या है? क्या आप हमें और अधिक बता सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: ईश्वर के प्रति प्रेम—यही कृष्णभावनामृत है। यदि तुमने ईश्वर से प्रेम करना नहीं सीखा, तो तुम्हारे धर्म का क्या अर्थ है? जब तुम वास्तव में ईश्वर-प्रेम के स्तर पर होते हो, तब तुम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझते हो—\"मैं ईश्वर का अंश हूँ।\" तब तुम अपना प्रेम पशु तक भी विस्तृत करते हो। यदि तुम वास्तव में ईश्वर से प्रेम करते हो, तो कीट के प्रति भी तुम्हारा प्रेम विद्यमान रहता है। तुम समझते हो, \"इस कीट का शरीर भिन्न है, किन्तु यह भी मेरे पिता का अंश है; इसलिए, यह मेरा भाई है।\" तब तुम बूचड़खाना नहीं चला सकते। यदि तुम बूचड़खाना चलाते हो और ईसा मसीह के आदेश, \"तू हत्या मत कर,\" की अवज्ञा करते हो, और स्वयं को ईसाई अथवा हिन्दू घोषित करते हो, तो वह धर्म नहीं है। तब वह केवल समय का अपव्यय है—क्योंकि तुम ईश्वर को नहीं समझते; तुम्हें ईश्वर के प्रति कोई प्रेम नहीं है, और तुम स्वयं को किसी सम्प्रदाय के अन्तर्गत नामांकित करते हो, किन्तु वहाँ कोई यथार्थ धर्म नहीं है। यही समस्त संसार में चल रहा है।\n\nInterviewer: हम इस स्थिति को कैसे ठीक कर सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। यदि तुम यह स्वीकार नहीं करते कि श्रीकृष्ण परम सत्ता हैं, तो उसे समझने का प्रयत्न करो। यही शिक्षा है: कोई परम सत्ता है; श्रीकृष्ण भारतीय नहीं हैं; वे ईश्वर हैं। सूर्य सर्वप्रथम भारत में उदित होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि सूर्य भारतीय है; इसी प्रकार, यद्यपि श्रीकृष्ण भारत में प्रकट हुए, अब वे इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन के माध्यम से पश्चिमी देशों में आ गए हैं।\n\nपरोपकार: अस्थायी और शाश्वत\n\n1972 में, दक्षिण भारतीय राज्य आन्ध्र प्रदेश एक भीषण अकाल से ग्रस्त हुआ जिसने कई करोड़ों लोगों को प्रभावित किया। इस आशा से कि अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ सहायता प्रदान करेगा, आन्ध्र प्रदेश राहत कोष समिति के सचिव T. L. Katidia ने श्रील प्रभुपाद को पत्र लिखा। श्रील प्रभुपाद ने इस आश्चर्यजनक और बोधप्रद पत्र से उत्तर दिया।\n\nपूज्य स्वामीजी,\n\nजुड़वाँ नगरों के निवासी आपसे और आपके सम्माननीय अनुयायियों से मिलने का यह अवसर पाकर प्रसन्न हैं। आपको ज्ञात होगा कि गत दो वर्षों में अपर्याप्त वर्षा और इस वर्ष उसके पूर्ण अभाव के कारण, हमारे राज्य [आन्ध्र प्रदेश, दक्षिण भारत का एक राज्य] का आधे से अधिक भाग एक गम्भीर अकाल की चपेट में है। इस अनिष्ट से निपटने के शासकीय प्रयासों के अनुपूरण की दृष्टि से, जीवन के विविध क्षेत्रों से लिए गए नागरिकों का एक केन्द्रीय स्वैच्छिक संगठन स्थापित किया गया है। इस संगठन के सदस्यों ने अकाल से प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया। स्थिति करुणाजनक है। ऐसे गाँव हैं जहाँ मीलों तक पीने का जल उपलब्ध नहीं है। चारे की कमी के कारण, पशु-स्वामी अपने पशुओं को नाममात्र के मूल्य पर बेच रहे हैं। अनेक आवारा पशु चारे और जल की अनुपलब्धता के कारण मर रहे हैं। खाद्य की समस्या भी अत्यन्त गम्भीर है। खुले बाजार में खाद्यान्नों के ऊँचे मूल्यों के कारण, बाजार मूल्यों पर अनाज का क्रय निर्धन ग्रामवासियों की पहुँच से परे है, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम पचास से साठ लाख लोग मुश्किल से दिन में एक बार भोजन कर पा रहे हैं। ऐसे अनेक हैं जो भुखमरी के कगार पर हैं। समूची स्थिति अत्यन्त करुणाजनक और हृदयविदारक है।\n\nअतः हम आपके पूज्य स्वरूप से अपील करते हैं कि विचार करें कि आपका संघ किस प्रकार सर्वोत्तम रीति से इन कई करोड़ों जीवों के उद्धार के लिए आगे आ सकता है जो अकल्पनीय दुःख में हैं। समिति यह सुझाव देना चाहेगी कि आपके संघ के सदस्य आपके प्रवचन में उपस्थित होने वाले भक्तों [भक्तगण] से अपील करें कि वे आन्ध्र प्रदेश राहत कोष में अपना यथाशक्ति अंशदान करें।\n\nसमिति अपने कुछ प्रतिनिधियों को आपके संघ के सदस्यों के साथ वहाँ भेजने के लिए तैयार है जहाँ कहीं भी आप राज्य के भूखे करोड़ों लोगों में प्रसाद वितरित करना चाहें।\n\nचूँकि मानव-सेवा ही माधव-सेवा है [\"मनुष्य की सेवा ईश्वर की सेवा है\"], समिति को विश्वास है कि आपके कृपालु संघ का थोड़ा-सा प्रयास भी लाखों लोगों के कष्टों को कम करने में बहुत दूर तक सहायक होगा।\n\nभगवान् की सेवा में आपका सदैव,\n\nटी. एल. कटिदिया, सचिव\n\nआन्ध्र प्रदेश राहत कोष समिति\n\nहैदराबाद, भारत\n\nमेरे प्रिय श्री कटिदिया,\n\nकृपया मेरा अभिवादन स्वीकार करें। आपके पत्र तथा आपकी व्यक्तिगत भेंट के सन्दर्भ में, मैं आपको यह सूचित करना चाहता हूँ कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न किए बिना कोई भी सुखी नहीं हो सकता। दुर्भाग्यवश लोग यह नहीं जानते कि भगवान् कौन हैं और उन्हें किस प्रकार प्रसन्न किया जाए। अतः हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन इसी हेतु है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रत्यक्ष रूप से जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। जैसा कि *श्रीमद्भागवत* के सप्तम स्कन्ध, षष्ठ अध्याय में कहा गया है: tuṣṭe ca tatra kim alabhyam ananta ādye/ kiṁ tair guṇa-vyatikarād iha ye sva-siddhāḥ।\n\nइस श्लोक में निहित भाव यह है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न करने से हम सभी को प्रसन्न कर लेते हैं, और तब अभाव का कोई प्रश्न ही नहीं रहता। चूँकि लोग सफलता के इस रहस्य को नहीं जानते, इसलिए वे सुखी होने के लिए अपनी-अपनी स्वतन्त्र योजनाएँ बनाते हैं। किन्तु इस प्रकार सुख प्राप्त करना सम्भव नहीं है। आपके पत्र-शीर्ष पर मुझे इस देश के अनेक प्रमुख व्यक्ति दिखाई देते हैं जो जनता के कष्टों को दूर करने में रुचि रखते हैं, परन्तु उन्हें यह निश्चय जान लेना चाहिए कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न किए बिना उनके समस्त प्रयास निष्फल रहेंगे। रोगग्रस्त मनुष्य केवल किसी कुशल चिकित्सक तथा औषधि के बल पर जीवित नहीं रह सकता। यदि ऐसा होता, तो कोई भी धनवान् कभी न मरता। मनुष्य पर *श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्* की कृपा होनी चाहिए।\n\nअतः यदि आप केवल कोष-संग्रह द्वारा राहत-कार्य करना चाहते हैं, तो मेरे विचार से वह सफल नहीं होगा। आपको परम सत्ता को प्रसन्न करना होगा, और यही सफलता का मार्ग है। उदाहरणार्थ, यहाँ संकीर्तन के सम्पादन के कारण, दो वर्षों के अकाल के पश्चात् वर्षा होने लगी है। पिछली बार जब हमने दिल्ली में हरे कृष्ण महोत्सव सम्पन्न किया था, तब पाकिस्तान द्वारा युद्ध घोषित किए जाने का निकट संकट था, और जब एक समाचारपत्र के संवाददाता ने मेरी राय जाननी चाही, तो मैंने कहा कि युद्ध तो अवश्य होगा क्योंकि दूसरा पक्ष आक्रामक है। तथापि, हमारे संकीर्तन आन्दोलन के कारण भारत विजयी हुआ। इसी प्रकार, जब हमने कलकत्ता में एक महोत्सव किया, तब नक्सलवादी [साम्यवादी] आन्दोलन थम गया। ये तथ्य हैं। संकीर्तन आन्दोलन के माध्यम से हम न केवल जीवन की समस्त सुविधाएँ प्राप्त कर सकते हैं, अपितु अन्ततः भगवद्धाम भी लौट सकते हैं। जो असुर-स्वभाव के हैं वे इसे नहीं समझ सकते, किन्तु यह तथ्य है।\n\nअतएव मैं आपसे, समाज के अग्रणी सदस्यों के रूप में, इस आन्दोलन में सम्मिलित होने का अनुरोध करता हूँ। हरे कृष्ण मन्त्र के जप से किसी की कोई हानि नहीं होती, अपितु लाभ महान् है। *भगवद्गीता* (3.21) के अनुसार, जो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा स्वीकार किया जाता है, उसे सामान्य जन भी स्वीकार करते हैं:\n\nyad yad ācarati śreṣṭhas\n\ntat tad evetaro janaḥ\n\nsa yat pramāṇaṁ kurute\n\nlokas tad anuvartate\n\n\"श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य जन उसी का अनुसरण करते हैं। और वह अपने अनुकरणीय कर्मों से जो मानदण्ड स्थापित करता है, समस्त संसार उसी का अनुसरण करता है।\"\n\nकृष्णभावनामृत का संकीर्तन आन्दोलन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अतः आपके माध्यम से मैं भारत के समस्त अग्रणी पुरुषों से यह अपील करना चाहता हूँ कि वे इस आन्दोलन को अत्यन्त गम्भीरता से स्वीकार करें और इस आन्दोलन को समस्त संसार में फैलाने हेतु हमें समस्त सुविधाएँ प्रदान करें। तब न केवल भारत में अपितु समस्त संसार में अत्यन्त सुखमय स्थिति होगी।\n\nइस आशा के साथ कि यह पत्र आपको अच्छे स्वास्थ्य में मिलेगा,\n\nआपका सदा हितैषी,\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी\n\nईश्वर पर अपनी निर्भरता की घोषणा\n\nअनेकों के लिए अमेरिकी द्विशताब्दी उत्सव का एक महान् अवसर था। मार्च 1976 में, मायापुर, भारत में, बैक टु गॉडहेड के सम्पादकों ने श्रील प्रभुपाद का एक विशेष साक्षात्कार लिया, जिसमें उन्होंने \"समस्त मनुष्य समान बनाए गए हैं,\" \"ईश्वर में हम विश्वास रखते हैं,\" तथा \"ईश्वर के अधीन एक राष्ट्र\" जैसे अमेरिकी सूत्रों पर कठोर दृष्टि डाली।\n\nBack to Godhead: थॉमस जेफरसन ने अमेरिकी क्रान्ति के मूल दर्शन को स्वातन्त्र्य-घोषणापत्र में अंकित किया। उस समय के प्रमुख व्यक्तियों ने, जिन्होंने इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए, यह स्वीकार किया कि कुछ अत्यन्त स्पष्ट अथवा स्वतःसिद्ध सत्य हैं, जिनमें प्रथम यह है कि समस्त मनुष्य समान बनाए गए हैं। इससे उनका तात्पर्य था कि समस्त मनुष्य विधि के समक्ष समान हैं और विधि द्वारा संरक्षित होने का समान अवसर रखते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, उस अर्थ में, जैसा आप कहते हैं, मनुष्य समान बनाए गए हैं।\n\nBTG: स्वातन्त्र्य-घोषणापत्र का एक अन्य बिन्दु यह है कि समस्त मनुष्यों को ईश्वर द्वारा कुछ नैसर्गिक अधिकार प्रदान किए गए हैं जिन्हें उनसे छीना नहीं जा सकता। ये हैं जीवन, स्वतन्त्रता, तथा...\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु पशुओं को भी जीवन का अधिकार है। पशुओं को भी जीने का अधिकार क्यों नहीं? उदाहरणार्थ, खरगोश वन में अपने ढंग से जी रहे हैं। सरकार शिकारियों को जाकर उन्हें मारने की अनुमति क्यों देती है?\n\nBTG: वे तो केवल मनुष्यों के विषय में बात कर रहे थे।\n\nŚrīla Prabhupāda: तब उनके पास कोई वास्तविक दर्शन नहीं है। यह संकीर्ण विचार कि मेरा परिवार अथवा मेरा भाई भला है, और मैं शेष सबको मार सकता हूँ, अपराध है। मान लीजिए कि अपने परिवार के लिए मैं आपके पिता को मार डालूँ। क्या यह दर्शन है? वास्तविक दर्शन है suhṛdaṁ sarva-bhūtānām: समस्त जीवों के प्रति मित्रभाव। निःसन्देह यह मनुष्यों पर लागू होता है, किन्तु यदि आप अनावश्यक रूप से एक पशु को भी मारें, तो मैं तत्काल विरोध करूँगा, \"तुम यह कैसी बकवास कर रहे हो?\"\n\nBTG: अमेरिका के संस्थापकों ने कहा कि एक अन्य नैसर्गिक अधिकार है स्वतन्त्रता का अधिकार, अथवा स्वाधीनता—इस अर्थ में स्वाधीनता कि सरकार को यह बताने का अधिकार नहीं कि तुम्हें कैसा कार्य करना है।\n\nŚrīla Prabhupāda: यदि सरकार पूर्ण नहीं है, तो उसे लोगों को यह बताने की अनुमति नहीं होनी चाहिए कि उन्हें क्या करना है। किन्तु यदि सरकार पूर्ण है, तो वह बता सकती है।\n\nBTG: तीसरा नैसर्गिक अधिकार जिसका उन्होंने उल्लेख किया, वह यह था कि प्रत्येक मनुष्य को सुख की खोज का अधिकार है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। किन्तु आपका सुख का मानदण्ड मेरे मानदण्ड से भिन्न हो सकता है। आपको मांस खाना रुचिकर लगे; मुझे उससे घृणा है। आपका सुख का मानदण्ड मेरे मानदण्ड के समान कैसे हो सकता है?\n\nBTG: तो क्या प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि वह जो भी सुख का मानदण्ड चाहे, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करे?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, सुख का मानदण्ड व्यक्ति के गुणों के अनुसार निर्धारित होना चाहिए। आपको समस्त समाज को चार वर्गों में विभाजित करना होगा: ब्राह्मण-गुण वाले, क्षत्रिय-गुण वाले, वैश्य-गुण वाले, तथा शूद्र-गुण वाले।* प्रत्येक व्यक्ति को अपने नैसर्गिक गुणों के अनुसार कार्य करने की उत्तम सुविधा मिलनी चाहिए।\n\nआप बैल को घोड़े के काम में नहीं लगा सकते, न ही घोड़े को बैल के काम में लगा सकते हैं। आज व्यावहारिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त कर रहा है। किन्तु इन महाविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाता है? अधिकांशतः तकनीकी ज्ञान, जो शूद्र-शिक्षा है। वास्तविक उच्च शिक्षा का अर्थ है वैदिक प्रज्ञा सीखना। यह ब्राह्मणों के लिए है। केवल शूद्र-शिक्षा से अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा होनी चाहिए कि वह किस शिक्षा के योग्य है। कुछ शूद्रों को तकनीकी शिक्षा दी जा सकती है, किन्तु अधिकांश शूद्रों को खेतों में कार्य करना चाहिए। चूँकि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचकर नगरों में शिक्षा प्राप्त करने आ रहा है कि \"हम अधिक धन कमा सकते हैं,\" इसलिए कृषि की उपेक्षा हो रही है। अब अभाव है क्योंकि उत्तम अन्न उत्पन्न करने में कोई संलग्न नहीं है। ये समस्त विसंगतियाँ कुशासन के कारण उत्पन्न हुई हैं। यह देखना सरकार का कर्तव्य है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने नैसर्गिक गुणों के अनुसार संलग्न हो। तब लोग सुखी होंगे।\n\nBTG: तो यदि सरकार कृत्रिम रूप से समस्त मनुष्यों को एक ही वर्ग में रख दे, तब सुख नहीं हो सकता।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, वह अस्वाभाविक है और अव्यवस्था उत्पन्न करेगा।\n\nBTG: अमेरिका के संस्थापक पितरों को वर्ग रुचिकर नहीं थे, क्योंकि उन्हें उनसे बहुत बुरा अनुभव हुआ था। क्रान्ति से पूर्व अमेरिकी लोग राजाओं के शासन में रहे थे, किन्तु राजा सदैव अत्याचारी तथा अन्यायी बन जाते थे।\n\nŚrīla Prabhupāda: क्योंकि वे साधु-राजा बनने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे। वैदिक सभ्यता में, बालकों को जीवन के आरम्भ से ही प्रथम श्रेणी के ब्रह्मचारियों [ब्रह्मचर्यव्रती विद्यार्थियों] के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था। वे गुरुकुल, अर्थात् आध्यात्मिक गुरु की पाठशाला में जाते, और आत्म-संयम, स्वच्छता, सत्यनिष्ठा तथा अनेक अन्य साधु-गुण सीखते थे। उनमें से श्रेष्ठतम आगे चलकर देश पर शासन करने के योग्य होते थे।\n\nअमेरिकी क्रान्ति का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। बात यह है कि जब लोग दुःखी हो जाते हैं, तब वे विद्रोह करते हैं। वह अमेरिका में हुआ, वह फ्रांस में हुआ, और वह रूस में हुआ।\n\nBTG: अमेरिकी क्रान्तिकारियों ने कहा कि यदि कोई सरकार लोगों पर समुचित रूप से शासन करने में विफल रहे, तब लोगों को उस सरकार को भंग करने का अधिकार है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। जैसे निक्सन के मामले में: उन्होंने उसे नीचे खींच लिया। किन्तु यदि वे निक्सन के स्थान पर एक अन्य निक्सन को बैठा दें, तो उसका क्या मूल्य? उन्हें यह जानना चाहिए कि निक्सन के स्थान पर एक साधु-नेता को कैसे बैठाया जाए। चूँकि लोगों के पास वह प्रशिक्षण तथा वह संस्कृति नहीं है, इसलिए वे एक के बाद एक निक्सन को चुनते रहेंगे और कभी सुखी नहीं होंगे। लोग सुखी हो सकते हैं। सुख का सूत्र *भगवद्गीता* में विद्यमान है। सर्वप्रथम उन्हें यह जानना चाहिए कि यह भूमि ईश्वर की है। अमेरिकी यह दावा क्यों करते हैं कि यह भूमि उनकी है? जब प्रथम बसने वाले अमेरिका गए, तब उन्होंने कहा, \"यह भूमि ईश्वर की है; अतः यहाँ रहने का हमें अधिकार है।\" तो अब वे दूसरों को इस भूमि पर बसने की अनुमति क्यों नहीं देते? उनका क्या दर्शन है? अनेकों अति-जनसंख्या वाले देश हैं। अमेरिकी सरकार को उन लोगों को अमेरिका आने देना चाहिए और उन्हें भूमि जोतने तथा अन्न उत्पन्न करने की सुविधा देनी चाहिए। वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे? उन्होंने बलपूर्वक दूसरों की सम्पत्ति ले ली है, और बलपूर्वक वे दूसरों को वहाँ जाने से रोक रहे हैं। इसके पीछे क्या दर्शन है?\n\nBTG: कोई दर्शन नहीं है।\n\nŚrīla Prabhupāda: धूर्तता ही उनका दर्शन है। वे बलपूर्वक सम्पत्ति ले लेते हैं, और फिर एक विधि बना देते हैं कि कोई बलपूर्वक दूसरे की सम्पत्ति नहीं ले सकता। अतः वे चोर हैं। वे ईश्वर की सम्पत्ति को ईश्वर के पुत्रों द्वारा अधिकृत किए जाने से नहीं रोक सकते। अमेरिका तथा संयुक्त राष्ट्र के अन्य देशों को यह सहमत होना चाहिए कि जहाँ कहीं पर्याप्त भूमि हो, उसका उपयोग मानव-समाज द्वारा अन्न उत्पन्न करने हेतु किया जा सकता है। सरकार कह सकती है, \"ठीक है, तुम अति-जनसंख्या वाले हो। तुम्हारे लोग यहाँ आ सकते हैं। हम उन्हें भूमि देंगे, और वे अन्न उत्पन्न कर सकते हैं।\" तब हम एक अद्भुत परिणाम देखेंगे। किन्तु क्या वे ऐसा करेंगे? नहीं। तो उनका क्या दर्शन है? धूर्तता। \"मैं बलपूर्वक भूमि लूँगा, और फिर दूसरों को यहाँ आने नहीं दूँगा।\"\n\nBTG: एक अमेरिकी सूत्रवाक्य है \"ईश्वर के अधीन एक राष्ट्र।\"\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, वही कृष्णभावनामृत है। ईश्वर के अधीन एक राष्ट्र होना चाहिए, और साथ ही ईश्वर के अधीन एक विश्व-सरकार भी। समस्त वस्तुएँ ईश्वर की हैं, और हम सब उनके पुत्र हैं। वही दर्शन वांछित है।\n\nBTG: किन्तु अमेरिका में लोग एक केन्द्रीय सरकार से बहुत भयभीत रहते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि जब भी कोई सशक्त सरकार होती है, तब सदैव अत्याचार होगा।\n\nŚrīla Prabhupāda: यदि नेता समुचित रूप से प्रशिक्षित हों, तो अत्याचार नहीं हो सकता।\n\nBTG: किन्तु अमेरिकी शासन-व्यवस्था की एक मान्यता यह है कि यदि किसी नेता के पास बहुत अधिक शक्ति हो, तो वह अवश्यमेव भ्रष्ट हो जाएगा।\n\nŚrīla Prabhupāda: तुम्हें उसे इस प्रकार प्रशिक्षित करना होगा कि वह भ्रष्ट हो ही न सके!\n\nBTG: वह प्रशिक्षण-प्रक्रिया क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: वह प्रशिक्षण वर्णाश्रम-धर्म है। समाज को गुण के अनुसार विभाजित करो और लोगों को इस सिद्धान्त में प्रशिक्षित करो कि समस्त वस्तुएँ ईश्वर की हैं और उन्हें ईश्वर की सेवा में प्रयुक्त होना चाहिए। तब वास्तव में \"ईश्वर के अधीन एक राष्ट्र\" हो सकता है।\n\nBTG: किन्तु यदि समाज भिन्न-भिन्न वर्गों में विभाजित हो, तो क्या ईर्ष्या नहीं होगी?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं। जिस प्रकार मेरे शरीर में भिन्न-भिन्न अंग हैं जो मिलकर कार्य करते हैं, उसी प्रकार समाज के भिन्न-भिन्न अंग एक ही लक्ष्य के लिए कार्य कर सकते हैं। मेरा हाथ मेरे पैर से भिन्न है। किन्तु जब मैं हाथ से कहता हूँ, \"एक गिलास जल ले आओ,\" तब पैर सहायता करता है। पैर की आवश्यकता है, और हाथ की भी आवश्यकता है।\n\nBTG: किन्तु पाश्चात्य संसार में हमारे पास एक श्रमिक वर्ग तथा एक पूँजीपति वर्ग है, और दोनों के बीच सदैव संघर्ष चलता रहता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। पूँजीपति वर्ग की आवश्यकता है, और श्रमिक वर्ग की भी आवश्यकता है।\n\nBTG: किन्तु वे लड़ रहे हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: क्योंकि वे प्रशिक्षित नहीं हैं; उनका कोई सामान्य उद्देश्य नहीं है। हाथ तथा पैर भिन्न-भिन्न ढंग से कार्य करते हैं, किन्तु सामान्य उद्देश्य शरीर का भरण-पोषण करना है। अतः यदि तुम पूँजीपतियों तथा श्रमिकों दोनों के लिए सामान्य उद्देश्य खोज लो, तब कोई संघर्ष नहीं होगा। किन्तु यदि तुम सामान्य उद्देश्य नहीं जानते, तब सदैव संघर्ष होगा।\n\nBTG: क्रान्ति?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nBTG: तो सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह सामान्य उद्देश्य खोजा जाए जिस पर लोग एकजुट हो सकें?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, जैसे हमारे कृष्णभावनाभावित समाज में आप प्रत्येक कार्य के विषय में मुझसे परामर्श लेने आते हैं, क्योंकि मैं आपको सामान्य उद्देश्य दे सकता हूँ। अन्यथा संघर्ष होगा। सरकार को जीवन के लक्ष्य—सामान्य उद्देश्य—को जानने में अत्यन्त निपुण होना चाहिए, और उन्हें लोगों को उस सामान्य उद्देश्य के लिए कार्य करने का प्रशिक्षण देना चाहिए। तब वे सुखी तथा शान्तिपूर्ण होंगे। किन्तु यदि लोग केवल निक्सन जैसे धूर्तों को चुनें, तो वे कभी सामान्य उद्देश्य नहीं पाएँगे। कोई भी धूर्त किसी जुगत से मत प्राप्त कर सकता है, और तब वह सरकार का अध्यक्ष बन जाता है। प्रत्याशी रिश्वत दे रहे हैं, वे ठगी कर रहे हैं, वे मत जीतने के लिए प्रचार कर रहे हैं। किसी न किसी प्रकार वे मत प्राप्त कर लेते हैं और प्रधान पद हथिया लेते हैं। यह व्यवस्था बुरी है।\n\nBTG: तो यदि हम अपने नेताओं को जनमत द्वारा न चुनें, तो समाज का शासन कैसे होगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: तुम्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र चाहिए। जैसे जब तुम कोई भवन निर्माण करना चाहते हो, तो तुम्हें अभियन्ता चाहिए। तुम्हें झाड़ू लगाने वाले नहीं चाहिए। क्या ऐसा नहीं है? झाड़ू लगाने वाला क्या करेगा? नहीं, वहाँ अभियन्ता होने ही चाहिए। अतः यदि तुम वर्णाश्रम के विभाजन का अनुसरण करो, तो केवल क्षत्रियों को ही शासन करने की अनुमति है। और विधान-सभा के लिए—सीनेटरों के लिए—केवल योग्य ब्राह्मण। अब क़साई विधान-सभा में बैठा है। वह विधि बनाने के विषय में क्या जानता है? वह क़साई है, किन्तु मत जीतकर वह सीनेटर बन जाता है। वर्तमान समय में, vox populi के सिद्धान्त से, एक क़साई विधायिका में पहुँच जाता है। अतः सब कुछ प्रशिक्षण पर निर्भर है। हमारे कृष्णभावनाभावित समाज में, हम वास्तव में वही कर रहे हैं, किन्तु राजनीति के मामले में, वे इसे भूल जाते हैं। केवल एक ही वर्ग नहीं हो सकता। वह मूर्खता है, क्योंकि हमें भिन्न-भिन्न वर्ग के मनुष्यों को भिन्न-भिन्न कार्यों में संलग्न करना होता है। यदि हम यह कला नहीं जानते, तो हम विफल होंगे, क्योंकि जब तक कार्य का विभाजन न हो, तब तक अव्यवस्था रहेगी। हमने *श्रीमद्भागवत* में राजा के समस्त उत्तरदायित्वों की विवेचना की है। समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों को ठीक उसी प्रकार सहयोग करना चाहिए जैसे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग करते हैं। यद्यपि प्रत्येक अंग किसी भिन्न प्रयोजन के लिए होता है, फिर भी वे सब एक ही उद्देश्य के लिए कार्य करते हैं: शरीर का समुचित भरण-पोषण करना।\n\nBTG: सरकार का वास्तविक कर्तव्य क्या है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यह समझना कि ईश्वर क्या चाहते हैं और यह देखना कि समाज उसी लक्ष्य की ओर कार्य करे। तब लोग सुखी होंगे। किन्तु यदि लोग ग़लत दिशा में कार्य करें, तो वे सुखी कैसे हो सकते हैं? सरकार का कर्तव्य यह देखना है कि वे सही दिशा में कार्य कर रहे हैं। सही दिशा है ईश्वर को जानना और उनके निर्देशों के अनुसार कार्य करना। किन्तु यदि नेता स्वयं ईश्वर की सर्वोच्चता में विश्वास न करें, और यदि वे यह न जानें कि ईश्वर क्या करना चाहते हैं, अथवा वे हमसे क्या कराना चाहते हैं, तो सुशासन कैसे हो सकता है? नेता स्वयं पथभ्रष्ट हैं, और वे दूसरों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। यही आज संसार में अव्यवस्था की स्थिति है।\n\nBTG: संयुक्त राज्य अमेरिका में परम्परागत रूप से धर्म तथा राज्य का पृथक्करण रहा है।\n\nŚrīla Prabhupāda: मैं चर्च की बात नहीं कर रहा। चर्च हो अथवा न हो—वह बिन्दु नहीं है। मुख्य बात यह है कि नेताओं को यह स्वीकार करना होगा कि एक परम नियन्ता है। वे इसे कैसे अस्वीकार कर सकते हैं? प्रकृति में प्रत्येक वस्तु परमेश्वर के नियन्त्रण में चल रही है। नेता प्रकृति को नियन्त्रित नहीं कर सकते, तो फिर वे एक परम नियन्ता को क्यों स्वीकार नहीं करते? यही समाज में दोष है। प्रत्येक दृष्टि से, नेता यह अनुभव कर रहे हैं कि एक परम नियन्ता अवश्य होना चाहिए, और फिर भी वे उन्हें अस्वीकार किए जा रहे हैं।\n\nBTG: किन्तु मान लीजिए सरकार नास्तिक हो...\n\nŚrīla Prabhupāda: तब सुशासन नहीं हो सकता। अमेरिकी कहते हैं कि वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं। किन्तु ईश्वर-विज्ञान के बिना, वह विश्वास मात्र काल्पनिक है। पहले ईश्वर-विज्ञान को अत्यन्त गम्भीरता से ग्रहण करो, तब उन पर विश्वास रखो। वे नहीं जानते कि ईश्वर कौन हैं, किन्तु हम जानते हैं। हम वास्तव में ईश्वर में विश्वास रखते हैं।\n\nवे अपनी ही शासन-पद्धति गढ़ रहे हैं। और यही उनका दोष है। वे कभी सफल नहीं होंगे। वे अपूर्ण हैं, और यदि वे अपनी ही विधियाँ तथा साधन गढ़ते रहेंगे, तो वे अपूर्ण ही रहेंगे। सदैव क्रान्तियाँ होती रहेंगी—एक के बाद एक। कोई शान्ति नहीं होगी।\n\nBTG: यह कौन निर्धारित करता है कि लोगों को धर्म के किन विधि-नियमों का अनुसरण करना चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda: ईश्वर। ईश्वर पूर्ण हैं। वे यह करते हैं। वैदिक मत के अनुसार, ईश्वर समस्त जीवों के नेता हैं (nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām)। हम उनसे भिन्न हैं क्योंकि वे सर्व-पूर्ण हैं और हम नहीं हैं। हम अत्यन्त लघु हैं। हममें ईश्वर के गुण हैं, किन्तु अत्यन्त अल्प मात्रा में। अतः हमें केवल थोड़ा-सा ज्ञान है—वह वायुयान है, किन्तु तुम एक मच्छर नहीं बना सकते। ईश्वर ने मच्छर का शरीर रचा है, जो स्वयं भी एक \"वायुयान\" है। और यही ईश्वर तथा हममें अन्तर है: हममें ज्ञान है, किन्तु वह ईश्वर के ज्ञान के समान पूर्ण नहीं है। अतः सरकार के नेताओं को ईश्वर से परामर्श लेना होगा; तब वे पूर्ण रूप से शासन करेंगे।\n\nBTG: क्या ईश्वर ने सर्वाधिक पूर्ण सरकार भी रची है?\n\nŚrīla Prabhupāda: ओह, हाँ। वैदिक काल में क्षत्रिय सरकार का शासन करते थे। जब युद्ध होता, तब राजा सबसे पहले युद्ध करता था। ठीक जैसे तुम्हारे जॉर्ज वाशिंगटन: जब युद्ध हुआ तब उसने युद्ध किया। किन्तु अब कैसा राष्ट्रपति शासन कर रहा है? जब युद्ध होता है, तब वह अत्यन्त सुरक्षित बैठकर दूरभाष से आदेश देता है। वह राष्ट्रपति होने के योग्य नहीं है। जब युद्ध हो, तब राष्ट्रपति को सबसे पहले आगे आकर युद्ध का नेतृत्व करना चाहिए।\n\nBTG: किन्तु यदि मनुष्य लघु तथा अपूर्ण है, तो वह एक पूर्ण सरकार के लिए ईश्वर के पूर्ण आदेशों को कैसे सम्पन्न कर सकता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यद्यपि तुम अपूर्ण हो, फिर भी क्योंकि तुम मेरा आदेश पालन कर रहे हो, इसलिए तुम पूर्ण होते जा रहे हो। तुमने मुझे अपना नेता स्वीकार किया है, और मैं ईश्वर को अपना नेता स्वीकार करता हूँ। इस प्रकार समाज का शासन पूर्ण रूप से हो सकता है।\n\nBTG: तो सुशासन का अर्थ है सर्वप्रथम परम पुरुष को सरकार के वास्तविक शासक के रूप में स्वीकार करना?\n\nŚrīla Prabhupāda: तुम प्रत्यक्ष रूप से परम पुरुष को स्वीकार नहीं कर सकते। तुम्हें अपने मार्गदर्शक के रूप में परम पुरुष के सेवकों—ब्राह्मणों अथवा वैष्णवों [भगवान् के भक्तों]—को स्वीकार करना होगा। सरकारी पुरुष क्षत्रिय हैं—द्वितीय वर्ग। क्षत्रियों को ब्राह्मणों अथवा वैष्णवों से परामर्श लेना चाहिए और तदनुसार विधि बनानी चाहिए। वैश्यों को क्षत्रियों के आदेशों को व्यवहार में लाना चाहिए। और शूद्रों को इन तीन वर्गों के अधीन कार्य करना चाहिए। तब समाज पूर्ण होगा।\n\nशान्ति का सूत्र\n\n1966 के उत्तरार्ध के युद्ध-विरोधी प्रदर्शनों के बीच, श्रील प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क के सेकेन्ड एवेन्यू पर स्थित अपने छोटे-से दुकान-मन्दिर से एक मुद्रित पर्चा (अमेरिका में उनके प्रथम प्रकाशनों में से एक) निकाला। श्रील प्रभुपाद के अनुयायियों तथा सहानुभूति रखने वालों ने इस पर्चे को न्यूयॉर्क की सड़कों पर, और बाद में सैन फ्रांसिस्को, मॉन्ट्रियल तथा अन्य नगरों में, सहस्रों की संख्या में वितरित किया। उनका \"शान्ति का सूत्र\" युद्ध-विरोधी प्रश्न के प्रति एक पूर्णतः नवीन दृष्टिकोण था, और सहस्रों अमेरिकियों के लिए इसने पूर्ण समाधान प्रस्तुत किया।\n\nआधुनिक सभ्यता की महान् भूल यह है कि वह दूसरों की सम्पत्ति पर इस प्रकार अधिकार जमाती है मानो वह स्वयं की हो, और इस प्रकार प्रकृति के नियमों में अनावश्यक विघ्न उत्पन्न करती है। ये नियम अत्यन्त सशक्त हैं। कोई भी जीव इनका उल्लंघन नहीं कर सकता। केवल वही जो कृष्णभावनाभावित है, प्रकृति के नियमों की कठोरता को सरलता से पार कर सकता है और इस प्रकार संसार में सुखी तथा शान्तिपूर्ण हो सकता है।\n\nजिस प्रकार एक राज्य विधि एवं व्यवस्था के विभाग द्वारा संरक्षित होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड का राज्य, जिसका यह पृथ्वी केवल एक तुच्छ अंश है, प्रकृति के नियमों द्वारा संरक्षित है। यह भौतिक प्रकृति ईश्वर की भिन्न-भिन्न शक्तियों में से एक है, जो समस्त विद्यमान वस्तुओं के परम स्वामी हैं। अतः यह पृथ्वी ईश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु हम जीव, विशेषतः तथाकथित सभ्य मनुष्य, ईश्वर की सम्पत्ति को व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों ही मिथ्या धारणाओं के अधीन अपनी सम्पत्ति होने का दावा कर रहे हैं। यदि आप शान्ति चाहते हैं, तो आपको इस मिथ्या धारणा को अपने मन से तथा संसार से हटाना होगा। मानव-जाति द्वारा पृथ्वी पर स्वामित्व का यह मिथ्या दावा ही, अंशतः अथवा पूर्णतः, पृथ्वी पर शान्ति के समस्त विघ्नों का कारण है।\n\nमूर्ख तथा तथाकथित सभ्य मनुष्य ईश्वर की सम्पत्ति पर स्वामित्व के अधिकार का दावा कर रहे हैं क्योंकि वे अब ईश्वरहीन हो गए हैं। तुम ईश्वरहीन समाज में सुखी तथा शान्तिपूर्ण नहीं हो सकते। *भगवद्गीता* में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही जीवों के समस्त कर्मों के वास्तविक भोक्ता हैं, कि वे ही समस्त ब्रह्माण्डों के परमेश्वर हैं, और कि वे ही समस्त प्राणियों के हितैषी मित्र हैं। जब संसार के लोग इसे शान्ति के सूत्र के रूप में जान लेंगे, तभी और वहीं शान्ति विद्यमान होगी।\n\nअतः यदि आप तनिक भी शान्ति चाहते हैं, तो आपको ईश्वर के पवित्र नाम के जप की सरल प्रक्रिया द्वारा, व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों ही रूप में, अपनी चेतना को कृष्णभावनामृत में बदलना होगा। यह संसार में शान्ति प्राप्त करने की एक मानक तथा मान्यता-प्राप्त प्रक्रिया है। अतः हम अनुशंसा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करके कृष्णभावनाभावित बने।\n\nयह व्यावहारिक, सरल तथा उदात्त है। चार सौ अस्सी वर्ष पूर्व भगवान् श्रीचैतन्य ने भारत में इस सूत्र को प्रवर्तित किया, और अब यह आपके देश में उपलब्ध है। ऊपर वर्णित जप की इस सरल प्रक्रिया को ग्रहण करें, *भगवद्गीता यथारूप* पढ़कर अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करें, और कृष्ण, ईश्वर के साथ अपने खोए हुए सम्बन्ध को पुनः स्थापित करें। शान्ति तथा समृद्धि तत्काल विश्वव्यापी परिणाम होगी।\n\nआध्यात्मिक साम्यवाद\n\n1971 में, सोवियत संघ की अपनी ऐतिहासिक यात्रा के दौरान, श्रील प्रभुपाद का परिचय प्रोफेसर ग्रिगोरी कोतोव्स्की से कराया गया, जो यू.एस.एस.आर. विज्ञान अकादमी के भारत-विभाग के अध्यक्ष तथा मॉस्को विश्वविद्यालय के भारतीय अध्ययन विभाग के सभापति थे। डॉ. कोतोव्स्की के कार्यालय में अनौपचारिक रूप से बैठे हुए, आध्यात्मिक नेता तथा साम्यवादी विद्वान् ने परस्पर सरोकार के विषयों पर सजीव चर्चा की, और श्रील प्रभुपाद ने आधुनिक साम्यवाद के भीतर एक आमूल सुधार का प्रस्ताव रखा।\n\nŚrīla Prabhupāda: उस दिन मैं समाचारपत्र, मॉस्को न्यूज़, पढ़ रहा था। एक साम्यवादी अधिवेशन हुआ था, और अध्यक्ष ने घोषणा की, \"हम सुधार हेतु दूसरों के अनुभव को ग्रहण करने के लिए तैयार हैं।\" अतः मेरे विचार से समाजवाद अथवा साम्यवाद की वैदिक अवधारणा साम्यवाद के विचार को बहुत उन्नत करेगी। उदाहरणार्थ, एक समाजवादी राज्य में विचार यह है कि किसी को भूखा नहीं रहना चाहिए; प्रत्येक के पास उसका भोजन होना चाहिए। इसी प्रकार, गृहस्थ-जीवन की वैदिक अवधारणा में अनुशंसा की गई है कि गृहस्थ यह देखे कि उसके घर में रहने वाली एक छिपकली अथवा साँप तक भूखा न रहे। इन निम्न प्राणियों तक को भोजन दिया जाना चाहिए, और निश्चय ही समस्त मनुष्यों को तो दिया ही जाना चाहिए। अनुशंसा की गई है कि गृहस्थ, भोजन ग्रहण करने से पूर्व, मार्ग पर खड़ा होकर घोषणा करे, \"यदि कोई अभी भी भूखा हो, तो कृपया आएँ! भोजन तैयार है!\" यदि कोई उत्तर न मिले, तब गृहस्वामी अपना भोजन ग्रहण करता है। आधुनिक समाज समस्त जनता को किसी निश्चित राज्य का स्वामी मानता है, किन्तु वैदिक अवधारणा है īśāvāsyam idaṁ sarvam—समस्त वस्तुओं का स्वामी īśa, परम नियन्ता है। Tena tyaktena bhuñjīthāḥ—उनके द्वारा तुम्हें जो दिया गया है, उसी का तुम भोग कर सकते हो। Mā gṛdhaḥ kasya svid dhanam: किन्तु दूसरों की सम्पत्ति पर अधिकार न जमाओ। यह *ईशोपनिषद्*—वेद है। यही विचार भिन्न-भिन्न *पुराणों* में समझाया गया है। वैदिक साहित्य में साम्यवाद के विषय में अनेक उत्तम अवधारणाएँ हैं। अतः मैंने सोचा कि ये विचार आपके सर्वाधिक विचारशील पुरुषों तक पहुँचाए जाने चाहिए। इसीलिए मैं बोलने के लिए उत्सुक था।\n\nProf. Kotovsky: यह रोचक है कि यहाँ हमारे देश में अब अति प्राचीन विचारों के इतिहास में बड़ी रुचि है। इस दृष्टि से, हमारे संस्थान ने महान् भारतीय संस्कृति की अनेक साहित्यिक धरोहरों का रूसी में अनुवाद तथा प्रकाशन किया है। आपको यह जानकर रुचि होगी कि हमने कुछ *पुराणों* तथा *रामायण* के अंशों का प्रकाशन किया है। *महाभारत* के रूसी में खण्ड हैं और *महाभारत* का एक द्वितीय संस्करण भी, जो पूर्ण रूप में अनूदित है। हमने संस्कृत टीकाओं सहित मनु-स्मृति का पूर्ण अनुवाद भी प्रकाशित किया है। इन प्रकाशनों में इतनी रुचि थी कि वे एक सप्ताह में बिक गए। वे अब पूर्णतः अनुपलब्ध हैं। एक माह के पश्चात् उन्हें पुस्तक-बाज़ार में पाना असम्भव हो गया। यहाँ मॉस्को तथा यू.एस.एस.आर. में पढ़ने वाले लोगों में प्राचीन वैदिक संस्कृति के प्रति बड़ी रुचि है, और इस दृष्टि से हमने ऐसी अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: इन *पुराणों* में, *श्रीमद्भागवत* को महा-पुराण कहा जाता है।\n\nProf. Kotovsky: महा-पुराण।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। हमने पूर्ण पाठ का अनुवाद किया है—पहले हम मूल संस्कृत पाठ, उसका लिप्यन्तरण, प्रत्येक शब्द का अंग्रेज़ी समानार्थक, फिर अनुवाद, और फिर तात्पर्य, अर्थात् श्लोक की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, *श्रीमद्भागवत* में अठारह हज़ार श्लोक हैं। हम प्रत्येक वस्तु का शब्दशः अनुवाद कर रहे हैं। आप देख सकते हैं। सम्पूर्ण भागवत-पुराण के प्रत्येक श्लोक का इसी प्रकार किया जा रहा है। आचार्यों का, अर्थात् उन महान् सन्त-ऋषियों का जो भागवत-दर्शन के प्रचारक हैं, मत है nigama-kalpa-taror galitaṁ phalam: यह वैदिक कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है (*श्रीमद्भागवत* 1.1.3)। इसे समस्त भारतीय विद्वानों ने स्वीकार किया है, और भगवान् श्रीचैतन्य ने विशेष रूप से इस *भागवत* का प्रचार किया। अतः हमारे पास सम्पूर्ण *भागवत* उसके अंग्रेज़ी अनुवाद में है। यदि आप उसे देखना चाहें, तो मैं आपको दिखा सकता हूँ।\n\nProf. Kotovsky: मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मॉस्को तथा लेनिनग्राद के पुस्तकालयों में हमारे पास प्राचीन भारतीय संस्कृति के लगभग समस्त प्रमुख ग्रन्थ हैं, *वेदों* से आरम्भ करके, संस्कृत में मूल पाठ। उदाहरणार्थ, हमारे संस्थान की लेनिनग्राद शाखा में मनु-स्मृति के छह अथवा आठ संस्करण हैं। यह संस्थान शाही रूस के समय लेनिनग्राद में स्थापित हुआ था, अतः लेनिनग्राद में अब हमारे संस्थान की एक शाखा है जो मुख्यतः एशियाई संस्कृति के इतिहास से सम्बन्धित है। आपको यहाँ इसका विवरण मिलेगा कि क्या अनूदित किया जा रहा है और भारतीय धर्म के इतिहास तथा आज हिन्दू भारत में भारतीय धर्म, अर्थात् हिन्दू-धर्म की दशा पर क्या अध्ययन किए जा रहे हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हिन्दू-धर्म एक अत्यन्त जटिल विषय है।\n\nProf. Kotovsky: ओह, हाँ। [वे हँसते हैं।] वास्तव में, मेरी समझ से, यूरोपीय दृष्टि से, यह कोई धर्म नहीं है; यह एक जीवन-पद्धति है—धर्म, दर्शन, जीवन-पद्धति, जो भी आप कहना चाहें।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह शब्द हिन्दू कोई संस्कृत शब्द नहीं है। यह मुसलमानों द्वारा दिया गया था। आप जानते हैं कि एक नदी है, इन्दुस, जिसे संस्कृत में सिन्धु कहा जाता है। मुसलमान स को ह उच्चारित करते हैं। सिन्धु के स्थान पर, उन्होंने इसे हिन्दू बना दिया। अतः हिन्दू एक ऐसा पद है जो संस्कृत शब्दकोश में नहीं मिलता, किन्तु यह प्रचलन में आ गया है। किन्तु वास्तविक सांस्कृतिक संस्था वर्णाश्रम कहलाती है। चार वर्ण हैं (सामाजिक विभाजन)—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—और चार आश्रम हैं (आध्यात्मिक विभाजन)—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। जीवन की वैदिक अवधारणा के अनुसार, जब तक लोग चार वर्णों तथा चार आश्रमों की इस व्यवस्था अथवा संस्था को ग्रहण न करें, तब तक वे वास्तव में सभ्य मनुष्य नहीं बनते। मनुष्य को सामाजिक व्यवस्थाओं के चार विभागों तथा आध्यात्मिक व्यवस्थाओं के चार विभागों की इस प्रक्रिया को ग्रहण करना होता है; उसे ही वर्णाश्रम कहते हैं। भारत की संस्कृति इसी युगों-पुरानी वैदिक व्यवस्था पर आधारित है।\n\nProf. Kotovsky: वर्णाश्रम।\n\nŚrīla Prabhupāda: वर्णाश्रम। और *भगवद्गीता* में—सम्भवतः आपने *भगवद्गीता* पढ़ी है?\n\nProf. Kotovsky: हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: वहाँ, *भगवद्गीता* (4.13) में, यह कथन है cātur-varṇyaṁ mayā sṛṣṭam: यह व्यवस्था विष्णु [ईश्वर] द्वारा रची गई थी। अतः चूँकि वर्णाश्रम परम पुरुष की रचना है, इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता। यह सर्वत्र प्रचलित है। यह सूर्य के समान है। सूर्य परम पुरुष की रचना है। सूर्य का प्रकाश अमेरिका में, रूस में, तथा भारत में—सर्वत्र है। इसी प्रकार, यह वर्णाश्रम व्यवस्था किसी न किसी रूप में सर्वत्र प्रचलित है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मणों को लीजिए, जो मनुष्यों में सर्वाधिक बुद्धिमान् वर्ग हैं। वे समाज के मस्तिष्क हैं। क्षत्रिय प्रशासनिक वर्ग हैं; फिर वैश्य उत्पादक वर्ग हैं, और शूद्र श्रमिक वर्ग हैं। मनुष्यों के ये चार वर्ग भिन्न-भिन्न नामों से सर्वत्र प्रचलित हैं। चूँकि यह मूल स्रष्टा द्वारा रची गई है, इसलिए यह सर्वत्र प्रचलित है, वर्णाश्रम-धर्म।\n\nProf. Kotovsky: यह रोचक है कि कुछ यूरोपीय तथा प्राचीन रूसी विद्वानों के मत में, यह वर्णाश्रम व्यवस्था एक परवर्ती रचना है, और यदि आप वैदिक साहित्य के प्राचीन ग्रन्थ पढ़ें, तो आपको एक बहुत अधिक सरल तथा कृषि-प्रधान समाज मिलेगा। इन विद्वानों का मत है कि वर्णाश्रम व्यवस्था भारतीय समाज में वैदिक युग के उत्तरकाल में प्रवर्तित हुई, आरम्भ से नहीं। और यदि आप प्राचीन ग्रन्थों का विश्लेषण करें, तो आपको ज्ञात होगा कि प्राचीन शास्त्रीय भारत में यह इतनी प्रचलित नहीं थी।\n\nŚrīla Prabhupāda: जहाँ तक हमारा प्रश्न है, इसका उल्लेख *भगवद्गीता* में है। Cātur-varṇyaṁ mayā sṛṣṭam [भ.गी. 4.13]। *भगवद्गीता* पाँच हज़ार वर्ष पूर्व कही गई थी, और *भगवद्गीता* में कहा गया है, \"*भगवद्गीता* की यह व्यवस्था मैंने सूर्यदेव को कही थी।\" अतः यदि आप उस काल का अनुमान लगाएँ, तो वह चार करोड़ वर्ष पूर्व का होता है। क्या यूरोपीय विद्वान् पाँच हज़ार वर्ष पीछे का इतिहास खोज सकते हैं? क्या वे चार करोड़ वर्ष पीछे जा सकते हैं? हमारे पास प्रमाण है कि यह वर्णाश्रम व्यवस्था कम से कम पाँच हज़ार वर्षों से प्रचलित रही है। वर्णाश्रम व्यवस्था का उल्लेख *विष्णु पुराण* (3.8.9) में भी है। Varṇāśramācāravatā puruṣeṇa paraḥ pumān। यह *विष्णु पुराण* में कहा गया है। वर्णाश्रम-धर्म आधुनिक युग में गणना किए गए किसी ऐतिहासिक काल की घटना नहीं है। यह नैसर्गिक है। *श्रीमद्भागवत* में तुलना दी गई है कि जिस प्रकार शरीर में चार विभाग हैं—मस्तिष्क-विभाग, भुजा-विभाग, उदर-विभाग तथा पाद-विभाग—उसी प्रकार प्रकृति की रीति से ये चार विभाग सामाजिक शरीर में विद्यमान हैं। मनुष्यों का एक वर्ग है जिसे मस्तिष्क माना जाता है, एक वर्ग है जिसे राज्य की भुजाएँ माना जाता है, एक वर्ग है जिसे उत्पादक वर्ग कहा जाता है, इत्यादि। इतिहास खोजने की कोई आवश्यकता नहीं; यह सृष्टि के दिन से ही नैसर्गिक रूप से विद्यमान है।\n\nProf. Kotovsky: आपने कहा कि किसी भी समाज में चार विभाग हैं, किन्तु उन्हें भेद कर पाना इतना सरल नहीं है। उदाहरणार्थ, किसी भी समाज में कोई भिन्न-भिन्न सामाजिक वर्गों तथा व्यावसायिक समूहों को चार विभागों में एकत्र कर सकता है; इसमें कोई कठिनाई नहीं। एकमात्र कठिनाई यह है, उदाहरणार्थ, समाजवादी समाज में—हमारे देश तथा अन्य समाजवादी समाजों में—कि आप उत्पादक समूह को श्रमिकों से कैसे भेद कर सकते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: उदाहरणार्थ, हम मनुष्यों के बौद्धिक वर्ग में आते हैं। यह एक विभाग है।\n\nProf. Kotovsky: बुद्धिमान् वर्ग, ब्राह्मण। और आप समस्त बुद्धिजीवियों को भी उस विभाग में रख सकते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: और फिर प्रशासनिक वर्ग।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: किन्तु वैश्य तथा शूद्र कौन हैं? यही कठिनाई है। क्योंकि शेष सब श्रमिक हैं—कारखाने के श्रमिक, सामूहिक कृषि-श्रमिक, इत्यादि। अतः इस दृष्टि से, मेरे विचार से, समाजवादी समाज तथा समाजवाद से पूर्व के समस्त समाजों के बीच एक बड़ा भेद है, क्योंकि आधुनिक पाश्चात्य समाज में आप समस्त सामाजिक तथा व्यावसायिक वर्गों को इन विशिष्ट वर्ग-विभाजनों में एकत्र कर सकते हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र: बुद्धिजीवी, उत्पादक वर्ग, उत्पादन-प्रणाली के स्वामी (उदाहरणार्थ, कारखाने के स्वामी), तथा निम्न श्रमिक। किन्तु यहाँ आपके पास वैश्य नहीं हैं क्योंकि कारखानों में आपके पास प्रशासनिक कर्मचारी हैं, और आप उन्हें क्षत्रिय कह सकते हैं, और फिर शूद्र हैं, अर्थात् स्वयं श्रमिक, किन्तु कोई मध्यवर्ती वर्ग नहीं।\n\nŚrīla Prabhupāda: यही कहा गया है। Kalau śūdra-sambhavaḥ। इस युग में व्यावहारिक रूप से समस्त मनुष्य शूद्र हैं। किन्तु यदि केवल शूद्र ही हों, तो सामाजिक व्यवस्था विक्षुब्ध हो जाएगी। आपकी शूद्रों की स्थिति के बावजूद, यहाँ ब्राह्मण विद्यमान है, और वह आवश्यक है। यदि आप सामाजिक व्यवस्था को इस प्रकार विभाजित न करें, तो अव्यवस्था होगी। यह *वेदों* का वैज्ञानिक अनुमान है। आप शूद्र वर्ग के हो सकते हैं, किन्तु सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आपको कुछ शूद्रों को ब्राह्मण बनने का प्रशिक्षण देना होगा। समाज शूद्रों पर निर्भर नहीं रह सकता। न ही आप ब्राह्मणों पर निर्भर रह सकते हैं। अपने शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, मस्तिष्क, भुजाएँ, उदर तथा पैर होने चाहिए। पैर, मस्तिष्क तथा भुजाएँ—सम्पूर्ण शरीर के ध्येय की पूर्ति हेतु सहयोग के लिए—सब अपेक्षित हैं। अतः किसी भी समाज में आप देख सकते हैं कि जब तक ये चार विभाग न हों, तब तक अव्यवस्था रहेगी। वह समुचित रूप से कार्य नहीं करेगा। वह माया होगी, और विघ्न होंगे। मस्तिष्क तो होना ही चाहिए, किन्तु वर्तमान समय में मस्तिष्कों का अभाव है। मैं आपके राज्य अथवा अपने राज्य की बात नहीं कर रहा; मैं समस्त संसार को समग्र रूप में ले रहा हूँ। पूर्वकाल में भारतीय प्रशासन एक राजतन्त्र था। उदाहरणार्थ, महाराज परीक्षित एक क्षत्रिय राजा थे। अपनी मृत्यु से ठीक पूर्व, उन्होंने अपने राजपद का त्याग कर दिया। वे आत्म-साक्षात्कार के विषय में श्रवण करने वन में आए। यदि आप समस्त विश्व-समाज की शान्ति तथा समृद्धि बनाए रखना चाहते हैं, तो आपको मनुष्यों का एक अत्यन्त बुद्धिमान् वर्ग, प्रशासन में निपुण मनुष्यों का एक वर्ग, उत्पादन में निपुण मनुष्यों का एक वर्ग, तथा कार्य करने वाले मनुष्यों का एक वर्ग रचना होगा। यह अपेक्षित है; आप इससे बच नहीं सकते। यही वैदिक अवधारणा है, mukha-bāhūru-pāda jāḥ (*श्रीमद्भागवत* 11.17.13)। Mukha का अर्थ है \"मुख,\" bāhu का अर्थ है \"भुजाएँ,\" ūru का अर्थ है \"कटि,\" और pāda, \"पैर।\" आप यह राज्य लें अथवा वह राज्य, जब तक इन चार जीवन-व्यवस्थाओं की एक सुचारु, व्यवस्थित स्थापना न हो, तब तक राज्य अथवा समाज अत्यन्त सुचारु रूप से नहीं चलेगा।\n\nProf. Kotovsky: सामान्यतः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस सम्पूर्ण वर्णाश्रम व्यवस्था ने किसी सीमा तक प्राचीन समाज में श्रम का एक नैसर्गिक विभाजन उत्पन्न किया। किन्तु अब किसी भी समाज में लोगों के बीच श्रम का विभाजन कहीं अधिक जटिल तथा परिष्कृत है। अतः उन्हें चार वर्गों में एकत्र करना अत्यन्त भ्रामक है।\n\nŚrīla Prabhupāda: भ्रम इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि भारत में, परवर्ती काल में, ब्राह्मण का पुत्र, ब्राह्मणोचित गुणों के बिना ही, ब्राह्मण होने का दावा करने लगा; और दूसरों ने, अन्धविश्वास अथवा परम्परागत रीति से, उसे ब्राह्मण मान लिया। अतः भारतीय सामाजिक व्यवस्था विशृंखलित हो गई। किन्तु हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन में हम सर्वत्र ब्राह्मणों को प्रशिक्षित कर रहे हैं, क्योंकि संसार को ब्राह्मण के मस्तिष्क की आवश्यकता है। यद्यपि महाराज परीक्षित राजा थे, फिर भी उनके पास परामर्श हेतु ब्राह्मणों तथा विद्वान् ऋषियों का एक समूह था, एक परामर्शदात्री मण्डली। ऐसा नहीं था कि राजा स्वतन्त्र थे। इतिहास में पाया जाता है कि यदि कुछ राजा सुव्यवस्थित न हों, तो ब्राह्मणीय परामर्शदात्री परिषद् द्वारा उन्हें राजगद्दी से हटा दिया जाता था। यद्यपि ब्राह्मण राजनीति में भाग नहीं लेते थे, फिर भी वे राजा को परामर्श देते थे कि राजकीय कार्य किस प्रकार सम्पन्न किया जाए। यह बहुत अधिक प्राचीन काल की बात नहीं है। अशोक कितने काल पूर्व हुए?\n\nProf. Kotovsky: वह उसके समतुल्य होगा जिसे हम अपनी शब्दावली में प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत कहते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: प्राचीन तथा सामन्ती भारत में—आप ठीक कहते हैं—यह अत्यन्त खुला हुआ था, और विधान-विभाग में उच्च प्रशासनिक कर्मचारियों का अधिकांश भाग ब्राह्मण थे। मुग़ल युग में भी मुस्लिम सम्राटों तथा प्रशासकों को परामर्श देने के लिए ब्राह्मण थे।\n\nŚrīla Prabhupāda: यह तथ्य है—ब्राह्मण स्वीकार किए जाते थे। वे राजा की परामर्शदात्री समिति बनाते थे। उदाहरणार्थ, चन्द्रगुप्त, हिन्दू राजा, सिकन्दर महान् के युग में हुए। चन्द्रगुप्त से ठीक पूर्व, सिकन्दर महान् ग्रीस से भारत आया और एक भाग जीत लिया। जब चन्द्रगुप्त सम्राट बने, तब चाणक्य उनके प्रधानमन्त्री थे। सम्भवतः आपने यह नाम चाणक्य सुना है?\n\nProf. Kotovsky: हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, वे एक महान् ब्राह्मण राजनीतिज्ञ थे, और यह उन्हीं के नाम पर है कि नई दिल्ली का वह भाग जहाँ समस्त विदेशी दूतावास एकत्र हैं, चाणक्य पुरी कहलाता है। चाणक्य पण्डित एक महान् राजनीतिज्ञ तथा ब्राह्मण थे। वे अत्यन्त विद्वान् थे। उनके नैतिक उपदेश आज भी मूल्यवान् हैं। भारत में, विद्यालयी बालकों को चाणक्य पण्डित के उपदेश पढ़ाए जाते हैं। यद्यपि वे प्रधानमन्त्री थे, फिर भी चाणक्य पण्डित ने अपना ब्राह्मण-भाव बनाए रखा; उन्होंने कोई वेतन नहीं लिया। यदि कोई ब्राह्मण वेतन स्वीकार करता है, तो समझा जाता है कि वह कुत्ता बन गया है। यह *श्रीमद्भागवत* में कहा गया है। वह परामर्श दे सकता है, किन्तु वह नौकरी स्वीकार नहीं कर सकता। अतः चाणक्य पण्डित एक कुटिया में रह रहे थे, किन्तु वे वास्तव में प्रधानमन्त्री थे। यह ब्राह्मणीय संस्कृति तथा ब्राह्मणीय मस्तिष्क ही वैदिक सभ्यता का मानदण्ड है। मनु-स्मृति ब्राह्मणीय संस्कृति के मानदण्ड का एक उदाहरण है। आप इतिहास से यह नहीं खोज सकते कि मनु-स्मृति कब लिखी गई, किन्तु इसे इतना पूर्ण माना जाता है कि यही हिन्दू-विधि है। सामाजिक व्यवस्था को समायोजित करने के लिए विधायिका को प्रतिदिन एक नई विधि पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं। मनु द्वारा दी गई विधि इतनी पूर्ण है कि यह समस्त काल के लिए लागू हो सकती है। संस्कृत में इसे tri-kālādau कहा गया है, जिसका अर्थ है \"भूत, वर्तमान तथा भविष्य के लिए हितकर।\"\n\nProf. Kotovsky: मुझे आपको बीच में रोकने के लिए खेद है, किन्तु मेरी जानकारी के अनुसार, अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में समस्त भारतीय समाज, ब्रिटिश प्रशासन के आदेश से, हिन्दू-विधि से भिन्न एक विधि के अधीन था। बहुत परिवर्तन हुआ। हिन्दुओं द्वारा प्रयुक्त वास्तविक हिन्दू-विधि मूल मनु-स्मृति से काफ़ी भिन्न थी।\n\nŚrīla Prabhupāda: उन्होंने अब परिवर्तन कर दिए हैं। हमारे स्वर्गीय पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी ही हिन्दू-संहिता प्रस्तुत की। उन्होंने विवाह में तलाक़ का अधिकार प्रस्तुत किया, किन्तु यह मनु-संहिता में नहीं था। उन्होंने इतनी सारी बातें बदल दी हैं, किन्तु इस आधुनिक युग से पूर्व सम्पूर्ण मानव-समाज मनु-स्मृति द्वारा शासित था। कड़े शब्दों में कहें तो, आधुनिक हिन्दू हिन्दू-शास्त्रों का कड़ाई से अनुसरण नहीं कर रहे हैं।\n\nकिन्तु हमारा प्रयोजन पुराने प्रकार के हिन्दू-समाज को वापस लाने का प्रयत्न करना नहीं है। वह असम्भव है। हमारा विचार मूल विचार से सर्वोत्तम विचार ग्रहण करने का है। उदाहरणार्थ, *श्रीमद्भागवत* में साम्यवादी विचार का वर्णन है। यह महाराज युधिष्ठिर को बताया गया है। यदि कोई वस्तु उत्तम हो, कोई उत्तम अनुभव हो, तो आप उसे क्यों न ग्रहण करें? यही हमारा दृष्टिकोण है। इसके अतिरिक्त, आधुनिक सभ्यता एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिन्दु से चूक रही है—मानव-जीवन का लक्ष्य। वैज्ञानिक रूप से, मानव-जीवन का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है, ātma-tattva। कहा गया है कि जब तक मानव-समाज के सदस्य आत्म-साक्षात्कार के बिन्दु तक न पहुँचें, तब तक वे जो भी करें उसमें पराजित होते हैं। वास्तव में आधुनिक समाज में यही हो रहा है, समस्त आर्थिक प्रगति तथा अन्य प्रगति के बावजूद: शान्ति तथा प्रशान्ति बनाए रखने के स्थान पर, वे लड़ रहे हैं—व्यक्तिगत रूप से, सामाजिक रूप से, राजनीतिक रूप से तथा राष्ट्रीय रूप से। यदि हम इस पर शान्त मन से विचार करें, तो हम देख सकते हैं कि ज्ञान की अनेक शाखाओं में बहुत प्रगति के बावजूद, हम वही मनोवृत्ति बनाए हुए हैं जो निम्न पशु-समाज में दृष्टिगोचर होती है। *श्रीमद्भागवत* के अनुसार हमारा निष्कर्ष यह है कि यह मानव-शरीर इन्द्रियतृप्ति के लिए कठोर परिश्रम करने हेतु नहीं है। किन्तु लोग उससे परे कुछ नहीं जानते। वे अगले जीवन के विषय में नहीं जानते। इस शरीर के समाप्त होने के पश्चात् क्या होता है, इसका अध्ययन करने हेतु ज्ञान का कोई वैज्ञानिक विभाग नहीं है। वह ज्ञान का एक महान् विभाग है।\n\n*भगवद्गीता* (2.13) में कहा गया है, dehino 'smin yathā-dehe। Deha का अर्थ है \"यह शरीर।\" Dehinaḥ का अर्थ है \"वह जो इस शरीर का स्वामी है।\" Dehino 'smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā। देही, अर्थात् शरीर का स्वामी, भीतर है, और शरीर एक रूप से दूसरे रूप में बदलता रहता है। बालक का एक निश्चित प्रकार का शरीर होता है जो बड़े होने पर दूसरे प्रकार में बदल जाता है। किन्तु शरीर का स्वामी फिर भी आद्योपान्त विद्यमान रहता है। इसी प्रकार, जब यह शरीर पूर्णतः बदल जाता है, तब हम दूसरा शरीर ग्रहण करते हैं। लोग इसे नहीं समझते। हम भिन्न-भिन्न शरीर ग्रहण कर रहे हैं, इसी जीवन में भी, शैशव से बाल्यावस्था तक, बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक, किशोरावस्था से युवावस्था तक। यह तथ्य है—प्रत्येक व्यक्ति इसे जानता है। मैं एक बालक था, किन्तु वह बालक-शरीर अब नहीं है। मेरे पास अब एक भिन्न शरीर है। इसे समझने में क्या कठिनाई है कि जब यह शरीर नहीं रहेगा, तब मुझे एक दूसरा शरीर ग्रहण करना होगा? यह एक महान् विज्ञान है।\n\nProf. Kotovsky: जैसा कि आप जानते हैं, इस समस्या के प्रति दो पूर्णतः विपरीत दृष्टिकोण हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों के अनुसार दृष्टिकोण कुछ भिन्न है, किन्तु साथ ही, कोई भी धर्म स्थान-परिवर्तन के अनुभव, अर्थात् आत्मा के देहान्तरण को मान्यता देता है तथा उसकी खोज करता है। ईसाई धर्म में, यहूदी धर्म में, इस...\n\nŚrīla Prabhupāda: मैं आपके साथ धर्मों की बात नहीं कर रहा। मैं विज्ञान तथा दर्शन की बात कर रहा हूँ। एक धर्म एक मार्ग मान सकता है; वह हमारा सरोकार नहीं है। हमारा सरोकार इस बिन्दु से है कि यदि शरीर का स्वामी शरीर के भिन्न-भिन्न परिवर्तनों के बावजूद स्थायी है, तो इसे समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि जब यह शरीर पूर्णतः बदल जाएगा, तब शरीर के स्वामी का एक दूसरा शरीर होगा।\n\nProf. Kotovsky: एक अन्य दृष्टिकोण यह है कि कोई पृथक्करण नहीं है। दो परिघटनाएँ नहीं हैं—शरीर तथा शरीर का स्वामी एक ही हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda [बल देकर]: नहीं।\n\nProf. Kotovsky: जब शरीर मरता है, तब स्वामी भी मर जाता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं। किन्तु इस तथ्य का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालय में ज्ञान का कोई विभाग क्यों नहीं है? यही मेरा प्रस्ताव है—उनमें इसका अभाव है। यह जैसा आप कहते हैं वैसा हो सकता है अथवा जैसा मैं कहता हूँ वैसा हो सकता है, किन्तु इसका अध्ययन करने के लिए ज्ञान का एक विभाग अवश्य होना चाहिए। हाल ही में टोरंटो के एक हृदय-रोग विशेषज्ञ, एक चिकित्सक, ने स्वीकार किया है कि एक आत्मा है। मेरा उनसे कुछ पत्राचार हुआ, और वे दृढ़ता से मानते हैं कि एक आत्मा है। अतः एक अन्य दृष्टिकोण है, किन्तु हमारी प्रक्रिया प्राधिकार से ज्ञान ग्रहण करने की है। इस विषय पर हमारे पास श्रीकृष्ण का कथन है, और वे प्रामाणिक हैं। श्रीकृष्ण को समस्त आचार्यों द्वारा प्राधिकार के रूप में स्वीकार किया जाता है। *भगवद्गीता* को समस्त संसार के विद्वत्-मण्डलों तथा दार्शनिक मण्डलों द्वारा स्वीकार किया जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\ndehino 'smin yathā dehe\n\nkaumāraṁ yauvanaṁ jarā\n\ntathā dehāntara-prāptir\n\ndhīras tatra na muhyati\n\n\"जिस प्रकार आत्मा बाल्यावस्था के शरीर को त्यागकर किशोरावस्था के शरीर में और फिर युवावस्था में आती है, उसी प्रकार आत्मा इस शरीर को भी त्यागकर दूसरा शरीर ग्रहण करती है।\" (भ.गी. 2.13) यह कथन श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया है, जो हमारी ज्ञान-परम्परा के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्राधिकार हैं। हम ऐसे कथन को बिना तर्क के स्वीकार करते हैं। यही वैदिक बोध की रीति है।\n\nProf. Kotovsky: कठिनाई यह है कि हमारा दृष्टिकोण यह है कि हम तर्क के बिना किसी वस्तु में विश्वास नहीं करते। हम केवल उन्हीं वस्तुओं में विश्वास कर सकते हैं जो तर्क पर आधारित हों।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, उसकी अनुमति है। यह *भगवद्गीता* (4.34) में कहा गया है। Tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā। Paripraśna, अर्थात् तर्क, की अनुमति है—किन्तु चुनौती के भाव से नहीं, अपितु समझने के भाव से। तर्क का निषेध नहीं है। किन्तु जहाँ तक वैदिक कथनों का प्रश्न है, वे अचूक हैं, और *वेदों* के विद्वान् उन्हें उसी रूप में स्वीकार करते हैं। उदाहरणार्थ, गोबर एक पशु का मल है। अब, वैदिक कथन यह है कि जैसे ही आप किसी भी पशु के मल को स्पर्श करें—भले ही आप अपने ही मल को स्पर्श करें—आप अपवित्र हो जाते हैं और आपको स्नान करके स्वयं को शुद्ध करना होता है। हिन्दू पद्धति के अनुसार, मल-त्याग के पश्चात् मनुष्य को स्नान करना होता है।\n\nProf. Kotovsky: यह तो काफ़ी समझ में आने वाला स्वास्थ्य-सम्बन्धी ज्ञान है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: हाँ, यह ठीक है।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु एक अन्य स्थान पर कहा गया है कि गोबर, यद्यपि पशु का मल है, फिर भी पवित्र है। यदि आप इसे किसी अपवित्र स्थान पर भी लगाएँ, तो वह स्थान शुद्ध हो जाता है। यह ऊपरी तौर पर विरोधाभासी है। एक स्थान पर कहा गया है कि पशु का मल अपवित्र है और जैसे ही आप उसे स्पर्श करें आपको शुद्ध होना होता है, और दूसरे स्थान पर कहा गया है कि गोबर पवित्र है। हमारे ज्ञान के अनुसार, यह विरोधाभासी है—फिर भी जो *वेदों* के अनुयायी हैं, वे इसे स्वीकार करते हैं। और तथ्य यह है कि यदि आप गोबर का विश्लेषण करें, तो आपको ज्ञात होगा कि उसमें समस्त रोगाणुनाशक गुण विद्यमान हैं।\n\nProf. Kotovsky: यह मुझे ज्ञात नहीं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, एक चिकित्सा महाविद्यालय के प्राध्यापक ने इसका विश्लेषण किया और उन्होंने इसे रोगाणुनाशक गुणों से परिपूर्ण पाया। अतः वैदिक कथन, चाहे विरोधाभासी प्रतीत हों, यदि सूक्ष्म रीति से विश्लेषित किए जाएँ तो वे सत्य सिद्ध होते हैं। कोई अपवाद हो सकता है। किन्तु इसे स्वीकार किया जाता है, और जब वैज्ञानिक रीति से विश्लेषित तथा परीक्षित किया जाता है, तो यह सही पाया जाता है।\n\nProf. Kotovsky: हाँ, यदि आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें, तो यह ठीक है।\n\nŚrīla Prabhupāda: अन्य उदाहरण भी हैं—जैसे शंख। शंख किसी प्राणी की अस्थि है, और वैदिक निर्देश के अनुसार यदि आप किसी प्राणी की अस्थि का स्पर्श करें तो आप अपवित्र हो जाते हैं और आपको स्नान करना पड़ता है। किन्तु यह शंख विग्रह-कक्ष में रखा जाता है, क्योंकि *वेदों* द्वारा इसे पवित्र स्वीकार किया गया है। मेरा अभिप्राय यह है कि हम वैदिक नियमों को तर्क के बिना स्वीकार करते हैं। यही सिद्धान्त विद्वानों द्वारा अपनाया जाता है। यदि आप अपने कथनों को *वेदों* के उद्धरणों से प्रमाणित कर सकें, तो वे स्वीकार किए जाते हैं। आपको उन्हें अन्य उपायों से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं। प्रमाण अथवा साक्ष्य कई प्रकार के होते हैं। वैदिक उद्धरण द्वारा प्रमाण को श्रुति-प्रमाण कहा जाता है। जैसे विधि-न्यायालय में यदि आप विधि-ग्रन्थ से कथन दे सकें तो आपका कथन स्वीकार किया जाता है, वैसे ही आपके द्वारा दिए गए सभी कथन, यदि श्रुति-प्रमाणों से समर्थित हों, तो विद्वानों द्वारा स्वीकार किए जाते हैं। मेरे विचार से आप जानते हैं कि *वेद* श्रुति के नाम से जाने जाते हैं।\n\nProf. Kotovsky: हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda:\n\nśruti-smṛti-purāṇādi-\n\npañcarātra-vidhiṁ vinā\n\naikāntikī harer bhaktir\n\nutpātāyaiva kalpate\n\n[BRS 1.2.101]\n\nजो भी पद्धति हम स्वीकार करें वह श्रुति, स्मृति, *पुराणों* तथा पाञ्चरात्र के साक्ष्यों से समर्थित होनी चाहिए। जो इन प्रमाणों से सिद्ध नहीं होता, वह एक उपद्रव है।\n\nProf. Kotovsky: क्या मैं केवल एक बात कह सकता हूँ? जो *वेदों* में है, उसे वैज्ञानिक रीति से भी सिद्ध किया जा सकता था। आज, मान लीजिए कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला है। उस प्रयोगशाला द्वारा जो कहा जाता है वह सत्य है। कि वह सत्य है, इसे आप स्वीकार करते हैं, उसकी यथार्थता में गए बिना। मान लीजिए आपके पास कोई वैज्ञानिक कार्यशाला अथवा संस्थान है; यदि यह कार्यशाला अथवा वैज्ञानिक संस्थान कहे, \"यह अच्छा नहीं है,\" तो सामान्य जन इसे निश्चित मान लेंगे: \"हाँ। वैज्ञानिक निकाय ने ऐसा कहा है, अतः यह समझ में आ गया।\"\n\nŚrīla Prabhupāda: इसी प्रकार, वैदिक प्रामाणिक कथन आचार्यों [महान शिक्षकों] द्वारा स्वीकार किए जाते हैं। भारत आचार्यों द्वारा शासित है—रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, शंकराचार्य। वे *वेदों* को स्वीकार करते हैं, और उनके अनुयायी उन्हें स्वीकार करते हैं। लाभ यह है कि गोबर पवित्र है अथवा अपवित्र, इसका शोध करने में मैं अपना समय व्यर्थ नहीं करता; अपितु, क्योंकि *वेदों* में इसे पवित्र कहा गया है, मैं इसे स्वीकार करता हूँ। श्रुति-प्रमाण को स्वीकार कर मैं अपना समय बचाता हूँ। इस प्रकार समाजशास्त्र तथा राजनीति अथवा किसी भी विषय हेतु *वेदों* में विभिन्न कथन विद्यमान हैं, क्योंकि वेद का अर्थ है \"ज्ञान।\"\n\nsarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭo\n\nmattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca\n\nvedaiś ca sarvair aham eva vedyo\n\nvedānta-kṛd veda-vid eva cāham\n\n(Bg. 15.15)\n\n<1>Prof. Kotovsky: क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? क्या संसार में आपके समाज की अनेक शाखाएँ हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: आपका मुख्य केन्द्र कहाँ है, और कृष्णभावनामृत समाज की शाखाएँ कहाँ हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: वस्तुतः, मेरी पैंसठ से अधिक शाखाएँ हैं। इन्होंने सिद्धान्तों को स्वीकार किया है। जैसे ये बालक। [श्रील प्रभुपाद अपने दो सचिवों की ओर संकेत करते हैं।]\n\nProf. Kotovsky: किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि ये विद्यार्थी सामान्य पाश्चात्य, यूरोपीय विश्वविद्यालयों से विरत रहते हैं? उदाहरणार्थ, क्या विभिन्न विश्वविद्यालयों में से किसी एक का सामान्य विद्यार्थी, जो सामान्य रीति से व्याख्यानों में उपस्थित होता है, दीक्षित होकर आपके समुदाय में सम्मिलित भी हो सकता है?\n\nŚrīla Prabhupāda: यदि आप हमारे समुदाय में रहना तथा दीक्षित होना चाहें, तो हम आपका स्वागत करते हैं। यदि नहीं, तो आइए हमारे दर्शन को समझने का प्रयत्न कीजिए, हमारी पुस्तकें पढ़िए—इतनी सारी पुस्तकें, पत्रिकाएँ, प्रश्न तथा उत्तर हैं। दर्शन को समझने का प्रयत्न कीजिए। ऐसा नहीं है कि सहसा कोई विद्यार्थी आता है और हमारा शिष्य बन जाता है। वह सर्वप्रथम आता है, संगति करता है, तथा समझने का प्रयत्न करता है। हम प्रचार-प्रसार नहीं करते। वह स्वेच्छा से कहता है कि वह शिष्य बनना चाहता है।\n\nProf. Kotovsky: क्या होगा यदि, उदाहरणार्थ, कोई विद्यार्थी न होकर एक युवा श्रमिक अथवा किसी कृषक का युवा पुत्र हो? क्या वह अपने सम्पूर्ण जीवन का त्याग कर किसी निर्दिष्ट केन्द्र में आपके समुदाय में सम्मिलित हो जाएगा? वह अपने दैनिक जीवन में, भौतिक जीवन में, अपना निर्वाह कैसे करेगा?\n\nŚrīla Prabhupāda: जैसा कि मैंने आपको बताया, यह प्रचार सम्पूर्ण संसार में ब्राह्मणों का सृजन करने हेतु है, क्योंकि ब्राह्मण तत्त्व का अभाव है। जो गम्भीरता से हमारे पास आता है उसे ब्राह्मण बनना पड़ता है, अतः उसे ब्राह्मण का व्यवसाय अपनाना चाहिए और क्षत्रिय अथवा शूद्र का व्यवसाय त्याग देना चाहिए। किन्तु यदि कोई अपना व्यवसाय बनाए रखना तथा साथ ही हमारे आन्दोलन को समझना चाहे, तो उसकी अनुमति है। हमारे आन्दोलन का अनुसरण करने वाले अनेक प्राध्यापक हैं। ओहायो स्टेट विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक हावर्ड व्हीलर हैं। वे मेरे शिष्य हैं। वे अपना प्राध्यापक-पद बनाए हुए हैं, किन्तु जो धन उन्हें प्राप्त होता है उसका लगभग सम्पूर्ण भाग वे इस कृष्णभावनामृत पर व्यय कर रहे हैं। गृहस्थ, जो बाहर गृहस्थ-जीवन में हैं, उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी आय का पचास प्रतिशत हमारे समाज हेतु दें, पच्चीस प्रतिशत परिवार हेतु रखें, और पच्चीस प्रतिशत व्यक्तिगत आपातकाल हेतु रखें। किन्तु भगवान् चैतन्य महाप्रभु सिखाते हैं कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कोई गृहस्थ है, अथवा संन्यास आश्रम में है, अथवा ब्राह्मण है, अथवा शूद्र। भगवान् चैतन्य कहते हैं, \"जो कोई कृष्ण के विज्ञान को समझ लेता है वह मेरा आध्यात्मिक गुरु बन जाता है।\" बंगाली में वास्तविक शब्द हैं किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय। क्या आप थोड़ी बंगाली समझते हैं?\n\nProf. Kotovsky: थोड़ी।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, एक ध्वनि-कम्पन के रूप में। येइ कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता, सेइ 'गुरु' हय। \"जो कोई कृष्ण के विज्ञान को समझ लेता है वह आध्यात्मिक गुरु बन सकता है।\" (*Caitanya-caritāmṛta*, Madhya 8.128)\n\nProf. Kotovsky: किन्तु समाज के विभिन्न सामाजिक वर्गों से ब्राह्मणों का सृजन करके, आप हिन्दू शास्त्रों के प्राचीन विधान का खण्डन करते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, मैं उसकी स्थापना करता हूँ।\n\nProf. Kotovsky: सभी शास्त्रों—*पुराणों* आदि—के अनुसार, इन चार वर्णों के वर्गों में से किसी एक के प्रत्येक सदस्य को उसी में जन्म लेना पड़ता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं, नहीं, नहीं।\n\nProf. Kotovsky: यही समस्त वर्णों का आधार है...\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं। मुझे खेद है।\n\nProf. Kotovsky: समस्त वर्णों का आधार...\n\nŚrīla Prabhupāda: आपने अशुद्ध कहा है। महान आदर सहित मैं निवेदन करता हूँ कि आप ठीक नहीं कह रहे। *Bhagavad-gītā* (4.13) में कहा गया है, cātur-varṇyaṁ maya-sṛṣṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśaḥ। \"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन चार वर्णों की रचना मेरे द्वारा गुण तथा कर्म के अनुसार की गई।\" जन्म का कोई उल्लेख नहीं है।\n\nProf. Kotovsky: मैं आपसे सहमत हूँ कि यह बाद के उन ब्राह्मणों का जोड़ है जिन्होंने इन गुणों को स्थायी बनाने का प्रयत्न किया।\n\nŚrīla Prabhupāda: इसी ने भारतीय संस्कृति का नाश किया है। अन्यथा भारत के एक भाग को पाकिस्तान के रूप में विभाजित करने की कोई आवश्यकता न होती। केवल इतना ही नहीं, अपितु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह सम्पूर्ण ग्रह भारत-वर्ष था, और महाराज परीक्षित के काल तक यह एक ध्वज के अधीन शासित था। तत्पश्चात् यह क्रमशः पृथक् हुआ। यह इतिहास है। हाल ही में उन्होंने पाकिस्तान को पृथक् कर दिया। अतः भारत-वर्ष अब भूमि के एक छोटे टुकड़े में सीमित होकर रह गया है। अन्यथा, वैदिक शास्त्र के अनुसार, यह सम्पूर्ण ग्रह भारत-वर्ष कहलाता है। पूर्व में इसका नाम इलावृत-वर्ष था। किन्तु जब से सम्राट भरत ने इस ग्रह पर शासन किया, इसे भारत-वर्ष कहा जाता है। अतः यह संस्कृति, कृष्णभावनामृत, सदा से विद्यमान रही है। किसी भी धर्म पर विचार करें—ईसाई, मुसलमान, यहूदी। वे अधिक से अधिक दो से तीन हज़ार वर्ष पुराने हैं। किन्तु इस वैदिक शास्त्र के आरम्भ का पता आप नहीं लगा सकते। अतः इसे सनातन, नित्य कहा जाता है। यह संस्कृति इस सम्पूर्ण मानव समाज हेतु है। यह कोई धार्मिक मत नहीं है। धार्मिक मत आप बदल सकते हैं, किन्तु वास्तविक धर्म आप बदल नहीं सकते। कृष्ण को समझने का प्रयत्न कीजिए। *Bhagavad-gītā* (18.66) में वे कहते हैं, sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja: \"अन्य सभी धर्मों का त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ।\" यही वास्तविक ज्ञान है—परम के प्रति शरणागत होना। आप अथवा मैं—कोई भी—किसी न किसी के प्रति शरणागत है। यह तथ्य है। हमारा जीवन शरणागति से चलता है, क्या ऐसा नहीं? क्या आप इस बिन्दु से असहमत हैं?\n\nProf. Kotovsky: कुछ सीमा तक आप शरणागत होते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, पूर्ण सीमा तक।\n\nProf. Kotovsky: आपको समाज के प्रति शरणागत होना पड़ता है, उदाहरणार्थ। सम्पूर्ण जनता के प्रति।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, सम्पूर्ण जनता के प्रति, अथवा राज्य के प्रति अथवा राजा के प्रति अथवा सरकार के प्रति अथवा जो भी आप कहें। यह शरणागति वहाँ अवश्य होनी चाहिए।\n\nProf. Kotovsky: केवल कठिनाई यह है कि हम किसी सरकार अथवा राजा के प्रति आधी शरणागति नहीं कर सकते। मुख्य अन्तर राजा के प्रति, किसी व्यक्ति के प्रति, अथवा समाज के प्रति शरणागति का है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, यह तो केवल रंग का परिवर्तन है। किन्तु शरणागति का सिद्धान्त वहाँ विद्यमान है। चाहे आप राजतन्त्र के प्रति शरणागत हों, चाहे जनतन्त्र, अभिजाततन्त्र, अथवा तानाशाही के प्रति, आपको शरणागत होना ही पड़ता है; यह तथ्य है। शरणागति के बिना कोई जीवन नहीं है। यह सम्भव ही नहीं। अतः हम लोगों को परम के प्रति शरणागत होने की शिक्षा दे रहे हैं, जहाँ से आपको सम्पूर्ण रक्षा प्राप्त होती है, ठीक जैसा कृष्ण कहते हैं (sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja [Bg. 18.66])। कोई नहीं कह सकता, \"नहीं, मैं किसी के प्रति शरणागत नहीं हूँ।\" एक भी व्यक्ति नहीं। अन्तर इस बात में है कि वह कहाँ शरणागत होता है। शरणागति का अन्तिम लक्ष्य कृष्ण हैं। अतएव *Bhagavad-gītā* (7.19) में कृष्ण कहते हैं, bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate: \"अनेक जन्मों तक इतनी सारी वस्तुओं के प्रति शरणागत होने के पश्चात्, जब मनुष्य वास्तव में ज्ञानवान हो जाता है तब वह मेरी शरण में आता है।\" Vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā sudurlabhaḥ: \"ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\"\n\nProf. Kotovsky: किन्तु साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शरणागति के साथ विद्रोह भी होना चाहिए। मानव-इतिहास ने सिद्ध किया है कि मानव-जाति ने केवल किसी प्रकार की शरणागति के विरुद्ध विद्रोह करके ही विकास किया है। मध्ययुग में फ़्रांसीसी क्रान्ति हुई। वह शरणागति के विरुद्ध विद्रोह था। किन्तु यह क्रान्ति स्वयं जन-साधारण के प्रति शरणागति थी। आप सहमत हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nProf. Kotovsky: अतः पूर्ण विराम पर पहुँच जाना पर्याप्त नहीं है। शरणागति के साथ कुछ के विरुद्ध विद्रोह तथा अन्य लोगों के प्रति शरणागति होनी चाहिए।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु शरणागति तब पूर्णतः समाप्त हो जाएगी जब वह कृष्ण के प्रति शरणागति हो।\n\nProf. Kotovsky: आह, आह।\n\nŚrīla Prabhupāda: यही पूर्ण विराम है—अब और शरणागति नहीं। अन्य कोई भी शरणागति आपको क्रान्ति द्वारा बदलनी पड़ती है। किन्तु जब आप कृष्ण के पास आते हैं, तब वह पर्याप्त है। आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। मैं आपको एक उदाहरण दूँगा: एक शिशु रो रहा है, और लोग उसे एक गोद से दूसरी गोद में ले जाते हैं। ओह, वह नहीं रुकता। किन्तु जैसे ही शिशु अपनी माता की गोद में आता है...\n\nProf. Kotovsky: वह रुक जाता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, पूर्ण सन्तुष्टि। अतः यह शरणागति, ये परिवर्तन, विभिन्न श्रेणियों में चलते रहेंगे। किन्तु इस सम्पूर्ण शरणागति का योग माया के प्रति शरणागति है। अतएव, *Bhagavad-gītā* में कहा गया है कि कृष्ण की उपेक्षा करते हुए यह शरणागति सर्वथा माया है। चाहे आप इसके प्रति शरणागत हों अथवा उसके प्रति, किन्तु अन्तिम शरणागति कृष्ण के प्रति शरणागति है; तब आप सुखी होंगे। शरणागति की प्रक्रिया तो विद्यमान है, किन्तु कृष्ण के प्रति शरणागति मनुष्य को दिव्य रूप से पूर्णतः सन्तुष्ट रखती है।\n\nProf. Kotovsky: क्या भारत में रूढ़िवादी हिन्दुओं अथवा ब्राह्मणों के विरोधी मनोभाव आपकी शिक्षाओं के प्रति आपके सामने नहीं आए?\n\nŚrīla Prabhupāda: हमने उन्हें वश में कर लिया है।\n\nProf. Kotovsky: आह।\n\nŚrīla Prabhupāda: कोई भी रूढ़िवादी हिन्दू आकर चुनौती दे सकता है, किन्तु हमारे पास हमारे अस्त्र हैं—वैदिक साहित्य। अतः कोई नहीं आया। अमेरिका में ईसाई पादरी तक मुझसे प्रेम करते हैं। वे कहते हैं, \"ये बालक अमेरिकी, ईसाई, यहूदी हैं, और अब ये इतने अधिक ईश्वर के अनुगामी हैं। किन्तु हम इन्हें उद्धार न कर सके।\" वे इसे स्वीकार कर रहे हैं। उनके पिता तथा उनके माता-पिता मेरे पास आते हैं, मुझे प्रणाम करते हैं, और कहते हैं, \"स्वामीजी, यह हमारा महान सौभाग्य है कि आप यहाँ ईश्वर-भावना सिखाने आए हैं।\" अतः इसके विपरीत, मेरा भली-भाँति स्वागत हुआ है। भारत में भी, क्योंकि आपने भारत के विषय में पूछा, अन्य सभी सम्प्रदाय स्वीकार कर रहे हैं कि मुझसे पूर्व अनेक प्रकार के स्वामी पाश्चात्य देशों में गए, किन्तु वे एक भी व्यक्ति को कृष्णभावनामृत में परिवर्तित न कर सके। वे इसे स्वीकार कर रहे हैं। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं कोई श्रेय नहीं लेता, किन्तु मुझे विश्वास है कि क्योंकि मैं वैदिक ज्ञान को यथारूप, मिलावट के बिना, प्रस्तुत कर रहा हूँ, अतः यह प्रभावी हो रहा है। यही मेरा विश्वास है। यदि आपके पास सही औषधि हो और आप उसे किसी रोगी को दें, तो आपको निश्चित होना चाहिए कि वह स्वस्थ हो जाएगा।\n\nProf. Kotovsky: आपके एक हज़ार शिष्यों में से कितने स्वयं भारत में हैं? आपके समुदाय के कितने सदस्य भारत में हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: भारत में?\n\nProf. Kotovsky: हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: भारत में अनेक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति हैं—सैकड़ों, सहस्रों, लाखों। भारत में तो प्रश्न ही नहीं उठता। एक भी हिन्दू ऐसा नहीं है जो कृष्णभावनाभावित न हो।\n\nProf. Kotovsky: हाँ, मैं समझता हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: वैष्णवजन। इसे वैष्णव सम्प्रदाय कहा जाता है। आप भारत में रहे हैं, अतः जैसा कि सामान्यतः ज्ञात है, वहाँ करोड़ों वैष्णव हैं। उदाहरणार्थ, ये सज्जन [उपस्थित एक भारतीय सज्जन] एयर इंडिया वायुसेवा के कमांडर हैं। वे मेरे शिष्य नहीं हैं, किन्तु वे एक वैष्णव हैं, कृष्णभावनाभावित। इसी प्रकार, भारत में करोड़ों कृष्णभावनाभावित व्यक्ति हैं। ऐसे मुसलमान भी हैं जो कृष्णभावनाभावित हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक मुसलमान प्राध्यापक हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण के महान भक्त हैं। अतः यह स्वाभाविक है। *Caitanya-caritāmṛta* में कहा गया है कि कृष्णभावनामृत सर्वत्र है, प्रत्येक के हृदय में है। इसे केवल इस प्रक्रिया द्वारा जाग्रत करना है। बस इतना ही। यह आपके हृदय में भी है। ऐसा नहीं है कि यह आपके लिए पराया हो। प्रत्येक के हृदय में कृष्णभावनामृत है। इस प्रक्रिया द्वारा हमें इसे जाग्रत करना है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे सूर्य उदित होता है। ऐसा नहीं है कि सहसा सूर्य कहीं शून्य से आ जाता है। वह तो वहाँ है, किन्तु प्रातःकाल में उदित होता है। इसी प्रकार, यह कृष्णभावनामृत सर्वत्र है, किन्तु किसी न किसी रीति से यह अब आच्छादित है। इस प्रक्रिया द्वारा संगति से यह पुनः जाग्रत तथा उद्बुद्ध होता है।\n\nProf. Kotovsky: आप कल मास्को आए। क्या आपने यहाँ मास्को में कुछ देखा?\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, मुझे दर्शनीय स्थल देखने में अधिक रुचि नहीं है।\n\nProf. Kotovsky: किन्तु किसी भी स्थिति में, केवल पुरानी शैली के होटल में ठहरना रोचक नहीं है—मिलने योग्य अधिक लोग नहीं हैं। और आप परसों प्रस्थान कर रहे हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda: यही मेरा कार्यक्रम है।\n\nProf. Kotovsky: आप संयुक्त राज्य अमेरिका हेतु प्रस्थान कर रहे हैं अथवा यूरोप हेतु?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यूरोप हेतु। पेरिस। और हमारे लन्दन तथा सैन फ्रांसिस्को में दो अत्यन्त विशाल समारोह हैं। वे रथ-यात्रा रथोत्सव की व्यवस्था कर रहे हैं। यह रथोत्सव जगन्नाथ पुरी में मनाया जाता है। क्या आप जगन्नाथ पुरी गए हैं?\n\nProf. Kotovsky: हाँ, रथोत्सव अनादि काल से होता आ रहा है। एक अत्यन्त प्राचीन परम्परा। विशाल रथ।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, और अब इसका प्रवर्तन पाश्चात्य देशों में लन्दन तथा सैन फ्रांसिस्को में हुआ है, और सम्भवतः क्रमशः हम इसका प्रवर्तन अन्य देशों में भी करेंगे।\n\nProf. Kotovsky: लन्दन में एक बड़ा भारतीय समुदाय है।\n\nŚrīla Prabhupāda: नहीं, नहीं। इसका आयोजन अंग्रेज़ों तथा अमेरिकियों द्वारा किया गया है। लन्दन तथा सैन फ्रांसिस्को के भारतीय समुदाय बनने का प्रयत्न कर रहे हैं—आप वह शब्द जानते हैं? साहब?\n\nProf. Kotovsky: [हँसते हुए।] पाश्चात्यीकृत। [दोनों हँसते हैं।] विश्वविद्यालय के एक अत्यन्त महान सामाजिक मानवविज्ञानी ने कुछ अत्यन्त रोचक लिखा है। वे कहते हैं कि दो प्रक्रियाएँ हैं—ब्राह्मणों, मुख्यतः उच्च वर्ग, के मध्य पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया, और संस्कृतीकरण नामक प्रक्रिया, जो तथाकथित निम्न वर्गों, यहाँ तक कि अस्पृश्यों, द्वारा ब्राह्मण अनुष्ठानों आदि को अपनाने की प्रक्रिया है। यह इस समय भारत में एक अत्यन्त रोचक प्रक्रिया है। किन्तु भारत की स्थिति, दुर्भाग्यवश, समस्यापूर्ण है।\n\nŚrīla Prabhupāda: कठिनाई यह है कि भारत कहीं नहीं है। वे पाश्चात्य जीवन का अनुकरण करने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु भौतिकतावादी अथवा प्राविधिक दृष्टिकोण से, वे सौ वर्ष पीछे हैं।\n\nProf. Kotovsky: हाँ, यह ठीक है। किन्तु भारत हेतु क्या किया जाए?\n\nŚrīla Prabhupāda: एक बात है जिसका मुझे अनुभव हो रहा है। यदि भारत की आध्यात्मिक सम्पदा का वितरण किया जाए, तो उससे भारत का सम्मान बढ़ेगा। क्योंकि मैं जहाँ भी जाता हूँ, लोग अब भी भारतीय संस्कृति की आराधना करते हैं। यदि भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के इस कोष का उचित वितरण किया जाए, तो कम से कम भारत के बाहर के लोग समझेंगे कि उन्हें भारत से कुछ प्राप्त हो रहा है।\n\nProf. Kotovsky: वस्तुतः, आप ठीक कहते हैं। भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सर्वत्र ज्ञात कराया जाना चाहिए। किन्तु साथ ही, इससे स्वयं भारतीय जनसमूह को किस प्रकार लाभ होगा? वे भारत में बैठे हैं, और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के सम्पूर्ण संसार में प्रसार से उन्हें कुछ प्राप्त होने वाला नहीं। भारतीय गाँवों को उर्वरक, ट्रैक्टर आदि चाहिए।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, हमें उस पर कोई आपत्ति नहीं।\n\nProf. Kotovsky: हाँ, मेरे विचार से आप आपत्ति नहीं कर सकते, किन्तु साथ ही, भारत में कुछ किया जाना चाहिए। कोई इसे पाश्चात्यीकरण कह सकता है, किन्तु एक औद्योगिक प्राविधिक क्रान्ति का यह प्रवर्तन भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों में आवश्यक है—कृषि, उद्योग आदि।\n\nŚrīla Prabhupāda: अर्जुन, *Bhagavad-gītā* समझने से पूर्व, एक योद्धा थे, और *Bhagavad-gītā* समझने के पश्चात् भी वे योद्धा ही रहे। अतः हम स्थिति को बदलना नहीं चाहते। उदाहरणार्थ, आप एक आदरणीय प्राध्यापक, एक शिक्षक हैं। हम यह नहीं कहते कि आपको अपनी स्थिति बदलनी चाहिए। हम आपको अपने दर्शन के विषय में सहमत कराने आए हैं। बस इतना ही। अर्जुन युद्ध करने से इनकार कर रहे थे। \"कृष्ण, मैं अपने सम्बन्धियों का वध नहीं करना चाहता। मैं यह राज्य नहीं चाहता।\" किन्तु उन्हें *Bhagavad-gītā* की शिक्षा दी गई, और अन्त में जब कृष्ण ने पूछा, \"अब तुम्हारा निर्णय क्या है?\" तो उन्होंने कहा, kariṣye vacanaṁ tava—\"हाँ, मैं वैसा ही करूँगा जैसा आप कहते हैं।\" [Bg. 18.73]। इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी चेतना बदल गई। वे योद्धा थे, और वे योद्धा ही रहे, किन्तु उन्होंने अपनी चेतना बदल ली। हम यही चाहते हैं। हम समाज की वर्तमान दशा को विचलित नहीं करना चाहते। हम प्रौद्योगिकी के विरुद्ध नहीं हैं। नहीं, अपितु हम किसी को इस कृष्णभावनामृत को समझाने का प्रयत्न करते हैं। यही हमारा कार्यक्रम है।\n\nProf. Kotovsky: वस्तुतः, साथ ही किसी भी चेतना का अन्तिम लक्ष्य समाज को बदलना है—उसे एक उत्तम समाज बनाना है।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह तो स्वतः हो जाता है।\n\nProf. Kotovsky: मैं वास्तव में इतना प्रसन्न नहीं हूँ कि अन्तिम लक्ष्य समाज को विचलित न करना है, क्योंकि आधुनिक समाज में चेतना के माध्यम से बदलने योग्य अनेक बातें हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह प्रारम्भिक परिवर्तन तपस्या के नियमों तथा विधानों का पालन करना है। उदाहरणार्थ, नशीले पदार्थ ग्रहण न करें।\n\nProf. Kotovsky: नशीले पदार्थों में लिप्त न होना—सादगी आदि।\n\nŚrīla Prabhupāda: अतः यदि कोई इस प्रक्रिया को अपना ले...\n\nProf. Kotovsky: तब अन्य बातें स्वतः आ जाएँगी।\n\nŚrīla Prabhupāda: किसी का सम्पूर्ण जीवन बदल जाएगा, क्योंकि ये चार बातें—अवैध यौन-जीवन, नशीले पदार्थ, माँसाहार तथा द्यूत-क्रीड़ा—सामाजिक उन्नति में अत्यन्त बड़ी बाधाएँ हैं।\n\nProf. Kotovsky: इससे स्वतः ही जीवन सरल हो जाएगा, क्योंकि जो व्यक्ति अवैध यौन-सम्बन्ध, नशीले पदार्थों तथा ऐसी अन्य बातों में लिप्त नहीं होता उसे तुलनात्मक रूप से एक सरल जीवन व्यतीत करना पड़ता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: एक दिन मैं बम्बई में एक आदरणीय सज्जन से बात कर रहा था। मैं उन्हें बता रहा था कि कृष्ण कहते हैं:\n\nmāṁ hi pārtha vyapāśritya\n\nye 'pi syuḥ pāpa-yonayaḥ\n\nstriyo vaiśyās tathā śūdrās\n\nte 'pi yānti parāṁ gatim\n\n\"वे भी जो नीच कुल में जन्मे हैं [pāpa-yonayaḥ]—स्त्री, वैश्य तथा शूद्र—मेरी शरण ग्रहण करके सम्मिलित किए जाते हैं। मेरा आश्रय स्वीकार करके वे भी दिव्य पद तक उन्नत हो जाते हैं।\" (Bg. 9.32) अब हिन्दू समाज के उच्च वर्गों ने *Bhagavad-gītā* के इस आदेश की उपेक्षा क्यों की है? मान लीजिए कोई पाप-योनय, नीच कुल में जन्मा है। कृष्ण कहते हैं कि वह \"दिव्य पद तक उन्नत हो सकता है यदि वह मुझे स्वीकार करे।\" यह संदेश उच्च वर्ग के लोगों द्वारा प्रचारित क्यों नहीं किया गया जिससे तथाकथित नीच कुल में जन्मे लोग उन्नत हो सकते? उन्होंने उनका तिरस्कार क्यों किया? परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों को स्वीकार करने के बजाय, भारतीयों ने उनका तिरस्कार किया, और अब वे विभाजित होकर पृथक् हो गए हैं। वे भारत के नित्य शत्रु बन गए हैं। अतः प्रथम बार हम व्यक्तियों को कृष्णभावनामृत के उच्चतर पद तक उन्नत करने का प्रयत्न कर रहे हैं, चाहे कोई नीच कुल में जन्मा हो। क्योंकि आत्मा शुद्ध है। *वेदों* में कहा गया है कि आत्मा किसी भी भौतिक कल्मष से अछूती है; वह तो केवल अस्थायी रूप से आच्छादित है। इस आवरण को हटा देना चाहिए। तब मनुष्य शुद्ध हो जाता है। यही मानव-जीवन का ध्येय है—इस भौतिक वातावरण से अपने आपको अनावृत करना, आध्यात्मिक बोध तक आना, तथा कृष्ण के प्रति शरणागत होना। तब जीवन पूर्ण होता है।\n\nआधुनिक विज्ञान का लघु संसार\n\nअप्रैल 1973 में, लॉस एंजेलिस के वेनिस बीच पर एक लम्बे प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान, श्रील प्रभुपाद आधुनिक विज्ञान तथा वैज्ञानिकों के विषय की ओर मुड़े। दार्शनिक कठोरता, गहन सामान्य बुद्धि, तथा निरस्त्र कर देने वाली स्पष्टवादिता के साथ, उन्होंने जीवन की उत्पत्ति के विषय में वैज्ञानिकों के सामान्यतः स्वीकृत सिद्धान्तों के पीछे की संकीर्णता तथा अतर्कसंगति को उजागर किया। उपस्थित विद्यार्थियों में डॉ. थौडम सिंह, एक कार्बनिक रसायनज्ञ, सम्मिलित थे, जिन्होंने इस संवाद को टेप पर अंकित किया।\n\nŚrīla Prabhupāda: विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का सम्पूर्ण संसार इस मिथ्या विचार पर चल रहा है कि जीवन जड़ पदार्थ से जन्म लेता है। हम इस निरर्थक सिद्धान्त को बिना चुनौती के नहीं जाने दे सकते। जीवन जड़ पदार्थ से नहीं आता। जड़ पदार्थ जीवन से उत्पन्न होता है। यह सिद्धान्त नहीं है; यह तथ्य है। विज्ञान एक अशुद्ध सिद्धान्त पर आधारित है; अतएव उसके सभी आकलन तथा निष्कर्ष गलत हैं, और लोग इसके कारण कष्ट भोग रहे हैं। जब इन सभी भ्रान्त आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों को सुधार दिया जाएगा, तब लोग सुखी हो जाएँगे। अतः हमें वैज्ञानिकों को चुनौती देनी होगी और उन्हें परास्त करना होगा। अन्यथा वे सम्पूर्ण समाज को पथभ्रष्ट कर देंगे।\n\nजड़ पदार्थ छह अवस्थाओं में बदलता है: जन्म, वृद्धि, स्थिति, उपजात-उत्पादन, ह्रास, तथा मृत्यु। किन्तु जड़ पदार्थ के भीतर का जीवन, आत्मा, नित्य है; वह ऐसे किसी परिवर्तन से नहीं गुज़रती। जीवन विकसित तथा क्षीण होता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह केवल इन छह अवस्थाओं में से प्रत्येक से तब तक गुज़रता रहता है जब तक भौतिक शरीर का और निर्वाह नहीं किया जा सकता। तब पुराना शरीर मर जाता है, और आत्मा एक नए शरीर में प्रवेश करती है। जब हमारे वस्त्र पुराने तथा जीर्ण हो जाते हैं, तो हम उन्हें बदल देते हैं। इसी प्रकार, एक दिन हमारे शरीर पुराने तथा निरुपयोगी हो जाते हैं, और हम एक नए शरीर में चले जाते हैं।\n\nजैसा कृष्ण *Bhagavad-gītā* (2.13) में कहते हैं, dehino 'smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā/ tathā dehāntara-prāptiḥ: \"जिस प्रकार देहधारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से युवावस्था तथा वृद्धावस्था की ओर निरन्तर अग्रसर होती है, उसी प्रकार आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चली जाती है।\" और कुछ आगे (2.18): antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ। इसका अर्थ है कि केवल अविनाशी तथा नित्य सत्ता का भौतिक शरीर ही विनाश के अधीन है। यह भौतिक शरीर नश्वर है, किन्तु शरीर के भीतर का जीवन नित्य, शाश्वत है।\n\n*वेदों* के अनुसार, शरीर के भीतर आत्मा का परिमाण बाल की नोक का दस-सहस्रवाँ भाग है। यह अत्यन्त सूक्ष्म है; वस्तुतः, यह आणविक है। फिर भी उस आणविक आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण, मेरा शरीर कार्य कर रहा है। क्या इसे समझना इतना कठिन है? मान लीजिए कोई मनुष्य अपने आपको अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट तथा बलवान समझता है। वह हृष्ट-पुष्ट तथा बलवान क्यों है? केवल इसलिए कि उसके शरीर के भीतर एक छोटी आध्यात्मिक चिनगारी है। किन्तु जैसे ही वह आध्यात्मिक चिनगारी चली जाती है, उसका शरीर मर जाता है, और उसका बल तथा ओज शून्य हो जाता है। यदि वैज्ञानिक कहते हैं कि जड़ पदार्थ ही जीवन का कारण तथा उद्गम है, तो उन्हें केवल एक मृत मनुष्य को रसायनों का अन्तःक्षेपण कर जीवित करके दिखाने दीजिए। किन्तु यह वे नहीं कर सकते।\n\nDr. Singh: क्योंकि वैज्ञानिक आत्मा को देख नहीं सकते, अतः वे कहते हैं कि उसका अस्तित्व अत्यन्त संदिग्ध है।\n\nŚrīla Prabhupāda: वे उसे कैसे देख सकते हैं? वह देखने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म है। ऐसी दृष्टि-शक्ति कहाँ है?\n\nDr. Singh: फिर भी, वे किसी न किसी उपाय से उसका संवेदन करना चाहते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: यदि आप किसी में प्राणघातक विष का केवल एक कण अन्तःक्षेपित कर दें, तो वह तत्काल मर जाता है। कोई विष को अथवा यह कि वह कैसे क्रिया करता है, देख नहीं सकता। किन्तु विष फिर भी क्रिया कर रहा है। उसी प्रकार, *वेद* कहते हैं कि क्योंकि आत्मा नामक वह सूक्ष्म कण शरीर के भीतर है, अतः सम्पूर्ण शरीर भली-भाँति कार्य कर रहा है। यदि मैं अपने आपको चुटकी काटूँ, तो मैं तत्काल उसका अनुभव करता हूँ, क्योंकि मैं अपनी सम्पूर्ण त्वचा पर चेतन हूँ। किन्तु जैसे ही आत्मा अनुपस्थित होती है, जो तब होता है जब मेरा शरीर मर जाता है, तब आप इसी त्वचा को लेकर काट सकते हैं और टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, और कोई विरोध नहीं करेगा। इस सरल बात को समझना इतना कठिन क्यों है? क्या यह आत्मा का पता लगाना नहीं है?\n\nDr. Singh: वह तो आत्मा है। किन्तु ईश्वर के विषय में क्या?\n\nŚrīla Prabhupāda: सर्वप्रथम हम आत्मा को समझें। आत्मा एक छोटा ईश्वर है। यदि आप नमूने को समझ लें, तो आप समग्र को समझ सकते हैं।\n\nअब यहाँ जड़ पदार्थ है। [श्रील प्रभुपाद अपनी छड़ी से एक मृत वृक्ष की ओर संकेत करते हैं।] पूर्व में इस वृक्ष से पत्ते तथा टहनियाँ उग रही थीं। वे अब क्यों नहीं उग रही हैं? क्या वैज्ञानिक इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं?\n\nKarāndhara dāsa: वे कहेंगे कि रासायनिक संघटन बदल गया है।\n\nŚrīla Prabhupāda: ठीक है, तो यदि वे रसायन के ज्ञान में इतने उन्नत हैं, तो उन्हें शाखाओं तथा पत्तों को पुनः उगाने हेतु उचित रसायनों की आपूर्ति करनी चाहिए।\n\nBrahmānanda Swami: ज्ञान का अर्थ है कि मनुष्य को अपने सिद्धान्त को प्रदर्शित करने में समर्थ होना चाहिए। उन्हें अपनी प्रयोगशालाओं में यह दिखाने में समर्थ होना चाहिए कि जीवन रसायनों के संयोग से उत्पन्न होता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, वैज्ञानिक प्रणाली का अर्थ है सर्वप्रथम अवलोकन, फिर परिकल्पना, और फिर प्रदर्शन। किन्तु ये वैज्ञानिक अपनी परिकल्पना को प्रदर्शित नहीं कर सकते। वे केवल अवलोकन करते हैं और फिर निरर्थक बात कहते हैं।\n\nवैज्ञानिक कहते हैं कि रसायन ही जीवन का कारण हैं। किन्तु जब वृक्ष जीवित था तब जो भी रसायन वहाँ थे वे सब अब भी उपस्थित हैं। और जीवन-ऊर्जा भी वहाँ है। वृक्ष में सहस्रों सूक्ष्मजीव हैं, और वे सब जीव हैं। कोई यह दावा नहीं कर सकता कि इस वृक्ष के शरीर में जीवन-ऊर्जा का अभाव है।\n\nDr. Singh: किन्तु स्वयं वृक्ष की जीवन-ऊर्जा के विषय में क्या?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, यही अन्तर है। जीवनी-शक्ति व्यक्तिगत है, और वह विशेष व्यक्तिगत जीव जो वृक्ष था, चला गया है। ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि जीवन को बनाए रखने हेतु आवश्यक सभी रसायन अब भी वहाँ हैं फिर भी वृक्ष मृत है।\n\nयहाँ एक अन्य उदाहरण है: मान लीजिए मैं किसी निवास-स्थान में रहता हूँ, और फिर मैं उसे छोड़ देता हूँ। मैं चला गया, किन्तु अनेक अन्य जीव वहाँ बने रहते हैं—चींटियाँ, मकड़ियाँ इत्यादि। यह सत्य नहीं है कि केवल इसलिए कि मैंने वह निवास-स्थान छोड़ दिया, अब वहाँ और जीवन नहीं समा सकता। अन्य जीव अब भी वहाँ रह रहे हैं। केवल इतना है कि मैं—एक व्यक्तिगत जीव—चला गया हूँ। वृक्ष के रसायन उस निवास-स्थान के समान हैं; वे केवल व्यक्तिगत जीवनी-शक्ति—आत्मा—के लिए कार्य करने हेतु वातावरण हैं। इस प्रकार वैज्ञानिक रासायनिक प्रयोगशाला में जीवन कभी उत्पन्न नहीं कर सकेंगे।\n\nतथाकथित वैज्ञानिक कहते हैं कि जीवन रसायनों से आरम्भ होता है। किन्तु वास्तविक प्रश्न यह है, \"रसायन कहाँ से आए हैं?\" रसायन जीवन से आते हैं, और इसका अर्थ है कि जीवन में योगशक्ति है। उदाहरणार्थ, एक सन्तरे के वृक्ष में अनेक सन्तरे होते हैं, और प्रत्येक सन्तरे में रसायन होते हैं—साइट्रिक अम्ल तथा अन्य। तो ये रसायन कहाँ से आए हैं? स्पष्टतः वे वृक्ष के भीतर के जीवन से आए हैं। वैज्ञानिक रसायनों के उद्गम से चूक रहे हैं। उन्होंने अपना अन्वेषण रसायनों से आरम्भ किया है, किन्तु वे रसायनों के उद्गम को पहचान नहीं सकते। रसायन परम जीवन—ईश्वर—से आते हैं। जिस प्रकार मनुष्य का जीवित शरीर अनेक रसायन उत्पन्न करता है, उसी प्रकार परम जीवन (भगवान्) वायुमण्डल में, जल में, मनुष्यों में, पशुओं में, तथा पृथ्वी में पाए जाने वाले सभी रसायनों का उत्पादन कर रहे हैं। और इसी को योगशक्ति कहा जाता है। जब तक भगवान् की योगशक्ति स्वीकार नहीं की जाती, तब तक जीवन की उत्पत्ति की समस्या का कोई समाधान नहीं है।\n\nDr. Singh: वैज्ञानिक उत्तर देंगे कि वे योगशक्ति में विश्वास नहीं कर सकते।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु उन्हें रसायनों के उद्गम की व्याख्या करनी ही होगी। कोई भी देख सकता है कि एक साधारण वृक्ष अनेक रसायन उत्पन्न कर रहा है; वे इसका खण्डन नहीं कर सकते। किन्तु वह इन्हें उत्पन्न कैसे करता है? क्योंकि वे इसका उत्तर नहीं दे सकते, अतः उन्हें स्वीकार करना ही होगा कि जीवनी-शक्ति में योगशक्ति है। मैं व्याख्या नहीं कर सकता कि मेरी अँगुली से मेरा नाखून कैसे उग रहा है; यह मेरे मस्तिष्क की शक्ति से परे है। दूसरे शब्दों में, यह अचिन्त्य सामर्थ्य अथवा अचिन्त्य-शक्ति से उग रहा है। अतः यदि अचिन्त्य-शक्ति एक साधारण प्राणी में विद्यमान है, तो कल्पना कीजिए कि ईश्वर के पास कितनी अचिन्त्य-शक्ति होगी।\n\nईश्वर तथा मेरे बीच अन्तर यह है कि यद्यपि मेरे पास ईश्वर के समान ही शक्तियाँ हैं, मैं केवल थोड़ी मात्रा में रसायन उत्पन्न कर सकता हूँ, जबकि वे विपुल मात्राएँ उत्पन्न कर सकते हैं। मैं स्वेद के रूप में थोड़ा जल उत्पन्न कर सकता हूँ, किन्तु ईश्वर समुद्रों का उत्पादन कर सकते हैं। समुद्री जल की एक बूँद का विश्लेषण आपको बिना किसी त्रुटि के समुद्र का गुणात्मक विश्लेषण दे देता है। इसी प्रकार, साधारण जीव ईश्वर का अभिन्न अंश है, अतः जीवों का विश्लेषण करके हम ईश्वर को समझने लगा सकते हैं। ईश्वर में महान योगशक्ति है। ईश्वर की योगशक्ति शीघ्रता से कार्य कर रही है, ठीक एक विद्युत-यन्त्र की भाँति। यन्त्र किसी निश्चित ऊर्जा से चलते हैं, और वे इतने भली-भाँति बनाए जाते हैं कि सम्पूर्ण कार्य केवल एक बटन दबाने से हो जाता है। इसी प्रकार, ईश्वर ने कहा, \"सृष्टि हो जाए,\" और सृष्टि हो गई। इस रीति से विचार करने पर, प्रकृति के कार्य समझने में अधिक कठिन नहीं हैं। ईश्वर के पास ऐसी अद्भुत शक्तियाँ हैं कि सृष्टि, केवल उनके आदेश पर, तत्काल हो जाती है।\n\nBrahmānanda Swami: वैज्ञानिक ईश्वर अथवा अचिन्त्य-शक्ति को स्वीकार नहीं करते।\n\nŚrīla Prabhupāda: यही उनकी धूर्तता है। ईश्वर का अस्तित्व है, और उनकी अचिन्त्य-शक्ति का भी अस्तित्व है।\n\nKarāndhara dāsa: वैज्ञानिक कहते हैं कि जीवन जैवरासायनिक रूप से रचा गया था।\n\nŚrīla Prabhupāda: और मैं उनसे कहता हूँ: \"आप जीवन की रचना क्यों नहीं करते? आपकी जीवविज्ञान तथा रसायनविज्ञान अत्यन्त उन्नत हैं, तो आप जीवन की रचना क्यों नहीं करते?\"\n\nKarāndhara dāsa: वे कहते हैं कि वे भविष्य में जीवन की रचना करेंगे।\n\nŚrīla Prabhupāda: भविष्य में कब? यदि वैज्ञानिक रचनात्मक प्रक्रिया को जानते हैं, तो वे अभी जीवन की रचना क्यों नहीं कर सकते? यदि जीवन का कोई जैवरासायनिक उद्गम है, और यदि जीवविज्ञानी तथा रसायनज्ञ इतने उन्नत हैं, तो वे अपनी प्रयोगशालाओं में जीवन की रचना क्यों नहीं कर सकते? जब यह निर्णायक बिन्दु उठाया जाता है, तब वे कहते हैं, \"हम इसे भविष्य में करेंगे।\" भविष्य में क्यों? यह निरर्थक है। किसी भी भविष्य पर विश्वास न करें, चाहे वह कितना ही सुखद हो। उनकी उन्नति का अर्थ क्या है? वे निरर्थक बात कर रहे हैं।\n\nKarāndhara dāsa: वे कहते हैं कि वे जीवन की रचना करने के बिल्कुल कगार पर हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: किन्तु वह भी भविष्य ही है, एक भिन्न रीति से। उन्हें स्वीकार करना ही होगा कि वे अब भी जीवन की उत्पत्ति के विषय में सत्य को नहीं जानते। क्योंकि वे भविष्य में जीवन की रचना करने की समर्थता की अपेक्षा कर रहे हैं, अतः वर्तमान में उनका ज्ञान अपूर्ण ही होना चाहिए। उनका प्रस्ताव किसी को कोई उत्तर-दिनांकित चेक देने जैसा है। मान लीजिए मुझ पर आपके दस सहस्र डॉलर ऋण हैं और मैं कहता हूँ, \"हाँ, मैं आपको इस उत्तर-दिनांकित चेक से सम्पूर्ण राशि चुका दूँगा। क्या यह ठीक है?\" यदि आप बुद्धिमान हैं, तो आप कुछ ठोस देख सकते हैं। इसी प्रकार, वैज्ञानिक जैवरसायन द्वारा घास का एक तिनका तक उत्पन्न नहीं कर सकते, फिर भी वे दावा करते हैं कि जीवन जड़ पदार्थ से उत्पन्न होता है। यह क्या निरर्थक बात है? क्या कोई इस पर प्रश्न नहीं कर रहा? हम सिद्ध कर सकते हैं कि जीवन जीवन से आरम्भ हुआ। यहाँ प्रमाण है: जब कोई पिता किसी सन्तान को जन्म देता है, तो पिता जीवित होता है, और सन्तान जीवित होती है। किन्तु वैज्ञानिक का यह प्रमाण कहाँ है कि जीवन जड़ पदार्थ से आता है? हम सिद्ध कर सकते हैं कि जीवन जीवन से आरम्भ होता है, और हम यह भी सिद्ध कर सकते हैं कि मूल जीवन श्रीकृष्ण हैं। किन्तु क्या ऐसा कोई साक्ष्य विद्यमान है कि कोई सन्तान कभी किसी मृत पाषाण से उत्पन्न हुई हो? वैज्ञानिक यह सिद्ध नहीं कर सकते कि जीवन जड़ पदार्थ से आता है। वे उसे भविष्य के लिए छोड़े दे रहे हैं।\n\nKarāndhara dāsa: वैज्ञानिक जिसे \"वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा\" कहते हैं उसका आधार यह है कि वे केवल उसी के विषय में बात करते हैं जिसका वे अपनी इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव कर सकते हैं।\n\nŚrīla Prabhupāda: तब वे उस रोग से पीड़ित हैं जिसे हम \"डॉक्टर मेंढक का दर्शन\" कहते हैं। एक बार एक मेंढक था जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन एक कुएँ में बिताया था। एक दिन एक मित्र उससे मिलने आया और उसे अटलांटिक महासागर के अस्तित्व के विषय में बताया।\n\n\"ओह, यह अटलांटिक महासागर क्या है?\" कुएँ में बैठे मेंढक ने पूछा।\n\n\"यह जल का एक विशाल पिण्ड है,\" उसके मित्र ने उत्तर दिया।\n\n\"कितना विशाल? क्या यह इस कुएँ से दूना बड़ा है?\"\n\n\"ओह, नहीं, बहुत अधिक बड़ा,\" उसके मित्र ने उत्तर दिया।\n\n\"कितना अधिक बड़ा? दस गुना बड़ा?\"\n\nइस प्रकार मेंढक आकलन करता गया। किन्तु उस महान महासागर की गहराइयों तथा सुदूर विस्तार को समझ पाने की उसके लिए क्या सम्भावना थी? हमारी क्षमताएँ, अनुभव, तथा कल्पना की शक्तियाँ सदा सीमित होती हैं। मेंढक सदा अपने कुएँ के सापेक्ष शब्दों में सोचता रहा। उसमें अन्यथा सोचने की कोई शक्ति नहीं थी। इसी प्रकार, वैज्ञानिक परम सत्य, समस्त कारणों के कारण, का अपनी अपूर्ण इन्द्रियों तथा मनों से आकलन कर रहे हैं, और इस प्रकार वे विभ्रमित होने के लिए बाध्य हैं। तथाकथित वैज्ञानिकों का मूल दोष यह है कि उन्होंने अपने निष्कर्षों पर पहुँचने हेतु आगमनात्मक प्रक्रिया को अपनाया है। उदाहरणार्थ, यदि कोई वैज्ञानिक आगमनात्मक प्रक्रिया द्वारा यह निर्धारित करना चाहे कि मनुष्य मरणशील है अथवा नहीं, तो उसे प्रत्येक मनुष्य का अध्ययन करना होगा यह जानने का प्रयत्न करने हेतु कि उनमें से कोई अथवा कुछ अमर तो नहीं। वैज्ञानिक कहता है, \"मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। कुछ मनुष्य ऐसे हो सकते हैं जो अमर हों। मैंने अभी तक प्रत्येक मनुष्य को नहीं देखा। अतः मैं कैसे स्वीकार करूँ कि मनुष्य मरणशील है?\" इसे आगमनात्मक प्रक्रिया कहा जाता है। और निगमनात्मक प्रक्रिया का अर्थ है कि आपके पिता, आपके शिक्षक, अथवा आपके गुरु कहते हैं कि मनुष्य मरणशील है, और आप इसे स्वीकार कर लेते हैं।\n\nDr. Singh: अतः ज्ञान प्राप्त करने की एक आरोही प्रक्रिया तथा एक अवरोही प्रक्रिया है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ। आरोही प्रक्रिया कभी सफल नहीं होगी, क्योंकि वह इन्द्रियों के माध्यम से एकत्र की गई जानकारी पर निर्भर करती है, और इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। अतः हम अवरोही प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं।\n\nईश्वर को आगमन-प्रक्रिया (inductive process) से नहीं जाना जा सकता। अतः उन्हें अधोक्षज कहा जाता है, जिसका अर्थ है \"प्रत्यक्ष अनुभूति से अज्ञेय\"। वैज्ञानिक कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, क्योंकि वे प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु वे तो अधोक्षज हैं; इसी कारण वैज्ञानिक ईश्वर से अनभिज्ञ हैं, क्योंकि उनसे उन्हें जानने की विधि छूट रही है। दिव्य विज्ञान को समझने के लिए मनुष्य को किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना चाहिए, उनसे विनम्रतापूर्वक श्रवण करना चाहिए, तथा उनकी सेवा करनी चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण इसे *भगवद्गीता* (4.34) में समझाते हैं: tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā।\n\nडॉ. सिंह: Nature नामक एक वैज्ञानिक पत्रिका है। उसमें पौधों और पशुओं जैसे प्राकृतिक उत्पादों के विषय में लेख होते हैं, किन्तु उसमें ईश्वर का उल्लेख नहीं होता—केवल प्रकृति का।\n\nश्रील प्रभुपाद: हम यह ठीक ही देख सकते हैं कि पौधे प्रकृति द्वारा उत्पन्न हो रहे हैं, किन्तु हमें यह पूछना चाहिए, \"प्रकृति को किसने उत्पन्न किया?\" यह प्रश्न पूछना ही बुद्धिमत्ता है।\n\nडॉ. सिंह: वैज्ञानिक इस विषय में विचार नहीं करते।\n\nश्रील प्रभुपाद: तब तो वे मूर्ख हैं। ज्यों ही हम प्रकृति की बात करते हैं, अगला प्रश्न यही होना चाहिए, \"किसकी प्रकृति?\" उदाहरणार्थ, मैं अपने स्वभाव की बात करता हूँ, और आप अपने स्वभाव की बात करते हैं। अतः ज्यों ही प्रकृति का उल्लेख होता है, अगली जिज्ञासा यही होनी चाहिए, \"किसकी प्रकृति?\"\n\nप्रकृति का अर्थ है ऊर्जा, और ज्यों ही आप ऊर्जा की बात करते हैं, आपको स्वीकार करना होगा कि उस ऊर्जा का कोई स्रोत है। उदाहरणार्थ, विद्युत्-ऊर्जा का स्रोत विद्युत्-शक्तिगृह (powerhouse) है। विद्युत् स्वतः उत्पन्न नहीं होती। हमें एक शक्तिगृह तथा जनित्र (generator) स्थापित करना पड़ता है। इसी प्रकार, *वेदों* में कहा गया है कि भौतिक प्रकृति श्रीकृष्ण के निर्देशन में कार्य कर रही है।\n\nडॉ. सिंह: तो क्या आपके कहने का अभिप्राय यह है कि विज्ञान एक मध्यवर्ती बिन्दु से आरम्भ हुआ है—मूल बिन्दु से नहीं?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ, ठीक यही बात है। वे उद्गम से अनभिज्ञ हैं। वैज्ञानिक एक बिन्दु से आरम्भ करते हैं—किन्तु वह बिन्दु कहाँ से आता है? यह वे नहीं जानते, चाहे विशाल अनुसन्धान ही क्यों न कर लें। मनुष्य को स्वीकार करना पड़ता है कि मूल स्रोत ईश्वर हैं, जो समस्त योगसिद्धियों से परिपूर्ण हैं और जिनसे सब कुछ प्रवाहित होता है। वे स्वयं *भगवद्गीता* (10.8) में कहते हैं: ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate, \"मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक लोकों का स्रोत हूँ। सब कुछ मुझसे ही प्रवाहित होता है।\" हमारे निष्कर्ष अन्धविश्वास पर आधारित नहीं हैं; वे अत्यन्त वैज्ञानिक हैं। पदार्थ जीवन से आता है। जीवन में—उद्गम में—असीम भौतिक संसाधन विद्यमान हैं; यही सृष्टि का महान् रहस्य है।\n\nआधुनिक वैज्ञानिक अनुसन्धान ठीक सांख्य दर्शन के समान है, जो भौतिक तत्त्वों का विश्लेषण करता है। सांख्य का अर्थ है \"गणना करना\"। हम भी किसी सीमा तक सांख्यवादी दार्शनिक हैं, क्योंकि हम भौतिक तत्त्वों की गणना और विश्लेषण करते हैं; यह पृथ्वी है, यह जल है, यह वायु है, यह सूर्यप्रकाश है, यह अग्नि है। और तो और, मैं अपने मन, अपनी बुद्धि तथा अपने अहंकार की भी गणना कर सकता हूँ। किन्तु अपने अहंकार से परे मैं गणना नहीं कर सकता। परन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहंकार से परे भी अस्तित्व है, और वह अस्तित्व जीवनी-शक्ति है—आत्मा। यही वह है जिसे वैज्ञानिक नहीं जानते। वे सोचते हैं कि जीवन भौतिक तत्त्वों का मात्र एक संयोग है, किन्तु श्रीकृष्ण *भगवद्गीता* (7.5) में इसका खण्डन करते हैं। Apareyam itas tv anyāṁ prakṛtiṁ viddhi me parām: \"इस अपरा प्रकृति के अतिरिक्त मेरी एक परा ऊर्जा भी है।\" अपरा ऊर्जा भौतिक तत्त्व हैं, और परा ऊर्जा जीव है।\n\nbhūmir āpo 'nalo vāyuḥ\n\nkhaṁ mano buddhir eva ca\n\nahaṅkāra itīyaṁ me\n\nbhinnā prakṛtir aṣṭadhā\n\n\"पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार—ये आठों मिलकर मेरी पृथक् भौतिक ऊर्जाएँ हैं।\" (गीता 7.4) श्रीकृष्ण यहाँ *भगवद्गीता* में समझाते हैं कि वायु (gas) उनसे आती है, और वायु से भी सूक्ष्म खम् (आकाश) है। आकाश से सूक्ष्म मन है, मन से सूक्ष्म बुद्धि है, और बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा है। किन्तु वैज्ञानिक इसे नहीं जानते। वे केवल स्थूल वस्तुओं की अनुभूति कर सकते हैं। वे वायु का उल्लेख करते हैं, किन्तु वायु कहाँ से आती है? वह गैस कहाँ से आती है?\n\nडॉ. सिंह: इसका उत्तर वे नहीं दे सकते।\n\nश्रील प्रभुपाद: किन्तु हम उत्तर दे सकते हैं। हमारे पास यह ज्ञान है कि गैस खम्, अर्थात् आकाश से आती है, और आकाश मन से आता है, मन बुद्धि से आता है, और बुद्धि श्रीकृष्ण की परा ऊर्जा, अर्थात् आत्मा से आती है।\n\nडॉ. सिंह: क्या सांख्य दर्शन में अपरा तथा परा—दोनों ऊर्जाओं का अध्ययन होता है?\n\nश्रील प्रभुपाद: नहीं। सांख्यवादी दार्शनिक परा ऊर्जा को नहीं जानते। वे केवल भौतिक तत्त्वों का विश्लेषण करते हैं, ठीक जैसे वैज्ञानिक करते हैं। न तो वैज्ञानिक और न सांख्यवादी दार्शनिक—कोई भी आत्मा के विषय में कुछ नहीं जानते। वे केवल श्रीकृष्ण की भौतिक ऊर्जा का विश्लेषण कर रहे हैं।\n\nडॉ. सिंह: वे सृजनात्मक भौतिक तत्त्वों का विश्लेषण कर रहे हैं?\n\nश्रील प्रभुपाद: भौतिक तत्त्व सृजनात्मक नहीं हैं! आत्मा सृजनात्मक है। केवल पदार्थ से कोई जीवन उत्पन्न नहीं कर सकता, और पदार्थ स्वयं को उत्पन्न नहीं कर सकता। आप, एक जीव, जल बनाने के लिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिला सकते हैं। किन्तु पदार्थ में स्वयं कोई सृजनात्मक ऊर्जा नहीं है। यदि आप हाइड्रोजन की एक बोतल को ऑक्सीजन की बोतल के समीप रख दें, तो क्या वे आपकी सहायता के बिना स्वतः संयुक्त हो जाएँगी?\n\nडॉ. सिंह: नहीं। उन्हें मिलाना ही पड़ता है।\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ, परा ऊर्जा—जीव—की आवश्यकता होती है। ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन अपरा ऊर्जा हैं, किन्तु जब परा ऊर्जा उन्हें मिलाती है, तभी वे जल बन सकते हैं।\n\nअपरा ऊर्जा में तब तक कोई सामर्थ्य नहीं, जब तक परा ऊर्जा संलग्न न हो। यह समुद्र [प्रशान्त महासागर की ओर संकेत करते हुए] शान्त और स्थिर है। किन्तु जब परा बल—वायु—इसे धकेलती है, तब ऊँची तरंगें उठती हैं। परा बल के बिना समुद्र में कोई शक्ति नहीं। इसी प्रकार, वायु से भी परे एक अन्य बल है, और एक अन्य, और एक अन्य, जब तक हम श्रीकृष्ण तक नहीं पहुँच जाते, जो सर्वाधिक परा बल हैं। यही वास्तविक अनुसन्धान है। मान लीजिए कि एक रेलगाड़ी अभी चलना आरम्भ कर रही है। इंजन एक डिब्बे को धकेलता है, जो दूसरे को धकेलता है, और इसी प्रकार, जब तक समूची गाड़ी चलने न लगे। और यह सम्पूर्ण गति इंजन-चालक, एक जीव, से उद्गत होती है। इसी प्रकार, विश्व-सृष्टि में श्रीकृष्ण प्रथम धक्का देते हैं, और तत्पश्चात्, अनेक क्रमिक धक्कों के माध्यम से, समस्त विश्व-प्रकटीकरण अस्तित्व में आता है। इसे *भगवद्गीता* (9.10) में समझाया गया है: mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sa-carācaram। \"हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है, और समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न कर रही है।\" और कुछ ही आगे:\n\nsarva-yoniṣu kaunteya\n\nmūrtayaḥ sambhavanti yāḥ\n\ntāsāṁ brahma mahad yonir\n\nahaṁ bīja-pradaḥ pitā\n\n\"समस्त जीव-योनियाँ भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव होती हैं, और मैं बीज-प्रदान करने वाला पिता हूँ।\" (गीता 14.4) उदाहरणार्थ, यदि हम वट का एक बीज बोएँ, तो अन्ततः एक विशाल वृक्ष उगता है और लाखों नवीन बीज उत्पन्न करता है। इनमें से प्रत्येक बीज, बारी-बारी से, लाखों नवीन बीजों सहित एक और वृक्ष उत्पन्न करता है, और इसी प्रकार आगे। अतः श्रीकृष्ण ही मूल बीज-प्रदान करने वाले पिता हैं।\n\nदुर्भाग्यवश, वैज्ञानिक केवल तत्काल कारण का अवलोकन करते हैं; वे दूरस्थ कारण की अनुभूति नहीं करते। दो कारण होते हैं—तत्काल कारण तथा दूरस्थ कारण। *वेदों* में श्रीकृष्ण को सर्व-कारण-कारणम् [ब्र.सं. 5.1], समस्त कारणों का कारण कहा गया है। यदि आप समस्त कारणों के कारण को समझ लें, तो आप सब कुछ समझ जाते हैं। Yasmin vijñāte sarvam evaṁ vijñātaṁ bhavati: \"यदि आप मूल कारण को जान लें, तो परवर्ती, गौण कारण स्वतः ज्ञात हो जाते हैं।\" यद्यपि वैज्ञानिक मूल कारण के पीछे खोज में लगे हैं, फिर भी जब *वेद*, जिनमें पूर्ण ज्ञान निहित है, मूल कारण बता देते हैं, तब वे स्वीकार नहीं करते। वे अपने आंशिक, अपूर्ण ज्ञान से ही चिपके रहते हैं।\n\nडॉ. सिंह: वैज्ञानिक ऊर्जा-स्रोतों को लेकर चिन्तित हैं, और अब वे पकाने, प्रकाश तथा अन्य विविध प्रयोजनों हेतु सौर ऊर्जा का उपयोग करने के लिए कार्य कर रहे हैं। उन्हें आशा है कि जब वे अन्य समस्त ऊर्जा-स्रोतों को समाप्त कर देंगे, तब वे सौर ऊर्जा का उपयोग कर सकेंगे।\n\nश्रील प्रभुपाद: यह कोई अत्यन्त नवीन सिद्धान्त नहीं है। सभी जानते हैं कि चूँकि वृक्षों की जड़ें सूर्य की ऊर्जा का संचय करती हैं, अतः वृक्ष से अग्नि प्राप्त करना सम्भव है। ये वैज्ञानिक नन्हे प्राणी हैं, किन्तु अत्यन्त दर्पयुक्त हैं। हम उन्हें श्रेय नहीं देते, क्योंकि वे केवल वही बता रहे हैं जो सब जानते हैं। ज्यों ही आप वृक्ष काटते हैं, आप उससे अग्नि प्राप्त नहीं कर सकते। उसे सूर्य में सुखाना पड़ता है। जब सूर्य से ऊर्जा एकत्र हो जाती है, तब वृक्ष अग्नि के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। वस्तुतः सब कुछ सूर्य की ऊर्जा द्वारा अनुरक्षित हो रहा है, किन्तु वैज्ञानिक नहीं जानते कि सूर्य की ऊर्जा कहाँ से आती है। *भगवद्गीता* (15.12) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nyad āditya-gataṁ tejo\n\njagad bhāsayate 'khilam\n\nyac candramasi yac cāgnau\n\ntat tejo viddhi māmakam\n\n\"सूर्य का तेज, जो इस समस्त संसार के अन्धकार को दूर करता है, मुझसे आता है। और चन्द्रमा का तेज तथा अग्नि का तेज भी मुझसे ही हैं।\"\n\nपुनः, श्रीकृष्ण कहते हैं, jyotiṣāṁ ravir aṁśumān: \"प्रकाशों में मैं तेजस्वी सूर्य हूँ।\" (गीता 10.21) इसके अतिरिक्त, *भगवद्गीता* के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं, śaśi-sūrya-netram: \"सूर्य और चन्द्रमा आपके महान्, असीम नेत्रों में से हैं।\" यह ज्ञान *भगवद्गीता* में निहित है, किन्तु वैज्ञानिक अपनी कल्पना द्वारा इस ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते। क्या वे कर सकते हैं?\n\nडॉ. सिंह: यह सम्भव नहीं है।\n\nश्रील प्रभुपाद: और उनका ज्ञान क्या है? शास्त्र कहते हैं कि यदि आप पृथ्वी के समस्त बालू-कणों को भी गिन लें, तब भी आप ईश्वर को नहीं समझ सकेंगे। यह सम्पूर्ण भौतिक गणना इसका अर्थ नहीं रखती कि आप में असीम को समझने की क्षमता है। किन्तु समस्त भौतिक वस्तुओं को गिनना तो उनकी क्षमता से भी परे है। वैज्ञानिक अपनी ऊर्जा और क्षमताओं पर इतने दर्पयुक्त क्यों हैं? वे तो भौतिक वस्तुओं को भी नहीं जानते, फिर आध्यात्मिक की तो बात ही क्या। जहाँ तक वैज्ञानिकों तथा अन्य जीवों का प्रश्न है, उनका ज्ञान सीमित है। किन्तु श्रीकृष्ण के लिए ऐसा नहीं है। यदि हम श्रीकृष्ण से ज्ञान प्राप्त करें, तो वह ज्ञान पूर्ण होता है। शास्त्रों में हमें यह जानकारी मिलती है कि समुद्र के भीतर नौ लाख जीव-योनियाँ विद्यमान हैं। शास्त्रों में दी गई जानकारी यथार्थ है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण से आती है, और जैसा श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं: \"पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में, मैं वह सब कुछ जानता हूँ जो भूत में घटित हुआ, वह सब जो वर्तमान में घटित हो रहा है, तथा वे समस्त वस्तुएँ जो अभी आने वाली हैं।\" (गीता 7.26)\n\nडॉ. सिंह: हमें परम ज्ञाता से ज्ञान ग्रहण करना होगा।\n\nश्रील प्रभुपाद: पूर्ण ज्ञान के लिए हमें किसी श्रेष्ठ व्यक्ति, किसी गुरु के समीप जाना पड़ता है। मनुष्य घर पर पुस्तकें पढ़कर किसी विषय को सीखने का प्रयत्न कर सकता है, किन्तु महाविद्यालय जाकर तथा किसी आचार्य के समीप जाकर वह कहीं अधिक भली-भाँति सीख सकता है। उसी प्रकार, हमें किसी गुरु के समीप जाना पड़ता है। निःसन्देह, यदि हमें कोई मिथ्या गुरु मिल जाए, तो हमारा ज्ञान मिथ्या होता है। किन्तु यदि हमारे गुरु पूर्ण हों, तो हमारा ज्ञान पूर्ण होता है। हम श्रीकृष्ण को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं। यदि वे ज्ञान में पूर्ण हैं, तो हमारा ज्ञान भी पूर्ण है। जहाँ तक हमारा प्रश्न है, हमें स्वयं में पूर्ण होने की आवश्यकता नहीं, किन्तु यदि हम पूर्ण से ज्ञान प्राप्त करें, तो हमारा ज्ञान पूर्ण होता है। हम यह नहीं कह सकते कि हमने समझ लिया है कि समुद्र में नौ लाख जीव-योनियाँ हैं, क्योंकि हमने समूचे समुद्र का अध्ययन किया है। अपितु, हम कहते हैं कि हम यह जानकारी शास्त्रों से ग्रहण करते हैं, और इसीलिए यह पूर्ण है। यही वैदिक प्रक्रिया है।\n\nवैज्ञानिक चाहे कितना ही अनुसन्धान-कार्य करें, किन्तु वैज्ञानिक चाहे कितना ही महान् क्यों न हो, उसकी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। अतः उसके पास पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता। हमारे नेत्रों का क्या मूल्य है? हम सूर्यप्रकाश के बिना नहीं देख सकते, न ही हम सूक्ष्मदर्शी (microscope) के बिना छोटी वस्तुएँ देख सकते हैं। हमारे नेत्र अपूर्ण हैं, और जो उपकरण हमारे नेत्रों ने आविष्कृत किए हैं, वे भी अपूर्ण हैं। तब फिर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना कैसे सम्भव है? चूँकि जीव सीमित है, अतः उसका ज्ञान सीमित है। एक बालक यह जान सकता है कि दो और दो चार होते हैं, किन्तु जब वह उच्च गणित की बात करता है, तो हम उसे गम्भीरता से नहीं लेते। जिन इन्द्रियों के माध्यम से कोई वैज्ञानिक ज्ञान अर्जित करता है, वे सीमित और अपूर्ण हैं; इसी कारण उसका ज्ञान सीमित और अपूर्ण है। अपने अज्ञान में वह सब कुछ जानने का दावा कर सकता है, किन्तु वह तो निरी बकवास है।\n\nएक अन्धा दूसरे अन्धे का मार्गदर्शन कर सकता है, किन्तु जब दोनों ही गड्ढे में गिर पड़ें, तो इससे उनका क्या लाभ? प्रकृति के नियम हमें हाथ-पाँव से जकड़े हुए हैं, फिर भी हम सोचते हैं कि हम कल्पना करने के लिए स्वतन्त्र हैं। यही माया है। यद्यपि प्रकृति के इतने नियमों से बद्ध हैं, फिर भी ये धूर्त सोचते हैं कि वे स्वतन्त्र हैं। तथापि, यदि कोई बादल आ जाए, तो वे सूर्य को नहीं देख सकते। हमारे पास देखने की क्या शक्ति है? केवल तभी, जब प्रकृति के नियम हमें कुछ सुविधा दें, हम देखने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः, हम केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में ही प्रयोग कर सकते हैं, और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, तो हमारे प्रयोग विफल हो जाते हैं। तब फिर हम प्रायोगिक ज्ञान पर इतने दर्पयुक्त क्यों हैं?\n\nप्रयोग क्यों? वस्तुएँ तो पहले से ही विद्यमान हैं। सूर्य की ऊर्जा वहाँ है, जो ईश्वर द्वारा हमारे उपयोग के लिए दी गई है। और जानने को क्या रह जाता है? वृक्षों से इतने सेब गिरते हैं। गुरुत्वाकर्षण के नियम को समझाने की और क्या आवश्यकता है? वस्तुतः वैज्ञानिकों में सामान्य बुद्धि का अभाव है। वे केवल \"वैज्ञानिक\" व्याख्याओं से सरोकार रखते हैं। वे कहते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का नियम केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में कार्य करता है, किन्तु ये परिस्थितियाँ किसने बनाई हैं? जब श्रीकृष्ण भगवान् श्रीरामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए, तब उन्होंने जल पर पत्थर फेंके, और वे पत्थर तैरने लगे। उस अवस्था में गुरुत्वाकर्षण का नियम कार्य नहीं किया। अतः गुरुत्वाकर्षण का नियम केवल परमेश्वर के निर्देशन में ही कार्य करता है। नियम स्वयं में अन्तिम नहीं है। कोई राजा एक नियम दे सकता है, किन्तु वह उस नियम को तत्क्षण बदल भी सकता है। परम विधि-दाता श्रीकृष्ण हैं, और कोई नियम केवल उनकी इच्छा से ही कार्य करेगा। वैज्ञानिक ईश्वर की इच्छा को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु चूँकि वे माया, भ्रम, से बद्ध हैं, अतः वे केवल किसी प्रेत-ग्रस्त व्यक्ति की भाँति ही बोल सकते हैं। मुझे बताइए, वह कौन-सी वैज्ञानिक व्याख्या है जो वृक्षों की समस्त विविधताओं की संगति बैठाती है?\n\nकरान्धर दास: वे कहते हैं कि प्रकृति उत्परिवर्तन (mutate) करती है और ये विविधताएँ उत्पन्न करती है।\n\nश्रील प्रभुपाद: तब तो वह प्रकृति की इच्छा ही होगी। और वह इच्छा क्या है? क्या भूमि में कोई इच्छा है?\n\nकरान्धर दास: हाँ, वे इस बिन्दु पर बहुत अस्पष्ट हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: इसका अर्थ है कि उनके पास पूर्ण ज्ञान नहीं है। वे यह नहीं जानते कि प्रकृति के पीछे श्रीकृष्ण की इच्छा है।\n\nडॉ. सिंह: वे यह समझाते हैं कि इन भिन्न-भिन्न पौधों की रासायनिक संरचना भिन्न होती है।\n\nश्रील प्रभुपाद: यह ठीक है, किन्तु इन रासायनिक संरचनाओं को किसने बनाया? ज्यों ही आप \"रासायनिक संरचना\" कहते हैं, आपको तत्क्षण एक ईश्वर की आवश्यकता पड़ जाती है।\n\nकरान्धर दास: वे कहते हैं कि ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि यदि आप दो रसायनों को परस्पर मिला दें...\n\nश्रील प्रभुपाद: ईश्वर हो या न हो, किसी न किसी इच्छा का होना अनिवार्य है। किसी न किसी चेतना का होना अनिवार्य है। दो रसायन मिलते हैं और अमुक-अमुक वस्तु उत्पन्न कर देते हैं। उन्हें कौन मिलाता है? चेतना वहाँ विद्यमान है। और वह चेतना ही श्रीकृष्ण हैं। चेतना सर्वत्र है, और ज्यों ही आप उस चेतना को स्वीकार करते हैं, आपको चेतना को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना पड़ता है। इसीलिए हम कृष्णभावनामृत की बात करते हैं। *भगवद्गीता* में कहा गया है कि चेतना सर्वव्यापी है। आप में चेतना हो सकती है, और मुझ में चेतना हो सकती है, किन्तु एक अन्य चेतना है, जो सर्वव्यापी है। मेरी चेतना मेरे शरीर तक सीमित है, और आपकी चेतना आपके शरीर तक सीमित है, किन्तु एक अन्य चेतना है, जो आप में, मुझ में, और सभी में विद्यमान है। वही कृष्णभावनामृत है।\n\nवस्तुतः संसार में सब कुछ सापेक्ष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। हमारे शरीर, जीवन, बुद्धि, और अन्य सब कुछ—सभी सापेक्ष हैं। हमारी दृष्टि से चींटी का जीवन अत्यन्त अल्प प्रतीत हो सकता है, किन्तु चींटी के लिए उसका जीवन लगभग सौ वर्ष की अवधि का होता है। वह सौ वर्ष शरीर के सापेक्ष होते हैं। इसी प्रकार, ब्रह्मा, जो हमारी दृष्टि से अकल्पनीय रूप से दीर्घ जीवन जीते हैं, अपनी दृष्टि से केवल सौ वर्ष ही जीते हैं। यही सापेक्षता है।\n\nकरान्धर दास: तब तो सापेक्षता हमारी व्यक्तिगत परिस्थिति पर आधारित है।\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। इसीलिए कहा जाता है कि जो एक के लिए भोजन है, वह दूसरे के लिए विष है। लोग सोच रहे हैं कि चूँकि वे चन्द्रमा पर जीवित नहीं रह सकते, अतः कोई अन्य जीव भी नहीं रह सकता। प्रत्येक व्यक्ति वस्तुओं के विषय में सापेक्ष रीति से, अपने ही संदर्भ में सोचता है। यही \"कूप-मण्डूक दर्शन\" का अर्थ है। मेंढक सदा अपने कुएँ के संदर्भ में वस्तुओं के विषय में सोचता रहता है। उसमें अटलान्टिक महासागर की कल्पना करने की कोई शक्ति नहीं, क्योंकि उसका कुआँ ही उसका एकमात्र अनुभव है। ईश्वर महान् हैं, किन्तु हम ईश्वर की महानता के विषय में अपने ही संदर्भ में, सापेक्ष महानता के संदर्भ में सोच रहे हैं। कुछ कीट रात्रि में जन्म लेते हैं; वे रात्रि में बड़े होते हैं, रात्रि में अपनी सन्तानें उत्पन्न करते हैं, और रात्रि में ही मर जाते हैं। वे सूर्य को कभी नहीं देखते; इसीलिए वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि दिन जैसी कोई वस्तु है ही नहीं। यदि आप उस कीट से प्रातःकाल के विषय में पूछें, तो वह कहेगा, \"कोई प्रातःकाल हो ही नहीं सकता।\" इसी प्रकार, जब लोग शास्त्रों से ब्रह्मा की दीर्घ आयु की अवधि के विषय में सुनते हैं, तो वे विश्वास नहीं करते। वे कहते हैं, \"इतने लम्बे समय तक कोई कैसे जी सकता है?\" *भगवद्गीता* (8.17) में श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\nsahasra-yuga-paryantam\n\nahar yad brahmaṇo viduḥ\n\nrātriṁ yuga-sahasrāntāṁ\n\nte 'ho-rātra-vido janāḥ\n\n\"मानवीय गणना के अनुसार, एक सहस्र युग मिलकर ब्रह्मा के एक दिन की अवधि है। और इतनी ही अवधि उनकी रात्रि की भी है।\"\n\nइस प्रकार ब्रह्मा, इन गणनाओं के अनुसार, इतने लाखों और खरबों वर्ष जीते हैं। हम इस पर विश्वास नहीं कर सकते, यद्यपि शास्त्रों में प्रमाण दिया गया है। दूसरे शब्दों में, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि श्रीकृष्ण निरर्थक बातें करते हैं, जबकि हम प्रामाणिक रूप से बोलते हैं। बड़े-बड़े विद्वान् तक कहते हैं कि शास्त्रों के ये कथन सब मानसिक कल्पनाएँ हैं। यद्यपि ये जन धूर्तों के अतिरिक्त और कुछ नहीं, फिर भी वे प्रतिष्ठित विद्वान् के रूप में चलते हैं। वे प्रकट शास्त्रों में दिए गए ईश्वर के कथनों का खण्डन या निषेध करने का प्रयत्न करके स्वयं को ईश्वर के स्थान से ऊपर रख लेते हैं। इस प्रकार विद्वानों, वैज्ञानिकों, और दार्शनिकों के वेश में इतने सारे मूर्ख समूचे संसार को भ्रमित कर रहे हैं।\n\nडॉ. सिंह: निःसन्देह, डार्विन के सिद्धान्त के विषय में इतना कुछ लिखा जा रहा है। किसी भी पुस्तकालय में उनके सिद्धान्तों पर सैकड़ों पुस्तकें हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: क्या वे उन्हें स्वीकार करते हैं या अस्वीकार?\n\nडॉ. सिंह: सामान्यतः वे उन्हें स्वीकार करते हैं, किन्तु कुछ ऐसे हैं जो अत्यन्त आलोचनात्मक हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: डार्विन जीव-योनियों के विकास (evolution) के विषय में बोलते हैं, किन्तु आध्यात्मिक विकास के विषय में उनके पास कोई वास्तविक जानकारी नहीं है। आत्मा की निम्न जीवन-रूपों से उच्च रूपों की ओर प्रगति के विषय में वे कुछ नहीं जानते। वे दावा करते हैं कि मनुष्य बन्दरों से विकसित हुआ है, किन्तु हम देख सकते हैं कि बन्दर विलुप्त नहीं हुआ। यदि बन्दर मनुष्य का तत्काल पूर्वज है, तो बन्दर अब भी क्यों विद्यमान है?\n\nडॉ. सिंह: डार्विन कहते हैं कि जीव-योनियाँ स्वतन्त्र रूप से सृजित नहीं हुईं, अपितु एक-दूसरे से अवतरित हुई हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: यदि स्वतन्त्रता का कोई प्रश्न ही नहीं, तो वे किसी एक विशेष जीव-योनि से अकस्मात् आरम्भ कैसे कर सकते हैं? उन्हें यह समझाना ही पड़ेगा कि मूल जीव-योनि अस्तित्व में कैसे आई।\n\nकरान्धर दास: वैज्ञानिक दावा करते हैं कि पृथ्वी जैविक रसायन (biological chemistry) द्वारा सृजित हुई, और वे यह सिखाने से मना करते हैं कि ईश्वर ने पृथ्वी की सृष्टि की, क्योंकि वे सोचते हैं कि सभी उन्हें मूर्ख समझेंगे।\n\nश्रील प्रभुपाद: यदि उनका जीवविज्ञान और रसायनविज्ञान इतने उन्नत हैं, तो वे कुछ सृजित क्यों नहीं करते? वे दावा करते हैं कि वे भविष्य में जीवन सृजित कर सकेंगे, किन्तु भविष्य में ही क्यों? जीवन तो पहले से ही सृजित है। क्या विज्ञान भविष्य पर आधारित है? हमें किसी भविष्य पर भरोसा नहीं करना चाहिए, चाहे हम उसे कितना ही सुखद क्यों न समझें। प्रत्येक व्यक्ति सोच रहा है कि भविष्य अत्यन्त सुखद होगा, किन्तु इसका हमारे पास क्या आश्वासन है? उन्हें स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वे नहीं जानते कि सत्य वास्तव में क्या है। वे अपने जैविक या रासायनिक प्रयोगों के माध्यम से घास का एक तिनका तक उत्पन्न नहीं कर सकते। फिर भी वे दावा कर रहे हैं कि सृष्टि किसी रासायनिक या जैविक विधि द्वारा उत्पन्न होती है। इस समस्त बकवास पर कोई प्रश्न क्यों नहीं उठाता?\n\nडॉ. सिंह: अन्तिम विश्लेषण में, जब वे जीवन के उद्गम पर विचार करते हैं, तो वे कहते हैं कि सब कुछ पदार्थ से आरम्भ हुआ। दूसरे शब्दों में, सजीव पदार्थ निर्जीव पदार्थ से आता है।\n\nश्रील प्रभुपाद: यह सजीव पदार्थ अब कहाँ से आ रहा है? क्या यह भूत में निर्जीव पदार्थ से आया था और वर्तमान में नहीं? चींटी कैसे आ रही है? क्या वह धूल से प्रकट हो रही है? चींटी तक जड़ पदार्थ से नहीं आती। ऐसे सिद्धान्त का उनके पास क्या प्रमाण है? डार्विन दावा करते हैं कि सुदूर भूतकाल में कोई वास्तव में बुद्धिमान् मनुष्य विद्यमान नहीं था, कि मनुष्य केवल वानरों से विकसित हुआ। यदि भूतकाल में कोई बुद्धिमान् मस्तिष्क नहीं था, तो ये वैदिक शास्त्र हज़ारों-हज़ारों वर्ष पूर्व कैसे लिखे गए? व्यासदेव जैसे ऋषि की वे क्या व्याख्या करते हैं?\n\nडॉ. सिंह: उनके पास कोई व्याख्या नहीं है। वे केवल यही कहते हैं कि ये अज्ञात वनवासी ऋषि हैं।\n\nश्रील प्रभुपाद: व्यासदेव उनके लिए अज्ञात हो सकते हैं, किन्तु फिर भी वे वहाँ थे। उन्हें ऐसा मस्तिष्क कैसे प्राप्त हुआ? वे आपके लिए या मेरे लिए अज्ञात हो सकते हैं, किन्तु फिर भी उनका मस्तिष्क-कार्य वहाँ है, उनका दर्शन वहाँ है, उनकी भाषा, भाषाविज्ञान, काव्य-रचनाएँ, तथा शाब्दिक सामर्थ्य वहाँ है। आप उस व्यक्ति को न जानते हों, किन्तु आप उस मस्तिष्क को समझ सकते हैं।\n\nडॉ. सिंह: क्या समस्त प्रकार के पशु आरम्भ से ही विद्यमान नहीं थे?\n\nश्रील प्रभुपाद: हाँ। एकसमय सृष्टि की पुष्टि *भगवद्गीता* से होती है। समस्त प्रकार के पशु और मनुष्य तथा देवता भी आरम्भ से ही विद्यमान थे। जीव एक विशेष प्रकार का शरीर चाहता है, और श्रीकृष्ण उसे वह प्रदान कर देते हैं। चूँकि वह किसी विशेष रीति से वस्तुओं की इच्छा करता है, अतः वह पदार्थ में प्रकृति के कुछ विशेष गुणों से संग करता है। अपने संग के अनुसार, वह एक विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त करता है। मनोवैज्ञानिक शक्तियाँ, मन, चिन्तन, अनुभूति, तथा इच्छा-शक्ति यह निर्धारित करती हैं कि जीव किस विशेष प्रकार की परिस्थिति तथा शरीर को प्राप्त करता है। विकासात्मक प्रक्रिया तो विद्यमान है, किन्तु वह जीव-योनियों का विकास नहीं है। ऐसा नहीं है कि एक जीव-योनि दूसरी से विकसित होती है, क्योंकि, जैसा श्रीकृष्ण कहते हैं:\n\navyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ\n\nprabhavanty ahar-āgame\n\nrātry-āgame pralīyante\n\ntatraivāvyakta-saṁjñake\n\n\"जब ब्रह्मा का दिन प्रकट होता है, तब जीवों का यह समूह अस्तित्व में आता है, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे सब विलीन हो जाते हैं।\" (गीता 8.18)\n\nविकास तो व्यष्टि जीव का आध्यात्मिक विकास है, जो विविध जीव-योनियों के माध्यम से होता है। यदि कोई मछली के शरीर में प्रवेश करता है, तो उसे विकासात्मक प्रक्रिया से पग-पग आगे बढ़ना पड़ता है। यदि कोई सीढ़ियों के शिखर पर है और किसी प्रकार नीचे गिर पड़ता है, तो उसे पुनः विकास की सीढ़ी पर पग-पग ऊपर चढ़ना पड़ता है। निःसन्देह, वैज्ञानिक इतना अनुसन्धान करने में व्यस्त हैं कि वे इसे नहीं समझ सकते। यदि आप उनसे कहें कि वे अपने अगले जीवन में वृक्ष बनने वाले हैं, तो वे सोचते हैं कि आप निरर्थक बातें कर रहे हैं। आखिर, अनुसन्धान से हम क्या सीख सकते हैं? जब समस्त कारणों का कारण ज्ञात हो जाता है, तब प्रत्येक ज्ञेय वस्तु ज्ञात हो जाती है, और कुछ भी अज्ञात नहीं रह जाता। जैसा *वेद* कहते हैं: yasmin vijñāte sarvam evaṁ vijñātaṁ bhavati। यदि हम परम सत्य को जान लें, तो अन्य समस्त सत्य ज्ञात हो जाते हैं, किन्तु यदि हम परम सत्य को न जानें, तो हम अज्ञान में रहते हैं। मनुष्य भले ही कोई आधिकारिक वैज्ञानिक या दार्शनिक न हो, किन्तु वह किसी को भी चुनौती दे सकता है और निर्भीकतापूर्वक बोल सकता है, यदि वह केवल एक वस्तु—श्रीकृष्ण—को जानता हो।\n\nयह समकालीन सभ्यता अपनी स्वतन्त्रता पर इतनी दर्पयुक्त है, किन्तु वस्तुतः यह तेल पर इतनी अधिक निर्भर है। यदि तेल की आपूर्ति बन्द हो जाए, तब ये धूर्त वैज्ञानिक क्या करेंगे? वे कुछ नहीं कर सकते। उन्हें अपनी परखनलियों में तेल बनाकर तो दिखाने दीजिए, इतना तेल कि वे अपनी सभ्यता को चला सकें। इस समय भारत में जल का अभाव है। इसके विषय में वैज्ञानिक क्या कर सकते हैं? वे जल की रासायनिक संरचना भले ही जानते हों, किन्तु जब उसका भारी अभाव हो, तब वे उसे उत्पन्न नहीं कर सकते। उन्हें बादलों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है, और वह सब ईश्वर की क्रिया-कुशलता है। वस्तुतः वे कुछ नहीं कर सकते। वे चन्द्रमा पर गए, किन्तु अपने समस्त परिश्रम के बदले वे केवल कुछ धूल और चट्टानें ही ले आए। यह धूर्त सरकार कर वसूलती है और धन व्यर्थ ही व्यय करती है। यही उनकी बुद्धिमत्ता है। यह तो गधों का राज्य है, बस इतना ही। राजनेताओं में कोई सहानुभूति या करुणा नहीं। वे यह विचार नहीं करते कि यह कठोर परिश्रम से अर्जित धन जनता से आ रहा है और वे इसे अन्य ग्रहों पर बड़े-बड़े राकेट छोड़ने में व्यय कर रहे हैं। वे जो कुछ करते हैं, वह केवल इतना है कि और अधिक धूल वापस लाने का वचन देते हैं। पहले वे एक मुट्ठी धूल ले आते हैं, फिर वे टनों धूल वापस लाने का वचन देते हैं। इस सब का क्या अर्थ है?\n\nकरान्धर दास: वे मानते हैं कि मंगल पर जीवन हो सकता है।\n\nश्रील प्रभुपाद: वे मानें या न मानें—इसमें क्या लाभ है? हम जो जानते हैं, वह यह है कि जीवन यहाँ है। वे यह जानते हैं, फिर भी वे लड़ने और जीवन का संहार करने में लगे हैं। यहाँ जीवन है। यहाँ एक मनुष्य है। जीवन निःसन्देह यहाँ है। किन्तु वे अपने बड़े-बड़े बमों से इसका विनाश करने में व्यस्त हैं। यही उनकी वैज्ञानिक उन्नति है।\n\nडॉ. सिंह: वे यह जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं कि अन्य ग्रहों पर क्या हो रहा है।\n\nश्रील प्रभुपाद: इसका अर्थ है कि अपनी बालसुलभ उत्सुकता के लिए वे इतना धन व्यय कर रहे हैं। वे अपनी उत्सुकता की तृप्ति के लिए तो इतना व्यय कर सकते हैं, किन्तु जब इतने सारे दरिद्रता-ग्रस्त देश उनसे सहायता माँगते हैं, तब वे कहते हैं कि धन नहीं है। वे चन्द्रमा पर जाने को लेकर तो अत्यन्त दर्पयुक्त हैं, किन्तु वे यह जानकारी क्यों नहीं ले लेते कि श्रीकृष्ण के गोलोक वृन्दावन में कैसे जाया जाए? यदि वे वहाँ जाएँ, तो उनकी समस्त उत्सुकता तृप्त हो जाएगी। वे जानेंगे कि इस अपरा ऊर्जा से परे वस्तुतः एक परा, आध्यात्मिक ऊर्जा है। यह भौतिक ऊर्जा स्वतन्त्र रूप से कार्य नहीं कर सकती। आध्यात्मिक ऊर्जा को उससे संयुक्त होना पड़ता है। भौतिक तत्त्व स्वयं से सृजित नहीं होते। सृजनात्मक तो आत्मा है। हम पदार्थ से कुछ बनाने का प्रयत्न कर सकते हैं, किन्तु पदार्थ स्वयं को सृजित नहीं करता। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन केवल तभी सम्पर्क में आएँगी, जब परा ऊर्जा द्वारा प्रेरित की जाएँ। केवल मूर्ख ही यह आशा कर सकते हैं कि समस्त विश्व-प्रकटीकरण, जो केवल पदार्थ है, स्वतः अस्तित्व में आ जाए। हमारे पास एक उत्तम मोटरगाड़ी हो सकती है, किन्तु यदि कोई चालक न हो, तो उसका क्या उपयोग? जब तक कोई मनुष्य यन्त्र को चलाना न जानता हो, जब तक कोई मनुष्य बटन न दबाए, तब तक यन्त्र कार्य नहीं करता। इसी प्रकार, परा ऊर्जा के बिना भौतिक ऊर्जा कार्य नहीं कर सकती। इस अद्भुत विश्व-प्रकटीकरण के पीछे एक परा ऊर्जा का निर्देशन है। यह समस्त जानकारी शास्त्रों में दी गई है, किन्तु फिर भी लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे।\n\nवस्तुतः सब कुछ ईश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु लोग इस सम्पत्ति को अपनी या अपने देश की बता रहे हैं। अब वे अति-जनसंख्या की समस्या की बात कर रहे हैं, किन्तु तथ्य यह है कि ईश्वर ने पर्याप्त मात्रा में प्रदान किया है। वस्तुतः यदि भूमि और भोजन का समुचित उपयोग किया जाए, तो वे पर्याप्त हैं। लोग कृत्रिम रूप से समस्याएँ उत्पन्न कर रहे हैं, और वैज्ञानिक उन्हें इतने सारे विनाशकारी उपकरण देकर उनकी सहायता कर रहे हैं। वे केवल उन धूर्तों और दुष्टों को प्रोत्साहित करते हैं, जो ईश्वर की सम्पत्ति को चुका देने का प्रयत्न कर रहे हैं। यदि आप किसी हत्यारे या चोर की सहायता करें, तो आप भी अपराधी बन जाते हैं। क्या यह ऐसा नहीं है? संसार में इतनी विपत्ति है, क्योंकि वैज्ञानिक समस्त चोरों और दुष्टों की सहायता कर रहे हैं। इस प्रकार वे सब अपराधी हैं। Stena eva saḥ। जो परमेश्वर के स्वामित्व को स्वीकार नहीं करता, वह चोर है।\n\nहमारा ध्येय इन धूर्तों को सद्बुद्धि पर लाना है। अब इसका उपाय ढूँढ़ना है। ये धूर्त कष्ट भोग रहे हैं, किन्तु चूँकि वे ईश्वर के पुत्र हैं, अतः उन्हें कष्ट नहीं भोगना चाहिए। वे यह नहीं जानते कि कोई ईश्वर है या कोई सुख है। वे आनन्द अथवा शाश्वत जीवन के विषय में कुछ नहीं जानते। वे इतना सारा अनुसन्धान कर रहे हैं और पचास, साठ, या सत्तर वर्ष जी रहे हैं। उसके पश्चात् वे नहीं जानते कि क्या होने वाला है। उन्हें यह ज्ञान नहीं कि जीवन शाश्वत है। वस्तुतः उनकी स्थिति किसी पशु जैसी है। पशु यह नहीं जानता कि मृत्यु के पश्चात् क्या है, न ही वह वास्तव में मृत्यु के विषय में विचार करता है। वह नहीं जानता कि वह यहाँ क्यों है, न ही वह जीवन का मूल्य जानता है। माया के प्रभाव में, पशु केवल खाने, सोने, अपनी रक्षा करने, मैथुन करने, और मरने में लगा रहता है। बस इतना ही। लोग इतना कठोर प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु किस प्रयोजन से? वे कहते हैं कि वे अगली पीढ़ी के लिए प्रबन्ध करने हेतु इतना कठोर संघर्ष कर रहे हैं, किन्तु वह प्रबन्ध किसलिए है? वे इसका उत्तर नहीं दे सकते। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन श्रीकृष्ण, ईश्वर, को सब कुछ का केन्द्र स्थापित करके जीवन को वास्तविक प्रयोजन प्रदान करने हेतु है। अतः इस महत्त्वपूर्ण आन्दोलन को समझना वैज्ञानिक के ही हित में है।"}
{"ref": "ssr/7", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/7/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "आध्यात्मिक सीमान्त का अन्वेषण", "purport": "श्रील प्रभुपाद का अमेरिका में आगमन\n\nश्रील प्रभुपाद के अमेरिका में प्रथम आगमन के कई वर्ष पश्चात्, एक शिष्य को वह डायरी मिली जो उन्होंने जलदूत नामक भापयान (steamship) से भारत से अपनी यात्रा के दौरान रखी थी। उसके भीतर एक कविता थी, जो बंगाली में हस्तलिखित थी, और जिसे श्रील प्रभुपाद ने जहाज पर तभी लिखा था जब वह बोस्टन बन्दरगाह में पहुँचा ही था। यह कविता श्रील प्रभुपाद के पाश्चात्य सभ्यता के प्रति प्रथम प्रभावों को सुन्दर रीति से व्यक्त करती है और अमेरिका की चेतना को बदलने के उनके हार्दिक संकल्प को प्रकट करती है।\n\nमेरे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण, आप इस निरर्थक आत्मा पर इतने कृपालु हैं, किन्तु मैं नहीं जानता कि आप मुझे यहाँ क्यों लाए हैं। अब आप मेरे साथ जो चाहें, वह कर सकते हैं।\n\nकिन्तु मैं अनुमान करता हूँ कि आपका यहाँ कोई कार्य है, अन्यथा आप मुझे इस भयानक स्थान पर क्यों लाते?\n\nयहाँ की अधिकांश जनसंख्या तमोगुण तथा रजोगुण के भौतिक गुणों से आच्छादित है। भौतिक जीवन में लीन रहकर, वे स्वयं को अत्यन्त सुखी और सन्तुष्ट समझते हैं, और इसीलिए उनमें वासुदेव के दिव्य सन्देश के प्रति कोई रुचि नहीं है। मैं नहीं जानता कि वे इसे कैसे समझ पाएँगे।\n\nकिन्तु मैं जानता हूँ कि आपकी अहैतुकी कृपा सब कुछ सम्भव कर सकती है, क्योंकि आप सर्वाधिक निपुण योगी हैं।\n\nवे भक्ति के रसों को कैसे समझ पाएँगे? हे प्रभु, मैं तो केवल आपकी कृपा के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ, ताकि मैं उन्हें आपके सन्देश के विषय में आश्वस्त कर सकूँ।\n\nसमस्त जीव आपकी इच्छा से मायाशक्ति के वश में हो गए हैं, और इसीलिए, यदि आप चाहें, तो आपकी इच्छा से वे भ्रम के बन्धन से मुक्त भी हो सकते हैं।\n\nमेरी कामना है कि आप उनका उद्धार करें। अतः यदि आप उनके उद्धार की इच्छा करें, तभी वे आपके सन्देश को समझ पाएँगे।\n\n*श्रीमद्भागवत* के शब्द आपके अवतार हैं, और यदि कोई धीर व्यक्ति विनम्र श्रवण-वृत्ति के साथ बारम्बार उन्हें ग्रहण करे, तो वह आपके सन्देश को समझ पाएगा।\n\n*श्रीमद्भागवत* (1.2.17–21) में कहा गया है: \"श्रीकृष्ण, भगवान्, जो प्रत्येक के हृदय में परमात्मा हैं और सत्यवादी भक्त के हितैषी हैं, उस भक्त के हृदय से भौतिक भोग की इच्छा को धो डालते हैं, जो उनके सन्देशों का आस्वादन करता है, और जो सन्देश स्वयं में ही पुण्यप्रद होते हैं जब उचित रीति से सुने और कीर्तित किए जाएँ। नियमित रूप से *भागवत* को सुनने तथा शुद्ध भक्त की सेवा करने से, हृदय को कष्ट देने वाला सब कुछ व्यावहारिक रूप से नष्ट हो जाता है, और दिव्य गीतों से प्रशंसित यशस्वी भगवान् की प्रेममयी सेवा एक अटल तथ्य के रूप में स्थापित हो जाती है। जिस समय प्रेममयी सेवा हृदय में स्थापित होती है, उस समय रजोगुण [रजस्] तथा तमोगुण [तमस्], और काम तथा कामना [काम] हृदय से लुप्त हो जाते हैं। तब भक्त सत्त्वगुण में स्थित हो जाता है और वह सुखी बन जाता है। इस प्रकार सत्त्वगुण में स्थित होकर, भगवान् की प्रेममयी सेवा से पुनरुज्जीवित मनुष्य भौतिक संग से मुक्ति [मुक्ति] प्राप्त करता है और भगवान् को वैज्ञानिक रूप से जान लेता है। इस प्रकार हृदय की गाँठें तथा समस्त शंकाएँ टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं। सकाम कर्मों [कर्म] की शृंखला तब समाप्त हो जाती है जब मनुष्य आत्मा को स्वामी के रूप में देखता है।\"\n\nवह तमोगुण तथा रजोगुण के प्रभाव से मुक्त हो जाएगा और इस प्रकार हृदय के अन्तर में संचित समस्त अमंगल वस्तुएँ लुप्त हो जाएँगी।\n\nमैं उन्हें कृष्णभावनामृत के इस सन्देश को कैसे समझाऊँगा? मैं अत्यन्त अभागा, अयोग्य, और सर्वाधिक पतित हूँ। अतः मैं आपका आशीर्वाद माँग रहा हूँ, ताकि मैं उन्हें आश्वस्त कर सकूँ, क्योंकि स्वयं अपने बल पर ऐसा करने में मैं असमर्थ हूँ।\n\nकिसी न किसी प्रकार, हे प्रभु, आप मुझे यहाँ अपने विषय में बोलने के लिए ले आए हैं। अब, मेरे प्रभु, यह आप पर निर्भर है कि आप मुझे, जैसी आपकी इच्छा हो, सफल या असफल बनाएँ।\n\nहे समस्त लोकों के आध्यात्मिक गुरु! मैं तो केवल आपके सन्देश को दोहरा सकता हूँ, अतः यदि आप चाहें, तो आप मेरी वाणी की शक्ति को उनकी समझ के अनुकूल बना सकते हैं।\n\nकेवल आपकी अहैतुकी कृपा से ही मेरे शब्द शुद्ध बनेंगे। मुझे विश्वास है कि जब यह दिव्य सन्देश उनके हृदयों में प्रवेश करेगा, तब वे निश्चय ही प्रफुल्लित अनुभव करेंगे और इस प्रकार जीवन की समस्त दुःखमय अवस्थाओं से मुक्त हो जाएँगे।\n\nहे प्रभु, मैं तो आपके हाथों में एक कठपुतली मात्र हूँ। अतः यदि आप मुझे यहाँ नृत्य कराने के लिए ले आए हैं, तो मुझसे नृत्य कराइए, मुझसे नृत्य कराइए। हे प्रभु, जैसी आपकी इच्छा हो, मुझसे वैसा ही नृत्य कराइए।\n\nमुझमें न तो कोई भक्ति है, न ही मुझमें कोई ज्ञान है, किन्तु मुझमें श्रीकृष्ण के पवित्र नाम में दृढ़ श्रद्धा है। मुझे भक्तिवेदान्त की उपाधि दी गई है, और अब, यदि आप चाहें, तो आप भक्तिवेदान्त के वास्तविक तात्पर्य को पूर्ण कर सकते हैं।\n\nहस्ताक्षरित—सर्वाधिक अभागा, तुच्छ भिक्षुक\n\nए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी,\n\nजलदूत जहाज पर, कॉमनवेल्थ पियर,\n\nबोस्टन, मैसाचुसेट्स, यू.एस.ए.\n\nदिनांकित 18 सितम्बर, 1965\n\nअपने राष्ट्र का निर्माण आध्यात्मिक भूमि पर करें\n\nसितम्बर 1972 में नैरोबी विश्वविद्यालय में बोलने हेतु आमन्त्रित किए जाने पर, श्रील प्रभुपाद ने परिसर के टैफ्ला (स्वतन्त्रता) हॉल में छात्रों तथा सरकारी अधिकारियों की एक उमड़ी हुई भीड़ को सम्बोधित किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने केन्या के विकासशील राष्ट्र के नागरिकों को परामर्श दिया, \"... कृपया आध्यात्मिक रूप से विकसित होइए, क्योंकि आध्यात्मिक विकास ही सुदृढ़ विकास है। अमेरिकियों तथा यूरोपीयों का अनुकरण मत कीजिए, जो बिल्लियों और कुत्तों के समान जी रहे हैं। परमाणु बम तो पहले से ही विद्यमान है, और ज्यों ही अगला युद्ध छिड़ेगा, उनके समस्त गगनचुम्बी भवन और शेष सब कुछ समाप्त हो जाएगा...।\"\n\nदेवियो और सज्जनो, कृष्णभावनामृत के प्रसार हेतु इस सभा में सम्मिलित होने के लिए कृपापूर्वक यहाँ आने पर मैं आपका हृदय से धन्यवाद करता हूँ। कृष्णभावनामृत आन्दोलन मानव-समाज को उस बिन्दु तक लाने का प्रयत्न कर रहा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सफल बन सके। आज का विषय है मानव-जीवन का वास्तविक अर्थ। हम समूचे संसार को इस अर्थ के विषय में शिक्षा देने का प्रयत्न कर रहे हैं।\n\n*पद्म पुराण* के अनुसार, मानव-जीवन अनेकानेक लाखों वर्षों की जीव-योनियों के पश्चात् प्राप्त होता है। जीवन जलचरों से आरम्भ हुआ, क्योंकि हम वैदिक साहित्य से समझ सकते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में समूचा ग्रह जल में निमग्न था। यह भौतिक जगत् पाँच स्थूल तत्त्वों से बना है—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, तथा आकाश। इनके अतिरिक्त तीन सूक्ष्म तत्त्व हैं—मन, बुद्धि, तथा अहंकार। इन परदों के पीछे आत्मा है, जो इन आठ तत्त्वों से आच्छादित है। यह जानकारी *भगवद्गीता* में दी गई है।\n\nमनुष्य ही एकमात्र जीव नहीं हैं जिनमें आत्मा है। हम सब आत्माएँ हैं—पशु, पक्षी, सरीसृप, कीट, वृक्ष, पौधे, जलचर, इत्यादि। आत्मा केवल भिन्न-भिन्न वस्त्रों से आच्छादित है, ठीक जैसे आप में से कुछ श्वेत वस्त्रों में सुसज्जित हैं, कुछ हरे में, कुछ लाल में, इत्यादि। किन्तु हमें वस्त्र से सरोकार नहीं; हमें आत्मा के रूप में आपसे सरोकार है। इस प्रकार *भगवद्गीता* (5.18) में कहा गया है:\n\nvidyā-vinaya-sampanne\n\nbrāhmaṇe ga vi hastini\n\nśuni caiva śvapāke ca\n\npaṇḍitāḥ sama-darśinaḥ\n\n\"विनम्र साधु, सच्चे ज्ञान के बल पर, एक विद्वान् तथा सौम्य ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ते, तथा एक कुत्ता-भक्षी को समान दृष्टि से देखता है।\"\n\nसाधु वर्ण, बुद्धि, अथवा जीव-योनि के आधार पर कोई भेद नहीं करता। वह प्रत्येक जीव को आत्मा के एक नन्हे कण के रूप में देखता है। कहा गया है:\n\nkeśāgra-śata-bhāgasya\n\nśatāṁśaḥ sādṛśātmakaḥ\n\njīvaḥ sūkṣma-svarūpo 'yaṁ\n\nsaṅkhyātīto hi cit-kaṇaḥ\n\n[चै.च. मध्य 19.140]\n\n\"आध्यात्मिक अणुओं के असंख्य कण हैं, जो एक केश के अग्रभाग के दस-हज़ारवें अंश के बराबर मापे जाते हैं।\" चूँकि हमारे पास आत्मा के आयामों को मापने का कोई उपकरण नहीं, अतः आत्मा के इस नन्हे कण को इस प्रकार मापा जाता है। दूसरे शब्दों में, आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि वह परमाणु से भी सूक्ष्म है। वह नन्हा कण आप में, मुझ में, हाथी में, विशाल पशुओं में, समस्त मनुष्यों में, चींटी में, वृक्ष में, सर्वत्र विद्यमान है। तथापि, वैज्ञानिक ज्ञान आत्मा के आयामों का आकलन नहीं कर सकता, न ही कोई चिकित्सक शरीर के भीतर आत्मा को ढूँढ़ सकता है। परिणामस्वरूप भौतिकवादी वैज्ञानिक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कोई आत्मा नहीं है, किन्तु यह तथ्य नहीं है। आत्मा है। आत्मा की उपस्थिति ही जीवित शरीर और मृत शरीर के बीच अन्तर उत्पन्न करती है। ज्यों ही आत्मा शरीर से प्रस्थान करती है, शरीर मर जाता है। उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। मनुष्य चाहे कितना ही महान् वैज्ञानिक या दार्शनिक क्यों न हो, उसे स्वीकार करना ही पड़ता है कि ज्यों ही आत्मा शरीर से प्रस्थान करती है, शरीर मर जाता है। तब उसका कोई मूल्य नहीं रहता और उसे फेंक देना पड़ता है। हमें इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए; आत्मा मूल्यवान् है, शरीर नहीं। यह तथ्य कि आत्मा संक्रमण (transmigrating) कर रही है, *भगवद्गीता* (2.22) में समझाया गया है:\n\nvāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya\n\nnavāni gṛhṇāti naro 'parāṇi\n\ntathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny\n\nanyāni saṁyāti navāni dehī\n\n\"जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीरों को त्यागकर नवीन भौतिक शरीर ग्रहण करती है।\"\n\nजब कोई पोशाक पुरानी हो जाती है, तब हम उसे त्याग देते हैं और दूसरी पोशाक ग्रहण कर लेते हैं; उसी प्रकार आत्मा इच्छा के अनुसार वस्त्र बदल रही है। चूँकि आत्मा ईश्वर का अंश है, अतः उसमें ईश्वरीय गुण हैं। ईश्वर परम इच्छा, परम शक्ति, परम स्वतन्त्र सत्ता हैं, और हम, उनके अंश होने के कारण, सूक्ष्म मात्रा में ये समस्त गुण रखते हैं। हम में इच्छा, चिन्तन, अनुभूति, तथा कामना है। *वेदों* में कहा गया है कि ईश्वर समस्त जीवनी-शक्तियों में परम जीवनी-शक्ति हैं (cetanaś cetanānām)। वे समस्त जीवों की आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर रहे हैं।\n\nहम जीव असंख्य हैं; हमारी संख्या की कोई सीमा नहीं। किन्तु ईश्वर एक हैं। वे भी जीवित हैं, जैसे हम हैं, किन्तु हम उस जीवनी-शक्ति के नन्हे कण हैं। उदाहरणार्थ, स्वर्ण का एक कण गुण में स्वर्ण की खान के समान ही होता है। यदि हम जल की एक छोटी बूँद के अवयवों का रासायनिक विश्लेषण करें, तो हमें वे समस्त अवयव मिलेंगे जो विशाल समुद्र में पाए जाते हैं। इसी प्रकार, हम ईश्वर के साथ एक हैं, उनके अंश होने के कारण। यह ईश्वरीय कण, अर्थात् आत्मा, या जीवनी-शक्ति, जलचरों से वृक्षों और पौधों तक, और तत्पश्चात् वृक्षों और पौधों से कीट-जीवन तक, फिर सरीसृप-जीवन तक, फिर पक्षियों और पशुओं के शरीरों तक संक्रमण कर रही है। डार्विन का विकास का सिद्धान्त आत्मा के संक्रमण की एक आंशिक व्याख्या मात्र है। डार्विन ने केवल वैदिक साहित्य से जानकारी ली है, किन्तु उन्हें आत्मा की कोई धारणा नहीं। अन्तर यह है कि आत्मा जलचर-जीवन से पौधों और वृक्षों तक, फिर कीट-जीवन तक, फिर पक्षी-जीवन तक, फिर पशु-जीवन तक, फिर मानव-जीवन तक संक्रमण कर रही है, और मानव-जीवन के भीतर वह असभ्य जीवन से सभ्य जीवन की ओर बढ़ती है, इत्यादि। मनुष्य का सभ्य जीवन विकास की पराकाष्ठा को निरूपित करता है। यहाँ एक सन्धिस्थल है: इस बिन्दु से हम पुनः विकास की चक्रीय प्रक्रिया में नीचे फिसल सकते हैं, अथवा हम स्वयं को एक ईश्वरीय जीवन की ओर उन्नत कर सकते हैं। चुनाव हम पर निर्भर है। यह *भगवद्गीता* में इंगित किया गया है।\n\nजीवन के इस मानव-रूप का वास्तव में अर्थ है विकसित चेतना; अतः हमें अपने जीवन को बिल्लियों, कुत्तों, और सूअरों के समान व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। यही आदेश है। यद्यपि यह शरीर कुत्ते या बिल्ली के शरीर की भाँति नश्वर है, फिर भी यह इस बात में भिन्न है कि मनुष्य इस जीवन में सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकता है। हम ईश्वर के अंश हैं, किन्तु किसी न किसी प्रकार हम इस भौतिक अस्तित्व में गिर पड़े हैं; अब हमें इस प्रकार विकसित होना है कि हम वापस अपने घर, भगवद्धाम जा सकें। यही सर्वोच्च सिद्धि है।\n\nवस्तुतः एक अन्य जगत् भी है—एक आध्यात्मिक जगत्। जैसा कि *भगवद्गीता* (8.20) में कहा गया है:\n\nparas tasmāt tu bhāvo 'nyo\n\n'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ\n\nyaḥ sa sarveṣu bhūteṣu\n\nnaśyatsu na vinaśyati\n\n\"किन्तु एक अन्य प्रकृति है, जो नित्य है तथा इस व्यक्त एवं अव्यक्त पदार्थ से परे दिव्य है। वह परम है और कभी विनष्ट नहीं होती। जब इस जगत् का सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब भी वह अंश ज्यों-का-त्यों बना रहता है।\"\n\nइस भौतिक प्रकृति में प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होती है, कुछ काल तक रहती है, कुछ उपज देती है, क्षीण होती है, और अन्ततः विलुप्त हो जाती है। हमारे शरीर एक निश्चित क्षण पर मैथुन द्वारा उत्पन्न होते हैं। पिता का वीर्य संयुक्त होकर मटर का-सा रूप धारण करता है, और जीव अथवा आत्मा उस रूप में आश्रय ले लेती है; और चूँकि वह आश्रय लेती है, अतः उसमें हाथ, पैर, नेत्र आदि विकसित होते हैं। यह विकास सातवें मास में पूर्ण हो जाता है, और नवें मास में मनुष्य गर्भ से बाहर आ जाता है। शिशु का विकास इसी कारण होता है कि आत्मा उपस्थित रहती है। यदि आत्मा उपस्थित न हो, तो कोई विकास नहीं होता, और शिशु मृत उत्पन्न होता है। हम इस मृत शरीर को लेकर रासायनिक द्रव्यों में सुरक्षित रख सकते हैं, किन्तु उसका विकास नहीं होगा। विकास का अर्थ है शरीर का परिवर्तन। हम सभी के कभी शिशु-शरीर थे, किन्तु अब वे शरीर विद्यमान नहीं हैं। शिशु का शरीर बालक के शरीर में विकसित होता है, वह शरीर किशोर के शरीर में विकसित होता है, वह शरीर युवक के शरीर में, और वह अन्ततः वृद्ध के शरीर में परिणत हो जाता है। अन्ततः शरीर पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण, इस भौतिक जगत् का विराट रूप, भी इसी प्रक्रिया के अनुसार कार्य करता है। वह एक निश्चित बिन्दु पर उत्पन्न होता है, विकसित होता है, सुरक्षित रखा जाता है, और एक निश्चित अवस्था पर विलीन हो जाता है। यही भौतिक जगत् की प्रकृति है। वह एक निश्चित अन्तराल पर प्रकट होता है, और पुनः विलुप्त हो जाता है (bhūtvā bhūtvā pralīyate)।\n\nbhāva शब्द का अर्थ है \"प्रकृति।\" एक अन्य प्रकृति है, जो कभी विलीन नहीं होती, जो नित्य है। जीव, अर्थात् आत्माएँ होने के नाते, हम भी नित्य हैं। इसकी पुष्टि *भगवद्गीता* (2.20) में होती है:\n\nna jāyate mriyate vā kadācin\n\nnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ\n\najo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo\n\nna hanyate hanyamāne śarīre\n\n\"आत्मा के लिए न जन्म है, न मृत्यु। न तो वह एक बार होकर पुनः कभी समाप्त होती है। वह अजन्मा, नित्य, सदा-विद्यमान, अमर तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।\"\n\nजैसे भगवान् का न जन्म है न मृत्यु, वैसे ही हम आत्माओं का भी न जन्म हो सकता है न मृत्यु; किन्तु चूँकि हम सोचते हैं, \"मैं यह शरीर हूँ,\" अतः हम मान बैठते हैं कि हम जन्म लेते हैं और मरते हैं। ऐसी सोच को माया अथवा भ्रम कहते हैं, और ज्यों ही हम आत्मा को शरीर के साथ अभिन्न मानने के इस भ्रम से बाहर निकलते हैं, त्यों ही हम ब्रह्मभूत नामक अवस्था को प्राप्त होते हैं। जब मनुष्य अहं ब्रह्मास्मि का अनुभव करता है—\"मैं यह शरीर नहीं हूँ; मैं आत्मा हूँ, परब्रह्म का अंश हूँ\"—तब वह जिसे ब्रह्म-साक्षात्कार कहते हैं, उसे प्राप्त करता है। ज्यों ही ब्रह्म-साक्षात्कार प्राप्त होता है, मनुष्य सुखी हो जाता है।\n\nक्या यह तथ्य नहीं है? यदि आप स्पष्ट रूप से समझ लें कि आपका न जन्म है न मृत्यु, कि आप नित्य हैं, तो क्या आप सुखी नहीं हो जाएँगे? हाँ, निश्चय ही। इस प्रकार जब मनुष्य ब्रह्म-साक्षात्कार-सम्पन्न, आध्यात्मिक रूप से साक्षात्कार-सम्पन्न हो जाता है, तब उसका लालसा अथवा शोक से कोई सरोकार नहीं रहता। समूचा संसार केवल लालसा तथा शोक में ही लगा है। तुम अफ़्रीकी लोग अब यूरोपीयों तथा अमेरिकियों के समान बनने की लालसा कर रहे हो, किन्तु यूरोपीयों ने अपना साम्राज्य खो दिया है, और अब वे शोक कर रहे हैं। तो इस प्रकार एक पक्ष लालसा कर रहा है और दूसरा शोक कर रहा है। इसी प्रकार, यह भौतिक जीवन केवल लालसा तथा शोक का सम्मिश्रण मात्र है। हम उन वस्तुओं की लालसा करते हैं जो हमारे पास नहीं हैं, और उन वस्तुओं के लिए शोक करते हैं जो हमने खो दी हैं। यही हमारा भौतिक कार्य-व्यापार है। किन्तु यदि हम यह अनुभव कर लें कि हम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् (परब्रह्म) के अंश हैं और कि हम ब्रह्म हैं, तब हम इस लालसा तथा शोक से ऊपर उठ जाएँगे।\n\nसंयुक्त राष्ट्र संघ जिस तथाकथित विश्व-बन्धुत्व अथवा एकता को प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा है, वह केवल तभी सम्भव है जब आप आध्यात्मिक स्तर अथवा ब्रह्म-साक्षात्कार तक पहुँचें। ब्रह्म-साक्षात्कार ही मानव-जीवन का लक्ष्य है। मनुष्य को बिल्लियों, कुत्तों तथा सूअरों के समान कार्य नहीं करना चाहिए। सूअर सदा दिन-रात अत्यन्त व्यस्त रहकर विष्ठा खोजता रहता है, और जब उसे वह मिल जाती है, तो वह उसे खाता है और कामोत्तेजित होकर बिना विवेक के मैथुन करता है। सूअर अपनी माता अथवा बहन अथवा किसी से भी मैथुन कर लेगा, और यही सूअर का जीवन है। किन्तु शास्त्र संकेत करते हैं कि मानव-जीवन बिल्लियों, कुत्तों तथा सूअरों के समान इन्द्रियतृप्ति हेतु कठोर परिश्रम करने के लिए नहीं है। वह इस अनुभव के लिए है कि \"मैं इस भौतिक जगत् का नहीं हूँ। मैं आत्मा हूँ और नित्य हूँ, किन्तु किसी-न-किसी प्रकार मैं जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु के इस बद्ध जीवन में गिर पड़ा हूँ।\" यह मानव-जीवन इन चार भौतिक दुःखों—जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु—का समाधान करने के लिए है। यही मानव-जीवन का लक्ष्य है। केवल इतना समझने का प्रयत्न करें कि मानव-जीवन सूअरों के समान अत्यन्त कठोर परिश्रम करने, फिर कुछ इन्द्रियतृप्ति प्राप्त करने, और फिर सहसा मर जाने के लिए नहीं है।\n\nजो लोग आत्मा में विश्वास नहीं करते, वे अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण दशा में हैं। वे न तो यह जानते हैं कि वे कहाँ से आए, और न यह कि वे कहाँ जा रहे हैं। आत्मा का ज्ञान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ज्ञान है, किन्तु किसी भी विश्वविद्यालय में इस पर चर्चा नहीं होती। परन्तु इस शरीर की रचना क्या है? मृत शरीर तथा जीवित शरीर में क्या भेद है? शरीर क्यों जीवित है? शरीर की दशा क्या है, और उसका मूल्य क्या है? वर्तमान में कोई इन प्रश्नों का अध्ययन नहीं कर रहा, किन्तु इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा हम लोगों को शिक्षित करने का प्रयत्न कर रहे हैं ताकि वे समझ सकें कि वे ये शरीर नहीं, अपितु आत्माएँ हैं। मानव-जीवन का कार्य-व्यापार बिल्लियों तथा कुत्तों के कार्य-व्यापार से भिन्न है। यही हमारा सन्देश है।\n\nजहाँ तक आत्मा का सम्बन्ध है, विकासात्मक प्रक्रिया चलती रहती है, और हम अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं, नित्य जीवन के बिन्दु तक पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं। वह नित्य जीवन सम्भव है। यदि आप इस मानव-जीवन में अपना भरसक प्रयत्न करें, तो अपने अगले जीवन में आप एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त कर सकते हैं। आपका आध्यात्मिक शरीर पहले से ही आपके भीतर है, और ज्यों ही आप इस भौतिक अस्तित्व के कल्मष से मुक्त हो जाएँगे, त्यों ही वह विकसित हो जाएगा। यही मानव-जीवन का लक्ष्य है। लोग नहीं जानते कि वास्तविक स्वार्थ क्या है; वह है स्वयं का साक्षात्कार करना, यह अनुभव करना कि \"मैं भगवान् का अंश हूँ, और मुझे भगवान् से मिलने हेतु भगवद्धाम लौटना है।\"\n\nजैसे हमारा यहाँ एक सामाजिक जीवन है, वैसे ही भगवान् का आध्यात्मिक राज्य में एक सामाजिक जीवन है। आप वहाँ उनसे जा मिल सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इस शरीर के समाप्त होने पर आप शून्य हो जाते हैं। नहीं। यह एक भ्रान्त धारणा है। *भगवद्गीता* (2.12) में, कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा:\n\nna tv evāhaṁ jātu nāsaṁ\n\nna tvaṁ neme janādhipāḥ\n\nna caiva na bhaviṣyāmaḥ\n\nsarve vayam ataḥ param\n\n\"ऐसा कोई काल नहीं था जब मैं विद्यमान न था, न तुम थे, और न ही ये समस्त राजा; और न ही भविष्य में हममें से कोई समाप्त होगा।\"\n\nनित्य जीवन प्राप्त करने की प्रक्रिया अत्यन्त सरल है, और तथापि साथ ही अत्यन्त कठिन भी। यह कठिन इसलिए है कि लोग आरम्भ में आत्मा के देहान्तरण के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते। किन्तु यदि हम केवल अधिकारियों से ज्ञान ग्रहण करें, तो यह प्रक्रिया अत्यन्त सरल हो जाती है। हमारी कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया यह है कि हम कृष्ण से—सर्वाधिक पूर्ण सत्ता से—ज्ञान ग्रहण करें, न कि भौतिक प्रकृति के नियमों से बद्ध किसी साधारण सत्ता से। बद्ध सत्ता से ग्रहण किया गया ज्ञान निश्चय ही दोषपूर्ण होता है।\n\nबद्धजीव के दोष क्या हैं? वह निश्चय ही भूलें करता है, निश्चय ही भ्रमित होता है, निश्चय ही दूसरों को ठगता है, और निश्चय ही उसकी इन्द्रियाँ अपूर्ण होती हैं। हम ज्ञान को पूर्णतया प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि हम दूसरों को ठगना चाहते हैं और हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं। यद्यपि हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं, तथापि हमें अपने नेत्रों पर बड़ा गर्व है, और हम सब कुछ देखना चाहते हैं। अतः कोई कहता है, \"क्या आप मुझे भगवान् दिखा सकते हैं?\" वस्तुतः उत्तर हाँ है। आप प्रत्येक क्षण भगवान् को क्यों नहीं देख सकते? कृष्ण कहते हैं, raso 'ham apsu kaunteya: \"मैं जल का स्वाद हूँ।\" प्रत्येक व्यक्ति जल पीता है, और वह स्वाद वहाँ विद्यमान है—अतः यदि हम इस स्वाद को भगवान् के रूप में सोचें, तो हम ईश्वर-साक्षात्कार की प्रक्रिया का आरम्भ कर देते हैं। कृष्ण यह भी कहते हैं, prabhāsmi śaśi-sūryayoḥ: \"मैं सूर्य का प्रकाश हूँ, और मैं चन्द्रमा की ज्योत्स्ना हूँ।\" हम सभी प्रतिदिन सूर्य-प्रकाश तथा चन्द्र-ज्योत्स्ना को देखते हैं, और यदि हम यह सोचें कि सूर्य तथा चन्द्र किस प्रकार प्रकाश उत्सर्जित करते हैं, तो हम अन्ततः भगवान् तक पहुँच जाएँगे। ऐसे अनेक समान उदाहरण हैं। यदि आप ईश्वर-भावनाभावित होकर स्वयं भगवान् का साक्षात्कार करना चाहें, तो यह अत्यन्त कठिन नहीं है। आपको केवल विहित विधियों का अनुसरण करना है। जैसा कि *भगवद्गीता* (18.55) में कहा गया है, tato mām-tattvato jñātvā। हमें केवल भगवान् को तत्त्वतः समझने का प्रयत्न करना है और उनके आविर्भाव, तिरोभाव तथा कार्यकलापों को समझने का प्रयत्न करना है। जब हम उन्हें तत्त्वतः समझ लेते हैं, तब हम तत्काल भगवद्धाम में प्रवेश करते हैं। इस शरीर को त्यागने के पश्चात्, जो व्यक्ति भगवान् अर्थात् कृष्ण को समझ लेता है, वह पुनः कोई अन्य भौतिक शरीर ग्रहण करने नहीं आता। कृष्ण कहते हैं, mām eti: \"वह मेरे पास आता है।\" यही हमारा लक्ष्य है।\n\nअतः हमें अपना समय बिल्लियों तथा कुत्तों के समान जीते हुए नहीं गँवाना चाहिए। हमें सुखपूर्वक रहना चाहिए, किन्तु साथ ही हमें कृष्णभावनाभावित अथवा ईश्वर-भावनाभावित होना चाहिए। यही हमें सुखी होने में सहायता करेगा। भगवान् को समझे बिना तथा ईश्वर-भावनाभावित हुए बिना शान्ति तथा सुख की कोई सम्भावना नहीं है। शान्ति तथा सुख का मार्ग *भगवद्गीता* में रेखांकित है।\n\nयदि आप वास्तव में भगवान् को समझना चाहें, तो उन्हें समझना अत्यन्त सरल है। भगवान् प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं। ईशावास्यम् इदं सर्वम्। दुर्भाग्यवश हम सोचते हैं, \"मैं स्वामी हूँ।\" उदाहरणार्थ, आपके देश में अंग्रेज़ों ने कभी स्वयं को स्वामी होने का दावा किया है, और अब आप स्वयं को स्वामी होने का दावा कर रहे हैं—तो कौन जानता है कि भविष्य में क्या होगा? वस्तुतः कोई नहीं जानता कि वास्तविक स्वामी कौन है। भूमि वहाँ है, और वह भगवान् की सम्पत्ति है, किन्तु हम केवल सोच रहे हैं, \"मैं स्वामी हूँ। यह मेरा है, और वह भी मेरा है।\" वास्तव में, यूरोपीयों के आने से पूर्व ही अमेरिका विद्यमान था, किन्तु अब अमेरिकी सोच रहे हैं, \"हम स्वामी हैं।\" इसी प्रकार, उनसे पूर्व लाल इंडियन सोच रहे थे, \"हम स्वामी हैं।\" तथ्य यह है कि कोई भी मनुष्य वास्तविक स्वामी नहीं है; स्वामी तो भगवान् हैं।\n\nīśāvāsyam idaṁ sarvaṁ\n\nyat kiṁ ca jagatyāṁ jagat\n\ntena tyaktena bhuñjīthā\n\nmā gṛdhaḥ kasya svid dhanam\n\n\"इस ब्रह्माण्ड के भीतर जो भी चर अथवा अचर है, वह सब भगवान् द्वारा नियन्त्रित तथा स्वामित्व में है। अतः मनुष्य को केवल वही वस्तुएँ ग्रहण करनी चाहिए जो उसके लिए आवश्यक हैं, जो उसके अंश के रूप में नियत हैं, और उसे अन्य वस्तुएँ ग्रहण नहीं करनी चाहिए, यह भली-भाँति जानते हुए कि वे किसकी हैं।\" (*ईशोपनिषद्*, मन्त्र 1)\n\nइसी साक्षात्कार की कमी है। कृष्ण समस्त रूपों पर—जिनमें अमेरिकी रूप, अफ़्रीकी रूप, बिल्ली के रूप, कुत्ते के रूप, वृक्ष के रूप आदि सम्मिलित हैं—अपने स्वामित्व का दावा करते हैं; क्योंकि वस्तुतः वे ही स्वामी हैं और परम पिता हैं। यदि हम केवल इतना अनुभव कर लें, तो हम ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कर लेते हैं। वास्तव में, यदि हम भगवान् का साक्षात्कार वैसे ही करें जैसा अधिकृत ग्रन्थों तथा वैदिक साहित्य में विहित है, तो हम पाएँगे कि इस पक्ष तथा उस पक्ष के बीच अब कोई कलह नहीं रहेगा। प्रत्येक वस्तु शान्तिमय हो जाएगी।\n\nप्रत्येक व्यक्ति को भगवान् की सम्पत्ति का उपयोग करने का अधिकार है, ठीक जैसे पुत्र को अपने पिता के व्यय पर जीवन-यापन करने का अधिकार है। शास्त्रों में कहा गया है कि घर में एक छोटे-से प्राणी को भी कुछ भोजन देना चाहिए। यही आध्यात्मिक साम्यवाद है। किसी को भी भूखा नहीं रहना चाहिए, यहाँ तक कि एक सर्प को भी नहीं। हम सदा सर्पों से डरते हैं, किन्तु यदि हम पाएँ कि कोई सर्प हमारे घर में रह रहा है, तो यह देखना हमारा कर्तव्य है कि उस सर्प को भी भोजन मिले। यही ईश्वर-भावना अथवा कृष्णभावना की धारणा है: samaḥ sarveṣu bhūteṣu। जो दिव्य रूप से स्थित है, वह प्रत्येक जीव के प्रति समान भाव रखता है। इस प्रकार *भगवद्गीता* संकेत करती है कि जब मनुष्य प्रत्येक को समान रूप से, भगवान् के अंश के रूप में देखता है, तब वह वास्तव में अपने भक्ति-जीवन का आरम्भ करता है। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन एक प्रामाणिक रीति से प्रत्येक व्यक्ति को यह समझाने का प्रयत्न कर रहा है कि वह क्या है और जीवन का लक्ष्य क्या है। हृदय-शुद्धि की यह प्रक्रिया अत्यन्त सरलता से सम्पन्न हो जाती है। मनुष्य को केवल इस महामन्त्र का जप करना है—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। वास्तव में यह देखा जा सकता है कि इस आन्दोलन में विभिन्न देशों तथा विभिन्न धर्मों के बालक तथा बालिकाएँ हैं, किन्तु किसी को भी किसी विशिष्ट वर्ग, देश अथवा धार्मिक संगठन से सरोकार नहीं है। हमें केवल स्वयं को तथा भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जानने से सरोकार है।\n\nभगवान् परम स्वामी हैं, और हम सभी उनके पुत्र अथवा सेवक हैं। अतः आइए हम स्वयं को भगवान् की सेवा में संलग्न करें, जैसा *भगवद्गीता* में अनुशंसित है। ज्यों ही हम समझ लेते हैं कि भगवान् प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, त्यों ही संसार की समस्त समस्याएँ तत्काल हल हो जाएँगी। इसमें कुछ समय लग सकता है। यह अपेक्षित नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति इस उच्च दर्शन को समझ लेगा, किन्तु यदि प्रत्येक देश के बुद्धिमान लोग इसे समझने का प्रयत्न करें, तो वह पर्याप्त होगा। *भगवद्गीता* (3.21) में कहा गया है:\n\nyad yad ācarati śreṣṭhas\n\ntat tad evetaro janaḥ\n\nsa yat pramāṇaṁ kurute\n\nlokas tad anuvartate\n\n\"महान् पुरुष जो भी कर्म करता है, सामान्य जन उसके पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं। और वह अपने आदर्श कर्मों द्वारा जो भी मानदण्ड स्थापित करता है, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।\"\n\nअतः हम संसार के सर्वाधिक बुद्धिमान पुरुषों को निमन्त्रण देते हैं कि वे इस कृष्णभावनामृत-दर्शन को समझें और इसे समस्त संसार में वितरित करने का प्रयत्न करें। अब हम इन अफ़्रीकी देशों में आए हैं, और मैं समस्त बुद्धिमान अफ़्रीकीजनों को निमन्त्रण देता हूँ कि वे आएँ, इस दर्शन को समझें और इसका वितरण करें। आप अपना विकास करने का प्रयत्न कर रहे हैं, अतः कृपया आध्यात्मिक रूप से विकास करें, क्योंकि आध्यात्मिक विकास ही सुदृढ़ विकास है। अमेरिकियों तथा यूरोपीयों का अनुकरण न करें, जो बिल्लियों तथा कुत्तों के समान जी रहे हैं। इन्द्रियतृप्ति की चेतना पर निर्मित ऐसी सभ्यताएँ टिक नहीं सकतीं। परमाणु बम तो पहले से ही विद्यमान है, और ज्यों ही अगला युद्ध छिड़ेगा, उनके समस्त गगनचुम्बी भवन तथा अन्य सब कुछ समाप्त हो जाएगा। इसे मानव-जीवन के वास्तविक दृष्टिकोण से, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करें। यही इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन का विषय है। अतः हम आपसे अनुरोध करते हैं कि इस दर्शन को समझने का प्रयत्न करें। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।\n\nसन्तों की करुणा\n\nप्रत्येक धर्म के अपने सन्त होते हैं, किन्तु समस्त सन्त एक दिव्य आध्यात्मिक गुण साझा करते हैं: करुणा। श्रील प्रभुपाद समझाते हैं….\n\nआज मैं आपसे भगवान् के पवित्र नाम की महिमा के विषय में बोलूँगा। इस पर महाराज परीक्षित तथा श्रील शुकदेव गोस्वामी के बीच एक ऐसे ब्राह्मण के सन्दर्भ में चर्चा हुई थी, जो अत्यन्त पतित था तथा सभी प्रकार के पापकर्मों में लिप्त था, किन्तु जो केवल पवित्र नाम के जप द्वारा ही उद्धार पा गया। यह *श्रीमद्भागवत* के षष्ठ स्कन्ध में पाया जाता है।\n\nविश्व के ग्रहमण्डलों का *श्रीमद्भागवत* के पंचम स्कन्ध में अत्यन्त भली-भाँति विवरण दिया गया है। ब्रह्माण्ड के भीतर कुछ ऐसे ग्रह हैं जो नारकीय हैं। वस्तुतः केवल *भागवत* ही नहीं, अपितु सभी धार्मिक शास्त्रों में नरक तथा स्वर्ग के वर्णन हैं। *श्रीमद्भागवत* में आप ज्ञात कर सकते हैं कि वे नारकीय ग्रह कहाँ हैं और इस ग्रह से कितने दूर हैं, ठीक जैसे आप आधुनिक खगोलशास्त्र से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। खगोलशास्त्रियों ने गणना की है कि चन्द्रमा यहाँ से कितनी दूर है और इस ग्रह तथा सूर्य के बीच कितनी दूरी है; इसी प्रकार, *भागवत* में नारकीय ग्रहों के वर्णन हैं।\n\nहमें इसी ग्रह पर भी विभिन्न वायुमण्डलीय दशाओं का अनुभव है। उत्तरी ध्रुव के समीप पश्चिमी देशों में जलवायु भारत से भिन्न है, जो विषुवत्-रेखा के समीप है। जैसे इस ग्रह पर वायुमण्डल तथा जीवन-दशाओं में भेद हैं, वैसे ही ऐसे अनेक ग्रह हैं जिनके वायुमण्डल तथा जीवन-दशाएँ भिन्न हैं।\n\nश्रील शुकदेव गोस्वामी से नारकीय ग्रहों का वर्णन सुनने के पश्चात्, महाराज परीक्षित ने कहा:\n\nadhuneha mahā-bhāga\n\nyathaiva narakān naraḥ\n\nnānogra-yātanān neyāt\n\ntan me vyākhyātum arhasi\n\n\"हे महोदय, मैंने आपसे नारकीय ग्रहों के विषय में सुना है। जो मनुष्य अत्यन्त पापी हैं, उन्हें उन ग्रहों पर भेजा जाता है।\" (*श्रीमद्भागवत* 6.1.6) महाराज परीक्षित एक वैष्णव [भक्त] हैं, और एक वैष्णव सदा दूसरों के कष्ट के प्रति करुणा अनुभव करता है। वह दूसरों के दुःखों से अत्यन्त व्यथित रहता है। उदाहरणार्थ, जब भगवान् ईसा मसीह प्रकट हुए, तब वे लोगों की दुःखमय दशाओं से अत्यन्त व्यथित थे। वे चाहे किसी भी देश अथवा सम्प्रदाय के हों, समस्त वैष्णव अथवा भक्त—कोई भी ऐसे लोग जो ईश्वर-भावनाभावित अथवा कृष्णभावनाभावित हैं—इस प्रकार करुणामय होते हैं। अतः किसी वैष्णव की, अर्थात् भगवान् की महिमा के किसी प्रचारक की निन्दा करना एक महान् अपराध है।\n\nकृष्ण अर्थात् भगवान्, किसी वैष्णव के चरणकमलों पर किए गए अपराधों को कभी सहन नहीं करते। कृपाम्बुधि: वैष्णव कृपा का सागर है। वाञ्छा-कल्पतरु: प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाएँ होती हैं, किन्तु वैष्णव समस्त इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है। कल्पतरु का अर्थ है \"इच्छा-वृक्ष।\" आध्यात्मिक जगत् में एक वृक्ष है जिसे इच्छा-वृक्ष कहते हैं। इस भौतिक जगत् में आप एक विशिष्ट प्रकार के वृक्ष से एक विशिष्ट प्रकार का फल प्राप्त करते हैं, किन्तु कृष्णलोक में तथा समस्त वैकुण्ठ ग्रहों में समस्त वृक्ष आध्यात्मिक हैं और आपकी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करेंगे। इसका वर्णन ब्रह्मसंहिता में है: cintāmaṇi-prakara-sadmasu kalpa-vṛkṣa [Bs. 5.29]।\n\nवैष्णव को महाभाग कहकर सम्बोधित किया जाता है, जिसका अर्थ है \"भाग्यशाली।\" जो वैष्णव बन जाता है तथा ईश्वर-भावनाभावित होता है, वह अत्यन्त भाग्यशाली समझा जाता है।\n\nचैतन्य महाप्रभु ने समझाया है कि जीव सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विभिन्न ग्रहमण्डलों में, विभिन्न योनियों में चक्कर काट रहे हैं। जीव कहीं भी जा सकता है—नरक में अथवा स्वर्ग में—जैसा वह चाहे और जैसा वह स्वयं को तैयार करे। अनेक स्वर्गीय ग्रह हैं, अनेक नारकीय योनियाँ हैं। जीव चक्कर काटता हुआ इन योनियों में भटकता रहता है और वर्तमान जीवन में अपनी मनोवृत्ति के अनुसार शरीर रचता रहता है। जैसा तुम बोओगे, वैसा ही काटोगे।\n\nचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भौतिक जगत् में भ्रमण करने वाले इन असंख्य जीवों में से कोई एक भाग्यशाली होता है, सब नहीं। यदि सब भाग्यशाली होते, तो सबने कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर लिया होता। यह तो सर्वत्र निःशुल्क वितरित किया जा रहा है। किन्तु लोग इसे ग्रहण क्यों नहीं कर रहे? क्योंकि वे अभागे हैं। अतः चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि केवल वे ही जो भाग्यशाली हैं, इस कृष्णभावनामृत को ग्रहण करते हैं, और वे आशापूर्ण जीवन, सुखद जीवन, आनन्दमय जीवन, ज्ञान का जीवन प्राप्त करते हैं।\n\nअभागे लोगों को भाग्यशाली बनाने हेतु द्वार-द्वार जाना वैष्णव का कर्तव्य है। वैष्णव सोचता है, \"इन लोगों का इनके नारकीय जीवन से उद्धार कैसे हो सकता है?\" यही महाराज परीक्षित की जिज्ञासा थी। उन्होंने कहा, \"हे महोदय, आपने वर्णन किया है कि अपने पापकर्मों के कारण मनुष्य को नारकीय जीवन-दशा में अथवा किसी नारकीय ग्रहमण्डल में डाल दिया जाता है। अब, वे कौन-से प्रतिकार-उपाय हैं जिनके द्वारा ऐसे व्यक्तियों का उद्धार हो सकता है?\" यही प्रश्न है। जब कोई वैष्णव आता है, जब स्वयं भगवान् आते हैं, अथवा जब भगवान् के पुत्र अथवा उनके अत्यन्त घनिष्ठ भक्त आते हैं, तब उनका एकमात्र ध्येय उन पापी मनुष्यों का उद्धार करना होता है जो कष्ट भोग रहे हैं। उन्हें यह जानने का ज्ञान होता है कि यह कैसे किया जाए।\n\nजब प्रह्लाद महाराज नृसिंहदेव से मिले, तब उन्होंने कहा:\n\nnaivodvije para duratyaya vaitaraṇyās\n\ntvad-vīrya-gāyana-mahāmṛta-magna-cittaḥ\n\nśoce tato vimukha-cetasa indriyārtha-\n\nmāyā-sukhāya bharam udvahato vimūḍhān\n\n\"हे मेरे प्रभु,\" प्रह्लाद कहते हैं, \"मैं अपने उद्धार के लिए अधिक चिन्तित नहीं हूँ।\" (भाग. 7.9.43) मायावादी दार्शनिक इस बात के प्रति अत्यन्त सावधान रहते हैं कि उनके व्यक्तिगत मोक्ष में कोई बाधा न पड़े। वे सोचते हैं, \"यदि मैं दूसरों के संग प्रचार करने जाऊँ, तो मैं पतित हो सकता हूँ, और मेरा साक्षात्कार समाप्त हो जाएगा।\" अतः वे नहीं आते। केवल वैष्णव ही पतन के जोखिम पर आते हैं—किन्तु वे पतित नहीं होते। वे बद्धजीवों का उद्धार करने हेतु नरक तक भी जा सकते हैं। यही प्रह्लाद महाराज का ध्येय है। वे कहते हैं, naivodvije: \"मैं इस भौतिक जगत् में रहने के विषय में अधिक चिन्तित नहीं हूँ।\"\n\nप्रह्लाद महाराज आगे कहते हैं, \"मुझे अपने लिए कोई चिन्ता नहीं है, क्योंकि किसी-न-किसी प्रकार मुझे सदा कृष्णभावनाभावित रहने का प्रशिक्षण मिला है।\" चूँकि वे कृष्णभावनाभावित हैं, अतः उन्हें विश्वास है कि अपने अगले जीवन में वे कृष्ण के पास जा रहे हैं। *भगवद्गीता* में कहा गया है कि यदि कोई कृष्णभावनामृत के विधि-नियमों का सावधानीपूर्वक पालन करे, तो यह निश्चित है कि वह अपने अगले जीवन में परम गन्तव्य को प्राप्त करेगा।\n\nप्रह्लाद महाराज आगे कहते हैं: \"मेरे लिए चिन्ता का केवल एक ही स्रोत है।\" देखिए—यद्यपि उन्हें अपने लिए कोई चिन्ता नहीं थी, तथापि उन्हें चिन्ता थी। वे कहते हैं, śoce tato vimukha-cetasaḥ: \"मैं उन व्यक्तियों के लिए चिन्तित हूँ जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। यही मेरी चिन्ता है। अपने लिए मुझे कोई चिन्ता नहीं है, किन्तु मैं उनके विषय में सोच रहा हूँ जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं।\" वे कृष्णभावनाभावित क्यों नहीं हैं? Māyā-sukhāya bharam udvahato vimūḍhān [SB 7.9.43]। इन धूर्तों ने क्षणिक सुख हेतु एक ढोंगी सभ्यता रच ली है।\n\nMāyā-sukhāya। वास्तव में यह एक तथ्य है। हमारी एक ढोंगी सभ्यता है। प्रति वर्ष इतनी सारी मोटरगाड़ियाँ बनाई जा रही हैं, और उस प्रयोजन हेतु इतनी सारी सड़कें खोदकर तैयार करनी पड़ती हैं। इससे समस्या पर समस्या उत्पन्न होती है। अतः यह māyā-sukhāya, भ्रामक सुख है, और तथापि हम इस प्रकार सुखी होने का प्रयत्न कर रहे हैं। हम सुखी होने का कोई उपाय गढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु इससे केवल अन्य समस्याएँ ही उत्पन्न होती हैं।\n\nआपके देश में आपके पास सर्वाधिक संख्या में मोटरगाड़ियाँ हैं, किन्तु इससे कोई समस्या हल नहीं होती। आपने जीवन की समस्याओं को हल करने में सहायता हेतु मोटरगाड़ियाँ बनाई हैं, किन्तु मैंने अनुभव किया है कि इससे भी अधिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जब मेरा शिष्य दयानन्द मुझे लॉस एंजिल्स में एक चिकित्सक के पास ले जाना चाहता था, तब मुझे चिकित्सक से परामर्श करने से पूर्व ही तीस मील की यात्रा का कष्ट उठाना पड़ा। एक बार जब आप मोटरगाड़ियाँ बना लेते हैं, तब आपको अपने मित्रों से मिलने हेतु तीस अथवा चालीस मील की यात्रा करनी पड़ती है।\n\nआप न्यूयॉर्क से बोस्टन तक एक घण्टे में उड़कर जा सकते हैं, किन्तु केवल हवाई अड्डे तक पहुँचने में ही उससे अधिक समय लग जाता है। इस स्थिति को māyā-sukhāya कहते हैं। Māyā का अर्थ है \"मिथ्या,\" \"भ्रामक।\" हम कोई अत्यन्त सुखद स्थिति रचने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु हमने एक अन्य असुखद स्थिति रच ली है। यही भौतिक जगत् की रीति है; यदि हम भगवान् तथा प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्वाभाविक सुख-साधनों से सन्तुष्ट नहीं हैं और कृत्रिम सुख-साधन रचना चाहते हैं, तो हमें कुछ असुख भी रचना पड़ता है। अधिकांश लोग यह नहीं जानते। वे सोचते हैं कि वे एक अत्यन्त सुखद स्थिति रच रहे हैं, किन्तु वास्तव में वे जीविका अर्जित करने हेतु कार्यालय जाने के लिए पचास मील यात्रा कर रहे हैं और पचास मील लौटने के लिए। ऐसी दशाओं के कारण ही प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि इन विमूढ़ों ने—इन भौतिकतावादी व्यक्तियों ने, इन धूर्तों ने—केवल क्षणिक सुख हेतु स्वयं पर एक अनावश्यक भार लाद लिया है। Vimūḍhān, māyā-sukhāya bharam udvahato। अतः, वैदिक सभ्यता में अनुशंसित है कि मनुष्य स्वयं को भौतिक जीवन से मुक्त करे, संन्यास अर्थात् त्याग-आश्रम ग्रहण करे, और सर्वथा निश्चिन्त होकर आध्यात्मिक जीवन का अनुष्ठान करे।\n\nयदि कोई गृहस्थ-जीवन में कृष्णभावनामृत का अनुष्ठान कर सके, तो वह अत्युत्तम है। भक्तिविनोद ठाकुर एक गृहस्थ थे, एक न्यायाधीश थे, और तथापि उन्होंने भक्ति का अनुष्ठान इतनी भली-भाँति किया। ध्रुव महाराज तथा प्रह्लाद महाराज गृहस्थ थे, किन्तु उन्होंने स्वयं को इस प्रकार प्रशिक्षित किया कि गृहस्थ होते हुए भी उनकी सेवा में कोई बाधा नहीं आई। अतः, प्रह्लाद महाराज कहते हैं, \"मैंने सदा कृष्णभावना में स्थित रहने की कला सीख ली है।\" वह कला क्या है? Tvad-vīrya-gāyana-mahāmṛta-magna-cittaḥ। केवल भगवान् के विजयी कार्यकलापों तथा लीलाओं की महिमा का गान करना। Vīrya का अर्थ है \"अत्यन्त वीरतापूर्ण।\"\n\nकृष्ण के कार्यकलाप वीरतापूर्ण हैं। आप उनके विषय में *कृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्* में पढ़ सकते हैं। कृष्ण का नाम, उनकी कीर्ति, उनके कार्यकलाप, उनके पार्षद, तथा उनसे सम्बन्धित अन्य सभी वस्तुएँ वीरतापूर्ण हैं। प्रह्लाद महाराज इस सन्दर्भ में कहते हैं, \"मुझे विश्वास है कि मैं जहाँ भी जाऊँ, मैं आपके वीरतापूर्ण कार्यकलापों की महिमा का गान कर सकता हूँ और सुरक्षित रह सकता हूँ। मेरे पतित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु मैं केवल उन व्यक्तियों के लिए चिन्तित हूँ जिन्होंने एक ऐसी सभ्यता रच ली है जिसमें वे सदा कठोर परिश्रम करने में व्यस्त रहते हैं। मैं उनके विषय में सोच रहा हूँ।\"\n\nप्रह्लाद आगे कहते हैं:\n\nprāyeṇa deva munayaḥ sva-vimukti-kāmā\n\nmaunaṁ caranti vijane na parārtha-niṣṭhāḥ\n\nnaitān vihāya kṛpaṇān vimumukṣa eko\n\nnānyaṁ tvad asya śaraṇaṁ bhramato 'nupaśye\n\n\"हे मेरे प्रभु, अनेक सन्त-पुरुष तथा ऋषि हैं जो अपने ही मोक्ष में अत्यन्त रुचि रखते हैं।\" (भाग. 7.9.44) Munayaḥ का अर्थ है \"सन्त-पुरुष\" अथवा \"दार्शनिक।\" Prāyeṇa deva munayaḥ sva-vimukti-kāmāḥ: वे अपने ही मोक्ष में अत्यन्त रुचि रखते हैं। वे हिमालय पर्वत जैसे एकान्त स्थानों में रहने का प्रयत्न करते हैं। वे किसी से बात नहीं करते, और वे सदा इस बात से भयभीत रहते हैं कि नगर में साधारण लोगों से मिलने-जुलने से कहीं उनका चित्त विचलित न हो जाए अथवा कदाचित् वे पतित ही न हो जाएँ। वे सोचते हैं, \"इससे तो अच्छा है कि मैं स्वयं को ही बचा लूँ।\"\n\nप्रह्लाद महाराज को खेद है कि ये महान् सन्त-पुरुष उस नगर में नहीं आते, जहाँ लोगों ने दिन-रात अत्यन्त कठोर परिश्रम की एक सभ्यता रच ली है। ऐसे सन्त अधिक करुणामय नहीं हैं। वे कहते हैं, \"मैं इन पतित लोगों के लिए चिन्तित हूँ जो केवल इन्द्रियतृप्ति हेतु अनावश्यक रूप से इतना कठोर परिश्रम कर रहे हैं।\"\n\nयदि उतना कठोर परिश्रम करने में कोई तुक भी होती, तो भी ऐसे लोग नहीं जानते कि वह क्या है। वे केवल मैथुन को ही जानते हैं। या तो वे किसी नग्न नृत्य में जाते हैं अथवा किसी नग्न क्लब में अथवा इस या उस में। प्रह्लाद महाराज कहते हैं, naitān vihāya kṛpaṇān vimumukṣa ekaḥ: \"हे मेरे प्रभु, मुझे अकेले मोक्ष नहीं चाहिए। जब तक मैं इन समस्त मूर्खों को अपने साथ न ले जाऊँ, मैं नहीं जाऊँगा।\" वे इन समस्त पतित आत्माओं को अपने साथ लिए बिना भगवद्धाम जाने से इनकार कर देते हैं। यही वैष्णव है। Nānyaṁ tvad asya śaraṇaṁ bhramato 'nupaśye: \"मैं केवल उन्हें यह सिखाना चाहता हूँ कि आपकी शरण कैसे ली जाए। बस इतना ही। यही मेरा लक्ष्य है।\"\n\nवैष्णव जानता है कि ज्यों ही कोई शरणागत होता है, त्यों ही उसका मार्ग प्रशस्त हो जाता है। Naivodvije para duratyaya-vaitaraṇyās tvad-vīrya-gāyana-mahāmṛta-magna-cittaḥ: \"किसी-न-किसी प्रकार, उन्हें कृष्ण के समक्ष नतमस्तक होने दें।\" यह एक सरल विधि है। आपको केवल इतना करना है कि आप श्रद्धापूर्वक कृष्ण के समक्ष नतमस्तक हों और कहें, \"हे मेरे प्रभु कृष्ण, मैं इतने काल तक, इतने जन्मों तक आपको भूला रहा। अब मुझे होश आया है; कृपया मुझे स्वीकार करें।\" बस इतना ही। यदि कोई केवल इस तकनीक को सीख ले और निष्ठापूर्वक स्वयं को भगवान् के प्रति समर्पित कर दे, तो उसका मार्ग तत्काल प्रशस्त हो जाता है। ये वैष्णव के दार्शनिक विचार हैं। वैष्णव सदा यह सोचता रहता है कि पतित बद्धजीवों का उद्धार कैसे हो सके। वह सदा उसी रीति से योजनाएँ बनाने में लगा रहता है, ठीक गोस्वामियों के समान। भगवान् चैतन्य के साक्षात् शिष्य, वृन्दावन के छह गोस्वामियों का कार्य-व्यापार क्या था? यह श्रीनिवास आचार्य द्वारा कहा गया है:\n\nnānā-śāstra-vicāraṇaika-nipuṇau sad-dharma-saṁsthāpakau\n\nlokānāṁ hita-kārinau tribhuvane mānyau śaraṇyākarau\n\nrādhā-kṛṣṇa-padāravinda-bhajanānandena mattālikau\n\nvande rūpa-sanātanau raghu-yugau śrī-jīva-gopālakau\n\n\"छह गोस्वामी, अर्थात् श्री सनातन गोस्वामी, श्री रूप गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, तथा श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी, समस्त मनुष्यों के कल्याण हेतु नित्य धार्मिक सिद्धान्तों की स्थापना के ध्येय से प्रकट शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन में अत्यन्त निपुण हैं। वे सदा गोपियों के भाव में निमग्न रहते हैं और राधा तथा कृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहते हैं।\" (षड्-गोस्वाम्य्-अष्टक 2)\n\nइसी प्रकार की वैष्णव-करुणा के साथ, महाराज परीक्षित श्रील शुकदेव गोस्वामी से कहते हैं: \"आपने जीवन की विभिन्न प्रकार की नारकीय दशाओं का वर्णन किया है। अब, मुझे बताइए कि जो कष्ट भोग रहे हैं, उनका उद्धार कैसे हो सकता है। कृपया मुझे यह समझाइए।\n\nadhuneha mahā-bhāga\n\nyathaiva narakān naraḥ\n\nnānogra-yātanān neyāt\n\ntan me vyākhyātum arhasi\n\nNara का अर्थ है मनुष्य, अर्थात् वे जो पतित हैं। Narakān naraḥ/ nānogra-yātanān neyāt tan me: \"उनका उनके भीषण दुःखों तथा भयंकर वेदनाओं से उद्धार कैसे हो सकता है?\" यही वैष्णव-हृदय है। महाराज परीक्षित कहते हैं, \"किसी-न-किसी प्रकार वे इस नारकीय जीवन में गिर पड़े हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें उसी दशा में बने रहना चाहिए। कोई-न-कोई उपाय अवश्य होगा जिससे उनका उद्धार हो सके, अतः कृपया वह समझाइए।\"\n\nश्रील शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया:\n\nna ced ihaivāpacitiṁ yathāṁhasaḥ\n\nkṛtasya kuryān mana-ukta-pāṇibhiḥ\n\ndhruvaṁ sa vai pretya narakān upaiti\n\nye kīrtitā me bhavatas tigma-yātanāḥ\n\n\"हाँ, मैंने पहले ही विभिन्न प्रकार की नारकीय दशाओं तथा अत्यन्त घोर वेदनामय जीवन का वर्णन किया है, किन्तु मनुष्य को उसका प्रतिकार करना ही होता है।\" (भाग. 6.1.7)\n\nयह कैसे किया जा सकता है? पापकर्म विविध रीतियों से किए जाते हैं। हम पापकर्म कर सकते हैं अथवा इस प्रकार कोई योजना बना सकते हैं, यह सोचते हुए कि \"मैं उस मनुष्य को मार डालूँगा।\" दोनों ही प्रकार से, यह पाप है। जब मन सोचता है, अनुभव करता है, तथा संकल्प करता है, तब वहाँ कर्म होता है।\n\nकुछ दिन पूर्व मैं एक पुस्तक में पढ़ रहा था कि यदि सड़क पर जाते समय किसी का कुत्ता आप पर भौंके, तो नियम के अनुसार वह कुत्ते के स्वामी की ओर से एक अपराध है। किसी को भी कुत्तों के भौंकने से भयभीत नहीं होना चाहिए, अतः मनुष्य को अपने कुत्ते की देखभाल करनी चाहिए। मैंने यह पढ़ा। यह आपके देश में एक नियम है। कुत्ता तो केवल भौंक रहा है, किन्तु यह पाप है। कुत्ता उत्तरदायी नहीं है, क्योंकि वह एक पशु है, किन्तु चूँकि पशु के स्वामी ने कुत्ते को अपना घनिष्ठ मित्र बना लिया है, अतः वह नियमतः उत्तरदायी है। यदि कोई बाहरी कुत्ता आपके घर में प्रवेश करे, तो उसे मारा नहीं जा सकता, किन्तु कुत्ते के स्वामियों पर अभियोग चलाया जा सकता है।\n\nजैसे कुत्ते का भौंकना अवैध है, वैसे ही जब आप दूसरों से कुछ अपमानजनक कहते हैं, तो वह भी पाप है। वह ठीक भौंकने के समान है। अतः पापकर्म इतनी अनेक रीतियों से किए जाते हैं। चाहे हम पापकर्मों के विषय में सोचें, अथवा हम कुछ पापमय बोलें, अथवा हम वास्तव में कोई पापकर्म करें, ये सब पापकर्म ही माने जाते हैं। Dhruvaṁ sa vai pretya narakān upaiti। मनुष्य को ऐसे पापकर्मों के लिए दण्ड भोगना ही पड़ता है।\n\nलोग अगले जीवन में विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे इस झंझट से बचना चाहते हैं। किन्तु हम उससे बच नहीं सकते। हमें नियम के अनुसार कार्य करना ही चाहिए, अन्यथा हमें दण्ड मिलेगा। इसी प्रकार, मैं भगवान् के नियम से बच नहीं सकता। यह सम्भव नहीं है। मैं दूसरों को ठग सकता हूँ, चोरी कर सकता हूँ, और स्वयं को छिपा सकता हूँ, और इस प्रकार राज्य के नियम के दण्ड से स्वयं को बचा सकता हूँ, किन्तु मैं अपने को उस श्रेष्ठ नियम से, प्रकृति के नियम से नहीं बचा सकता। यह अत्यन्त कठिन है। इतने अनेक साक्षी हैं। दिवस का प्रकाश साक्षी है, चन्द्रमा की ज्योत्स्ना साक्षी है, और कृष्ण परम साक्षी हैं। आप यह नहीं कह सकते, \"मैं यह पाप कर रहा हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं देख सकता।\"\n\nकृष्ण आपके हृदय के भीतर विराजमान परम साक्षी हैं। वे यह अंकित करते रहते हैं कि आप क्या सोच रहे हैं और क्या कर रहे हैं। वे सुविधा भी प्रदान करते हैं। यदि आप अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने हेतु कुछ करना चाहें, तो कृष्ण उस कर्म हेतु सुविधा प्रदान करते हैं। यह *भगवद्गीता* में कहा गया है। Sarvasya cāhaṁ hṛdi sanniviṣṭaḥ: \"मैं प्रत्येक के हृदय में स्थित हूँ।\" Mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṁ ca: [Bg. 15.15] \"मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति प्रकट होते हैं।\"\n\nइस प्रकार कृष्ण हमें एक अवसर प्रदान करते हैं। यदि आप कृष्ण को चाहें, तो वे आपको उन्हें प्राप्त करने का अवसर देंगे, और यदि आप कृष्ण को न चाहें, तो वे आपको उन्हें भूलने का अवसर देंगे। यदि आप कृष्ण को, भगवान् को भूलकर जीवन का भोग करना चाहें, तो कृष्ण आपको समस्त सुविधा प्रदान करेंगे ताकि आप भूल सकें, और यदि आप कृष्णभावनामृत सहित जीवन का भोग करना चाहें, तो कृष्ण आपको कृष्णभावनामृत में प्रगति करने का अवसर देंगे। यह आप पर निर्भर है।\n\nयदि आप सोचें कि आप कृष्णभावनामृत के बिना सुखी हो सकते हैं, तो कृष्ण इस पर कोई आपत्ति नहीं करते। Yathecchasi tathā kuru। अर्जुन को सलाह देने के पश्चात्, उन्होंने केवल इतना कहा, \"अब मैंने तुम्हें सब कुछ समझा दिया है। तुम जो भी इच्छा करो, कर सकते हो।\" अर्जुन ने तत्काल उत्तर दिया, kariṣye vacanaṁ tava: [Bg. 18.73] \"अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।\" यही कृष्णभावनामृत है।\n\nभगवान् आपकी इस तनिक स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते। यदि आप भगवान् की आज्ञा के अनुसार कार्य करना चाहें, तो भगवान् आपकी सहायता करेंगे। यदि आप कभी पतित भी हो जाएँ, तो भी यदि आप निष्ठावान् हो जाएँ—\"इस समय से मैं कृष्णभावनाभावित रहूँगा और उनकी आज्ञाओं का पालन करूँगा\"—तो कृष्ण आपकी सहायता करेंगे। सभी प्रकार से, यदि आप पतित भी हो जाएँ, तो वे आपको क्षमा कर देंगे और आपको अधिक बुद्धि प्रदान करेंगे। यह बुद्धि कहेगी, \"यह मत करो। अब अपने कर्तव्य में लगे रहो।\" किन्तु यदि आप कृष्ण को भूलना चाहें, यदि आप कृष्ण के बिना सुखी होना चाहें, तो वे आपको इतने अनेक अवसर देंगे कि आप जन्म-जन्मान्तर कृष्ण को भूलते रहेंगे।\n\nमहाराज परीक्षित यहाँ कहते हैं, \"ऐसा नहीं है कि यदि मैं कहूँ कि कोई भगवान् नहीं है तो कोई भगवान् नहीं होगा, अथवा मैं जो करता हूँ उसके लिए उत्तरदायी नहीं रहूँगा।\" यही नास्तिक मत है। नास्तिक भगवान् को नहीं चाहते, क्योंकि वे सदा पापमय होते हैं—यदि वे सोचें कि भगवान् है, तो उन्हें दण्ड के विचार से काँपना पड़ेगा। अतः वे भगवान् के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं। यही उनकी प्रक्रिया है। वे सोचते हैं कि यदि वे भगवान् को स्वीकार न करें तो कोई दण्ड नहीं है और वे जो चाहें कर सकते हैं।\n\nजब खरगोशों पर बड़े पशु आक्रमण करते हैं, तब वे अपने नेत्र मूँद लेते हैं और सोचते हैं, \"मैं मारा नहीं जाऊँगा।\" किन्तु वे फिर भी मारे जाते हैं। इसी प्रकार, हम भगवान् तथा भगवान् के नियम के अस्तित्व को अस्वीकार कर सकते हैं, किन्तु तथापि भगवान् तथा उनका नियम वहाँ विद्यमान हैं। उच्च न्यायालय में आप कह सकते हैं, \"मुझे सरकार के नियम की परवाह नहीं,\" किन्तु आपको सरकारी नियम स्वीकार करने हेतु बाध्य किया जाएगा। यदि आप राज्य के नियम को अस्वीकार करें, तो आपको कारागार में डाल दिया जाएगा और कष्ट भुगतवाया जाएगा। इसी प्रकार, आप मूर्खतावश भगवान् के अस्तित्व की निन्दा कर सकते हैं—\"कोई भगवान् नहीं है\" अथवा \"मैं ही भगवान् हूँ\"—किन्तु तथापि आप अपने समस्त कर्मों के लिए, भले तथा बुरे दोनों के लिए, उत्तरदायी हैं।\n\nदो प्रकार के कर्म हैं—भले तथा बुरे। यदि आप भली-भाँति कार्य करें तथा पुण्यकर्म करें, तो आपको सौभाग्य प्राप्त होता है, और यदि आप पापमय कार्य करें, तो आपको कष्ट भोगना पड़ता है। अतः श्रील शुकदेव गोस्वामी कहते हैं:\n\ntasmāt puraivāśv iha pāpa-niṣkṛtau\n\nyateta mṛtyor avipadyatātmanā\n\ndoṣasya dṛṣṭvā guru-lāghavaṁ yathā\n\nbhiṣak cikitseta rujāṁ nidāna-vit\n\n(भाग. 6.1.8)\n\nविभिन्न प्रकार के प्रायश्चित्त हैं। यदि आप कोई पाप करें और किसी अन्य वस्तु द्वारा उसका प्रतिकार करें, तो वह प्रायश्चित्त है। इसके उदाहरण ईसाई बाइबिल में हैं। श्रील शुकदेव गोस्वामी कहते हैं, \"आपको यह जानना चाहिए कि आप उत्तरदायी हैं, और पापमय जीवन की गुरुता के अनुसार, आपको शास्त्रों में वर्णित किसी प्रकार के प्रायश्चित्त को स्वीकार करना चाहिए।\"\n\nवास्तव में, ठीक जैसे जब कोई रोगी होता है तो उसे चिकित्सक के पास जाना पड़ता है और प्रायश्चित्त के एक रूप के रूप में चिकित्सक का शुल्क चुकाना पड़ता है, वैसे ही वैदिक जीवन-पद्धति के अनुसार ब्राह्मणों का एक वर्ग होता है जिनके पास मनुष्य अपने किए पापों के अनुसार विहित प्रायश्चित्त हेतु जाता है।\n\nश्रील शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि मनुष्य को अपने पापमय जीवन की गुरुता के अनुसार विहित प्रायश्चित्त सम्पन्न करना होता है। वे उदाहरण को आगे बढ़ाते हैं: doṣasya dṛṣṭvā guru-lāghavaṁ yathā bhiṣak cikitseta rujāṁ nidāna-vit [SB 6.1.8]। जब आप किसी चिकित्सक से परामर्श करते हैं, तो वह रोग की गुरुता के अनुसार कोई सस्ती औषधि अथवा कोई महँगी औषधि लिखता है। यदि आपको केवल सिरदर्द है, तो वह कोई ऐस्पिरिन लिख सकता है, किन्तु यदि आपको कुछ अत्यन्त गम्भीर है, तो वह तत्काल कोई शल्य-क्रिया लिखता है जिसका व्यय एक सहस्र डॉलर होगा। इसी प्रकार, पापमय जीवन एक रोगग्रस्त दशा है, अतः स्वस्थ होने हेतु मनुष्य को विहित उपचार का अनुसरण करना चाहिए।\n\nजन्म-मृत्यु की शृंखला को स्वीकार करना आत्मा की एक रोगग्रस्त दशा है। आत्मा का न जन्म है न मृत्यु और न रोग, क्योंकि वह आत्मतत्त्व है। कृष्ण *भगवद्गीता* (2.20) में कहते हैं: na jāyate, आत्मा का कोई जन्म नहीं है, और mriyate, उसकी कोई मृत्यु नहीं है। Nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo/ na hanyate hanyamāne śarīre। आत्मा नित्य तथा शाश्वत है। वह इस शरीर के विनाश के साथ नष्ट नहीं होती। Na hanyate hanyamāne śarīre [Bg. 2.20]। Na hanyate का अर्थ है कि इस शरीर के विनाश के पश्चात् भी वह मारी अथवा नष्ट नहीं होती।\n\nआधुनिक सभ्यता का लुप्त बिन्दु यह है कि लोगों को यह शिक्षा देने हेतु कोई शिक्षा-पद्धति नहीं है कि मृत्यु के पश्चात् क्या होता है। अतः हमारे पास सर्वाधिक दोषपूर्ण शिक्षा है, क्योंकि मृत्यु के पश्चात् क्या होता है, इस ज्ञान के बिना मनुष्य एक पशु के समान मरता है। पशु यह नहीं जानता कि वह कोई अन्य शरीर ग्रहण करने जा रहा है; उसे ऐसा कोई ज्ञान नहीं होता।\n\nमानव-जीवन एक पशु बनने के लिए नहीं है। मनुष्य को केवल खाने, सोने, मैथुन तथा रक्षा में ही रुचि नहीं रखनी चाहिए। आपके पास खाने की कोई अत्युत्तम व्यवस्था हो सकती है, अथवा सोने हेतु अनेक सुन्दर भवन, अथवा मैथुन-जीवन की कोई अत्युत्तम व्यवस्था, अथवा आपकी रक्षा हेतु कोई अत्युत्तम रक्षा-बल, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप एक मनुष्य हैं। उस प्रकार की सभ्यता पशु-जीवन है। पशु भी खाने, सोने तथा मैथुन-जीवन में रुचि रखते हैं, और अपनी ही विधियों के अनुसार वे रक्षा भी करते हैं। तब फिर मानव-जीवन तथा पशु-जीवन में क्या भेद है, यदि आप केवल देह-प्रकृति के इन चार सिद्धान्तों में ही संलग्न रहें?\n\nभेद तब होता है जब कोई मनुष्य जिज्ञासु होता है—\"मुझे इस दुःखमय दशा में क्यों डाला गया है? क्या इसका कोई निदान है? क्या कोई चिरस्थायी, नित्य जीवन है? मैं मरना नहीं चाहता। मैं अत्यन्त सुखपूर्वक तथा शान्तिपूर्वक जीना चाहता हूँ। क्या इसकी कोई सम्भावना है? वह विधि क्या है? वह विज्ञान क्या है?\" जब ये जिज्ञासाएँ वहाँ होती हैं और इन प्रश्नों का उत्तर देने हेतु पग उठाए जाते हैं, तब वह मानव-सभ्यता है; अन्यथा वह कुत्ता-सभ्यता है, पशु-सभ्यता है।\n\nपशु सन्तुष्ट हो जाते हैं यदि वे खा सकें, सो सकें, कुछ मैथुन-जीवन भोग सकें, और कुछ रक्षा कर सकें। वास्तव में कोई रक्षा है ही नहीं, क्योंकि कोई भी स्वयं को क्रूर मृत्यु के हाथों से नहीं बचा सकता। उदाहरणार्थ, हिरण्यकशिपु सदा जीवित रहना चाहता था, और इसलिए उसने कठोर तपस्याएँ कीं। तथाकथित वैज्ञानिक अब कह रहे हैं कि हम वैज्ञानिक विधियों द्वारा मृत्यु को रोक देंगे। यह भी एक अन्य पागलपन भरा कथन है। यह सम्भव नहीं है। आप वैज्ञानिक ज्ञान में चाहे जितनी महान् उन्नति कर लें, किन्तु इन चार समस्याओं—जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग—का कोई वैज्ञानिक समाधान नहीं है।\n\nजो बुद्धिमान है, वह इन चार प्रमुख समस्याओं को हल करने हेतु उत्सुक होगा। कोई मरना नहीं चाहता। किन्तु इसका कोई निदान नहीं है। मुझे मरना ही है। प्रत्येक व्यक्ति इतनी अनेक गर्भनिरोधक विधियों का प्रयोग करके जनसंख्या की वृद्धि को रोकने हेतु अत्यन्त चिन्तित है, किन्तु तथापि जन्म चलता ही रहता है। अतः जन्म का कोई अवरोध नहीं है। आप अपनी वैज्ञानिक विधियों द्वारा नवीनतम औषधियों का आविष्कार कर सकते हैं, किन्तु आप रोग को नहीं रोक सकते। केवल एक गोली लेकर रोग का अन्त कर देना सम्भव नहीं है।\n\n*भगवद्गीता* में कहा गया है, janma-mṛtyu jarā-vyādhi-duḥkha-doṣānudarśanam: मनुष्य सोच सकता है कि उसने अपने जीवन की समस्त समस्याएँ हल कर ली हैं, किन्तु इन चार समस्याओं—जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग—का समाधान कहाँ है? वह समाधान कृष्णभावनामृत है।\n\nकृष्ण उसी ग्रन्थ में यह भी कहते हैं:\n\njanma karma ca me divyam\n\nevaṁ yo vetti tattvataḥ\n\ntyaktvā dehaṁ punar janma\n\nnaiti mām eti so 'rjuna\n\n(Bg. 4.9)\n\nहम सभी प्रत्येक क्षण अपना शरीर त्याग रहे हैं। इस शरीर को त्यागने की अन्तिम अवस्था मृत्यु कहलाती है। किन्तु कृष्ण कहते हैं, \"यदि कोई मेरे आविर्भाव तथा तिरोभाव को और मेरे कार्यकलापों को—सतही रूप से नहीं, अपितु तत्त्वतः—समझ ले, तो इस शरीर को त्यागने के पश्चात् वह पुनः कभी कोई भौतिक शरीर ग्रहण नहीं करता।\"\n\nऐसे व्यक्ति का क्या होता है? Mām eti—वह कृष्ण के पास लौट जाता है। यदि आपको कृष्ण के पास जाना है, तो आपको अपना आध्यात्मिक शरीर तैयार करना होगा। यही कृष्णभावनामृत है। यदि आप स्वयं को कृष्णभावनामृत में बनाए रखें, तो धीरे-धीरे आप अपना अगला शरीर, एक आध्यात्मिक शरीर तैयार कर लेते हैं, जो आपको तत्काल कृष्णलोक, कृष्ण के धाम में ले जाएगा, और आप सुखी हो जाएँगे। आप वहाँ चिरकाल तक तथा आनन्दपूर्वक रहेंगे।\n\nस्वयं को भ्रम से बचाना\n\nसन् 1973 में श्रील प्रभुपाद को कैलिफ़ोर्निया की एक महिला से एक असाधारण पत्र प्राप्त हुआ, जो उनके दो युवा शिष्यों से मिली थी। उसने शिकायत की कि उनका \"जिन लोगों से वे मिलते हैं, उनके प्रति अत्यन्त नकारात्मक दृष्टिकोण था।\" उसकी सच्ची चिन्ता से द्रवित होकर, श्रील प्रभुपाद ने अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर उसे यह विचारपूर्ण पत्र लिखा।\n\nआपकी कृपा:\n\nकृपया इस पत्र को प्रेम सहित स्वीकार करें… के-मार्ट; सैन फ़र्नान्डो। हमने भिन्न-भिन्न अवसरों पर आपके दो लड़कों से बात की है। दोनों का ही जिन लोगों से वे मिलते हैं, उनके प्रति अत्यन्त नकारात्मक दृष्टिकोण था।\n\nयह विश्वास न करें कि यह किसी भी प्रकार से वैसा है जैसा होना चाहिए।\n\nये लड़के भगवान् का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह भीतर से आता है। उनके दृष्टिकोण में करुणा होनी चाहिए। हम इसे अनुभव करते हैं; अतः इन स्वर्ग के छोटे-छोटे टुकड़ों को चुन-चुनकर इन लोगों के बीच रखें। अन्यथा यह आपके प्रयोजन को विफल कर देगा।\n\nप्रेम है। इसे वैसा ही रहने दें जैसा यह है; प्रेम सहित अथवा बिल्कुल नहीं।\n\nमेरी प्रार्थनाएँ आपके साथ रहें… और मैं आपसे विनती करती हूँ कि वे मेरे साथ भी रहें।\n\nईश्वर में आपकी, उनकी कृपा बनी रहे,\n\nLynne Ludwig\n\nमेरी प्रिय Lynne Ludwig,\n\nकृपया मेरे आशीर्वाद स्वीकार करें। कैलिफ़ोर्निया से आया आपका पत्र मुझे प्राप्त हुआ, इसकी मैं पावती देता हूँ, और मैंने उसकी विषय-वस्तु को ध्यानपूर्वक देखा है; यद्यपि भारत में व्यापक भ्रमण तथा प्रचार-यात्रा के कारण अब तक मुझे आपको विस्तार से उत्तर देने का अवसर नहीं मिला। आपकी शिकायत यह है कि कैलिफ़ोर्निया में आप मेरे दो युवा शिष्यों से मिलीं और वे आपको उन लोगों के प्रति \"अत्यन्त नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले\" प्रतीत हुए जिनसे वे मिलते हैं। निःसन्देह, मैं इस प्रकरण को तथा परिस्थितियों को नहीं जानता, किन्तु मेरे प्रिय शिष्यों की ओर से किसी भी अकृपा अथवा अविवेक के लिए कृपया उन्हें क्षमा कर दें। आखिरकार, भगवान् की सेवा हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन त्याग देना सरल बात नहीं है, और माया, अर्थात् वह भ्रामक भौतिक ऊर्जा, उन लोगों को पुनः बन्दी बनाने का विशेष रूप से कठोर प्रयत्न करती है जिन्होंने भक्त बनने हेतु उसकी सेवा त्याग दी है। अतः माया के आक्रमण को सहने तथा प्रलोभन की सभी अवस्थाओं में दृढ़ बने रहने के लिए, भक्ति की नवदीक्षित अवस्था में स्थित युवा अथवा अनुभवहीन भक्त कभी-कभी उन वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के विरुद्ध एक भाव अपना लेते हैं, जो सम्भवतः उनकी कोमल भक्ति-लता हेतु हानिकर अथवा संकटकारी हो सकते हैं। वे अपनी रक्षा हेतु ऐसे भावों में अति तक भी कर सकते हैं, और इस प्रकार कुछ अभक्तों को — जो स्वयं सम्भवतः अब भी माया की भौतिक ऊर्जा से अत्यधिक मोहित हैं — वे नकारात्मक अथवा निराशावादी प्रतीत होंगे।\n\nकिन्तु वास्तविक तथ्य यह है कि यह भौतिक जगत् एक दुःखमय, नकारात्मक स्थान है, जो पग-पग पर संकट से भरा है; यह *दुःखालयम् अशाश्वतम्* [Bg. 8.15] है, अर्थात् मृत्यु, जन्म, रोग तथा वृद्धावस्था का एक क्षणिक निवास, केवल पीड़ा तथा कष्ट का घर। इन वस्तुओं को जैसी वे हैं वैसा समझने के स्तर पर पहुँचना अत्यन्त सामान्य बात नहीं है, अतएव जो व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेते हैं उन्हें \"महात्मा\" कहा गया है।\n\nmām upetya punar janma\n\nduḥkhālayam aśāśvatam\n\nnāpnuvanti mahātmānaḥ\n\nsaṁsiddhiṁ paramāṁ gatāḥ\n\n[Bg. 8.15]\n\nइसका अर्थ है कि जिन्होंने यह समझ लिया है कि भौतिक जगत् दुःख तथा क्षणभंगुरता के स्थान हैं (*दुःखालयम् अशाश्वतम्* [Bg. 8.15]), वे यहाँ पुनः कभी नहीं लौटते, और क्योंकि वे *महात्मानः*, अर्थात् महान् आत्माएँ हैं, श्रीकृष्ण उन्हें अपने पास रखते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने को शुद्ध भक्त बनाकर इस गन्दे स्थान से बच निकलने योग्य बना लिया है। यह श्लोक स्वयं श्रीकृष्ण, अर्थात् साक्षात् ईश्वर ने *भगवद्गीता* (8.15) में कहा है। इससे अधिक अन्तिम प्रमाण और कौन हो सकता है? तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने हेतु, मनुष्य को प्रत्येक भौतिक वस्तु को निराशावादी दृष्टि से देखना चाहिए — जब तक कि उसका उपयोग श्रीकृष्ण की सेवा तथा प्रसन्नता हेतु न किया जाए। हम इस स्थूल पदार्थ के क्षेत्र के भीतर अपनी गहनतम लालसाओं हेतु किसी स्थायी सुख अथवा सन्तोष की अधिक आशा नहीं रखते।\n\nआप अपने पत्र में कई बार \"प्रेम\" शब्द का सन्दर्भ देती हैं, किन्तु वास्तविक तथ्य यह है कि इस भौतिक जगत् में प्रेम नहीं है। वह मिथ्या प्रचार है। यहाँ जिसे वे प्रेम कहते हैं, वह केवल काम है, अर्थात् व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की इच्छा :\n\nkāma eṣa krodha eṣa\n\nrajo-guṇa-samudbhavaḥ\n\nmahāśano mahā-pāpmā\n\nviddhy enam iha vairiṇam\n\nश्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन से कहते हैं कि \"यह केवल काम है… जो इस संसार का सर्वभक्षी, पापमय शत्रु है।\" (Bg. 3.37) वैदिक भाषा में भौतिकतावादी \"प्रेम\" के लिए — जैसा कि हम आजकल उसे कहते हैं — कोई शब्द नहीं है। *काम* शब्द काम अथवा भौतिक इच्छा का वर्णन करता है, प्रेम का नहीं; किन्तु वास्तविक प्रेम के लिए जो शब्द हमें *वेदों* में मिलता है वह *प्रेमा* है, अर्थात् केवल ईश्वर के प्रति प्रेम। ईश्वर से प्रेम के अतिरिक्त प्रेम की कोई सम्भावना नहीं है। बल्कि, केवल कामपूर्ण इच्छा ही है। पदार्थ के इस वातावरण के भीतर, मानवीय क्रियाओं की समूची परिधि — और केवल मनुष्यों की ही प्रत्येक क्रिया नहीं अपितु समस्त जीवों की — काम-इच्छा, अर्थात् नर तथा नारी के बीच आकर्षण, पर आधारित है, उसी से प्रेरणा पाती है और इस प्रकार दूषित होती है। उसी काम-जीवन के लिए समूचा ब्रह्माण्ड घूम रहा है — और कष्ट भोग रहा है! यही कठोर सत्य है। यहाँ तथाकथित प्रेम का अर्थ है कि \"तुम मेरी इन्द्रियों को तृप्त करो, मैं तुम्हारी इन्द्रियों को तृप्त करूँगा,\" और ज्यों ही वह तृप्ति रुकती है, तत्क्षण ही विवाह-विच्छेद, वियोग, कलह तथा घृणा उत्पन्न हो जाती है। प्रेम की इस मिथ्या धारणा के अन्तर्गत इतनी सारी बातें चल रही हैं। वास्तविक प्रेम का अर्थ है ईश्वर, श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम।\n\nप्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रेम-प्रवृत्ति को किसी ऐसे लक्ष्य में टिकाना चाहता है जो उसकी दृष्टि में योग्य हो। किन्तु प्रश्न केवल अज्ञान का है, क्योंकि लोगों के पास इस विषय में अत्यल्प ज्ञान है कि वह परम प्रेमास्पद वस्तु — जो वास्तव में उनका प्रेम स्वीकार करने तथा उसका प्रतिदान देने योग्य है — कहाँ मिले। लोग बस जानते ही नहीं। समुचित जानकारी नहीं है। ज्यों ही आपकी किसी भौतिक वस्तु में आसक्ति होती है, वह आपके मुख पर ठोकर मारेगी, जर्जर होगी और आपको निराश करेगी। वह निश्चय ही आपको असन्तुष्ट तथा हताश करेगी। यह तथ्य है। किन्तु आपके देश के, तथा सारे संसार के ये युवक यह स्वीकार कर रहे हैं, \"हाँ, यह तथ्य है,\" और वे श्रीकृष्ण से सही जानकारी प्राप्त कर रहे हैं :\n\nbahūnāṁ janmanām ante\n\njñānavān māṁ prapadyate\n\nvāsudevaḥ sarvam iti\n\nsa mahātmā sudurlabhaḥ\n\n\"अनेक जन्मों तथा मृत्युओं के पश्चात्, जो वास्तव में ज्ञानवान् है वह मुझे समस्त कारणों का कारण तथा जो कुछ है उस सबका मूल जानकर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसी महान् आत्मा अत्यन्त दुर्लभ है।\" (Bg. 7.19) पुनः श्रीकृष्ण उसी शब्द *महात्मा*, अर्थात् महान् आत्मा, का प्रयोग करते हैं। अतः हमारे जिन भक्तों से आप मिली हैं वे साधारण लड़के-लड़कियाँ नहीं हैं। नहीं। उन्हें वास्तव में ज्ञानवान्, महान् आत्माएँ माना जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अनेक जन्मों में भौतिक जीवन के दुःखमय रोग का अनुभव किया है और उससे विरक्त हो गए हैं। अतः वे उच्चतर ज्ञान खोज रहे हैं — वे कुछ श्रेष्ठतर खोज रहे हैं — और जब वे श्रीकृष्ण को पाते हैं तथा उनकी शरण लेते हैं, तब वे *महात्मा* बन जाते हैं, जो वास्तव में ज्ञान में स्थित होते हैं। यह भौतिक जगत् ठीक एक कारागार के समान है; यह एक दण्ड-स्थान है जिसका प्रयोजन हमें उस बिन्दु तक लाना है जहाँ हम विरक्त हो जाएँ, अन्ततः श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करें, और आनन्द तथा पूर्ण ज्ञान में नित्य जीवन की अपनी मूल प्रकृति को पुनः प्राप्त करें। अतः यह इन भक्तों का गौरव है कि उन्होंने वह कर दिखाया है जो *सुदुर्लभः* है, अर्थात् मानव-समाज में समस्त मनुष्यों में अत्यन्त दुर्लभ।\n\nश्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करके मनुष्य वह अन्तिम वस्तु पा लेगा जिसमें वह अपना प्रेम निवेशित कर सके : ईश्वर। ईश्वर के प्रति प्रेम प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है, ठीक जैसे एक अनजली दियासलाई में अग्नि — किन्तु वह ढका हुआ है। परन्तु यदि मनुष्य किसी प्रकार से ईश्वर के प्रति अपने सुप्त प्रेम को विकसित कर ले, और श्रीकृष्ण उसके परम आराध्य लक्ष्य, परम मित्र, परम स्वामी अथवा परम प्रियतम बन जाएँ, तो वह फिर कभी निराश अथवा दुःखी नहीं होगा। बल्कि, क्योंकि उसकी प्रेम-प्रवृत्ति यथोचित रूप से स्थापित है :\n\nmac-cittā mad-gata-prāṇā\n\nbodhayantaḥ parasparam\n\nkathayantaś ca māṁ nityaṁ\n\ntuṣyanti ca ramanti ca\n\n(Bg. 10.9)\n\nजिस भक्त का जीवन श्रीकृष्ण को समर्पित है, वह सदा \"महान् सन्तोष तथा आनन्द\" का अनुभव करता रहता है, और वह निरन्तर प्रबुद्ध रहता है, सदा सकारात्मक रहता है, नकारात्मक नहीं, जैसा कि आप कहती हैं। उन्नत भक्त सबका मित्र होता है। *योग-युक्तो विशुद्धात्मा*, अर्थात् श्रीकृष्ण की प्रेममयी भक्ति में संलग्न शुद्ध आत्मा, *सर्व-भूतात्म-भूतात्मा* होती है, सबको प्रिय, और सब उसे प्रिय। अन्यत्र श्रीकृष्ण कहते हैं कि *यो मद्-भक्तः स मे प्रियः*, अर्थात् उनका भक्त, जो उन्हें अत्यन्त प्रिय है, *अद्वेष्टा सर्व-भूतानां मैत्रः करुण एव च*, अर्थात् द्वेष नहीं करता अपितु समस्त जीवों का दयालु मित्र है। इसके अतिरिक्त, भक्त को सबके प्रति समदर्शी माना जाता है (*पण्डिताः सम-दर्शिनः* [Bg. 5.18])। वह कभी भेद नहीं करता, यह कहते हुए कि \"यह अच्छा है, यह बुरा है।\" नहीं।\n\nये कृष्णभावनामृत की अधिक उन्नत अवस्थाओं के वर्णन हैं, जिन्हें भक्त परिपक्व ज्ञान के विकास से प्राप्त करते हैं। वर्तमान में हमारे अनेक विद्यार्थी युवक हैं। वे क्रमशः सीख रहे हैं, और यह प्रक्रिया इतनी प्रभावकारी, सुनिश्चित तथा प्रामाणिक है कि यदि वे इस पर डटे रहें तो वे उस सही बिन्दु तक पहुँच जाएँगे, अर्थात् प्रेम के, जैसा आप कहती हैं। किन्तु वह प्रेम भौतिक नहीं है, अतः उसे साधारण, लौकिक व्यवहारों के मिथ्या, भावुक स्तर पर नहीं आँका जाना चाहिए। यही हमारा तात्पर्य है। अतएव यह कहना कि वे प्रेम नहीं करते, भौतिकतावादियों की दृष्टि से सत्य हो सकता है। उन्होंने परिवार, मित्रों, पत्नी, देश, जाति आदि के प्रति स्नेह त्याग दिया है, जो सब जीवन की देहात्म-बुद्धि, अर्थात् क्षणभंगुर इन्द्रियतृप्ति, पर आधारित है। वे माया के प्रेम, अर्थात् काम, से कुछ-कुछ विरक्त हो गए हैं, और वे श्रीकृष्ण का प्रेम, अर्थात् अनन्त, पूर्णतः फलदायी प्रेम चाहते हैं, किन्तु अभी तक वे उस बिन्दु तक विकसित नहीं हुए हैं, बस इतना ही। हम यह आशा नहीं कर सकते कि आपके देशवासी, जो इतनी सारी बुरी आदतों के अभ्यस्त हैं, सहसा माँस खाना, मादक पदार्थ लेना, अवैध काम-जीवन, तथा इतनी सारी अन्य गन्दी बातें त्याग देंगे, और रातोंरात महान्, आत्म-साक्षात्कारी आत्माएँ बन जाएँगे। यह सम्भव नहीं है। यह कल्पनालोक है। किन्तु केवल श्रीकृष्ण के भक्त के रूप में दीक्षित होना ही मनुष्य को मानव-समाज की सर्वोच्च श्रेणी में रख देता है। *स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्न-कर्म-कृत्* : [Bg. 4.18] \"वह मानव-समाज में बुद्धिमान् है। वह सब प्रकार के कार्यों में संलग्न रहकर भी दिव्य स्थिति में है।\" और यद्यपि ऐसा भक्त अभी आध्यात्मिक बोध के उच्चतम स्तर तक उन्नत न हुआ हो, तथापि उसे — किसी भी क्षणिक दुर्बलता के बावजूद — सर्वाधिक उन्नत व्यक्ति माना जाना चाहिए।\n\napi cet su-durācāro\n\nbhajate mām ananya-bhāk\n\nsādhur eva sa mantavyaḥ\n\nsamyag vyavasito hi saḥ\n\n\"यदि कोई भक्त अत्यन्त निन्दनीय कर्म भी कर बैठे, तो भी उसे साधु माना जाना चाहिए, क्योंकि वह यथोचित रूप से स्थित है।\" (Bg. 9.30) जैसा आप कहेंगी, \"भूल करना मानवीय है।\" अतः नवदीक्षित अवस्था में हम सदा कुछ विसंगतियों की अपेक्षा कर सकते हैं। कृपया इस वस्तु को इसी प्रकाश में देखें और उनकी छोटी-छोटी भूलें क्षमा कर दें। बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपने प्राण भी, श्रीकृष्ण को दे दिए हैं — और यह कभी भूल नहीं है।\n\nआपका सदा हितैषी,\n\nA. C. Bhaktivedanta Swami\n\nजो श्रेष्ठतम तथा सुन्दरतम है उसका बोध\n\nमई 1974 के दौरान, प्रसिद्ध आयरिश कवि Desmond James Bernard O'Grady ने रोम में श्रील प्रभुपाद के निवास पर उनसे भेंट की, और दोनों के बीच एक दीर्घ तथा सजीव चर्चा हुई। अन्य बातों के साथ-साथ, इस आध्यात्मिक नेता तथा कवि ने व्यक्तिगत पहचान तथा व्यक्तिगत कर्तव्य, युद्ध का अन्त करने, आधुनिक शिक्षा तथा उसकी समस्याओं, समय से परे जीवन, तथा प्रेम के मूल स्वरूप पर चर्चा की।\n\nMr. O'Grady : *भगवद्गीता* का आपका संस्करण अत्यन्त उत्तम है।\n\nŚrīla Prabhupāda : यह दो वर्षों में पाँचवाँ संस्करण है।\n\nMr. O'Grady : हरे कृष्ण आन्दोलन किस देश में सर्वाधिक सफल रहा है?\n\nŚrīla Prabhupāda : सर्वत्र। अफ़्रीका, अमेरिका, कनाडा, जापान, चीन में। किन्तु वास्तव में यह अमेरिका में सर्वाधिक सफल रहा है। अनेक अमेरिकियों ने कृष्णभावनामृत को अपनाया है।\n\nMr. O'Grady : यहाँ रोम में क्या स्थिति है? क्या आपको पुलिस से समस्याएँ हुईं?\n\nŚrīla Prabhupāda : हमें सर्वत्र समस्याएँ होती हैं। पुलिस कभी-कभी हमें परेशान करती है, किन्तु प्रायः वे थक जाते हैं और अन्ततः कुछ नहीं करते। [हँसी।]\n\nMr. O'Grady : व्यवस्था हार मान जाती है? यह तो अद्भुत है। मैं स्वयं इस व्यवस्था से बहुत थक गया हूँ। वर्तमान स्थिति में कुछ गड़बड़ है। शायद आप मुझे कुछ परामर्श दे सकें कि इस व्यवस्था को कैसे परास्त किया जाए।\n\nŚrīla Prabhupāda : आप आयरिश लोग! आप कभी लड़ने से नहीं थकते।\n\nMr. O'Grady : नहीं। [हँसी।] यह हमारे भीतर है।\n\nŚrīla Prabhupāda : वास्तव में, यह लड़ाई निरन्तर चलती ही रही है।\n\nMr. O'Grady : अच्छा, आप सुझाव देते हैं कि हम इसके विषय में क्या करें? मेरा अभिप्राय है, क्या यह मेरे लिए नैतिक रूप से उचित है कि मैं यहाँ बैठा रहूँ…\n\nŚrīla Prabhupāda : जब तक हम जीवन की देहात्म-बुद्धि से भ्रमित रहते हैं, यह सोचते हुए कि हम ये शरीर हैं, एक व्यक्ति यह सोचता है \"मैं आयरिश हूँ,\" दूसरा सोचता है \"मैं इतालवी हूँ,\" \"…अमेरिकी,\" \"…भारतीय,\" इत्यादि — जब तक यह चलता रहेगा, लड़ाई चलती रहेगी। आप कुत्तों तथा बिल्लियों के बीच लड़ाई नहीं रोक सकते। वे क्यों लड़ते हैं? कुत्ता बस यह सोचता है, \"मैं एक बड़ा कुत्ता हूँ।\" और बिल्ली सोचती है, \"मैं एक बड़ी बिल्ली हूँ।\" इसी प्रकार, यदि हम सोचते हैं, \"मैं एक आयरिश हूँ\" अथवा \"मैं एक अंग्रेज़ हूँ,\" तो हम इन बिल्लियों तथा कुत्तों से अच्छे नहीं हैं। जब तक लोग जीवन की देहात्म-बुद्धि में बने रहेंगे, लड़ाई होती रहेगी।\n\nMr. O'Grady : महात्मा गाँधी House of Commons में किससे लड़ रहे थे?\n\nŚrīla Prabhupāda : वह एक और कुत्ता-वाद था। कोई अन्तर नहीं है। कुत्ता सोचता है, \"मैं एक कुत्ता हूँ,\" क्योंकि उसके पास एक कुत्ते का शरीर है। यदि मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं भारतीय हूँ क्योंकि यह शरीर भारतीय भूमि पर जन्मा है, तो मैं कुत्ते से किस प्रकार भिन्न हूँ? जीवन की देहात्म-बुद्धि बस पशुता है। जब हम समझ लेते हैं कि हम ये शरीर नहीं अपितु आत्माएँ हैं, तब शान्ति होगी। अन्यथा कोई शान्ति नहीं हो सकती। *स एव गो-खरः* [SB 10.84.13]। वैदिक साहित्य कहता है कि जीवन की देहात्म-बुद्धि में स्थित व्यक्ति ठीक एक गाय अथवा गधे के समान है। लोगों को आत्मा की इस निम्न धारणा से ऊपर उठना होगा। यह कैसे किया जाता है?\n\nmāṁ ca yo 'vyabhicāreṇa\n\nbhakti-yogena sevate\n\nsa guṇān samatītyaitān\n\nbrahma-bhūyāya kalpate\n\n\"जो अनन्य भक्तियोग की आध्यात्मिक क्रियाओं में संलग्न होता है, वह तत्क्षण प्रकृति के गुणों से ऊपर उठ जाता है और आध्यात्मिक स्तर पर उन्नत हो जाता है।\" (*भगवद्गीता* 14.25)\n\nहमारे समाज में अनेक मेक्सिकन, कनाडियन, भारतीय, यहूदी तथा मुसलमान हैं, किन्तु वे अब अपने को मुसलमान, ईसाई, यहूदी अथवा कुछ और नहीं मानते। वे सब श्रीकृष्ण के सेवक हैं। यही ब्रह्म-साक्षात्कार है।\n\nMr. O'Grady : यह भी तो उसे एक नाम देना है।\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ, एक नाम तो होना ही चाहिए। किन्तु यद्यपि, उदाहरणार्थ, आपका नाम किसी अन्य आयरिश व्यक्ति के नाम से भिन्न है, फिर भी आप सब यह अनुभव करते हैं कि आप आयरिश हैं। किसी का नाम भिन्न हो सकता है, किन्तु इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। गुण एक होना चाहिए। यही अपेक्षित है। जब हम श्रीकृष्ण का गुण प्राप्त कर लेते हैं, तब भिन्न-भिन्न नामों के बावजूद, शान्ति होगी। इसे *सो ऽहम्* कहते हैं। किसी राष्ट्र में विभिन्न लोगों के नाम भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सभी लोग एक ही राष्ट्रीयता का अनुभव करते हैं। विविधताएँ रह सकती हैं, किन्तु यदि गुण एक हो, तो वही एकत्व है, *ब्रह्म-भूत*।\n\nbrahma-bhūtaḥ prasannātmā\n\nna śocati na kāṅkṣati\n\nsamaḥ sarveṣu bhūteṣu\n\nmad-bhaktiṁ labhate parām\n\n\"जो इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित होता है, वह तत्क्षण परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह न तो कभी शोक करता है और न ही किसी वस्तु की कामना करता है; वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।\" (Bg. 18.54)\n\nयह संसार भौतिक रूप से संक्रमित व्यक्ति के लिए दुःखमय है, किन्तु भक्त के लिए समूचा संसार वैकुण्ठ के समान ही उत्तम है। निर्विशेषवादी के लिए, ब्रह्म-अवस्था प्राप्त करना, अर्थात् परब्रह्म से एकाकार हो जाना, अन्तिम लक्ष्य है।\n\nMr. O'Grady : क्या परम सत्य बाह्य है अथवा आन्तरिक?\n\nŚrīla Prabhupāda : न तो बाह्य है और न ही आन्तरिक। परम सत्य द्वैत-रहित है।\n\nMr. O'Grady : ठीक है, किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर…\n\nŚrīla Prabhupāda : हम परम नहीं हैं। जब हम परम स्तर पर स्थित होते हैं, तब हम परम होते हैं। तथापि, इस समय हम सापेक्ष जगत् में हैं। परम सत्य यहाँ भी है, किन्तु हमारी इन्द्रियाँ उस परम सत्य को समझने योग्य पर्याप्त रूप से उन्नत नहीं हैं। जब तक हम समय के नियन्त्रण में हैं, तब तक परम बनने का प्रश्न ही नहीं उठता।\n\nMr. O'Grady : तो \"परम\" का अर्थ है समय से परे जीवन?\n\nŚrīla Prabhupāda : यह *भगवद्गीता* (4.9) में कहा गया है :\n\njanma karma ca me divyam\n\nevaṁ yo vetti tattvataḥ\n\ntyaktvā dehaṁ punar janma\n\nnaiti mām eti so 'rjuna\n\n\"जो मेरे अवतरण तथा कर्मों के दिव्य स्वरूप को जान लेता है, वह शरीर त्यागने पर इस भौतिक जगत् में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है, हे अर्जुन।\"\n\nयही परम है — घर वापस जाना, भगवद्धाम वापस जाना। जब तक मनुष्य भौतिक जगत् में है और इस शरीर से तादात्म्य करता है, तब तक वह एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करता रहता है। वह परम नहीं है। यह यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है। जब मनुष्य आध्यात्मिक जगत् को वापस जाता है, तब वह परम स्थिति प्राप्त करता है।\n\nMr. O'Grady : ठीक है, किन्तु मेरा प्रश्न यह है : क्या हमारे लिए यहाँ बैठे रहना पर्याप्त है — आप वहाँ बैठे हैं और हम मित्रों की भाँति आपके साथ बैठकर वार्तालाप की सौम्य कला में संलग्न हैं, जबकि समुद्र-पार…\n\nŚrīla Prabhupāda : आप जो बात चूक गए वह यह है कि यद्यपि आप एक स्थान पर बैठे हैं और मैं भिन्न स्थान पर बैठा हूँ, यह अन्तर हमारे वास्तविक अस्तित्व को प्रभावित नहीं करता। हम दोनों मनुष्य हैं। \"आयरिश,\" \"अंग्रेज़,\" \"प्रोटेस्टैंट,\" \"कैथोलिक,\" इत्यादि की धारणाएँ बस भिन्न-भिन्न वस्त्र हैं। मनुष्य को इन उपाधियों से मुक्त होना होगा। जब मनुष्य इस प्रकार मुक्त हो जाता है, तब वह शुद्ध हो जाता है।\n\nsarvopādhi-vinirmuktaṁ\n\ntat-paratvena nirmalam\n\nhṛṣīkeṇa hṛṣīkeśa-\n\nsevanaṁ bhaktir ucyate\n\n[Cc. Madhya 19.170]\n\n(*Bhakti-rasāmṛta-sindhu* 1.1.12)\n\nजब आप अपनी इन्द्रियों को शुद्ध कर लेते हैं और उन शुद्ध इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न कर देते हैं, तब आपने अपना जीवन सिद्ध कर लिया है। यही अद्वैत है, और यही परम है।\n\nMr. O'Grady : किन्तु यह व्यवस्था यह आग्रह करती है कि आप अपने को अमेरिकी अथवा भारतीय अथवा अफ़्रीकी अथवा जो कुछ भी समझें।\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ। भौतिकतावादी समाज का अर्थ है द्वैत।\n\nMr. O'Grady : किन्तु यह तो अपरिहार्य है। आप भौतिक अस्तित्व से कैसे बच सकते हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda : यह कृष्णभावनामृत में सम्भव है। कमल जल में रहता है किन्तु जल को कभी स्पर्श नहीं करता।\n\nMr. O'Grady : मेरे विचार से आप एक क्षेत्र की स्थितियों को दूसरे क्षेत्र के रूपकों से नहीं समझा सकते। आप राजनीतिक समस्याओं पर अस्पष्ट आध्यात्मिक धारणाओं के आधार पर कैसे तर्क कर सकते हैं? उनका स्वभाव पूर्णतः भिन्न है।\n\nŚrīla Prabhupāda : कभी-कभी विविध उदाहरण किसी समस्या को बेहतर समझने अथवा सराहने में हमारी सहायता करते हैं। फूलदान में विविध फूल होते हैं, और वह विविधता फूलों के विचार को बेहतर सराहने में हमारी सहायता करती है। किसी भी दृष्टि से देखें, श्रीकृष्ण समस्त समस्याओं को सुलझा सकते हैं। केवल आयरिश अथवा अंग्रेज़ों की समस्याएँ ही क्यों? समस्त समस्याएँ। इसे विविधता में एकता कहते हैं। हमारे विद्यार्थी भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमियों से आते हैं, किन्तु क्योंकि वे सब कृष्णभावनामृत में हैं, वे एकीकृत हैं।\n\nMr. O'Grady : बहुत अच्छा। हाँ, मैं इसे स्वीकार करता हूँ। तथापि, मैं यह जानना चाहूँगा कि जब आप \"कृष्णभावनामृत\" कहते हैं, तो क्या उसमें और क्राइस्ट-चेतना में कोई अन्तर है?\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं, कोई अन्तर नहीं है। ईसा मसीह ईश्वर का सन्देश प्रचार करने आए थे। यदि आप वास्तव में क्राइस्ट-भावनाभावित बन जाते हैं, तो आप कृष्णभावनाभावित बन जाते हैं।\n\nMr. O'Grady : और क्या कृष्णभावनाभावित अथवा ईश्वर-भावनाभावित बनने का अर्थ है आत्म-भावनाभावित बनना? अर्थात्, इस बात के प्रति सचेत बनना कि हम वास्तव में कौन हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ, ईश्वर-चेतना में आत्म-चेतना सम्मिलित है, किन्तु आत्म-चेतना आवश्यक रूप से ईश्वर-चेतना नहीं है।\n\nMr. O'Grady : किन्तु हो सकती है?\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं।\n\nMr. O'Grady : मनुष्य उस ईश्वर के प्रति चेतना प्राप्त कर सकता है जो भीतर है।\n\nŚrīla Prabhupāda : इसका अर्थ है कि वह ईश्वर-भावनाभावित है। आप इस समय सूर्य-प्रकाश में हैं, और सूर्य के प्रति चेतना में आपकी अपने को देखने की सामर्थ्य सम्मिलित है। अन्धकार में आप अपने को नहीं देख सकते। रात में आप अपने हाथ अथवा पैर तक नहीं देख सकते, किन्तु यदि आप सूर्य के सम्मुख आते हैं, तो आप सूर्य को तथा अपने को भी देखते हैं। सूर्य-प्रकाश के बिना, ईश्वर-चेतना के बिना, आत्म-चेतना अपूर्ण है। तथापि, ईश्वर-चेतना आत्म-चेतना को अत्यन्त स्पष्ट कर देती है।\n\nMr. O'Grady : हम अपने शिक्षण-व्यवसाय में अनेक युवाओं से मिलते हैं, और हम उन्हें किसी प्रकार की उपदेशात्मक मुक्ति सिखाने का प्रयत्न नहीं करते। हम उन्हें इस बात के बोध की ओर निर्देशित करने का प्रयत्न करते हैं कि उनके आसपास के संसार में जो श्रेष्ठतम है, जो सर्वाधिक सुन्दर है तथा जो आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक पोषक है — अर्थात्, जहाँ तक यह व्यवस्था हमें अनुमति देती है। प्रायः विद्यार्थी आध्यात्मिक स्थिति में होने योग्य पर्याप्त तटस्थ नहीं होते; वे अधिकतर भावनात्मक अवस्था में होते हैं। हमारा सामना प्रायः इस मूल प्रश्न से होता है कि \"मैं कौन हूँ?\" अथवा \"यह सब क्या है?\"\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ।\n\nMr. O'Grady : अथवा वे पूछते हैं, \"मैं यहाँ क्यों हूँ?\"\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ, बहुत अच्छा।\n\nMr. O'Grady : हमसे पूछा जाता है, \"मुझे यहाँ क्यों होना चाहिए? आप कौन हैं, शिक्षक, और आपको क्या अधिकार है कि हमें बताएँ कि क्या सोचें अथवा क्या बनें अथवा क्या न बनें? मैं Shakespeare को क्यों पढ़ूँ? मैं Mozart को क्यों सुनूँ? मुझे Bob Dylan अधिक प्रिय है।\" इस प्रकार के प्रश्न एक अत्यन्त मोहभंग की मनःस्थिति से, तथा असुरक्षा, अनिश्चितता, और वस्तुओं की समूची संरचना में — जैसी वे हैं — विश्वसनीयता के अभाव से उत्पन्न प्रतीत होते हैं। प्रायः हमें इन प्रश्नों का उत्तर एक प्रकार से उथल-पुथल भरे ढंग से देना पड़ता है। प्रत्यक्ष उत्तर प्रस्तुत करने के बजाय, हमें परोक्ष रूप से उत्तर देना पड़ता है, उस संस्कार को ध्यान में रखते हुए जिसने विद्यार्थियों को आरम्भ में ये प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया। क्या आपके विचार से हमें उन तक अधिक प्रत्यक्ष रूप से पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए?\n\nŚrīla Prabhupāda : आप जिस समस्या की बात कर रहे हैं वह है…\n\nMr. O'Grady : आधुनिक शिक्षा।\n\nŚrīla Prabhupāda : हाँ। इतने सारे प्रश्न हैं, किन्तु आधुनिक शिक्षा उनका उत्तर नहीं देती। \"मैं यहाँ क्यों आया हूँ? प्रयोजन क्या है?\" इन प्रश्नों का पूर्ण रूप से उत्तर दिया जाना चाहिए। अतः *वेद* आदेश देते हैं : *तद्-विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्* [MU 1.2.12]। इन सब प्रश्नों के उत्तर पाने हेतु, मनुष्य को एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना चाहिए।\n\nMr. O'Grady : यदि आपके पास कोई न हो तो? यदि हमें बताया जाए कि Mr. Nixon ही प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु हैं, तो? हम क्या करें?\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं, नहीं। [हँसी।] प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरुओं के लिए एक मानदण्ड है। आपने श्लोक की केवल एक पंक्ति ही सुनी है। आध्यात्मिक गुरु कौन है? वह अगली पंक्ति में है : *श्रोत्रियं ब्रह्म-निष्ठम्* [MU 1.2.12]। *श्रोत्रियम्* शब्द उसका द्योतक है जिसने किसी अन्य प्रामाणिक स्रोत से सुना है। आध्यात्मिक गुरु वह है जिसने किसी अन्य योग्य आध्यात्मिक गुरु से सन्देश ग्रहण किया है। यह ठीक एक चिकित्सक के समान है जिसने किसी अन्य चिकित्सक से चिकित्सा-विज्ञान का ज्ञान ग्रहण किया है। इसी प्रकार, प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को क्रमिक आध्यात्मिक गुरुओं की परम्परा में आना चाहिए। मूल आध्यात्मिक गुरु ईश्वर हैं।\n\nMr. O'Grady : हाँ। मान लिया।\n\nŚrīla Prabhupāda : जिसने ईश्वर से सुना है, वह वही सन्देश अपने शिष्यों को समझाता है। यदि शिष्य उस सन्देश को नहीं बदलता, तो वह एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु है। यही हमारी प्रक्रिया है। हम श्रीकृष्ण, अर्थात् ईश्वर, से सुनकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, और उनसे यह समझते हैं कि कौन पूर्ण है। अथवा हम उनके प्रतिनिधि से सुनते हैं, जो श्रीकृष्ण का खण्डन नहीं करता और जिसने उनके सन्देश का साक्षात्कार किया है। ऐसा नहीं है कि हम एक बात कहें और सब निरर्थक कार्य करें। जो ऐसा करता है, वह आध्यात्मिक गुरु नहीं है।\n\nMr. O'Grady : अब वहाँ मेरे बेचारे वृद्ध पिता हैं, जो आयरलैंड के पश्चिम में रहते हैं। एक सीधे-सादे वृद्ध व्यक्ति, अब अठहत्तर वर्ष के, आपकी पीढ़ी के। वे अपनी आयु में इस बिन्दु तक पहुँच गए हैं जहाँ वे कहते हैं, \"वे मुझे बताते हैं, ये पादरी, वे अन्ततः मुझे बताते हैं कि यह तो ईश्वर ही जानते हैं। किन्तु मैं जानना चाहता हूँ कि ईश्वर को किसने बताया।\" फिर वे मेरे पास आकर कहते हैं, \"तुम विद्यालय गए, और तुमने पुस्तकें पढ़ीं। मुझे बताओ, ईश्वर को किसने बताया?\" तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। यही अठहत्तर तथा उनतालीस वर्ष के बीच का अन्तर है।\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं, यह आयु का अन्तर नहीं है। अन्तर ज्ञान का है। *ब्रह्म-सूत्र* में यह प्रश्न उठाया गया है : ईश्वर कौन हैं? सर्वप्रथम यही प्रश्न है।\n\nMr. O'Grady : ईश्वर को किसने सिखाया?\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं। सर्वप्रथम यह प्रश्न है कि ईश्वर कौन हैं। तत्पश्चात् हम पूछेंगे कि ईश्वर को किसने सिखाया। *वेदान्त-सूत्र* कहता है, *अथातो ब्रह्म जिज्ञासा* : अब हमें यह जिज्ञासा करनी चाहिए कि ईश्वर कौन हैं। जब तक आप यह न जानें कि ईश्वर कौन हैं, तब तक आप यह प्रश्न कैसे उठा सकते हैं कि ईश्वर को किसने उपदेश दिया? यदि आप ईश्वर को नहीं जानते, तो यह प्रश्न उठता ही नहीं कि ईश्वर को किसने उपदेश दिया। क्या ऐसा नहीं है?\n\nMr. O'Grady : हाँ।\n\nŚrīla Prabhupāda : ईश्वर कौन हैं, यह *ब्रह्म-सूत्र* में समझाया गया है। *जन्माद्यस्य यतः* : [SB 1.1.1] ईश्वर वे हैं जिनसे सब कुछ उद्भूत होता है। यही ईश्वर हैं — वह परम सत्ता जिनसे सब कुछ उद्भूत होता है। अब, उस परम सत्ता का स्वभाव क्या है? क्या वे एक निर्जीव पत्थर हैं अथवा एक जीव? यह भी समझाया गया है। *जन्माद्यस्य यतो ऽन्वयाद् इतरतश् चार्थेष्व अभिज्ञः स्वराट्* (*श्रीमद्भागवत* 1.1.1) : वह परम सत्ता प्रत्येक वस्तु से, प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से, पूर्णतः अवगत है। जब तक वे प्रत्येक वस्तु से पूर्णतः अवगत न हों, तब तक वे ईश्वर नहीं हो सकते। तब वह प्रश्न आता है जो आपने उठाया, ईश्वर को किसने सिखाया? और इसका भी उत्तर दिया गया है। *स्वराट्* : वे पूर्णतः स्वतन्त्र हैं। उन्हें किसी से शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। यही ईश्वर हैं। यदि किसी को दूसरों से शिक्षा ग्रहण करनी पड़े, तो वह ईश्वर नहीं है। श्रीकृष्ण ने *भगवद्गीता* कही, और उन्हें इसे किसी से सीखना नहीं पड़ा। मुझे इसे अपने आध्यात्मिक गुरु से सीखना पड़ा, किन्तु श्रीकृष्ण को इसे किसी से सीखना नहीं पड़ा। जिसे दूसरों से शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है, वही ईश्वर है।\n\nMr. O'Grady : मानवीय प्रेम कहाँ से आता है?\n\nŚrīla Prabhupāda : प्रत्येक वस्तु ईश्वर से आ रही है। ईश्वर का अंश होने के कारण, हम आंशिक प्रेम प्रकट करते हैं, क्योंकि मूल प्रेम उनमें विद्यमान है। कोई वस्तु तब तक अस्तित्व में नहीं रह सकती जब तक वह ईश्वर में न हो; अतः प्रेम ईश्वर में विद्यमान है।\n\nMr. O'Grady : और प्रेम की अभिव्यक्तियाँ ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं?\n\nŚrīla Prabhupāda : जब तक प्रेम की प्रवृत्ति ईश्वर में न हो, तब तक हम उसे कैसे प्रकट कर सकते हैं? किसी विशेष पिता से जन्मे पुत्र में पिता के लक्षण होते हैं। क्योंकि प्रेम की प्रवृत्ति ईश्वर में है, अतः हमारे भीतर भी वही प्रवृत्ति है।\n\nMr. O'Grady : शायद आपके भीतर प्रेम आवश्यकता से उत्पन्न होता है।\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं, \"शायद\" का कोई प्रश्न नहीं है। हम ईश्वर को परम शब्दों में परिभाषित कर रहे हैं। *जन्माद्यस्य यतः* : [SB 1.1.1] ईश्वर वे हैं जिनसे सब कुछ उद्भूत हुआ है। संघर्ष की प्रवृत्ति भी ईश्वर में है, किन्तु उनका संघर्ष तथा उनका प्रेम परम हैं। भौतिक जगत् में हम यह अनुभव करते हैं कि संघर्ष प्रेम के ठीक विपरीत है, किन्तु ईश्वर में संघर्ष की प्रवृत्ति तथा प्रेम की प्रवृत्ति एक ही हैं। यही \"परम\" का अर्थ है। हम वैदिक शास्त्रों से सीखते हैं कि जब ईश्वर के तथाकथित शत्रु ईश्वर द्वारा मारे जाते हैं, तब वे मुक्ति प्राप्त करते हैं।\n\nMr. O'Grady : क्या ईश्वर के इस बोध तक अकेले पहुँचना सम्भव है?\n\nŚrīla Prabhupāda : नहीं। अतः हमने यह श्लोक उद्धृत किया है : *तद्-विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्* [MU 1.2.12]। *अभिगच्छेत्* शब्द का अर्थ है \"अवश्य।\" अकेले यह सम्भव नहीं है। संस्कृत व्याकरण में इसे क्रिया का *विधिलिङ्* रूप कहते हैं, और इस रूप का प्रयोग तब होता है जब कोई विकल्प न हो। *अभिगच्छेत्* शब्द का अर्थ है कि मनुष्य को गुरु की शरण में अवश्य जाना चाहिए। यही वैदिक आदेश है। अतः *भगवद्गीता* में आप पाएँगे कि अर्जुन श्रीकृष्ण से बात कर रहे थे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि बातें सुलझ नहीं रही थीं, तब उन्होंने श्रीकृष्ण के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया।\n\nkārpaṇya-doṣopahata-svabhāvaḥ\n\npṛcchāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-cetāḥ\n\nyac chreyaḥ syān niścitaṁ brūhi tan me\n\nśiṣyas te 'haṁ śādhi māṁ tvāṁ prapannam\n\n\"अब मैं अपने कर्तव्य के विषय में भ्रमित हूँ और दुर्बलता के कारण समस्त धैर्य खो बैठा हूँ। इस अवस्था में मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे स्पष्ट रूप से बताएँ कि मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है। अब मैं आपका शिष्य हूँ, और आपके शरणागत एक आत्मा हूँ। कृपया मुझे उपदेश दें।\" (Bg. 2.7) तो यहाँ हम देख सकते हैं कि अर्जुन अपने कर्तव्य के विषय में भ्रमित हैं।\n\nMr. O'Grady : क्या यह कर्तव्य स्वयं के प्रति है, दूसरों के प्रति है, अथवा राज्य के प्रति?\n\nŚrīla Prabhupāda : एक सैनिक का कर्तव्य शत्रु से युद्ध करना है। अर्जुन एक सैनिक थे, और श्रीकृष्ण ने उन्हें परामर्श दिया, \"विपक्ष तुम्हारा शत्रु है, और तुम एक सैनिक हो। तुम अहिंसक बनने का प्रयत्न क्यों कर रहे हो? यह अच्छा नहीं है।\" तब अर्जुन ने कहा, \"वास्तव में, मैं भ्रमित हूँ। इस भ्रम में मैं सही निर्णय नहीं ले सकता। अतः मैं आपको अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार करता हूँ। कृपया मुझे उचित उपदेश दें।\" अव्यवस्थित दशा में, जीवन की भ्रमित अवस्था में, मनुष्य को किसी अन्य की शरण में जाना चाहिए, जो उस विषय के पूर्ण ज्ञान में हो। आप वैधानिक समस्याओं को सुलझाने हेतु किसी अधिवक्ता के पास जाते हैं, और चिकित्सा-सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने हेतु किसी चिकित्सक के पास जाते हैं। भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक पहचान के विषय में भ्रमित है। अतः किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना हमारा कर्तव्य है, जो हमें वास्तविक ज्ञान दे सके।\n\nMr. O'Grady : मैं अत्यन्त भ्रमित हूँ।\n\nŚrīla Prabhupāda: अतः आपको किसी आध्यात्मिक गुरु के समीप जाना ही होगा।\n\nMr. O'Grady: और वे यह निर्णय करते हैं कि इस उलझन को रोकने में मेरी सहायता कैसे करें?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ, आध्यात्मिक गुरु वही हैं जो समस्त उलझन का समाधान कर देते हैं। यदि आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य को उलझन से नहीं बचा सकते, तो वे आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं। यही कसौटी है।\n\nsaṁsāra-dāvānala-līḍha-loka-\n\ntrāṇāya kāruṇya-ghanāghanatvam\n\nprāptasya kalyāṇa-guṇārṇavasya\n\nvande guroḥ śrī-caraṇāravindam **\n\nयह समूचा उलझा हुआ संसार ठीक एक धधकते दावानल के समान है। वन की अग्नि में सभी पशु उलझ जाते हैं। वे नहीं जानते कि अपने प्राण बचाने हेतु कहाँ जाएँ। भौतिक जगत् की धधकती अग्नि में प्रत्येक प्राणी उलझा हुआ है। उस धधकते दावानल को कैसे बुझाया जाए? इसके लिए न तो आपकी मनुष्य-निर्मित अग्निशमन-टुकड़ी का उपयोग सम्भव है, और न ही केवल बाल्टियों से जल उड़ेलना सम्भव है। समाधान तब आता है जब बादलों से वर्षा उस दावानल पर बरसती है। तभी वह अग्नि बुझ सकती है। वह सामर्थ्य आपके हाथों में नहीं, अपितु ईश्वर की कृपा में है। अतः मानव-समाज उलझी हुई दशा में है, और वह कोई समाधान नहीं पा सकता। आध्यात्मिक गुरु वही हैं जिन्होंने ईश्वर की कृपा प्राप्त की है, और वे उस उलझे हुए मनुष्य तक समाधान पहुँचा सकते हैं। जिसने ईश्वर की कृपा प्राप्त की है, वही आध्यात्मिक गुरु बन सकता है और उस कृपा को दूसरों तक पहुँचा सकता है।\n\nMr. O'Grady: समस्या तो इस आध्यात्मिक गुरु को पाने की है।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह समस्या नहीं है। समस्या यह है कि आप निष्ठावान् हैं या नहीं। आपको समस्याएँ हैं, किन्तु ईश्वर आपके हृदय के भीतर हैं। ईश्वरः सर्व-भूतानाम् [भ.गी. 18.61]। ईश्वर दूर नहीं हैं। यदि आप निष्ठावान् हैं, तो ईश्वर आपके पास आध्यात्मिक गुरु भेजते हैं। इसी कारण ईश्वर को चैत्य-गुरु भी कहा जाता है, अर्थात् हृदय के भीतर स्थित आध्यात्मिक गुरु। ईश्वर भीतर से तथा बाहर से, दोनों ओर से सहायता करते हैं। इस प्रकार सब कुछ भगवद्गीता में वर्णित है। यह भौतिक शरीर एक यन्त्र के समान है, किन्तु हृदय के भीतर आत्मा है, और आत्मा के साथ परमात्मा, अर्थात् श्रीकृष्ण हैं, जो दिशा-निर्देश देते हैं। भगवान् कहते हैं, \"तुम यह करना चाहते थे; अब यहाँ अवसर है। जाओ और करो।\" यदि आप निष्ठावान् हैं, तो आप कहते हैं, \"अब, हे ईश्वर, मुझे आप चाहिए।\" तब वे आपको दिशा-निर्देश देंगे। \"हाँ, अब तुम आओ और मुझे इस प्रकार प्राप्त करो।\" यह उनकी कृपा है। तथापि, यदि हम कुछ और चाहते हैं, तो वह भी ठीक है। हम उसे पा सकते हैं। ईश्वर अत्यन्त दयालु हैं। जब मैं कुछ चाहता हूँ, तब वे मेरे हृदय में रहकर मुझे दिशा देते हैं और बताते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाए। तो फिर वे आध्यात्मिक गुरु कैसे प्राप्त किया जाए, इसका दिशा-निर्देश क्यों नहीं देंगे? सर्वप्रथम हमें पुनः अपनी ईश्वर-भावना को जागृत करने हेतु उत्सुक होना चाहिए। तब ईश्वर हमें आध्यात्मिक गुरु प्रदान करेंगे।\n\nMr. O'Grady: आपका हार्दिक धन्यवाद।\n\nŚrīla Prabhupāda: आपका हार्दिक धन्यवाद। आपसे मेरा यह अनुरोध है। आप एक कवि हैं। केवल ईश्वर का वर्णन कीजिए। आप वर्णन करने में निपुण हैं, और इसी कारण मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि कृपया अपने व्यवसाय में ईश्वर का वर्णन कीजिए। तब आपका जीवन सफल हो जाएगा। और यदि कोई आपको सुनता है, तो उसका जीवन भी सफल हो जाएगा। यही विधान है:\n\nidaṁ hi puṁsas tapasaḥ śrutasya vā\n\nsviṣṭasya sūktasya ca buddhi-dattayoḥ\n\navicyuto 'rthaḥ kavibhir nirūpito\n\nyad uttamaśloka-guṇānuvarṇanam\n\n(श्रीमद्भागवत 1.5.22)\n\nसमाज में अनेक नायक हैं जो कवि, वैज्ञानिक, धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ इत्यादि हैं। जो ऐसे निपुण हैं, उन्हें यह विधान दिया जाता है: आपका कर्तव्य है कि परम सत्ता की महिमा का वर्णन करके अपने व्यवसाय को पूर्णता प्रदान करें।\n\nMr. O'Grady: मेरा अनुभव यह है कि किसी असाधारण कारण से किसी एक को कोई विशेष कार्य करने हेतु चुन लिया जाता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: वह कारण यहाँ दिया गया है। अविच्युतः। वह अमोघ चयन यह है: \"वे भगवान् की महिमा का वर्णन करें।\"\n\nMr. O'Grady: किन्तु आप कह रहे थे कि आध्यात्मिक गुरु चुना जाता है। आध्यात्मिक गुरु, कवि, पुरोहित—इन्हें ईश्वर चुनता है। इस व्यक्ति को कविता रचने, चित्र बनाने अथवा संगीत रचने हेतु चुना जाता है।\n\nŚrīla Prabhupāda: अतः जब आप संगीत की रचना करें, तब ईश्वर के विषय में संगीत रचें। यही आपकी पूर्णता है।\n\nMr. O'Grady: जब कोई अपनी विधा में ईश्वर के लिए कार्य करता है, तब उसकी विधा ही उसकी पूर्णता बन जाती है?\n\nŚrīla Prabhupāda: हाँ।\n\nMr. O'Grady: आपका हार्दिक धन्यवाद।"}
{"ref": "ssr/8", "book": "ssr", "lang": "hi", "url": "/hi/library/ssr/8/", "verse_text": "", "devanagari": "", "synonyms": "", "translation": "पूर्णता की प्राप्ति", "purport": "जीवन का प्रयोजन जानना\n\nप्रत्येक विचारशील मनुष्य यह मूलभूत प्रश्न पूछता है, \"जीवन का प्रयोजन क्या है?\" दुर्भाग्यवश, परम अर्थ को पाने की हमारी कठिनाई इस तथ्य से और भी बढ़ जाती है कि सहस्रों परस्पर-विरोधी दर्शन, धर्म तथा विचारधाराएँ एवं उनके समर्थक हमारी निष्ठा के लिए होड़ करते हैं। यहाँ श्रील प्रभुपाद कुछ सरल एवं प्रबोधक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।\n\nआज का विषय है ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध। यही आत्म-साक्षात्कार है। संकीर्तन-आन्दोलन आत्म-साक्षात्कार की सरलतम विधि है, क्योंकि यह हृदय को स्वच्छ करता है। अपनी पहचान के विषय में हमारी ग़लतफ़हमी मन के दर्पण पर पड़ी धूल के कारण है। जिस दर्पण पर धूल जमी हो, उसमें मनुष्य स्वयं को नहीं देख पाता। किन्तु यदि वह अत्यन्त स्वच्छ हो, तो मनुष्य स्वयं को देख सकता है। अतः ध्यान हृदय को स्वच्छ करने की एक विधि है। ध्यान का अर्थ है परम के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयास करना।\n\nजिस किसी वस्तु के सम्पर्क में हम आते हैं, उसके साथ कोई न कोई सम्बन्ध होता है। चूँकि मैं अब इस गद्दी पर बैठा हूँ, अतः सम्बन्ध यह है कि मैं बैठूँगा और गद्दी मुझे धारण करेगी। आपके भी सम्बन्ध हैं। आप अंग्रेज़ हैं अथवा भारतीय, अतः आपके समाज के साथ, आपके परिवार के साथ, आपके मित्रों के साथ एक सम्बन्ध है। तो फिर ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है?\n\nयदि आप प्रत्येक व्यक्ति से पूछें, तो बहुत कम लोग ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की व्याख्या कर पाएँगे। वे कहते हैं, \"ईश्वर क्या है? ईश्वर मर चुका है। मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता, फिर सम्बन्ध की तो बात ही क्या।\" चूँकि ये मलिन वस्तुएँ उनके हृदय को ढके हुए हैं, इसलिए वे देख नहीं पाते। प्रत्येक वस्तु के साथ हमारा सम्बन्ध है—फिर हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करते? क्या यह बुद्धिमत्ता है? नहीं। यह अज्ञान है। इस भौतिक जगत् के समस्त प्राणी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से ढके हुए हैं। इसी कारण वे ईश्वर को नहीं देख पाते। वे न तो ईश्वर को समझ पाते हैं, और न ही उन्हें समझने का प्रयास करते हैं। किन्तु ईश्वर वहाँ हैं। इंग्लैंड में प्रातःकाल कुहासा रहता है, अतः आप उस कुहरे के पीछे सूर्य को नहीं देख पाते। किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि सूर्य है ही नहीं? आप उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि आपकी आँखें ढकी हुई हैं। किन्तु यदि आप संसार के किसी अन्य भाग में तार भेजें, तो वे कहेंगे, \"हाँ, सूर्य यहाँ है। हम उसे देख सकते हैं। वह अत्यन्त चकाचौंध करने वाला, प्रकाश से परिपूर्ण है।\" अतः जब आप ईश्वर के अस्तित्व का खण्डन करते हैं अथवा ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को निश्चित नहीं कर पाते, तो इसका अर्थ यह है कि आपमें ज्ञान का अभाव है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर नहीं हैं। हमीं में अभाव है। सूर्य ढका नहीं है। सूर्य ढका नहीं जा सकता। कुहरे, बादल अथवा कुहासे में सूर्य को ढकने की शक्ति नहीं है। सूर्य कितना विशाल है! वह इस पृथ्वी से अनेक गुना बड़ा है। और बादल अधिक से अधिक दस, बीस अथवा सौ मील को ही ढक सकते हैं। तो फिर बादल सूर्य को कैसे ढक सकते हैं? नहीं। बादल सूर्य को नहीं ढक सकते। वे आपकी आँखों को ढक लेते हैं। जब कोई शत्रु आता है और कोई खरगोश अपनी रक्षा नहीं कर पाता, तब वह खरगोश अपनी आँखें बन्द कर लेता है और सोचता है, \"मेरा शत्रु अब चला गया।\" इसी प्रकार, हम ईश्वर की बहिरंगा शक्ति से ढके हुए हैं और सोचते हैं, \"ईश्वर मर चुका है।\"\n\nभगवान् की तीन प्रकार की शक्तियाँ हैं। विष्णु पुराण में परमेश्वर की शक्ति का वर्णन है। और वेदों में भी, उपनिषदों में, परमेश्वर की शक्तियों के वर्णन हैं। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.8)। शक्ति का अर्थ है \"ऊर्जा\"। भगवान् की अनेक शक्तियाँ हैं। वेद कहते हैं, \"ईश्वर को कुछ भी नहीं करना है।\" हमें कार्य करना पड़ता है क्योंकि अस्तित्व में बने रहने का हमारे पास और कोई उपाय नहीं है—हमें खाना पड़ता है, हम इसका, उसका भोग करना चाहते हैं—किन्तु ईश्वर को कार्य क्यों करना पड़े? ईश्वर को कार्य नहीं करना पड़ता। तो फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की? क्या वह कार्य नहीं है? नहीं। तो फिर यह कैसे हुआ? उनकी विविध शक्तियाँ इतनी प्रबल हैं कि वे स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। हम देख सकते हैं कि एक पुष्प कैसे खिलता है, बढ़ता है और व्यवस्थित रूप से अनेक रंग प्रदर्शित करता है: एक ओर एक छोटा बिन्दु, दूसरी ओर एक छोटा बिन्दु, एक ओर श्वेत, दूसरी ओर अधिक श्वेत। तितली भी ऐसी कलात्मक समरूपता प्रदर्शित करती है। अतः यह सब चित्रित किया जा रहा है, किन्तु इतनी पूर्ण रीति से और इतनी द्रुत गति से कि हम देख ही नहीं पाते कि कैसे। हम समझ नहीं पाते कि यह कैसे किया जा रहा है, किन्तु यह भगवान् की शक्ति द्वारा किया जा रहा है।\n\nज्ञान के अभाव के कारण ही लोग कहते हैं कि ईश्वर मर चुका है, कि ईश्वर है ही नहीं, और कि ईश्वर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। इन विचारों की तुलना उस मनुष्य के विचारों से की गई है जो भूत से ग्रसित हो। जिस प्रकार भूतग्रस्त मनुष्य सब निरर्थक बातें बकता है, उसी प्रकार जब हम ईश्वर की मायावी शक्ति से ढक जाते हैं, तब हम कहते हैं कि ईश्वर मर चुका है। किन्तु यह तथ्य नहीं है। अतएव, हमें अपने हृदय को स्वच्छ करने हेतु इस जप-विधि की आवश्यकता है। हरे कृष्ण मन्त्र के जप की इस सरल विधि को अपनाइए। इस प्रकार, अपने गृहस्थ-जीवन में, अपने क्लब में, अपने घर में, मार्ग पर—सर्वत्र—हरे कृष्ण का जप कीजिए, और आपके हृदय को ढकने वाला, आपकी वास्तविक स्थिति को ढकने वाला यह अन्धकार दूर हो जाएगा। तब आप अपनी वास्तविक स्वरूपगत स्थिति को समझ पाएँगे।\n\nभगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अनुशंसा की: चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12]। मार्जनम् का अर्थ है \"स्वच्छ करना\", और दर्पणम् का अर्थ है \"दर्पण\"। हृदय एक दर्पण है। यह एक कैमरे के समान है। जिस प्रकार कैमरा दिन-रात के सभी प्रकार के चित्र खींचता है, उसी प्रकार हमारा हृदय भी चित्र खींचता है और उन्हें एक अचेतन अवस्था में रख लेता है। मनोवैज्ञानिक यह जानते हैं। हृदय इतने सारे चित्र खींच लेता है, और इसी कारण वह ढक जाता है। हम नहीं जानते कि यह कब आरम्भ हुआ, किन्तु यह तथ्य है कि भौतिक सम्पर्क के कारण हमारी वास्तविक पहचान ढक जाती है। अतएव चेतो-दर्पण-मार्जनम्: मनुष्य को अपना हृदय स्वच्छ करना होता है। हृदय को स्वच्छ करने की विभिन्न विधियाँ हैं—ज्ञान-विधि, योग-विधि, ध्यान-विधि, पुण्य कर्म। कर्म भी हृदय को स्वच्छ करता है। यदि कोई अत्यन्त पुण्यपूर्वक कार्य करे, तो उसका हृदय धीरे-धीरे स्वच्छ हो जाएगा। किन्तु यद्यपि हृदय को स्वच्छ करने हेतु ये विधियाँ अनुशंसित हैं, फिर भी इस युग में ये सभी कठिन हैं। दार्शनिक ज्ञान के पथ का अनुसरण करने हेतु मनुष्य को अत्यन्त विद्वान् पण्डित बनना पड़ता है, इतने सारे ग्रन्थ पढ़ने पड़ते हैं, विद्वान् आचार्यों एवं पण्डितों के पास जाकर तर्क-वितर्क करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की खोज करनी पड़ती है जिसने प्रकाश देखा हो। तो ये सब दार्शनिक विधियाँ हैं। ध्यान भी एक अनुशंसित विधि है। मनुष्य को प्रश्न करना चाहिए, \"मैं क्या हूँ?\" केवल विचार कीजिए: क्या मैं यह शरीर हूँ? नहीं। क्या मैं यह उँगली हूँ? नहीं, यह मेरी उँगली है। यदि आप अपने पाँव पर ध्यान दें, तो आप पाएँगे, \"ओह, यह मेरा पाँव है।\" इसी प्रकार, आप प्रत्येक वस्तु को \"मेरा\" पाएँगे। और वह \"मैं\" कहाँ है? सब कुछ मेरा है, किन्तु वह \"मैं\" कहाँ है? जब कोई उस \"मैं\" की खोज करता है, वही ध्यान है। वास्तविक ध्यान का अर्थ है समस्त इन्द्रियों को उसी रीति से एकाग्र करना। किन्तु वह ध्यान-विधि अत्यन्त कठिन है। मनुष्य को इन्द्रियों का संयम करना होता है। इन्द्रियाँ मनुष्य को बाहर की ओर खींचती हैं, और उसे उन्हें अन्तर्मुखी करके आत्म-निरीक्षण की ओर लाना होता है। इसी कारण योग-पद्धति में आठ सोपान हैं। प्रथम है नियामक सिद्धान्तों द्वारा इन्द्रियों का संयम। फिर आसन—वह मन को एकाग्र करने में सहायक होगा। यदि कोई झुककर बैठे, तो वह सहायक नहीं होगा; यदि कोई सीधा तनकर बैठे, तो वह सहायक होगा। फिर श्वास का संयम, फिर ध्यान, फिर समाधि। किन्तु आज ये अत्यन्त, अत्यन्त कठिन विधियाँ हैं। कोई इन्हें तत्क्षण नहीं कर सकता। तथाकथित योग-विधियाँ खण्डित हैं—केवल आसन और कुछ श्वास-व्यायामों का ही अभ्यास किया जाता है। किन्तु वह मनुष्य को पूर्णता की अवस्था तक नहीं पहुँचा सकती। वास्तविक योग-विधि, यद्यपि एक अनुशंसित वैदिक विधि है, फिर भी इस युग में अत्यन्त कठिन है। इसी प्रकार मनुष्य तार्किक दार्शनिक विधि से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकता है: \"यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म नहीं है, तो फिर ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है?\" ऐसी अनुभववादी दार्शनिक चर्चा भी अनुशंसित है, किन्तु इस युग में यह निरर्थक है।\n\nअतः चैतन्य महाप्रभु—केवल चैतन्य महाप्रभु ही नहीं, अपितु वैदिक साहित्य भी—कहते हैं:\n\nharer nāma harer nāma\n\nharer nāmaiva kevalam\n\nkalau nāsty eva nāsty eva\n\nnāsty eva gatir anyathā\n\n[चै.च. आदि 17.21]\n\nकलौ का अर्थ है \"इस युग में\"। नास्त्य् एव, नास्त्य् एव, नास्त्य् एव—तीन बार नास्त्य् एव। एव का अर्थ है \"निश्चय ही\", और नास्ति का अर्थ है \"नहीं\"। \"निश्चय ही नहीं, निश्चय ही नहीं, निश्चय ही नहीं।\" वह \"निश्चय ही नहीं\" क्या है? मनुष्य कर्म से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह पहला \"निश्चय ही नहीं\" है। मनुष्य ज्ञान से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह दूसरा \"निश्चय ही नहीं\" है। मनुष्य योग से अपना साक्षात्कार नहीं कर सकता। निश्चय ही नहीं। कलौ। कलौ का अर्थ है \"इस युग में\"। कलौ नास्त्य् एव नास्त्य् एव नास्त्य् एव गतिर् अन्यथा। इस युग में मनुष्य निश्चय ही इन तीनों में से किसी विधि द्वारा सफलता नहीं पा सकता। तो फिर अनुशंसित विधि क्या है? हरेर् नाम हरेर् नाम हरेर् नामैव केवलम् [चै.च. आदि 17.21]। केवल हरे कृष्ण मन्त्र का जप कीजिए। केवलम् का अर्थ है \"केवल\"। केवल हरे कृष्ण का जप कीजिए। यह सरलतम तथा परम उदात्त विधि है। यह अनुशंसित, व्यावहारिक तथा प्रामाणिक है। अतः इसे अपनाइए। जीवन की किसी भी दशा में इसे स्वीकार कीजिए। जप कीजिए। इसमें कोई व्यय नहीं है, कोई हानि नहीं है। हम कोई गुप्त वस्तु का जप नहीं कर रहे। नहीं। यह खुला हुआ है। और जप करने से आप अपना हृदय स्वच्छ कर लेंगे।\n\nइस भौतिक जगत् में कोई दुःख नहीं चाहता, फिर भी वह आता है। अप्रत्याशित रूप से, उस दावानल के समान जो किसी के माचिस जलाए बिना ही भड़क उठता है, वह आता है। कोई युद्ध नहीं चाहता, फिर भी युद्ध लड़े जाते हैं। कोई अकाल नहीं चाहता, फिर भी अकाल आता है। कोई महामारी नहीं चाहता, फिर भी वह आती है। कोई झगड़ा नहीं चाहता, फिर भी झगड़ा होता है। कोई ग़लतफ़हमी नहीं चाहता, फिर भी वह होती है। क्यों? यह वन में धधकती अग्नि के समान है। और इसे अग्निशमन-यन्त्रों से नहीं बुझाया जा सकता। समस्याओं की यह धधकती अग्नि हमारी तथाकथित ज्ञान की उन्नति से नहीं बुझाई जा सकती। नहीं। यह सम्भव नहीं है। जिस प्रकार मनुष्य अग्निशमन-यन्त्र भेजकर अथवा थोड़ा जल लाकर किसी दावानल को नहीं बुझा सकता, उसी प्रकार हमारे जीवन की समस्याएँ भौतिक विधियों से हल नहीं की जा सकतीं।\n\nअनेक उदाहरण हैं। प्रह्लाद महाराज कहते हैं, \"हे मेरे प्रभु, वस्तुतः माता-पिता बालकों के रक्षक नहीं हैं।\" माता-पिता अपने बालकों की देखभाल करते हैं; यह उनका कर्तव्य है। किन्तु वे परम रक्षक नहीं हैं। जब प्रकृति का नियम बालक को बुलाता है, तब माता-पिता उसकी रक्षा नहीं कर सकते। अतएव यद्यपि सामान्यतः यह तथ्य माना जाता है कि माता-पिता बालक के रक्षक हैं, वस्तुतः यह तथ्य नहीं है। यदि कोई समुद्र में नौकायन कर रहा हो और वह सोचे कि उसके पास अत्यन्त उत्तम आसन है, तो क्या वह उसकी रक्षा करेगा? नहीं। फिर भी वह डूब सकता है। एक उत्तम वायुयान आकाश में उड़ रहा है, सभी सुरक्षित हैं, किन्तु अकस्मात् वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। कोई भी भौतिक वस्तु हमारी रक्षा नहीं कर सकती। मान लीजिए कोई रोगग्रस्त है। वह किसी अच्छे चिकित्सक को नियुक्त कर सकता है जो अच्छी औषधि देता है, किन्तु इससे यह आश्वासन नहीं मिलता कि वह जीवित रहेगा। तो फिर परम आश्वासन क्या है? प्रह्लाद महाराज कहते हैं, \"हे मेरे प्रभु, यदि आप किसी की उपेक्षा कर दें, तो कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता।\"\n\nयह हमारा व्यावहारिक अनुभव है। हम भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा प्रस्तुत समस्याओं को हल करने हेतु अनेक विधियाँ आविष्कृत कर सकते हैं, किन्तु वे पर्याप्त नहीं हैं। वे न तो कभी समस्त समस्याओं को हल करेंगी, और न ही वास्तविक राहत देंगी। यह तथ्य है। अतएव श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, \"माया, यह बहिरंगा शक्ति, अत्यन्त, अत्यन्त प्रबल है। कोई इसे पार नहीं कर सकता। यह प्रायः असम्भव है।\" तो फिर मनुष्य इस भौतिक प्रकृति से कैसे मुक्त हो सकता है? श्रीकृष्ण कहते हैं, \"केवल मेरी शरण ग्रहण करने मात्र से मनुष्य भौतिक प्रकृति के आक्रमण से राहत पा सकता है।\" यह तथ्य है। अतः हमें यह जानने हेतु अपना हृदय स्वच्छ करना होगा कि ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है।\n\nकठोपनिषद् में कहा गया है, नित्यो नित्यानां चेतनश् चेतनानाम्। परम परब्रह्म भगवान्, अर्थात् परम सत्य, नित्य हैं। ईश्वर नित्य हैं, और हम भी नित्य हैं। किन्तु वेद बताते हैं कि वे परम जीवित सत्ता हैं। वे मृत नहीं हैं। यदि वे जीवित नहीं हैं, तो यह संसार कैसे चल रहा है? भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, \"मेरे अधीक्षण में सब कुछ चल रहा है।\" बाइबिल में भी कहा गया है, \"ईश्वर ने सृष्टि की।\" यह तथ्य है। ऐसा नहीं कि किसी समय एक पिण्ड था और फिर यह हुआ और फिर वह हुआ। नहीं। वेद हमें वास्तविक तथ्य बताते हैं, किन्तु देखने हेतु हमें अपनी आँखें खोलनी होंगी। चेतो-दर्पण-मार्जनम् [चै.च. अन्त्य 20.12]। यही हमारे हृदय को स्वच्छ करने की विधि है। जब हम अपने हृदय को स्वच्छ कर लेते हैं, तब हम समझ पाएँगे कि श्रीकृष्ण और वेद क्या कहते हैं। हमें शुद्ध होने की आवश्यकता है। यदि कोई मनुष्य पीलिया से पीड़ित हो और आप उसे मिश्री का एक टुकड़ा दें, तो वह कहेगा कि यह अत्यन्त कड़वा है। किन्तु क्या मिश्री कड़वी होती है? नहीं, वह अत्यन्त मधुर होती है। और पीलिया की औषधि वही मिश्री है। आधुनिक विज्ञान यही निर्धारित करता है, और वैदिक साहित्य में भी यही निर्धारित है। अतः यदि हम इस मिश्री की बड़ी मात्रा ग्रहण करें, तो हमें पीलिया से राहत मिल जाएगी। और जब राहत मिलती है, तब मनुष्य कहता है, \"ओह, यह तो अत्यन्त मधुर है।\" अतः निरीश्वरवादी सभ्यता का यह आधुनिक पीलिया हरे कृष्ण के इस जप द्वारा ठीक किया जा सकता है। आरम्भ में यह कड़वा प्रतीत हो सकता है, किन्तु जब मनुष्य उन्नत होता है, तब वह देखेगा कि यह कितना सुखद है।\n\nजैसे ही मनुष्य अपनी पहचान को, ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझ लेता है, वैसे ही वह तत्क्षण सुखी हो जाता है। हम इतने सारे दुःखों से भरे हुए हैं क्योंकि हमने स्वयं को भौतिक जगत् के साथ अभिन्न मान लिया है। इसी कारण हम दुःखी हैं। चिन्ता तथा भय भौतिक जगत् के साथ अपनी मिथ्या पहचान के कारण हैं। उस दिन मैं समझा रहा था कि जो हड्डी एवं चर्म के इस थैले के साथ अपनी पहचान बनाता है, वह पशु के समान है। अतः हरे कृष्ण के जप से यह ग़लतफ़हमी दूर हो जाएगी। हृदय की स्वच्छता का अर्थ है कि मनुष्य समझ जाएगा कि वह इस भौतिक जगत् का नहीं है। अहं ब्रह्मास्मि: मैं आत्मा हूँ। जब तक मनुष्य स्वयं को इंग्लैंड के साथ, भारत के साथ अथवा अमेरिका के साथ अभिन्न मानता है, यह अज्ञान है। आज आप अंग्रेज़ हैं क्योंकि आपका जन्म इंग्लैंड में हुआ, किन्तु अपने अगले जीवन में सम्भव है आपका जन्म इंग्लैंड में न हो; वह चीन में, रूस में अथवा किसी अन्य देश में हो सकता है। अथवा सम्भव है आपको यह मानव शरीर ही न मिले। आज आप राष्ट्रवादी हैं, आप अपने देश के अत्यन्त प्रबल अनुयायी हैं, किन्तु कल यदि आप अपने ही देश में रहें, तो सम्भव है आप एक गाय हों जिसे वधशाला की ओर ले जाया जा रहा हो।\n\nअतः हमें अपनी पहचान को भली-भाँति जानना होगा। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी की वास्तविक पहचान यह है कि वह ईश्वर का नित्य सेवक है। यदि कोई इस प्रकार सोचे—\"मैं और किसी का सेवक नहीं हूँ; मेरा कार्य ईश्वर की सेवा करना है\"—तो वह मुक्त है। उसका हृदय तत्क्षण स्वच्छ हो जाता है, और वह मुक्त हो जाता है। और जब मनुष्य उस अवस्था तक पहुँच जाता है, तब इस संसार की उसकी समस्त चिन्ताएँ एवं व्यग्रताएँ समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि वह जानता है, \"मैं ईश्वर का सेवक हूँ। ईश्वर मुझे रक्षा प्रदान करेंगे। फिर मैं किसी बात की चिन्ता क्यों करूँ?\" यह ठीक एक बालक के समान है। बालक जानता है कि उसके माता-पिता उसकी देखभाल करेंगे। वह निश्चिन्त है। यदि वह अग्नि को छूने जाए, तो उसकी माता उसकी रक्षा करेगी: \"ओह, मेरे प्यारे बच्चे, मत छुओ।\" माता सदा उसकी देखभाल करती रहती है। तो फिर आप ईश्वर पर अपना विश्वास क्यों नहीं रखते? वस्तुतः, आप ईश्वर की रक्षा में ही हैं।\n\nलोग गिरजे में जाकर कहते हैं, \"हे ईश्वर, हमें हमारी प्रतिदिन की रोटी दे।\" वस्तुतः, यदि वे हमें वह न दें, तो हम जीवित ही न रह पाएँ। यह तथ्य है। वेद भी कहते हैं कि एक परम पुरुष ही प्रत्येक अन्य प्राणी की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। ईश्वर प्रत्येक को भोजन प्रदान कर रहे हैं। हम मनुष्यों की अपनी आर्थिक समस्या है, किन्तु मानव-समाज के अतिरिक्त अन्य समाजों में कौन-सी आर्थिक समस्या है? पक्षी-समाज में कोई आर्थिक समस्या नहीं है। जीवन की योनियाँ, और उनमें से, मानव-समाज अत्यन्त, अत्यन्त छोटा है। तो उन्होंने ही समस्याएँ खड़ी कर ली हैं—क्या खाएँ, कहाँ सोएँ, कैसे मैथुन करें, कैसे रक्षा करें। ये हमारे लिए समस्या हैं, किन्तु अधिकांश प्राणियों—जलचरों, मछलियों, पौधों, कीटों, पक्षियों, पशुओं तथा अन्य करोड़ों-करोड़ों प्राणियों—के लिए ऐसी कोई समस्या नहीं है। वे भी प्राणी हैं। यह मत सोचिए कि वे हमसे भिन्न हैं। यह सत्य नहीं है कि हम मनुष्य ही एकमात्र प्राणी हैं और अन्य सभी मृत हैं। नहीं। और उनका भोजन एवं आश्रय कौन प्रदान कर रहा है? वह ईश्वर है। पौधे एवं पशु कार्यालय नहीं जाते। वे धन कमाने हेतु तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने विश्वविद्यालय नहीं जाते। तो फिर वे कैसे खाते हैं? ईश्वर प्रदान कर रहे हैं। हाथी सैकड़ों पाउंड भोजन खाता है। कौन प्रदान कर रहा है? क्या आप हाथी के लिए प्रबन्ध कर रहे हैं? करोड़ों हाथी हैं। कौन प्रदान कर रहा है?\n\nअतः यह स्वीकार करने की विधि कि ईश्वर प्रदान कर रहे हैं, इस सोच से श्रेष्ठ है कि \"ईश्वर मर चुका है। हम रोटी के लिए गिरजे जाकर ईश्वर से प्रार्थना क्यों करें?\" भगवद्गीता में कहा गया है, \"चार प्रकार के लोग श्रीकृष्ण के पास आते हैं: दुःखी, धन के अभावग्रस्त, ज्ञानी तथा जिज्ञासु।\" जो जिज्ञासु है, जो ज्ञानी है, जो दुःखी है, और जो धन का अभावग्रस्त है—ये चार वर्ग के मनुष्य ईश्वर के समीप आते हैं। \"हे मेरे प्रभु, मैं अत्यन्त भूखा हूँ। मुझे मेरी प्रतिदिन की रोटी दे।\" यह अच्छा है। जो इस प्रकार ईश्वर के समीप आते हैं, उन्हें सुकृतिनः कहकर अनुशंसित किया गया है। सुकृती का अर्थ है \"पुण्यात्मा\"। वे पुण्यात्मा हैं। यद्यपि वे धन के लिए, भोजन के लिए माँग रहे हैं, फिर भी उन्हें पुण्यात्मा माना जाता है क्योंकि वे ईश्वर के समीप आ रहे हैं। और अन्य ठीक इसके विपरीत हैं। वे दुष्कृतिनः, अर्थात् पापी हैं। कृती का अर्थ है \"अत्यन्त गुणवान्\", किन्तु दुष्कृती शब्द यह संकेत करता है कि उनकी ऊर्जा का अनर्थ रचने हेतु दुरुपयोग किया जा रहा है। ठीक उस मनुष्य के समान जिसने आणविक अस्त्रों का आविष्कार किया। उसके पास बुद्धि है, किन्तु उसका दुरुपयोग किया गया है। उसने कोई ऐसी वस्तु रच दी है जो भयानक है। कोई ऐसी वस्तु रचिए जो सुनिश्चित करे कि मनुष्य को अब और मरना न पड़े। ऐसी वस्तु रचने का क्या लाभ है जिससे करोड़ों लोग तत्क्षण मर जाएँगे? वे आज मरेंगे या कल या सौ वर्ष बाद। तो वैज्ञानिकों ने क्या किया? कोई ऐसी वस्तु रचिए जिससे मनुष्य तत्क्षण न मरे, जिससे अब और रोग न रहे, जिससे अब और वृद्धावस्था न रहे। तब आपने कुछ किया होगा। किन्तु दुष्कृती कभी ईश्वर के पास नहीं जाते। वे कभी ईश्वर को समझने का प्रयत्न नहीं करते। इसी कारण उनकी ऊर्जा कुमार्गगामी हो जाती है।\n\nजो स्थूल भौतिकतावादी ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध की उपेक्षा करते हैं, उनका वर्णन भगवद्गीता में मूढ़ों के रूप में किया गया है। मूढ़ का अर्थ है \"गधा\", \"खच्चर\"। जो धन कमाने हेतु अत्यन्त, अत्यन्त कठिन परिश्रम कर रहे हैं, उनकी तुलना गधे से की जाती है। वे प्रतिदिन वही चार चपातियाँ खाएँगे, फिर भी वे सहस्रों डॉलर कमाने हेतु अनावश्यक परिश्रम कर रहे हैं। और अन्य का वर्णन नराधम के रूप में किया गया है। नराधम का अर्थ है \"मनुष्यों में नीचतम\"। यह मानव-जीवन ईश्वर-साक्षात्कार के लिए है। ईश्वर का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करना मनुष्य का अधिकार है। जो ब्रह्म को, ईश्वर को समझ लेता है, वही ब्राह्मण है, अन्य नहीं। अतः यही इस मानव-जीवन का कर्तव्य है। प्रत्येक मानव-समाज में कोई न कोई व्यवस्था है जिसे \"धर्म\" कहा जाता है और जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर को समझने का प्रयत्न कर सकता है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वह ईसाई धर्म हो, मुसलमानी धर्म हो, अथवा हिन्दू धर्म। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। व्यवस्था ईश्वर को तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को समझने की है। बस इतना ही। यह मनुष्यों का कर्तव्य है, और यदि मानव-समाज में इस कर्तव्य की उपेक्षा की जाए, तो वह पशु-समाज है। पशुओं में यह समझने की शक्ति नहीं है कि ईश्वर क्या है और ईश्वर के साथ उनका सम्बन्ध क्या है। उनकी एकमात्र रुचि खाने, सोने, मैथुन करने तथा रक्षा करने में है। यदि हम भी केवल इन्हीं बातों से सरोकार रखते हैं, तो हम क्या हैं? हम पशु हैं। इसी कारण भगवद्गीता कहती है कि जो इस अवसर की उपेक्षा करते हैं, वे \"मनुष्यों में नीचतम\" हैं। उन्हें जन्म मिले, फिर भी उन्होंने उनका उपयोग ईश्वर-साक्षात्कार हेतु न करके केवल पाशविक प्रवृत्तियों हेतु किया। इसी कारण वे नराधम, अर्थात् मनुष्यों में नीचतम हैं। और कुछ अन्य व्यक्ति हैं जो अपने ज्ञान पर अत्यन्त गर्व करते हैं। किन्तु वह ज्ञान क्या है? \"ईश्वर है ही नहीं। मैं ही ईश्वर हूँ।\" उनका वास्तविक ज्ञान माया ने हर लिया है। यदि वे ईश्वर हैं, तो वे कुत्ता कैसे बन गए? उनके विरुद्ध इतने सारे तर्क हैं, फिर भी वे केवल ईश्वर की अवहेलना करते हैं। नास्तिकता। चूँकि उन्होंने नास्तिकता की विधि को अपना लिया है, अतः उनका वास्तविक ज्ञान चुरा लिया गया है। वास्तविक ज्ञान का अर्थ है यह जानना कि ईश्वर क्या है और ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है। यदि कोई इसे नहीं जानता, तो यह समझना चाहिए कि उसका ज्ञान माया ने हर लिया है।\n\nअतः इस प्रकार, यदि हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने का प्रयत्न करें, तो उसके उपाय एवं साधन हैं। ग्रन्थ हैं, और ज्ञान है, तो फिर इनका लाभ क्यों न उठाएँ? प्रत्येक व्यक्ति को इस ज्ञान का लाभ उठाना चाहिए। यह समझने का प्रयत्न कीजिए कि भगवद्गीता तथा अन्य वैदिक साहित्य में, सर्वत्र, यह कहा गया है कि ईश्वर महान् हैं और यद्यपि हम गुणतः ईश्वर के साथ एक हैं, फिर भी हम अणु-मात्र हैं। समुद्र तथा जल के सूक्ष्म कण का गुण एक ही है, किन्तु जल की बूँद में नमक की मात्रा तथा समुद्र में नमक की मात्रा भिन्न है। वे गुणतः एक हैं किन्तु मात्रा में भिन्न। इसी प्रकार, ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं, और हममें कुछ शक्ति है। ईश्वर सब कुछ रचते हैं, और हम उड़ने हेतु एक छोटा यन्त्र रच सकते हैं, ठीक उन छोटे यन्त्रों के समान जिनसे बालक खेलते हैं। किन्तु ईश्वर करोड़ों ग्रहों को आकाश में उड़ता हुआ रच सकते हैं। यही ईश्वर की योग्यता है। आप कोई ग्रह नहीं रच सकते। और यदि आप कोई ग्रह रच भी सकें, तो उसका क्या लाभ है? ईश्वर द्वारा रचे गए करोड़ों ग्रह हैं। किन्तु आपमें भी सृजन-शक्ति है। ईश्वर में शक्ति है, और आपमें शक्ति है। किन्तु उनकी शक्ति इतनी महान् है कि आपकी शक्ति उससे तुलनीय नहीं है। यदि आप कहें, \"मैं ही ईश्वर हूँ\", तो यह मूर्खता है। आप दावा कर सकते हैं कि आप ईश्वर हैं, किन्तु आपने ऐसे कौन-से असाधारण कार्य किए हैं कि आप दावा कर सकें कि आप ईश्वर हैं? यह अज्ञान है। जो स्वयं को ईश्वर समझता है, उसका ज्ञान माया के मायाजाल ने हर लिया है। अतः हमारा सम्बन्ध यह है कि ईश्वर महान् हैं और हम अणु-मात्र हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं, \"समस्त जीव मेरे अंश हैं। गुणतः वे मेरे साथ एक हैं, किन्तु मात्रा में भिन्न हैं।\" अतः हम एक साथ ही ईश्वर के साथ एक भी हैं और भिन्न भी। यही हमारा सम्बन्ध है। हम एक हैं क्योंकि हममें ईश्वर के समान ही गुण हैं। किन्तु यदि हम स्वयं का सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हम पाएँगे कि यद्यपि हममें कुछ महान् गुण हैं, फिर भी ईश्वर में वे सभी अधिक मात्रा में विद्यमान हैं।\n\nहममें कोई ऐसी वस्तु नहीं हो सकती जो ईश्वर में न हो। यह सम्भव नहीं है। अतएव वेदान्त-सूत्र में कहा गया है कि जो कुछ हममें है, वह ईश्वर में भी पाया जाता है। वह ईश्वर से ही निःसृत हो रहा है। अतः हमारा सम्बन्ध यह है कि चूँकि हम छोटे हैं, चूँकि हम अणु-मात्र हैं, इसलिए हम ईश्वर के नित्य सेवक हैं। इस भौतिक जगत् में भी, साधारण व्यवहार में, हम देखते हैं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की सेवा करने जाता है क्योंकि वह दूसरा मनुष्य उससे बड़ा है और उसे अच्छा वेतन दे सकता है। अतः स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि यदि हम छोटे हैं, तो हमारा कर्तव्य ईश्वर की सेवा करना है। हमारा और कोई कार्य नहीं है। हम सभी मूल सत्ता के विभिन्न अंश हैं।\n\nजो पेंच किसी यन्त्र से जुड़ा है, वह मूल्यवान् है क्योंकि वह सम्पूर्ण यन्त्र के साथ कार्य कर रहा है। और यदि पेंच को यन्त्र से अलग कर दिया जाए, अथवा यदि वह त्रुटिपूर्ण हो, तो वह व्यर्थ है। मेरी उँगली तब तक करोड़ों डॉलर के मूल्य की है जब तक वह इस शरीर से जुड़ी है और शरीर की सेवा कर रही है। और यदि उसे इस शरीर से काट दिया जाए, तो उसका क्या मूल्य है? कुछ नहीं। इसी प्रकार, हमारा सम्बन्ध यह है कि हम ईश्वर के अत्यन्त छोटे कण हैं; इसलिए हमारा कर्तव्य अपनी ऊर्जाओं को उनके साथ संयोजित करना और उनके साथ सहयोग करना है। यही हमारा सम्बन्ध है। अन्यथा हम व्यर्थ हैं। हम कट चुके हैं। जब उँगली निरर्थक हो जाती है, तब चिकित्सक कहता है, \"ओह, इस उँगली को काट दो। अन्यथा शरीर में विष फैल जाएगा।\" इसी प्रकार, जब हम ईश्वरविहीन हो जाते हैं, तब हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध से कट जाते हैं और इस भौतिक जगत् में कष्ट भोगते हैं। यदि हम पुनः परमेश्वर के साथ जुड़ने का प्रयत्न करें, तो हमारा सम्बन्ध पुनर्जीवित हो जाता है।\n\nसर्वोच्च प्रेम\n\n\"प्रेम।\" गायक इसके विषय में मधुर गीत गाते हैं, कवि इसमें आनन्दित होते हैं, उपन्यासकार इसके विषय में जटिल कथाएँ बुनते हैं। चलचित्र तथा दूरदर्शन इससे ओतप्रोत हैं। किन्तु क्या यह वास्तविक है? इस सुस्पष्ट निबन्ध में, श्रील प्रभुपाद तर्क प्रस्तुत करते हैं कि जिस प्रेम का अनुभव हम इस भौतिक जगत् में करते हैं, वह एक भ्रम पर आधारित है और, यहाँ की प्रत्येक अन्य वस्तु के समान, क्षणभंगुर है। फिर भी एक \"सर्वोच्च प्रेम\" है—जिसकी कल्पना लौकिक रोमांसकारों ने कभी नहीं की।\n\nयदि कोई भक्ति की कोमल लता की भली-भाँति रक्षा करे, तो वह धीरे-धीरे ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का फल उत्पन्न करती है। ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का अर्थ है वह प्रेम जो न तो भौतिक लाभ की इच्छा से, न मात्र दार्शनिक समझ की इच्छा से, और न ही सकाम परिणामों की इच्छा से रंजित हो। अनन्य प्रेम यह जानना है कि \"ईश्वर महान् हैं, मैं उनका अंश हूँ, और इसी कारण वे मेरे परम प्रेमास्पद हैं।\" यह चेतना मानव-जीवन की सर्वोच्च पूर्णता तथा आत्म-साक्षात्कार की समस्त विधियों का परम लक्ष्य है। यदि कोई इस बिन्दु तक पहुँच जाए—ईश्वर ही मेरे एकमात्र प्रियतम हैं, श्रीकृष्ण ही एकमात्र प्रेमास्पद हैं—तो उसका जीवन पूर्ण हो जाता है। और जब कोई श्रीकृष्ण के साथ उस दिव्य सम्बन्ध का आस्वादन करता है, तब वह वास्तविक सुख का अनुभव करता है। तब वह भक्ति की लता इतनी दृढ़ता से सुरक्षित हो जाएगी कि उसे केवल पकड़ लेने मात्र से मनुष्य परम गन्तव्य तक पहुँच सकेगा। यदि कोई किसी वृक्ष पर अटल रूप से चढ़ता जाए, तो वह अन्ततः उसकी सर्वोच्च चोटी तक पहुँच जाता है। इसी प्रकार, यदि कोई उस भक्ति-लता को पकड़कर ईश्वर-प्रेम प्राप्त कर सके, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह श्रीकृष्ण के दिव्य धाम तक पहुँचेगा और उनके साथ साक्षात् रूप से संग करेगा, ठीक जैसे हम यहाँ आमने-सामने संग कर रहे हैं।\n\nईश्वर काल्पनिक अथवा मनगढ़न्त नहीं हैं। वे उतने ही वास्तविक हैं जितने हम। (वस्तुतः, हम भ्रम के अधीन हैं; हम इस प्रकार जी रहे हैं मानो यह शरीर ही हमारा वास्तविक स्वरूप हो, यद्यपि यह शरीर तनिक भी वास्तविकता नहीं है, अपितु केवल एक क्षणभंगुर अभिव्यक्ति है।) हम यह मानने का दुस्साहस करते हैं कि ईश्वर है ही नहीं अथवा उनका कोई रूप नहीं है। यह मानसिक कल्पना ज्ञान के दरिद्र भण्डार के कारण है। भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनका धाम विद्यमान हैं, और मनुष्य वहाँ जा सकता है, उन तक पहुँच सकता है, और उनके साथ संग कर सकता है। यह तथ्य है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है परमेश्वर के संग में रहना और आनन्द एवं ज्ञान में नित्य रूप से विद्यमान रहना। ऐसे नित्य संग का अर्थ है श्रीकृष्ण के साथ खेलना, श्रीकृष्ण के साथ नृत्य करना तथा श्रीकृष्ण से प्रेम करना। अथवा श्रीकृष्ण आपके पुत्र बन सकते हैं—जो भी आप चाहें।\n\nश्रीकृष्ण के साथ पाँच प्रमुख सम्बन्ध हैं: निष्क्रिय भक्त के रूप में, सेवक के रूप में, मित्र के रूप में, माता-पिता के रूप में, तथा प्रेमी के रूप में। श्रीकृष्ण के धाम की गौएँ भी मुक्त आत्माएँ हैं। उन्हें सुरभि गौएँ कहा जाता है। अनेक लोकप्रिय चित्र हैं जो दर्शाते हैं कि श्रीकृष्ण किस प्रकार गौओं से प्रेम करते हैं, किस प्रकार वे उनका आलिंगन करते हैं और उन्हें चूमते हैं। श्रीकृष्ण के साथ उस निष्क्रिय सम्बन्ध को शान्त कहा जाता है। उनका पूर्ण सुख तब प्राप्त होता है जब श्रीकृष्ण आकर उन्हें केवल स्पर्श करते हैं।\n\nअन्य भक्तगण वास्तव में सेवा अर्पित करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं। वे सोचते हैं, \"श्रीकृष्ण बैठना चाहते हैं। मैं उनके लिए स्थान का प्रबन्ध करूँगा। श्रीकृष्ण भोजन करना चाहते हैं। मैं उनके लिए कोई उत्तम भोजन लाऊँगा।\" और वे वास्तव में ये प्रबन्ध करते हैं। अन्य भक्तगण श्रीकृष्ण के साथ समानता के स्तर पर मित्र के रूप में खेलते हैं। वे नहीं जानते कि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं; उनके लिए श्रीकृष्ण उनके प्रेमास्पद मित्र हैं, और वे एक क्षण के लिए भी उन्हें भुला नहीं सकते। दिन-भर तथा रात-भर वे श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं। रात्रि में, जब वे सो रहे होते हैं, तब वे सोचते हैं, \"ओह, प्रातःकाल मैं जाकर श्रीकृष्ण के साथ खेलूँगा।\" और प्रातःकाल वे श्रीकृष्ण के घर जाते हैं और प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं, जब श्रीकृष्ण की माता उन्हें मैदानों में अपने मित्रों के साथ खेलने जाने से पूर्व सजाती हैं। कृष्णलोक (श्रीकृष्ण के धाम) में और कोई गतिविधि नहीं है। वहाँ कोई उद्योग नहीं है, कार्यालय की ओर भागदौड़ नहीं है, अथवा ऐसी कोई निरर्थक बात नहीं है। वहाँ पर्याप्त दूध एवं मक्खन है, और प्रत्येक व्यक्ति प्रचुरता से खाता है। श्रीकृष्ण को अपने मित्र अत्यन्त प्रिय हैं, और कभी-कभी वे उनके लिए मक्खन चुराने का आनन्द लेते हैं। मनुष्य वास्तव में इस प्रकार जी सकता है, और यही अस्तित्व की पूर्णता है। हमें जीवन की उस पूर्णता की अवस्था के लिए लालायित होना चाहिए। कृष्णभावनामृत उसे प्राप्त करने की विधि है।\n\nकिन्तु जब तक मनुष्य में इस भौतिक जगत् के प्रति तनिक-सी भी आसक्ति है, तब तक उसे यहीं रहना होगा। श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर हैं। वे किसी ऐसे व्यक्ति को अपने संग में प्रवेश करने नहीं देते जिसमें जीवन की भौतिक धारणा का तनिक भी अंश हो। भक्ति भौतिक कल्मष से मुक्त होनी चाहिए। यह मत सोचिए, \"मैं एक अत्यन्त विद्वान् पण्डित हूँ। मैं मानसिक कल्पना द्वारा खोज निकालूँगा कि परम सत्य क्या है।\" यह निरर्थक है; मनुष्य कल्पना करता ही चला जाए और फिर भी समस्त स्रोतों के स्रोत को कभी नहीं पाएगा। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, \"मनुष्य करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक परम सत्य के विषय में कल्पना करता रह सकता है, और फिर भी वह प्रकट नहीं होगा।\" मनुष्य जैसा है वैसा ही इस भौतिक जगत् में सड़ सकता है और कल्पना करता चला जा सकता है, किन्तु वह सही विधि नहीं है। यहाँ वह विधि है—भक्तियोग।\n\nभगवान् चैतन्य कहते हैं कि श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा करना जीवन की सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है, और इसकी तुलना में, अन्य वस्तुएँ जिनके लिए लोग इस भौतिक जगत् में लालायित रहते हैं, समुद्र के बुलबुलों के समान हैं। सामान्यतः, लोग पुरस्कारों के पीछे रहते हैं, और इसी कारण वे धार्मिक बनते हैं। वे कहते हैं, \"मैं हिन्दू हूँ,\" \"मैं ईसाई हूँ,\" \"मैं यहूदी हूँ,\" \"मैं मुसलमान हूँ,\" \"मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, और इसी कारण मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता। मैं श्रीकृष्ण को स्वीकार नहीं कर सकता।\" इसे धार्मिकता, अर्थात् धर्म कहा जाता है। धर्म की ऐसी भौतिकतावादी, सम्प्रदायवादी धारणा के साथ, वे कर्मकाण्डों एवं श्रद्धा से चिपके हुए इस भौतिक जगत् में सड़ते रहेंगे। वे इस धारणा के अधीन हैं कि यदि वे अपने धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करें, तो उन्हें भौतिक समृद्धि प्राप्त होगी। निस्सन्देह, यदि कोई किसी भी प्रकार की धार्मिक श्रद्धा से चिपका रहे, तो उसे भौतिक जीवन की सुविधाएँ मिल जाएँगी।\n\nलोग यह भौतिक समृद्धि क्यों चाहते हैं? इन्द्रियतृप्ति के लिए। वे सोच रहे हैं, \"मेरी एक अत्यन्त सुन्दर पत्नी होगी। मेरी अत्यन्त अच्छी सन्तानें होंगी। मेरा एक अत्यन्त अच्छा पद होगा। मैं राष्ट्रपति बनूँगा। मैं प्रधानमन्त्री बनूँगा।\" यह इन्द्रियतृप्ति है। और जब मनुष्य निराश हो जाता है और देख लेता है कि धनी होना अथवा राष्ट्रपति-पद प्राप्त करना उसे सुख नहीं दे सकता, यौन-जीवन के समस्त रस को निचोड़ लेने के पश्चात्, जब वह पूर्णतः निराश हो जाता है, तब सम्भव है वह एलएसडी का सहारा लेकर शून्य के साथ एक हो जाने का प्रयत्न करे। किन्तु यह निरर्थक बात सुख नहीं दे सकती। यहाँ सुख है: मनुष्य को श्रीकृष्ण के समीप जाना ही होगा। अन्यथा, यह एलएसडी की उलझन तथा निर्विशेष शून्य की धारणाओं में भटकने में ही समाप्त हो जाएगा। लोग निराश हैं। यदि उनके पास सच्चा आध्यात्मिक जीवन नहीं है तो वे अवश्य ही निराश होंगे, क्योंकि व्यक्ति स्वभाव से आध्यात्मिक है।\n\nश्रीकृष्ण के बिना कोई कैसे सुखी हो सकता है? मान लीजिए किसी को समुद्र में फेंक दिया जाए। वह वहाँ कैसे सुखी हो सकता है? वह हमारे लिए नहीं है। कोई अत्यन्त अच्छा तैराक हो सकता है, किन्तु वह कितने समय तक तैर पाएगा? वह अन्ततः थक जाता है और डूब जाता है। इसी प्रकार, हम स्वभाव से आध्यात्मिक हैं। हम इस भौतिक जगत् में कैसे सुखी हो सकते हैं? यह सम्भव नहीं है। किन्तु मनुष्य यहाँ बने रहने का प्रयत्न करते हैं, जीवित रहने हेतु इतने सारे क्षणभंगुर समायोजन करते हुए। यह जोड़-तोड़ सुख नहीं है। यदि कोई वास्तव में सुख चाहता है, तो यहाँ वह विधि है: मनुष्य को ईश्वर-प्रेम प्राप्त करना ही होगा। जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण से प्रेम न कर सके, जब तक वह बिल्लियों, कुत्तों, देश, राष्ट्र तथा समाज के प्रति प्रेम से मुक्त न हो जाए और इसके स्थान पर अपना प्रेम श्रीकृष्ण पर एकाग्र न कर ले, तब तक सुख का प्रश्न ही नहीं उठता। रूप गोस्वामी ने इस सम्बन्ध में एक अत्यन्त सुन्दर उदाहरण दिया है: अनेक मादक द्रव्य हैं जो मनुष्य को विचारों अथवा मतिभ्रमों से भर देते हैं। किन्तु रूप गोस्वामी कहते हैं कि जब तक मनुष्य ईश्वर-प्रेम के उस अन्तिम मादक द्रव्य, अर्थात् कृष्ण-प्रेमा का आस्वादन न करे, तब तक उसे ध्यान, निर्विशेष अद्वैतवाद तथा अन्य अनेक विभ्रमों द्वारा मोहित होना पड़ेगा।\n\nचैतन्य महाप्रभु वर्णन करते हैं कि श्रीकृष्ण का अनन्य प्रेम प्राप्त करने हेतु मनुष्य को भक्ति-सेवा, अर्थात् कृष्णभावनामृत का सम्पादन करना होता है। मनुष्य को अपने आपको अनन्य रूप से श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करना होता है। अनन्य भक्ति की सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है समस्त भौतिक इच्छाओं, समस्त मानसिक कल्पना तथा समस्त सकाम कर्मों से मुक्त होना। अनन्य भक्ति का मूल सिद्धान्त यह है कि मनुष्य पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होने के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं रख सकता। यद्यपि कोई यह जान भी ले कि ईश्वर के अन्य समस्त रूप भी श्रीकृष्ण ही हैं, फिर भी उसे किसी अन्य रूप की आराधना नहीं करनी चाहिए, अपितु श्रीकृष्ण के रूप पर ही एकाग्र होना चाहिए। श्रीकृष्ण के अनेक रूप हैं, किन्तु मनुष्य को केवल उनके बंशीधर रूप में ही श्रीकृष्ण की आराधना करनी होती है, जैसे राधा-कृष्ण विग्रह में। केवल उसी रूप पर एकाग्र हो जाइए, और समस्त मानसिक कल्पना तथा सकाम कर्म स्वतः गिर जाएँगे। मनुष्य को कृष्णभावनामृत का अनुकूल रीति से अनुशीलन करना होता है, और इसका अर्थ है ऐसी सेवा का सम्पादन जिससे श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हों। कृष्णभावनामृत अपनी ही विधि गढ़ने से प्राप्त नहीं होता। मैं सोच सकता हूँ कि मैं कृष्णभावनामृत में कुछ कर रहा हूँ, किन्तु इसे किसने अनुमोदित किया है? उदाहरणार्थ, भगवद्गीता में, अर्जुन कुछ नैतिक कारणों से युद्ध करने में हिचकिचाया, किन्तु वह उस स्थिति को सकाम कर्मों के स्तर से देख रहा था, जिस स्तर पर मनुष्य को परिणामों का भोग करना पड़ता है अथवा कष्ट उठाना पड़ता है। वह विचार कर रहा था कि यदि वह अपने परिवार-जनों का वध करे, तो उसे अनेक प्रतिक्रियाओं के अधीन होना पड़ेगा। तथापि, इस निष्कर्ष को श्रीकृष्ण ने अनुमोदित नहीं किया। भौतिक जगत् में क्रिया एवं प्रतिक्रिया के नियम को कर्म कहा जाता है, किन्तु भक्ति-सेवा कर्म से परे है।\n\nअनन्य प्रेम को सकाम कर्मों (कर्म) के समस्त अंशों तथा मानसिक कल्पना एवं भौतिक इच्छा के समस्त अंशों से मुक्त होना चाहिए। उस अनन्य भक्ति-सेवा को श्रीकृष्ण पर अनुकूल रीति से स्थिर रहना चाहिए। \"अनुकूल\" का अर्थ है उसके अनुरूप जो वे चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने इच्छा की कि कुरुक्षेत्र का युद्ध हो; यह सब उन्हीं के द्वारा रचा गया था। अर्जुन से कहा गया, \"तुम अपनी ही रीति से सोच रहे हो, किन्तु यदि तुम युद्ध न भी करो, तो भी निश्चिन्त रहो कि चूँकि यह मेरे द्वारा रचा गया है, अतः ये जो योद्धा यहाँ एकत्र हैं, इनमें से कोई भी अपने घरों को नहीं लौट रहा। वे यहीं मारे जाएँगे। यह पहले ही रचा जा चुका है।\" ईश्वर की इच्छा ऐसी होती है कि उसे कोई बदल नहीं सकता। श्रीकृष्ण के दो गुण हैं: वे रक्षा कर सकते हैं, और वे वध भी कर सकते हैं। यदि वे किसी का वध करना चाहें, तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो उसकी रक्षा कर सके, और यदि वे किसी की रक्षा करें, तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो उसका वध कर सके। श्रीकृष्ण की इच्छा सर्वोपरि है। अतएव, हमें अपनी इच्छाओं को श्रीकृष्ण की इच्छाओं के साथ संयोजित करना होगा। श्रीकृष्ण जो कुछ भी चाहते हैं, उसे कोई निरर्थक एवं निरस्त नहीं कर सकता क्योंकि वे परमेश्वर हैं। अतएव, हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को श्रीकृष्ण की इच्छा के साथ संयोजित करना, न कि कोई कर्म गढ़कर फिर यह घोषणा करना: \"मैं यह कर्म कृष्णभावनामृत में कर रहा हूँ।\" हमें यह निश्चित करने में अत्यन्त सावधान रहना होगा कि श्रीकृष्ण वास्तव में उसे चाहते हैं या नहीं। ऐसा अधिकृत ज्ञान श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि द्वारा शिक्षित किया जाता है। आध्यात्मिक गुरु की स्तुति में अपनी प्रार्थनाओं में हम प्रतिदिन गाते हैं, \"यदि आध्यात्मिक गुरु सन्तुष्ट हैं, तो ईश्वर सन्तुष्ट होंगे। और यदि कोई अपने आध्यात्मिक गुरु को असन्तुष्ट करता है, तो उसके लिए ईश्वर को प्रसन्न करने का कोई मार्ग नहीं है।\"\n\nअतएव, जहाँ तक सम्भव हो, मनुष्य को अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश का सम्पादन करना होता है। यही मनुष्य को प्रगति करने में समर्थ बनाएगा। यही कृष्णभावनामृत के अनुकूल सम्पादन का सार है। अपनी वृद्धावस्था में, मैं अमेरिका आया हूँ, और मैं कृष्णभावनामृत की शिक्षा देने का प्रयत्न कर रहा हूँ, क्योंकि मेरे आध्यात्मिक गुरु ने मुझे आदेश दिया कि मुझे यह करना ही है। यह मेरा कर्तव्य है। मैं नहीं जानता कि मैं सफल होऊँगा अथवा असफल। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता; मेरा कर्तव्य पूर्ण हो जाता है यदि मैं आपके समक्ष वह सब प्रस्तुत कर सकूँ जो मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु से सुना है। इसे कृष्णभावनामृत का अनुकूल सम्पादन कहा जाता है। जो वास्तव में गम्भीर हैं, उन्हें श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि के माध्यम से श्रीकृष्ण के आदेश को अपना समूचा जीवन एवं प्राण बना लेना चाहिए। जो इस सिद्धान्त से चिपका रहता है, वह निश्चय ही प्रगति करता है। चैतन्य महाप्रभु ने इसी प्रकार कहा, और मेरे आध्यात्मिक गुरु कहा करते थे, \"आध्यात्मिक गुरु पारदर्शी माध्यम हैं।\" उदाहरणार्थ, मैं इस ग्रन्थ के अक्षरों को इन पारदर्शी चश्मों के माध्यम से भली-भाँति देख पाता हूँ, जिनके बिना मैं नहीं देख पाता क्योंकि मेरी आँखें त्रुटिपूर्ण हैं। इसी प्रकार, हमारी इन्द्रियाँ सभी त्रुटिपूर्ण हैं। हम इन आँखों से ईश्वर को नहीं देख सकते, हम इन कानों से हरे कृष्ण को नहीं सुन सकते, हम आध्यात्मिक गुरु के माध्यम के बिना कुछ नहीं कर सकते। जिस प्रकार त्रुटिपूर्ण आँख चश्मे के माध्यम के बिना नहीं देख सकती, उसी प्रकार मनुष्य आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम के बिना परमेश्वर के समीप नहीं पहुँच सकता। \"पारदर्शी\" का अर्थ है कि वह माध्यम कल्मष से मुक्त होना चाहिए। यदि वह पारदर्शी है, तो मनुष्य उसके आर-पार देख सकता है।\n\nईश्वर के अनन्य प्रेम में हमें अपनी इन्द्रियों को संलग्न करना होता है—सर्वेन्द्रिय, समस्त इन्द्रियाँ। इसका अर्थ है कि काम-वासना को भी कृष्णभावनामृत में संलग्न करना है। ईश्वर की पिता अथवा माता के रूप में धारणा भगवान् की सेवा में अपनी काम-वासना को संलग्न करने की अनुमति नहीं देती, क्योंकि पिता एवं माता के साथ कोई यौन-सम्बन्ध नहीं होता। किन्तु ईश्वर की प्रेमी के रूप में धारणा में यौन-संलग्नता भी है। अतएव, चैतन्य महाप्रभु ने परमेश्वर के साथ हमारी संलग्नता की सर्वाधिक पूर्ण जानकारी प्रदान की। जीवन की अन्य धार्मिक धारणाओं में, ईश्वर को अधिक से अधिक पिता अथवा माता के रूप में स्वीकार किया जाता है। भारत में अनेक उपासक देवी काली को ईश्वर का प्रतिनिधित्व मानते हैं। निस्सन्देह, यह अनुमोदित नहीं है, किन्तु यह विश्वास विद्यमान है, और ईसाई धर्म में भी ईश्वर की धारणा पिता के रूप में है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु हमें बताते हैं कि मनुष्य भगवान् के साथ यौन-संलग्नता भी रख सकता है। यह जानकारी चैतन्य महाप्रभु का अद्वितीय योगदान है। इस भौतिक जगत् में, यौन-संलग्नता को सर्वोच्च संलग्नता, सबसे बड़ा सुख माना जाता है, यद्यपि वह केवल एक विकृत रूप में ही विद्यमान है। तथापि, किसी ने यह धारणा नहीं की कि आध्यात्मिक जगत् में यौन-संलग्नता हो सकती है। समूचे संसार में कहीं भी ऐसे धर्मशास्त्र का एक भी उदाहरण नहीं है। यह जानकारी प्रथम बार चैतन्य महाप्रभु द्वारा दी गई है: मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अपने पति के रूप में, अपने प्रेमी के रूप में पा सकता है। यह राधा एवं कृष्ण की उपासना में सम्भव है, किन्तु कोई भी, विशेषकर निर्विशेषवादी, राधा-कृष्ण को नहीं समझ सकते। निर्विशेषवादियों को कोई धारणा ही नहीं है; वे यह तक कल्पना नहीं कर सकते कि ईश्वर का कोई रूप है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि ईश्वर का न केवल रूप है, अपितु उनका यौन-जीवन भी है। यह चैतन्य महाप्रभु का सर्वोच्च योगदान है।\n\nमनुष्य विभिन्न सम्बन्धों में परमेश्वर की सेवा कर सकता है, किन्तु भौतिक जगत् में वे सम्बन्ध केवल विकृत प्रतिबिम्बों के रूप में विद्यमान हैं। इस भौतिक जगत् के सम्बन्ध में हमारी संलग्नता क्या है? समाज, मैत्री तथा प्रेम के विषय में हमारी धारणाएँ क्या हैं? वे सभी जीवन की भौतिक धारणा पर आधारित हैं। हमारे समाज में, कोई किसी पुत्र के पिता अथवा माता के रूप में संलग्न है, और अन्य पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका के रूप में संलग्न हैं। अन्य रस (सम्बन्ध) भी हैं, जैसे किसी दूसरे के साथ शत्रु के रूप में संलग्न होना। बारह विभिन्न सम्बन्ध हैं, जिनमें से पाँच प्रमुख हैं। शेष सात अप्रत्यक्ष सम्बन्ध हैं, जैसे, उदाहरणार्थ, किसी का शत्रु होना। शत्रुओं के बीच भी प्रायः एक सम्बन्ध होता है, यहाँ तक कि एक हत्यारे तथा जिसकी वह हत्या करता है, उसके बीच भी। किन्तु जहाँ तक श्रीकृष्ण के साथ हमारे सम्बन्ध का प्रश्न है, यदि कोई उनके शत्रु के रूप में भी सम्बन्ध स्थापित कर ले, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। अतएव, जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को श्रीकृष्ण के साथ संलग्न करता है, तब बारह विभिन्न प्रकारों में से किसी एक में सम्बन्ध स्थापित हो सकता है, जिनमें से पाँच प्रकार प्रत्यक्ष हैं और सात अप्रत्यक्ष।\n\nजब श्रीकृष्ण कंस के अखाड़े में प्रकट हुए, तब अनेक विशाल मल्ल उन्हें मारने के लिए तैयार थे। वस्तुतः, उन्हें वहाँ मारे जाने के लिए ही आमन्त्रित किया गया था। उनके शत्रु कंस ने सोचा, \"शीघ्र ही ये बालक आएँगे। हमने सोलह वर्षों तक उन्हें मारने का प्रयत्न किया, किन्तु वह बालक कृष्ण मारा न जा सका। किन्तु अब मैंने उसे अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया है, और जब वह आएगा तो इन मल्लों के साथ लड़ेगा, और वे उसे मार डालेंगे।\" आसुरी अथवा नास्तिक लोग सदा श्रीकृष्ण को, अर्थात् ईश्वर को, मारने के विचार में रहते हैं। इसी कारण वे अपने सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं कि ईश्वर मर चुका है। वे सोचते हैं कि यदि ईश्वर मर जाए, तो वे जैसा चाहें वैसा करने के लिए स्वतन्त्र हो जाएँगे। किन्तु जहाँ तक उनकी वास्तविक गतिविधियों का प्रश्न है, ईश्वर मरा हो अथवा जीवित, किन्तु ईश्वर का अभिकर्ता, अर्थात् भौतिक शक्ति, इतनी प्रबल है कि कोई भी स्वतन्त्र रूप से कोई अनुचित कार्य नहीं कर सकता। जैसे ही कोई कुछ अनुचित करता है, तत्क्षण दण्ड मिलता है। इसके लिए ईश्वर की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर मरा हो अथवा जीवित, किन्तु भौतिक शक्ति किसी भी व्यक्ति को दण्डित करने हेतु पर्याप्त है जो भौतिक नियमों का तनिक भी उल्लंघन करता है। ईश्वर ने ये परिस्थितियाँ निर्धारित की हैं, किन्तु मूर्ख लोग नहीं समझते।\n\nतथापि, भगवान् चैतन्य शुद्ध भक्ति-जीवन में समस्त इन्द्रियों को श्रीकृष्ण की सेवा में अनुकूल रीति से संलग्न करने की बात कहते हैं। मनुष्य को अपनी इन्द्रियों को अनुकूल रीति से संलग्न करना चाहिए और वह करना चाहिए जो श्रीकृष्ण चाहते हैं। फिर भी यदि कोई अपनी इन्द्रियों को श्रीकृष्ण की इच्छा के विरुद्ध संलग्न करे किन्तु फिर भी श्रीकृष्ण का चिन्तन करे, तो वह भी लाभप्रद है। उदाहरणार्थ, पूतना नामक असुरी ने श्रीकृष्ण को मारने का विचार किया। जिस प्रकार ईश्वरीय व्यक्तियों का कार्य ईश्वर की सेवा करना है, उसी प्रकार असुर तथा नास्तिक सदा ईश्वर को मारने के लिए तत्पर रहते हैं। पूतना ने सोचा, \"मैं श्रीकृष्ण को मार डालूँगी। वह तो केवल एक बालक है।\" यह आसुरी जनों की एक और भूल है। वे श्रीकृष्ण को, अर्थात् ईश्वर को, एक साधारण बालक अथवा मनुष्य समझते हैं। तो इस प्रकार पूतना सोच रही थी: \"मैं अपने स्तन पर विष लगा लूँ, और जब वह बालक मेरा दूध पीने जाएगा, तब वह मर जाएगा।\" जैसे ही हम इसका अध्ययन करते हैं, हम देखते हैं कि वह श्रीकृष्ण के पास उनकी शत्रु के रूप में आई, फिर भी उन्होंने उसे मित्र के रूप में स्वीकार किया क्योंकि वे अत्यन्त दयालु हैं। उन्होंने उसकी मानसिकता के आसुरी अंश को नहीं लिया, अपितु उसे स्वीकार कर लिया। प्रत्येक जीव बद्ध है, किन्तु श्रीकृष्ण नहीं हैं। एक चिकित्सक अथवा मनोचिकित्सक उन्मादियों का उपचार करता है, किन्तु वह स्वयं उन्मादी नहीं हो जाता। कभी-कभी कोई रोगी उस पर क्रोधित हो सकता है अथवा उसे गाली दे सकता है, किन्तु चिकित्सक शान्त रहता है और केवल उसका उपचार करता है। इसी प्रकार, यदि कोई श्रीकृष्ण को अपना शत्रु माने, तो श्रीकृष्ण उसके शत्रु नहीं हो जाते।\n\nपूतना श्रीकृष्ण को विष देने आई, किन्तु उन्होंने इसे अन्यथा रूप में लिया। उन्होंने सोचा, \"मैंने उसका स्तन-दुग्ध पिया है। इसलिए वह मेरी माता बन गई है।\" श्रीकृष्ण ने उसके साथ अपनी माता के समान व्यवहार किया, और इसी कारण वह श्रीकृष्ण की वास्तविक माता यशोदा के समान ही पद को प्राप्त होकर मुक्त हो गई। निष्कर्ष यह है कि सर्वोच्च पूर्णता श्रीकृष्ण के साथ अनुकूल सम्बन्ध स्थापित करना है, किन्तु यदि कोई स्वयं को प्रतिकूल रूप से भी संलग्न करे, तो भी श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि वे उसे कम-से-कम मुक्ति तो प्रदान कर ही देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा मारे गए समस्त शत्रु तत्क्षण मुक्त हो गए।\n\nदो वर्ग के मनुष्य निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन हो सकते हैं: जो जान-बूझकर निराकार ब्रह्मज्योति में विलीन होने की आकांक्षा करते हैं, वे प्रवेश कर सकते हैं, और जो श्रीकृष्ण के शत्रु हैं और उनके द्वारा मारे जाते हैं, वे भी ऐसा कर सकते हैं। अतएव, भक्त निष्कर्ष निकालता है: मैं ऐसी अवस्था को क्यों स्वीकार करूँ जो ईश्वर के शत्रुओं को भी प्रदान की जाती है?\n\nचैतन्य महाप्रभु शुद्ध भक्ति-सेवा की अनुशंसा करते हैं। न तो अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने की कोई कामना होनी चाहिए, न प्रायोगिक दर्शन द्वारा श्रीकृष्ण को समझने का कोई प्रयास होना चाहिए, और न ही श्रीकृष्ण से भौतिक लाभ प्राप्त करने हेतु कोई सकाम कर्म होने चाहिए। एकमात्र इच्छा यही होनी चाहिए कि उनकी अनुकूल रीति से सेवा की जाए, जैसा वे चाहते हैं। यदि श्रीकृष्ण कुछ चाहें, तो हमें वही करना चाहिए। मान लीजिए मैं किसी शिष्य से कहूँ, \"हे मेरे प्रिय छात्र, कृपया मुझे एक गिलास जल दो।\" तब यह उसका कर्तव्य है कि वह मुझे एक गिलास जल दे। यदि वह सोचे, \"प्रभुपाद एक गिलास जल चाहते हैं, किन्तु उन्हें कोई और श्रेष्ठ वस्तु क्यों न दूँ? एक गिलास गर्म दूध क्यों न दूँ?\" तो यह सेवा नहीं है। उसकी दृष्टि में, गर्म दूध अत्यन्त स्वादिष्ट है और जल से श्रेष्ठ है, फिर भी क्योंकि मैंने जल माँगा है, अतः उसे मुझे जल देना है, दूध नहीं। यही अनुकूल सेवा है। मनुष्य को यह समझना होता है कि श्रीकृष्ण क्या चाहते हैं। जब वह घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, तब मनुष्य श्रीकृष्ण की सर्वाधिक अनुकूल रीति से सेवा कर सकता है। और जब तक वह घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं होता, तब तक मनुष्य को श्रीकृष्ण क्या चाहते हैं इसकी जानकारी आध्यात्मिक गुरु के पारदर्शी माध्यम से लेनी होती है।\n\nवैष्णव कभी यह नहीं सोचता कि श्रीकृष्ण के साथ उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। भगवान् चैतन्य कहते हैं, \"मैं श्रीकृष्ण के सेवक के सेवक के सेवक के सेवक का सेवक हूँ—सौ बार सेवक का सेवक।\" हमें सेवक के सेवक के सेवक बनने के लिए सहमत होना होगा। यही गुरु-परम्परा की विधि है, और यदि कोई वास्तविक, दिव्य ईश्वर-प्रेम चाहता है, तो उसे यह विधि अपनानी होगी। चूँकि लोग इस विधि को स्वीकार नहीं करते, इसलिए वे वास्तविक ईश्वर-प्रेम विकसित नहीं करते। वे ईश्वर की बात करते हैं, किन्तु वस्तुतः वे ईश्वर से प्रेम नहीं करते; चूँकि शुद्ध भक्ति-सेवा का कोई अनुशीलन नहीं है, इसलिए वे कुत्ते से प्रेम करते हैं।\n\nहम कह सकते हैं, \"ईश्वर-प्रेम\", किन्तु जब तक हम इस सिद्धान्त को न अपनाएँ, तब तक हमें कुत्ते से प्रेम करना होगा, ईश्वर से नहीं। यही भूल है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि यदि कोई वास्तव में ईश्वर-प्रेम चाहता है, तो उसे शुद्ध भक्ति-सेवा की विधि का अनुसरण करना होगा। ऐसा नहीं है कि चैतन्य महाप्रभु अपनी ही मानसिक कल्पना से कह रहे हैं; उनके कथन वैदिक शास्त्रों में, जैसे नारद-पञ्चरात्र तथा श्रीमद्भागवत में, पुष्ट हैं। ये दोनों ग्रन्थ, तथा भगवद्गीता, भक्तों के लिए अभिप्रेत अत्यन्त प्रामाणिक शास्त्र हैं। चैतन्य महाप्रभु नारद-पञ्चरात्र के एक श्लोक से उद्धरण देते हैं: हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिर् उच्यते [चै.च. मध्य 19.170]। यह शुद्ध भक्ति-सेवा की परिभाषा है। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनम्। हृषीकेण का अर्थ है \"अपनी इन्द्रियों से\"। हमें अपनी इन्द्रियों को संलग्न करना होता है; ऐसा नहीं कि हम केवल अपने मन को संलग्न करें। यदि कोई कहे, \"मैं सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करता हूँ\", तो वह शुद्ध भक्ति-सेवा नहीं है। ध्यान चिन्तन है, किन्तु कोई श्रीकृष्ण का चिन्तन नहीं करता; वे शून्य अथवा किसी निराकार वस्तु का चिन्तन करते हैं। यदि कोई श्रीकृष्ण अथवा नारायण अथवा विष्णु का चिन्तन करे, जैसा वैदिक शास्त्रों में निर्धारित है, तो वही वास्तविक योग है; योग-ध्यान का अर्थ है अपने मन को परमात्मा पर केन्द्रित करना। परमात्मा चतुर्भुज नारायण के रूप में श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व हैं। पतञ्जलि तक, जो योग-पद्धति के एक प्रामाणिक आचार्य हैं, विष्णु पर ध्यान निर्धारित करते हैं। किन्तु जिस प्रकार लोग कूट धार्मिक विधियाँ गढ़ रहे हैं, उसी प्रकार आज के तथाकथित योगियों ने किसी शून्य वस्तु का चिन्तन करने की अपनी ही रीति गढ़ ली है।\n\nकिन्तु नारद-पञ्चरात्र कहता है, हृषीकेण हृषीकेश-सेवनम्: [चै.च. मध्य 19.170] मनुष्य को न केवल अपने मन को, अपितु अपनी इन्द्रियों को भी संलग्न करना चाहिए। इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी की सेवा में संलग्न कीजिए। ये तीन संस्कृत शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। हृषीकेश का अर्थ है \"इन्द्रियों के स्वामी\"। अतः भक्तियोग का अर्थ है इन्द्रियों के स्वामी की इन्द्रियों से सेवा करना। इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण हैं। हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारे पास हमारी इन्द्रियाँ इसलिए हैं क्योंकि हम इस भौतिक जगत् का भोग करना चाहते थे, और इसी कारण भगवान् ने हमारे भोग हेतु हमें इन्द्रियों का एक विशेष समूह दिया है। सूअर का एक विशेष प्रकार का शरीर एवं इन्द्रियाँ हैं क्योंकि वह विष्ठा खाने का भोग करना चाहता था। इसी प्रकार, मनुष्य का एक विशेष प्रकार का शरीर एवं इन्द्रियाँ हैं क्योंकि वह कुछ और भोगना चाहता था। हमारे पास बद्ध इन्द्रियों का एक विशेष समूह है जिससे इस भौतिक जगत् का भोग करना है, और यही वह है जिसे हमें शुद्ध करना है। हमारी इन्द्रियाँ मूल हैं, किन्तु अब वे भौतिक इच्छाओं से ढकी हुई हैं। हमें अपना उपचार करके ऐसी इच्छाओं से मुक्त होना है। जब किसी की इन्द्रियाँ भौतिक इन्द्रियतृप्ति की ओर अब प्रवृत्त नहीं रहतीं, तब उसकी स्थिति को शुद्ध भक्ति कहा जाता है।\n\nनारद-पञ्चरात्र के इस श्लोक से, हम समझ सकते हैं कि आत्मा की मूल इन्द्रियाँ हैं। आत्मा चाहे कितने भी छोटे शरीर में प्रवेश कर गई हो, वह निराकार नहीं है; उसकी इन्द्रियाँ हैं। सम्भव है किसी को अपने ग्रन्थ पर कोई खटमल मिल जाए। वह इतना छोटा है, किसी सूई की नोक से भी छोटा, फिर भी वह चलता है; उसकी समस्त इन्द्रियाँ हैं। छोटे जीवाणु भी चलते हैं, और उनकी अपनी इन्द्रियाँ हैं। मूलतः, समस्त जीवों की इन्द्रियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि इन्द्रियाँ कुछ भौतिक परिस्थितियों में विकसित हुई हों। नास्तिक सिद्धान्त यह है कि भौतिक परिस्थितियों में हमने इन्द्रियाँ विकसित की हैं, कि आध्यात्मिक अवस्था में कोई इन्द्रियाँ नहीं हैं, और कि हम निराकार हैं। किन्तु तर्क एवं युक्ति से, वह ऐसा नहीं हो सकता। आध्यात्मिक शक्ति का एक सूक्ष्म कण, चाहे वह आकार में किसी परमाणु से भी छोटा हो, उसकी अपनी इन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ, भौतिक तत्त्वों से ढकी होने के कारण, एक विकृत रूप में प्रकट होती हैं। हमें इन्द्रियों को शुद्ध करना होता है, और जब इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तब हम उन्हें इन्द्रियों के स्वामी के सुख हेतु संलग्न कर सकते हैं। श्रीकृष्ण इन्द्रियों के स्वामी एवं अधिपति हैं। अतएव, चूँकि हम परमेश्वर के अंश हैं, इसलिए हमारी इन्द्रियाँ उन्हीं से उधार ली गई हैं; वे किराए पर हैं। सर्वोत्तम बात यह है कि इन्द्रियों का उपयोग उनकी इन्द्रिय-तृप्ति हेतु करें, न कि अपनी। यही शुद्ध कृष्णभावनामृत की विधि है।\n\nश्रीमद्भागवत से, भगवान् चैतन्य शुद्ध भक्ति का एक उदाहरण देते हैं: भागवत में कहा गया है कि श्रीकृष्ण प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। अतएव, जिस प्रकार नदियाँ बहती हैं और उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति समुद्र तक पहुँचने की होती है, उसी प्रकार जैसे ही कोई भगवान् की महिमा सुनता है, उसकी आत्मा तत्क्षण परमेश्वर की ओर आकृष्ट हो जाती है। यही शुद्ध भक्ति-सेवा का आरम्भ है। जैसे ही जप की ध्वनि होती है, हरे कृष्ण, तत्क्षण श्रीकृष्ण की समस्त सामग्री, श्रीकृष्ण का नाम, श्रीकृष्ण की कीर्ति, श्रीकृष्ण का धाम, श्रीकृष्ण के पार्षद—सब कुछ—अकस्मात् भीतर प्रकट हो जाते हैं क्योंकि वे उपस्थित हैं। यही मनुष्य के कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। किसी सन्दर्भ के आधार पर स्मरण करने का अर्थ है कि जैसे ही कोई कोई संकेत-शब्द सुनता है, वह तत्क्षण उस संकेत के पीछे की समस्त जानकारी का स्मरण कर लेता है। इसी प्रकार, जब हमारे मन केवल श्रीकृष्ण के गुणों की थोड़ी-सी महिमा सुनने मात्र से श्रीकृष्ण की ओर तथा श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, वही शुद्ध कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। तब और कोई गति, अर्थात् मन का संचलन नहीं रहता।\n\nगोपियों के साथ ठीक ऐसा ही हुआ: जैसे ही उन्होंने श्रीकृष्ण की बंशी की ध्वनि सुनी, उन्होंने सब कुछ त्याग दिया। उनमें से कुछ लेटी हुई थीं, कुछ अपने पारिवारिक कार्यों में लगी थीं, कुछ अपने बालकों की देखभाल कर रही थीं, किन्तु जैसे ही उन्होंने श्रीकृष्ण की बंशी सुनी, वे सब कुछ भूलकर उनकी ओर दौड़ पड़ीं। उनके पतियों ने, उनके भाइयों ने, तथा उनके पिताओं ने कहा, \"तुम अपना कर्तव्य छोड़कर क्यों जा रही हो?\" किन्तु उन्होंने परवाह नहीं की—वे बस चली गईं। मन के श्रीकृष्ण में उस विलय में कोई अवरोध तथा कोई बाधा नहीं है। यही शुद्ध भक्ति का आरम्भ है।\n\nपुरुषोत्तम का अर्थ है श्रीकृष्ण। पुरुष शब्द का अर्थ है \"भोक्ता\"। बद्ध जीव मिथ्या भोक्ता, अनुकरण-भोक्ता हैं। यहाँ इस भौतिक जगत् में, समस्त जीव पुरुषों के रूप में कार्य कर रहे हैं। पुरुष का अधिक सटीक अर्थ है \"नर\"। नर को भोक्ता माना जाता है, और नारी को भोग्य माना जाता है। भौतिक जगत् में, चाहे किसी का नर शरीर हो अथवा नारी शरीर, प्रत्येक में भोग करने की प्रवृत्ति है, और इसी कारण प्रत्येक को पुरुष कहा जाता है। किन्तु वस्तुतः एकमात्र पुरुष परमेश्वर हैं। हम जीव उनकी शक्ति हैं, और वे परम भोक्ता हैं। हम पुरुष नहीं हैं। शक्तियाँ भोग हेतु प्रयुक्त की जाती हैं, और हम शक्तियाँ हैं, परम पुरुष के उपकरण हैं। अतएव पुरुषोत्तम परम दिव्य पुरुष, अर्थात् श्रीकृष्ण हैं। जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति हमारी शुद्ध भक्ति प्रयुक्त होती है और कोई अवरोध अथवा बाधाएँ नहीं रहतीं, वही शुद्ध कृष्णभावनामृत का लक्षण है।\n\nशुद्ध कृष्णभावनामृत में कोई महत्त्वाकांक्षा अथवा मंशा नहीं होती। उपासना का प्रत्येक अन्य दिव्य कृत्य अथवा प्रकार किसी मंशा से प्रेरित होता है: कोई मुक्ति चाहता है, कोई भौतिक समृद्धि चाहता है, कोई किसी उच्चतर लोक में जाना चाहता है, कोई कृष्णलोक जाना चाहता है। ये महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं होनी चाहिए। शुद्ध भक्त की ऐसी कोई महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं होतीं। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण के परम धाम जाने की इच्छा तक नहीं करता। निस्सन्देह, वह जाता है, किन्तु उसकी कोई इच्छा नहीं होती। वह केवल अपने आपको पूर्णतः श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न करना चाहता है।\n\nविभिन्न प्रकार की मुक्ति होती है। सालोक्य मुक्ति है, अर्थात् परमेश्वर के साथ उसी लोक में रहना। वैकुण्ठ-लोकों के निवासी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ उसी लोक में रहते हैं। सार्ष्टि मुक्ति का अर्थ है नारायण के समान ही प्रायः वही ऐश्वर्य प्राप्त करना। मुक्त जीवात्मा ठीक नारायण के समान प्रकट हो सकती है, चार भुजाओं सहित, चार प्रतीकों सहित, प्रायः वही शारीरिक लक्षणों सहित, वही ऐश्वर्य, वही आभूषण, वही भवन, सब कुछ। सारूप्य का अर्थ है वही रूप अथवा लक्षण प्राप्त करना। सामीप्य का अर्थ है कभी दूर न रहना, अपितु सदा परमेश्वर के साथ संग करना। उदाहरणार्थ, जिस प्रकार हम साथ बैठे हैं, उसी प्रकार मनुष्य भगवान् के साथ संग कर सकता है। इसे सामीप्य-मुक्ति, अर्थात् समीप होने की मुक्ति कहा जाता है। तथापि, शुद्ध भक्तगण मुक्ति के इन विभिन्न रूपों को स्वीकार नहीं करते। वे केवल श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहना चाहते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की मुक्ति से सरोकार नहीं है। जो वास्तव में कृष्णभावनाभावित हैं, वे परमेश्वर का संग प्राप्त करते हैं, किन्तु वे उसकी इच्छा नहीं करते; उनकी एकमात्र महत्त्वाकांक्षा भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहना है। भक्ति-सेवा, अर्थात् कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च पूर्णता तब प्रदर्शित होती है जब कोई भक्त परमेश्वर से किसी वरदान अथवा लाभ को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है। प्रह्लाद महाराज को जो भी उन्हें प्रिय था वह प्रस्तावित किया गया, उन्हें केवल माँगना था, किन्तु उन्होंने कहा, \"हे मेरे प्रभु, मैं आपका नित्य सेवक हूँ। आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है, तो फिर मैं उससे कोई लाभ कैसे स्वीकार कर सकता हूँ? तब तो मैं आपका सेवक नहीं रहूँगा; मैं तो व्यापारी हो जाऊँगा।\" उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया, और यही शुद्ध व्यक्ति का चिह्न है। श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि वे भक्त की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, चाहे वह भौतिक वरदान ही क्यों न चाहे। यदि भक्त के हृदय की गहराई में कोई इच्छा हो, तो वे उसे भी पूर्ण करते हैं। वे इतने दयालु हैं। किन्तु भक्तियोग, अर्थात् भक्ति-सेवा की उदात्त स्थिति यह है कि शुद्ध भक्त मुक्ति के विभिन्न प्रकारों को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है, चाहे वे परमेश्वर द्वारा ही प्रस्तावित क्यों न किए जाएँ।\n\nयदि किसी के भीतर भौतिक इच्छाएँ अथवा मंशाएँ हों, और ऐसी इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह स्वयं को भक्ति-सेवा में संलग्न करे, तो परिणाम यह होगा कि उसे कभी शुद्ध ईश्वर-प्रेम प्राप्त नहीं होगा। यदि कोई यह सोच रहा है, \"मैं कृष्णभावनामृत में, श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा में संलग्न हूँ, क्योंकि मुझे अमुक-अमुक ऐश्वर्य चाहिए\", तो वह इच्छा भले ही पूर्ण हो जाए, किन्तु उसे श्रीकृष्ण का वैसा अनन्य प्रेम कभी प्राप्त नहीं होगा जैसा गोपियों को था। यदि किसी की कोई मंशा हो, तो वह अपना भक्ति-कर्तव्य निभाते हुए भी शुद्ध ईश्वर-प्रेम की अवस्था तक नहीं पहुँच पाएगा। भक्ति-रसामृत-सिन्धु के एक श्लोक में, रूप गोस्वामी कहते हैं, \"जब तक मनुष्य किसी भौतिक लाभ [भुक्ति] की इच्छा करता है, अथवा यदि वह मुक्ति [मुक्ति] भी चाहता है, तब तक उसे उन प्रेत-रूपी प्रतिनिधित्वों को ग्रहण करना होगा।\" जब तक वह माया किसी के हृदय के भीतर विद्यमान रहती है, तब तक मनुष्य शुद्ध ईश्वर-प्रेम से प्राप्त उस आध्यात्मिक आनन्द का भोग कैसे कर सकता है? दूसरे शब्दों में, यदि किसी की भौतिक इच्छाएँ हों, अथवा मुक्ति की भी इच्छा हो, तो वह शुद्ध ईश्वर-प्रेम प्राप्त नहीं कर सकता। शुद्ध भक्ति समस्त इच्छाओं से रहित होती है—वह केवल प्रेममयी सेवा को उसके अपने ही निमित्त अर्पित करना है।\n\nरूप गोस्वामी के जीवन में एक सुन्दर उदाहरण है। रूप गोस्वामी तथा उनके बड़े भाई सनातन गोस्वामी वृन्दावन में अलग-अलग रहते थे और अपना भजन, अर्थात् भक्ति-सेवा करते रहते थे। रूप वन में रहते थे, और वहाँ उत्तम भोजन पकाने अथवा एक चपाती खाने के लिए गाँव से भिक्षा माँगने की कोई सुविधा नहीं थी। रूप गोस्वामी छोटे भाई थे, और उन्होंने सोचा, \"यदि मुझे कुछ खाद्य-सामग्री मिल जाए, तो मैं उत्तम व्यंजन तैयार करके श्रीकृष्ण को अर्पित कर सकता हूँ और अपने बड़े भाई को आमन्त्रित कर सकता हूँ।\" उनकी यह इच्छा थी। अगले ही क्षण, लगभग बारह वर्ष की एक सुन्दर बालिका आई और प्रचुर मात्रा में खाद्य-सामग्री—दूध, आटा, घी इत्यादि—दे गई। यही वैदिक व्यवस्था है; कभी-कभी गृहस्थ संन्यास-आश्रम के याचकों एवं ऋषियों को खाद्य-सामग्री भेंट करते हैं। रूप गोस्वामी अत्यन्त प्रसन्न हुए कि श्रीकृष्ण ने इतनी सारी वस्तुएँ भेजी हैं और कि अब वे एक भोज तैयार कर सकते हैं। उन्होंने एक भोज तैयार किया और फिर अपने बड़े भाई को आमन्त्रित किया।\n\nजब सनातन गोस्वामी आए, तब वे आश्चर्यचकित हुए। \"तुमने ये वस्तुएँ कैसे प्राप्त कीं? तुमने इस वन में इतना उत्तम भोज तैयार कर लिया है। यह कैसे सम्भव है?\"\n\nअतः रूप गोस्वामी ने समझाया, \"प्रातःकाल मैंने इसकी इच्छा की, और संयोगवश श्रीकृष्ण ने मुझे ये समस्त वस्तुएँ भेज दीं। एक सुन्दर बालिका आई, और उसने मुझे ये दे दीं।\" वे उस बालिका का वर्णन कर रहे थे: \"एक अत्यन्त सुन्दर बालिका।\"\n\nतब सनातन ने कहा, \"यह सुन्दर बालिका राधारानी हैं। तुमने राधारानी से, भगवान् की नित्य प्रियतमा से सेवा ले ली है। यह बड़ी भारी भूल है।\" यही उनका दर्शन है। वे भगवान् से सेवा स्वीकार नहीं करते। वे केवल सेवा अर्पित करना चाहते थे। किन्तु श्रीकृष्ण इतने चतुर हैं कि वे भी अपने भक्त की सेवा करना चाहते हैं। वे अपने भक्त की सेवा करने का अवसर ढूँढ़ते रहते हैं। यह आध्यात्मिक स्पर्धा है। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण से कुछ नहीं चाहता; वह केवल उनकी सेवा करना चाहता है। और श्रीकृष्ण भी अपने भक्त की सेवा करने का अवसर ढूँढ़ते हैं। श्रीकृष्ण अपने भक्त को प्रसन्न करने के लिए सदा उतने ही व्यग्र रहते हैं जितना भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए।\n\nयही दिव्य जगत् है। परम स्तर पर, कोई शोषण नहीं है। प्रत्येक सेवा करना चाहता है; कोई सेवा लेना नहीं चाहता। दिव्य जगत् में, प्रत्येक सेवा देना चाहता है। आप मुझे सेवा देना चाहते हैं, और मैं आपको सेवा देना चाहता हूँ। यह कितनी सुन्दर भावना है। इस भौतिक जगत् का अर्थ है कि मैं आपकी जेब काटना चाहता हूँ, और आप मेरी जेब काटना चाहते हैं। बस इतना ही। यही भौतिक जगत् है। हमें इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। भौतिक जगत् में, प्रत्येक अपने मित्र का, अपने पिता का, अपनी माता का, प्रत्येक का शोषण करना चाहता है। किन्तु दिव्य जगत् में, प्रत्येक सेवा करना चाहता है। प्रत्येक के लिए श्रीकृष्ण सेवा के केन्द्र-बिन्दु हैं, और समस्त भक्तगण, चाहे श्रीकृष्ण के मित्र, सेवक, माता-पिता अथवा प्रेमी के रूप में, सभी उनकी सेवा करना चाहते हैं। और साथ ही, श्रीकृष्ण भी उनकी सेवा करना चाहते हैं। यह एक दिव्य सम्बन्ध है; मुख्य कार्य सेवा है, यद्यपि सेवा की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्येक परिपूर्ण है। वहाँ कोई भूख नहीं है, खाने की कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी प्रत्येक खाने के लिए उत्तम वस्तुएँ अर्पित करता है। यही दिव्य जगत् है। जब तक हम केवल श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की सेवा करने की अवस्था तक न पहुँच जाएँ, तब तक हम सेवा के दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकते। यदि हमारी कोई मंशा हो, तो वह भाव कभी जागृत नहीं होगा। बिना किसी मंशा के, बिना व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की इच्छा के, परमेश्वर तथा उनके भक्तों की सेवा अर्पित की जानी चाहिए।\n\nआत्म-साक्षात्कार की पूर्णता\n\nइस समापन-अध्याय में, श्रील प्रभुपाद आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान के परम लक्ष्य—परम आत्मा, अर्थात् श्रीकृष्ण के पूर्ण साक्षात्कार—पर चर्चा करते हैं। आत्म-साक्षात्कार का विकास इस समझ से आरम्भ होता है कि आत्मा भौतिक नहीं है—कोई भौतिक शरीर नहीं है—अपितु शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा है। तदुपरान्त, मनुष्य यह अनुभव करता है कि शुद्ध, आध्यात्मिक आत्मा नित्य रूप से परम आत्मा, अर्थात् श्रीकृष्ण का अंश है। अन्ततः मनुष्य यह सीखता है कि उस नित्य, आनन्दमय, दिव्य सम्बन्ध में पूर्ण रूप से कैसे जिया जाए। जिसने इस अवस्था को प्राप्त कर लिया है, उसने जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर ली है।\n\nजब श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर थे, तब वृन्दावन के समस्त निवासी उनसे प्रेम करते थे। वस्तुतः, वे श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे। वे यह नहीं जानते थे कि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं अथवा नहीं, और न ही वे इन विचारों से विचलित होते थे कि \"यदि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं तो मैं उनसे प्रेम करूँगा।\" उनकी भावना शुद्ध प्रेम की थी, और वे सोचते थे, \"वे ईश्वर हों अथवा न हों—इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हम श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं, बस इतना ही।\" अतः यही वास्तविक, अनन्य प्रेम का स्तर है। जब कोई सोचता है, \"यदि श्रीकृष्ण ईश्वर हैं, तो मैं उनसे प्रेम करूँगा\", तो यह जान लेना चाहिए कि यह शुद्ध प्रेम का नहीं, अपितु सशर्त प्रेम का स्तर है। पृथ्वी पर रहते हुए, श्रीकृष्ण ने असाधारण शक्तियाँ प्रदर्शित कीं, और व्रजवासी, अर्थात् वृन्दावन के निवासी, प्रायः सोचते थे, \"ओह, श्रीकृष्ण कैसे अद्भुत बालक हैं। सम्भव है वे कोई देवता हों।\" वे इस प्रकार इसलिए सोचते थे क्योंकि लोग सामान्यतः इस धारणा के अधीन थे कि देवता सर्वशक्तिमान् होते हैं। भौतिक जगत् के भीतर देवता शक्तिशाली होते हैं, किन्तु लोग इससे अनभिज्ञ हैं कि श्रीकृष्ण इन सभी से ऊपर हैं। देवताओं में सर्वोच्च, ब्रह्मा ने इस विषय में अपना मत इस श्लोक में दिया, ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः [ब्र.सं. 5.1]: \"श्रीकृष्ण परम नियन्ता हैं, और उनका शरीर ज्ञान, आनन्द एवं नित्यता से परिपूर्ण है।\" वृन्दावन के निवासी श्रीकृष्ण की परम नियन्ता तथा समस्त देवताओं के स्वामी के रूप में उनकी शक्ति को बहुत कम जानते थे। उल्लेखनीय बात यह है कि उनके प्रति इनका प्रेम ऐसे विचारों के अधीन नहीं था।\n\nजिस प्रकार वृन्दावन के निवासी श्रीकृष्ण से निःशर्त प्रेम करते थे, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी उनसे निःशर्त प्रेम करते थे। व्रज-जन-वल्लभ, गिरि-वर-धारी। जब वृन्दावन के निवासियों ने स्वर्ग के प्रमुख देवता, इन्द्र को यज्ञ अर्पित करना बन्द कर दिया, तब उन्होंने स्वयं को एक अत्यन्त संकटपूर्ण स्थिति में डाल लिया। इन्द्र अत्यन्त क्रोधित हुए और शक्तिशाली बादल भेजे जो सात दिनों तक वृन्दावन पर निरन्तर बरसते रहे। समूचा क्षेत्र जलमग्न होने लगा, और निवासी अत्यन्त विचलित हो गए। यद्यपि वे केवल सात वर्ष के थे, फिर भी श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर तथा उसे गाँव की रक्षा हेतु एक छत्र के समान धारण करके वृन्दावन के निवासियों को बचा लिया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने देवता इन्द्र को यह शिक्षा दी कि उनकी ये बाधाएँ केवल उनकी छोटी-सी उँगली से रोकी जा सकती हैं। यह देखकर, भगवान् इन्द्र श्रीकृष्ण के समक्ष नतमस्तक हो गए।\n\nइस प्रकार श्रीकृष्ण गोपीजन-वल्लभ के रूप में भी विख्यात हुए, जो यह संकेत करता है कि उनका एकमात्र कार्य गोपी-जन की रक्षा करना है। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को यह सिखाने का लक्ष्य रखता है कि गोपी-जन, अर्थात् श्रीकृष्ण के शुद्ध प्रेमी कैसे बना जाए। जब हम ईश्वर के शुद्ध प्रेम की उस अवस्था तक पहुँच जाते हैं, तब भगवान् हमें किसी भी संकट से बचाएँगे, भले ही इसके लिए उन्हें कोई पहाड़ी अथवा पर्वत ही क्यों न उठाना पड़े। श्रीकृष्ण को गोवर्धन पर्वत उठाने के लिए किसी योग-पद्धति का अभ्यास नहीं करना पड़ा। ईश्वर के रूप में, वे सर्वशक्तिमान् हैं, बालक के रूप में भी। वे बालक के समान खेलते थे और दूसरों के साथ बालक के समान व्यवहार करते थे, किन्तु जब आवश्यकता हुई, तब उन्होंने स्वयं को सर्वशक्तिमान् ईश्वर के रूप में प्रकट किया। यही श्रीकृष्ण का, अर्थात् ईश्वर का स्वभाव है: उन्हें ईश्वर बनने के लिए ध्यान का अभ्यास अथवा किसी योग-पद्धति का अनुसरण नहीं करना पड़ता। वे कोई निर्मित प्रकार के ईश्वर नहीं हैं, अपितु नित्य रूप से ईश्वर हैं।\n\nयद्यपि वे ईश्वर हैं, फिर भी वे अपने भक्तों के साथ प्रेममय सम्बन्धों का आनन्द लेते हैं, और अपने भक्तों को सन्तुष्ट करने हेतु वे प्रायः ऐसी भूमिकाएँ ग्रहण करते हैं जो गौण प्रतीत होती हैं। श्रीकृष्ण को प्रायः किसी भक्त का बालक बनना अच्छा लगता है, और इस प्रकार वे यशोदा के प्रिय बालक, यशोदा-नन्दन बन गए। चूँकि वे ईश्वर हैं और प्रत्येक उनकी आराधना करता है, इसलिए कोई उन्हें ताड़ना नहीं देता। तथापि, श्रीकृष्ण अपने भक्त माता-पिता द्वारा ताड़ना पाने का आनन्द लेते हैं, और चूँकि श्रीकृष्ण ताड़ना पाने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, इसलिए भक्तगण भी यह भूमिका ग्रहण कर लेते हैं, यह कहते हुए, \"ठीक है, मैं आपका पिता बनूँगा और आपको ताड़ना दूँगा।\" इसी प्रकार, जब श्रीकृष्ण युद्ध करना चाहते हैं, तब उनका कोई भक्त हिरण्यकशिपु असुर बनकर उनसे लड़ता है। इस प्रकार, श्रीकृष्ण की समस्त गतिविधियाँ उनके भक्तों के सम्बन्ध में सम्पन्न होती हैं। यदि हम श्रीकृष्ण के ऐसे पार्षद बनने की आकांक्षा करते हैं, तो हमें कृष्णभावनामृत, अर्थात् श्रीकृष्ण के प्रति जागरूकता विकसित करनी होगी।\n\nयशोदा-नन्दन व्रज-जन-रञ्जन। श्रीकृष्ण का एकमात्र कार्य व्रज-जनों को सन्तुष्ट करना है, और उनका एकमात्र कार्य श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट करना है। यही प्रेम की पारस्परिकता है। यमुना-तीर-वन-चारी: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों, ग्वालबालों, पक्षियों, भौंरों, तथा गौओं एवं बछड़ों को प्रसन्न करने हेतु यमुना के तट पर विचरण करते हैं। ये साधारण पक्षी, भौंरे, गौएँ, बछड़े अथवा मनुष्य नहीं हैं; इन सभी ने आत्म-साक्षात्कार के शिखर को प्राप्त कर लिया है और इस प्रकार, अनेकानेक जन्मों के पश्चात्, ऐसी स्थिति प्राप्त की है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्ण के साथ खेल सकते हैं। यह कृष्णभावनामृत आन्दोलन प्रत्येक को कृष्णलोक जाने तथा मित्र, सेवक, पिता अथवा माता के रूप में श्रीकृष्ण का पार्षद बनने में समर्थ बना सकता है। श्रीकृष्ण अपने भक्त के सम्बन्ध में इनमें से कोई भी स्थिति ग्रहण करने को सहमत रहते हैं। वे यह कैसे करते हैं, यह सब हमारे ग्रन्थ भगवान् चैतन्य की शिक्षाएँ में वर्णित है। श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध का साक्षात्कार करने हेतु, हमें केवल भगवान् चैतन्य तथा उनके प्रमुख पार्षदों, अर्थात् छः गोस्वामियों—श्री रूप, सनातन, श्री जीव, गोपाल, रघुनाथ दास, तथा रघुनाथ भट्ट—के पदचिह्नों पर चलना है। ये गोस्वामीगण सदा हरे कृष्ण का जप तथा भावविभोर होकर नृत्य करने में संलग्न रहते थे। उन्होंने सिखाया कि जब कोई कृष्ण-कीर्तन, अर्थात् श्रीकृष्ण के पवित्र नामों के कीर्तन में मग्न हो जाता है, तब वह कृष्ण-प्रेम के सागर में विलीन हो जाता है। जैसे ही श्रीकृष्ण के नाम की ध्वनि गुंजायमान होती है, मनुष्य तत्क्षण प्रेम के सागर में विलीन हो सकता है। यही शुद्ध भक्ति का चिह्न है। इस प्रकार कीर्तनों के समय छः गोस्वामी तत्क्षण ईश्वर-प्रेम के सागर में विलीन हो जाते थे।\n\nछः गोस्वामी न केवल भगवान् चैतन्य महाप्रभु के अन्य भक्तों को, अपितु अभक्तों को भी प्रिय थे। शुद्ध भक्त की स्थिति यह है कि उसका कोई शत्रु नहीं होता क्योंकि वह ईर्ष्यालु नहीं होता। शुद्ध भक्त सदा प्रत्येक के लिए खुला रहता है, और वह यह भेद नहीं करता कि इस व्यक्ति को हरे कृष्ण जप करने की अनुमति दी जा सकती है और उस व्यक्ति को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। भौतिक स्तर पर, जो द्वैत का स्तर है, ऊँच-नीच, पुरुष-स्त्री, तथा इस-उस के बीच भेद होते हैं, किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर ऐसे कोई भेद नहीं होते। शुद्ध भक्त, समदृष्टि से प्रत्येक वस्तु को देखते हुए, इसी कारण ईर्ष्यारहित होता है। चूँकि वह ईर्ष्यारहित है, इसलिए वह आराध्य है। वस्तुतः, यहाँ तक कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति केवल इसीलिए आराध्य है यदि वह ईर्ष्यारहित है, क्योंकि ईर्ष्यारहित होना केवल आध्यात्मिक स्तर पर ही सम्भव है। यह भगवद्गीता (5.18–19) का भी निर्णय है:\n\nvidyā-vinaya-sampanne\n\nbrāhmaṇe gavi hastini\n\nśuni caiva śvapāke ca\n\npaṇḍitāḥ sama-darśinaḥ\n\nihaiva tair jitaḥ sargo\n\nyeṣāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ\n\nnirdoṣaṁ hi samaṁ brahma\n\ntasmād brahmaṇi te sthitāḥ\n\n\"विनम्र ऋषि, यथार्थ ज्ञान के बल पर, एक विद्वान् एवं विनयशील ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ते तथा एक कुत्ता-भक्षक को समान दृष्टि से देखता है। जिनके मन समता एवं समभाव में स्थित हैं, उन्होंने जन्म-मृत्यु की अवस्थाओं को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं, और इस प्रकार वे पहले ही ब्रह्म में स्थित हैं।\"\n\nऐसी स्थिति वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसने भगवान् चैतन्य की कृपा अर्जित की है। उनकी कृपा प्राप्त करने पर, कोई व्यक्ति पीड़ित मानवता को भौतिक कल्मष से उद्धार कर सकता है। चूँकि छः गोस्वामी ऐसे भक्त थे, इसलिए हम इस मन्त्र के साथ उन्हें अपना सादर प्रणाम अर्पित करते हैं: वन्दे रूप-सनातनौ रघु-युगौ श्री-जीव-गोपालकौ। छः गोस्वामी संसार में वास्तविक धर्म की स्थापना करने के लक्ष्य से समस्त शास्त्रों का सूक्ष्मता से अध्ययन करने में निपुण थे। वे हमारे मार्गदर्शन हेतु अनेक ग्रन्थ छोड़ गए, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध श्री रूप गोस्वामी का भक्ति-रसामृत-सिन्धु (द नेक्टर ऑफ डिवोशन) है, जो नवदीक्षित भक्त को आरम्भिक दिशा-निर्देश देता है। गोस्वामीगण सदा अत्यन्त कठिन परिश्रम करते थे, दिन-रात, और उनका कार्य केवल ग्रन्थ लिखना, जप करना तथा नृत्य करना था। वस्तुतः, वे खाने, सोने, मैथुन करने तथा भय से अपनी रक्षा करने की शारीरिक आवश्यकताओं से प्रायः मुक्त थे। मैथुन का तो प्रश्न ही नहीं था, और न ही भय अथवा रक्षा का कोई प्रश्न था, क्योंकि वे पूर्णतः श्रीकृष्ण में लीन थे। वे अधिक से अधिक प्रतिदिन डेढ़ घण्टा सोते थे, और वे प्रायः कुछ भी नहीं खाते थे। जब भी उन्हें भूख लगती, तो वे केवल किसी गृहस्थ के घर जाकर एक या दो रोटी के टुकड़े माँग लेते थे।\n\nऐसे साधु-पुरुषों का ध्येय केवल यही है कि प्रत्येक को आध्यात्मिक चेतना तक उन्नत करके पीड़ित मानवता को सुखी बनाएँ। भौतिक जगत् में, प्रत्येक एक-दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है—एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, एक समाज दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, एक व्यापारी दूसरे का शोषण करने का प्रयत्न कर रहा है, इत्यादि। इसे अस्तित्व के लिए संघर्ष कहा जाता है, और इसी से संघर्षरत लोगों ने एक नियम गढ़ लिया है जिसका नाम है \"जिसकी लाठी उसकी भैंस\", किन्तु हम वास्तव में देख सकते हैं कि सबसे शक्तिशाली को भी संघर्ष करना पड़ता है, ठीक जैसा वर्तमान विश्व-स्थिति में है। रूस, अमेरिका तथा चीन के बीच एक महान् संघर्ष चल रहा है। ऐसे संघर्ष के कारण, प्रत्येक कष्ट भोग रहा है। वस्तुतः, अस्तित्व के लिए संघर्ष का अर्थ ही कष्ट है। तथापि, श्रीकृष्ण के शुद्ध भक्तगण दूसरों का शोषण करने में नहीं, अपितु लोगों को सुखी बनाने में रुचि रखते हैं, और इसी कारण समस्त लोकों में उनकी आराधना की जाती है। चाणक्य पण्डित ने तो यहाँ तक कहा कि एक धनी मनुष्य तथा एक विद्वान् मनुष्य की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि एक धनी मनुष्य अपने ही देश में अथवा अपने ही लोक में सम्मानित हो सकता है, किन्तु एक विद्वान् मनुष्य, अर्थात् ईश्वर का भक्त, जहाँ भी जाता है वहीं सम्मानित होता है।\n\nभक्त के लिए स्वर्ग एवं नरक में भी कोई भेद नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण दोनों ही स्थानों पर उसके साथ रहते हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ नरक का प्रश्न ही नहीं उठता; प्रत्येक स्थान वैकुण्ठ है। उदाहरणार्थ, हरिदास ठाकुर पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे, क्योंकि उनका जन्म एक मुसलमान परिवार में हुआ था, और हिन्दू मुसलमानों के मन्दिर में प्रवेश करने का विरोध करते थे। तथापि, हरिदास ठाकुर ने इससे स्वयं को विचलित नहीं होने दिया। उन्होंने सोचा, \"ओह, मैं जाकर उन्हें क्यों विचलित करूँ? मैं यहीं जप करूँगा।\" परिणामस्वरूप भगवान् चैतन्य, जो स्वयं भगवान् जगन्नाथ हैं, हरिदास से मिलने प्रतिदिन आते थे। यही शुद्ध भक्त की शक्ति है: उसे जगन्नाथ के पास नहीं जाना पड़ता; जगन्नाथ उसके पास आते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु जब समुद्र में स्नान करने जाते थे, तब प्रतिदिन हरिदास ठाकुर से मिलने जाया करते थे। भगवान् हरिदास की कुटिया में प्रवेश करके पूछते, \"हरिदास, तुम क्या कर रहे हो?\" और हरिदास उत्तर देते, \"कृपया भीतर पधारिए, हे मेरे प्रभु।\" अतः यही भक्त की वास्तविक स्थिति है। अतएव श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके भक्त की उपासना स्वयं उनकी उपासना से भी अधिक मूल्यवान् है। भक्त वास्तव में श्रीकृष्ण को प्रदान करने में समर्थ है, क्योंकि वह कृष्णभावनामृत के विज्ञान को, श्रीकृष्ण के वचनों को सुनने के विज्ञान को, कृष्ण-प्रसादम् ग्रहण करने तथा श्रीकृष्ण का आनन्द लेने के विज्ञान को जानता है। निर्विशेषवादी तथा शून्यवादी अहं ब्रह्मास्मि—\"मैं आत्मा हूँ\"—पर शुष्क दार्शनिक ग्रन्थों का उपदेश दे सकते हैं, किन्तु अन्ततः कौन आकृष्ट होगा? जो सोचता है, \"मैं पत्थर हूँ\", और जो सोचता है, \"मैं शून्य हूँ\", उनमें क्या अन्तर है? हम पत्थर, काठ अथवा शून्य क्यों बनें? हमारी वास्तविक स्थिति श्रीकृष्ण के साथ प्रेममय व्यवहार में पारस्परिकता निभाने की होनी चाहिए।\n\nश्रीकृष्ण के प्रति प्रेम की चिनगारी आध्यात्मिक गुरु, अर्थात् शुद्ध भक्त के द्वारा प्रज्वलित की जाती है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरे आध्यात्मिक गुरु, हिज़ डिवाइन ग्रेस ॐ विष्णुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने मुझे पाश्चात्य जगत् में कृष्णभावनामृत के प्रसार का उत्तरदायित्व ग्रहण करने का आदेश दिया। हिज़ डिवाइन ग्रेस की पाश्चात्य देशों में भगवान् चैतन्य के सन्देश का प्रचार करने की महान् इच्छा थी, और मेरी सफलता उनकी कृपा एवं प्रसन्नता दोनों है। जब मैं प्रथम बार अपने आध्यात्मिक गुरु से मिला, तब मैं भारत में एक अत्यन्त युवा व्यक्ति था, एक राष्ट्रवादी, एक अत्यन्त उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यालय में संलग्न। किन्तु यद्यपि मैं जाना नहीं चाहता था, फिर भी मेरे एक मित्र ने, जो आज भी कलकत्ता में जीवित हैं, मुझे हिज़ डिवाइन ग्रेस के पास बलपूर्वक ले गए। मैं उनसे मिलने में अनिच्छुक था क्योंकि हमारे घर में हमारे पिता अनेक संन्यासियों का स्वागत किया करते थे और मैं उनके व्यवहार से बहुत सन्तुष्ट नहीं था। मैंने सोचा कि भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज भी कोई वैसे ही व्यक्ति होंगे, और यदि वे वैसे ही हुए, तो उनसे मिलने में मेरा क्या प्रयोजन? किन्तु मेरे मित्र मुझे बलपूर्वक ले गए। \"उनसे मिल क्यों नहीं लेते?\" उन्होंने पूछा। मैं अन्ततः मान गया और उनके साथ गया, और मुझे लाभ हुआ।\n\nमेरी प्रथम भेंट पर, हिज़ डिवाइन ग्रेस ने कहा कि मेरे जैसे शिक्षित युवकों का विदेशी देशों में जाकर चैतन्य महाप्रभु के सुसमाचार का प्रचार करना आवश्यक है। मैंने उत्तर दिया कि भारत एक विदेशी-शासित राष्ट्र है और कोई हमारे सन्देशों को नहीं सुनेगा। वस्तुतः, उस समय विदेशी भारतीयों को अत्यन्त तुच्छ समझते थे, क्योंकि इतने सारे स्वतन्त्र राष्ट्रों के समक्ष भारत अब भी परतन्त्र था, ब्रिटेन के अधीन। उस समय एक बंगाली कवि थे जिन्होंने वास्तव में यह विलाप किया कि असभ्य राष्ट्र तक स्वतन्त्र थे, जबकि भारत ब्रिटेन पर निर्भर था। हिज़ डिवाइन ग्रेस ने मुझे आश्वस्त किया कि परतन्त्रता एवं स्वतन्त्रता केवल अस्थायी अवस्थाएँ हैं, और उन्होंने इंगित किया कि चूँकि हम मानवता के नित्य कल्याण से सरोकार रखते हैं, इसलिए हमें चैतन्य महाप्रभु की इस चुनौती को ग्रहण करना चाहिए। हिज़ डिवाइन ग्रेस, मेरे गुरु महाराज के साथ यह भेंट 1922 में हुई, अर्थात् आधी शताब्दी पूर्व।\n\nमुझे विधिवत् दीक्षा 1933 में मिली, अर्थात् गुरु महाराज के इस मर्त्यलोक से प्रयाण से ठीक तीन वर्ष पूर्व। अन्तिम क्षण में, उनके प्रयाण से ठीक एक पखवाड़ा पूर्व, उन्होंने मुझे एक पत्र लिखकर अपने निर्देशों को दोहराया। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि मुझे यह सुसमाचार अंग्रेज़ी-भाषी लोगों के मध्य प्रचारित करने का प्रयत्न करना चाहिए। यह पत्र पाने के पश्चात्, मैं कभी-कभी स्वप्न देखता था कि गुरु महाराज मुझे बुला रहे हैं और मैं घर छोड़कर उनका अनुसरण कर रहा हूँ। मैं इस प्रकार स्वप्न देखता था और सोचता था, \"मुझे अपना घर त्यागना होगा। मेरे गुरु महाराज चाहते हैं कि मैं अपना घर त्यागकर संन्यास ग्रहण करूँ।\" साथ ही मैं सोचता था, \"यह तो भयानक है। मैं अपना घर कैसे छोड़ूँ? अपनी पत्नी को? अपने बच्चों को?\" इसे माया कहा जाता है। वस्तुतः मैं अपना गृहस्थ-जीवन त्यागना नहीं चाहता था, किन्तु गुरु महाराज ने मुझसे उसे त्यागवा दिया। उनके आदेशों का पालन करते हुए, मैंने अपना घर, कुछ बच्चों सहित, छोड़ दिया, किन्तु अब गुरु महाराज ने मुझे समूचे संसार में अनेक सुन्दर बच्चे दे दिए हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण की सेवा करने से किसी की हानि नहीं होती, और यह मेरे अपने व्यावहारिक अनुभव का एक उदाहरण है।\n\nजब मैं 1965 में अकेला भारत से निकला, तब मुझे भय था कि मुझे बहुत कठिनाई होगी। भारत सरकार मुझे देश से कोई धन बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देती थी, अतः मैं केवल कुछ ग्रन्थ तथा चालीस रुपए लेकर आया। मैं ऐसी ही अवस्था में न्यूयॉर्क नगर पहुँचा, किन्तु यह सब गुरु महाराज तथा श्रीकृष्ण की कृपा से हुआ। सब कुछ श्रीकृष्ण तथा आध्यात्मिक गुरु की संयुक्त कृपा से होता है। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि श्रीकृष्ण की कृपा तथा गुरु की कृपा संयुक्त रहती हैं। यही इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन की सफलता का रहस्य है। श्रीकृष्ण सदा हमारे भीतर रहते हैं, और इसी कारण वे हमारे प्रयोजनों के विषय में सब कुछ जानते हैं, और वे हमें वैसा कार्य करने का अवसर देते हैं जैसा हम निर्णय करते हैं। यदि हम इस भौतिक जगत् का भोग करने का निर्णय करें, तो श्रीकृष्ण हमें एक अत्यन्त चतुर व्यापारी अथवा एक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ अथवा एक धूर्त मनुष्य बनने की बुद्धि देते हैं ताकि हम धन कमा सकें और अपना भोग कर सकें। भौतिक जीवन के मानदण्डों के अनुसार, अनेक लोग महान् बन रहे हैं। वे अत्यन्त दरिद्र मनुष्यों के रूप में आरम्भ करते हैं और शीघ्र ही, सौभाग्यवश, करोड़पति बन जाते हैं। तथापि, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे अपने तुच्छ प्रयासों से ऐसी सफलता प्राप्त कर रहे हैं। बुद्धि के बिना, कोई उन्नति नहीं कर सकता, और वह बुद्धि श्रीकृष्ण द्वारा दी जाती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे प्रत्येक के हृदय में परमात्मा के रूप में आसीन हैं और कि उनकी इच्छा से मनुष्य स्मरण कर सकता है, और उनकी इच्छा से मनुष्य भूल सकता है। श्रीकृष्ण जीव की इच्छा के अनुसार विस्मृति एवं स्मृति प्रदान करते हैं। यदि हम श्रीकृष्ण को भूलकर भौतिक जगत् का भोग करना चाहें, तो वे हमें आवश्यक बुद्धि देंगे ताकि हम उन्हें सदा के लिए भूल सकें।\n\nअनेक लोग सोच रहे हैं, \"मैं इस भौतिक जगत् का अत्यन्त भली-भाँति भोग कर सकता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति इतना अच्छा समय बिता रहा है। कोई कारण नहीं कि मैं उतना भोग न कर सकूँ जितना वे करते हैं।\" यह विचार भ्रम है क्योंकि भौतिक जगत् में कोई वास्तविक भोग नहीं है। हम राष्ट्रपति केनेडी के समान किसी अत्यन्त उच्च पद तक उठ सकते हैं। हम अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त विख्यात, अत्यन्त बुद्धिमान् एवं सुशिक्षित, अत्यन्त धनी एवं अत्यन्त शक्तिशाली हो सकते हैं, और हमारी एक अत्यन्त सुन्दर पत्नी एवं बच्चे हो सकते हैं तथा हम देश का सर्वोच्च पद धारण कर सकते हैं—किन्तु किसी भी क्षण हम गोली से मारे जाने के अधीन हैं। यही भौतिक जगत् का स्वभाव है: हमें पग-पग पर संकट का सामना करना पड़ता है। बिना अवरोधों के सुख का प्रश्न ही नहीं है। यहाँ तक कि जब सुख अर्जित किए जाते हैं, तब भी वे बहुत अधिक संघर्ष एवं त्याग के पश्चात् अर्जित किए जाते हैं, और जो भी सुख अर्जित किया जाए वह क्षणभंगुर होता है, क्योंकि भौतिक जगत् में ऐसा कोई सुख नहीं है जो हमें निरन्तर एवं अनन्त भोग दे सके। केवल श्रीकृष्ण ही हमें वह दे सकते हैं।\n\nअतएव श्रीकृष्ण भगवद्गीता में उपदेश देते हैं कि प्रत्येक जीव का कल्याण इसी में है कि वह इस निरर्थक भौतिक गतिविधि को त्यागकर केवल उनकी शरण ग्रहण कर ले। दुर्भाग्यवश, इस युग में लोग भौतिक प्रकृति की चकाचौंध से, भ्रम अथवा माया से इतने आकृष्ट हैं कि उन्हें बहुत रुचि नहीं है। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक घोषित करते हैं कि यदि कोई उनकी शरण ग्रहण करे, तो वे समस्त पापमय प्रतिक्रियाओं से पूर्ण रक्षा प्रदान करेंगे, फिर भी लोग इतने आसक्त हैं कि वे ऐसा नहीं कर पाते। लोग सदा भयभीत रहते हैं कि श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करने से वे कुछ खो देंगे, ठीक जैसे मुझे पाश्चात्य जगत् में जाकर प्रचार करने से अपना परिवार खोने का भय था। किन्तु श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि यदि वे कुछ ले भी लें, तो वे हमें सहस्रों गुना अधिक पुरस्कृत करेंगे।\n\nआध्यात्मिक गुरु भी इस अर्थ में दयालु हैं कि वे द्वार-द्वार, देश-देश, नगर-नगर भिक्षा माँगते हैं: \"हे मेरी प्रिय देवियो एवं सज्जनो, हे मेरे प्रिय बालको एवं बालिकाओ, कृपया कृष्णभावनामृत को अपनाइए।\" इस प्रकार वे श्रीकृष्ण की अत्यन्त गोपनीय सेवा करते हैं। श्रीकृष्ण वे परमेश्वर हैं जो आदेश देते हैं, और आध्यात्मिक गुरु उन आदेशों का सम्पादन करते हैं; इसी कारण आध्यात्मिक गुरु श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं। श्रीकृष्ण उन्हें स्वर्ग भेजें अथवा नरक, इससे उनके लिए कोई अन्तर नहीं पड़ता। आध्यात्मिक गुरु, अर्थात् शुद्ध भक्त के लिए, स्वर्ग एवं नरक दोनों समान हैं यदि वहाँ कृष्णभावनामृत न हो। नरक में लोग अनेक प्रकार से कष्ट भोग रहे हैं, और स्वर्ग में वे अनेक प्रकार से अपनी इन्द्रियों का भोग कर रहे हैं, किन्तु भगवान् का भक्त किसी भी ऐसे स्थान पर रह सकता है जहाँ कृष्णभावनामृत हो, और चूँकि वह इस चेतना को अपने साथ लाता है, इसलिए वह सदा आत्म-सन्तुष्ट रहता है। यदि उसे नरक भेज दिया जाए, तो वह केवल हरे कृष्ण का जप करके सन्तुष्ट रहेगा। वस्तुतः, वह नरक में नहीं, अपितु श्रीकृष्ण में विश्वास करता है। इसी प्रकार, यदि उसे स्वर्ग में रख दिया जाए, जहाँ इन्द्रियतृप्ति के इतने सारे अवसर हैं, तो वह वहाँ भी अलिप्त रहेगा, क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा सन्तुष्ट हैं। इस प्रकार भगवान् की सेवा हेतु एक भक्त कहीं भी जाने को तैयार रहता है, और इसी कारण वह श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।\n\nविरक्त निर्विशेषवादी दार्शनिक कहते हैं कि यह संसार मिथ्या है और कि निराकार ब्रह्म ही सत्य है। किन्तु यदि उनसे ऐसे समाज में जाने को कहा जाए जहाँ भौतिक इन्द्रियतृप्ति प्रधान हो, तो वे उन परिस्थितियों से प्रभावित होने के भय से इन्कार कर देंगे। तथापि, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के लिए ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। चूँकि वह संयमित है और उसने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर ली है, इसलिए वह कहीं भी जाने से नहीं डरता।\n\nफलस्वरूप, जब भक्तगण किसी ऐसे स्थान पर मिलते हैं जहाँ कृष्णभावनामृत नहीं है, तब कोई हानि नहीं है, क्योंकि वे हरे कृष्ण का जप करने तथा उस स्थान को कृष्णभावनामृत से ओतप्रोत करने का अवसर ले लेते हैं। यह अवसर सदा लिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को स्वयं को किसी कक्ष में बन्द करके अकेले जप करना चाहिए। महान् ऋषि नारद एक अन्तरिक्ष-यात्री हैं जो समूचे ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हैं। यद्यपि वे सर्वाधिक उन्नत लोकों में निवास कर सकते हैं, फिर भी वे कभी-कभी नरक में जाकर वहाँ प्रचार करते हैं। यही ईश्वर के सेवक की सुन्दरता है—वह सदा श्रीकृष्ण तथा उनके अंशों के प्रति प्रेम के कारण कार्य करता रहता है।\n\nभक्ति-सेवा का अन्तर्निहित सिद्धान्त श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। किसी विशेष भक्त की स्थिति चाहे जो भी हो—श्रीकृष्ण के मित्र, सेवक, माता-पिता अथवा प्रेमी के रूप में—उसकी सेवा निःशर्त होती है, क्योंकि कृष्णभावनामृत किसी भौतिक परिस्थिति पर निर्भर नहीं है। वह दिव्य है और उसका भौतिक प्रकृति के गुणों से कोई सरोकार नहीं है। भक्त कहीं भी जाने से नहीं डरता, और इसी कारण वह समस्त भौतिक परिस्थितियों को समान देखता है। संसार में हम कह सकते हैं कि यह रहने का अच्छा स्थान है और वह बुरा स्थान है, किन्तु, जैसा पहले इंगित किया गया, भक्त इन मानसिक कल्पनाओं के अधीन नहीं है। उसके लिए भौतिक अस्तित्व का मूल सिद्धान्त ही बुरा है, क्योंकि भौतिक अस्तित्व का अर्थ है श्रीकृष्ण की विस्मृति।\n\nभक्ति की तटस्थ अवस्था में मनुष्य भगवान् की निराकार दीप्ति को तथा हृदय के भीतर स्थित परमात्मा को अधिक महत्त्व दे सकता है, किन्तु कृष्णभावनामृत वास्तव में तब विकसित होता है जब मनुष्य सोचता है, \"श्रीकृष्ण मेरे घनिष्ठ सम्बन्धों के अत्यन्त घनिष्ठ स्वामी हैं।\" आरम्भ में, निस्सन्देह, निराकार साक्षात्कार तथा परमात्मा का साक्षात्कार कृष्णभावनामृत के अंग हैं। ईश्वर का उनके निराकार पक्ष में अथवा परमात्मा के रूप में उनके पक्ष में आंशिक साक्षात्कार मनुष्य को भगवान् के प्रति श्रद्धा विकसित करने में समर्थ बनाता है, किन्तु जब मनुष्य का श्रीकृष्ण के साथ मित्र, स्वामी, पुत्र अथवा प्रेमी के रूप में घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है, तब वह श्रद्धा लुप्त हो जाती है।\n\nव्यक्तिगत सम्बन्ध का यह स्तर निश्चय ही निराकार स्तर अथवा परमात्मा, अर्थात् परमात्मा के साक्षात्कार के स्तर से उच्चतर है। तटस्थ धारणा में, मनुष्य केवल यह अनुभव करता है कि वह तथा परम सत्य गुणतः एक हैं, अथवा वह अनुभव करता है कि वह परम का अंश है। यह निश्चय ही ज्ञान है, क्योंकि जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ सेवक के रूप में व्यक्तिगत सम्बन्ध विकसित करता है, तब वह परमेश्वर के पूर्ण ऐश्वर्य की सराहना करने लगता है। जो यह अनुभव करता है कि ईश्वर छः ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, वह वास्तव में सेवा अर्पित करने लगता है। जैसे ही मनुष्य श्रीकृष्ण की महानता के प्रति जागरूक हो जाता है और श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता को समझ लेता है, उसकी सेवा आरम्भ हो जाती है। दिव्य सेवा अर्पित किए जाने पर ईश्वर की महानता के प्रति जागरूकता बढ़ती है। जो व्यक्ति भगवान् की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने हेतु भगवान् की सेवा करता है, वह सन्तुष्ट हो जाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं और व्यक्तिगत जीव उनका अंश है। यदि वे सन्तुष्ट हैं, तो जीव सन्तुष्ट है। यदि पेट सन्तुष्ट है, तो शरीर के समस्त अंग सन्तुष्ट हैं, क्योंकि वे पेट के माध्यम से पोषण प्राप्त करते हैं। जब मेरे एक गुरुभाई ने एक अत्यन्त गर्म दिन में मेरे गुरु महाराज को पंखा झलना आरम्भ किया, तब गुरु महाराज ने पूछा, \"तुम अकस्मात् मुझे पंखा क्यों झल रहे हो?\" उस बालक ने उत्तर दिया, \"क्योंकि यदि आप सन्तुष्ट हैं, तो हम सभी सन्तुष्ट हैं।\" यही सूत्र है—हमें अपनी इन्द्रियों को पृथक् रूप से सन्तुष्ट करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, अपितु श्रीकृष्ण की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करना चाहिए। तब स्वाभाविक रूप से हम सन्तुष्ट हो जाएँगे।\n\nकृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदा श्रीकृष्ण को सन्तुष्टि देने का प्रयत्न करता रहता है, और यही कृष्णभावनामृत का आरम्भ है। चूँकि निराकार धारणा में ईश्वर का कोई रूप नहीं है, इसलिए उनकी इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने का कोई अवसर नहीं है। तथापि, जो श्रीकृष्ण को स्वामी के रूप में देखता है, वह सेवा अर्पित कर सकता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को हृषीकेश, अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी के रूप में सम्बोधित किया गया है। जब यह समझ लिया जाता है कि परम सत्य इन्द्रियों के स्वामी हैं, कि हमारी इन्द्रियाँ उनकी इन्द्रियों की उपज हैं, और कि उन्हें इसीलिए उनकी इन्द्रियों की सन्तुष्टि हेतु प्रयुक्त किया जाना चाहिए, तब कृष्णभावनामृत, जो प्रत्येक के भीतर सुप्त है, जागृत होने लगता है। एक बार चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, \"श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में तटस्थ स्थिति तथा स्वामी एवं सेवक के सम्बन्ध में क्या अन्तर है?\" दोनों ही दशाओं में मनुष्य समझ सकता है कि श्रीकृष्ण महान् हैं, किन्तु तटस्थ स्थिति में सेवा की कोई प्रवृत्ति नहीं होती। इसी कारण श्रीकृष्ण तथा जीव के बीच स्वामी-सेवक का सम्बन्ध अधिक उन्नत है। फिर जब मनुष्य श्रीकृष्ण के साथ मैत्री प्राप्त करता है, तब एक और दिव्य गुण जुड़ जाता है। यह धारणा रहती है कि ईश्वर महान् हैं और उनकी सेवा अर्पित की जानी चाहिए, किन्तु एक अतिरिक्त भाव भी रहता है: \"श्रीकृष्ण मेरे मित्र हैं। अतएव मुझे उनके साथ इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए कि वे प्रसन्न रहें।\" मित्र के साथ हम केवल सेवा अर्पित करने मात्र से सन्तुष्ट नहीं होते, अपितु उसे वास्तव में सुखी एवं सन्तुष्ट बनाने में सन्तुष्ट होते हैं। ऐसे सम्बन्ध में समानता भी होती है, क्योंकि श्रीकृष्ण तथा भक्त समान स्तर पर सम्बन्ध रखते हैं। इस प्रकार इस स्थिति में भक्तगण वास्तव में श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता को भूल जाते हैं। जब श्रीकृष्ण के बालमित्र खेल खेलते हुए श्रीकृष्ण के कन्धों पर सवारी करते थे, तब वे यह नहीं सोचते थे कि वे उनसे बड़े हैं। वहाँ इन्द्रियतृप्ति अथवा आत्म-महिमा का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि सम्बन्ध शुद्ध प्रेम पर आधारित है। भक्त की एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को सुख देने की है, और श्रीकृष्ण भी उनसे सुख प्राप्त करने हेतु अपने मित्रों को अपने कन्धों पर बैठाते हैं। कभी-कभी कोई व्यक्ति केवल इस तथ्य को स्वीकार कर लेता है कि उसका मित्र उसके मुख पर थप्पड़ मारेगा—किन्तु ऐसे कार्य में हीनता का कोई प्रश्न नहीं है। जब मैत्री एवं पारस्परिक सुख सम्बन्ध का आधार हों, तब अपमान अथवा हीनता का कोई प्रश्न नहीं रहता।\n\nकृष्णभावनामृत तथा श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध का समूचा आधार स्वयं श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति है। श्रीमती राधारानी, व्रज की कन्याएँ, तथा श्रीकृष्ण के ग्वालबाल मित्र—सभी श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति के विस्तार हैं। हम सभी में सुख की ओर एक प्रवृत्ति है, क्योंकि जिस स्रोत से हम निःसृत होते हैं वह सुख में पूर्णतः सामर्थ्यवान् है। निर्विशेषवादी इन शब्दों में नहीं सोच सकते, क्योंकि वे आह्लादिनी शक्ति का खण्डन करते हैं; अतएव निर्विशेषवादी दर्शन अपूर्ण एवं निम्न है। जो कृष्णभावनामृत में हैं, वे श्रीकृष्ण में तथा उनकी समस्त सामग्री—उनके मित्रों, सेवकों, पिता, माता तथा प्रियतमा—में आह्लादिनी शक्ति को पहचानते हैं। श्रीकृष्ण के साथ वे समस्त सम्बन्ध जिनका लक्ष्य श्रीकृष्ण की इन्द्रियों को सन्तुष्ट करना है, श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।\n\nजहाँ तक व्यक्तिगत आत्मा का प्रश्न है, वह मूलतः इस आह्लादिनी शक्ति का, अर्थात् स्वयं सुख के आगार का अंश है। तथापि, भौतिक प्रकृति के सम्पर्क के कारण, आत्मा अपनी वास्तविक स्थिति को भूल गई है और एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की क्रमिक प्रक्रिया में फँस गई है। इस प्रकार मनुष्य अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करता है। अब हमें संघर्ष के इन कष्टों से, उन असंख्य देहान्तरणों से जो हमें जन्म, वृद्धावस्था, रोग एवं मृत्यु के दुःख भोगने पर विवश करते हैं, स्वयं को निकालना होगा और कृष्णभावनामृत में अपने नित्य जीवन के बिन्दु तक आना होगा। वह नित्य जीवन सम्भव है। यदि कोई इस मानव-जीवन में अपना सर्वोत्तम प्रयत्न करे, तो अपने अगले जीवन में उसे एक आध्यात्मिक शरीर मिलेगा। आध्यात्मिक शरीर पहले से ही स्थूल भौतिक शरीर के भीतर है, किन्तु वह तभी विकसित होगा जब मनुष्य इस भौतिक अस्तित्व के कल्मष से मुक्त हो जाए। यही मानव-जीवन का ध्येय तथा समस्त लोगों का वास्तविक स्वार्थ है। स्वार्थ का अर्थ वस्तुतः यह अनुभव करना है, \"मैं ईश्वर का अंश हूँ। मुझे ईश्वर के राज्य में लौटना है और उनसे जा मिलना है।\" जिस प्रकार यहाँ हमारा एक सामाजिक जीवन है, उसी प्रकार ईश्वर का आध्यात्मिक राज्य में एक सामाजिक जीवन है, और हम वहाँ उनसे जा मिल सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इस शरीर को समाप्त करने के पश्चात् हम शून्य हो जाते हैं। भगवद्गीता (2.12) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, \"ऐसा कभी नहीं था जब मैं विद्यमान न था, न ही तुम, न ही ये समस्त राजा, और न ही भविष्य में हममें से कोई विद्यमान रहना बन्द करेगा।\" अतएव हमारा अस्तित्व नित्य है, और जन्म-मृत्यु के परिवर्तन केवल क्षणभंगुर भौतिक शरीरों के परिवर्तन हैं।"}
